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    <title><![CDATA[साईबाबा]]></title>
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    <description><![CDATA[Life and Teachings of Sai Baba, Bhajans, stotras, artis, Information, photos & Picture Gallery of Sai]]></description>
    <copyright>Copyright webdunia.com</copyright>
    <lastBuildDate>Wed, 10 Jun 2026 00:37:19 +0530</lastBuildDate>
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      <title>साईबाबा</title>
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      <title><![CDATA[Shri Sai Chalisa साई चालीसा स्मरण केल्याने साई कृपा प्राप्त होते]]></title>
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      <description><![CDATA[पहले साईं के चरणों में, अपना शीश नमाऊं मैं ।
कैसे शिर्डी साईं आए, सारा हाल सुनाऊं मैं ॥1॥

कौन हैं माता, पिता कौन हैं, यह न किसी ने भी जाना ।
कहां जनम साईं ने धारा, प्रश्न पहेली रहा बना ॥]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="shirdi sai baba" class="imgCont" height="592" src="https://media.webdunia.com/_media/mr/img/article/2021-04/08/full/1617851768-1788.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="shirdi sai baba" width="740" /></p>
	</p>
	पहले साईं के चरणों में, अपना शीश नमाऊं मैं ।</p>
<p>
	कैसे शिर्डी साईं आए, सारा हाल सुनाऊं मैं ॥1॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कौन हैं माता, पिता कौन हैं, यह न किसी ने भी जाना ।</p>
<p>
	कहां जनम साईं ने धारा, प्रश्न पहेली रहा बना ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कोई कहे अयोध्या के ये, रामचन्द्र भगवान हैं ।</p>
<p>
	कोई कहता साईंबाबा, पवन-पुत्र हनुमान हैं ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कोई कहता मंगल मूर्ति, श्री गजानन हैं साईं ।</p>
<p>
	कोई कहता गोकुल-मोहन, देवकी नन्दन हैं साईं ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शंकर समझ भक्त कई तो, बाबा को भजते रहते ।</p>
<p>
	कोई कह अवतार दत्त का, पूजा साईं की करते ॥</p>
<p>
	कुछ भी मानो उनको तुम, पर साईं हैं सच्चे भगवान ।</p>
<p>
	बड़े दयालु, दीनबन्धु, कितनों को दिया है जीवन दान ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कई वर्ष पहले की घटना, तुम्हें सुनाऊंगा मैं बात ।</p>
<p>
	किसी भाग्यशाली की, शिर्डी में आई थी बारात ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आया साथ उसी के था, बालक एक बहुत सुन्दर ।</p>
<p>
	आया, आकर वहीं बस गया, पावन शिर्डी किया नगर ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कई दिनों तक रहा भटकता, भिक्षा मांगी उसने दर-दर ।</p>
<p>
	और दिखाई ऐसी लीला, जग में जो हो गई अमर ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जैसे-जैसे उमर बढ़ी, वैसे ही बढ़ती गई शान ।</p>
<p>
	घर-घर होने लगा नगर में, साईं बाबा का गुणगान ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दिग्-दिगन्त में लगा गूंजने, फिर तो साईंजी का नाम ।</p>
<p>
	दीन-दुखी की रक्षा करना, यही रहा बाबा का काम ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बाबा के चरणों में जाकर, जो कहता मैं हूं निर्धन ।</p>
<p>
	दया उसी पर होती उनकी, खुल जाते दु:ख के बन्धन ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कभी किसी ने मांगी भिक्षा, दो बाबा मुझको सन्तान ।</p>
<p>
	एवं अस्तु तब कहकर साईं, देते थे उसको वरदान ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	स्वयं दु:खी बाबा हो जाते, दीन-दुखी जन का लख हाल ।</p>
<p>
	अन्त: करण श्री साईं का, सागर जैसा रहा विशाल ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भक्त एक मद्रासी आया, घर का बहुत बड़ा धनवान ।</p>
<p>
	माल खजाना बेहद उसका, केवल नहीं रही सन्तान ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लगा मनाने साईं नाथ को, बाबा मुझ पर दया करो ।</p>
<p>
	झंझा से झंकृत नैया को, तुम ही मेरी पार करो ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कुलदीपक के अभाव में, व्यर्थ है दौलत की माया ।</p>
<p>
	आज भिखारी बन कर बाबा, शरण तुम्हारी मैं आया ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दे दो मुझको पुत्र दान, मैं ॠणी रहूंगा जीवन भर ।</p>
<p>
	और किसी की आस न मुझको, सिर्फ़ भरोसा है तुम पर ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अनुनय-विनय बहुत की उसने, चरणों में धर के शीश ।</p>
<p>
	तब प्रसन्न होकर बाबा ने, दिया भक्त को यह आशीष ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अल्लाह भला करेगा तेरा`, पुत्र जन्म हो तेरे घर ।</p>
<p>
	कृपा होगी तुम पर उसकी, और तेरे उस बालक पर ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अब तक नही किसी ने पाया, साईं की कृपा का पार ।</p>
<p>
	पुत्र रत्न दे मद्रासी को, धन्य किया उसका संसार ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	तन-मन से जो भजे उसी का, जग में होता है उद्धार ।</p>
<p>
	सांच को आंच नहीं है कोई, सदा झूठ की होती हार ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मैं हूं सदा सहारे उसके, सदा रहूंगा उसका दास ।</p>
<p>
	साईं जैसा प्रभु मिला है, इतनी ही कम है क्या आस ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मेरा भी दिन था इक ऐसा, मिलती नहीं मुझे थी रोटी ।</p>
<p>
	तन पर कपड़ा दूर रहा था, शेष रही नन्हीं सी लंगोटी ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सरिता सन्मुख होने पर भी मैं प्यासा का प्यासा था ।</p>
<p>
	दुर्दिन मेरा मेरे ऊपर, दावाग्नि बरसाता था ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	धरती के अतिरिक्त जगत में, मेरा कुछ अवलम्ब न था ।</p>
<p>
	बना भिखारी मैं दुनिया में, दर-दर ठोकर खाता था ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ऐसे में इक मित्र मिला जो, परम भक्त साईं का था ।</p>
<p>
	जंजालों से मुक्त मगर इस, जगती में वह मुझ-सा था ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बाबा के दर्शन की खातिर, मिल दोनों ने किया विचार ।</p>
<p>
	साईं जैसे दया-मूर्ति के, दर्शन को हो गए तैयार ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पावन शिर्डी नगरी में जाकर, देखी मतवाली मूर्ति ।</p>
<p>
	धन्य जन्म हो गया कि हमने, जब देखी साईं की सूरति ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जबसे किए हैं दर्शन हमने, दु:ख सारा काफूर हो गया ।</p>
<p>
	संकट सारे मिटे और, विपदाओं का अन्त हो गया ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मान और सम्मान मिला, भिक्षा में हमको बाबा से ।</p>
<p>
	प्रतिबिम्बित हो उठे जगत में, हम साईं की आभा से ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बाबा ने सम्मान दिया है, मान दिया इस जीवन में ।</p>
<p>
	इसका ही सम्बल ले मैं, हंसता जाऊंगा जीवन में ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साईं की लीला का मेरे, मन पर ऐसा असर हुआ ।</p>
<p>
	लगता जगती के कण-कण में, जैसे हो वह भरा हुआ ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	“काशीराम” बाबा का भक्त, इस शिर्डी में रहता था ।</p>
<p>
	मैं साईं का साईं मेरा, वह दुनिया से कहता था ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सीकर स्वयं वस्त्र बेचता, ग्राम नगर बाजारों में ।</p>
<p>
	झंकृत उसकी हृद तन्त्री थी, साईं की झंकारों में ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	स्तब्ध निशा थी, थे सोये, रजनी आंचल में चांद-सितारे ।</p>
<p>
	नहीं सूझता रहा हाथ को हाथ तिमिर के मारे ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वस्त्र बेचकर लौट रहा था, हाय! हाट से “काशी” ।</p>
<p>
	विचित्र बड़ा संयोग कि उस दिन, आता था वह एकाकी ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	घेर राह में खड़े हो गए, उसे कुटिल, अन्यायी ।</p>
<p>
	मारो काटो लूटो इस की ही ध्वनि पड़ी सुनाई ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लूट पीट कर उसे वहां से, कुटिल गये चम्पत हो ।</p>
<p>
	आघातों से ,मर्माहत हो, उसने दी संज्ञा खो ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बहुत देर तक पड़ा रहा वह, वहीं उसी हालत में ।</p>
<p>
	जाने कब कुछ होश हो उठा, उसको किसी पलक में ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अनजाने ही उसके मुंह से, निकल पड़ा था साईं ।</p>
<p>
	जिसकी प्रतिध्वनि शिर्डी में, बाबा को पड़ी सुनाई ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	क्षुब्ध उठा हो मानस उनका, बाबा गए विकल हो ।</p>
<p>
	लगता जैसे घटना सारी, घटी उन्हीं के सम्मुख हो ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उन्मादी से इधर-उधर, तब बाबा लगे भटकने ।</p>
<p>
	सम्मुख चीजें जो भी आईं, उनको लगे पटकने ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	और धधकते अंगारों में, बाबा ने अपना कर डाला ।</p>
<p>
	हुए सशंकित सभी वहां, लख ताण्डव नृत्य निराला ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	समझ गए सब लोग कि कोई, भक्त पड़ा संकट में ।</p>
<p>
	क्षुभित खड़े थे सभी वहां पर, पड़े हुए विस्मय में ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उसे बचाने के ही खातिर, बाबा आज विकल हैं ।</p>
<p>
	उसकी ही पीड़ा से पीड़ित, उनका अन्त:स्थल है ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इतने में ही विधि ने अपनी, विचित्रता दिखलाई ।</p>
<p>
	लख कर जिसको जनता की, श्रद्धा-सरिता लहराई ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लेकर कर संज्ञाहीन भक्त को, गाड़ी एक वहां आई ।</p>
<p>
	सम्मुख अपने देख भक्त को, साईं की आंखें भर आईं ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शान्त, धीर, गम्भीर सिन्धु-सा, बाबा का अन्त:स्थल ।</p>
<p>
	आज न जाने क्यों रह-रह कर, हो जाता था चंचल ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आज दया की मूर्ति स्वयं था, बना हुआ उपचारी ।</p>
<p>
	और भक्त के लिए आज था, देव बना प्रतिहारी ॥51॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आज भक्ति की विषम परीक्षा में, सफल हुआ था “काशी” ।</p>
<p>
	उसके ही दर्शन के खातिर, थे उमड़े नगर-निवासी ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जब भी और जहां भी कोई, भक्त पड़े संकट में ।</p>
<p>
	उसकी रक्षा करने बाबा, आते हैं पलभर में ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	युग-युग का है सत्य यह, नहीं कोई नई कहानी ।</p>
<p>
	आपातग्रस्त भक्त जब होता, आते खुद अन्तर्यामी ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भेद-भाव से परे पुजारी, मानवता के थे साईं ।</p>
<p>
	जितने प्यारे हिन्दु-मुस्लिम, उतने ही थे सिक्ख ईसाई ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भेद-भाव मन्दिर-मस्जिद का, तोड़-फोड़ बाबा ने डाला ।</p>
<p>
	राम-रहीम सभी उनके थे, कृष्ण-करीम-अल्लाहताला ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	घण्टे की प्रतिध्वनि से गूंजा, मस्जिद का कोना-कोना ।</p>
<p>
	मिले परस्पर हिन्दू-मुस्लिम, प्यार बढ़ा दिन-दिन दूना ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	चमत्कार था कितना सुंदर, परिचय इस काया ने दी ।</p>
<p>
	और नीम कडुवाहट में भी, मिठास बाबा ने भर दी ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सबको स्नेह दिया साईं ने, सबको सन्तुल प्यार किया ।</p>
<p>
	जो कुछ जिसने भी चाहा, बाबा ने उनको वही दिया ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ऐसे स्नेह शील भाजन का, नाम सदा जो जपा करे ।</p>
<p>
	पर्वत जैसा दु:ख न क्यों हो, पलभर में वह दूर टरे ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साईं जैसा दाता हमने, अरे नहीं देखा कोई ।</p>
<p>
	जिसके केवल दर्शन से ही, सारी विपदा दूर हो गई ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	तन में साईं, मन में साईं, साईं-साईं भजा करो ।</p>
<p>
	अपने तन की सुधि-बुधि खोकर, सुधि उसकी तुम किया करो ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जब तू अपनी सुधि तज, बाबा की सुधि किया करेगा ।</p>
<p>
	और रात-दिन बाबा, बाबा ही तू रटा करेगा ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	तो बाबा को अरे! विवश हो, सुधि तेरी लेनी ही होगी ।</p>
<p>
	तेरी हर इच्छा बाबा को, पूरी ही करनी होगी ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जंगल-जंगल भटक न पागल, और ढूंढ़ने बाबा को ।</p>
<p>
	एक जगह केवल शिर्डी में, तू पायेगा बाबा को ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	धन्य जगत में प्राणी है वह, जिसने बाबा को पाया ।</p>
<p>
	दु:ख में सुख में प्रहर आठ हो, साईं का ही गुण गाया ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	गिरें संकटों के पर्वत, चाहे बिजली ही टूट पड़े ।</p>
<p>
	साईं का ले नाम सदा तुम, सम्मुख सब के रहो अड़े ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस बूढ़े की करामात सुन, तुम हो जाओगे हैरान ।</p>
<p>
	दंग रह गये सुनकर जिसको, जाने कितने चतुर सुजान ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	एक बार शिर्डी में साधू, ढ़ोंगी था कोई आया ।</p>
<p>
	भोली-भाली नगर-निवासी, जनता को था भरमाया ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जड़ी-बूटियां उन्हें दिखाकर, करने लगा वहां भाषण ।</p>
<p>
	कहने लगा सुनो श्रोतागण, घर मेरा है वृन्दावन ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	औषधि मेरे पास एक है, और अजब इसमें शक्ति ।</p>
<p>
	इसके सेवन करने से ही, हो जाती दु:ख से मुक्ति ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अगर मुक्त होना चाहो तुम, संकट से बीमारी से ।</p>
<p>
	तो है मेरा नम्र निवेदन, हर नर से हर नारी से ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लो खरीद तुम इसको इसकी, सेवन विधियां हैं न्यारी ।</p>
<p>
	यद्यपि तुच्छ वस्तु है यह, गुण उसके हैं अति भारी ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जो है संतति हीन यहां यदि, मेरी औषधि को खायें ।</p>
<p>
	पुत्र-रत्न हो प्राप्त, अरे वह मुंह मांगा फल पायें ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	औषधि मेरी जो न खरीदे, जीवन भर पछतायेगा ।</p>
<p>
	मुझ जैसा प्राणी शायद ही, अरे यहां आ पायेगा ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दुनियां दो दिन का मेला है, मौज शौक तुम भी कर लो ।</p>
<p>
	गर इससे मिलता है, सब कुछ, तुम भी इसको ले लो ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हैरानी बढ़ती जनता की, लख इसकी कारस्तानी ।</p>
<p>
	प्रमुदित वह भी मन ही मन था, लख लोगो की नादानी ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	खबर सुनाने बाबा को यह, गया दौड़कर सेवक एक ।</p>
<p>
	सुनकर भृकुटि तनी और, विस्मरण हो गया सभी विवेक ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हुक्म दिया सेवक को, सत्वर पकड़ दुष्ट को लाओ ।</p>
<p>
	या शिर्डी की सीमा से, कपटी को दूर भगाओ ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मेरे रहते भोली-भाली, शिर्डी की जनता को ।</p>
<p>
	कौन नीच ऐसा जो, साहस करता है छलने को ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पल भर में ही ऐसे ढ़ोंगी, कपटी नीच लुटेरे को ।</p>
<p>
	महानाश के महागर्त में, पहुंचा दूं जीवन भर को ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	तनिक मिला आभास मदारी क्रूर कुटिल अन्यायी को ।</p>
<p>
	काल नाचता है अब सिर पर, गुस्सा आया साईं को ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पल भर में सब खेल बन्द कर, भागा सिर पर रखकर पैर ।</p>
<p>
	सोच था मन ही मन, भगवान नहीं है अब खैर ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सच है साईं जैसा दानी, मिल न सकेगा जग में ।</p>
<p>
	अंश ईश का साईंबाबा, उन्हें न कुछ भी मुश्किल जग में ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	स्नेह, शील, सौजन्य आदि का, आभूषण धारण कर ।</p>
<p>
	बढ़ता इस दुनिया में जो भी, मानव-सेवा के पथ पर ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वही जीत लेता है जगती के, जन-जन का अन्त:स्थल ।</p>
<p>
	उसकी एक उदासी ही जग को कर देती है विह्वल ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जब-जब जग में भार पाप का, बढ़ बढ़ ही जाता है ।</p>
<p>
	उसे मिटाने के ही खातिर, अवतारी ही आता है ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पाप और अन्याय सभी कुछ, इस जगती का हर के ।</p>
<p>
	दूर भगा देता दुनिया के, दानव को क्षण भर में ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	स्नेह सुधा की धार बरसने, लगती है इस दुनिया में ।</p>
<p>
	गले परस्पर मिलने लगते, हैं जन-जन आपस में ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ऐसे ही अवतारी साईं, मृत्युलोक में आकर ।</p>
<p>
	समता का यह पाठ पढ़ाया, सबको अपना आप मिटाकर ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	नाम द्वारका मस्जिद का, रक्खा शिर्डी में साईं ने ।</p>
<p>
	दाप, ताप, सन्ताप मिटाया, जो कुछ आया साईं ने ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सदा याद में मस्त राम की, बैठे रहते थे साईं ।</p>
<p>
	पहर आठ ही राम नाम का, भजते रहते थे साईं ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सूखी-रूखी, ताजी-बासी, चाहे या होवे पकवान ।</p>
<p>
	सदा प्यार के भूखे साईं की, खातिर थे सभी समान ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	स्नेह और श्रद्धा से अपनी, जन जो कुछ दे जाते थे ।</p>
<p>
	बड़े चाव से उस भोजन को, बाबा पावन करते थे ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कभी-कभी मन बहलाने को, बाबा बाग में जाते थे ।</p>
<p>
	प्रमुदित मन निरख प्रकृति, छटा को वे होते थे ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रंग-बिरंगे पुष्प बाग के, मन्द-मन्द हिल-डुल करके ।</p>
<p>
	बीहड़ वीराने मन में भी, स्नेह सलिल भर जाते थे ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ऐसी सुमधुर बेला में भी, दु:ख आपात विपदा के मारे ।</p>
<p>
	अपने मन की व्यथा सुनाने, जन रहते बाबा को घेरे ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सुनकर जिनकी करूण कथा को, नयन कमल भर आते थे ।</p>
<p>
	दे विभूति हर व्यथा,शान्ति, उनके उर में भर देते थे ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जाने क्या अद्भुत,शक्ति, उस विभूति में होती थी ।</p>
<p>
	जो धारण करते मस्तक पर, दु:ख सारा हर लेती थी ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	धन्य मनुज वे साक्षात् दर्शन, जो बाबा साईं के पाये ।</p>
<p>
	धन्य कमल-कर उनके जिनसे, चरण-कमल वे परसाये ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	काश निर्भय तुमको भी, साक्षात साईं मिल जाता ।</p>
<p>
	बरसों से उजड़ा चमन अपना, फिर से आज खिल जाता ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	गर पकड़ता मैं चरण श्री के, नहीं छोड़ता उम्रभर ।</p>
<p>
	मना लेता मैं जरूर उनको, गर रूठते साईं मुझ पर ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	।।इतिश्री साईं चालीसा समाप्त।।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 05 Nov 2025 21:40:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 05 Nov 2025 21:42:06 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Hinduism]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[शिरडीचे साईबाबा यांच्या नावावरुन बाळासाठी नावे]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/shirdi-sai-baba-name-for-baby-boy-with-meaning-125091700037_1.html</link>
      <guid>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/shirdi-sai-baba-name-for-baby-boy-with-meaning-125091700037_1.html</guid>
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      <description><![CDATA[साईनाथ- दयाळू स्वामी
साईराम- करुणामय आणि धर्मरक्षक
साईश- साईचा ईश, म्हणजेच "साई स्वामी"
साईकुमार- साईंचे भक्त
साईप्रसाद- साईंचा आशीर्वाद]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2025-09/17/full/1758102658-6121.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="1200" /></p>
	</p>
	साईनाथ- दयाळू स्वामी</p>
<p>
	साईराम- करुणामय आणि धर्मरक्षक</p>
<p>
	साईश- साईचा ईश, म्हणजेच "साई स्वामी"</p>
<p>
	साईकुमार- साईंचे भक्त</p>
<p>
	साईप्रसाद- साईंचा आशीर्वाद</p>
<p>
	साईअनंत- साईंचे अनंत रूप दर्शवणारे नाव</p>
<p>
	साईराज- साईंचा राजा किंवा साईंच्या कृपेचा अधिपती</p>
<p>
	साईचरन- साई बाबांच्या चरणी भक्ती दर्शवणारा</p>
<p>
	साईव्रत- साई बाबांच्या व्रताशी संबंधित नाव</p>
<p>
	साईशुभ- साई बाबांचा शुभ आशीर्वाद</p>
<p>
	साईभक्त- साई बाबांचा निस्वार्थ भक्त</p>
<p>
	साईतेज- साई बाबांचे तेजस्वी रूप</p>
<p>
	साईचैतन्य- साई बाबांची आध्यात्मिक ऊर्जा</p>
<p>
	साईकृपा- साईंची दयाळू कृपा</p>
<p>
	साईसिद्ध- सिद्धी प्राप्त केलेला</p>
<p>
	साईरामेश - साई व राम यांचे संगमस्वरूप</p>
<p>
	साईसुंदर- सुंदर, तेजस्वी आणि साईच्या कृपाशीलतेने नटलेला</p>
<p>
	साईवर्धन- साईकृपेने वाढणारा, प्रगती करणारा</p>
<p>
	साईयश- साईचे यश, सन्मान व कीर्ती</p>
<p>
	साईचेतन- सजीव, चैतन्यमय</p>
<p>
	साईकरण - कार्यकर्ता, साईकृपेने धर्मरक्षण करणारा</p>
<p>
	साईजीवन- साईसारखे जीवन देणारा, जीवनाचा आधार</p>
<p>
	साईसागर- साईप्रमाणे ज्ञान आणि करुणेचा अथांग सागर<br />
	साईअनंत- अनंत, अमर आणि साईच्या कृपेमुळे असीम</p>
<p>
	शिर्डीश- शिरडीतील पवित्र ऊर्जा दर्शवणारा</p>
<p>
	सबुरीनंद- धीर आणि संयमाचे प्रतीक</p>
<p>
	साईदीप- साई बाबांना या नावानेही ओळखले जाते</p>
<p>
	सैविक- या नावाचा अर्थ ईश्वराचा सेवक किंवा भगवानाचा सेवक असा होतो</p>
<p>
	साईंश- साईं बाबांचा अंश</p>
<p>
	साई- या नावाचा अर्थ साईबाबांचे स्मरण करणारा असा होतो</p>
<p>
	सैनित- आशा, उमेद</p>
<p>
	साईआंश- साईं बाबांचा अंश</p>
<p>
	सैलेश- पर्वतांचा राजा</p>
<p>
	श्रद्धानंद- श्रद्धेने भरलेला</p>
<p>
	योगीराज- महान संत आणि योगी</p>
<p>
	गुरुनाथ- महान गुरु, साई बाबांचे स्वरूप</p>
<p>
	भक्तेश- भक्ती आणि श्रद्धेचे प्रतीक</p>
<p>
	शरणेश- भगवंताच्या शरण जाणारा</p>
<p>
	कृपेश- कृपाळू</p>
<p>
	सत्यराज- सत्यावर चालणारा</p>
<p>
	दयासिंधु- करुणेचा महासागर</p>
<p>
	मंगलनंद- मंगलमयी आणि आनंददायी</p>
<p>
	चैतन्येश- दिव्य प्रकाश</p>
<p>
	प्रसादेश- परम कृपेचा आशीर्वाद</p>
<p>
	विश्वेश- संपूर्ण जगाचा अधिपती</p>
<p>
	ज्ञानेश- ज्ञानाचा अधिपती</p>
<p>
	प्रेमनाथ- प्रेमाने परिपूर्ण</p>
<p>
	परमानंद- सर्वोच्च आनंद मिळवणारा</p>
<p>
	सर्वेश्वर- संपूर्ण सृष्टीचा अधिपती</p>
<p>
	अनंतेश- अनंत शक्तीचा स्वामी</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 18 Sep 2025 06:04:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 17 Sep 2025 15:22:50 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईबाबांची आरती]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-baba-aarti-lyrics-in-marathi-109081900084_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2021-07/29/thumb/1_1/1627530127-2983.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2021-07/29/thumb/1_1/1627530127-2983.jpg</image>
      <description><![CDATA[आरती साईबाबा ।
सौख्यदातारा जीवा ।
चरणरजतळीं निज दासां विसावां ।
भक्तां विसावा ॥धृ॥]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
	<img align="center" alt="saibaba aarti" class="imgCont" height="354" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2021-07/29/full/1627530127-2983.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="630" /></p>
<font style="font-size:11pt; color:#000000">आरती साईबाबा ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">सौख्यदातारा जीवा ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">चरणरजतळीं निज दासां विसावां ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">भक्तां विसावा ॥धृ॥</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">जाळुनियां अनंग ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">स्वस्वरुपी राहे दंग ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">मुमुक्षुजना दावी ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">निजडोळां श्रीरंग ॥१॥</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">जया मनीं जैसा भाव ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">तया तैसा अनुभव ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">दाविसी दयाघना ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">ऐसी ही तुझी माव ॥२॥</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">तुमचें नाम ध्यातां ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">हरे संसृतिव्यथा ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">अगाध तव करणी ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">मार्ग दाविसी अनाथा ॥३॥</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">कलियुगीं अवतार ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">सगुणब्रह्म साचार ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">अवतीर्ण झालासे ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">स्वामी दत्त दिगंबर ॥४॥</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">आठा दिवसां गुरुवारी ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">भक्त करिती वारी ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">प्रभुपद पहावया ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">भवभय निवारी ॥५॥</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">माझा निजद्रव्य ठेवा ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">तव चरणसेवा ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">मागणें हेंचि आता ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">तुम्हा देवाधिदेवा ॥६॥</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">इच्छित दीन चातक ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">निर्मळ तोय निजसुख ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">पाजावें माधवा या ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">सांभाळ आपुली भाक ॥७॥</font>]]></content:encoded>
      <pubDate>Mon, 07 Jul 2025 19:01:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Mon, 07 Jul 2025 22:13:10 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[शिर्डीच्या साई बाबांचे खरे नाव काय, त्याचा जन्म कुठे झाला?]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-baba-real-name-and-birthplace-124093000035_1.html</link>
      <guid>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-baba-real-name-and-birthplace-124093000035_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2018-06/26/thumb/1_1/1530002052-7647.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2018-06/26/thumb/1_1/1530002052-7647.jpg</image>
      <description><![CDATA[Sai Baba Real Name And Janmsthan : साईबाबांचा जन्म 27-28 सप्टेंबर 1830 रोजी महाराष्ट्रातील परभणी जिल्ह्यातील पाथरी गावात झाला. काही ठिकाणी त्यांचा जन्म 1938 मध्ये झाल्याचे सांगितले जाते. साईंचे जन्मस्थान पाथरी येथे मंदिर बांधले आहे. मंदिरात साईंची ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="" class="imgCont" height="592" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2018-06/26/full/1530002052-7647.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="740" /></p>
	<strong>Sai Baba Real Name And Janmsthan </strong>: साईबाबांचा जन्म 27-28 सप्टेंबर 1830 रोजी महाराष्ट्रातील परभणी जिल्ह्यातील पाथरी गावात झाला. काही ठिकाणी त्यांचा जन्म 1938 मध्ये झाल्याचे सांगितले जाते. साईंचे जन्मस्थान पाथरी येथे मंदिर बांधले आहे. मंदिरात साईंची आकर्षक मूर्ती ठेवण्यात आली आहे. हे बाबांचे निवासस्थान आहे, जिथे भांडी, घट्टी, देवदेवतांच्या मूर्ती या जुन्या वस्तू ठेवल्या आहेत. जुन्या घराचे अवशेषही चांगले जतन केले आहेत. हे घर साईबाबांचे वंशज रघुनाथ भुसारी यांच्याकडून श्री साई स्मारक ट्रस्टकडून 90 रुपयांच्या मुद्रांकावर 3,000 रुपयांना खरेदी करण्यात आले होते. साईबाबा हे परशुराम यांचे तिसरे अपत्य होते ज्यांचे नाव हरिभाऊ होते.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>साईबाबांचे खरे नाव हरिबाबू असल्याचे सांगितले जाते</strong></p>
<p>
	<strong>परभणी हे साईबाबांचे जन्मस्थान आहे</strong></p>
<p>
	<strong>चांद मिया हे शिर्डीच्या साईबाबांचे शेजारी होते</strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	साई बाबांचे खरे नाव काय होते: साई बाबांच्या वडिलांचे नाव परशुराम भुसारी आणि आईचे नाव अनुसया होते ज्यांना गोविंद भाऊ आणि देवकी अम्मा म्हणूनही ओळखले जात होते. काही लोक वडिलांना गंगाभाऊही म्हणत. या दोघांना 5 पुत्र होते त्यांची नावे पुढीलप्रमाणे- रघुपती, दादा, हरिभाऊ, अंबादास आणि बळवंत. साईबाबा हे परशुराम यांचे तिसरे अपत्य होते ज्यांचे नाव हरिभाऊ होते.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>चांद मियाँ कोणाचे नाव: </strong>सध्या साईबाबांचे विरोधक त्यांना चांद मियाँ मानतात. साईंच्या विरोधकांच्या मते ते मुस्लिम होते आणि हिंदूंनी कोणत्याही मुस्लिमाची पूजा करू नये. साईबाबांच्या आई-वडिलांच्या घराजवळ एक मुस्लिम कुटुंब राहत होते. त्या कुटुंबाच्या प्रमुखाचे नाव चांद मिया आणि त्यांच्या पत्नीचे नाव चांद बी होते. त्याला मूलबाळ नव्हते. हरिबाबू म्हणजेच साई आपला बहुतेक वेळ त्यांच्या घरात घालवत असत. चांदबी हरिबाबूंना आपला मुलगा मानत.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>साईबाबांकडे स्वतःचे काहीही नव्हते: </strong>साई आणि त्यांचे भाऊ लहानपणीच अनाथ झाले. त्यानंतर साईंना एका वली फकीराकडे नेण्यात आले. नंतर जेव्हा ते घरी परतले तेव्हा त्यांच्या शेजारी चांद बी यांनी त्यांना खायला दिले आणि त्यांना वैंकुशा आश्रमात सोडले. बाबांकडे स्वतःचे काही नव्हते. सातका नाही, कफनी नाही, कुर्ता नाही, वीट नाही, भिकेची वाटी नाही, मशीद नाही आणि पैसा नाही.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बाबांनी जे काही होते ते इतरांनी दिलेले होते. इतरांनी दिलेले ते दान करुन देत असे. भिक्षा मागून जे काही आणायचे ते आपल्या कुत्र्यासाठी आणि पक्ष्यांसाठी आणायचे. बाबांनी आयुष्यभर तोच कुर्ता किंवा झगा घातला होता, जो दोन ठिकाणहून फाटला होता. शिर्डीत आजही ते बघायला मिळतात.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>साईबाबांचा मृत्यू केव्हा झाला: </strong>साई बाबांनी 15 ऑक्टोबर 1918 रोजी दसऱ्याला शिर्डी येथे समाधी घेतली. 27 सप्टेंबर 1918 रोजी साईबाबांच्या शरीराचे तापमान वाढू लागले. त्यांनी अन्न आणि पाणी सर्व काही सोडून दिले. बाबांच्या निधनाच्या काही दिवस आधी तात्यांची तब्येत इतकी बिघडली की त्यांना जिवंत राहणे शक्यच नव्हते. पण त्याऐवजी साईबाबांनी आपला नश्वर देह सोडला आणि 15 ऑक्टोबर 1918 रोजी ब्रह्मलीन झाले. तो दिवस विजयादशमी (दसरा) होता.</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Mon, 30 Sep 2024 16:35:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Mon, 30 Sep 2024 16:42:08 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[श्री साई बाबांचे गुरु पाठाचे अभंग]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/guru-pathache-abhang-marathi-lyrics-122071200041_1.html</link>
      <guid>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/guru-pathache-abhang-marathi-lyrics-122071200041_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2021-11/17/thumb/1_1/1637132454-8995.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2021-11/17/thumb/1_1/1637132454-8995.jpg</image>
      <description><![CDATA[अनंत कोटी ब्रह्माण्ड नायक राजाधिराज योगीराज परब्रम्ह
श्री सचिदानंद सद्गुरू साईनाथ महाराज कि जय ….]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="" class="imgCont" height="592" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2021-11/17/full/1637132454-8995.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="740" /></p>
	अनंत कोटी ब्रह्माण्ड नायक राजाधिराज योगीराज परब्रम्ह</p>
<p>
	श्री सचिदानंद सद्गुरू साईनाथ महाराज की जय ….</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साईनाथ गुरु माझे आई</p>
<p>
	मजला ठाव द्यावा पाई</p>
<p>
	दत्ताराज गुरू माझे आई</p>
<p>
	मजला ठाव द्यावा पाई</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जयाची ती रूपे सगुण निर्गुण</p>
<p>
	ऐसा नारायण वंदू आधी</p>
<p>
	सगुण सेविता निर्गुण ये हाती</p>
<p>
	निर्गुणाची प्राप्ती आरंभींना</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आधी मुलं काढी क ख बाराखडी</p>
<p>
	मग शब्द जोडी झाल्या ज्ञान</p>
<p>
	गणू म्हणे तैसी सगुणोपासना</p>
<p>
	बाराखडी जाणा अध्यात्माची</p>
<p>
	 </p>
<p>
	तिही बाराखडी शिकवी जो गुरु</p>
<p>
	भावाभिचे तारू तोच जाणा</p>
<p>
	गुरु सेवा हिच प्रथम पायरी</p>
<p>
	असे टिकणे भारी अवघड</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सद्गुरू रायाची कृपा संपादिता</p>
<p>
	सेवेची पूर्तता सहज होई</p>
<p>
	गणू म्हणे केल्या प्रसन्न सविता</p>
<p>
	प्रभेची न्यूनता केवि पडे</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सद्गुरू ची सेवा बहुतांनी केली</p>
<p>
	ऐसी साक्ष दिधली (2) पुराणांनी</p>
<p>
	पूर्णब्रह्म राम जानकीचा कांत</p>
<p>
	झाला शरणागत (2) वशिष्ठाशी</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रुक्मिणी वलभे केला सांदिपनी</p>
<p>
	आपणाला गुणी (2) गुरुराय</p>
<p>
	गणू म्हणे गुरु वाचुनी या नर</p>
<p>
	तो ची जाण खर (2) दो पायांचा</p>
<p>
	 </p>
<p>
	निष्ठावंत भाव हाच देतो फळ</p>
<p>
	अभक्तिचा मळ (2) निमालिया </p>
<p>
	चहाड दू तोंड्या ऐसा नारदमुनी</p>
<p>
	तरी झाला तरणी (2) प्रह्लादाते</p>
<p>
	 </p>
<p>
	गोपी चन्दे गुरु नीतीशी काढिला</p>
<p>
	पुढें तोची झाला (2) वंद्य त्याते</p>
<p>
	गणू म्हणे सोने चढे मोला अंगे</p>
<p>
	कसोटीच्या संगे (2) जगा माझी</p>
<p>
	गणू म्हणे सोने चढे मोला अंगे</p>
<p>
	 </p>
<p>
	क्षमा, शांती, दया असे जया ठायी</p>
<p>
	तसे ज्ञान पाही संपूर्ण ते</p>
<p>
	जयाचीये शिरी ईश्वराचा हात</p>
<p>
	तोच सद्गुरूनाथ करावा हो</p>
<p>
	बाहेरील सोंगा भुलू नका कदा</p>
<p>
	पंतगाते दगा दीपा पाशी</p>
<p>
	 </p>
<p>
	गणू म्हणे हंस पाण्याते टाकुनी</p>
<p>
	घेत असे शोधूनी जैसे दूध</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हिरे आणि गारा हे त्याचे खाणीत</p>
<p>
	तैसे बद्ध मुक्त जगा माझी</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पारखीतो येता ही राधे वेचुनी</p>
<p>
	कुक्कुट पायानी कालवितो</p>
<p>
	मुमुक्षु पारखी चार वाक कोंबडा</p>
<p>
	कुक्कुटा उकिरडा गोड वाटे</p>
<p>
	 </p>
<p>
	गणू म्हणे जो का असे भाग्यवंत</p>
<p>
	त्याचाच हेत गुरु पायी</p>
<p>
	 </p>
<p>
	क्षमा शांती युक्त भावाभिचे जहाज ..</p>
<p>
	ऐसा सद्गुरू राज शिर्डी माझी</p>
<p>
	क्षमा शांती युक्त भावाभिचे जहाज ..</p>
<p>
	ऐसा सद्गुरू राज शिर्डी माझी</p>
<p>
	 </p>
<p>
	नामा भिता जयाची शोभे बाबा साई ..</p>
<p>
	अनाथांची माई तिचं जाण</p>
<p>
	नामा भिता जायची शोभे बाबा साई ..</p>
<p>
	अनाथांची माई तिचं जाणा</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अनाथ सनाथ आन भेद जेथे ..</p>
<p>
	सुर्यप्रकाशाते निवड तैची</p>
<p>
	अनाथ सनाथ आन भेद जेथे ..</p>
<p>
	सुर्यप्रकाशाते निवड तैची</p>
<p>
	 </p>
<p>
	माझा गुरुराज जान्हवीचे जळ ..</p>
<p>
	गणू अर्पी भाळ तया पायी</p>
<p>
	माझा गुरुराज जान्हवीचे जळ ..</p>
<p>
	गणू अर्पी भाळ तया पायी</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अंगकाठी उंच केलीसी धारण ..</p>
<p>
	कळवावया खूण भक्तजना</p>
<p>
	अंगकाठी उंच केलीसी धारण ..</p>
<p>
	कळवावया खूण भक्तजना</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उच्च ज्ञान जिका अध्यात्म साजीरे ..</p>
<p>
	तेची सेवा सारे कल्याणार्थ</p>
<p>
	उच्च ज्ञान जीक अध्यात्म साजीरे ..</p>
<p>
	तेची सेवा सारे कल्याणार्थ</p>
<p>
	 </p>
<p>
	परी नका सोडू – पेंगणे ली लता ..</p>
<p>
	नये थोर होता पाल्याविण</p>
<p>
	परी नका सोडू – पेंगणे ली लता ..</p>
<p>
	नये थोर होता पाल्याविण</p>
<p>
	 </p>
<p>
	गणू म्हणे बाळ तांबूस सावळा ..</p>
<p>
	सगुरूची लीला अगाधाची</p>
<p>
	गणू म्हणे बाळ तांबूस सावळा ..</p>
<p>
	सगुरूची लीला अगाधाची</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सद्गुरुरायानी जला तेल केले</p>
<p>
	दीप उजाळेले लक्षावधी</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ठेऊनीया दीप उषा पायथ्याशी</p>
<p>
	पहुडे फलीसी गुरुमूर्ती<br />
	<br />
	<p>
		त्याच्या त्या कृतीचा हाच आहे अर्थ</p>
	<p>
		कदा अंधारात निजू नये<br />
		 </p>
</p>
<p>
	गणू म्हणे माया दुधर्र अंधार</p>
<p>
	ज्ञानदिप थोर म्हणुनी लावा</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शिव , विष्णू , ब्राह्म रूप बाबा साई</p>
<p>
	भाव दुजा काही मानू नका</p>
<p>
	भाव दुजा काही मानू नका</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सदगुरु रायाची पायचीजी धूळ</p>
<p>
	तेच गंगाजळ शुद्ध माना</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अमृता आगळी मुखीची वचने</p>
<p>
	तिच माना मने गीता जेवी</p>
<p>
	 </p>
<p>
	गणू म्हणे बाबा वसंत सोज्वळ</p>
<p>
	भक्तांनो कोकिळ व्हारे तुम्ही</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 23 Nov 2023 06:39:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 22 Nov 2023 23:14:12 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sai Ashtottara Shatanamavali श्री शिर्डीसांई अष्टोत्तरशतनामावली]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/shri-shirdi-sai-ashtottara-shatanamavali-122041900018_1.html</link>
      <guid>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/shri-shirdi-sai-ashtottara-shatanamavali-122041900018_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2019-10/07/thumb/1_1/1570442724-5189.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2019-10/07/thumb/1_1/1570442724-5189.jpg</image>
      <description><![CDATA[ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं साईनाथाय नमः ।
ॐ लक्ष्मीनारायणाय नमः ।
ॐ श्रीरामकृष्णमारुत्यादिरूपाय नमः ।
ॐ शेषशायिने नमः ।
ॐ गोदावरीतटशिरडीवासिने नमः ।
ॐ भक्तहृदालयाय नमः ।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="" class="imgCont" height="592" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2019-10/07/full/1570442724-5189.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai baba" width="740" /></p>
	 <strong>Sai Ashtottara Shatanamavali</strong>ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं साईनाथाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ लक्ष्मीनारायणाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ श्रीरामकृष्णमारुत्यादिरूपाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ शेषशायिने नमः ।</p>
<p>
	ॐ गोदावरीतटशिरडीवासिने नमः ।</p>
<p>
	ॐ भक्तहृदालयाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सर्वहृद्वासिने नमः ।</p>
<p>
	ॐ भूतावासाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ भूतभविष्यद्भाववर्जिताय नमः ।</p>
<p>
	ॐ कालातीताय नमः ॥ १०॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ॐ कालाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ कालकालाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ कालदर्प दमनाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ मृत्युञ्जयाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ अमर्त्याय नमः ।</p>
<p>
	ॐ मर्त्याभयप्रदाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ जीवाधाराय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सर्वाधाराय नमः ।</p>
<p>
	ॐ भक्तावनसमर्थाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ भक्तावनप्रतिज्ञाय नमः ॥ २०॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ॐ अन्नवस्त्रदाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ आरोग्यक्षेमदाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ धनमाङ्गल्यप्रदाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ ऋद्धिसिद्धिदाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ पुत्रमित्रकलत्रबन्धुदाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ योगक्षेमवहाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ आपद्बान्धवाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ मार्गबन्धवे नमः ।</p>
<p>
	ॐ भुक्तिमुक्तिस्वर्गापवर्गदाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ प्रियाय नमः ॥ ३०॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ॐ प्रीतिवर्धनाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ अन्तर्यामिने नमः ।</p>
<p>
	ॐ सच्चिदात्मने नमः ।</p>
<p>
	ॐ नित्यानन्दाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ परमसुखदाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ परमेश्वराय नमः ।</p>
<p>
	ॐ परब्रह्मणे नमः ।</p>
<p>
	ॐ परमात्मने नमः ।</p>
<p>
	ॐ ज्ञानस्वरूपिणे नमः ।</p>
<p>
	ॐ जगतःपित्रे नमः ॥ ४०॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ॐ भक्तानांमातृदातृपितामहाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ भक्ताभयप्रदाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ भक्तपराधीनाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ भक्तानुग्रहकातराय नमः ।</p>
<p>
	ॐ शरणागतवत्सलाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ भक्तिशक्तिप्रदाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ ज्ञानवैराग्यदाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ प्रेमप्रदाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ संशयहृदय दौर्बल्य पापकर्मवासनाक्षयकराय नमः ।</p>
<p>
	ॐ हृदयग्रन्थिभेदकाय नमः ॥ ५०॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ॐ कर्मध्वंसिने नमः ।</p>
<p>
	ॐ शुद्धसत्वस्थिताय नमः ।</p>
<p>
	ॐ गुणातीतगुणात्मने नमः ।</p>
<p>
	ॐ अनन्तकल्याणगुणाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ अमितपराक्रमाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ जयिने नमः ।</p>
<p>
	ॐ दुर्धर्षाक्षोभ्याय नमः ।</p>
<p>
	ॐ अपराजिताय नमः ।</p>
<p>
	ॐ त्रिलोकेषु अविघातगतये नमः ।</p>
<p>
	ॐ अशक्यरहिताय नमः ॥ ६०॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ॐ सर्वशक्तिमूर्तये नमः ।</p>
<p>
	ॐ सुरूपसुन्दराय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सुलोचनाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ बहुरूपविश्वमूर्तये नमः ।</p>
<p>
	ॐ अरूपव्यक्ताय नमः ।</p>
<p>
	ॐ अचिन्त्याय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सूक्ष्माय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सर्वान्तर्यामिने नमः ।</p>
<p>
	ॐ मनोवागतीताय नमः ।</p>
<p>
	ॐ प्रेममूर्तये नमः ॥ ७०॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ॐ सुलभदुर्लभाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ असहायसहायाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ अनाथनाथदीनबन्धवे नमः ।</p>
<p>
	ॐ सर्वभारभृते नमः ।</p>
<p>
	ॐ अकर्मानेककर्मासुकर्मिणे नमः ।</p>
<p>
	ॐ पुण्यश्रवणकीर्तनाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ तीर्थाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ वासुदेवाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सताङ्गतये नमः ।</p>
<p>
	ॐ सत्परायणाय नमः ॥ ८०॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ॐ लोकनाथाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ पावनानघाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ अमृतांशुवे नमः ।</p>
<p>
	ॐ भास्करप्रभाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ ब्रह्मचर्यतपश्चर्यादि सुव्रताय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सत्यधर्मपरायणाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सिद्धेश्वराय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सिद्धसङ्कल्पाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ योगेश्वराय नमः ।</p>
<p>
	ॐ भगवते नमः ॥ ९०॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ॐ भक्तवत्सलाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सत्पुरुषाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ पुरुषोत्तमाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सत्यतत्त्वबोधकाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ कामादिषद्वैरिध्वंसिने नमः ।</p>
<p>
	ॐ अभेदानन्दानुभवप्रदाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ समसर्वमतसम्मताय नमः ।</p>
<p>
	ॐ श्रीदक्षिणामूर्तये नमः ।</p>
<p>
	ॐ श्रीवेङ्कटेशरमणाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ अद्भुतानन्दचर्याय नमः ॥ १००॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ॐ प्रपन्नार्तिहराय नमः ।</p>
<p>
	ॐ संसारसर्वदुःखक्षय कारकाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सर्ववित्सर्वतोमुखाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सर्वान्तर्बहिस्थिताय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सर्वमङ्गलकराय नमः ।</p>
<p>
	ॐ सर्वाभीष्टप्रदाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ समरसन्मार्गस्थापनाय नमः ।</p>
<p>
	ॐ श्रीसमर्थ सद्गुरु साईनाथाय नमः ॥ १०८॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	श्री शिर्डीसाई अष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णा ।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 16 Nov 2023 07:17:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 16 Nov 2023 07:56:51 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sai Baba Vrat Katha साई बाबा व्रत विधी, कथा आणि आरती]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-baba-vrat-katha-puja-vidhi-123100300039_1.html</link>
      <guid>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-baba-vrat-katha-puja-vidhi-123100300039_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2018-06/26/thumb/1_1/1530002052-7647.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2018-06/26/thumb/1_1/1530002052-7647.jpg</image>
      <description><![CDATA[Sai Baba Vrat Katha पुरुष, महिला आणि लहान मुले हे व्रत करू शकतात.
हे व्रत खूप चमत्कारिक आहे. जर तुम्ही नऊ गुरुवार नीट पाळले तर तुम्हाला अपेक्षित परिणाम नक्कीच मिळतात.]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="" class="imgCont" height="592" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2018-06/26/full/1530002052-7647.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="740" /></p>
	<strong>Sai Baba Vrat Katha </strong>जो कोणी 9 गुरुवार भक्तीभावाने साईबाबांची व्रत कथा आणि आरती करतो त्याला निश्चितच अपेक्षित फळ मिळते. असे म्हणतात की जो कोणी साई बाबांची व्रत कथा श्रद्धेने ऐकतो आणि उपवास करतो, साई नक्कीच त्याच्या मनाची इच्छा पूर्ण करतात.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>साई बाबा व्रत नियम</strong></p>
<p>
	पुरुष, महिला आणि लहान मुले हे व्रत करू शकतात.</p>
<p>
	हे व्रत खूप चमत्कारिक आहे. जर तुम्ही नऊ गुरुवार नीट पाळले तर तुम्हाला अपेक्षित परिणाम नक्कीच मिळतात.</p>
<p>
	कोणत्याही गुरुवारपासून साईबाबांचे नाव घेऊन हे व्रत सुरू करता येते. ज्या कार्यासाठी हे व्रत पाळले आहे त्या कार्यासाठी खऱ्या मनाने साईबाबांची प्रार्थना करावी.</p>
<p>
	सकाळी किंवा संध्याकाळी कोणत्याही आसनावर निळे कापड पसरावे, साईबाबांचे चित्र ठेवावे, स्वच्छ पाण्याने पुसून चंदन किंवा कुंकुम तिलक लावावा. उदबत्ती आणि दिवे लावल्यानंतर साईबाबांची व्रत कथा वाचावी आणि साईबाबांचे स्मरण करून प्रसाद वाटावा. (कोणतेही फळ किंवा गोड प्रसाद म्हणून वाटता येईल.)</p>
<p>
	हा उपवास फळे खाऊन किंवा एक वेळ खाऊन पाळता येतो. पूर्ण भुकेले असताना उपवास करू नका.</p>
<p>
	शक्य असल्यास 9 गुरुवारी साईबाबांच्या मंदिरात जाऊन दर्शन घ्यावे. जर तुम्ही बाबांच्या मंदिरात जाऊ शकत नसाल (जवळजवळ कोणतेही मंदिर नसेल तर) तर घरीच साई बाबांची भक्तीभावाने पूजा करता येते.</p>
<p>
	गावाबाहेर जावे लागले तर हे उपोषण चालू ठेवता येईल.</p>
<p>
	जर स्त्रियांना उपवासाच्या वेळी मासिक पाळीचा त्रास होत असेल किंवा काही कारणास्तव उपवास करता येत नसेल, तर तो गुरुवार नऊ गुरुवारांमध्ये गणू नका आणि त्या गुरुवारऐवजी तो गुरुवार बदलून इतर गुरुवार करा आणि नवव्या गुरुवारी उदयापन करा.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>उद्यापन विधी</strong></p>
<p>
	उद्यापन नवव्या गुरुवारी करावे. यामध्ये पाच गरिबांना जेवण द्या. एखाद्याच्या क्षमतेनुसार अन्न दिले पाहिजे. साई भक्तांचा असा विश्वास आहे की व्रत केल्याने मनोकामना नक्कीच पूर्ण होतील.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>श्री साई बाबा व्रत कथा</strong></p>
<p>
	किरण आणि तिचा नवरा किशन शहरात राहत होते. खरे तर दोघांचे एकमेकांवर खूप प्रेम होते. पण किशनभाईचा स्वभाव भांडखोर होता. त्याच्या स्वभावामुळे शेजारीही त्रासले होते, पण किरण धार्मिक स्वभावाची, देवाला मानणारी आणि काहीही न बोलता सर्व काही सहन करत. हळुहळु तिच्या पतीचा रोजगार ठप्प झाला. काहीच कमाई नव्हती. </p>
<p>
	 </p>
<p>
	आता किशन भाई दिवसभर घरीच राहत असे. घरी पडून राहून त्यांचा स्वभाव चिडखोर झाला. एके दिवशी दुपारी एक म्हातारा दारात येऊन उभा राहिला. त्याच्या चेहऱ्यावर एक विलक्षण चमक होती.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	म्हातारा आला आणि त्याने डाळ आणि तांदूळ मागितले. किरणने डाळ आणि तांदूळ देऊन वृद्धाला दोन्ही हातांनी नमस्कार केला. म्हातारा म्हणाला, साई सुखी ठेव. भगिनी किरण म्हणाल्या की महाराज नशिबी सुख नाही. मग ते कसे मिळणार? असे म्हणत त्यांनी आपल्या दुःखी जीवनाचे वर्णन केले.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	श्री साईबाबांच्या उपवासाची कथा सांगताना म्हातारा म्हणाला - नऊ गुरुवारी फळाहार किंवा एकभुक्त रहा. शक्य असल्यास साई मंदिरात जा. नऊ गुरुवारी घरी साईबाबांची पूजा कर, साई उपवास कर, आरती कर आणि विधीपूर्वक उद्यान कर. भुकेल्यांना अन्न देणे, लोकांना साई व्रताबद्दल जास्तीत जास्त सांगणे, अशा प्रकारे साई व्रताचा प्रचार करणे, साईबाबा तुमच्या सर्व मनोकामना पूर्ण करतील. हे व्रत कलियुगात अत्यंत चमत्कारिक आहे. त्यातून प्रत्येकाच्या इच्छा पूर्ण होतात. पण साईबाबांवर अढळ श्रद्धा असणे महत्त्वाचे आहे. एखाद्याने धीर धरला पाहिजे. जो कोणी अशा प्रकारे साईबाबांची व्रत कथा आणि आरती करेल, बाबा त्याच्या सर्व मनोकामना नक्कीच पूर्ण करतील.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	किरणने गुरुवारचे व्रत केले. नवव्या गुरुवारी गरिबांना अन्नदान केले. साई व्रताबद्दल इतरांना सांगितले. त्यांच्या घरातील भांडणे संपली आणि सुख-शांती होती जणू किशन भाईचा स्वभावच बदलला होता. त्याचा रोजगार पुन्हा सुरू झाला. अल्पावधीतच सुख-समृद्धी वाढली.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आता पती-पत्नी दोघेही सुखी जीवन जगू लागले. एके दिवशी किरण बहिणीचे मेव्हणे आणि भावजय आले आणि एकमेकांशी बोलत असताना त्यांनी सांगितले की त्यांची मुले अभ्यास करत नाहीत. परीक्षेत नापास झाले. </p>
<p>
	 </p>
<p>
	किरण बहिणीने नऊ गुरुवारचा महिमा सांगून साईबाबांच्या भक्तीमुळे मुले चांगली साधना करू शकतील असे सांगितले. मात्र यासाठी साईबाबांवर श्रद्धा असणे आवश्यक आहे. ते सर्वांना मदत करतात. तिच्या वहिनींनी उपवासाची पद्धत विचारली तेव्हा किरण बहिणीने सांगितले की, नऊ गुरुवारी फळे खाऊन किंवा एकदा जेवण करून हा उपवास करता येतो आणि शक्य असल्यास नऊ गुरुवारी साईंच्या दर्शनासाठी मंदिरात जाण्यास सांगितले. असेही म्हटले आहे की -</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हे व्रत पुरुष, स्त्री किंवा बालक कोणीही करू शकते. नऊ गुरुवारी साई चित्राची पूजा करावी.</p>
<p>
	फुले अर्पण करावी, दिवे लावावे, अगरबत्ती इ. प्रसाद अर्पण करावे, साईबाबांचे स्मरण करावे, आरती करावी इत्यादी पद्धती सांगितल्या. </p>
<p>
	साई व्रत कथा, साई स्मरण, साई चालीसा इ. </p>
<p>
	नवव्या गुरुवारी गरिबांना अन्नदान करावे.</p>
<p>
	नवव्या गुरुवारी साई व्रताबद्दल तुमच्या नातेवाईकांना आणि शेजाऱ्यांना सांगावे.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	काही दिवसांनी सुरतहून त्यांच्या मेहुणीकडून पत्र आले की तिची मुले साई व्रत पाळू लागली आहेत आणि खूप मन लावून अभ्यास करत आहेत. उपवासही केला. याबाबत त्यांनी लिहिले की, साईबाबांची व्रत कथा आणि आरती केल्याने त्यांच्या मैत्रिण कोमल बहिणीच्या मुलीचे लग्न खूप चांगले झाले आहे. त्यांच्या शेजाऱ्याचा दागिन्यांची पेटी बेपत्ता झाली होती. साई व्रताच्या महिमामुळे दोन महिन्यांनी सापडली हा अद्भुत चमत्कार होता. </p>
<p>
	 </p>
<p>
	बहीण किरण म्हणाल्या की, साईबाबांचा महिमा मोठा आहे. ज्या प्रकारे साईबाबा तुम्हास प्रसन्न झाले तसेच आम्हास होवो, हीच प्रार्थना.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>साईबाबा आरती</strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	आरती श्री साईं गुरुवर की । परमानन्द सदा सुरवर की ।।</p>
<p>
	जा की कृपा विपुल सुखकारी । दुःख, शोक, संकट, भयहारी ।।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शिरडी में अवतार रचाया । चमत्कार से तत्व दिखाया ।।</p>
<p>
	कितने भक्त चरण पर आये । वे सुख शान्ति चिरंतन पाये ।।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भाव धरै जो मन में जैसा । पावत अनुभव वो ही वैसा।।</p>
<p>
	गुरु की उदी लगावे तन को । समाधान लाभत उस मन को ।।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साईं नाम सदा जो गावे । सो फल जग में शाश्वत पावे ।।</p>
<p>
	गुरुवासर करि पूजा – सेवा । उस पर कृपा करत गुरुदेवा ।।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	राम, कृष्ण, हनुमान रूप में । दे दर्शन, जानत जो मन में ।।</p>
<p>
	विविध धर्म के सेवक आते । दर्शन कर इच्छित फल पाते ।।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जै बोलो साईं बाबा की । जो बोलो अवधूत गुरु की ।।</p>
<p>
	साईंदास” आरती को गावे । घर में बसि सुख, मंगल पावे ।।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 12 Oct 2023 09:04:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 12 Oct 2023 09:13:57 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[शिरडीच्या साईबाबांची कथा]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/shirdi-sai-baba-kahani-marahti-123101100032_1.html</link>
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      <description><![CDATA[Shirdi Sai Baba Vrat Katha कोकिळा आणि तिचा नवरा महेशभाई एका शहरात राहत होते. दोघेही एकमेकांसोबत खूप प्रेमाने राहत होते, पण महेशभाई खूप भांडखोर होते. महेश थेट बोलत नसे, बोलण्याची शिष्टाई त्याला नव्हती.]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="" class="imgCont" height="397" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/ta/img/article/2016-06/02/full/1464861772-9083.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="600" /></p>
	<strong>Shirdi Sai Baba Vrat Katha </strong>कोकिळा आणि तिचा नवरा महेशभाई एका शहरात राहत होते. दोघेही एकमेकांसोबत खूप प्रेमाने राहत होते, पण महेशभाई खूप भांडखोर होते. महेश थेट बोलत नसे, बोलण्याची शिष्टाई त्याला नव्हती.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पण कोकिळा अतिशय धार्मिक स्वभावाची स्त्री होती, तिची देवावर श्रद्धा होती आणि काहीही न बोलता सर्व काही सहन करत होती. हळूहळू महेशभाईंचा रोजगार ठप्प झाला. त्याला काहीही उत्पन्न नव्हते. आता तो पूर्ण रिकामा झाला, तो दिवसभर घरीच असायचा आणि बेरोजगारीमुळे त्याने आणखीनच चुकीचा मार्ग पत्करला. आता त्याचे वागणे पूर्वीपेक्षा जास्त वाईट होत गेले.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	एक दिवस दुपारी एक म्हातारा बाबा दारात येऊन उभा राहिला. ज्याच्या चेहऱ्यावर विलक्षण तेज दिसत होते. म्हातारे बाबा येताच त्यांनी डाळ आणि तांदूळ मागितले. कोकिळा बहिणीने श्रद्धेने त्यांना डाळ आणि तांदूळ दिले आणि त्या बाबांना दोन्ही हातांनी नमस्कार केला. बाबा म्हणाले सई तुला सुखी ठेव. कोकिळा बहीण म्हणाली, “महाराज, सुख माझ्या नशिबात नाही” आणि तिने तिची सर्व दुःखाची गोष्ट सांगितली.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वृद्ध बाबांनी श्री साईंच्या व्रताबद्दल सविस्तर माहिती दिली. 9 गुरुवारी उपवास करा. उपवास दरम्यान, फळे खा किंवा एका वेळी एक जेवण घ्या. 9 गुरुवारी घरी साईबाबांची पूजा करा. शक्य असल्यास साई मंदिरातही जावे. आणि नियमानुसार उद्यानपण करावे. भुकेल्यांना अन्न द्यावे.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साई व्रताची पुस्तके 7, 11, 21 जास्तीत जास्त लोकांमध्ये वितरित करा. आणि अशा प्रकारे साई व्रताचा प्रचार करा. साईबाबा तुमची इच्छा पूर्ण करतील. सर्वात महत्त्वाची गोष्ट म्हणजे साईबाबांवर अढळ श्रद्धा असणे महत्त्वाचे आहे.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कोकिळा बहिणीनेही गुरुवारी उपवास सुरू केले. 9 गुरुवार रोजी गोरगरिबांना अन्नदान करून त्यांना दक्षिणा दिली तसेच उपवासाची पुस्तकेही भेट दिली. त्यांच्यातील कौटुंबिक कलह संपुष्टात आले आणि घरात सुख-शांती नांदली.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	महेशभाईंचा स्वभाव पूर्णपणे बदलला. त्याचा रोजगार पुन्हा सुरू झाला. काही दिवसातच कुटुंबात सुख-समृद्धी खूप वाढली. पती-पत्नी दोघेही आनंदी जीवन जगू लागले. काही दिवसांनी कोकिळा बहिणीचा मेव्हणा सुरतहून आला होता. बोलताना त्यांनी सांगितले की त्यांची मुले अभ्यास करत नाहीत आणि परीक्षेत नापास झाली आहेत. कोकिळा बहिणीने गुरुवारच्या व्रताचा महिमा सांगितला आणि म्हणाल्या की साई बाबांच्या कृपेने मुलं चांगलं अभ्यास करू लागतील पण त्यासाठी श्रद्धा असणं गरजेचं आहे. साईबाबा सर्वांना आशीर्वाद देतात. त्यांच्या वहिनींनी व्रताचे नियम आणि कायदे विचारले. कोकिळा बहिणीने त्यांना त्या सर्व गोष्टी सांगितल्या.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	काही दिवसांनी सुरतहून त्यांच्या वहिनीचे पत्र आले, त्यात लिहिले होते की, तिची मुले साई व्रत पाळू लागली आहेत आणि त्यांचा अभ्यास चांगला होत आहे. गुरुवारीही त्यांनी उपोषण केले आणि पतीच्या कार्यालयात उपवासाची पुस्तके वाटली होती. तिने पुढे लिहिले की तिने आपल्या मैत्रिणींना देखील महिमा सांगितला. साई व्रत पाळून तिच्या मैत्रिणीच्या मुलीचे लग्न अगदी चांगल्या ठिकाणी ठरले.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	त्यांच्या शेजाऱ्याची दागिन्यांची पेटी हरवली होती, आता महिनाभरानंतर साईंच्या कृपेने दागिन्यांची पेटी परत मिळाली. असे अनेक आश्चर्यकारक चमत्कार घडले. कोकिळा बहिणीची साईंची भक्ती शक्तीचे ज्ञान होते. हे साईनाथ, जसे सर्वांवर कृपा करतो तशीच आमच्यावरही कर.</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 11 Oct 2023 16:10:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 11 Oct 2023 16:12:22 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अन्नदान करताना कोणाशीही भेदभाव करू नका, सर्वांची भूक सारखीच असते]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/when-donating-food-do-not-discriminate-against-anyone-122021200016_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2021-06/16/thumb/1_1/1623821077-0068.jpg"/>
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      <description><![CDATA[कोणतीही व्यक्ती साईबाबांकडे आपल्या समस्या घेऊन येत असे, ते त्यांना सर्व काही ठीक होईल असे सांगायचे. ते सिद्ध पुरुष होते, म्हणून त्यांनी वाक्सिद्धी साधली होती. त्याने जे सांगितले ते खरे ठरले. हळू हळू लोकांचा असा विश्वास वाटू लागला की डोक्यावर हात आला ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="dan bhojan" class="imgCont" height="323" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2021-06/16/full/1623821077-0068.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="bhandara food" width="621" /></p>
	कोणतीही व्यक्ती साईबाबांकडे आपल्या समस्या घेऊन येत असे, ते त्यांना सर्व काही ठीक होईल असे सांगायचे. ते सिद्ध पुरुष होते, म्हणून त्यांनी वाक्सिद्धी साधली होती. त्याने जे सांगितले ते खरे ठरले. हळू हळू लोकांचा असा विश्वास वाटू लागला की डोक्यावर हात आला किंवा ते चांगले बोलले तर ते तसेच घडेल. मोठ्या संख्येने लोक त्यांना घेरायचे. लोकांचे भले करणे हेच साईबाबांचे कार्य होते. चांगल्याच्या बदल्यात त्यांनी कधीही लोकांकडे काहीही मागितले नाही.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	त्यावेळी कुलकर्णी नावाचे ज्योतिषी होते. कुलकर्णीजीही लोकांना आनंदी कसे राहायचे हे सांगायचे, पण या सेवेच्या बदल्यात त्यांना पैसे मिळाले, अशी त्यांची इच्छा असायची. यामुळे ते साईबाबांशी असहमत होते आणि मत्सरही करत होते. हळूहळू साईबाबांचे वागणे पाहून तेही त्यांचे भक्त झाले.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	एके दिवशी कुलकर्णीजींनी साईबाबांच्या सन्मानार्थ मेजवानी दिली आणि बाबांना आमंत्रित केले. साईबाबा म्हणाले, &#39;तुम्ही दिवसभर लोकांना जेवू द्या, मीही येतो.&#39; कुलकर्णी दिवसभर जेवण पुरवत राहिले, चांगले लोक येत राहिले. तिथे एक भिकारीही आला. कुलकर्णीजी भिकाऱ्याला म्हणाले, &#39;या सर्वांपासून दूर जा, मी अन्नक्षेत्र उघडले आहे, पण भिकाऱ्यांसाठी दुसरी जागा आहे.&#39;</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भिकारी म्हणाला, &#39;इकडे दे, मी इथेच बसतो.&#39; कुलकर्णीजींनी त्या भिकाऱ्याला बाहेर ढकलून दिले आणि म्हणाले, &#39;आता तुम्हाला इथे अन्न मिळणार नाही.&#39; मेजवानी रात्री झाली आणि कुलकर्णी वाट पाहत राहिले, पण साईबाबा आले नाहीत. ते रात्री साईबाबांकडे पोहोचले आणि विचारले, &#39;तुम्ही मेजवानीला आला नाही?&#39;</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साईबाबा म्हणाले, &#39;मी आलो होतो आणि तिथून उपाशीपोटी परत आलो.&#39; हे ऐकून कुलकर्णीजींना आठवले आणि ते म्हणाले, &#39;तर ते आपण होता?&#39; बाबा म्हणाले, &#39;हो, मी तोच भिकारी होतो. बघा भाऊ, अन्नदान करताना भेदभाव करू नका. सगळ्यांची भूक सारखीच असते. मी फक्त तुम्ही अन्नदान करत आहात की सेवेसाठी हे पाहण्यासाठी आलो आहे.&#39;</p>
<p>
	 </p>
<p>
	धडे</p>
<p>
	साईबाबांनी येथे संदेश दिला आहे की, आपल्याकडे काही क्षमता, संपत्ती असेल तर ती अहंकाराने वापरू नये. लोकांची निस्वार्थीपणे सेवा केली पाहिजे.</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Mon, 02 Oct 2023 09:53:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Mon, 02 Oct 2023 10:29:00 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sai Baba 11 Vachan श्री साईबाबांची अकरा वचने]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-baba-11-vachan-122042900065_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2021-11/17/thumb/1_1/1637132454-8995.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2021-11/17/thumb/1_1/1637132454-8995.jpg</image>
      <description><![CDATA[॥ शिरडीस ज्याचे लागतील पाय ॥ टळती अपाय सर्व त्याचे ॥१॥
॥ माझ्या समाधीची पायरी चढेल ॥ दु:ख हें हरेल सर्व त्याचें ॥२॥
॥ जरी हें शरीर गेलों मी टाकून ॥ तरी मी धांवेन भक्तांसाठीं ॥३॥
॥ नवसास माझी पावेल समाधी ॥ धरा द्दढ बुद्धी माझ्या ठायीं ॥४॥]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="" class="imgCont" height="592" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2021-11/17/full/1637132454-8995.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="740" /></p>
	॥ शिरडीस ज्याचे लागतील पाय ॥ टळती अपाय सर्व त्याचे ॥१॥</p>
<p>
	॥ माझ्या समाधीची पायरी चढेल ॥ दु:ख हें हरेल सर्व त्याचें ॥२॥</p>
<p>
	॥ जरी हें शरीर गेलों मी टाकून ॥ तरी मी धांवेन भक्तांसाठीं ॥३॥</p>
<p>
	॥ नवसास माझी पावेल समाधी ॥ धरा द्दढ बुद्धी माझ्या ठायीं ॥४॥</p>
<p>
	॥ नित्य मी जिवंत, जाणा हेंचि सत्य ॥ नित्य घ्या प्रचीत अनुभवें ॥५॥</p>
<p>
	॥ शरण मज आला, आणि वायां गेला ॥ दाखवा दाखवा ऐसा कोणी ॥६॥</p>
<p>
	॥ जो जो, मज भजे, जैशा जैशा भावें ॥ तैसा तैसा पावें, मीही त्यासी ॥७॥</p>
<p>
	॥ तुमचा मी भार वाहीन सर्वथा ॥ नव्हे हें अन्यथा वचन माझें ॥८॥</p>
<p>
	॥ जाणा येथें आहे साहाय्य सर्वांस ॥ मागे जें जें त्यास तें तें लाभे ॥९॥</p>
<p>
	॥ माझा जो जाहला कायावाचामनीं ॥ तयाचा मी ऋणी सर्वकाळ ॥१०॥</p>
<p>
	॥ साई म्हणे तोचि; तोचि झाला धन्य ॥ झाला जो अनन्य माझ्या पायीं ॥११॥</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 10 Aug 2023 08:42:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 10 Aug 2023 08:47:07 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[About Sai Baba and His Family शिरडीच्या साईबाबांच्या कुटुंबाबद्दल जाणून घ्या]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/about-sai-baba-and-his-family-118101500011_1.html</link>
      <guid>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/about-sai-baba-and-his-family-118101500011_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2018-10/15/thumb/1_1/1539588653-2607.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2018-10/15/thumb/1_1/1539588653-2607.jpg</image>
      <description><![CDATA[साईबाबा जन्म स्थळ
महाराष्ट्राच्या परभणी जिल्ह्यातील पाथरी गावात साईबाबांचा जन्म 27 सप्टेंबर 1830 रोजी झाला होता.]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="saibaba" class="imgCont" height="338" src="//media.webdunia.com/_media/mr/img/article/2018-10/15/full/1539588653-2607.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="600" /></p>
	</p>
	साईबाबा जन्म स्थळ</p>
<p>
	महाराष्ट्राच्या परभणी जिल्ह्यातील पाथरी गावात साईबाबांचा जन्म 27 सप्टेंबर 1830 रोजी झाला होता. </p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>About Sai Baba and Hhis Family </strong>साईबाबांच्या आई-वडिलांचे नाव</p>
<p>
	साईबाबांच्या वडिलांचे नाव परशुराम भुसारी आणि आईचे नाव अनुसूया असे होते. यांना गोविंद भाऊ आणि देवकी अम्मा असे ही ओळखले जात होते. काही लोकं वडिलांना गंगाभाऊ असेही हाक मारायचे. यांचे 5 पुत्र होते ज्यांचे नाव- रघुपती, दादा, हरीभाऊ, अंबादास आणि बलवंत असे होते. बाबा परशुराम यांची तिसरी संतान होते ज्यांचे नाव हरीभाऊ असे होते.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>साईबाबांचे वंशज</strong></p>
<p>
	साईबाबांचे वंशज आजदेखील औरंगाबाद, निजामाबाद आणि हैदराबाद येथे राहतात. साईंचे मोठे भाऊ रघुपती यांचे दोन पुत्र होते- महारुद्र आणि परशुराम बापू. महारुद्र यांचे दोन पुत्र आहे त्यातून रघुनाथजी यांच्याकडे पाथरी येथील घर होते. </p>
<p>
	 </p>
<p>
	रघुनाथ भुसारी यांना 2 पुत्र आणि एक पुत्री आहे- दिवाकर भुसारी, शशिकांत भुसारी आणि मुलगी नागपूर येथे राहते. दिवाकर हैदराबादमध्ये आणि शशिकांत निजामाबाद येथे राहतात. </p>
<p>
	 </p>
<p>
	परशुराम यांचे पुत्र भाऊ यांना प्रभाकर राव आणि माणिक राव नामक 2 पुत्र होते. प्रभाकर राव यांचे प्रशांत, मुकुंद, संजय नामक पुत्र आणि लता पाठक त्यांची मुलगी आहे. हे औरंगाबादमध्ये राहतात. माणिकराव भुसारी यांना 4 मुली आहेत- अनिता, सुनीता, सीमा आणि दया.</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 20 Jul 2023 06:55:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 20 Jul 2023 11:48:29 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[श्री साईसच्चरित संपूर्ण अध्याय]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sri-sai-satcharita-full-adhyaay-marathi-123071900026_1.html</link>
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      <description><![CDATA[श्रीसाईनाथांच्या कृपेनें कै० गोविंदराव रघुनाथ दाभोलकर ऊर्फ अण्णासाहेब यांनी या ग्रंथरूपानें ही अमूल्य देणगी दिली आहे. शेवटच्या अध्यायांतील १८२ ते १९४ ओंव्यांत सुचविल्याप्रमाणें या ग्रंथाचें पारायण अगर सप्ताह साईभक्तांनीं करून अनुभव घ्यावा.]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sri Sai Satcharita Marathi" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2023-07/19/full/1689751829-5758.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sri Sai Satcharita Marathi" width="740" /></p>
	</p>
	श्रीसाईनाथांच्या कृपेनें कै० गोविंदराव रघुनाथ दाभोलकर ऊर्फ अण्णासाहेब यांनी या ग्रंथरूपानें ही अमूल्य देणगी दिली आहे. शेवटच्या अध्यायांतील १८२ ते १९४ ओंव्यांत सुचविल्याप्रमाणें या ग्रंथाचें पारायण अगर सप्ताह साईभक्तांनीं करून अनुभव घ्यावा.<br />
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sri-sai-satcharita-upoddhant-marathi-123071900024_1.html" target="_blank">श्री साईसच्चरित - उपोद्धात</a></strong><br />
		<p>
			<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sri-sai-satcharita-prastavana-marathi-123071900025_1.html" target="_blank">श्री साईसच्चरित - प्रस्तावना</a></strong></p>
	</p>
</p>
<p>
	<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-1-122042200036_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय १</a></strong><br />
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-2-122042200037_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय २</a></strong><br />
		<p>
			<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-3-122042200038_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ३</a></strong><br />
			<p>
				<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-4-122042200040_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ४</a></strong><br />
				<p>
					<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-5-122042200041_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ५</a></strong><br />
					<p>
						<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-6-122042200042_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ६</a></strong><br />
						<p>
							<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-7-122042200043_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ७</a></strong><br />
							<p>
								<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-8-122042200044_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ८</a></strong><br />
								<p>
									<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-9-122042200046_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ९</a></strong><br />
									<p>
										<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-10-122042200047_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय १०</a></strong><br />
										<p>
											<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-11-in-marathi-122042300051_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ११</a></strong><br />
											<p>
												<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter12-122042300053_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय १२</a></strong><br />
												<p>
													<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-13-122042300054_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय १३</a></strong><br />
													<p>
														<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-14-122042300055_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय १४</a></strong><br />
														<p>
															<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-15-122042300056_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय १५</a></strong><br />
															<p>
																<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-16-122042300057_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय १६</a></strong><br />
																<p>
																	<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-17-122042300058_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय १७</a></strong><br />
																	<p>
																		<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-18-122042300059_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय १८</a></strong><br />
																		<p>
																			<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-19-122042300060_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय १९</a></strong><br />
																			<p>
																				<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-20-122042300061_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय २०</a></strong><br />
																				<p>
																					<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-21-122042600034_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय २१</a></strong><br />
																					<p>
																						<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-22-122042600036_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय २२</a></strong><br />
																						<p>
																							<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-23-122042600037_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय २३</a></strong><br />
																							<p>
																								<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-24-122042600038_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय २४</a></strong><br />
																								<p>
																									<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-25-122042600043_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय २५</a></strong><br />
																									<p>
																										<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-26-122042600045_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय २६</a></strong><br />
																										<p>
																											<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-27-122042600046_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय २७</a></strong><br />
																											<p>
																												<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-28-122042600047_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय २८</a></strong><br />
																												<p>
																													<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-29-122042600048_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय २९</a></strong><br />
																													<p>
																														<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-30-122042600050_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ३०</a></strong><br />
																														<p>
																															<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-31-122042600054_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ३१</a></strong><br />
																															<p>
																																<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-32-122042600055_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ३२</a></strong><br />
																																<p>
																																	<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-33-122042600056_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ३३</a></strong><br />
																																	<p>
																																		<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-34-122042600060_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ३४</a></strong><br />
																																		<p>
																																			<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-35-122042600062_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ३५</a></strong><br />
																																			<p>
																																				<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-36-122042600064_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ३६</a></strong><br />
																																				<p>
																																					<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-37-122042600065_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ३७</a></strong><br />
																																					<p>
																																						<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-38-122042600067_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ३८</a></strong><br />
																																						<p>
																																							<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-39-122042600069_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ३९</a></strong><br />
																																							<p>
																																								<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-40-122042600070_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ४०</a></strong><br />
																																								<p>
																																									<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-41-122042900045_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ४१</a></strong><br />
																																									<p>
																																										<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-42-122042900047_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ४२</a></strong><br />
																																										<p>
																																											<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-43-122042900048_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ४३</a></strong><br />
																																											<p>
																																												<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-44-122042900050_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ४४</a></strong><br />
																																												<p>
																																													<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-45-122042900052_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ४५</a></strong><br />
																																													<p>
																																														<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-46-122042900053_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ४६</a></strong><br />
																																														<p>
																																															<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-47-122042900054_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ४७</a></strong><br />
																																															<p>
																																																<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/साईसच्चरित-अध्याय-४८-122042900055_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ४८</a></strong><br />
																																																<p>
																																																	<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-49-122042900056_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ४९</a></strong><br />
																																																	<p>
																																																		<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-50-122042900058_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ५०</a></strong><br />
																																																		<p>
																																																			<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-51-122042900059_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ५१</a></strong><br />
																																																			<p>
																																																				<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-52-122042900061_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ५२</a></strong><br />
																																																				<p>
																																																					<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-53-122042900062_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ५३</a></strong></p>
																																																			</p>
																																																		</p>
																																																	</p>
																																																</p>
																																															</p>
																																														</p>
																																													</p>
																																												</p>
																																											</p>
																																										</p>
																																									</p>
																																								</p>
																																							</p>
																																						</p>
																																					</p>
																																				</p>
																																			</p>
																																		</p>
																																	</p>
																																</p>
																															</p>
																														</p>
																													</p>
																												</p>
																											</p>
																										</p>
																									</p>
																								</p>
																							</p>
																						</p>
																					</p>
																				</p>
																			</p>
																		</p>
																	</p>
																</p>
															</p>
														</p>
													</p>
												</p>
											</p>
										</p>
									</p>
								</p>
							</p>
						</p>
					</p>
				</p>
			</p>
		</p>
	</p>
</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 19 Jul 2023 12:58:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 06 Jan 2024 17:31:49 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[श्री साईसच्चरित - प्रस्तावना]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sri-sai-satcharita-prastavana-marathi-123071900025_1.html</link>
      <guid>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sri-sai-satcharita-prastavana-marathi-123071900025_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2023-07/19/thumb/1_1/1689751709-5257.jpg"/>
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      <description><![CDATA[(१) आपल्या ह्या आर्यावर्तांत सद‌गुरुकृपेवांचून मोक्ष नाहीं अशी द्दढ समजूत, द्दढ भावना, द्दढ सिद्धान्त आहे; व हा सिद्धान्त आजकालचा नाहीं, फार पुरातन आहे. तो वेदकालापासून आहे व त्यास वेदशास्त्रांचा आधार आहे.]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sri Sai Satcharita Prastavana" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2023-07/19/full/1689751709-5257.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sri Sai Satcharita Prastavana" width="740" /></p>
	</p>
	(१) आपल्या ह्या आर्यावर्तांत सद‌गुरुकृपेवांचून मोक्ष नाहीं अशी द्दढ समजूत, द्दढ भावना, द्दढ सिद्धान्त आहे; व हा सिद्धान्त आजकालचा नाहीं, फार पुरातन आहे. तो वेदकालापासून आहे व त्यास वेदशास्त्रांचा आधार आहे. सदुरु कोणत्याहि जातीचे, धर्माचे, वयाचे, प्रत्यक्ष अथवा ग्रंथरूप, स्त्री असोत अथवा पुरुष असोत, साधुसंत, देवता, माता, पिता असोत, बंधुभगिनी असोत, मित्रसखा असोत, नवरा असो वा बायको असो, ज्ञात असोत वा अज्ञात असोत, ते कसे असावेत, त्यांची सेवा कशी करावी, त्यांची कृपा केव्हां होते, ते उपदेश केव्हां करतात, ज्ञानप्राप्ति केव्हां होते व ज्ञानोत्तर मनोवृत्ति कशी बनते याचें सर्वोत्कृष्ट वर्णन भगवान्‌ श्रीसमर्थ सद्नुरु झानेश्वरमहाराज यांनीं आपल्या श्रीमद्भगवद्नीताभाष्यांत केलें आहे. महाराज लिहितात :---</p>
<p>
	 </p>
<p>
	तें ज्ञान पैं गा बरवें । जरी मनीं अथि आणावें । तरी संतां या भजावें । सर्वस्वेंसीं ॥१६५॥</p>
<p>
	जे ज्ञानाचा कुरुठा । तेथ सेवा हा दारवंटा । तो स्वाधीन करी सुभटा । वोळगोनी ॥१६६॥</p>
<p>
	तरी तनुमनुजीवें । चरणासीं लागावें । आणि अगर्वता करावें । दास्य सकळ ॥१६७॥</p>
<p>
	मग अपेक्षित जें आपुलें । तेंही सांगती पुसिलें । जेणें अंत:करण बोधलें । संकल्पा न ये ॥१६८॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	श्रीज्ञानेश्वरी, अ. ४, श्लो. ३४</p>
<p>
	 </p>
<p>
	गुरुसेवेचे मार्ग, साधनें, अथवा अंगें अनंत आहेत. अद्वितीय राजकारणी पुरुष, राज्यसंस्थापक पराक्रमी वीर, अलौकिक शास्त्रकार, इतिहासकार, नाटककार, विशाल बुद्धीचे शिक्षक, व्याख्याते, लेखक वगैरे थोर पुषांस आपले व्यवहारगुरु मानून त्यांचीं चरित्रें लिहिणें ही गुरुसेवा व जनसेवा आहे, परंतु ही सेवा ऐहिक स्वरूपाची असून ती कालमानानुरूप करावयाची असते. तिचें महत्त्व व फल शाश्वत नसतें. तिला देशकालाची मर्यादा असते. तिच्यांत जरी लोकशिक्षण, परोपकार बराच असतो तरी ती स्वार्थमूलकहि असते. अत एव ती परमार्थफलदायी नव्हे.</p>
<p>
	(२) पुष्कळशा साधुसंतांचीं चरित्रें लिहिणें हाहि एक गुरुसेवाप्रकार आहे; व तो परमार्थफलदायीहि आहे. परंतु हा व उपरिनिर्दिष्ट प्रकार हे दोन्ही एकदेशी किंवा एकांगी होत. यांच्या केवळ लेखनापासून पारमार्थिक अंतिम घ्येय प्राप्त होणें कठीण; किंबहुना नाहींच म्हटलें तरी चालेल.</p>
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	(३) माझ्या अल्प समजुतीप्रमाणें लेखनसेवेंत सर्वांत उत्तम व खात्रीनें मोक्षफल देणारी व श्रेष्ठ सेवा म्हणजे गुर्वाज्ञेवरून अथवा आपल्या अंत:स्फूर्तीनें आपल्या सद्‌गुरूचें चरित्र लिहून त्याचें नित्य नियमानें आपण स्वत: अध्ययन व देशकाल-प्रकृत्यनुकूलतेप्रमाणें द्दढ निश्चयानें, शुद्ध अंत:करणानें, उत्कृष्ट श्रद्धेनें, निस्सीम प्रेमानें व अव्यभिचारी भक्तिभावानें शेंकडों पारायणें व सप्ताह करणें, व इतर सद्भक्तांस करावयास लावणें ही सेवा होय. ही सेवा शरीरवाङमनात्मक असून ती कुटुंबपोषणमार्ताच्या अथवा ऐश्वर्याच्या आड येत नाहीं.</p>
<p>
	(४) चरित्रलेखनांत दोन भेद असतात. संक्षिप्त किंवा विस्तृत, आणि गद्य किंवा पद्य. अध्ययन, पठण, पारायण किंवा सप्ताह करण्यास विस्तृत व पद्यचरित्रेंच योग्य होत. गद्यचरित्रांचीं पारायणें किंवा सप्ताह करण्याची वहिवाट नाहीं. गद्य पाठ करण्यास कठीण. पद्य लवकर व सुलभतेनें पाठ होतें, स्मरणांत राहातें व वेळीं आठवतें. आपलें पुरातन संस्कृत वाङमय बहुतेक पद्यांतच आहे, याचें कारण तरी हेंच असलें पाहिजे. पद्य व विस्तृत गुरुचरित्राचें अध्ययन, पठण, पारायण व सप्ताह यांनीं गुरुसेवा उत्तम होते असा सार्वत्रिक अनुभव असून  आपल्यांत प्रघातहि तसाच आहे.</p>
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	(५) पारायणें व सप्ताह करण्याची चाल फार प्राचीन आहे. वेद कालापासूनची आहे. वेदांचीं, भागवताचीं, रामायणाचीं, योगवासिष्ठाचीं वगैरे गीर्वाण ग्रंथराजांचीं पारायणें व सप्ताह नित्य कोठें ना कोठें होत असतात हें आपण पाहतों व ऐकतों.</p>
<p>
	(६) त्याचप्रमाणें शीज्ञानेश्वरी, श्रीनाथभागवत, श्रीदासबोध वगैरे मराठींत लिहिलेल्या विश्ववंद्य ग्रंथराजांचींहि पारायणें व सप्ताह नित्य होत असतात. हीहि चाल पुरातनच आहे. हीं चरित्रें ग्रंथ नसून केवळ ऐहिक व पारमार्थिक ज्ञानग्रंथ आहेत. तथापि जे पुरुष या ग्रंथनिर्मात्यांस अथवा या ग्रंथांसच आपले गुरू मानतात त्यांना या ग्रंथांचें अध्ययन, पठण, पारायण व सप्ताह केल्यानें नि:संशय सर्वोत्कृष्ट, अनुपमेय व मोक्षफलदायी गुरुसेवा घडते.</p>
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	(७) गुरुचरित्र म्हणजे गुरूंचा अवतार, बालपण, तरुणपण, वृद्धपण, त्यांनीं केलेल्या अद्‌भुत लीला, दाखविलेले अतुल चमत्कार, केलेली अवतार - कार्यें वगैरे गोष्टींचा लिहिलेला विश्वसनीय व सत्य ग्रंथ.</p>
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	(८) वरील केवळ ज्ञानग्रंथांचा व गुरुचरित्रग्रंथांचा उपयोग मात्र दोन्ही प्रकारांनीं करण्यांनीं करण्यांत येतो. काम्य द्दष्टीनें व निष्कामबुद्धीनें. काम्य :--- ऐहिक, ऐश्वर्योपभोगासाठीं किंवा चिंता, आपत्ति,  संकट, रोगयातना, पीडानिवारण होण्यासाठीं; निष्काम :--- संसारनिवृत्ति किंवा जन्ममरणमुक्ततेसाठीं. निष्काम गुरूसेवा ही केव्हांहि श्रेष्ठच ठरणार. मग ती गुरुचरित्र-लेखन-सेवा असो वा अन्य प्रकारची असो.</p>
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	(९) गुरुचरित्र-लेखन-सेवा ही नारदपुराणांत दिली आहे; यावरून ती फार प्राचीन आहे यांत शंका नाहीं.</p>
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	(१०) आपल्या या भरतभूमींत अवतीर्ण झालेल्या साधुसंतांचीं त्रोटक चरित्रें आपल्याकडील पसिद्ध श्रीमन्महीपति कविमहाराजांनीं मराठींत ओंवीप्रबंधांत आपल्या प्रख्यात जगन्मान्य श्रीभक्तलीलामृत, व श्रीसंतलीलामृत या दोन ग्रंथांत लिहून ठेविलीं आहेत.</p>
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	(११) तसेंच त्यानंतरच्या बहुतेक सर्व महाराष्ट्रीय अर्वाचीन साधुसंतांचीं संक्षिप्त चरित्रें आपल्याकडील प्रसिद्ध श्रीदासगणू कविमहाराजांनीं आपल्या विख्यात श्रीभक्तलीलामृत, श्रीसंतलीलामृत व श्रीभक्तिसारामृत या तीन मराठी ग्रंथांत ओंवी प्रबंधांत लिहून ठेविलीं आहेत.</p>
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	(१२) या उपरिनिर्दिष्ट कविवर्यद्वयांनीं लिहून ठेविलेल्या प्रत्येक ग्रंथाचें पारायण किंवा सप्ताह करतां येईल. परंतु त्यांतील कोणत्याहि एका साधुसंतांच्या चरित्राचें स्वतंत्र रीतीनें पारायण किंवा सप्ताह करूं म्हटलें तर, तें चरित्र सर्वांगपूर्ण व, विस्तृत नसल्यामुळें व त्या चरित्रास वरील ग्रंथांत फार तर दोनतीन पानेंच खर्ची घातलीं असल्याकरणानें तें चरित्र पारायण किंवा सप्ताह करण्यास मुळींच उपयोगी पडत नाहीं.</p>
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	(१३) विस्तृत पद्यमय गुरुचरित्राच्या अध्ययनानें, पठणानें, पारायणानें किंवा सप्ताहानें चरित्रलेखकास तर गुरुसेवा होतेच; परंतु इतर भक्तांनींहि जर त्या चरित्राचें अध्ययन, पठण, पारायण व सप्ताह केले तर लेखकास जनींजनार्दनाची सेवा घडून, लोकसंग्रहाच्या सेवेचें श्रेय मिळून त्या इतर भक्तजनांच्या जन्माचेंहि सार्थक होतें.</p>
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	(१४) सद्रुरु ग्रंथरुपानें आपापल्या भक्तांकडून दोन प्रकारची सेवा घेतात. एक श्रीज्ञानेश्वरी, श्रीनाथभागवत, श्रीदासबोध यांसारखे महान्‌ ग्रंथ स्वत:च निर्माण करून किंवा दुसरें, आपलीं चरित्रें आपल्या सद्भक्तांकडून लिहून घेऊन त्यांचें लेखकाकडून व भक्तवृंदाकडून अध्ययन, पठण, पारायणें व सप्ताहरूपानें सेवा घेणों.</p>
<p>
	(१५) अनेक सद्भक्तांनीं आपापल्या इच्छेनुसार व आवडीनुसार आजपर्यंत निरनिराळ्या प्रसंगीं व निरनिराळ्या भाषेंत आपापल्या गुरूंचीं गद्याप्रमाणें पद्य चरित्रें लिहून जगास ऋणी करून ठेविलें आहे. तथापि पारायणें व सप्ताह करण्यास योग्य, विस्तृत, पद्य, व्यापक, सर्वांगपरिपूर्ण, प्रख्यात असें निदान आपल्या महाराष्ट्रांत तरी पहिलें, फार जुनें, गोड, रसाळ, चटकदार, प्रासादिक, श्रीसरखतीगंगाधर यांनीं क्षेत्र औदुंबर, श्रीवाडी, श्रीगाणगापुरनिवासी, श्रीसमर्थ सद्नुरु नृसिंहसरखती महाराज यांचें लिहिलेलें चरित्र; जें बृहत्‌ किंवा थोरलें गुरुचरित्र म्हणून हल्लीं प्रसिद्ध आहे, जें आबालवृद्धांच्या उत्तम परिचयाचें आहे, ज्याचे नित्यश; ह्जारों ठीकाणीं नियमानें रोज अध्ययन - पठण होतें व प्रसंगानुसार ज्याचीं पारायणें व सप्ताह होतात. दुसरें अगदीं शैलधी (शिरडी), तालुके कोपरगांव, जिल्हा अहमदनगर येथील निवासी, क्षेत्रसंन्यासी, आधुनिक संतचूडामणि श्रीसच्चिदानंद समर्थ सद्‌गुरु सांईबाबामहाराज यांचें लिहिलेलें चरित्र; जें श्रीसांईसच्चरित या नांवानें श्रीसांईलीलेंत ६ वर्षें प्रत्येक अंकांत एक एक अध्याय या रूपानें प्रसिद्ध होऊन, नुकतेंच या वर्षाच्या (सातव्या वर्षाच्या) ५-६-७-८ या जोड अंकांत अवतरणिकाध्यायासह पूर्ण झालें आहे व ज्याबद्दल ही हल्लींची प्रस्तावना लिहिली आहे. अशा या दोन गुरुचरित्रांखेरीज कोणीं तिसरें इतकें विस्तृत लिहिलेलें गुरुचरित्र आढळत नाहीं.</p>
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	(१६) श्रीसमर्थ सद्‌गुरु टेंभेस्वामी ऊर्फ वासुदेवानंदसरस्वती महाराज यांनीं एक विस्तृत, विद्वत्तापूर्ण, विविधवृत्त, शब्दालंकार, अर्थालंकार, शब्दार्थालंकार, कुट्टकसुभाषितयुक्त असें लिहिलेलें छापील गुरुचरित्र बरेच वर्षांपूर्वीं माझ्या पाहण्यांत आल्याचें स्मरतें.</p>
<p>
	(१७) तसेंच श्रीसमर्थसद्नुरु श्रीक्षेत्र बाळेकुंद्री येथील निवासी दत्तमहाराज यांनींहि एक गुरुचरित्र लिहिलें आहे असें ऐकतों; परंतु हें गुरुचरित्र अद्याप छापून प्रसिद्ध झालेलें दिसत नाहीं.</p>
<p>
	(१८) श्रीसमर्थसद्नुरु वासुदेवानंदसरस्वती महाराजांनीं हिलिलेलें गुरुचरित्र श्रीसरस्वतीगंगाधरांनीं लिहिलेल्या गुरुचरित्राइतकें अद्याप प्रसिद्धीस आलेलें दिसत नाहीं. कदाचित्‌ महाराजांच्या भक्तमंडळाकडून त्यांचें अध्ययन, पठण, पारायण व सप्ताहहि श्रीपुण्यमहासरित्‌ नर्मदातीरावर गायकवाडींत चांदोद-कर्नाळीपासून बर्‍याच अंतरावर असलेल्या श्रीगरुडेश्वरक्षेत्रीं महाराजांच्या समाधिमंदिरांत होतहि असतील; परंतु त्याची नक्की माहिती मिळालेली नाहीं. हें चरित्र महाराजांनीं स्वत:च लिहिलें असल्याकारणानें त्याची गणना श्रीसरस्वतीगंगाधर व कै. श्री. अण्णासाहेब दाभोलकर यांनीं लिहिलेल्या गुरुचरित्रलेखनांत करतां येणार नाहीं.</p>
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	(१९) खुद्द श्रीसमर्थसद्नुरु सांईबाबा महाराज यांच्या कृपेस पात्र झालेले, व आधुनिक कविश्रेष्ठांत ज्यांची प्रामुख्यानें गणना होत आहे, व ज्यांनीं आजपावेतों मनाचे श्लोक, जलददूत काव्य, नाटकखंड, लावण्या, पोवाडे, ग्राम्यगीत, अर्वाचीन भक्तलीलामृत, संतलीलामृत, भक्तिसारामृत, ईशावास्य भावार्थमंजिरी, अमृतानुभवटीका, गोदामाहात्म्य, स्तोत्रें, अष्टकें, सुभाषितें, कीर्तनोपयोगी आख्यानें, चक्रीभजन, स्फुट कविता, वगैरे लहानमोठे पुष्कळ ग्रंथ लिहिले  आहेत व सर्वांच्या परिचयाचे असे श्रीदासगणूमहाराज यांनी श्रीबाबांचीं दोन चरित्रें-एक त्यांनीं आपल्या भक्तलीलामृतांत व दुसरें भक्तिसारामृतांत अनुक्रमें ३१, ३२, ३३. व ५२, ५३ ता अध्यायांत लिहिलीं आहेत, पहिल्याची पृष्ठसंख्या १२ असून ओंवीसंख्या ५०९ आहे व दुसर्‍याची पृष्ठसंख्या १२ असून ओंवीसंख्या ४९७ आहे.</p>
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	(२०) हीं दोन्ही चरित्रें सर्वोत्कृष्ट, ह्रदयंगम, रसाळ, प्रसादजन्य आहेत यांत शंका नाहीं. तीं अध्ययन, पठण, पारायण, व सप्ताह करण्यास योग्य आहेत; फक्त तीं फारच लघु आहेत इतकेंच. त्यांतील  कथा व श्रीसांईसच्चरितांतील कथा कमीजास्त प्रमाणानें बुतेक एकच आहेत. आपल्या देशाची हीन स्थिति व तिचीं  कारणें यांचें ह्रदयस्पर्शी सुंदर चित्र श्रीदासगणू महाराजांनीं इतर ग्रंथांप्रमाणें या लघुचरित्रांतहि उत्तम रेखाटलें आहे. श्री. अप्णासाहेब या भानगडींत मुळींच पडले नाहींत.</p>
<p>
	(२१) श्रीक्षेत्र वाडी येथील  श्रीदत्तस्तवराज या छोटेखानी पुस्तकांतील माहितीवरून श्रीसस्वतीगंगाधर यांनीं लिहिलेल्या बृहद्रुरुचरित्राहून एक निराळा स्वतंत्र फक्त ७०७ श्लोकी लघुगुरुचरित्र नांवाचा ग्रंथ वाडींत आहे. तो थोरल्या गुरुचरित्रापेक्षां फार प्राचीन आहे असें दिसतें. पण हें चरित्र कोणी व कधी लिहिलें हें समजण्यास मार्ग नाहीं. यांतील चरित्रनायक तेच थोरल्या गुरुचरित्रांतील चरित्रनायक होत. या चरित्रनायक श्रीसमर्थसद्नुरु नृसिंहसरस्वती महाराजांचा समाधिकाल शके ११४० हा अहे असें लघुरुव्चरित्रांतील ७०५, ७०६, ७०७, या ओंव्यांवरून दिसतें.</p>
<p>
	(२२) श्रीसरस्वतीगंगाधर यांचें उपनांव साखरे. या साखरे कुळांतील श्रीसायंदेव हे श्रीसमर्थ सद्नुरु नृसिंहसरस्वती महाराजांच्या कृपेस पात्र झाले. त्यांच्यावर नंतर सद्नुरूंचा अनुग्रह होऊन ‘तुझे वंशजांकडून माझी निरंतर सेवा होत जाईल’ असें त्यांना वरप्रदान मिळालें. श्रीसायंदेवापासून पांचवे पुरुष हे श्रीसरस्वतीगंगाधर होत. या श्रीसरस्वतीगंगाधरांना हल्लीं प्रसिद्धा असलेलें बृहद्रुरुचरित्र लिहिण्यास स्वत: श्रीसर्थसद्नुक नृसिंहसरस्वती महाराजांनीं आज्ञा केली असें त्याच चरित्रांत लिहिलेलें आहे. यावरून हें चरित्रसुद्धां पुष्कळ वर्षांचें जुनें आहे असें दिसतें. चंरित्रलेखनाचा किंवा चरित्रलेखकाचा काल दिलेला नाहीं.</p>
<p>
	(२३) याच श्रीसमर्थ सद्नुरु नृसिंहसरस्वती महाराजांचा अवतार पुन्हां श्रीक्षेत्र आळंदी येथें होऊन ते शके १८०७ सालीं समाधिस्थ झाले असें श्रीदासगणू महाराजांनीं आपल्या श्रीभक्तलीलामृत या ग्रंथाच्या ३० वे अध्यायांत १२ व १०३ ओंवींत लिहिलें आहे. यावरून हल्लीं प्रचारांत असललें थोरलें गुरुचरित्र शके १८०७ सालानंतर लिहिलें नसून, जरी लघुगुरुचरित्राइतकें जुनें नसलें तरी, खात्रीनें १८०७ सालाच्या पुष्कळच पूर्वीं लिहिलें गेलें असलें पाहिजे यांत शंका नाहीं.</p>
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	(२४) असो. आपल्याला गुरुसेवा घडावी, आपल्या हातून शक्य तितका लोकसंग्रहहि व्हावा व मातृभाषावाङमयाची सेवा व्हावी या उदात्त हेतूनें श्रीसमर्थ सद्‌गुरु सांईबाबा महाराज यांच्या आज्ञेवरून श्री. अण्णासाहेबांनी सेवावृत्तिशृंखलाविमोचन झाल्यावर हें गुरुचरित्र लिहिलें आहे.</p>
<p>
	(२५) श्रीसरस्वतीगंगाधरांच्या गुरुचरित्राप्रमाणेंच या श्रीसांईसच्चरितांत अवतरणिकाध्यायासह ५३ अध्याय आहेत. पहिल्याची ओंवीसंख्या ७३०० आहे, याची ओंवीसंख्या ९४५० आहे.</p>
<p>
	(२६) संस्कृतांत जसा अनुष्टुप्‌ छंद तसाच मराठींत ओंवीप्रबंध हा मोठया कवित्वलेखनास योग्य आहे. चरित्रग्रंथांस ओंवीप्रबंध सुगम असतो म्हणूनच मराठींतील बहुतेक मोठमोठे नामांकित विश्ववंद्य पद्यग्रंथ ओंवीप्रबंधांतच लिहिलेले आढळतात. याच कारणाकरितां श्रीसांईसच्चरितहि ओंवीप्रबंधांतच लिहिलेलें आहे.</p>
<p>
	(२७) श्रीसरस्वतीगंगाधरांच्या गुरुचरित्रांतील कथा सर्वथैव विश्वसनीय व अनुभवजन्य अशाच आहेत. परंतु त्या श्रीसरस्वतीगंगाधरांच्या प्रत्यक्ष अनुभवाच्या आहेत किंवा त्यांची माहिती त्यांना मुखपरंपरेनें मिळाली आहे, किंवा ज्यांच्या कथा लिहिल्या आहेत त्या व्यक्तींनीं त्यांना समक्ष किंवा लेखनद्वारें कळविली आहे हें समजण्यास आज आपल्याजवळ कांहींच साधन नाहीं व त्या ग्रंथांतहि त्यासंबंधाचा कांहीं सुलासा केलेला नाहीं.</p>
<p>
	(२८) श्रीसाईसंच्चरितांत ज्या कथा अगर लीला वर्णिल्या आहेत त्यांपैकीं पुष्कळ श्री. अण्णासाहेबांनीं स्वत: डोळ्यांनीं पाहिल्या आहेत व बाकीच्या ज्या भक्तांस श्रीबाबांचे प्रत्यक्ष व स्वप्नांत अनुभव आले व ज्यांनीं ते अनुभव त्यांच्या समजुतीप्रमाणें जशाच्या असेच अण्णासाहेबांस लिहून कळविले अगर तोंडीं निवेदन केले व त्यांपैकीं बहुतेक अजूनहि हयात आहेत; त्या लीला व अनुभवांवर अण्णासाहेबांनीं फक्त आपल्या प्रासादिक व रसाळ वाणीनें कथास्वरूपाचा पद्यमय, मोहक व सुंदर पेहेराव चढवून त्यांचें ह्रदयंगम वर्णन श्रीसाईसच्चरितांत केलें आहे.</p>
<p>
	(२९) प्रत्येक अध्यायांत प्रथम वेदान्त, नंतर गुरुगौरव, व नंतर कथा याप्रमाणें ५१ अध्यायांची मांडणी केली आहे. ५२ व्या अध्यायांत सिंहावलोकन करून, अवतरणिका देऊन ग्रंथ संपूर्ण करूं असें पहिल्याच एका ओंवींत लिहिलें आहे. परंतु हल्लीं जो ५२ वा अध्याय प्रसिद्ध झाला आहे त्यांत सिंहावलोकनहि दिसत नाहीं व सवतरणिकाहि दिसत नाहीं. त्यांत श्रीसद्‌गुरुमाहात्म्य, श्रीसांईसच्चरित-फलश्रुति, ग्रंथकाराची प्रसादयाचना, व प्रार्थना इतक्याच गोष्टी आहेत. ‘५१ वा अध्याय प्रसिद्ध झला. आतां फक्त ५२ वा अध्याय प्रसिद्ध होणें राहिलेला या अंकीं प्रसिद्धा होऊन श्रीसाईसच्चरित ग्रंथ आतां संपूर्ण झाला आहे.’ असे खुद्द अण्णासाहेबांच्या हातचे शब्द श्रीसांईलीलेच्या ६ व्या वर्षाच्या ३ र्‍या अंकांत ८८० पानावर छापलेले आहेत. यावरून अवतरणिकेच्या व सिंहावलोकनाच्या ओंव्या लिहिलेलीं चिठोरीं कोठेंतरी गहाळ झालीं असावीं असें दिसतें. नेहमींच्या संवयीप्रमाणें अण्णासाहेबांनीं ५२ वा अध्यायहि चिठोर्‍यांवरच लिहिला होता. तीं चिठोरीं मजकडे तपासण्याकरितां आलीं होतीं. त्यांत ओव्यांचे क्रमांक नव्हते, व चिठोर्‍यांचे अंक २० पासून पुढें होते. यावरून सिंहावलोकनाच्या व अवतरणिकेच्या ओंव्या गहाळ झाल्या असाव्यात किंवा विस्मृतीनें तयार करावयाच्या राहिल्या असाव्यात असें वाटतें. हल्लीं अवतरणिकेचा नवा अध्याय तयार करून तो ५३ व अध्याय म्हणून ग्रंथास जोडला आहे. याप्रमाणें एकंदर या सांईसच्चरिताची किंवा गुरुचरित्राची रचना आहे.</p>
<p>
	(३०) श्रीबाबांचें शिरडी क्षेत्रीं प्रथमागमन, तिरोभवन पुनश्च प्रकटीकरण, त्यांच्या अद्‌भुत लीला, अप्रतिम चमत्कार, भक्तानुभव, अनुग्रह, उपदेश-ग्रंथवाचन, ग्रंथलेखन, पादुकापूजन, इष्टदेवतापूजन, ईश्वरभजन, जप, तप, नामस्मरण, आसन, उपासना, धनसुतदारा - दान, संकटनिवारण, व्याधिनाश, योगैश्वर्य, मशीदमाई-वैभव, उदीमाई-प्रभाव; धुनीमाई-प्रताप, घरट्टपेषण-पराक्रम, नित्यक्रम, आहारविहार, शयन, चिलीम, पादत्राण, पेहेराव, संताविष्करण, शंकानिरसन, पंचमहायज्ञ-सामर्थ्य, धर्मशिक्षण, व्यवहारशिक्षण, परमार्थपाठ, सर्वव्यापकत्व, सर्वज्ञता, मनोगतकथन, पूर्वकथन, पूर्वजन्मकथन, भविष्यकथन, हंडी किंवा डेग, चावडी, भिक्षा, भिक्षाधिकार, मंदीर, लेंडीबाग, उत्सव, पंचतत्त्वप्रभुत्व, परस्पर मनोमय चिच्छक्तिसंदेश, औदार्य, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, दया, क्षमा, शांति, निर्याण, वगैरे विषयांच्या सुमारें १०५ ते १७५ पर्य़ंत कथा, उपकथा व आडकथा, त्या श्रीसांईसच्चरितांत वर्णिल्या आहेत.</p>
<p>
	(३१) कित्येक ठिकाणीं एकेक अध्यायांत २, ३, ४, ५, पर्यंतहि कथा आल्या आहेत; तर कित्येक ठिकाणीं २ किंवा ३ अध्याय मिळून एकच कथा वर्णिली आहे.</p>
<p>
	(३२) कविता-ग्रंथ तीन प्रकारचे असतात: नैसर्गिक, प्रासादिक व कृत्रिम, कृत्रिम कविता केवळ विद्वत्तेच्या व बुद्धिमत्तेच्या जोरावर केलेली असते; ती उत्तम ठरेल, परंतु शाश्वत टिकणार नाहीं; व तिच्यांत प्रतिभा, प्रसाद किंवा देणगी हे गुण कधींहि येणार नाहींत. गुरुकृपेवांचून अंगीं कितीहि विद्वत्ता असली तरी हल्लींच्या ग्रंथासारखा ग्रंथ निर्माण होणें कठीण, कोणत्याहि पारमार्थिक ग्रंथांत वरील तीन गुण असल्याखेरीज मुमुक्षु वाचकांवर त्याची छाप पडणार नाहीं व त्यांची त्यावर श्रद्धा व विश्वास बसणार नाहीं. श्रीसाईसच्चरित हा ग्रंथ प्रसादजन्य आहे व त्यामुळेंच तो कोणाहि मुमुक्षु भक्तास आवडणारा असून त्याचें नित्यश: अध्ययन, पठण होऊन त्यांचीं शेंकडों पारायणें व सप्ताह झाल्यावांचून राहणार नाहींत.</p>
<p>
	(३३) अण्णासाहेबांच्या घराण्यांत मूळपासून गुरुभक्ति होती किंवा नव्हती हें समजण्यास हल्लीं मार्ग नाहीं. परंतु अण्णासाहेबांनीं आपल्या स्वत:संबंधानें तिसर्‍या अध्यायांत जी हकीकत लिहिली आहे तीवरून पाहतां अण्णासाहेबांस प्रथमत: गुरुभक्ति किंवा गुरुप्रेम मुळींच नव्हेतें. तसेंच गुरु करणें हें थोतांड आहे असें त्यांस वाटत असून गुरु करण्याची आवश्यकताच नाहीं असें ते प्रतिपादन करीत व स्वकर्तृत्वाचाच अभिमान अधिक बाळगीत असत. परंतु श्रीबाबांची नजरानजर होऊन कांहीं नमोमय साक्षित्व शब्दोच्चर झाल्याबरोबर ते सर्वस्वी अभिमानगलित झाले व सद्रुरूवांचून तरणोपाय नाहीं अशी त्यांना फूर्ण खात्री पटली. नंतर त्यांच्यावर बाबांची कृपाहि झाली. श्रीसांईसच्चरितलेखन हें त्याच कृपेचें फल होय. अण्णासाहेबांनीं विश्ववद्य अशा पुष्कळ साधुसंतांचे जगन्मान्य काव्यग्रंथ वाचले असल्याकारणानें त्यांच्या श्रीसांईसच्चरितावर प्रामुख्येंकरून श्रीसमर्थ सद्रुरु नाथमहाराजांच्या श्रीएकनाथी भागवत भाषाथाटाची छाप पडलेली दिसते.</p>
<p>
	(३४) श्रीसाईसच्चरितलेखनाबद्दल आधुनिक विद्वन्मणि श्री. चिंतामणराव विनायक ऊर्फ नानासाहेब वैद्य यांनीं आपला अनुकूल अभिप्राय प्रकट करून अण्णासाहेबांना ‘महीपति’ ही पदवी देऊन त्यांचा व त्यांच्या ग्रंथाचा गौरव केला आहे. (श्रीसाईलीला वर्ष २, अंक ९, पान १८२) यावरून हे श्रीसांईसच्चरित नुसतें गुरुचरित्र नसून तें एक उत्कृष्ट रसात्मक काव्य आहे.</p>
<p>
	(३५) श्रीसांईसच्चरितांत भगवान्‌ श्रीज्ञानेश्वर महाराज लिहितात त्याप्रमाणें अण्णासाहेबांच्या वाणीचें व लेखनाचें सार्थक झालें आहे.</p>
<p>
	“वाचे बरवें कवित्व । कवित्वीं बरवें रसिकत्व । रसिकत्वी परतत्त्व । - स्पर्शु जैसा” ॥३४७॥</p>
<p>
	(श्रीज्ञानेश्वरी अ. १८ श्लो. १४.) ग्रंथांत द्दष्टान्त, उपमा, अलंकार, रसपरिपोष यांचा भरपूर भरणा आहे.</p>
<p>
	(३६) श्रीसरस्वतीगंगाधरांनीं लिहिलेल्या गुरुचरित्राप्रमाणें याहि श्रीसांसच्चरिताचें नित्य अध्ययन व पठण होऊन त्याचीं शेंकडों पारायणें व सप्ताह व्हावेत अशी ग्रंथकर्त्याची फार फार इच्छा होती. ती इच्छा फलद्रूप झाल्याचा सोहळा पाहण्यास ते जिवंत राहिले नाहींत हा दैवदुर्विपाक आहे.</p>
<p>
	(३७) हा ग्रंथ मुमुक्ष भक्तांस एक प्रकारचा गोड, मधुर, परमार्थ - मेवाच आहे. अण्णासाहेबांच्या सदिच्छेस मान देऊन मुमुक्षु भक्तांनीं स्वत: आपण या मेव्याचें श्रद्धेनें व अंत:करणपूर्वक आकंठ सेवन करून इतर भक्तांसहि करावयास लावल्यास भगवान्‌ श्रीज्ञानेश्वरमहाराज लिहितात त्याप्रमाणें मुमुक्षुभक्तांना ज्ञानयज्ञानें श्रीसांईपरमात्मा संतुष्ट केला असें होऊन ते शरीरनाशानंतर त्याच षडगुणैश्वर्य श्रीसांईपरमात्म्याशीं एकरूप होतील यांत तिलप्राय शंका नाहीं.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पैं माझिया तुझिया मिळणीं । वाढीवली जे हे कहाणी । मोक्षधर्म का जिणी । आलासे जेथें ॥</p>
<p>
	तो हा सकलार्थप्रद । आम्हां दोघांचा संवाद । न करितां पदभेद । पाठेंचि जो पढे ॥</p>
<p>
	तेणें ज्ञानानळीं प्रदीप्तीं । मूळ अविद्येचिया आहुतीं । तोषविला होय सुमति । परमात्मा मी ॥</p>
<p>
	ते हे मंत्ररहस्य गीता ।  मेळवी जो माझिया भक्तां । अनन्यजीवन माता । बाळका जैसी ॥</p>
<p>
	तैसी भक्तां गीतेसी । भेटी करी जो आदरेंसीं । तो देहापाठीं मजसीं । येकचि होय ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	श्रीज्ञानेश्वरी, अ. १८ श्लोक ७० व ६८, ओंव्या १५२४, १५२५, १५२६, १५१२, व १५१३, कै. प्रत पान ५३०-५३१.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शेवटीं कर्तुमकर्तुंमन्यथाकर्तुम्‌, शक्तिमान्‌, सर्वज्ञ, सर्वसाक्षी, श्रीसमर्थसद्नुरुसांईपरमात्म्याचे पुण्यचरणकमलीं अनन्यभावें नम्रतापूर्वक मस्तक ठेवून ही बरीच लांबलेली प्रस्तावना संपवितों.</p>
<p>
	ठाणें</p>
<p>
	ता. २०-११-३०</p>
<p>
	बाबांचें बाळ.</p>
<p>
	(कै० बाळकृष्ण विश्वनाथ देव)</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 19 Jul 2023 12:57:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 19 Jul 2023 12:58:36 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[श्री साईसच्चरित - उपोद्धात]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sri-sai-satcharita-upoddhant-marathi-123071900024_1.html</link>
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      <description><![CDATA[श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीसद्रुरुम्यो नम: ॥
गुरुर्ब्रम्हा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर: । गुरु: साक्षात्‌ परब्रम्हा तस्मै श्रीगुरवे नम: ॥१॥
ब्रम्हानंदं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति । द्वंद्वातीतं गगनसद्दशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्‌ ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sri Sai Satcharita upoddhant marathi" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2023-07/19/full/1689751600-0939.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sri Sai Satcharita upoddhant marathi" width="740" /></p>
	</p>
	श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीसद्रुरुम्यो नम: ॥</p>
<p>
	गुरुर्ब्रम्हा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वर: । गुरु: साक्षात्‌ परब्रम्हा तस्मै श्रीगुरवे नम: ॥१॥</p>
<p>
	ब्रम्हानंदं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति । द्वंद्वातीतं गगनसद्दशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्‌ ॥</p>
<p>
	एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं । भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्नुरुं तं नमामि ॥२॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उपोद्धात</p>
<p>
	 </p>
<p>
	श्रीसाईनाथ महाराज सुमारे पन्नास वर्षांपूर्वीं शिरडीस प्रथम आले. शिर्डी हा गांव अहमदनगर जिल्ह्यांत कोपरगांव तालुक्यांत आहे. महाराज मूळ कोठील रहाणारे व त्यांची मातापितरे कोण, याविषयीं खात्रीलापयक माहिती मिळत नाही. एवढें मात्र खचित दिसतें कीं, महाराजांचा मोंगलाईशीं संबंध बराच असावा. महाराजांचे बोलण्यांत शेलू, जालना, माणवद, पाथरी, परभणी, नौरंगाबाद (म्ह० औरंगाबाद), बीड, बेदर या मोंगलाईच्या गांवांचा वारंवार उल्लेख येत असे. एकदां एक पाथरीचा गृहस्थ महाराजांचे दर्शनास आला होता. त्याला महाराजांनीं पाथरीची हकीकत विचारून तेथील बहुतेक ठळक ठळक गृहस्थांचीं नांवें घेऊन त्यांचेविषयीं चौकशी केली. यावरून महाराजांना पाथरीची विशेष माहिती होती असें मानतां येईल; पण त्यांचा जन्म तेथलाच असावा असें खात्रीलायक म्हणतां येत नाहीं.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	तसेंच, महाराज मूळचे ब्राम्हाण होते, कीं ते जन्मत:च मुसलमान होते हें निश्वयात्मक सांगती येत नाहीं. किंबहुना त्यांच्या कित्येक भक्तांच्या मानण्याप्रमाणें ते ‘अयोनिज’ होते कीं काय हेंहि सांगतां येत नाहीं. महाराजांना अयोनिज मानणें हें भक्तेतरांच्या  द्दष्टीला अशक्य वाटेल, पण तसें प्रस्तुत लेखकाला वाटत नाहीं. या लेखकाजवळ महाराजांनीं स्वत: एकदां असें उद्नार काढले होते कीं, ‘आतां आपण जाऊं ते आठ वर्षांचे होऊन येऊं.’ श्रीकृश्णमूर्ति देवकीमातेजवळ प्रकटली तेव्हां आठ वर्षांचीच होती असें पुराणांतरीं वर्णन आहे. ‘आठा वर्षांची मूर्ती । असंभाव्य पडिली दीप्ति । तेजें दशदिशा उजळती । तेथें लपती शशिसूर्य ॥’ (हरिविजय अ. ३, ओ. १२६). महाराजांचे पुष्कळ भक्त, त्यांना हे साधकाचे सिद्ध झालेले मानीत नसून प्रत्यक्ष अवतार मानतात, व महाराजांच्या लीला व त्यांची अद्भुत शक्ति पाहून त्यांना श्रीकृष्णाचा अवतार मानणारे पुष्कळ आहेत. महाराज मात्र स्वत: आपल्याकडे तो अधिकार घेत नसत. ते बोलतांना आपल्याला परमेश्वराचा सेवक ‘बंदा’ म्हणून घेत. आपल्या गुरूचा आशीर्वाद आपल्याला पूर्ण आहे व त्यांचेच कृपेनें भक्तांचीं संकटें दूर होऊन त्यांचें कल्याण होतें, असें ते म्हणत. भक्तांना आशीर्वाद देतांना प्राय: ‘अल्ला भला करेगा’ हेच शब्द असत. स्वत:कडे कधींहि मोठेपणा घेत नसत. ते कधींहि ‘अनल हक्क’ म्हणजे ‘मीच परमीश्वर’ सें म्हणत नसत. पण त्यांचा उच्चार वारंवार ‘यादे हक्क’ म्हणजे ‘मी परमेश्वराची याद म्हणजे स्मरण करतों’ हा असे.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	महाराज शिर्डीस आले ते एका मुसलमान गृहस्थाकडील वरीतीबरोबर आले. त्याचें नांव चांदभाई, तो धूपखेडें नांवाच्या गांवचा पाटील होता. एक दिवस त्याचा घोडा चुकला म्हणून त्याला शोधावयाला तो रानांत चालल होता. तों तेथें एका झाडाखालीं त्याला महाराज बसलेले दिसले. महाराजांना त्यानें पूर्वीं कधीं पाहिलें नव्हतें. महाराजानीं त्याला हांक मारली व चिलीम पिऊन जा असें म्हटलें. तो म्हणाला. माझा घोडा चुकला आहे व मी त्याच्या शोधासाठीं निघालों आहें. महाराज म्हणाले, ‘त्यासाठीं लांब कशाला जावयाला पाहिजे ? तो पलीकडच्या कुंपणाच्या आड आहे.’ त्याबरोबर चांदभाई, महाराजांनीं सांगितलेल्या कुंपणाकडे गेला. तों तेथें घोडा खरोखरच चरत होता. चांदभाईनें घोड घेतला व तो महाराजांकडे आला. महाराजांनीं त्याला चिलीम पाजल्यावर तो महाराजांना आपल्या घरीं येण्याबद्दल आग्रह करूं लागला. महाराज म्हणाले, ‘मी उद्यां येईन.’ त्याप्रमाणें महाराज दुसरे दिवशीं त्याचे घरीं गेले. चांदभाईला चिलीम पाजली तेथें रानांत विस्तव नव्हता. महाराजांनीं आपल्या हातांत असलेला चिमटा जमिनीवर आपटून विस्तव उत्पन्न केला व आपलें काम करून घेतलें.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	महाराज चांदभाईचे घरीं कांहीं दिवस राहिले. नंतर चांदभाईचे बायकोच्या भाच्याची सोयरीक शिर्डीच्या एका मुलीशी झाली व त्या लग्नाचे वरातीबरोबर महाराज शिर्डीस आले. वरात गांवाबाहेर खंडोबाचे देवाजवळ एका मळ्यांत उतरली होती. महाराज खंडोबाचे देवळांत गेले तों तेथें त्यांना म्हाळसापती या नांवाचे गृहस्थ भेटले. हे म्हाळसापती शिर्डीचे राहणारे असून जातीनें दैवज्ञ होते. हे खंडोबाचे भक्त असून खंडेरायाची वारी त्यांच्याकडे कित्येक पिढयांपासून असे. महाराज खंडोबाचे देवळांत गेले तेव्हां कफनी, टोपी व अंगावर धोतर असा पोषाख होता. त्यांना पाहिल्याबरोबर म्हाळसापतींनीं ‘आवो सांईबाबा’ या शब्दांनीं त्यांचें स्वागत केलें, व तेंच नांव म्हणजे ‘सांईबाबा’ महाराजांनी’ अखेरपर्यंत धारण केलें. महाराजांची बहुतेक भक्तमंडळी त्यांना साईबाबा किंवा बाबा असें म्हणत. महाराजांची एकदां एका कामांत कमिशनवर साक्ष झाली. तेव्हां महाराजांना नांव विचारलें असतां ‘मला सांईबाबा म्हणतात’ असें उत्तर दिलें. म्हाळसापती महाराजांना गांवांत घेऊन आले व तेथें त्यांनीं महाराजांची व आपले सोबती काशीराम शिंपी व आप्पा जागले यांची गांठ घालून दिली. हे तिघेहि गांवांत येणार्‍या साधुसंतांची, गोसावी-बैराग्यांची, फकीर-फुकर्‍यांची आपल्या शक्तीप्रमाणें सेवा करीत, व त्यांचा परामर्ष घेत. शिर्डी गांव फार रहदारीचा असल्यामुळें येथें वारंवार अशी मंडळी येत व त्यांची थोडीबहुत संभावना, वर लिहिलेल्या तिघांकडून होत असे. हे तिघेहि (काशीराम, आप्पा व म्हाळसापती) महाराजांचे पूर्ण भक्त बनले. यांपैकीं काशीराम व आप्पा हे पुढें कांहीं वर्षांनी वारले. काशीरामांनीं आधीं देह ठेवला व त्यानंतर कांहीं वर्षांनीं आप्पांनीं देह ठेवला. पण दोघांनाहि मरणसमयीं एकादशी लाभली. हरिभक्तांचें मरण हरिदिनींच होणें योग्य व त्याप्रमाणेंच या दोघांचेंहि झालें. काशीरामांनीं महाराजांची सेवा अति उत्तम तर्‍हेनें म्हणजे खरोखरच तनमनधनानें केली. महाराजांची कफनी पूर्वीं भगवी किंवा पांढरी असे. काशीरामानें हिरवी कफनी व हिरवी टोपी महाराजांना शिवून दिली; पण प्राय; महाराज पांढरीच कफनी घालीत व डोक्यास धोतर बांधीत. तसेंच महाराजांना चिलीम तंबाकू पुरवून त्यांच्या धुनीला सर्पणहि पुरवावयाचें व जरूर पडल्यास पैसेहि द्यावयाचे, हें ब्रत काशीरामांनीं चालविलें. पुढें पुढें तर आपली पैशांची थैलीच महाराजांपुढें ठेवावयाची व महाराजांनीं इच्छेस येईल तितके पैसे घ्यावे अशी विनंती करावयाची. महाराज त्या वेळेस दक्षिणा घेत नंसत, तरी पण काशीरामाकडून पैसा दोन पैसे नेहमीं घेत. महाराजांनीं आपल्याकडून वाईट वाटून डोळ्यांतून अश्रूहि यावयाचे. अशा प्रकारें वाईट सुद्धां परमार्थाला विघातक आहे. कारण त्यांत माझी देण्याची शक्ति आहे अशा तर्‍हेचा अभिमान शिरतो. अर्थांत्‌ भक्तांच्या परमार्थाला विघातक गोष्टी असतील त्या काढून टाकण्याचा देवाचा नित्ससंकल्प असतो. त्याप्रमाणें काशीरामासही झालें. कांहीं दिवसांनीं त्याची पैशांसंबंधानें ओढाताण होऊं लागली, आणि महाराजांनीं त्याच्याजवळ दक्षिणा मागण्याचा सपाटा चालविला. पैसे संपले असें त्याला मोठया कष्टानें म्हणावें लागलें. मग ‘वाण्याजवळ मागून मला आणून दे’ असें महाराजांनीं म्हटलें. त्याप्रमाणें कांहीं दिवस वाण्याकडून मागून आपण्याचा क्रम चालू ठेवला. पुढें वाणीहि पैसे देईनासा झाला. अर्थात्‌ सगळी लीला काशीरामाचा अभिमान दूर करण्यासाठींच होती. त्याची अशी खात्री झाली कीं, आपली देण्याची शक्ति नाहीं, व हें त्याला पटल्याबरोबर त्याची सांपत्तिक स्थिति सुधारत चालली आणि तो पूर्वीप्रमाणें सुखवस्तु झाला. महाराजांनीं आपल्याकडून दक्षिणा नित्य घ्यावी ही तळमळ पार नाहींशी झाली.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	काशीराम कापड विकण्याचा धंदा करीत असे व निरनिराळ्या गांवीं बाजारचे दिवशीं दुकान घाली. एकदां नाऊरच्या बाजाराहून परत येतांना कांहीं लुटारू भिल्लांशीं त्याची गांठ पडली. काशीराम घोडयावर होता. तिकडे लुटारू प्रथम गेले नाहींत पण त्याच्या बरोबरच्या गाडया रस्त्यानें चालल्या होत्या त्या त्यांनीं अडविल्या. नंतर काशीरामाकडे त्यांचें लक्ष गेल्याबरोबर ते तिकडे धांवून गेले. चोरांनीं काशीरामाला लुटण्याची तयारी केली व त्याप्रमाणें कांहीं सामान घेतलेंहि. त्याला काशीरामानें हरकत केली नाहीं. पुढें त्या चोरांनीं त्याचेजवळ एक लहानशी गांठोडी होती तिला हात घातला. चोरांना वाटलें. त्यांतच कांहीं डबोलें आहे. खरोखरच त्यांत नुसती पिठीसाखर होती. काशीरामाला जानकीदासबाबा या नांवाच्या सत्पुरुषानें मुंग्यांना साखर घालीत जावी असा उपदेश केल्यापासून काशीराम नेहमीं साखर जवळ बाळगीत असे; अर्थात्‌ ती गठडी त्याला अत्यंत प्रिय होती, व काय वाटेल तें होवो पण ती गठडी जाऊं द्यावयाची नाहीं, असा त्यानें निश्चय केला. तितक्यांत त्या चोरांपैकीं एकाची तरवार पडली होती तिकडे काशीरामाचें लक्ष जाऊन त्यानें ती उचलली व त्या चोरांपैकीं दोघांना त्यानें ठार केलें. इतक्यां तिसर्‍या चोरानें मागाहून येऊन कुर्‍हाडीचा घाव त्याचे डोक्यावर घातला. त्याबरोबर काशीराम बेशुद्ध होऊन प्रेतवत्‌ पडला. राहिलेल्या चोरांना काशीरामाचा प्राणान्त झाला असें वाटून ते त्याला तेथेंच टाकून चालते झाले. पण वस्तुत: त्याचा प्राणान्त झाला नव्हता. पुढें कांहीं वेळानें तो शुद्धीवर आला व कांहीं दिवसांनीं बरा झाला. त्याची महाराजावर पूर्ण श्रद्धा असल्यामुळें त्यानें इस्पितळांत जाण्याचें नाकारलें व मला शिर्डीस घेऊन चला असा आग्रह धरला. त्य्राप्रमाणें त्याला तेथें आणलें आणि महाराजांच्या सांगण्यावरून तेथेंच माधवराव देशापांडयांकडून औषधोपचार करविला. अर्थात्‌ महाराजांच्या कृपेनें काशीरामाची प्रकृति चांगली झाली.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	या शूर कृत्याबद्दल मुंबई सरकारकडून काशीरामास एक तलवार बक्षीस मिळाली. काशीरामाची चोरांशीं झटापट चालली असतांना इकडे शिरडीस महाराजांनीं आकान्त करून सोडला. एकसारख्या शिव्या, बोंबा मारणें व इतर क्षोभाचे प्रकार चालले. जवळ असलेल्या मंडळींनीं ताबडतोब ओळखिलें कीं कोणत्या तरी प्रिय भक्तावर अति महत्संकट आलें आहे; व हा सगळा आकान्त त्या संकटांतून भक्ताला रक्षण करण्यासाठींच आहे आणि तसाच प्रकार झाला. चोर पुष्कळ असून हत्यारबंद होते. त्यांचे तडाक्यांतून काशीरामानें जिवंत सुटणें कोणालाहि शक्य वाटलें नसतें; पण तारणार्‍याचें काय चालतें ? असो. काशीराम यानंतर कांहीं वर्षें वांचला व शके  १८३० च्या चैत्र शुद्ध ११ ला वारला.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वर लिहिलेल्या तिघांपैकीं म्हाळसापती बरचे दिवस हयात होते, आणि ते भाद्रपद शेक १८४४ त वारले. त्यांचा व महाराजांचा अति निकट संबंध होता. महाराजांचें बसणें मशिदींत असे व निजणें एक रात्र मशिदींत व एक रात्र चावडींत असे. महाराज मशिदींत निजत त्या रात्री म्हाळसापति उजाडेपर्यंत महारांजवळ बसूना असत, व मधूनमधून दोघांच्या अति प्रेमाच्या गोष्टी चालत. म्हाळसापतींचें देहावसान होईपर्यंत त्यांचा एक दिव्स आड मशिदींत रात्रभर बसण्याचा क्रम चालू असे. हे चांगले अधिकारी असून पूर्ण निरपेक्ष असत व यांचेपासून महाराजांचे भक्तांना बोध व आनंद नित्य मिळत असे; किंबहुना महाराजांच्या पश्चात्‌ त्यांच्या भक्तांना हें एक विश्रांतिस्थानच होतें.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	महाराज येथें आल्यापासून प्राय: येथील मशिदींत वास करूं लागले. ती मशीद त्या वेळेला अगदीं पडक्या स्थितींत असे. महाराज दिवसा इकडे तिकडे जात, पण रात्रीं मशिदींतच राहात. कोणीं जेवावयास नेलें तर जात; लोकांस औषधपाणी सांगत व देत. त्यासाठीं कधींहि पैसा घेत नसत. इतकेंच नव्हे, पण रोग्यांची शुश्रूषा योग्य होत नसली तर स्वत: आपण जाऊन करीत व अशा तर्‍हेनें  महाराजांनीं ज्यांना औषधोपचार केला व ज्यांची शुश्रूषा केली अशी पुष्कळ मंडळी अजून येथें आहेत. पुढें औषधपाणी देण्याचें महाराजांनीं बंद केलें व नुसती उदी म्हणजे अंगारा देऊं लागले. पूर्वीहि अंगारा देत असत व त्यापासून लोकांना गुण येई.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आपण पूर्वी लोकांना औषधपाणी करीत होतों, अशाविषयीं उल्लेख महाराजांनीं एकदां प्रस्तुत लेखकाजवळ केला होता. ते म्हणाले. “ काका, (प्रस्तुत लेखकाला ते काका म्हणून हांक मारीत.) मी पूर्वीं लोकांना औषधदेत असें. पुढें औषध देणें सोडलें आणि ‘हरि हरि’ करूं लागलों आणि हरि हरि करतां करतां हरि भेटला.”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	महाराज येथें प्रथम आले तेव्हां येथें एक देवीदास नांवाचे साधु असत व त्यांचेकडे निरनिराळे साधु निरनिराळे वेळीं येत. तसेंच रामेश्वर, पंढरपूर व इतर दक्षिणेकडील क्षेत्रांना पायवाटेनें जाणार्‍या यात्रेकरूंचा हा रस्ताच असल्यामुळें पुष्कळ सत्पुरुषांचे पाय येथें वेळोवेळीं लागत. त्यांपैकीं एक जानकीदास नांवाचे साधु येथें बरेच दिवस होते. ते उत्तम अधिकारी होते असें सांगतात. त्यांची व महाराजांची फार बैठक असे. तसेंच सुप्रसिद्ध गंगागीरबाबाहि येथें येत असत. महाराज येथें आल्यानंतर जेव्हां गंगागीर येथें प्रथम आले, तेव्हां महाराज दोन हातांत दोन मातीच्या घागरी विहिरीवरून भरून नेत होते. त्यांना पाहिल्याबरोबर गंगागीरबाबा जवळ असलेल्या गांवकरी मंडळींना म्हणाले, ‘ही मूर्ति येथें कधीं आली ? हें केवळ रत्न आहे. यांची योग्यता फारच मोठी आहे. गांवचें फार मोठें भाग्य कीं, हें रत्न तुम्हांला लाभलें.’ नंतर गंगागरिबाबा महाराजांचे दर्शनास गेले व दोघांच्या मोठया प्रेमाच्या गोष्टी झाल्या. असेच उद्नार महाराजांसंबंधानें अक्कलकोटच्या आनंदनाथमहाराजांनीं काढले होते. हे आनंदनाथमहाराज अक्कलकोटच्या सुप्रसिद्ध स्वामींचे शिष्य होते. ते येवल्याजवळ सावरगांव येथें एकदां गेले असतां शिर्डीचे माधवराव बळवंत देशपांडे, दगडू भाऊ गायके, नंदराम शिवराम मारवाडी व भागचंद मारवाडी, त्यांचे दर्शनास गेले होते. दर्शन झाल्यावर ही मंडळी शिर्डीस यावयाला निघाली, तों आनंदनाथमहाराज एकाएकीं धांवत येउण त्यांचे गाडींत बसले व म्हणाले, मी तुमच्याबरोबर येतों. नेवरगांवाच्या व येवल्याच्या मंडळींनीं य अमहाराजंना अडविण्याचा प्रयत्न केला पण तो व्यर्थ गेला. आनंदनाथमहाराज तेथें आले तेव्हां त्यांनीं महाराजांसंबंधानें शब्द काढले ते असे, “हा हिरा आहे. याची खरी किंमत तुम्हांला नाहीं. हा जरी उकिरडयावर असला तरी प्रत्यक्ष हिरा आहे, हें घ्यानांत ठेवा.” या वेळीं महाराज प्रसिद्धीस आले नव्हते व गांवांतले लोक त्यांना एक साधारण किंबहुना वेडा फकीर मानीत.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	महाराजांची स्थिति या वेळेला “फाटकें तुटकें नेसतो रे । मन मानेल तेथें बसतो रे । वेडया वेडयापरि दिसतो रे । परी ब्रम्हांड गिळुनी असतो रे ॥” अशी होती. महाराज कधीं ओढयावर जाऊन बसत; कधीं गांवकुसाजवळ असलेल्या एका लिंबाखालीं बसत, कधीं कोणाच्या मळ्यांत जाऊन बसत; अंगावरील कपडे फाटके असत, कधीं कधीं उग्ररूप धारण करीत. या व अशाच वर्तनामुळें साधारण जनसमाजाला ते वेडेच वाटत. पण लौकरच लोकंचा भ्रम दूर झाला व महाराजांची योग्यता शिर्डीच्या लोकांना कळून आली. तो प्रकार असा घडून आला :---</p>
<p>
	 </p>
<p>
	महाराजांना मशिदींत व देवळांतूनहि पुष्कळ दिवे लावण्याची हौस असे. अर्थात्‌ ‘हौस असे’ हें व्यावहारिक द्दष्टीचें बोलणें आहे. खरोभर पाहिलें तर त्यांचें करणें कोणतीच हौस पुरविण्याकरितां नसे. (कारण त्यांना हौस अशी उरलीच नव्हती.) तर त्यांत कांहीं तरी अन्य हेतु म्हणजे लोकांचे हित करण्याचाच असावयाचा. असो. या दिव्यांसाठीं महाराज तेली व वाणी यांचे घरोघर जाऊन तेल मागून आणीत. कांहीं दिवस त्यांनीं महाराजांना तेल दिलें. अर्थात्‌ तीं व्यावहारिक माणसें किती दिवस तेल देणार ? त्यांनीं एक दिवस महाराजांना तेल नाहीं म्हणून सांगितलें. त्यामुळें महाराजांच्या नित्यक्रमांत थोडाच फरक पडणार होता ! महाराजांनीं पणत्यांमध्यें तेलाऐवजीं पाणी घातलें आणि नेहमींप्रमाणें काकडे घालून काडी ओढून ते पेटविले. महाराज ही तयारी करीत असतांना लोकांना त्यांच्या वेडेपणाविषयीं खात्री वाटूं लागली; पण जेव्हां काडी ओढून काकडयांस लावल्याबरोबर ते पेटले व रात्रभर जळत राहिले, तेव्हां अर्थातच लोक थक्क झाले. ते महाराजांना शरण गेले व महाराजांची अवहेलना केल्याबद्दल क्षमा मागूं लागले. कित्येकांनीं तर महाराजांना निरनिराळ्या तर्‍हेनें थोडें थोडें छळलें होतें. ते तर फारच घाबरले. पण महाराज पूर्ण दयाळू, अपकार करणार्‍यांची सुद्धां उपेक्षा करावयाची नाहीं तर त्यांच्यावरहि उपकारच करावयाचा हें महाराजांचें ब्रीद ! तेव्हां अर्थातच कोणालाहि  भिण्याचें कारण नव्हतें. सर्व लोकांवर महाराजांचें प्रेम असून त्यांचें पुत्रवत्‌ प्रतिपालन महाराज करीत. गांवावर कोणतेंहि संकट यावयाचें असलें कीं महाराजांनीं त्याची आगाऊ सूचना द्यावयाची व महारजांचे सांगण्याप्रमाणें जे वागत ते निर्भय होत.</p>
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	 </p>
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	सगळ्या गांवची जरी महारजांवर श्रद्धा बसली, तरी महाराजांशीं निकट संबंध फारच थोडया लोकांचा असे. महाराजांच्या प्रखर वृत्तीमुळें त्यांच्याशीं फाजील सलगी करण्याची कोणाची हिंमत होत नसे; आणि मशिर्दीत लोकांचें जाणें-येणें फार कमी असे. या वेळेला येथील देशापांडे घराण्यापैकीं माधवराव बळवंत यांचे जाणें-येणें विशेष होऊं लागलें. मशिदीच्या आवाराला लागूनच एक लहानसें घर होतें, तेथें त्या वेळीं मराठी शाळा असे. त्या शाळेंत माधवराव हे मास्तर होते व त्यानीं वेळोवेळी शाळेंतून मशिदींत जाण्याचा पाठ पाडला. तेथें गेले म्हणजे चिलीम भरून आपण ओढावयाची आणि महाराजांना ओढावयाला द्यावयाची. कोणत्या कारणानें कां होईना, माधवरावांची महाराजांशीं सलगी होऊं छागली आणि माधवरावांचें मन महाराज आकर्षण करूं लागले. कांहीं वर्षांनीं मधवरावांनीं सर्व धंदे सोडून केवळ महाराजांची व त्यांचे दर्शनास येणार्‍या मंडळीची सेवा हाच एक धंदा पत्करला. या सेवेबद्दल मोबदला म्हणून माधवरावांनीं कधींहि मागितला नाहीं. अजूनहि यांचा आणि महाराजांच्या भक्तांचा निकट संबंध आहे आणि त्यांचा पुष्कळ मंडळींना आधार वाटतो; व कित्येक भक्त तर अधिक उणें कांहीं निघाल्यास माधवरावांचे सल्लयाशिवाय पुढें पाऊल टाकीत नाहींत.</p>
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	 </p>
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	महाराज शिर्डी सोडून बहुतकरून कोठें जात नसत. मात्र कधीं कधीं निमगांवास बाबासाहेब डेंगळे या नांवाचे महाराजांचे भक्त असत तिकडे जात व कधीं राहत्यास चंद्रभानशेट मारवाडी यांचेकडे जात. चंद्रभानशेट वारल्यावर त्यांचे दुकानाचा कारभार खुशालचंदशेट पाहात असत. या खुशालचंदजींना महाराज वारंवार बोलावणें धाडीत व कोणी राहात्याचा माणूस आला कीं त्याला खुशालचंद्र भेटला होता का, म्हणून विचारीत. असो.</p>
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	बाबासाहेब डेंगळे यांचे बंधु नानासाहेब डेंगळे जाळी-निमगांव येथें राहात असत. त्यांना मुलगा नव्हता. प्रथम कुटुंबास मुलगा होईना म्हणून दुसरें लग्न केलें; तरीसुद्धां कांहीं उपयोग झाला नाहीं. मग बाबासाहेबांनीं त्यांना महाराजांचे दर्शनास पाठविलें. महाराजांचे दर्शनास नानासाहेब डेंगळे आले तेव्हां महाराजांनीं मुलगा होईल असा आशीर्वाद दिला व योग्य वेळीं तो आशीर्वाद फलद्रूप होऊन त्यांना मुलगा झाला. अर्थातच त्यामुळें नानसाहेबांची श्रद्धा महाराजांवर बसली व ते महाराजांकडे वारंवार येऊं लागले. त्याचें सरकारी कामगारांशीं बरेंच दळणवळण असल्यामुळें त्यांनीं साहजिकच महाराजांचे गुण कामगार मंडळी जवळ गाइले आणि त्यामुळें लवकरच कलेक्टराचे चिटणीस रा. चिदंबर केशव ऊर्फ अण्णासाहेब गाडगीळ कांहीं मडळींना घेऊन महाराजांचे दर्शनास आले. अण्णासाहेब गाडगिळांची महाराजांवरील श्रद्धा उत्तरोत्तर वाढत जाऊन ते महाराजांचे पूर्ण भक्त बनले.</p>
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	महाराज ज्या मशिदींत बसत व निजत, ती पूर्ण मोडकळीस आलेली असून खालीं धुरळा अतिशय, व वरूनहि माती पडावयाची अशी स्थिति असल्यामुळें नानसाहेब डेंगळ्यांनीं महाराजांना एक जाड फळी निजण्यासाठीं म्हणून आणून दिली. त्यांचा हेतु हा कीं, महाराजांनीं नुसत्या जमिनीवर न निजतां ती फळी खालीं टाकून तिच्यावर निजावें. महाराजांनीं त्य फळीचा उपयोग निजण्यासाठीं केला, पण प्रकार निराळा केला. ती फळी जमिनीवर न टांकतां ती मशिदीच्या आढयाला जुन्या चिंध्या बांधून टांगली व तिच्यावर निजूं लागले. त्या चिंध्यांकडे पाहिलें तर फळीचें सुद्धां ओझें सहन करण्यासारख्या त्या नव्हात्या. पण महाराजांच्या प्रभावामुळें त्या फळीचेंच काय, पण महाराजांच्या शरीराचेंहि ओझें त्या सहन करूं लागल्या. निजतांना चार बाजूंना चार जळत्या पणत्या महाराज ठेवीत. त्या फळीवर महाजांना पांहाण्याचें ज्याला त्याला मोठें कौतुक वाटे व पुष्कळ मंडळी लाब उभे राहून तें कौतुक पाहात; मात्र महाराजांना फळीवर चढतांना किंवा उतरतांना कोणीं पाहिलें नाहीं. पुष्कळदां मंडळींनीं पाळती ठेविल्या पण महाराजांचें चढणें-उतरणें कोणालाहि दिसलें नाहीं. वरील कौतुक पाहाण्यासाठीं मंडळी फर जमूं लागली, तेव्हां ही उपाधी दूर होण्यासाठीं महाराजांनीं ती फळी एके दिवशीं तोडून टाकली.</p>
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	नानासाहेब डेंगळे ज्या कारणासाठीं महाराजांचे दर्शनास प्रथम आले, त्याच कारणासाठीं कोपरगांवचे मुलकी सर्कल इन्स्पेक्टर गोपाळराव गुंड हेहि दर्शनास आले. यांना तीन कुटुंबें असून मुलगा नव्हता. यांनाहि महाराजांचे आशीर्वादानें मुलगा झाला. हेहि महाराजांचे पूर्ण भक्त बनले. त्यांच्या मनांत एकादां असें आलें कीं, मधीद मोडकळीस आली आहे. ती आपण फिरून बांधवावी; व त्यासाठी त्यांनीं बरेचसे दगड गोळ केले. पण महाराजांनीं.त्यांना मशीद बांधण्याची परवानगी दिली नाहीं. तें काम दुसर्‍या एका भक्ताकडून करवून घ्यावयाचें होतें. ती हकीकत पुढें दिली आहे. गोपाळरावांनीं जमविलेल्या दगडांचा विनियोग महाराजांच्याच आज्ञेनें तेथील शनीचें देऊळ बांधण्यांत व गांवांतील दुसर्‍या देवळांचा जीर्णीद्धार  करण्यांत झाला. महाराजांचें सर्व देवळांकडे लक्ष असे. येथील मारुतीच्या देवळाचाहि महारांनींच जीर्णोद्धार करविला व तें देऊळ मोठेंहि करविलें. जसें गांवांतील देवळांकडे महाराजांचें लक्ष असे. तसेंच येथील तुरबतीकडे सुद्धां महाराजांचें लक्ष असे. गांवकुसाजवळील निंबाच्या झाडाखालीं महाराज कधीं कधीं बसत म्हणून वर सांगितलें आहे. तेथेंच एक पीराची तुरबत आहे असें महाराजांनीं एकदां म्हटलें व तेथें खणून पाहिलें तों तेथें खरोखरच तुरबत निघाली. मग त्या दिवशीं मंडळळींनीं महाराजांची वाजत गाजत मिरवणूक काढली. या तुरबतीबद्दलचा उल्लेख महाराजांनीं प्रस्तुत लेखकाजवळहि केला होता. महाराज म्हणाले, ही आपल्या वडिलांची जागा आहे. येथें दर गुरूवारीं व शुक्रवारीं ऊद जाळीत जावा म्हणजे त्यांत आपलेंच कल्याण आहे. एकदां गोपाळराव गुंडांच्या मनांत असें आलें कीं, येथें महाराजांप्रीत्यर्थ वार्षिक जत्रा ऊर्फ उरूस भरवावा. तो विचार त्यानें गांवांतील तात्या पाटील, दादा कोते पाटील, माधवराव देशपांडे वगैरे वगैरे मंडळींपुढें ठेवला व त्यांना तो रुचून त्यांनीं त्यासाठीं जमवाजमव करण्याचें मनावर घेतलें. पण तेथें तेव्हां असलेल्या कुळ्कर्ण्याकडून आडकाठी झाली व तिचा परिणाम हा झाला कीं, कलेक्टरानें जत्रा भरवूं नये म्हणून हुकूम दिला. पण जत्रा भरविण्यासंबंधानें महाराजांचा आशीर्वाद पूर्ण होता. म्हणून वरील मंडळींनीं फिरून कलेक्टराकडे अर्ज करून, पहिला हुकूम रद्द ‘करवून जत्रा भरविण्याचा हुकूम आणला. ती जत्रा महाराजांच्या आज्ञेनें रामनवमीला भरवावयाचें ठरलें, व तेव्हांपासून ती सूरू झाली ती अजूनहि दर रामनवमीला भरत असते.</p>
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	 </p>
<p>
	या जत्रेची व्यवस्था पहिल्यापासून शिर्डी येथील तात्या गणपती पाटील कोते हे पाहात असतात. त्यांच्यावर महाराजांचें अत्यंत प्रेम असे. हे महाराजांना ‘मामा’ म्हणत. यांची आई सौ. बायजाबाई यांनीं महाराजांची फार सेवा केली आणि ती अशा वेळेला कीं, जेव्हां गांवांतील बहुजनसमाज महाराजांना वेडयांत काढी. महाराज पूर्वी दिवसांतून चारपांच वेळां गांवांत भिक्षेल जात. पण सौ. बायजाबाईंनीं त्यांना कधींहि विन्मुख लाविलें नाहीं. अर्थात्‌ या सेवेचें फळ बाईंना तर मिळालेंच, पण त्यांच्या सर्व कुटुंबाला व विशेषत: तात्यांना मिळालें. तात्यांना महाराज पैसे देत इतकेंच नव्हे, तर त्यांचे सर्व तर्‍हेनें लाड करीत. संध्याकाळीं रोज तात्या हे महाराजांकडे जात त्या वेळचा मामा-भाच्यांचा प्रेमाचा सोहळा पाहाण्यासारखा व प्रेमाचीं भाषणें ऐकण्यासारखीं असत. तसेंच मशिदींतील व चावडींतील सर्व व्यवस्था तात्यांकडेच असे. तात्यांनीं येऊन उठविल्याशिवाय महाराज उठत नसत; व तात्यांनीं महाराजांना हातीं धरून नेऊन तेथें महाराजांसाठीं आसन घालावयाचें व त्यावर महाराजांनीं बसावयाचें असा क्रम असे. चिलीमहि तात्यांनींच भरून द्यावयाची.</p>
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	 </p>
<p>
	रामनवमीच्या जत्रेच्या वेळीं म्हणजे खुद्द रामनवमीचेच दिवशीं दोन मोठया निशाणांची थाटाची मिरवणूक निघून मशिदींत जात असे; व तेथें तीं दोन निशाणें दोन टोंकांना बांधलीं जात. त्यांपैकीं एक निशाण रा. शंकरराव रघुनाथ देशापांडे ऊर्फ नानासाहेब निमोणकर यांजकडून येत असे, व दुसरें नगरचे दामूशेट कासार यांचेकडून येत असे. नानासाहेब निमोणकर हे निमोणचे देशपांडे होते. निमोण गांव संगमनेर तालुक्यांत आहे. नानसाहेब तालुक्यांत पुढारी गृहस्थांमध्यें मोडत असून सरकारनें त्यांना ऑनररी मँजिस्ट्रेट नेमिलें होतें व तें काम त्यांनीं पुष्कळ वर्षें केलें. शेवटीं वृद्धापकाळ झाला म्हणून तें स्यांनीं सोडलें. त्यांचे चुलते येथें राहात असत व ते कधीं कधीं येथें येत. येथें आले म्हणजे चुलत्याचे सांगण्यावरून महाराजांचे दर्शनास जात. हळू हळू महाराजांवर त्यांची श्रद्धा वाढत चालली आणि शेवटलीं तीन वर्षें तर त्यांनीं महाराजांच्या अखंड सेवेंतच घातलीं. फक्त स्नानसंध्यादि नित्य कर्म उरकण्यापुरते घरीं जात. बाकी सारा वेळ महाराजांचे सेवेंत तत्पर असत. साठी उलटून गेली होती, तरी महाराजांची सेवा करतांना आळस किंबा विश्रांतीची इच्छाहि कधीं त्यांना शिवली नाहीं. महाराज त्यांना ‘काका’ म्हणून हांक मारीत. महाराजांच्या पश्चात्‌ हे फार दिवस राहिले नाहींत. लौकरच त्यांना महाराजांनीं आपल्या पायापाशीं नेलें. महाराजांचे कृपेनें त्यांचा अंत उत्तम झाला. शेवटचे तीन दिवस त्यांना जिकडे तिकडे महाराज दिसत, व जो जवळ येई त्याला सांईबाबा (महाराजांना ‘बाबा’ म्हणत तें वर सांगितलेंच आहे) म्हणत. स्वत:च्या कुटुंबालाहि “या सांईबाबा” असें म्हणत. कुटुंबाला वाटलें. त्यांना कांहीं भ्रम झाला असेल आणि म्हणून कुटुंबानें म्हटलें, “मी बाबा नव्हे, मी आपली पत्नी आहें.” त्यावर ते म्हणाले, “तुझ्यांत कोण, बाबाच आहेत. तूं बाबाच आहेस.” अशा तर्‍हेनें महाराजांचे अखंड स्मरणांत त्यांचा अंत झाला.</p>
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	 </p>
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	रामनवमीचे वेळीं दुसरें निशाण येतें तें दामोदर सावळाराम ऊर्फ दामूशेट कासाराचें हे वर सांगितलेंच आहे. यांना दोन कुटुंबें असून एकापासूनहि पुत्रसंतति नव्हती व त्यामुळें ते फार खत करीत असत. त्यांना एकदां माधवराव देशापांडयांचे सासरे रा. गोविंदाराव सापकर यांनीं येथें येऊन महाराजांचा आशीर्वाद घ्यावा असें सुचविलें. त्याप्रमाणें ते आले. महाराजांनीं आशीर्वाद दिला व त्या आशीर्वादाप्रमाणें त्यांना मुलगा झाला. अर्थात्‌ त्यांची निष्ठा महाराजांवर बसली; व तेव्हांपासून रामनवमीला नवीन निशाण आणावयाचें व त्या दिवशीं येथें फकीर जमले असतील त्या सगळ्यांना जेवूं घालावयाचें हा नेम त्यांनीं धरला: व तो त्यांचा नेम अजून चालू आहे.</p>
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	 </p>
<p>
	रामनवमीची जत्रा सुरू होण्याचे पूर्वीं कांहीं वर्षें महाराजांनीं एका निष्काम भक्ताला आपल्याकडे ओढून घेतलें होतें. ते भक्त म्हणजे रा. नारायण गोविंद ऊर्फ नानासाहेब चांदोरकर. हे कल्याणचे राहाणारे असून त्या वेळेला नगरच्या कलेक्टरचे चिटणीस होते. यांना एके दिवशीं येथील कुळकर्णी रा. केशव अनंत ऊर्फ आप्पा यांनीं सांगितलें कीं, आपल्याला महाराजांनीं बोलाविलें आहे. नामासाहेबांना हें आप्पांचें बोलणे प्रथम खरें वाटलें नाहीं, व त्यांनीं त्याला म्हटलें; उगीच महाराजांचें नांव कशाला सांगतोस ? तुझें माझ्याशीं कांहीं काम असेल तर तसें स्पष्ट सांग. त्यावर आप्पानें खरोखर महाराजांनीं बोंलावलें आहे असें निश्चयानें सांगितल्यावरून नानसाहेब महाराजांचे दर्शनास आले व लौकरच त्यांची श्रद्धा महाराजांवर बसली. मग ते तेथें वारंवार येऊन महाराजांच्या बोधामृताचा लाभ घेऊं लागले. महाराजांच्या व त्यांच्या तासच्या तास बैठकी होत. “तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यंति तेऽज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन: ॥” या श्रीभगवदुक्तीप्रमाणें नानासाहेबांचे प्रणिपात, परिप्रश्न व सेवा असत आणि महाराज त्यांना उपदेश करीत. एकदां तर याच श्लोकाचें विवेचन महाराज सुमारें एक तास करीत होते. त्या विवेचनावरून नानासाहेबांची खात्री झाली कीं, महाराजांना संस्कृत उत्तम येत असलें पाहिजे. नानासाहेबांनीं महारजांची सेवा अति उत्तम केली. त्यांत विशेषत: दोन गोष्टींमुळें तर ते महाराजांच्या भक्तांना चिरस्मरणीय राहातील. एक तर महाराजांची जुनी मशीद होती ती त्यांनीं मोडून फिरून बांधली व मोठी केली. ननासाहेबांना हें काम स्वत: करून घेण्याला सवड नव्हती, म्हणून त्यांचे विनंतीवरून नानासाहेब निमोणकरांनीं येथें राहून स्वत: देखरेख करण्याचें पत्करलें व तें काम त्यांनीं उत्तम तर्‍हेनें पार पडलें. मशीद बांधण्याला महाराजांची परवानगी म्हाळसापतींचे द्वारें मागितली व ती महाराजांनीं दिली. तरी पण काम चालू असतांना महाराजांनीं वेळोवेळीं काम पाडून ट]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 19 Jul 2023 12:55:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 19 Jul 2023 12:56:48 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईबाबांचे अभंग]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/shirdi-saibaba-abhang-in-marathi-118012400019_1.html</link>
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      <description><![CDATA[शिर्डी माझे पंढरपुर । साईबाबा रमावर ।। १ ।।
शुद्ध भक्ती चंद्रभागा । भाव पुंडलिक जागा ।। २ ।।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="" class="imgCont" height="354" src="http://media.webdunia.com/_media/hi/img/article/2016-07/23/full/1469267349-9653.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="630" /></p>
	<p style="text-align: center;">
		शिर्डी माझे पंढरपुर । साईबाबा रमावर ।। १ ।।</p>
</p>
<p style="text-align: center;">
	शुद्ध भक्ती चंद्रभागा । भाव पुंडलिक जागा ।। २ ।।</p>
<p style="text-align: center;">
	या हो या हो अवघे जन । करा बाबांसी वंदन ।। ३ ।।</p>
<p style="text-align: center;">
	गणु म्हणे बाबा साई । धाव पाव माझे आई ।। ४ ।।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 01 Jun 2023 07:03:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 01 Jun 2023 07:24:39 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईबाब जन्मतिथी : साईबाबांविषयी माहिती]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-baba-birth-date-28-september-121092800012_1.html</link>
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      <description><![CDATA[साईबाबा  (इ.स. १८५६ – १५ ऑक्टोबर, १९१८) एक भारतीय फ़कीर होते. अहमदनगर जिल्ह्यातील राहाता तालुक्यातील शिर्डी ह्या गांवात त्यांचे वास्तव्य असल्यामुळे त्यांना ‘शिर्डीचे साईबाबा’ म्हणूनही ओळखले जाते. येथूनच बाबांनी सर्वांना श्रद्धा व सबुरी हा महामंत्र ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="saibaba aarti" class="imgCont" height="354" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2021-07/29/full/1627530127-2983.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="630" /></p>
	साईबाबा  (इ.स. १८५६ – १५ ऑक्टोबर, १९१८) एक भारतीय फ़कीर होते. अहमदनगर जिल्ह्यातील राहाता तालुक्यातील शिर्डी ह्या गांवात त्यांचे वास्तव्य असल्यामुळे त्यांना ‘शिर्डीचे साईबाबा’ म्हणूनही ओळखले जाते. येथूनच बाबांनी सर्वांना श्रद्धा व सबुरी हा महामंत्र दिला. शिर्डीस आल्यावर प्राप्त होणारी मनःशांती व मिळणारा आत्मविश्वास यामुळे शिर्डी हे भारतासह जगभरातील लाखो भाविकांचे श्रद्धास्थान बनले आहे.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साईबाबा हे मोमीन वंशीय मुस्लिम होते असेही मानण्यात येते. जेव्हा पहिल्यांदा त्यांना म्हाळसा पतींनी(शिर्डीचा पुजारी) पाहिले तेव्हा साई अशी हाक मारली, कारण त्यावेळी लोक मराठी-उर्दू-फारशी मिश्रित भाषा वापरीत असत, साई चा अर्थ &#39;फकीर&#39; किंवा &#39;यवनी संत&#39; असा आहे. साईबाबांसाठी हिंदू - मुस्लिमांच्यासह सर्व लोक समान होते. त्यांनी धर्मनिरपेक्षतेची शिकवण दिली. “सबका मालिक एक” आणि " अल्लाह मालिक " हे साईंचे बोल होते.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साईबाबांच्या जन्मस्थानाचा वाद</p>
<p>
	साई बाबाचा जन्म कधी आणि कोठे झाला आणि त्याचे आई -वडील कोण होते ते अज्ञात आहे. त्याची सत्यता कोणत्याही दस्तऐवजावरून माहित नाही. शिर्डीच्या साईंनी स्वतः याबद्दल काहीही सांगितले नाही. तथापि, एक आख्यायिका म्हणून लोकप्रिय आहे की एकदा श्री साई बाबांचे म्हाळसापतीचे जिव्हाळ्याचे भक्त होते, जे बाबांबरोबर मस्जिद आणि चावडीमध्ये झोपले होते. त्यांनी सांगितले की "मी पाथर्डी (पाथरी) येथील ब्राह्मण कुटुंबात जन्म झाला. माझ्या पालकांनी मला माझ्या लहानपणी एका फकीराच्या हवाली केले होते. " ही चर्चा चालू असताना, पाथरीचे काही लोक तिथे आले आणि बाबांनी काही लोकांची चौकशीही केली. </p>
<p>
	 </p>
<p>
	त्यांच्या जन्मस्थानाची आणि तारखेची बाब प्रत्यक्षात त्यांच्या अनुयायांच्या श्रद्धा आणि श्रद्धेवर आधारित आहे. श्री सत्य साई बाबा, ज्यांना शिर्डी साई बाबांचा अवतार समजले जाते, त्यांनी त्यांचे पूर्वीचे रूप सादर करताना शिर्डी साई बाबांच्या सुरुवातीच्या जीवनाशी संबंधित घटनांवर प्रकाश टाकला आहे, ज्यावरून हे कळते की त्यांचा जन्म 28 सप्टेंबर रोजी झाला होता. सप्टेंबर 1835 पूर्वीच्या हैदराबाद राज्यातील पाथरी नावाच्या गावात. माझा जन्म ब्राह्मण कुटुंबात झाला.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पालक</p>
<p>
	जन्मतारीख आणि ठिकाणाप्रमाणे, सईच्या पालकांबद्दल सत्यतेसाठी काहीही ज्ञात नाही. श्री सत्य साई बाबांनी दिलेल्या वर वर्णनानुसार त्यांच्या वडिलांचे नाव श्री गंगा बावडिया आणि आईचे नाव देवगिरी अम्मा असे मानले जाते. हे दोघेही शिव-पार्वतीचे उपासक होते आणि त्यांना फक्त शिवाच्या आशीर्वादाने मुले होती. असे म्हटले जाते की जेव्हा साई त्याच्या आईच्या उदरात होती, त्याच वेळी त्याच्या वडिलांनी ब्रह्माच्या शोधात अरण्यवासाची इच्छा तीव्र केली. ते सर्व काही सोडून बाहेर जंगलात गेले. त्याची पत्नीही त्याच्यासोबत होती. वाटेत तिने मुलाला जन्म दिला आणि पतीच्या आदेशानुसार तिला झाडाखाली सोडले. तेथून एक मुस्लिम गूढ बाहेर आला जो निपुत्र होता. त्याने त्या मुलाला दत्तक घेतले आणि प्रेमाने &#39;बाबा&#39; असे नाव देऊन त्याने त्याला वाढवले. </p>
<p>
	 </p>
<p>
	बालपण आणि चांद पाटील यांचा आश्रय</p>
<p>
	बाबांचे पालनपोषण एका मुस्लिम फकीराने केले होते, परंतु लहानपणापासूनच त्यांचा कल विविध धर्मांकडे होता परंतु त्यांचा कोणत्याही एका धर्मावर एकात्मिक विश्वास नव्हता. कधी तो हिंदू मंदिरात प्रवेश करायचा तर कधी मशिदीत जाऊन शिवलिंगाची स्थापना करायचा. ना गावातील हिंदू त्याच्यावर खूश होते ना मुसलमान. त्याच्या सततच्या तक्रारींमुळे, त्याला वाढवणाऱ्या गूढवादीने त्याला त्याच्या घरातून हाकलून लावले. अशाच एका खात्यानुसार, औरंगाबाद जिल्ह्यातील धूप गावातील एक श्रीमंत मुस्लिम गृहस्थ, बाबांच्या म्हणण्याने प्रभावित होऊन हरवलेली घोडी सापडली, त्याने बाबांना आश्रय दिला आणि बाबा तिथे काही काळ राहिले. </p>
<p>
	 </p>
<p>
	शिर्डी येथे आगमन</p>
<p>
	एक चमत्कारीक कथा म्हणून असे म्हटले जाते की बाबा वयाच्या सोळाव्या वर्षी शिर्डी येथे कडुनिंबाच्या झाडाखाली पहिल्यांदा सापडले होते. त्याच्या निवासस्थानाबद्दल काही चमत्कारिक कथा प्रचलित आहेत.  काही काळानंतर तो तेथून गायब झाला. पुन्हा शिर्डीला येण्याच्या आणि ते राहण्याचे ठिकाण बनवण्याच्या संदर्भात, अशी एक कथा आहे की काही काळ चांद पाटील यांच्या आश्रयामध्ये राहिल्यानंतर, एकदा पाटीलच्या जवळच्या नातेवाईकाची मिरवणूक शिर्डी गावात गेली, ज्यांच्याबरोबर बाबा देखील होते गेला. लग्न संपल्यानंतर, मिरवणूक परत आली पण बाबांना ती जागा खूप आवडली आणि ते त्याच जीर्ण मशिदीत राहू लागले आणि आयुष्यभर तिथेच राहिले. </p>
<p>
	 </p>
<p>
	&#39;साई&#39; हे नाव मिळाले</p>
<p>
	असे म्हटले जाते की जेव्हा चांद पाटीलच्या नातेवाईकाची मिरवणूक शिर्डी गावात पोहोचली तेव्हा खंडोबाच्या मंदिरासमोर बैलगाड्या उघडल्या गेल्या आणि मिरवणुकीतले लोक खाली उतरू लागले. त्याच वेळी, म्हाळसापती या धर्माभिमानी व्यक्तीने तरुण फकीरच्या विलक्षण व्यक्तिमत्त्वामुळे भारावून जाऊन त्याला &#39;साई&#39; म्हणून संबोधले. हळूहळू शिर्डीतील प्रत्येकजण त्याला &#39;साई&#39; किंवा &#39;साई बाबा&#39; या नावाने हाक मारू लागला आणि अशा प्रकारे तो &#39;साई&#39; या नावाने प्रसिद्ध झाला. </p>
<p>
	 </p>
<p>
	धार्मिक मान्यता</p>
<p>
	साई बाबांचे पालनपोषण एका मुस्लिम फकीराने केले आणि नंतरही ते अनेकदा मशिदींमध्ये राहिले. लोक साधारणपणे त्याला फक्त मुस्लिम फकीर म्हणून ओळखत असत. ते सतत अल्लाहचे स्मरण करत असत. तो &#39;अल्लाह मलिक&#39; म्हणायचा. तथापि, त्याने सर्व धर्मांच्या ऐक्यावर भर दिला आणि वेगवेगळ्या धर्मांना त्याच्या आश्रयामध्ये स्थान दिले. त्याचे अनुयायी हिंदू आणि मुस्लिम दोन्ही होते. हिंदू आणि मुस्लिमांचे विविध धार्मिक सण त्यांच्या आश्रयस्थानात (मशिदी) साजरे केले जात. हिंदू धर्मग्रंथांच्या अभ्यासालाही त्यांनी आश्रय दिला. त्यावेळी भारतातील अनेक प्रदेशांमध्ये हिंदू-मुस्लिम द्वेष प्रचलित होता, परंतु त्याचा संदेश होता.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	१५ ऑक्टोबर १९१८ रोजी दसर्‍याच्या दिवशी साईबाबांचे शिर्डीतच निधन झाले.</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 30 Mar 2023 07:37:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 30 Mar 2023 08:10:21 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईबाबांचे 11 वचन, शिरडीस ज्याचे लागतील पाय।। टळली अपाय सर्व त्याचे।।]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-vachan-in-marathi-118092700012_1.html</link>
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      <description><![CDATA[श्रद्धा- सबुरी हे दोन मंत्र होते साईंचे. वेद-पुराणाप्रमाणे चित्त योग्य मार्गावर आणण्यासाठी एक इष्ट असणे गरजेचे आहे. साईबाबांचे 11 वचन याची उद्देश्य पूर्ती करतात. साईबाबांनी मराठीत म्हटलेले 11 वचन:]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
	<img align="center" alt="" class="imgCont" height="354" src="//media.webdunia.com/_media/hi/img/article/2018-08/22/full/1534936167-8169.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="630" /></p>
श्रद्धा- सबुरी हे दोन मंत्र होते साईंचे. वेद-पुराणाप्रमाणे चित्त योग्य मार्गावर आणण्यासाठी एक इष्ट असणे गरजेचे आहे. साईबाबांचे 11 वचन याची उद्देश्य पूर्ती करतात. साईबाबांनी मराठीत म्हटलेले 11 वचन:<br />
<iframe allow="autoplay; encrypted-media" allowfullscreen="" frameborder="0" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/G7kNtj-1ae0?rel=0" width="560"></iframe><br />
<br />
<p>
	साई म्हणे तोचि, तोचि झाला धन्य।।</p>
<p>
	झाला जो अनन्य माइया पायी।।11।।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 10 Nov 2022 07:35:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 10 Nov 2022 07:54:16 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[शिरडीचे साईबाबा मुस्लिम होते का?]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/was-sai-baba-muslim-122082000048_1.html</link>
      <guid>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/was-sai-baba-muslim-122082000048_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2018-10/18/thumb/1_1/1539848580-1094.jpg"/>
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      <description><![CDATA[साई बाबा कोण आहेत? साई कोठून आले आणि ते भक्तांचे साईबाबा कसे झाले, ते यवन देशाचा मुस्लिम फकीर असल्याचे आता लोक मानू लागले आहेत. खरंच असं होतं का? जाणून घेऊया काय आहे साईंबद्दल साई विरोधकांचा युक्तिवाद...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="" class="imgCont" height="592" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2018-10/18/full/1539848580-1094.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="saibaba" width="740" /></p>
	साई बाबा कोण आहेत? साई कोठून आले आणि ते भक्तांचे साईबाबा कसे झाले, ज्याचे दर्शन घेतल्यानंतर भक्त आपले जीवन धन्य मानू लागतात. जर शंकराचार्यांनी साईंना मुस्लिम फकीर म्हटले आहे. स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती यांनी स्वतः सांगितले की, साई मांसाहारी होते, लोकांची सुंता करून घेत असे, पिंडारी समाजाचा मुलगा होता जो दरोडेखोर होता. त्यामुळे तो आमचा आदर्श होऊ शकत नाही. शंकराचार्यांनी तेच सांगितले का? कोणत्याही तथ्याशिवाय? नसेल तर त्यामागची वस्तुस्थिती काय आहे? साईबाबांबद्दल खूप गोंधळ उडाला आहे. ते हिंदू होते की मुस्लिम? ते कबीर, नामदेव, पांडुरंग इत्यादींचे अवतार होते का? काहीजण म्हणतात की ते शिवाचा अंश आहे तर काहींना त्याच्यात दत्तात्रेयांचा अंश दिसतो. इतरांचे म्हणणे आहे की ते अक्कलकोट महाराजांचे अंश आहे. उलट ते यवन देशाचा मुस्लिम फकीर असल्याचे आता लोक मानू लागले आहेत. खरंच असं होतं का? जे सोने आगीत जळून कुंदन होईल, त्या सोन्याचा प्रश्न आपण आपल्या संतांना करणे आवश्यक आहे. हेरगिरी करण्यासाठी किंवा हिंदू भूभाग हाणून पाडण्यासाठी, सुफी संतांच्या वेशात फकीरांची टोळी पाठवली गेली, ज्यांनी गावाबाहेर तळ ठोकला. शहर सीमेवर तळ ठोकून तेथील प्रजेच्या व राजांच्या सामर्थ्याचा अंदाज घेणे आणि प्रजेमध्ये बंडखोरी करणे हे त्यांचे काम होते.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अनेकदा शहराच्या किंवा गावाच्या सीमेवर आपल्याला सुफी संतांची समाधी सापडेल, कारण सीमेवरून टोहणे करणे सोपे होते आणि कोणताही धोका नव्हता. हिंदूंना प्राचीन काळापासून संतांच्या मनात आदर आणि श्रद्धेची शिकवण दिलेली असल्याने ते कोणत्याही संताला प्रश्न करत नाहीत आणि त्याच्याकडे संशयाने पाहत नाहीत. विशेषत: गावातील भोळे लोक, साधुसंतांच्या वेशातील लोकांवर विश्वास ठेवून त्याच्या चरणी नतमस्तक होतात. हे तथाकथित संत आयुष्यभर इथेच राहून एकीकडे हेरगिरीचे काम करायचे आणि दुसरीकडे धर्माचे काम करायचे.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साईंचे विरोधक आणि कट्टर हिंदूंचा असा युक्तिवाद आहे की असे अनेक सूफी संत झाले आहेत ज्यांनी हळूहळू राम आणि कृष्णाच्या भक्तीद्वारे हिंदूंना इस्लामवर विश्वास ठेवायला लावला आणि शेवटी त्यांचे इस्लाममध्ये धर्मांतर केले. आजही असे अनेक संत कार्यरत आहेत. साईबाबाही या कटाचा एक भाग आहे.  </p>
<p>
	 </p>
<p>
	अशा लोकांचा साईंबद्दल असा युक्तिवाद आहे की साई आपला बहुतेक वेळ मुस्लीम धर्मगुरूंसोबत घालवत असे. अजमेरमध्येही काही महिने वास्तव्य केले. साई एक संपूर्ण मुस्लिम गूढवादी होते आणि त्यांनी आपले संपूर्ण आयुष्य मुस्लिमांसारखे जगले. चला जाणून घेऊया काय आहे साईंबद्दल साई विरोधकांचा युक्तिवाद...</p>
<p>
	 </p>
<p>
	1. &#39;साई&#39; हा शब्द फारसी भाषेतील असून त्याचा अर्थ &#39;संत&#39; असा होतो. त्या काळात हा शब्द सामान्यतः भारताच्या पाकिस्तानी भागात मुस्लिम तपस्वींसाठी वापरला जात असे. शिर्डीत ज्या मंदिराच्या बाहेर साई प्रथम येऊन मुक्कामी होते, त्या मंदिराचे पुजारी त्यांना साई म्हणून संबोधले. मंदिराच्या पुजाऱ्याने ते मुस्लिम फकीर वाटले तेव्हाच त्याने साई म्हटले.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	2. &#39;सब का मालिक एक&#39; असे सईने कधीच म्हटले नाही. साईसच्चित्राच्या अध्याय 4, 5, 7 मध्ये उल्लेख आहे की ते आयुष्यभर फक्त &#39;अल्लाह मालिक है&#39; म्हणत राहिले. काही लोकांनी त्यांना हिंदू संत बनवण्यासाठी &#39;सबका मालिक एक है&#39; म्हणत असे, असा खोटा प्रचार काही लोकांनी केला. जर ते ऐक्याचे बोलत होते, तर &#39;राम हा मालक आहे&#39; किंवा &#39;देव मालक आहे&#39; असे कधीच का म्हटले नाही.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	3. कोणताही हिंदू संत आपले डोके कफनासारखे बांधत नाही, फक्त मुस्लिम फकीर हे करतात. जो पोशाख साईचा होता तो फक्त मुस्लिम फकीराचा असू शकतो. हिंदू धर्मात, डोक्यावर पांढरा कफन बांधण्यास मनाई आहे, एकतर केस ठेवले जातात किंवा डोक्यावर कोणत्याही प्रकारे केस नाहीत.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	4. साई बाबांनी राहण्यासाठी मशीद का निवडली? इतरही जागा होत्या, पण ते आयुष्यभर मशिदीतच राहिले. मशिदीशिवाय शिर्डीत इतरही अनेक ठिकाणे होती जिथे त्यांचा मुक्काम होता. मशीद का? त्यांना देवळात राहिचे नव्हते तर कडुनिंबाच्या झाडाखाली झोपडी बांधली असती. त्यांच्या भक्तांनी त्यांना यात मदत केली असती.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	5. साई सच्चित्रानुसार, साई बाबा लोकांना उपासना, ध्यान, प्राणायाम आणि योगाबद्दल सांगत असत की ते करण्याची गरज नाही. त्यांच्या प्रवचनावरून ते हिंदुत्वविरोधी असल्याचे दिसून येते. लोकांमध्ये एकेश्वरवादावर विश्वास निर्माण करणे हे साई बाबांचे ध्येय होते. त्यांना कर्मकांड, ज्योतिष इत्यादीपासून दूर ठेवा.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	6. मशिदीतून भांडी आणल्यानंतर तो मौलवींना फातिहा वाचायला सांगायचा. तेव्हाच जेवणाला सुरुवात व्हायची. त्यांनी कधीही मशिदीत गीता पठण केले नाही किंवा जेवण करण्यापूर्वी &#39;श्री गणेश करो&#39; देखील म्हटले नाही. हिंदू-मुस्लिम ऐक्याबद्दल बोलायचे असेल तर दोन्ही धर्मांचा आदर करायला हवा होता.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	7. साईंना सर्वजण यवन मानत होते. ते भारताचे नसून अफगाणिस्तानचा होते, म्हणूनच लोक त्यांना यवनाचा मुसलमान म्हणत. त्याची उंची आणि आंगकाठी यवनी सारखीच होती. साईसच्चित्रानुसार, एकदा साईंनीही याचा उल्लेख केला होता. त्यांना भेटायला येणारे लोक मुस्लिम फकीर मानले जात होते, पण त्यांच्या डोक्यावरचे चंदन पाहून लोक गोंधळून जायचे.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	8. नाथ पंथाचे लोक करतात तशी बाबांनी धुनी बनवली नाही. थंडीपासून वाचण्यासाठी बाबा लाकूड एका ठिकाणी जमवून आग पेटवत असे. लोकांनी त्यांच्या या आगीला जाळणे म्हणजे धूर समजला. बाबांकडे गेलेल्या लोकांना बाबांनी काही ना काही द्यावे असे वाटत असल्याने ते धुनीची राख लोकांना प्रसाद म्हणून देत असत. प्रसाद द्यायचाच असेल तर तो आपल्या भक्तांना मांसात मिसळलेला खारट भात द्यायचा.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	9. आजकाल साईबाबांचा ब्राह्मण कुळात जन्म झाल्याची कहाणी पुस्तके आणि लेखांद्वारे प्रसारित केली जात आहे. कोणत्याही ब्राह्मणाला मशिदीत राहायला आवडेल का?</p>
<p>
	 </p>
<p>
	10. साईंच्या काळात दोनदा दुष्काळ पडला होता पण साई त्या वेळी आपल्या भक्तांसाठी काहीही करू शकले नाहीत. एकदा प्लेग पसरल्यावर त्याने गावातील सर्व लोकांना गावाबाहेर जाण्यास मनाई केली, कारण कोणी परत आले तर या गावातही प्लेग पसरेल, म्हणून त्यांनी लोकांमध्ये भीती भरली की कोणतीही मी ओढलेली रेषा ओलांडली तर तो मरेल. या भीतीमुळे भोळे लोक गावाबाहेर गेले नाहीत आणि साईंनी गावाला प्लेगपासून वाचवले हा चमत्कार म्हणून लोकांनी प्रचार केला. प्लेग त्यांच्या गावापर्यंत पोहोचू शकला नाही. असे अनेक लोक साईंकडे यायचे, जे त्याला बाहेरच्या जगाची स्थिती सांगायचे.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	11. साईंचा जन्म 1830 मध्ये झाला होता, परंतु त्यांनी भारतीयांना स्वातंत्र्य लढ्यात मदत करणे आवश्यक मानले नाही, कारण ते भारतीय नव्हते. ते इंग्रजांचे गुप्तहेर होते. अफगाण पंढरीच्या समाजातील होते आणि त्यांचे वडील त्यांच्यासोबत भारतात आले. त्यांच्या वडिलांचे नाव बहरुद्दीन आणि त्यांचे नाव चांद मियाँ होते.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	12. साईंचे विरोधक, साई चरित्रात नमूद केलेल्या घटनेचे उदाहरण देत म्हणतात की 1936 मध्ये हरी विनायक साठे (एक साई भक्त) यांनी नरसिंह स्वामींना त्यांच्या मुलाखतीत सांगितले होते. बाबा कोणत्याही हिंदू देवतेची किंवा स्वत:ची मशिदीत पूजा करू देणार नाहीत किंवा मशिदीत कोणत्याही देवतेला ठेवू देणार नाहीत, असे सांगितले. एकदा त्यांनी शिवरात्रीच्या मुहूर्तावर बाबांना विचारले की ते महादेव किंवा शिवाप्रमाणे बाबांची पूजा करू शकतात का? तेव्हा बाबांनी स्पष्टपणे नकार दिला, कारण ते मशिदीत होते. त्यांचा हिंदू जीवनपद्धतीलाही विरोध होता. तरीही साठे साहेब आणि मेघा रात्री मशिदीच्या पायरीवर फुले, बेलची पाने, चंदन लावून मूकपणे पूजा करू लागले. तेव्हा तात्या पाटलांनी त्यांना पाहून पूजा करण्यास मनाई केली. त्याच क्षणी साईला जाग आली आणि जोरजोरात ओरडून ते शिवीगाळ करू लागले. त्यामुळे संपूर्ण गाव जमा झाले आणि त्यांनी साठे आणि मेघाला खडसावले.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	13. साई भक्त आणि शिर्डी साई संस्थान यांनी सांगितलेले साईंबद्दलचे सर्वात योग्य पुस्तक म्हणजे साई सच्चित्र. पुस्तकातील पृष्ठ क्रमांक 17, 28, 29, 40, 58, 78, 120, 150, 174 आणि 183 वर साईने &#39;अल्लाह मालिक&#39; म्हटल्याचे लिहिले आहे. संपूर्ण पुस्तकात साईंनी कोणत्याही हिंदू देवतेचे नाव घेतले नाही एकदाही घेतले नाही किंवा &#39;सबका मालिक एक&#39; असे म्हटले नाही. साई भक्तांनी सांगावे की जे साईंनी कधीच तोंडाने म्हटले नाही, ते साईंच्या नावाने प्रचार का केले जात आहे?</p>
<p>
	 </p>
<p>
	14. साईला रामाशी जोडण्याचा कट: 12 ऑगस्ट 1997 रोजी, गुलशन कुमारच्या हत्येनंतर 6 महिन्यांनी, 1998 मध्ये साई नावाच्या एका नवीन देवाचा अवतार झाला. यानंतर लवकरच 28 मे 1999 रोजी &#39;बीवी नंबर 1&#39; हा चित्रपट आला, ज्यामध्ये साईसोबत पहिल्यांदा राम जोडून &#39;ओम साई राम&#39; हे गाणे बनवण्यात आले.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	15. बाबा बाजारातून पीठ, डाळी, तांदूळ, मिरची, मसाला, मटण इत्यादी खाद्यपदार्थ मागवत असत आणि यासाठी ते कोणावरही अवलंबून नव्हते. भीक मागणे त्याच्याकडे एक दिखावा होता. बाबांकडेही घोडा होता. शिर्डीच्या श्रीमंत हिंदूंनी त्यांच्यासाठी सर्व प्रकारच्या सोयींची व्यवस्था केली होती. कृष्णा माईंनी त्यांच्या सांगण्यावरूनच गरिबांना जेवण देत असे, मशिदीची साफसफाई करायची आणि सर्व प्रकारची देखभाल करायची.</p>
<p>
	<br />
	16. साईने मेघाकडे बघितले आणि म्हणाले, &#39;तू उच्च श्रेष्ठ ब्राह्मण आहेस आणि मी फक्त खालच्या जातीचा यवन (मुस्लिम) आहे त्यामुळे तुझी जात भ्रष्ट होईल. तर तू इथून निघून जा. -साई सच्चित्र.-(अध्याय 28)</p>
<p>
	 </p>
<p>
	* एका एकादशीला त्यांनी पैसे देत केळकरांना मांस विकत आणायला सांगितले. -साईसच्चरित्र (अध्याय 38)</p>
<p>
	 </p>
<p>
	*  बाबांनी एका ब्राह्मणाला जबरदस्तीने बिर्याणी चाखायला सांगितली. -साईसच्चरित्र (अध्याय 38)</p>
<p>
	 </p>
<p>
	* साईसच्चित्रानुसार साई बाबा रागावायचे आणि शिवीगाळ करायचे. जेव्हा त्यांना खूप राग येत असे तेव्हा ते आपल्या भक्तांना मारहाण करत असे. बाबा कधी कधी दगड फेकायचे आणि कधी शिवीगाळ करायचे. - 6वा, 10वा, 23वा आणि 41वा साईसच्चरित्र अध्याय वाचा.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	* बाबांनी स्वतः कधीही उपवास केला नाही आणि कोणाला करू दिला नाही. साई सच्चरित्र (अध्याय 32)</p>
<p>
	 </p>
<p>
	* &#39;मला या गोंधळापासून दूर राहू द्या. मी एक फकीर आहे, माझ्यासाठी गंगाजलाचा हेतू काय आहे? - साईसच्चरित्र (अध्याय 28)</p><p>
	साईचे विरोधक म्हणतात की साई अफगाणिस्तानचा पिंडारी लुटारू होता. यासाठी ते एक कथा सांगतात की औरंगजेबाच्या मृत्यूनंतर मुघल साम्राज्याचा अंत होत होता फक्त दिल्ली त्याच्या हाताखाली होती. मराठ्यांच्या शूर पुत्रांनी एक प्रकारे हिंदू साम्राज्याचा पाया रचला होता. अशा वेळी मराठ्यांची बदनामी करून हे पिंडारी परिसरात लुटीचे काम करायचे.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इंग्रज आल्यावर त्यांनी पिंडार्‍यांना मारायला सुरुवात केली. या निर्मूलन मोहिमेमुळे अनेक पिंडारी इंग्रजांचे हेर बनले. साईचे विरोधक म्हणतात की झाशीची राणी लक्ष्मीबाईच्या सैन्यात 500 पिंडारी अफगाण पठाण सैनिक होते. त्यातील काही सैनिकांना इंग्रजांनी लाच देऊन नेले होते. ते स्वतः झाशीच्या राणीच्या किल्ल्याची गुपिते इंग्रजांना सांगत असे. ज्या मार्गाने राणी घोडा घेऊन रणांगणातून निघून गेली, त्या मार्गाने या पिंडारी पठाणांनी इंग्रजांना मदत केली. शेवटी इंग्रजांसह 5 पिंडारी पठाण होते. त्यापैकी एक शिर्डीच्या कथित साईबाबांचे वडील होते, जे नंतर झाशी सोडून महाराष्ट्रात लपले. त्यांचे नाव बहरुद्दीन होते. त्याच पिंडारी पठाण फरारी सैनिकाचा मुलगा हा शिर्डीचा साई जो एका वेश्येपासून जन्माला आला आणि त्याचे नाव चांद मियाँ होते.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	1857 मध्ये ब्रिटीशांनी भारतात हिंदू आणि मुस्लिमांमध्ये फूट पाडण्याच्या धोरणाखाली काम सुरू केले. या क्रांतीच्या अपयशाचे कारण यातूनच काही हिंदू-मुस्लिम इंग्रजांच्या भानगडीत येऊन त्यांच्यासाठी काम करत असत. बंगालमध्येही हिंदू-मुस्लिम संतांमध्ये दुरावा निर्माण करण्याचे काम केले. या काळात धर्मांध मुस्लिम आणि पाकिस्तानचे स्वप्न पाहणारे मुस्लिम इंग्रजांच्या पाठीशी होते.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साईचे वडील जे पिंडारी होते, त्यांचे मुख्य काम अफगाणिस्तानातून भारतातील राज्ये लुटणे हे होते. एकदा लुटमार करत असताना ते महाराष्ट्रातील अहमदनगरला गेले, जिथे ते एका वेश्येच्या घरात राहिले. त्यानंतर ते त्याच्या शेजारी राहू लागले. काही काळानंतर त्या वेश्येतून त्यांना एक मुलगा आणि मुलगी झाली. मुलाचे नाव त्यांनी चांद मियाँ ठेवले. त्या मुलासोबत ते अफगाणिस्तानला गेले. मुलीला वेश्येकडे सोडले. अफगाणिस्तान हे त्यावेळी इस्लामिक प्रशिक्षण केंद्र होते, जिथे लूटमार, जिहाद आणि धर्मांतराच्या पद्धती शिकवल्या जात असे.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	त्यावेळी इंग्रज पिंडार्‍यांवर जबरदस्त हल्ले करत होते, त्यामुळे बहरुद्दीन वेशात लुटपाट करत असे आणि त्याने आपला मुलगा चांद मियाँ (साई) याला ही प्रशिक्षित केले. चांद मियाँ चादर पसरून भीक मागायचा. चांद मियाँ इथली परिस्थिती चादरावर लिहायचा आणि खालून शिवून अफगाणिस्तानला पाठवायचा. त्यामुळे जिहादींना मराठे आणि इंग्रजांच्या कारवायांची जाणीव झाली.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साई अफगाणिस्तानचा पिंडारी होता ज्याला लोक यवानी म्हणत. हिंदू गावांमध्ये गूढवाद्यांच्या वेशात चोरी करण्यासाठी ते पूर्वी कुप्रसिद्ध होते. हिरवे कापड पसरून भीक मागायचा आणि त्याला काबूलला पाठवायचा. याच पत्रकात त्यांनी मराठा सैन्य आणि हिंदू यांचा वापर केला तो श्रीमंतांची माहिती इतर पिंडारींना पाठवत असे जेणेकरून ते त्यांच्यात घुसतील. त्याची शीट एकदा एका इंग्रजाने पकडली होती आणि त्यावर लिहिलेली गुप्त माहिती माहित होते.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	त्याच तो मराठा सैन्याची आणि हिंदू श्रीमंतांची माहिती इतर पिंडारींना एका पीराच्या समाधीवर अर्पण करण्यासाठी पाठवत असलेल्या चादरीत देत असे. त्याची चादार एकदा एका इंग्रजाने पकडली होती आणि त्यावर लिहिलेली गुप्त माहिती जाणून घेतली होती. </p>
<p>
	 </p>
<p>
	1857 च्या क्रांतीचा काळ हा इंग्रजांसाठी अत्यंत कठीण काळ होता. अशा स्थितीत चांद मियाँ इंग्रजांच्या हाती सापडला. अहमदनगरमध्ये पहिल्यांदाच साईचा फोटो काढण्यात आला. आधीच्या काळात देखील गुन्हेगाराचा फोटो काढला जात असे.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हा चांद मियाँ 8 वर्षांनंतर तुरुंगातून सुटल्यानंतर काही दिवसांनी शिर्डीमध्ये एका मिरवणुकीतून पोहोचला आणि तिथे सोलेमानी लोकांना भेटला ज्यांचे खरे काम होते गैर मुस्लिम लोकांमध्ये राहून शांतपणे इस्लाम वाढवणे. या सभेनंतर साई पुन्हा मिरवणुकीसह निघून गेला. काही दिवसांनी चांद मियाँ शिर्डीला व इकडे आले आणि त्यांनी अल-तकियाचे ज्ञान घेतले. मशिदीला मुद्दाम हिंदू नाव देण्यात आले आणि तिथल्या राहण्याची सर्व व्यवस्था सुलेमानी मुस्लिमांनी केली. एक षड्यंत्र अंतर्गत चांद मियाँला चमत्कारी फकीर म्हणून बढती मिळाली आणि गावातील भोळे हिंदू लोक त्याच्यावर विश्वास करु लागले. चांद मियाँला अनेक प्रकारची जादू आणि औषधी वनस्पतींची माहिती होती, त्यामुळे हळूहळू गावातील लोक त्याच्यावर विश्वास ठेवू लागले. पुढे त्यांच्या चमत्कारांचा मुंबईतील मंडळींनीही प्रचार केला. त्यामुळे श्रीमंत लोकही त्यांच्या संपर्कात येऊ लागले.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साईंनी हिंदू-मुस्लिम ऐक्याबद्दल सांगितले आणि मराठ्यांना त्यांच्या खऱ्या शत्रूंशी एकतेचा धडा शिकवला. मराठ्यांची शक्ती कमकुवत करण्याचा हा डाव होता. केवळ साईच नाही तर असे अनेक भोंदू लोक त्या काळात संपूर्ण महाराष्ट्रात हेच काम करत होते. मराठ्यांच्या पराक्रमाने सर्वजण घाबरले होते, म्हणून त्यांनी &#39;छळ&#39;चा वापर केला. पण साईंमागचा खरा हेतू लोकांना इस्लामकडे वळवण्याचा होता, याचे उदाहरण साई सच्चरित्रात आहे की, साईकडे एक पोलीस येतो, ज्याला साई मारुन पळून लावण्याचे सांगतात. आता प्रत्यक्षात घडले असे होते की एका पंडितजींनी आपल्या मुलाला शिक्षण मिळावे म्हणून साईंच्या स्वाधीन केले होते. पण साईने त्याचा खत्ना केला.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पंडितजींना कळताच त्यांनी कोतवालीला खबर दिली. साईला पकडण्यासाठी एक पोलिसही आला, ज्याला साईने मारायला सांगितले होते. त्या वेळीही साईला लपवून पळून जाण्याचा प्रयत्न करतात पण पोलीस त्याचा फोटो काढून घेतो. साईने बुरखा घातलेला फोटो त्यावेळचा आहे.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साईबाबा कोण होते, हा प्रश्न नाही, पण साईबाबा हिंदुत्वविरोधी नव्हते हे इथे सांगणे आवश्यक आहे. त्यांनी सर्व धर्मातील कर्मकांड आणि ढोंगीपणाला विरोध केला. ते खर्‍या अर्थाने वेदांती होते, जे दुष्ट आणि धार्मिक कट्टरतेच्या विरोधात होते.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	फेसबुकवर साईंच्या विरोधकांची अनेक पेज आहेत, ज्यामध्ये साईबाबांबद्दल आक्षेपार्ह गोष्टी आणि फोटो सापडतील. साई विरोधकांच्या या कथेत किती सत्य आहे हे सांगणे कठीण आहे, तथापि कथेला कोणताही आधार नाही, कारण त्यांनी साईसच्चित्राचा उल्लेख केलेल्या गोष्टी संदर्भासह वाचल्या पाहिजेत तरच उघड होईल. त्यांनी संदर्भ काढून अशा गोष्टींचा प्रचार केला, त्यामुळे लोकांमध्ये संभ्रम निर्माण होत आहे. त्यामुळे येथे म्हणावे लागेल की ज्यांना साई बाबांबद्दल कमी माहिती आहे त्यांनी साईसच्चित्र आणि साई लीला वाचावी.</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 20 Aug 2022 15:54:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 20 Aug 2022 16:03:12 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>अनिरुद्ध जोशी</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[श्री साईं नाथ महिम्ना स्तोत्रम]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/shri-sainath-mahimna-stotram-109081900058_1.html</link>
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      <description><![CDATA[सदा सत्सवारुपम चिदानंदा कंडम जगात्सम्भावास्थाना संहार हे तुम
स्वभाक्तेच्चाया मनुसम दर्स्यम्तम नममिस्वरम सद्गुरुम सैनाथं । 
भावाध्वंताविद्वंसा मर्तान्दमिदायम मनोवाग्गातिर्तम मुनिर्ध्यानागाम्यम 
जगत व्यापकं निर्मलं निर्गुणं त्वं नममिस्वरम सद्गुरुम ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<!--Image-->
<p class="wdp_articleLImg">
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="" class="imgCont" height="417" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/ta/img/article/2018-05/22/full/1526972613-8055.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="740" /></p>
	<span style="color: rgb(0, 0, 0); font-size: 11pt;">सदा सत्सवारुपम चिदानंदा कंडम जगात्सम्भावास्थाना संहार हे तुम</span></p>
<font style="font-size:11pt; color:#000000">स्वभाक्तेच्चाया मनुसम दर्स्यम्तम नममिस्वरम सद्गुरुम सैनाथं । </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">भावाध्वंताविद्वंसा मर्तान्दमिदायम मनोवाग्गातिर्तम मुनिर्ध्यानागाम्यम </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">जगत व्यापकं निर्मलं निर्गुणं त्वं नममिस्वरम सद्गुरुम सैनाथं । </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">भाव्बम्भोधी मग्नार्दितानाम जनानाम स्वपदा सृतानाम स्वभाक्तिप्रियानाम </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">समुधारानार्था कलौ सम्भावानतम नममिस्वरम सद्गुरुम सैनाथं । </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">सदा निम्बव्र्क्सस्य मुलाधिवासत सुधास्त्राविणं तितका मप्या प्रियं तं </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">तरुण कल्पव्र्क्सधिकम साधयन्तं नममिस्वरम सद्गुरुम सैनाथं ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">सदा कल्पव्र्क्सस्य तस्याधिमूले भावेद्भावाबुद्धाया सपर्यधिसेवाम </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">न्रुनाम कुर्वथाम भुक्तिमुक्ति प्रदम्तम नममिस्वरम सद्गुरुम सैनाथं । </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">अनेकाश्रुता तर्क्य लिलाविलासिः समविस्क्रतेसना भास्वत्प्रभावं </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">अहम्भावाहिनाम प्रसन्नात्मभावं नममिस्वरम सद्गुरुम सैनाथं । </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">सातम विश्राम राम मेवाभिरामम सदा सज्जनिः संस्तुतं संनामाद्धिः </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">जनामोदादम भक्ताभाद्र प्रधम तं नममिस्वरम सद्गुरुम सैनाथं ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">अजन्मध्यामेक्हम परम ब्रह्म साक्षात स्वयं संभवं रामामेवा वाथिर्नाम </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">भवदार्सनात्सम पुनीतः प्रबोहम नममिस्वरम सद्गुरुम सैनाथं ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">श्री साईं श कृपा निधे खिला द्रुमा सर्वर्थासिद्धिप्रदा </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">युस्मात्पदाराजः प्रभावमतुलं धतापिवक्ता क्षमः </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">सद्भाक्त्य सरनाम कृतान्जलिपुतः सम्प्रपितो समी प्रभो </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">श्रीमत साईं परेसपदा कमालान्नान्याच्चारान्यम मामा </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">सैरुपधरा राघवोत्तामाम भक्त कम विभुधा ध्रुमम प्रभुम । </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">मायायोपतासित्ता सुद्धाये चिन्तया म्याहमाहर्निसम मुदा </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">सरत्सुधाम्सू प्रतिमा प्रकाशम् क्रिपतापत्रम तवा साईं नाथ </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">त्वधियापदा सम्सृतानाम स्वच्चायाय तपमयापकरोतु ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">उपसनादैवता साईं नाथ सतवीर मयोपसनिना सतुतस्त्वं </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">रमेन्मनो में तवा पादयुग्मे भ्रुंगो यथाब्जे मकरंदलुब्धः । </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">अनेकाजन्मर्जिता पापसंक्षयो भावेध्भावात्पदा सरोज दर्सनत </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">क्सम्स्व सर्वाना पुन्जकन प्रसिद साईं गुरो दयानिधे ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">श्री साईं नाथ चरनाम्रुता पुता सित्तास्तात्पदा सेवानारातः सचियानता भक्त्या </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">संसार जन्य दुरिताऊ धविनिर गथास्ते कैवाल्याधामा परमं समवाप्नुवन्ति ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">स्तोत्रमेतात्पठेद्भाक्त्य यो नारास्तान्मनाह सदा </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">सद्गुरु साईं नाथस्य कृपा पत्रं भवेद ध्रुवं ।</font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">साईं नाथ कृपा सर्वदृसत्पद्य कुसुमावालिः </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">श्रेयसे च मनः सुध्याई प्रेमासुत्रेना गुम्फिता । </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">गोविन्दासुरिपुत्रेना कसिनाथाभिधयिना </font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">उपसनित्युपख्येना श्री साईं गुरवे रपिता </font>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 07 Jul 2022 07:24:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 07 Jul 2022 07:26:29 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>वेबदुनिया</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[शिर्डी साईं उधी मंत्र Shirdi Sai Udhi Mantra]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/shirdi-sai-udhi-mantra-109081900060_1.html</link>
      <guid>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/shirdi-sai-udhi-mantra-109081900060_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2017-01/04/thumb/1_1/1483523973-2083.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2017-01/04/thumb/1_1/1483523973-2083.jpg</image>
      <description><![CDATA[महोग्रह पीद्हम महोत्पाथा पीद्हम
महारूगा पीद्हम
मातीवर पीद्हम हरात्यासुतेय द्वारकामाई भस्म नमस्ते
गुरु श्रेष्ट सैएश्वराया
स्रीकाराम नित्यं सुभाकारम]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
	<img align="center" alt="" class="imgCont" height="354" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2017-01/04/full/1483523973-2083.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="630" /></p>
<strong><span style="background-color:#ff8c00;">शिर्डी साईं उधी मंत्र</span></strong><br />
<br />
<span style="font-size:16px;"><font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><b>महोग्रह पीद्हम महोत्पाथा पीद्हम</b></font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><b>महारूगा पीद्हम</b></font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><b>मातीवर पीद्हम हरात्यासुतेय द्वारकामाई भस्म नमस्ते</b></font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><b>गुरु श्रेष्ट सैएश्वराया</b></font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><b>स्रीकाराम नित्यं सुभाकारम</b></font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><b>परमं पविथ्रम महापापहरं</b></font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><b>बाबा विभुतिम धरयाम्यहम</b></font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><b>परमं पविथ्रम बाबा विभुतिम</b></font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><b>परमं विचिथ्रम लीला विभुतिम</b></font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><b>परमार्थ इश्तार्था मोक्ष प्रधातिम</b></font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><b>बाबा विभुतिम इदामास्रायामी साईं विभुतिम इदामास्रायामी</b></font><br />
<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><b>ॐ श्री सत्चिदानान्दा सद्गुरु सैनाथाया नमः</b></font></span><br />
<br />
<p>
	<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><span style="color:#000000;"><span style="font-size:16px;"><strong><span style="background-color:#ff8c00;">Shirdi Sai BABA Udhi Mantra</span></strong></span></span></font></p>
<p>
	 </p>
<p>
	<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><span style="font-size:16px;"><strong>Mahograha Peedham Mahotpaatha Peedham</strong></span></font></p>
<p>
	<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><span style="font-size:16px;"><strong>Maharooga Peedham Mahateevra Peedham</strong></span></font></p>
<p>
	<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><span style="font-size:16px;"><strong>Haratyaasutey Dwarakamayi Bhasma Namasthey</strong></span></font></p>
<p>
	<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><span style="font-size:16px;"><strong>Guru Sreshta Saieshwaraaya</strong></span></font></p>
<p>
	<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><span style="font-size:16px;"><strong>Sreekaram Nityam Subhakaaram</strong></span></font></p>
<p>
	<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><span style="font-size:16px;"><strong>Paramam Pavithram Mahapapaharam</strong></span></font></p>
<p>
	<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><span style="font-size:16px;"><strong>Baba Vibhutim Dharayamyaham</strong></span></font></p>
<p>
	<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><span style="font-size:16px;"><strong>Paramam Pavithram Baba Vibhutim</strong></span></font></p>
<p>
	<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><span style="font-size:16px;"><strong>Paramam Vichithram Leela Vibhutim</strong></span></font></p>
<p>
	<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><span style="font-size:16px;"><strong>Paramartha Ishtaartha Moksha Pradhaatim</strong></span></font></p>
<p>
	<font style="font-size:11pt; color:#FF0080"><span style="font-size:16px;"><strong>Baba Vibhutim Idamasrayami Sai Vibhutim Idamasrayami<br />
	Om Shree Satvidananda Sadguru Sainnatha Namah</strong></span></font></p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 23 Jun 2022 08:27:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 23 Jun 2022 08:52:15 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>वेबदुनिया</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ५३]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-53-122042900062_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
श्रीसाई साक्षात् ब्रम्हामूर्ती । संतसम्राट चक्रवर्ती । समर्थसद्नुरुदिगंतकीर्ति । बुद्धिस्फूर्तिप्रदायक ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 53" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/29/full/1651228272-175.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra chapter 53" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	श्रीसाई साक्षात् ब्रम्हामूर्ती । संतसम्राट चक्रवर्ती । समर्थसद्नुरुदिगंतकीर्ति । बुद्धिस्फूर्तिप्रदायक ॥१॥</p>
<p>
	अनन्यभावें त्यासी शरण । वंदूं त्याचे पुण्य चरण । संसृतिभयाचें करी हरण । जन्ममरण चुकवी जो ॥२॥</p>
<p>
	गताध्यायीं दिधलें वचन । “प्रथम करूनि सिंहावलोकन । नंतर अवतरणिका देऊन । ग्रंथ करीन संपूर्ण” ॥३॥</p>
<p>
	पंतहेमाड ऐसें वदले । परी तैसें नाहीं घडलें । अवतरणिकारूप सार काढिलें । कीं राहिलें विस्मृतीनें ॥४॥</p>
<p>
	ज्यानें आरंभावें ग्रंथलेखन । त्यानेंच करावें तें पूर्ण । शेखीं अवतरणिका देऊन । ऐसें नियमन सर्वत्र ॥५॥</p>
<p>
	परी नियमा अपवाद असे । त्याचेंच प्रत्यंतर येथें दिसे । कांहीं न होय स्वेच्छावशें । बलीयस मनोगत बाबांचें ॥६॥</p>
<p>
	हेमाड अवचित दिवंगत । दु:खित अवघियांचें चित्त । अवतरणिकेची न कळे मात । न सुचत कांहीं कोणाला ॥७॥</p>
<p>
	अण्णासाहेबांचें दप्तर गहन । सायासें करूनि तत्संशोधन । त्यांचे चिरंजीव श्रीगजानन । जरूर तितुकें मज देती ॥८॥</p>
<p>
	अण्णासाहेब काटकसरी । व्यर्थ  न जाऊं देती चिठोरीं । काम करिती कलाकुसरीं । स्वभाव यापरी तयांचा ॥९॥</p>
<p>
	लिहिती अध्याय चिठोर्‍यांवरी । तींच देती मुद्रकाकरीं । वाउगी खर्च खुपे अंतरीं । तयांची सरी न ये कवणा ॥१०॥</p>
<p>
	निर्जीव बापुडीं तीं चिठोरीं । करुणा उपजे तयांच्या अंतरीं । हीं उद्धरतील कवणेपरी । संतकेसरीसेवेविण ॥११॥</p>
<p>
	वाटे आलेंसें हेमाडजीवा । करिती चिठोर्‍यांचा मेळावा । तत्करवीं करविती सेवा । असावा उदात्त हेतु हा ॥१२॥</p>
<p>
	अंतिमाध्यायाची तीच परी । लिहिला असे चिठोर्‍यावरी । मनन केलें बहुतीं परी । अवतरणिका तदंतरीं मिळेना ॥१३॥</p>
<p>
	गजाननरावादिकां मात कथिली । बाबासाहेबांसही तीच निवेदिली  । त्या सर्वांची सल्ला पडली । पाहिजे घडली अवतरणिका ॥१४॥</p>
<p>
	बाबासाहेब मुदत घालिती । श्रीसाईलीलेंत प्रसिद्ध करिती । मुदतीचे दिवस संपूनि जाती । तरी अवतरणिका अवतरेना ॥१५॥</p>
<p>
	हेमाडा गोविंद सद्नुणखाणी । तन्मुखीं वेदान्त भरी पाणी । ग्रंथीं प्रकटे प्रसादवाणी । अद्भुत करणी गुरुकृपेची ॥१६॥</p>
<p>
	सद्रुरु साईभक्त अनंत । त्यांत कविरत्न हेमाडपंत । तत्सम असेल जो प्रज्ञावंत । तोचि महंत करणार ती ॥१७॥</p>
<p>
	कुठूनचि अवतरणिका अवतरेना । खिन्नत्व आलें माझिया मना । केली दत्तगुरूंची प्रार्थना । भाकिली करुणा तयांची ॥१८॥</p>
<p>
	मी पामर बुद्धिमंद । नसे विचार विद्यागंध । कैसा येईल मज ओवीप्रबंध । कवित्वअंध मी मूळचा ॥१९॥</p>
<p>
	परी यास असे एक आधारू । सानुकूल जैं श्रीदत्तगुरू । मशकाकरवीं उचलविती मेरू । अधिकार थोरू तयांचा ॥२०॥</p>
<p>
	पुनश्च प्रार्थीं उमारमणा । कृपा उपजे साईनारायणा । करीं मम मतीसी प्रेरणा । अवतरणिकालेखना सत्वरीं ॥२१॥</p>
<p>
	शक्ति नसे कवित्व कराया । माझें मतिमांद्य जाणे श्रीगुरुराया । घालूनि नती त्याचिया पायां । प्रवर्तें घडाया अवतरणिका ॥२२॥</p>
<p>
	अवतरणिका ग्रंथ - खंड । करणार साई वक्रतुंड । तयाचें वैभव अद्भुत प्रचंड । माझें तोंड निमित्तमात्र ॥२३॥</p>
<p>
	‘प्रथमाध्यायीं’ मंगलाचरण । विन्घहर्ता विश्वादिकारण । गौरीशंकर कंठमंडन । श्रीगजवदन नमियेला ॥२४॥</p>
<p>
	जी अभिनव वाग्विलासिनी । चातुर्यकलाकामिनी । ती श्रीशारदा विश्वमोहिनी । इष्टार्थदायिनी नमियेली ॥२५॥</p>
<p>
	कुलगुरु आप्तेष्ट गुरुजन । सगुणावतार संतसज्जन । शरण्य सद्नुरु कैवल्यनिधान । साईभगवान नमियेले ॥२६॥</p>
<p>
	गोधूमपेषण कथा सांगोन । महामारी - पूर्णोपशमन । कैसें केलें तें विशद करून । साईसामर्थ्य वर्णिलें ॥२७॥</p>
<p>
	प्रस्तुत ग्रंथप्रयोजन । हेमाडपंत नामकरण । गुर्वनवश्यकता - विवादखंडन । दर्शन हेमाडा ‘द्वितीयाध्यायीं’ ॥२८॥</p>
<p>
	ग्रंथलेखन । अनुज्ञापन । कैसें आलें साईमुखांतून । रोहिल्याचें वृत्तकथन । केलें संपूर्ण ‘तृतीयाध्यायीं’ ॥२९॥</p>
<p>
	जगच्चालक - कंठाभरण । साधुसंतांचें अवतरण । भूमंडळीं किंकारण । केलें विवरण विस्तारें ॥३०॥</p>
<p>
	दत्तावतार अत्रिनंदन । साई साक्षाद्धरिचंदन । शिरडी क्षेत्रीं प्रथमागमन । वर्णन समग्र ‘चतुर्थीं’ ॥३१॥</p>
<p>
	शिरडी क्षेत्रीं गुप्त होऊन । पुनश्च तेथें प्रकटन । सकलां केलें विस्मयापन्न । सधन पाटलासमवेत ॥३२॥</p>
<p>
	गंगागीरादि संतसंमेलन । स्वशिरीं वाहूनि दूरचें जीवन । कैसें निर्माण केलें उद्यान । निरूपण समस्त ‘पंचमीं’ ॥३३॥</p>
<p>
	रामनवमी उत्सव थोर । बाळा बोवा कीर्तनकार । मशीदमाईजीर्णोद्धार । कथन सविस्तर ‘षष्ठाध्यायीं’ ॥३४॥</p>
<p>
	बाबांचा समाधिखंडयोग । धोती पोती इत्यादि प्रयोग । बाबा हिंदु कीं यवन ढोंग । संतांतरंग अगाध ॥३५॥</p>
<p>
	बाबांचा पेहराव वर्तन दवा । चिलीम जाती धुनी दिवा । त्यांचा आजार त्यांची सेवा । अगम्य देखावा अवघाचि ॥३६॥</p>
<p>
	भागोजी शिंद्याची महाव्याधी । खापर्डेसुत ग्रंथिज्वरौषधी । नाना पंढरीदर्शनबुद्धि । कथिती सुधी ‘सप्तमीं’ ॥३७॥</p>
<p>
	नरजन्माचें अपूर्व महिमान । साईभैक्ष्यवृत्तिवर्णन । बायजाबाईंचें संतसेवन । भोजनविंदान बाबांचें ॥३८॥</p>
<p>
	बाबा तात्या म्हाळसापती । रात्रीं तिघे मशिदींत निजती । बाबांची आगळी प्रीती । दोघांवरती समसमान ॥३९॥</p>
<p>
	राहते ग्रामींचे खुशालचंद् । बाबा शांति - ज्ञान - कंद । परस्परांचा प्रेमसंबंध । निरूपणानंद ‘अष्टमाध्यायीं’ ॥४०॥</p>
<p>
	तात्यासाहेब नूलकर । तात्या पाटील भक्तवर । एकांग्लभौम गृहस्थ थोर । प्रायश्चित्त घोर आज्ञाभंगाचें ॥४१॥</p>
<p>
	पंचमहायज्ञ करवून । बाबा करीत भिक्षान्नसेवन । भिक्षाधिकारसंपन्न लक्षण । करिती वर्णन चातुर्यें ॥४२॥</p>
<p>
	बाबासाहेब  तर्खड श्रेष्ठ । कट्टे प्रार्थनासमाजिष्ट । बनले साईभक्तैकनिष्ठ । कथा उत्कृष्ट ‘नवमाध्यायीं’ ॥४३॥</p>
<p>
	लांब अवघी हात चार । रुंद तशीच वीतभर । आढयास टांगिलेल्या फळीवर । शयन योगेश्वर बाबांचें ॥४४॥</p>
<p>
	केव्हां शिरडींत पद पडलें । किती वर्षें वास्तव्य झालें । देहावसान कधीं घडलें । केलें निरूपण ह्रदयंगम ॥४५॥</p>
<p>
	अंतरीं शांत निरिच्छस्थिती । बाहेर दावीत पिशाचवृत्ती । लोकसंग्रह नित्य चित्तीं । अढळ प्रवृत्ती गुरुरायांची ॥४६॥</p>
<p>
	वेदशास्त्र - धर्मलक्षण । परमार्थ आणि व्यवहार शिक्षण । भक्ताभक्त - चित्तपरीक्षण । हतवटी विलक्षण सद्नुरूंची ॥४७॥</p>
<p>
	बाबांचें आसन बाबांचें ज्ञान । बाबांचें ध्यान बाबांचें स्थान । त्यांचें सामर्थ्य आणि महिमान । कथन संपूर्ण ‘दशमाध्यायीं’ ॥४८॥</p>
<p>
	सच्चिदानंदस्वरूपस्थिती । दिगंत बाबांची प्रख्याती । डॉक्टर पंडितांची प्रेमभक्ति । सिदिकवृत्ती वर्णियेली ॥४९॥</p>
<p>
	कैसें केलें अभ्राकर्षण । कैसी अनिलीं सत्ता विलक्षण । अनलापासूनि संरक्षण । सुरस विवरण ‘एकादशीं’ ॥५०॥</p>
<p>
	काका धुमाळ, निमोणकर । एक मामलेदार एक डॉक्टर । प्रसंग भिन्न भिन्न प्रकार । वर्णिले मधुर वाणीनें ॥५१॥</p>
<p>
	नाशिक अग्निहोत्री मुळे संशयी । संत घोलप रामानुयायी । त्यांची साईदर्शननवलाई । ‘द्वादशाध्यायीं’ निरूपिली ॥५२॥</p>
<p>
	बाळाशिंपी - हिमज्वरनाशन । केलें कृष्णश्वाना दध्योदन देऊन । बापूसाहेब - महामारी - शमन । केलें चारून आक्रोड पिस्ते ॥५३॥</p>
<p>
	आळंदी स्वामी कर्णरोगी । आशीर्वचनेंचि केले निरोगी । जुलाब पीडा काका भोगी । नाशिली भुईमुगीदाण्यांनीं ॥५४॥</p>
<p>
	हर्द्याचे भक्त दत्तोपंत । पोटशूळव्याधिग्रस्त । आशीर्वादेंचि केले मुक्त । समस्त जनांदेखत ॥५५॥</p>
<p>
	एका मीमाजी पाटलाला । कफक्षयाचा व्याधी जडला । उदी लावूनि रोग दवडिला । वृत्तांत वर्णिला ‘त्रयोदशीं’ ॥५६॥</p>
<p>
	नांदेडचे शेट रतनजी पारसी । विख्यात व्यापारी खिन्न मानसीं । पुत्रसंतान देऊनि त्यांसी । हर्षाकाशीं बैसविलें ॥५७॥</p>
<p>
	मौलीसाहेब गुप्त संत । नांदेड शहरीं हमाली करीत । साईसंकेतवचें ज्ञात होत । कथा अद्भुत ‘चतुर्दशीं’ ॥५८॥</p>
<p>
	नारदीय कीर्तनपद्धती । कथिती बाबा दासगणूप्रती । चोळकरांचें फेडूनि घेती । व्रत चहा सिता त्यां पाजुनी ॥५९॥</p>
<p>
	औरंगबादेहूनि पल्ली आली । मशीदींतील पल्लीस भेटली । चुकचुकण्यावरूनि वार्ता कथिली । कथा निरूपिली ‘पंचदशीं’ ॥६०॥</p>
<p>
	संततिसंपत्तिसंपन्न । साईयशोदुंदुभि परिसोन । एक गृहस्थ शिरडीलागून । आले ब्रम्हाज्ञानप्राप्त्यर्थ ॥६१॥</p>
<p>
	जो इच्छी ब्रम्हाप्राप्ति । त्यासी होआवी संसारविरक्ति । सुटली पाहिजे धनासक्ति । प्रथम चित्तीं तयाच्या ॥६२॥</p>
<p>
	पांच रुपयांची उसनवारी । ज्या न देववे बाबां क्षणभरी । नोटा असूनि वस्त्रांतरीं । कवणेपरी त्या ब्रम्हा मिळे ॥६३॥</p>
<p>
	साईबोधशैली सुंदरा । हेमाडांची प्रसाद - गिरा । संयोग जैसा पय - शर्करा । कथा मनोहरा ‘षोडशीं’ ॥६४॥</p>
<p>
	पूर्वकर्थचेंच अनुसंधान । ब्रम्हाज्ञान - विस्तारकथन । धनलोभ याचें नि:संतान । वर्णन मधुर ‘सप्तदशीं’ ॥६५॥</p>
<p>
	साठयांची गुरुचरित्रकथा । राधाबाईंची उपदेशवार्ता । हेमाडांची अनुग्रहता । कथनकुशलता ‘अष्टादशीं’ ॥६६॥</p>
<p>
	अनुग्रहकथेचा विस्तार । साई - श्रीबोधानुसार । केला असे फार फार । विचार ‘एकोनविंशतीं ॥६७॥</p>
<p>
	‘ईशावास्य - भावार्थबोधिनी’ । प्रारंभिली दासगणूंनीं’ । त्यांत शंका उपजली मनीं । पुसिली त्यांनीं बाबांना ॥६८॥</p>
<p>
	बाबा म्हणती मोलकरीण । करील काकांची तन्निवारण । सद्नुरुमहिमा असाधारण । गोड निरूपण ‘विंशतीं’ ॥६९॥</p>
<p>
	एक प्रांताधिकारी सुलक्षण । दुसरे पाटणकर विचक्षण । तिसरे एक वकील विलक्षण । अनुग्रहण तिघांचें ‘एकविंशतीं’ ॥७०॥</p>
<p>
	मशीदमाई भवतारका । तीच द्वारावती द्वारका । बाबा कथिती सकल लोकां । भावार्थ एकाही नकळे ॥७१॥</p>
<p>
	मशीदमाईचे गुण वानिती । मिरीकर, बुट्टींचें अहिदंश टाळिती । अमीर सक्कराचा वात हरिती । वारिती अहिमय तयाचें ॥७२॥</p>
<p>
	हेमाड वृश्चिकदंश - संकट । इतरांवरचें उरगारिष्ट । निवारीत अपमृत्यु दुर्घट । प्रसंग प्रकट ‘द्वाविंशतीं’ ॥७३॥</p>
<p>
	योगाभ्यासियाचें शंकानिरसन । माधवरावांचें अहिदंशनिवारण । धुनीं, इंधन, अजाहनन । वर्णन केलें अतिरम्य ॥७४॥</p>
<p>
	बडेबाबाची बडेजाव । गुर्वाज्ञानिष्ठा - अभाव । किती दिलें तरी बहु हाव । अतृप्त स्वभाव मूळचा ॥७५॥</p>
<p>
	काकासाहेब भक्तश्रेष्ठा । गुर्वाज्ञीं परमैकनिष्ठ । सद्नुरुलीलाकथन विशिष्ट । केलें उत्कृष्ट ‘त्रयोविंशतीं’ ॥७६॥</p>
<p>
	फुटाण्याचें निमित्त करून । हेमाडपंतां देती शिकवण । सद्नुरुस्मरण केलियावीण । विषयसेवन न करावा ॥७७॥</p>
<p>
	अण्णा बाबरे व मावशीबाई । कलह दोघांत लाविती साई । त्या विनोदमस्करीची नवाई । गाई कविवर्य ‘चतुर्विंशतीं’ ॥७८॥</p>
<p>
	भक्त दामूअण्णा कासार । अहमदनगरचे राहाणार । करूं इच्छिती फार थोर । व्यापार कापूस - तांदुळांचा ॥७९॥</p>
<p>
	उद्यमीं होईल हानी सत्य । आम्रफलसेवनीं प्राप्त अपत्य । वदती साई ज्ञानादित्य । निरूपण कृत्य ‘पंचविंशतीं’ ॥८०॥</p>
<p>
	भक्त एक नामें ‘पंत’ । अन्य संतानुग्रहीत । पटवूनि दिली त्यां खूण त्वरित । पंत प्रमोदित जाहले ॥८१॥</p>
<p>
	हरिश्चंद्र पितळे भक्त । तदीय तनय अपस्मारग्रस्त । कृपावलोकनेंचि समस्त । रोग अस्त पावला ॥८२॥</p>
<p>
	दिले पितळ्यांस रुपये तीन । म्हणती पूर्वीं दिले दोन । बाबा वदती करीं पूजन । रुचिर कथन ‘षड्‌विंशतीं’ ॥८३॥</p>
<p>
	भागवत पोथी हातीं देऊन । आपण घ्यावी प्रसाद म्हणून । देती काका इच्छा धरून । भगवान देत ती माधवा ॥८४॥</p>
<p>
	विष्णुसहस्रनामाची पोथी । एका रामदाश्याचे पोथ्यांत होती । त्या न कळत बाबा घेती । तीही देती माधवरावा ॥८५॥</p>
<p>
	विष्णुसहस्रनामाची पोथी देऊन । शामरावावर अनुग्रहण । कैसे करिती साई दयाघन । कथानिरूपण ‘सप्तविंशतीं’ ॥८६॥</p>
<p>
	भक्त लखमीचंद् मुनशी । चिडीबाई बर्‍हाणपुरवासी । मेघा ब्राम्हाण पुण्यराशी । पातले चरणांसी बाबांच्या ॥८७॥</p>
<p>
	स्वप्नीं देऊनि सर्वां द्दष्टान्त । देत त्याची प्रचीत जागरांत । सद्नुरुमाउलीची अगम्य मात । प्रेमें कथित ‘अष्टाविंशतीं’ ॥८८॥</p>
<p>
	मद्रदेशींचा भजनी मेळा । शिरडी क्षेत्रीं झाला गोळा । बघाया दानौदार्य सोहळा । भोळा शंकर बाबांचा ॥८९॥</p>
<p>
	रघुनाथराव तेंडुलकर  । तत्तनय परीक्षा प्रकार । त्यांची पेनसनचिंता दूर । मनोहर लीला बबांची ॥९०॥</p>
<p>
	भक्त डॉक्टर कँप्टन हाते । साईचरणीं प्रेम मोठें । दिलें स्वप्नदर्शन पहांटे । कथानक गोमटें ‘एकोनत्रिंशतीं’ ॥९१॥</p>
<p>
	सप्तशृंगीदेवीउपासक । कोणी काकाजी वैद्यनामक । देवी देत त्या द्दष्टान्त एक । संतनायक साई पहावे ॥९२॥</p>
<p>
	शामरावानें त्याच देवीस । केला होता एक नवस । शामा नवस फेडाया वणीस । जाई तीस वर्षांनीं ॥९३॥</p>
<p>
	राहत्याचे शेठ चंदखुशाल । पंजाबी ब्राम्हाण रामलाल । स्वप्नीं दोघां “शिरडीस चल” । हे साईबोल कथन ‘त्रिंशतीं’ ॥९४॥</p>
<p>
	विजयानंद यति मद्रासी । निघे जावया सरस - मानसीं । ठेवूनि घेतला निजपदापाशीं । श्रीह्रषीकेशी बाबांनीं ॥९५॥</p>
<p>
	भक्तशार्दूल मानकर । साईपदांबुज - मधुकर । हिंस्रक्रूरव्याघ्रोद्धार । कथन सुंदर ‘एकत्रिंशतीं’ ॥९६॥</p>
<p>
	आम्ही चौघे सज्जन संत । देव शोधार्थ रानीं हिंडत । मी होतांच अभिमानगलित । दर्शन देत मज गुरुराय ॥९७॥</p>
<p>
	उपोषण करणार गोकलेबाई । अशीच दुजी कथा साई । सांगत स्वमुखें त्याची नवाई । हेमाड गाई ‘द्वात्रिंशतीं’ ॥९८॥</p>
<p>
	नारायण जानीचे मित्रास । जाहला एकाएकीं वृश्चिकदंश । एका भक्ताचे कन्यकेस । दिधला त्रास ज्वरानें ॥९९॥</p>
<p>
	चांदोरकरसुतेस भारी । प्रसूतिवेदना करी घाबरी । जानी स्वत: दु:खित अंतरीं । तिळभरी सुचेना कोणाला ॥१००॥</p>
<p>
	कुलकर्णीसाहेब भक्तवर । बाळाबुवा भजनकार । उदीप्रभाव बलवत्तर । कळला खरोखर सर्वांना ॥१०१॥</p>
<p>
	भक्त हरीभाऊ  कर्णीक । श्रद्धावंत आणि भाविक । त्यांच्या दक्षिणेची कथा मोहक । बोधप्रदायक ‘त्रयस्त्रिंशतीं’ ॥१०२॥</p>
<p>
	मालेगांबचे एक डॉक्टर । पुतण्या हाडयाव्रणें अति जर्जर । पिल्ले डॉक्टर भक्तप्रवर । पीडित दुर्धर नारूनें ॥१०३॥</p>
<p>
	बापाजी श्रीशिरडीकर । ग्रंथिज्वरें कुटुंब जर्जर । एक इराणी लहान पोर । व्यथित घोर आंकडीनें ॥१०४॥</p>
<p>
	ह्रर्द्याचे एक गृहस्थ । मूतखडयानें अत्यावस्थ । मुंबईचे एक प्रभु कायस्थ । कुटुंब ग्रस्त प्रसूतिरोगें ॥१०५॥</p>
<p>
	उपरिनिर्दिष्ट व्याध्युच्चाटन । केवळ उदीस्पर्शेंकरून । झालें न लागतां क्षण । निरूपण रसाळ ‘चतुस्त्रिंशतीं’ ॥१०६॥</p>
<p>
	महाजनींचे मित्र एक । निर्गुणाचे पूर्ण भजक । ते बनले मूर्तिपूजक । दर्शनैकमात्रेंकरूनि ॥१०७॥</p>
<p>
	दरमसी जेठाभाई ठक्कर । मुंबईचे एक सॉइसिटर । सबीज द्राक्षें निर्बीज सत्वर । करूनि गुरुवर त्या देती ॥१०८॥</p>
<p>
	वांद्याचे एक कायस्थ । त्यां नीद न ये स्वस्थ । बाळा पाटील नेवासस्थ । उदीप्रचीत ‘पंचत्रिंशतीं’ ॥१०९॥</p>
<p>
	गोमांतकस्थ गृहस्थ दोन । नवस करिती भिन्न भिन्न । एक सेवावृत्तीलागून । दुजा स्तेनशोधार्थ ॥११०॥</p>
<p>
	दोघांनाही नवसविस्मृती । साई समर्थ देती स्मृती । त्रिकालज्ञान ब्रम्हांडव्याप्ती । कीर्तिकोण वर्णील ॥१११॥</p>
<p>
	औरंगाबाद सखारामजाया । पुत्रार्थ धांवे साईंचे पायां । इच्छापूर्ति श्रीफळ देऊनियां । कथन कथाशया ‘षटत्रिंशतीं’ ॥११२॥</p>
<p>
	चावडी - समारंभ सोहळा । इतरत्र पाहण्या मिळे विरळा । हेमाड वर्णिती पाहूनि डोळां । कथा रसाळा ‘सप्तत्रिंशतीं’ ॥११३॥</p>
<p>
	हंडीमाजी पदार्थ भिन्न । शिजवूनि करिती नाना पव्कान्न । देती सर्वां प्रसादभोजन । वर्णन मनोहर ‘अष्टत्रिंशतीं’ ॥११४॥</p>
<p>
	“तद्विद्धि प्रणिपातेन” । या गीताश्लोकाचें विवरण । सांगती चांदोरकरांलागून । संस्कृताभिमान हरावया ॥११५॥</p>
<p>
	द्दष्टान्त देऊनि संतनृपती । बापूसाहेब बुट्टींप्रती । मंदिर बांधण्या आज्ञापिती । ‘एकोनचत्वारिंशतीं’ वृत्तांत्त ॥११६॥</p>
<p>
	मातु:श्रीचें व्रतोद्यापन । देव घालिती ब्राम्हाणभोजन । बाबांस देती निमंत्रण । पत्रलेखन । करूनियां ॥११७॥</p>
<p>
	यतिवेष धारण करून । तद्दिनीं येती विभूती तीन । ब्राम्हाणांसमवेत जाती जेवून । न कळे विंदान गुरुरायाचें ॥११८॥</p>
<p>
	द्दष्टान्त देऊनि हेमाडास । बाबा येती भोजनास । छबीरूपीं धरूनि वेष । वर्णन सुरस ‘चत्वारिंशतीं’ ॥११९॥</p>
<p>
	छबीचीच कथा विस्तारून । सांगती कवी भक्तांलागून । सद्नुरूचें अतर्क्य महिमान । निरूपण रमणीय रसाळ ॥१२०॥</p>
<p>
	धारण करूनि रुद्रावतार । होती लाल खदिरांगार । करिती गाळींचा भडिमार । क्रोधें देवांवर श्रीसाई ॥१२१॥</p>
<p>
	“नित्य नेमें श्रीज्ञानेश्वरी । वाच” म्हणती साई श्रीहरी । स्वप्नीं कथिती वाचनाची परी । हेमाड विवरी ‘एकचत्वारिंशतीं’ ॥१२२॥</p>
<p>
	भक्त दात्यांची त्रिपुंड्रलेपना । साईनिधन - पूर्वसूचना । चुकविलें रामचंद्रनिधना ।  तैसेंच मरणा तात्यांच्या ॥१२३॥</p>
<p>
	साईसद्नुरु - निर्याणवार्ता । उपजवी श्रोतयां उद्विग्नता । व्याकुल करी हेमाडचित्ता । कथा पुनीता ‘द्विचत्वारिंशतीं’ ॥१२४॥</p>
<p>
	बाबांचा निधनवृत्तांत । पूर्वाध्यायीं अपूर्ण निभ्रांत । तोचि संपूर्ण हेमाडपंत । करीत ‘त्रिचतुश्चत्वारिंशतीं’ ॥१२५॥</p>
<p>
	एकदां काकासाहेब दीक्षित । काका व माधवासमवेत । वाचीत असतां नाथ भागवत । शंकित मानसीं जाहले ॥१२६॥</p>
<p>
	माधवराव शंका निरसित । समाधान न पवे दीक्षितचित्त । आनंदराव पाखाडे स्वप्न कथीत । करीत निरसन शंकेचें ॥१२७॥</p>
<p>
	आढयास टांगिल्या फळीवरी । म्हाळसापती कां न निद्रा करी । साई समर्थ शंका निवारी । कथाकुसरी ‘पंचचत्वारिंशतीं’ ॥१२८॥</p>
<p>
	जागींच बैसूनि अटन सर्वत्र । दावीत जनां चमत्कृतिसत्र । काशी गया गमन विचित्र । अद्भुत चरित्र बाबांचें ॥१२९॥</p>
<p>
	चांदोरकरसूनु लग्न - पर्वणी । शामास जाण्या कथी संतमणी । शामा देखे बाबा ईक्षणीं । गयापट्टणीं छबिरूपें ॥१३०॥</p>
<p>
	अजद्वय - पूर्वजन्मकथन । करिती स्वमुखें साईत्रिनयन । रम्य मधुर पवित्र गहन । कथावर्णन । ‘षट्‌चत्वारिंशतीं’ ॥१३१॥</p>
<p>
	ऐसीच एक अहिमंडुकांची । किंवा लोभी धनको - रिणकोची । पूर्वपीठिका कथिती साची । साई विरिंची हरि - हर ॥१३२॥</p>
<p>
	वैर हत्या आणि ऋण । फेडण्याकारणें पुनर्जनन । करविती बाबा कथामृतपान । ह्रद्य कथन ‘सप्तचत्वारिंशतीं’ ॥१३३॥</p>
<p>
	एक शेवडे भक्तप्रवर । एक अभाविक सपटणेकर । एकाचा वकिली परीक्षाप्रकार । कृपा दुज्यावर ‘अष्टचत्वारिंशतीं’ ॥१३४॥</p>
<p>
	हरी कान्होबा मुंबईनिवासी । स्वामी सोमदेव कुटिल मानसीं । संतपरीक्षणार्थ श्रीशैलधीसी । आले अभिमानासी धरूनियां ॥१३५॥</p>
<p>
	दर्शनखेवों मनोगत कथिलें । दोघे तत्काळ लज्जित झाले । साईचरणीं चित्त वेधलें । पाप निमालें जन्मांतरींचें ॥१३६॥</p>
<p>
	बाबांसन्निध बैसले असतां । स्त्रीरूप देखूनि विकारवशता । उपजे चांदोरकरांचे चित्ता । वर्णिली वार्ता ‘एकोनपंचाशतीं’ ॥१३७॥</p>
<p>
	“तद्विद्धि प्रणिपातेन” । याचाच अर्थ विस्तारून । करिती त्याचेंच समर्थन । रघुनाथनंदन ‘पंचाशतीं’ ॥१३८॥</p>
<p>
	दीक्षित हरी सीताराम । भक्त धुरंधर बाळाराम । नांदेड वकील पुंडलीक नाम । शिरडी प्रथम पातले कैसे ॥१३९॥</p>
<p>
	एकेकाची कथा अद्भुत । श्रवणीं श्रोते होत विस्मित । भक्तमनोदधि उचंबळत । वृत्त वर्णिती ‘एकपंचाशतीं’ ॥१४०॥</p>
<p>
	करूनि ग्रंथसिंहावलोकन । मागूनि घेत पसायदान । खलांचें खलत्व घालवून । सज्जनसंरक्षण करावें ॥१४१॥</p>
<p>
	सद्नुरुचरणीं लीन होऊन । मस्तक लेखणी अर्पण करून । सर्व ग्रंथ संपवून । कृतार्थ लेखन ‘द्विपंचाशतीं’ ॥१४२॥</p>
<p>
	एवं श्रीसाईसच्चरिताध्याय । पूर्ण करिती गोविंदराय । प्रेमें वंदूनि त्यांचे पाय । नमितों गुरुमाय विश्वाची ॥१४३॥</p>
<p>
	अध्यायाध्यायसार - कथिका । तिलाच वदती अवतरणिका । कैवल्यपुरीची सत्पथिका । मुमुक्षुरसिकां जी होय ॥१४४॥</p>
<p>
	शेल्यास रकटयाचा पदर । म्हणूनि करितील अव्हेर । परी दासविनती एकवार । चतुर श्रोतीं परिसावी ॥१४५॥</p>
<p>
	शेला ना शिशु गोंडस नीट । बांधावी ना वाईट दीठ । अवतरणिका ही काळी तीट । बाळ धीट त्या लावी ॥१४६॥</p>
<p>
	ग्रंथ सुंदर षड्रस अन्न । अध्यायार्थ पदार्थ भिन्न । अशेष - पचना तक्रपान । तद्वत लेखन अवतरणिका ॥१४७॥</p>
<p>
	ग्रंथ सुरभि सदाफला । अध्यायपद्धती । पंत हेमाड जी आचरिती । ती कथितों यथामती । सादर श्रोतीं परिसावी ॥१४९॥</p>
<p>
	प्रथमारंभीं सद्नुरुस्तवन । नंतर करिती वेदान्त - निरूपण । साई ब्रम्हास्वरूप वर्णन । अनुभवकथन तदनंतर ॥१५०॥</p>
<p>
	मूळचेच हेमाड व्युत्पन्न । त्यांत सद्नुरुसाई प्रसन्न । तत्क्षणीं केलें प्रतिभासंपन्न । ग्रंथ - पव्कान्न निर्मावया ॥१५१॥</p>
<p>
	जैं अनुभवितील याची गोडी । बंद तैंच जन्ममरणनाडी । निर्वाणपदाची वतनवाडी । अक्षय्य जोडी मिळेल ॥१५२॥</p>
<p>
	हेमाडांची रसाळ वाचा । साईप्रसादलाभ साचा । योग पय - इक्षु - रसाचा । ग्रंथाचा थाट काय वानावा ॥१५३॥</p>
<p>
	असतील बहुत ग्रंथकार । न ये प्रसादवाणीचा अधिकार । जैं लाधे सद्नुरु साचार । विश्वाधार रमापति ॥१५४॥</p>
<p>
	जरी केलें विद्याध्ययन । न निपजे ऐसें ग्रंथलेखन । सद्नुरुकृपेवांचून । सत्य वचन त्रिवार ॥१५५॥</p>
<p>
	कोण वानील श्रीसाईसच्चरिता । किती अनुपम ग्रंथयोग्यता । लाधला हेमाडपंतासम कर्ता । परम सौभाग्यता मुमुक्षूंची ॥१५६॥</p>
<p>
	यावत् ग्रंथ महीतळीं । तावत्  कीर्ति भूमंडळीं । गोविंदरायें केली दिवाळी । वेळींच मुमुक्षूंकारणें ॥१५७॥</p>
<p>
	ग्रंथ बाप धन्य धन्य । साईसद्नुरुप्रसादजन्य । मुमुक्षुजीवां होईल मान्य । विचारदैन्य फेडील ॥१५८॥</p>
<p>
	अनंतजन्मींचा सुकृतठेवा । म्हणूनि घडली साईसेवा । मिळाला मधुर गोविंदरावा । मेवा ग्रंथलेखनाचा ॥१५९॥</p>
<p>
	पंत हेमाड कट्टे भक्त । कवि वेदांतविद्यासक्त । साईसद्नुरुपदानुरक्त । दिवानक्त असती कीं ॥१६०॥</p>
<p>
	वेदान्तविषय अति गहन । विरक्ति - भक्तिज्ञान जोड देऊन । ऐसा ग्रंथ करणें निर्माण । गुरुकृपेवीण दुर्घट ॥१६१॥</p>
<p>
	अध्याय नव्हत हीं हेमकोंदणें । जडिलीं त्यांत कथा - अमोलरत्नें । त्यांतील अर्थप्रभाकिरणें । महाप्रयत्नें गोविंदरायें ॥१६२॥</p>
<p>
	नाना अध्याय सुगंध सुमनमाळा । अर्पीतसे श्रीसाईसद्नुरुगळां । गोविंद - मती प्रेमळ बाळा । निर्मळभावेंकरूनी ॥१६३॥</p>
<p>
	नाना अध्याय शुद्ध हेमकुंभ । त्यांत श्रीसाईसच्चरित गंगांस । भरूनि ठेविती रघुनाथडिंभ । मुमुक्षुदंभ दवडावया ॥१६४॥</p>
<p>
	नानाग्रंथरणांगण नभ । उभविती अध्याय यशस्तंभ । मर्दूनि असुर दर्पाभिमानंदभ । रघुनाथडिंभमतिखङ्गें ॥१६५॥</p>
<p>
	ग्रंथ रत्नजडित पंचारती । अध्यायकथार्थ स्नेहसूत्रज्योती । विरक्ति शांति घेऊनि येती । संतनृपती ओंवाळण्या ॥१६६॥</p>
<p>
	ग्रंथमाया विश्वमोहिनी । अध्याय बाहू उंच उभवुनी । कथार्थ - केय़ूर काय शृंगारुनी । सज्ज आलिंगनीं साई ब्रम्हा ॥१६७॥</p>
<p>
	साई सच्चरित ग्रंथसम्राट । अध्याय रम्य चतुर भाट । श्रद्धा ज्ञान वेदान्त थाट । वैभव अफाट वानिताती ॥१६८॥</p>
<p>
	साईसच्चरित परमार्थ - हाट । एकेक अध्याय त्यांतील पेठ । अनुभवकथा वस्तु दाट । रचिल्या नीट कविवर्यें ॥१६९॥</p>
<p>
	ग्रंथ गंगपात्र विराट । अध्यायरचना सुबक घाट । कथारसामृतप्रवाह अचाट । सामर्थ्य अफाट गुरुकृपेचें ॥१७०॥</p>
<p>
	ग्रंथ नव्हे हा कल्पवृक्ष । संसारजनां वाटे रुक्ष । मुमुक्षुभाविकां केवळ मोक्ष । अनुभव प्रत्यक्ष पहावा ॥१७१॥</p>
<p>
	यासचि म्हणावें खरें स्मारक । जें संसृतितमतापहारक । मोहमायानिरयतारक । शांतिदायक अक्षय्य ॥१७२॥</p>
<p>
	ग्रंथकार राव गोविंद । साईसद्नुरुपदारविंद । नित्य नवा मधु मकरंद । चाखीत मिलिंद होऊनी ॥१७३॥</p>
<p>
	उपनाम जयांचें ‘दाभोलकर’ । आंग्लप्रभुसेवातत्पर । विद्या विनय आचार - विचार । अधिकारसंपन्न जे असती ॥१७४॥</p>
<p>
	रखुमाबाई तयांची गृहिणी । सुशील भाविक सद्नुणखाणी । पतिपरायण विनतवाणी । साईचरणीं द्दढभाव ॥१७५॥</p>
<p>
	वेंगुर्ल्यासन्निध ‘दापोली’ । मूळवस्ती तेथ जाहली । ‘केळवें’ ग्रामीं नंतर केली । वस्ती वांडवडिलीं कवींच्या ॥१७६॥</p>
<p>
	शके सतराशें एक्यायशीं । शुक्ल पंचमी मृगशिर - मासीं । रघुनाथमार्या लक्ष्मीच्या कुशीं । जन्मती पुण्यराशी गोविंद ॥१७७॥</p>
<p>
	गौडसारस्वत ब्राम्हाण जाती । गोत्र भारद्वाज वय सप्तती । आषाढ शुक्ल नवमी तिथी । दिवंगति अठराशें एकावन्नीं ॥१७८॥</p>
<p>
	शके अठराशें चवेचाळिसीं । ग्रंथ आरंभिला चैत्रमासीं । वावन्नाध्याय । ज्येष्ठमासीं । शाके एकावन्नीं पूर्ण केले ॥१७९॥</p>
<p>
	गोविंदरावां एकचि सुत  । पांच दुहिता, चार विवाहित । सुत विवाहित वैद्यक शिकत । सुता अविवाहित शिके तेंचि ॥१८०॥</p>
<p>
	आतां कथितों पारायणपद्धती । तैसीच सप्ताहाची सुगम रीती । दिधली गुरुचरित्रीं वा अन्य ग्रंथीं । कृपावधान श्रोतीं द्यावें ॥१८१॥</p>
<p>
	चोखट करूनि अंत:करण । भक्तिभावें करावें पारायण । एक, द्वि, वा त्र्यहनीं करावें पूर्ण । साईनारायण तोषेल ॥१८२॥</p>
<p>
	अथवा करावा सप्ताह गोड । मिळेल पुण्यसंपत्तीची जोड । साई पुरवील मनींचें कोड । भवभय मोड होईल ॥१८३॥</p>
<p>
	प्रारंभ करावा गुरुवासरीं । उष:कालीं स्नानानंतरीं । बसावें आपुल्या आसनावरी । उरकुनी सत्वरी नित्यकर्म ॥१८४॥</p>
<p>
	मंडप घालवा रम्य विस्तीर्ण । रंभा, कर्दळी, वसनादि करून । उपरी सुंदर आच्छादन । घालून विभूषित करावा ॥१८५॥</p>
<p>
	त्यांत करावें उच्चासन । भोंवतीं काढाव्या भिन्न भिन्न । रंगवल्लया रंगपूर्ण । नयनसुभग असाव्या ॥१८६॥</p>
<p>
	साईसद्नुरु - प्रतिमा करून । अथवा सुंदर छबी घेऊन । उच्चासनीं ठेवावी जपून । करूनि वंदन प्रेमभावें ॥१८७॥</p>
<p>
	चीनांशुकीं ग्रंथ बांधोनी । सद्नुरुसन्निध त्या ठेवूनि । पंचोपचारें उभयतां पूजुनी । आरंभ वाचनीं करावा ॥१८८॥</p>
<p>
	व्रतस्थ राहावें अष्ट वासर । करावा गोरस वा फलाहार । अथवा भर्जित धान्य प्रकार । नक्त रुचिर वा एकभुक्त ॥१८९॥</p>
<p>
	प्राचीदिशीं मुख करून । सद्नुरुमूर्ती मनीं आठवून । करावें स्वस्थ मनेंकरून । ग्रंथवाचन मोदभरें ॥१९०॥</p>
<p>
	अष्ट, अष्ट, आणि सप्त । अष्ट, षट्, अष्ट, सप्त । एवं पाठ करावा दिन सप्त । अवतरणिका फक्त अष्टमाहनीं ॥१९१॥</p>
<p>
	अष्टमदिनीं व्रतपारणा । करूनि नैवेद्य साईनारायणा । सुग्रास भोजन आप्तेष्ट - ब्राम्हाणां । दक्षिणा यथाशक्ति त्यां द्यावी ॥१९२॥</p>
<p>
	अवंतूनि वैदिक ब्राम्हाणां । करावी निशीं वेदघोषणा । पयशर्करापान संभावना । देऊनि तन्मना निववावें ॥१९३॥</p>
<p>
	अंतीं वंदूनि सद्नुरुचरणां । अर्पावी त्या उचित दक्षिणा । धाडावी ती भांडारभुवना । संस्थाननिधिवर्धनाकारणें ॥१९४॥</p>
<p>
	येणें तोषेल साईभगवान । देईल भक्ता पसायदान । छेदील भवभय - लेलिहान । दावील निधान मोक्षाचें ॥१९५॥</p>
<p>
	श्रोते संत माहेरघर । पडो, पडेल अवतरणिका विसर । द्यावी ग्रंथार्थावर नजर । विनवी किंकर पायांतें ॥१९६॥</p>
<p>
	श्रोते सज्जन कृतांत काळ । असो दासावर दया अढळ । ठेवूनि तुमच्या चरणीं भाळ । प्रार्थी बाळ बाबांचा ॥१९७॥</p>
<p>
	उणें अधिक असेल जें जें । तें तें द्यावें मजला माझें । सार गेऊनि चित्त विराजे । ऐसें कीजे श्रोतीं तुम्हीं ॥१९८॥</p>
<p>
	नमो साई शिवनंदना । नमो साई कमलासना । नमो साई मधुसूदना । पंचवदना साई नमो ॥१९९॥</p>
<p>
	नमो साई अत्रिनंदना । नमो साई पाकशासना । नमो साई निशारमणा । वन्हिनारायणा साई नमो ॥२००॥</p>
<p>
	नमो साई रुक्मिणीवरा । नमो साई चिद्भास्करा । नमो साई ज्ञानसागरा । ज्ञानेश्वरा श्रीसाई नमो ॥२०१॥</p>
<p>
	अवतरणिका वाक्पुष्पांजली । तैसीच नमन - नामावली । प्रार्थी अर्पूनि गुरुपदकमलीं । साईमाउली संतोषो ॥२०२॥</p>
<p>
	इति श्रीसाईसद्नुरुप्रेरिते । दास बाबा बाळविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । अवतरणिका नाम त्रिपंचाशत्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ समाप्तोऽयं ग्रंथ: ॥</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 Apr 2022 15:59:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 Apr 2022 16:01:20 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ५२]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-52-122042900061_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
आतां करूं सिंहावलोकन । तदनंतर ग्रंथ संपूर्ण । करूं अवतरणिका देऊन । सारांश निवेदन ग्रंथाचा ॥१॥
देहीं असतां ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 52" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/29/full/1651228098-9815.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra adhyay 52" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	आतां करूं सिंहावलोकन । तदनंतर ग्रंथ संपूर्ण । करूं अवतरणिका देऊन । सारांश निवेदन ग्रंथाचा ॥१॥</p>
<p>
	देहीं असतां निजभक्तांला । वेळोवेळीं जो अनुभव दिधला । त्याचा ग्रंथ ही “साईलीला” । ग्रंथ लिहविला स्मरणार्थ ॥२॥</p>
<p>
	“साईलीला” परम पवित्र । त्यांतील सच्चरितकथासत्र । वाचा हें निजगुरुचरित्र । इहपरत्रप्रबोधक ॥३॥</p>
<p>
	संग्रहीं ज्या ते असंख्यात । परी व्युत्पत्तिविद्यारहित । करीं धरूनि हेमाडपंत । हें निज सच्चरित लिहविलें ॥४॥</p>
<p>
	कांहीं आपण आपुली ख्याती । स्वमुखें शिष्यां श्रवण करविती । तेही गेलिया निजधामाप्रती । या ग्रंथा स्फूर्ती तैंपासून ॥५॥</p>
<p>
	परोपरीच्या वार्ता गहन । साई जेव्हां करीत कथन । श्रोते होत अत्यंत तल्लीन । भूक तहान विसरत ॥६॥</p>
<p>
	जिंहीं पाहिलें साईस्वरूप । हरले तयांचे त्रिविध ताप । ऐसा ज्यांचा तेज:प्रताप । साद्यंत केवीं वर्णावा ॥७॥</p>
<p>
	ऐसा साई उदारकीर्ति । जे जे लागले त्याच्या भक्तीं । तयांचिया उद्धाराप्रति । ठेविली निजख्याती लिहून ॥८॥</p>
<p>
	गोदावरीचें पवित्र स्नान । पुढें घेवोनियां समाधिदर्शन । करावें हें सच्चरित श्रवण । त्रिताप शमन होतील ॥९॥</p>
<p>
	सहज बोलतां जयाच्या गोष्टी । नकळत पडे परमार्थमिठी । प्रेमें घाला या ग्रंथीं दिठी । पापांच्या कोटी निरसतील ॥१०॥</p>
<p>
	जन्ममरण - यातायाती । चुकवाव्या जे मनें इच्छिती । तिंहीं अखंड स्मरणभक्ति । गुरुपदासक्ति जोडावी ॥११॥</p>
<p>
	प्रमाद मिथ्या ज्ञानाचें कारण । आत्मरूपीं अनवधारण । जेथूनि उद्भवे जनन - मरण । सर्वानर्थ - निदान जें ॥१२॥</p>
<p>
	मोह म्हणजे मिथ्या ज्ञान । अनात्मठायीं आत्माभिमान । तोच मृत्यु विद्वज्जन । लक्षण करितात ॥१३॥</p>
<p>
	साई - कथासागरमंथन । करितां साईकथाकथन । गोडी जिची नित्य नूतन । श्रोत्यांचें अध:पतन चुकेल ॥१४॥</p>
<p>
	साईचें गुणमय स्थाळखरूप । त्याचें करितां ध्यान अमूप । प्रकटेल सूक्ष्मतम आत्मस्वरूप । होऊनि लोप सगुणाचा ॥१५॥</p>
<p>
	न होतां सगुणरूपीं प्रवेश । कळेना आत्म ज्योतीश । परब्रम्हा जें निर्विशेष । दुर्बोध नि:शेष जाणावया ॥१६॥</p>
<p>
	जेणें दावूनि आपुलीं पाउलें । प्रेमें निजभक्त भाविक बळें । देहींच असतां विदेही केलें । परमार्था लाविलें अकळपणें ॥१७॥</p>
<p>
	सागरासी देतां आलिंगन । सरिता विसरते सरितापण । तैसा भक्ता येतां शरण । नुरविसी दुजेपण भक्ताचें ॥१८॥</p>
<p>
	दोनी दीप एक होती । एकमेकां आलिंगन देती । तात्काळ हारपे द्वैतस्थिति । एकचि दीप्ति एकत्वें ॥१९॥</p>
<p>
	कर्पूर सोडूनि त्याची द्दति । सूर्या सोडूनि त्याची दीप्ति । कनका सोडूनि त्याची कांति । राहील कां निश्चिती वेगळी ॥२०॥</p>
<p>
	जैसी सागरीं रिघे सरिता । सागरचि होऊनि ठाके तत्त्वतां । अथवा लवण सागरीं रिघतां । सागरीं समरसता तत्काळ ॥२१॥</p>
<p>
	तेणेंपरी येतां साईपदीं शरण । भक्तांमाजी नुरे दुजेपण । भक्त होती समसमान । त्यागूनि मीपण आपुलें ॥२२॥</p>
<p>
	जागृति स्वप्न अथवा सुषप्ति । तिहींमाजील कवण्याही स्थितीं । जाहलिया साईमय वृत्ति । संसारनिवृत्ति काय दुजी ॥२३॥</p>
<p>
	असो आतां येऊनि लोटांगणासी । हेंचि मागतों पायांपाशीं । तुजवीण अन्यत्र या वांछेसी । जाऊं न देसी एकसरीं ॥२४॥</p>
<p>
	ब्रम्हादिस्तंबपर्यंत । घटमठीं सबाह्य आकाशवत । परिपूर्ण जो सर्व भूतांत । विषमता यक्तिंचित जो नेणे ॥२५॥</p>
<p>
	सकळ भक्त ज्या समसमान । जो नेणे मानावमान । प्रियाप्रिय नेणे जयाचें मन । जया न विषमपण तिळभर ॥२६॥</p>
<p>
	शरण रिघूं त्या साईसमर्था । जो निजस्मरणें दे सर्वार्था । त्याच्या चरणीं अखंड माथा । ठेवूनि कृतार्था होऊं कीं ॥२७॥</p>
<p>
	आतां श्रोते सज्जन भक्तप्रवर । सर्वां माझा नमस्कार । तुम्ही थोर मित्राचार । विनवितों साचार तें परिसा ॥२८॥</p>
<p>
	मासोमासीं काढूनि अवसर । कथा परिसल्या ज्या हा काळवर । त्या जयाच्या, तयाचा विसर । नेदा क्षणभर पडावया ॥२९॥</p>
<p>
	आपण जों जों सप्रेम चित्ता । परिसतां या साईच्या कथा । तों तों मी जो येथील वक्त । तया उल्हासता दे साई ॥३०॥</p>
<p>
	तैसें जैं श्रोते न दत्तावधान । वक्ता न केव्हांही सुप्रसन्न । परस्परांच्या प्रसन्नतेवीण । वाउगा शीण श्रवणाचा ॥३१॥</p>
<p>
	परम दुस्तर भवसागर । उसळती मोहाच्या लाटा अनिवार । आदळती अविचार - तटावर । पाडिती तरुवर धैर्याचे ॥३२॥</p>
<p>
	वाजतो अहंकाराचा वारा । तेणें हा डहुळे सागर सारा । क्रोधद्वेषादि महामगरां । मिळे जैं थारा निर्भयपणें ॥३३॥</p>
<p>
	‘मी माझें’ हा मगर । वासना विकल्प भंवरे अपार । निंदा - असूयादि जेथें तिरस्कार । असंख्य जलचर तळपती ॥३४॥</p>
<p>
	ऐसा जरी हा सागर भयंकर । अगस्तिरूपें प्राशी गुरुवर । तयांचे जे चरणरजकिंकर । तयां न लवमात्र भय त्यांचें ॥३५॥</p>
<p>
	म्हणोनि साई समर्थ सद्नुरु । होऊनियां भवाब्धीचें तारूं । आम्ही जे केवळ कासधरू । त्यां सर्वांस उतरू पैलपार ॥३६॥</p>
<p>
	महादुस्तर हा भवार्णव । करा साई चरणांची नाव । दावील निर्भय पैल ठाव । पहा नवलाव निष्ठेचा ॥३७॥</p>
<p>
	पाळितां या ऐशा व्रता । भासे न संसारदु:ख - तीव्रता । लाभ न अन्य येणेंपरता । सेव्य समर्थता ती हीच ॥३८॥</p>
<p>
	साईचरणीं अत्यंत भक्ती । नयनीं कोंदो साईमूर्ती । साईच दिसो सर्वांभूतीं । ऐसी ही स्थिती भक्तां येवो ॥३९॥</p>
<p>
	होऊनियां स्वच्छंदवर्ती । पूर्वजन्मीं पावलों च्युती । आतां तरी लाभो सद्नती । संगनिर्मुक्ति ये अर्थीं ॥४०॥</p>
<p>
	पाठीसी असतां श्रीसमर्थ ।  कोणीही लावूं न शके हात । ऐसिया निर्धारें जे निर्धास्त । धन्य ते भक्त साईंचे ॥४१॥</p>
<p>
	असो आतां येतें मना । धरूनियां  बाबांच्या चरणां । करावी तयांस एक प्रार्थना । सकल भक्तजनांकारणें ॥४२॥</p>
<p>
	कीं हा ग्रंथ सर्वां घरीं । असावा नित्य पाठांतरीं । नियमें प्रेमें पारायण करी । संकटें वारी तयांचीं ॥४३॥</p>
<p>
	होवोनियां शुचिर्भूत । प्रेम आणि श्रद्धायुक्त । वाचील जो हा सात दिसांत । अनिष्टें शांत तयाचीं ॥४४॥</p>
<p>
	तो हा अध्यात्मतंतूंनीं विणिला । कृष्णब्रम्हाकथांहीं भरला । ब्रम्हात्मैक्यरसीं तरतरला । अपूर्व उथळला अद्वैतीं ॥४५॥</p>
<p>
	या नाथकाव्यनंदनवनीं । बत्तीस खणांचिया वृंदावनीं । या गोड मनोहर सदुग्धानी । ज्ञानी अज्ञानी रमताती ॥४६॥</p>
<p>
	करितां हें सच्चरित श्रवण । अथवा नेमें पारायण । करितील साई समर्थचरण । संकटनिवारण अविलंबें ॥४७॥</p>
<p>
	धनेच्छूसी लाभेल धन । शुद्ध व्यवहारीं यश पूर्ण । फळ येईल निष्ठेसमान । येईना भावावीण अनुभव ॥४८॥</p>
<p>
	आदरें करितां ग्रंथवाचन । साईसमर्थ सुप्रसन्न । करी अज्ञानदारिद्य विच्छिन्न । ज्ञानधनसंपन्नता देई ॥४९॥</p>
<p>
	ग्रंथरचनीं साईसंकेत । तैसेंच तयाचें गुप्त मनोगत । होईल जो तच्चरणानुरक्त । धन्य त्या जीवित भक्ताचें ॥५०॥</p>
<p>
	चित्त करूनियां सुसमाहित । नेमनिष्ठ हें सच्चरित । वाचावा एक तरी अध्याय नित । होईल अमित सुखदायी ॥५१॥</p>
<p>
	जया मनीं स्वहितविचार । तेणें हा ग्रंथ वाचावा साचार । जन्मोजन्मीं साईंचे उपकार । आनंदनिर्भर आठवील ॥५२॥</p>
<p>
	गुरुपौणिमा गोकुळअष्टमी । पुण्यतिथी रामनवमी । या साईंच्या उत्सवीं नियमीं । ग्रंथ निजधामीं वाचावा ॥५३॥</p>
<p>
	जैसा जैसा संग चित्तीं । तैसी तैसी जन्मप्राप्ती । अंते मती तैसी गती । शास्त्रसंमती यालागीं ॥५४॥</p>
<p>
	भक्तांचा आधार श्रीसाई । त्यावीण विन्घें न पडती ठायीं । लेंकुरालागीं कनवाळू माई । येथ नवलाई काय ती ॥५५॥</p>
<p>
	काय वानूं कथा यापरती । शब्दचि जेथें पावती उपरती । वाटे रहावें मौनवृत्तीं । योग्य स्तुति ती हीच ॥५६॥</p>
<p>
	तरी तीव्र मोक्षेच्छा मनीं धरून । शुभ कर्मेंच नित्य करून । श्रवणादि नवविध भक्तीचें सेवन । केलिया शुद्धांत:करण होईल ॥५७॥</p>
<p>
	हें न सद्नुरुप्रसादावीण । तयावीण ना परतत्त्वज्ञान । ‘ब्रम्हौवाहं’ नित्य स्मरण । गुरुनिष्ठाप्रवण तो होय ॥५८॥</p>
<p>
	संबंध जैसा पितापुत्र । गुरु हे उपमा नाममात्र । पिता करी इहसुखा पात्र । गुरु इहामुत्र - सुखदाता ॥५९॥</p>
<p>
	पिता अर्पील क्षणिक वित्त । गुरु अर्पील क्षयातीत । अविनाशवस्तु करील प्रतीत । अपरोक्ष हातांत देईल ॥६०॥</p>
<p>
	माता नऊ मास पोटीं धरी । जन्म देतां घाली बाहेरी । गुरुमातेची उलटी परी । बाहेरील भीतरीं घालील ॥६१॥</p>
<p>
	अंतीं ‘गुरु गुरु’ स्मरण करितां । शिष्य नि:शंक लाधेल सायुज्यता । मग तो स्वयें गुरूनें हाणितां । पूर्ण ब्रम्हाता लाधेल ॥६२॥</p>
<p>
	गुरुकरींचा आघात । करील जन्ममरण - नि:पात । गुरूकरितां देहाचा अंत । कोण मग भाग्यवंत यापरता ॥६३॥</p>
<p>
	खड्ग तोमर फरश शूल । इत्यादि हातीं घ्यावें लागेल । आघात पडतां शुद्धि असेल । मूर्ति मग दिसेल सद्नुरूची ॥६४॥</p>
<p>
	कितीही करा देहाचें जतन । केव्हां तरी होणार पतन । मग तयाचें गुरुहस्तें हनन । पुनर्जननहारक ॥६५॥</p>
<p>
	मारा मरेमरेंतों मार । छेदा माझा समूळ अहंकार । जेणें न पुनर्जन्म येणार । ऐसा मज दुर्धर द्या मार ॥६६॥</p>
<p>
	जाळा माझें कर्माकर्म । निवारा माझें धर्माधर्म । जेणें मज होईल सुख परम । ऐसा मोहभ्रम छेदावा ॥६७॥</p>
<p>
	घालवा माझे संकल्प विकल्प । करावें मज निर्विकल्प । पुण्यही नको नको मज पाप । नको हा उपव्द्याप जन्माचा ॥६८॥</p>
<p>
	जातां शरण रिघावयास । तंव तूं उभा चौंबाजूंस । पूर्व पश्चिम अवघ्या दिशांस । अधोर्ध्व आकाशपाताळीं ॥६९॥</p>
<p>
	अवघ्या ठायीं तुझा वास । तरी मजमाजीही तुझा वास । किंबहुना ‘मी - तूं’ हा भेदाभास । मानितां सायास मज वाटे ॥७०॥</p>
<p>
	म्हणूनि  हेमाड अनन्य शरण । द्दढ धरी सद्नुरुचरण । चुकवी पुनर्जन्ममरण । ऐसें निजोद्धरण संपादी ॥७१॥</p>
<p>
	ही काय थोडी कृति अघटित । भक्त उद्धराया असंख्यात । निर्माण केलें हें निजचरित । हेमाड निमित्त करूनियां ॥७२॥</p>
<p>
	हें श्रीसाईसमर्थचरित । व्हावें मज हातें हें अघटित । ना तों साईकृपेविरहित । पामरा मज अघटित हें ॥७३॥</p>
<p>
	नाहीं फारा दिसांचा सहवास । नाहीं संत ओळखण्याचा अभ्यास । अंगीं न शोधक द्दष्टीचें साहस । देखणें अविश्वासपूर्वक ॥७४॥</p>
<p>
	कधीं न केली अनन्यभावें उपासना । कधीं न क्षणभर बैसलों भजना । ऐसिया हस्तें चरितलेखना । करवूनियां जना दावियलें ॥७५॥</p>
<p>
	साधावया निजवचनार्थ । साईच आठवूनि देती हा ग्रंथ । पुरवूनि घेती हा निजकार्यार्थ । हेमाड हा व्यर्थ नांवाला ॥७६॥</p>
<p>
	मशकें काय उचलावा मेरू । टिटवी जैं उपसावा सागरू । परी पाठीं असतां सद्नुरू । अद्भुत करणी घडवितो ॥७७॥</p>
<p>
	असो आतां श्रोतेजन । करितों तुम्हांस अभिवंदन । जाहला हा ग्रंथ संपूर्ण । साईसमर्पण साईंचा ॥७८॥</p>
<p>
	श्रोतृवृंदां सानथोरां । माझें लोटांगण एकसरा । तुमचेनि धर्में या कथासत्रा । साईचरित्रा संपविलें ॥७९॥</p>
<p>
	मी कोण येथें संपविणार । हा तरी व्यर्थ अहंकार । जेथें साई सूत्रधार । तेथें हें म्हणणार मी कोण ॥८०॥</p>
<p>
	तरी त्यागूनि अभिमान मूल ब्याद । गावे निजगुरुगुणानुवाद । मनोज्ञा त्या या बोधप्रद । ऐसिया बाग्यज्ञा संपवितों ॥८१॥</p>
<p>
	येथें पूर्ण झाला हा ग्रंथ । पूर्ण झाला माझा मनोरथ । पूर्ण झाला साईकार्यार्थ । मीही कृतार्थ जाहलों ॥८२॥</p>
<p>
	ऐसा ग्रंथ अध्ययितां संपूर्ण । मन:कामना होतील पूर्ण । ह्रदयीं धरिल्या सद्नुरुचरण । होईल उत्तीर्ण भवसागर ॥८३॥</p>
<p>
	रोगिया होय आरोग्य । दरिद्री होय धनाढय । संकल्प - विकल्पा येईअ स्थैर्य । दीना औदार्य लाभेल ॥८४॥</p>
<p>
	पिशाच - बाधा अपस्मार । ग्रंथावर्तनें होतील दूर । मूक अपंग पंगू बधिर । तयांही सुखकर हें श्रवण ॥८५॥</p>
<p>
	जो शक्तिमान् परमेश्वर । तयाचा जयांसी पडला विसर । ऐसे जे अविद्यामोहित नर । होईल उद्धार तयांचा ॥८६॥</p>
<p>
	नर असूनि असुराचार । करूनि मिथ्या दवडिती शरीर । संसार मानिती सुखाचें आगर । होईल उद्धार तयांचा ॥८७॥</p>
<p>
	अगाध साईनाथांची करणी । हेमाड नितान्त स्थापिला चरणीं । तयाला निजसेवेसी लावुनी । सेवा ही करवुनी घेतली ॥८८॥</p>
<p>
	शेवटीं जो जगच्चालक । सद्नुरु प्रबुद्धिप्रेरक । तयाच्या चरणीं अमितपूर्वक । लेखणी मस्तक अर्पितों ॥८९॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 Apr 2022 15:56:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 Apr 2022 16:11:27 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ५१]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-51-122042900059_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
जय जय साई भक्ताधारा । गीतार्थप्रकाशका गुरुवरा । सर्वसिद्धींचिया दातारा । कृपा करा मजवरी ॥१॥
करावया निदाघशमन । ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 51" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/29/full/1651226281-0401.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra adhyay 51" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	जय जय साई भक्ताधारा । गीतार्थप्रकाशका गुरुवरा । सर्वसिद्धींचिया दातारा । कृपा करा मजवरी ॥१॥</p>
<p>
	करावया निदाघशमन । मलयगिरीं उगवे चंदन । अथवा सुखवावया विश्वजन ।  वर्षतो घन भूमीवरी ॥२॥</p>
<p>
	किंवा देवांचें व्हावया पूजन । प्रकटे वसंतसमयीं सुमन । अथवा कराया श्रोतृसमाधान । उदया ये आख्यानपरंपरा ॥३॥</p>
<p>
	ऐकतां हें साईचरित्र । श्रोते वके दोघेही पवित्र । पवित्र ऐकती त्यांचे श्रोत्र । पवित्र वक्त्र वक्त्याचें ॥४॥</p>
<p>
	गताध्यायीं अज्ञाननिरसन ।  होतां कैसें प्रकटे ज्ञान । ‘तद्विद्धि प्रणिपातेन; । श्लोकार्थनिरूपण जाहलें ॥५॥</p>
<p>
	भगवद्नीतापरिसमाप्तीं । अठराविया अध्यायाअंतीं । बहात्तरावे श्लोकप्रांतीं । अर्जुना पुसती श्रीकृष्ण ॥६॥</p>
<p>
	येथवरी जें जाहलें प्रवचन । तेणें ‘झालें कां मोहनिरसन’ । हाच स्पष्ट केला कीं प्रश्न । ‘झालें कां ज्ञान’ पुसिलें ना ॥७॥</p>
<p>
	तैसीच पार्थेंही दिधली पावती । ‘मोह माझा गेला दिगंतीं’ । म्हणे ‘ना झाली ज्ञानप्राप्ति । मोहविच्छित्तीच जाहली’ म्हणे ॥८॥</p>
<p>
	मोहनाम केवळ अज्ञान । दिसाया मात्र शब्द दोन । अर्थावबोध नाहीं भिन्न । गीतार्थज्ञ जाणती ॥९॥</p>
<p>
	‘यत्त्वयोक्त वचस्तेन’ । ‘मोहोऽयं विगतो’ जाण । अकरावे अध्यायाआरंभीं अर्जुन । करी हेंचि कथन श्रीकृष्णा ॥१०॥</p>
<p>
	आतां सांप्रत अध्याय नूतन । आरंभीं काकासाहेबांलागून । कैसें शिर्डींत केलें स्थापन । करूं तें विवेचन नवलाचें ॥११॥</p>
<p>
	त्यांचा शिर्डीचा ऋणानुबंध । त्यांचा साईंशीं द्दढसंबंध । कैसा मुळींचा कारणनिर्बंध । ऐका तो संबंध आमूल ॥१२॥</p>
<p>
	कथा त्यांच्या आहेत बहुत । लहानथोरां सर्वां विदित । परी ते आरंभीं कैसे शिर्डीप्रत । आले तें अविश्रुत सकळांस ॥१३॥</p>
<p>
	पूर्वपुण्याईच्या गोष्टी । तेणें परमेसकृपाद्दष्टी । तेणेंचि पुढें सद्नुरुभेटी । स्वानंदपुष्टी शिष्यास ॥१४॥</p>
<p>
	यासह आतां हा अध्याय । श्रोतयां वर्णील कथात्रय । तीन भक्तांचा हा महोदय । श्रोत्यांचें ह्रदय निववील ॥१५॥</p>
<p>
	इतर उपाय कोटयनुकोटी । करा परमार्थप्राप्तीसाठीं । होतां न सद्नुरुकृपाद्दष्टि । पडेना गांठीं परमार्थ ॥१६॥</p>
<p>
	ये अर्थींची कथा गोड । श्रवण करितां पुरेल कोड । श्रोतया मनीं प्रकटेल आवड । वाढेल चाड निजस्वार्थीं ॥१७॥</p>
<p>
	गुरुभक्तांचें समाधान । तो हा अध्याय परमपावन । श्रोतां चित्तें सावधान । करावा श्रवण हितकर ॥१८॥</p>
<p>
	हरी सीताराम दीक्षित । काकासाहेब नांवें विश्रुत । सकल साईबाबांचे भक्त । आदरें ज्यां स्मरत प्रेमानें ॥१९॥</p>
<p>
	तयांची ती पूर्वपीठिका । आनंददायक बहुश्रुत रसिकां । सादर कथितों भक्ताभाविकां । चरित्रश्रवणोत्सुकां सुखार्थ ॥२०॥</p>
<p>
	सन एकोणीसशें नऊपर्यंत । पूर्वीं ‘साई’ हें नांव ज्यां अपरिचित । तेच पुढें साईंचे परम भक्त । सर्वविश्रुत जाहले ॥२१॥</p>
<p>
	विश्वविद्यालय शिक्षणानंतर । कित्येक वर्षें लोटलियावर । नानासाहेब चांदोरकर । आले लोणावळ्यावर एकदां ॥२२॥</p>
<p>
	दीक्षित त्यांचे जुने स्नेही । भेती झाल्या फार वर्षांहीं । सुखदु:खाच्या वार्ता त्यांहीं । परस्परांहीं त्या केल्या ॥२३॥</p>
<p>
	लंडनशहरीं गाडींत चढतां । दीक्षितांचा पाय घसरतां । जाहली त्या पायां जी व्यथा । शमेना उपायशतांही ॥२४॥</p>
<p>
	त्या व्यथेची साद्यंत वार्ता । सहज निघाली संभाषण करितां । तेथें श्रीसाईबाबांची उपयुक्तता । आठवली चित्तांत नानांच्या ॥२५॥</p>
<p>
	तो पायाचा लंगडेपणा । नि:शेष जावा येतें कां मना ? । चला माझिया गुरूचे दर्शना । ऐसें तंव नाना वदले तयां ॥२६॥</p>
<p>
	मग नानांहीं नवल विशेष । म्हणूनि साईंचें वृत्त अशेष । कथिलें आनंदें दीक्षितांस । संतावतंसमहिम्यातें ॥२७॥</p>
<p>
	“माझें माणूस कितीही दूर । असेना साता समुद्रांपार । चिडीसारखा मी बांधूनियां दोर । ओढूनि सत्वर आणितों” ॥२८॥</p>
<p>
	ऐसें बाबांचें नित्य वचन । वरी नानांहीं केलें प्रवचन । म्हणाले बाबांचे नसल्या आपण । होणें न आकर्षण तयांचें ॥२९॥</p>
<p>
	तुम्ही तयांचे असल्यावीण । होणार नाहीं तुम्हां दर्शन । हीच बाबांची मोठी खूण । तुम्ही कां आपण जातां तिथें ? ॥३०॥</p>
<p>
	असो हें ऐकूनि साईंचें वर्नन । दीक्षितांचें धालें अंत:करण । मग ते म्हणाले नानांलागून । घेतों मी दर्शन बाबांचें ॥३१॥</p>
<p>
	माझिया पायाची काय कथा । सकल देहाची नश्वरावस्था । राहेना सुचिर पायाची व्यथा । नाहीं मज चिंता तदर्थ ॥३२॥</p>
<p>
	जातों मी आपुलिया गुरूचे दर्शना । परी तें निरतिसयसौख्यसंपादना । अल्पसुखाची नाहीं मज कामना । त्याची न याचना करीं मी ॥३३॥</p>
<p>
	ब्रम्हावेगळे नाहीं सुख । तेंच एक सुख अमोलिक । होईन मी तुमच्या गुरूचा पाईक । या एक अमोलिक सुखास्तव ॥३४॥</p>
<p>
	असो पायाचा लंगडेपणा । त्याची न मज कांहीं विवंचना । परी माझिया लंगडिया मना । ताळ्यावरी आणा प्रार्थना ही ॥३५॥</p>
<p>
	बहुत शिणलों करितां साधन । परी न निश्चल राही मन । प्रयत्नें ठेवूं म्हणतां स्वाधीन । जाई तें निसटुन नकळत ॥३६॥</p>
<p>
	कितीही असावें सावधान । अत्यंत मनोनिग्रह करून । कधीं जाईल नजर चूकवून । आश्चर्य गहन मनाचें ॥३७॥</p>
<p>
	तरी मी नाना मनापासून । घेईन तुमच्या गुरूचें दर्शन । माझिया मनाचें लंगडेपण । घालवा मी प्रार्थीन तयांतं ॥३८॥</p>
<p>
	नश्वर शरीरसौख्यीं उदास । जया आत्यंतिक - सुखाची हौस । ऐशिया भक्ताच्या परमार्थास । परम सार्वत्रिक या कामीं ॥४०॥</p>
<p>
	काकासाहेब आपुलेसाठीं । मिळवावया लोकमतपुष्टी । घेत असताम स्नेह्यांच्या भेटी । पातले उठाउठी नगरास ॥४१॥</p>
<p>
	काकासाहेब मिरीकर । नामें एक तेथील सरदार । दीक्षितांचा घरोबा फार । उतरले सुखकर त्या स्थानीं ॥४२॥</p>
<p>
	त्याच समयास अनुसरून । होतें नगरीं घोडयांचें प्रदर्शन । तदर्थ नानाप्रकारचे जन । होते कीं निमग्न त्या कामीं ॥४३॥</p>
<p>
	बाळासाहेब मिरीकर । कोपरगांवचे मामलेदार । प्रदर्शनार्थ होते हजर । अहमदनगर  शहरांत ॥४४॥</p>
<p>
	यदर्थ दीक्षित आले तेथें । कार्य तें अवघें आटपलें होतें । शिर्डीस कैसें जाणें घडतें । कोण मज नेतें तेथवर ॥४५॥</p>
<p>
	उरकतां तेथील कार्यभाग । दिसों लागला शिर्डीचा मार्ग । घडावा बाबांचा दर्शनयोग । हा एकचि उद्योग दीक्षितां ॥४६॥</p>
<p>
	येईल कोण मजबरोबर । नेईल कोण बांबांचे समोर । घालील मज त्यांचे पायांवर । काळजी अनिवार दीक्षितां ॥४७॥</p>
<p>
	निवडणुकीचें काम सरतां । कैसें जावें शिरडीस आतां । लागून राहिली दीक्षितां चिंता । विनविती सादरता मिरीकरां ॥४८॥</p>
<p>
	काकासाहेब मिरीकर । यांचे बाळासाहेब हे कुमर । विचार करिती परस्पर । दीक्षितांबरोबर कोण जातो ॥४९॥</p>
<p>
	दोघांपैकीं कोणीही एक । असल्यास सांगती नको आणीक । तरी मग जावें कोणीं निश्चयात्मक । चालला आवश्यक विचार  ॥५०॥</p>
<p>
	मनुष्याच्या मानवी कल्पना । ईश्वराची आणीक योजना । दीक्षितांचे शिर्डीच्या गमना । अकल्पित घटना प्रकटली ॥५१॥</p>
<p>
	इकडे ऐसी तळमळ । दुसरीकडे पहा चळवळ । पाहूनि भक्ताची इच्छा प्रबळ । समर्थ कळवळले कैसे ॥५२॥</p>
<p>
	एवं विचारारूढ दीक्षित । बैसले असतां तेथें सचिंत । माधवरावचि आले नगरांत । आश्चर्यचकित जन अवघे ॥५३॥</p>
<p>
	माधवरावांस त्यांचे श्वशुर । नगराहूनि करिती तार । सासू आपुली फार बेजार । भेटीस या सत्वर सहकुटुंब ॥५४॥</p>
<p>
	तार येतांच केली तयारी । मिळतांच बाबांची अनुज्ञा वरी । घेवोनियां कुटुंब बरोबरी । गेलीं चिथळीवरी तीं दोघें ॥५५॥</p>
<p>
	तीन वाजतांची गाडी गांठली । उभयतां तीं नगरा गेलीं । गाडी येऊनि द्वारीं थडकली । उतरती खालीं उभयतां ॥५६॥</p>
<p>
	इतुक्यांत नानासाहेब पानशे । आपासाहेब गद्रे असे । पातले तेथे प्रसंगवशें । प्रदर्शनमिषें त्या मार्गें ॥५७॥</p>
<p>
	माधवराव खालीं उतरतां । द्दष्टीस पडले यांचे अवचिता । वाटली तयां अति विस्मयता । आनंद चित्ता न समाये ॥५८॥</p>
<p>
	म्हणती पहा हे येथें सुदैवें । माधवराव शिर्डीचे बडवे । याहूनि आतां कोणीं हो बरवें । शिर्डीस न्यावें दीक्षितां ? ॥५९॥</p>
<p>
	मग तयांतें मारूनि हांका । म्हणती आले दीक्षित काका  । मिरीकरांचे येथें जा देखा । कौतुक अवलोका बाबांचें ॥६०॥</p>
<p>
	दीक्षित आमुचे स्नेही अलौकिक । तुमची त्यांची होईल ओळख । शिर्डीस जाया ते अत्यंत उत्सुक । तुमच्या आगमनें सुख त्यांतें ॥६१॥</p>
<p>
	देऊनि ऐसा निरोप त्यांना । वृत्त हें कळविलें दीक्षितांना । ऐकोनि हरली त्यांचीही विवंचना । संतोष मनांत अत्यंत ॥६२॥</p>
<p>
	श्वशुरगृहीं जाऊनि पाहती । सासूचीही ठीक प्रकृति । माधवराव थोडे विसवती । मिरीकर धाडिती बोलावूं ॥६३॥</p>
<p>
	बोलावण्यास देऊनि मान । होतां थोडा अस्तमान । माधवराव गेले  निघून । दीक्षितांलागून भेटावया ॥६४॥</p>
<p>
	तीच त्यांची प्रथम भेट । बाळासाहेब घालिती गांठ । रात्रीं दहाचे गाडीचा घाट । ठरला कीं स्पष्ट दोघांचा ॥६५॥</p>
<p>
	ऐसा हा बेत ठरल्यावरी । पुढें पहा नवलपरी । बाळासाहेब सारिती दूरी । पडदा बाबांचे छबीवरील ॥६६॥</p>
<p>
	हें बाबांचें छायाचित्र । मेघा बाबांचा नि:सीम छात्र । परमप्रेमें पूजी पवित्र । शंकर हा त्रिनेत्र भावुनी ॥६७॥</p>
<p>
	कांच फुटली झालें निमित्त । म्हणूनियां ती व्हावया दुरुस्त । बाळासाहेबांसवें नगरांत । आरंभीं निघत शिर्डीहून ॥६८॥</p>
<p>
	तीच ही तसबीर होऊन दुरुस्त । दीक्षितांची जणूं वाटचि पहात । मिरीकरांचे दिवाणखान्यांत । होती वस्त्रावृत ठेविलेली ॥६९॥</p>
<p>
	अश्वप्रदर्शनसमाप्तीस । बाळासाहेब परतावयास । होता अजूनि थोडा अवकाश । म्हणूनि माधवरावांस सोपिली ॥७०॥</p>
<p>
	पडदा सारूनि केली अनावृत । माधवरावांस केली सुप्रत । म्हणाले बाबांचिया समागमांत । शिर्डीपर्यंत जावें सुखें ॥७१॥</p>
<p>
	तंव ती सर्वांगमनोहर । प्रथम द्दष्टीं पडतां तसबीर । काकासाहेब आनंदनिर्भर । प्रणिपातपुर सर अवलोकिती ॥७२॥</p>
<p>
	पाहोनियां ती घटना विचित्र । तैसेंच अकल्पित रम्य पवित्र । समर्थसाईंचें छायाचित्र । वेधले नेत्र दीक्षितांचे ॥७३॥</p>
<p>
	जयांचे दर्शनीं धरिला हेत । तयांची प्रतिमा ही मूर्तिमंत । मार्गींच यावी अवलोकनांत । आल्हाद अत्यंत जाहला ॥७४॥</p>
<p>
	तीही यावी शिर्डीहूनी । काका साहेब - मिरीकर - भवनीं । तेच वेळीं दीक्षित ते स्थानीं । योग हा पाहोनि विचित्र ॥७५॥</p>
<p>
	जैसा दीक्षितमनीं भावार्थ । तैसा पुरवावया साईसमर्थ । वाटले या मिषें आले तेथ । मिरीकर - भक्तभवनास ॥७६॥</p>
<p>
	लोणावळ्यास नानांचें दर्शन । तयांसवें झालेलें भाषण । तेथेंच बाबांचें गुरुत्वाकर्षण । बीजारोपण भेटीचें ॥७७॥</p>
<p>
	नातरी ही शिर्डीची छबी । याच वेळीं येथें कां यावी । इतुका वेळ कां असावी । आवृत कां रहावी या स्थळीं ॥७८॥</p>
<p>
	असो ऐसें होतां निश्चित । घेऊनियां ती छबी समवेत । माधवराव आणि दीक्षित । निघाले आनंदित मानसें ॥७९॥</p>
<p>
	तेच रात्रीं भोजनोत्तर । दोघेही गेले स्टेशनावर । भरोनि दुसरे वर्गाचा दर । तिकीटें बरोबर घेतलीं ॥८०॥</p>
<p>
	दहाचा ठोका पडतां कर्णीं । येऊं लागला अग्निरथ - ध्वनी । दुसरा वर्ग चिकार भरूनी । गेला हें नयनीं अवलोकिलें ॥८१॥</p>
<p>
	प्रसंग ऐसा येऊनि पडतां । दोघांसि लागली दुर्धर चिंता । वेळही थोडा उरला आतां । करावी व्यवस्था कैसी पां ॥८२॥</p>
<p>
	असो आतां या गर्दीचे पायीं । परत जावें आलिया ठायीं । निश्चय केला हा दोघांहीं । जावें कीं शिरडीस उदयीक ॥८३॥</p>
<p>
	इतुक्यांत गाडीचा गार्ड अवचितां । ओळखीचा दिसला दीक्षितां । पहिल्या वर्गांत बसण्याची व्यवस्था । केली निर्घोरता तयानें ॥८४॥</p>
<p>
	पुढें गाडींत होतां उपस्थित । चाल्ल्या बाबांच्या गोष्टी मनसोक्त । माधवराव कथीत कथामृत । आनंदें ओसंडत दीक्षित ॥८५॥</p>
<p>
	ऐसें त्या मार्गीं सुखपरवडी । वेळ गेला अति तांतडी । कोपरगांवीं पातली गाडी । आनंदनिरवडी उतरले ॥८६॥</p>
<p>
	तेच समयीं स्टेशनावर । नानासाहेब चांदोरकर । पाहूनि दीक्षित आनंदनिर्भर । भेटले परस्पर अकल्पित ॥८७॥</p>
<p>
	तेही घ्यावया बाबांचें दर्शन । निघाले होते शिर्डीलागून । हा अनपेक्षित योग पाहून । विस्मयापन्न तिघेही ॥८८॥</p>
<p>
	मग ते तिघे तांगा करून । बोलत चालत निघाले तेथून । मार्गांत करूनि गोदावरीस्नान । पातले पावन शिर्डींत ॥८९॥</p>
<p>
	पुढें होतां साईंचें दर्शन । दीक्षितांचें द्रवलें मन । नयन झाले अश्रुपूर्ण । स्वानंदजीवन ओसंडलें ॥९०॥</p>
<p>
	मींही तुझी पाहूनि वाट । पुढें शाम्यास पाठविला थेट । नगरास तुझी घ्यावया भेट । वदले मग स्पष्ट साई तयां ॥९१॥</p>
<p>
	रोमहर्षित दीक्षितशरीर । कंठीं दाटला बाष्पपूर । चित्त जाहलें हर्षनिर्भर । घर्म सर्वांगीं दरदरला ॥९२॥</p>
<p>
	देह सूक्ष्म कंपायमान । चित्तवृत्ति स्वानंदनिमग्न । नेत्र पावले अर्धोन्मीलन । आनंदघन दाटला ॥९३॥</p>
<p>
	आज माझी सफळ द्दष्टी । म्हणोनि चरणीं घातली मिठी । मना धन्यता वाटली मोठी । आनंद सृष्टीं न समाये ॥९४॥</p>
<p>
	पुढें वर्षांचीं वर्षें गेलीं । साईचरणीं निष्ठा जडली । पूर्ण साईंची कृपा संपादिली । सेवेसी वाहिली निज काया ॥९५॥</p>
<p>
	यथासाङग सेवाही चांगली । करण्यालागीं मठीही बांधिली । शिर्डींत बहुसाल वस्तीही केली । महती वाढविली साईंची ॥९६॥</p>
<p>
	सारांश त्याचा जो धरितो काम । निश्चयें तयासी करी निष्काम । साई निजभक्तविश्रामधाम । भक्तांसी परम सुखदायी ॥९७॥</p>
<p>
	चंद्रा चकोर अपरिमित । चकोरां एकचि नक्षत्रनाथ । तैसे तिजला सुत जरी बहुत । माता ती अवघ्यांस एकचि ॥९८॥</p>
<p>
	दिनकरा कुमुदिनी अपार । परी कुमुदिनींस एकचि दिनकर । भक्तां तुझिया नाहीं पार । पिता तूं गुरुवर एकलाचि ॥९९॥</p>
<p>
	मेघा आतुर चातक कैक । मेघ तेथूनि चातकां एक । तैसे त्याचे भक्त अनेक । जननीजनक तो एक ॥१००॥</p>
<p>
	शरण जे जे सद्भावें सहज  । त्यांची त्यांची रक्षूनि लाज । आवडी निजांगें पुरवितो काज । पाहतसों आज प्रत्यक्ष ॥१०१॥</p>
<p>
	जगीं जो  जो प्राणी जिवंत । मरण करणार तयाचा अंत । साई दीक्षितां अभय देत । “तुज मी विमानांत नेईन” ॥१०२॥</p>
<p>
	जैसा साईबाचादत्त । तैसाच झाला दीक्षितां अंत । वाचेनें साईंचे गुणगण गात । देखिलें मी साक्षात् निज डोळां ॥१०३॥</p>
<p>
	अग्निरथीं एक बांकावर । बसलों असतां आम्ही परस्पर । समर्थ साईंच्या वार्तांत चूर । विमानीं जणूं भरकन आरूढले ॥१०४॥</p>
<p>
	पहा साधिली अवचित संधी । मान देऊनि माझिये स्कंधीं । पावले अवचित विमानसिद्धी । सौख्य निरवधि दीक्षित ॥१०५॥</p>
<p>
	नाहीं आळा नाहीं पीळ । नाहीं घरघर नाहीं कळ । बोलतां चालतां देखतां सकळ । शरीर निश्चळ राहिलें ॥१०६॥</p>
<p>
	मानवभूमिका ऐसी विसर्जिली । निजरूपीं निजज्योति मिळविली । विमानमार्गें स्वरूपीं स्थापिली । ज्योतींत समरसली निज ज्योत ॥१०७॥</p>
<p>
	साईचरणीं लागतां ध्यान । गळाला पूर्ण देहाभिमान । वृत्ति पावली समाधान । पूर्ण कृष्णार्पण देहास ॥१०८॥</p>
<p>
	शके अठराशें अठ्ठेचाळीस । ज्येष्ठ वद्य एकादशीस । दीक्षित पावले ब्रम्हापदास । या कर्मभूमीस त्यागुनी ॥१०९॥</p>
<p>
	म्हणा हें त्यांचें देहावसान । अथवा तयांतें आलें विमान । झाले ते साईपदविलीन । कोणासही प्रमाण ही गोष्ट ॥११०॥</p>
<p>
	ऐशा उपकारा व्हावें उत्तींर्ण । ऐसें भावी तो अभक्त पूर्ण । द्दश्यदानें उतरायीपण । स्वप्नींही जाण घडेना ॥१११॥</p>
<p>
	चिंतामणी देऊं पहाल । नित्य चिंता वाढवाल । तेणें अचिंत्यदानियां व्हाल । उतराई हा बालनिर्णय ॥११२॥</p>
<p>
	बरें कल्पतरूही द्याल । गुरूस जाल कराया न्यहाल । गुरु निर्विकल्पदानीं कुशल । उत्तीर्णता होईल का तेणें ॥११३॥</p>
<p>
	आतां असो या सर्वांपरीस । गुरुस देऊं पहाल परीस । परीस लोहाचें सुवर्ण सरस । करील, गुरु ब्रम्हारस पाजील ॥११४॥</p>
<p>
	कामधेनु अर्पाल गुरूस । उत्तीर्ण मानाल गुरूपकारास । कामना वाढवाल असमसाहस । निष्काम निरायासदानी गुरु ॥११५॥</p>
<p>
	अखिल विश्वामाजील संपत्ती । देऊनि गुरुपकार फेडूं जे इच्छिती । अमायिक दात्या जे मायिक अर्पिती । येणें का पावती उत्तीर्णता ॥११६॥</p>
<p>
	देह ओवाळूं गुरूवरून । तरी तो केवळ नश्वर जाण । जीव सांडावा ओवाळून । तरी तो जाण मिथ्या स्वयें ॥११७॥</p>
<p>
	सद्रुरु सत्यवस्तूचा दाता । तया मिथ्या वस्तु अर्पितां । उतराई काय होईल दाता । आहे ही वार्ता अशक्य ॥११८॥</p>
<p>
	म्हणोनि अनन्यश्रद्धापूर्ण । घालोनि दंडवत लोटांगण । मस्तकीं वंदा सद्नुरुचरण । उपकारस्मरणपूर्वक ॥११९॥</p>
<p>
	अखंड गुरूपकारस्मृति । हेंच भूषण शिष्याप्रती । त्यांतूनि उत्तीर्ण होऊं जे पाहती । निजसुखा आंचवती ते शिष्य ॥१२०॥</p>
<p>
	कथा इतुकी होतां श्रवण । श्रोतयांची वाढली तहान । जिज्ञासापूर्ण आतुरता पाहून । कथा एक लहान निवेदितों ॥१२१॥</p>
<p>
	संतही आपुलें बंधुप्रेम । व्यक्त करितीं संसारियांसम । अथवा दक्ष लोकसंग्रहीं परम । असती हें वर्म जाणवती ॥१२२॥</p>
<p>
	किंवा स्वयें साईच आपण । करावया निजभक्तकल्याण । त्या त्या भूमिका निजांगें नटून । परमार्थशिक्षण देतात ॥१२३॥</p>
<p>
	ये अर्थींची त्रोटक कथा । सादर श्रवण कीजे श्रोतां । कळेल जेणें न सांगतां सवरतां । संतांची संतां निजखूण ॥१२४॥</p>
<p>
	एकदां श्रीगोदातीरीं । प्रसिद्ध राजमहेंद्री शहरीं । आली श्रीवासुदेवानंदांची स्वारी । उपनामधारी ‘सरस्वती’ ॥१२५॥</p>
<p>
	महाथोर अंतर्ज्ञानी । कर्ममार्गाचे कट्टे अभिमानी । अखंड जयांची कीर्ति - स्वर्धुनी । राहिली गर्जुनी महीतळीं ॥१२६॥</p>
<p>
	कर्णोपकर्णीं वार्ता परिसुनी । पुंडलीकराव आदिकरूनी । नांदेड शहरींच्या भाविकजनीं । धरिला दर्शनीं द्दढ हेत ॥१२७॥</p>
<p>
	असो पुढें ती मंडळी निघाली । राजमहेंद्री नगरीं पातली । गोदेकांठीं प्रात:काळीं । दर्शना आली स्वामींच्या ॥१२८॥</p>
<p>
	समय खोता सुप्रभात । नांदेडकर मंडळी समस्त । निघाली स्नानार्थ गंगेप्रत । गात स्तोत्रपाठ मुकानें ॥१२९॥</p>
<p>
	तेथेंच स्वामी देखोनि स्थित । मंडळी सद्भावें  साष्टांग नमीत । सहज कुशल प्रश्न चालत । वार्ता तों निघत शिर्डीची ॥१३०॥</p>
<p>
	कर्णीं पडतां साईमान । स्वामी स्वकरें करीत प्रणास । म्हणाले ते आमुचे बंधु निष्काम । आम्हांसी नि:सीम प्रेम त्यांचें ॥१३१॥</p>
<p>
	घेऊनि तेथील एक श्रीफळ । देऊनि पुंडलीकरावांजवळ । म्हणाले वंदूनि बंधुपदकमळ । अर्पा हें शिर्डीस जाल तेव्हां ॥१३२॥</p>
<p>
	सांगा माझा नमस्कार । म्हणा असों द्या कृपा या दीनावर । पडूं न द्यावा अयचा विसर । प्रेम निरंतर वाढावें ॥१३३॥</p>
<p>
	तुम्ही शिरडीग्रामालागून । पुनश्च केव्हां कराल गमन । करा हें माझें बंधूस अर्पण । आदरें स्मरणपूर्वक ॥१३४॥</p>
<p>
	आम्ही स्वामी न करावें वंदन । असें जरी हें आम्हां निबंधन । परी त्या नियमाचें करणें उल्लंघन । प्रसंगीं कल्याणकारक ॥१३५॥</p>
<p>
	म्हणूनि घेतां साईदर्शन । होऊं न द्या या गोष्टीचें विस्मरण । साईपदीं हें श्रीफल अर्पण । करा कीं स्मरणपूर्वक ॥१३६॥</p>
<p>
	ऐकोनियां तयांच्या वचना । पुंडलीकराव लागती चरणां । म्हणती जैसी स्वामींची अनुज्ञा । आणीन काचरणा ती तैसी ॥१३७॥</p>
<p>
	करोनि आज्ञा शिरसामान्य । येणें मी आपणा मानितों धन्य । स्वामीस शरण जाऊनि अनन्य । निघाले तेथून पुंडलीकराव ॥१३८॥</p>
<p>
	स्वामी जे बाबांस बंधु वदत । तें काय होतें अवघें निरर्थ । ‘यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहुयात’ । बाबा या श्रुतिसंमत वर्तत ॥१३९॥</p>
<p>
	जन जाय ‘धुनी ’ वदत । ती बाबांचे सन्मुख नित्य । अष्टौ प्रहर होती प्रज्वलित । हें बाबांचें व्रत होतें ॥१४०॥</p>
<p>
	चित्तशुद्धिद्वारा प्रमाण । अग्निहोत्रकर्मादि साधन । ब्रम्हाप्राप्त्यर्थ करीत धारण । लोकसंग्रहकारण जें ॥१४१॥</p>
<p>
	श्रीवसुदेवानंद - सरस्वती । तेही यती तैसेच व्रती । मग ते बाबांस बंधु म्हणती । ही काय उक्ति वैयर्थिक ॥१४२॥</p>
<p>
	पुढें संपला नाहीं जों महिना । सवें घेऊनि चार मित्रांना । योग आला पुंडलीकरावांना । निघाया दर्शना साईंचे ॥१४३॥</p>
<p>
	घेतलें सामान फळफळावळ । स्मरणपूर्वक घेतला नारळ । साईदर्शना निघाले सकळ । आनंदें अविकळ मानसें ॥१४४॥</p>
<p>
	पुढें मनमाडास उतरल्यावर । कोपरगांवाची गाडी सुटल्यावर । अवकाश म्हणूनि गेले ओढयावर । तृषाही फार लागली ॥१४५॥</p>
<p>
	अनशेपोटीं नुसतें पाणी । पीतां होईल प्रकृतीस हानी । म्हणूनि एक पुरचुंडी आणी । चिवडयाची कोणी फराळा ॥१४६॥</p>
<p>
	तोंडांत घालितां चिवडयाची चिवडा लागला अत्यंत तिखट । नारळावांचूनि चिवडा  फुकट । जाहली खटपट ही व्यर्थ ॥१४७॥</p>
<p>
	तेव्हां एक म्हणे त्यां सकळां । युक्ति एक आठवली मला । नारळ फोडूनि चिवडयांत मिसळा । पहा मग ती कळा चिवडयाची ॥१४८॥</p>
<p>
	नारळ म्हणतां नारळ तयार । फोडावयास कैंचा उशीर । मिसळतां चिवडा लागला रुचकर । प्याले मग त्यावर ते पाणी ॥१४९॥</p>
<p>
	नारळ म्हणतां नारळ आला । तो कोणाचा नाहीं विचारिला । क्षुधेनें ऐसा कहर केला । विसर पाडिला अवघ्यांसी ॥१५०॥</p>
<p>
	असो पुढें गेले ठिकाणीं । कोपरगांवचे गाडींत बसुनी । मार्गीं पुंडलीकरावांलागुनी । आठवला मनीं नारळ ॥१५१॥</p>
<p>
	आली पाहुनी सिर्डी जवळ । पुंडलीकरावां लागली तळमळ । वासुदेवानंदांचेंच श्रीफळ । चुकीनें चिवडयांत मिसळलें ॥१५२॥</p>
<p>
	कळलें जेव्हां नारळ फुटला । पुंडलीकराव भयें दाटला । सर्व अंगा कंप सुटला । अपराध घडला संतांचा ॥१५३॥</p>
<p>
	जाहला तया अति संताप । जोडलें तरी केवढें पाप । पडतील माथां स्वामींचे शाप । झाले ते प्रलाप व्यर्थ माझे ॥१५४॥</p>
<p>
	श्रीफळाची ऐसी गत । व्हावी पाहतां मोठी फसगत । पुंडलीकरावांचें चित्त । विस्मयें तटस्थ जाहलें ॥१५५॥</p>
<p>
	आतां काय बाबांस देऊं । कैसिया रीतीं त्यां समजावूं । कैसें मी तयां वदन दावूं । श्रीफळ गमावॄनि बैसलों ॥१५६॥</p>
<p>
	होणार साईचरणीं समर्पण । फराळ त्याचा जाहला पाहून । पुंडलीकराव मनीं खिन्न । म्हणाले हा अपमान संतांचा ॥१५७॥</p>
<p>
	आतां जैं बाबा मागती नारळ । अधोवदन होतील सकळ । कारण मनमाडावर त्याचा फराळ । केला ही खळबळ सर्वांतरीं ॥१५८॥</p>
<p>
	नारळ नाहीं जवळ आज । खरे सांगावें तरी लाज । खोटें सांगूनि भागेना काज । साईमहाराज सर्वसाक्षी ॥१५९॥</p>
<p>
	असो साईंचें घेतां दर्शन । मंडळी झाली सुखसंपन्न । आनंदाश्रुपूर्ण नयन । प्रसन्नवदन ते सकळ ॥१६०॥</p>
<p>
	आतां आम्ही अहर्निश । पाठवितों बिनतारेचे संदेश । दिमाख याचा दावितों विशेष । अभिमानवश होऊनि ॥१६१॥</p>
<p>
	यदर्थ उभारूं लागती स्थानें । लागे अपार पैसा खर्चणें । तेथें हीं संतांस न लगती साधनें । पाठविती मनेंच संदेश ॥१६२॥</p>
<p>
	स्वामींनीं पुंडलीकरावांस । नारळ दिधला ते समयास । पाठविला होता साईनाथांस । पूर्वींच हा संदेश बिनतारी ॥१६३॥</p>
<p>
	पुंडलीकराव घेतां दर्शन । साईबाबा आपण होऊन । म्हणाले “माझी वस्तु आण । बंधूच्या जवळून आणिलेली” ॥१६४॥</p>
<p>
	मग तो खिन्न पुंडलीकराय । धरूनियां श्रीबाबांचे पाय । म्हणे क्षमेवीण दुसरा उपाय । नाहीं मज काय सांगूं मी ॥१६५॥</p>
<p>
	नारळाची मज आठव होती । परी भुकेची करावया तृप्ति । आम्ही जंव गेलों ओढियावरती । जाहली विस्मृति सकळांस ॥१६६॥</p>
<p>
	तेथें चिवडयाचा करितां फराळ । फोडूनि मिसळला हाच कीं नारळ । म्हणूनि आणितों दुसरें श्रीफळ । स्वीकारा निश्चळ मानसें ॥१६७॥</p>
<p>
	ऐसें म्हणूनि उठूं लागतां । पुंडलीकराव फळाकरितां । साईमहाराज धरोनि हस्तां । तया निवारितां देखिले ॥१६८॥</p>
<p>
	नेणतां घडला विश्वासघात । कृपाळू आपण घ्या पदरांत । क्षमस्व व्हा मज कृपावंत । असें मी नितांत अपराधी ॥१६९॥</p>
<p>
	स्वामींसारिखा साधू सज्जन । अवगणूनि तयांचें वचन । करावें जें आपणां अर्पण । तें म्यां भक्षण फळ केलें ॥१७०॥</p>
<p>
	हा तों संतांचा अतिक्रम । केवढा मी अपराधी परम । आहे काय या पापा उपरम । कैसा मी बेशरम जाहलों ॥१७१॥</p>
<p>
	तंव ही ऐकतां झालेली मात । हांसूनि बोलले श्रीसाईनाथ । “घ्यावा कशास नारळ हातांत । ठेवणें व्यवस्थित जरी नव्हतें ॥१७२॥</p>
<p>
	तुम्ही माझी वस्तु मजप्रत । द्याल ऐसें जाणूनि निश्चित । माझ्या बंधूनें तुमचिया बोलांत । विश्वास अत्यंत ठेवला ॥१७३॥</p>
<p>
	त्याचा का व्हावा हा परिणाम । हेच का तुम्ही विश्वासधाम । पुरला न माझ्या बंधूचा काम । ऐसेंच का काम हें तुमचें” ॥१७४॥</p>
<p>
	म्हणाले “त्या फळाची योग्यता । येईना इतर कितीही देतां । घडावयाचें घडलें आतां । व्यर्थ दुश्चित्तता किमर्थ ॥१७५॥</p>
<p>
	स्वामींनीं तुज दिधला नारळ । तोही माझाच संकल्प केवळ । माझ्याच संकल्पें फुटलें तें फळ । अभिमान निष्फळ कां धरिसी ॥१७६॥</p>
<p>
	अहंकाराची धरिसी बुद्धी । तेणें आपणा मानिसी अपराधी । एवढें निरहंकर्तृत्व साधीं । अवधी चुकेल ॥१७७॥</p>
<p>
	पुण्याचाचि काय अभिमान । पापाचा कां नाहीं अभिमान । प्रताप दोहींचा समसमान । म्हणूनि निरभिमान वर्तें तूं ॥१७८॥</p>
<p>
	तुला माझी घडावी भेटी । ऐसें जें आलें माझिया पोटीं । तेव्हांच नारळ तुझिया करसंपुटीं । पडला ही गोष्टी त्रिसत्य ॥१७९॥</p>
<p>
	तुम्ही तरी माझींच मुलें । फळ जें तुम्हां मुखीं लागलें । तेंच तुम्हीं मज अर्पण केलें । समजा मज पावलें निश्चित” ॥१८०॥</p>
<p>
	ऐसी जेव्हां झाली समजूत । तेव्हांच पुंडलीकरावाचें चित्त । साईमुखींच्या वचनें विरमन । उद्विग्नता वितळत हळू हळू ॥१८१॥</p>
<p>
	नारळ गेला झालें निमित्त । उपदेशें निवळे उद्विग्न चित्त । एवं तें सर्व अहंकारविलसित । अभिमाननिर्मुक्त निर्दोष ॥१८२॥</p>
<p>
	एवढेंच या कथेचें सार । वृत्ति जों जों निरहंकार । तों तों परमार्थीं लाहे अधिकार । सहज भवपार होईल ॥१८३॥</p>
<p>
	आतां तिसर्‍या भक्ताचा अभिनव । श्रवण करा गोड अनुभव । दिसेल बाबांचें अतुल वैभव । सामर्थ्यगौरव एकसरें ॥१८४॥</p>
<p>
	वांद्रें नाम तालुक्यामाझारीं । उत्तरेस वांद्रें शहराशेजारीं । शांताक्रूज नामक नगरीं । वसत ‘धुरंधर’ हरिभक्त ॥१८५॥</p>
<p>
	सकल बंधु संतप्रेमी । निष्ठा जयांची द्दढतर श्रीरामीं । अनन्य श्रद्धा रामनामीं । नावडे रिकामी उठाठेव ॥१८६॥</p>
<p>
	साधी तयांची संसारसरणी । तैसी मुलाबाळांची राहणी । स्त्रीवर्गही निर्दोष आचरणीं । ऋणी चक्रपाणी तेणें तयां ॥१८७॥</p>
<p>
	बाळाराम त्यांतील एक । विठ्ठलभक्त पुण्यश्लोक । राजदरबारीं ज्याचा लौकिक । आवडता देख सर्वत्रां ॥१८८॥</p>
<p>
	तारीख एकोणीस फेब्रुवारी । सन अठराशें अठयाहत्तरीं । एका रामभक्ताचिये उदरीं । उपजलें महीवरी हें रत्न ॥१८९॥</p>
<p>
	अलंकार पाठारे प्रभु - ज्ञातींत । प्रसिद्ध घरंदाज घराण्यांत । सन अठराशें अठयाहत्तरांत । आले हे मुंबईंत जन्मास ॥१९०॥</p>
<p>
	पाश्चात्यविद्यापारंगत । अँडव्होकेट - पदवीभूषित । तत्त्वज्ञानामाजीं निष्णात । विद्वान विख्यात सर्वत्र ॥१९१॥</p>
<p>
	पांडुरंगीं अतिप्रेम । परमार्थाची आवड परम । पितयाचें आराध्यदैवत राम । पुत्राचें निजधाम विठ्ठल ॥१९२॥</p>
<p>
	अवघे बंधु पदवीधर । वृत्ति सदैव धर्मपर । शुद्ध बीजचे शुद्ध संस्कार । बाळारामावर अपूर्व ॥१९३॥</p>
<p>
	कोटिक्रमाची मोहक मांडणी । सरळ शुद्ध विचारसरणी । कुशाग्र बुद्धि सदाचरणी । गुण हे अनुकरणीय तयांचे ॥१९४॥</p>
<p>
	समाजसेवा केली नितांत । स्वयें लिहिला समावृत्तांत । संपतां हें व्रत अंगीकृत । निघाले परमार्थ साधावया ॥१९५॥</p>
<p>
	त्यांतही आक्रमुनी बराच प्रांत । भगवद्नीता ज्ञानेश्वरी ग्रंथ । वाचूनि संपादिलें प्रावीण्य त्यांत । अध्यात्मविषयांत नांवाजले ॥१९६॥</p>
<p>
	ते साईंचे परम भक्त । सन एकोणीसशें पंचवीसांत । ब्रम्हीभूत अल्पवयांत । अल्प तच्चरित परिसावें ॥१९७॥</p>
<p>
	तारीख नऊ माहे जून । एकोणीसशें पंचवीस सन । इहलोकीं यात्रा संपवून । विठ्ठलीं विलीन हे झाले ॥१९८॥</p>
<p>
	एप्रील एकोणीसशें बारा । सालीं पाहूनि दिन एक बरा । संतदर्शना साईदरबारा । बंधु धुरंधरा योग आला ॥१९९॥</p>
<p>
	शिर्डीस बाबुलजी ज्येष्ठ सहोदर । घेऊनि वामनराव बरोबर । दर्शन घेऊनि सहा महिन्यां अगोदर । आनंदानें परतले ॥२००॥</p><p>
	तयांचा तो गोड अनुभव । अनुभवाया इतर सर्व । दर्शनलाभ जोडाया अभिनव । वाळारामादि तंव गेले ॥२०१॥</p>
<p>
	हे येण्याचे आधींच देख । “आज माझे दरबारचे लोक । येणार आहेत येथें अनेक” । बाबा अवघ्यां देखत बोलले ॥२०२॥</p>
<p>
	परिसूनि ऐसी प्रेमाची वार्ता । धुरंधर बंधूंस अति विस्मयता । शिर्डीस येण्याचें कोणा न कळवितां । बाबांस ही वार्ता कळली कैसी ॥२०३॥</p>
<p>
	पुढें साई पाहोनि द्दष्टीं । धांवोनि चरणीं घातली मिठी । हळू हळू चालल्या गोष्टी । सुखसंतुष्टी सर्वत्रां ॥२०४॥</p>
<p>
	शिवाय पाहूनि मंडळी आली । निघाली बाबांची वचनावली । “पहा हीं दरबारचीं माणसें आलीं । येणार म्यां म्हटलीं होतीं तीं” ॥२०५॥</p>
<p>
	आणीक पुढें भाषा बाबांची । शब्दें शब्द ऐका ती साची । “तुमची आमची साठ पिढयांची । ओळख पूर्वींची आहे बरें” ॥२०६॥</p>
<p>
	बाळारामादि बंधुजन । सकळही ते विनयसंपन्न । उभे सन्मुख कर जोडून । राहिले श्रीचरण लक्षीत ॥२०७॥</p>
<p>
	श्रीसाईंचें दर्शन होतां । बाळारामादि सर्वांचे चित्ता । सोल्लास अनिवार प्रेमावस्था । आल्याची सार्थकता वांटली ॥२०८॥</p>
<p>
	अश्रुपूर्ण झाले नयन । कंठ रोधिला वाष्पेंकरून । रोमांच उठले सर्वांगावरून । आले दाटून अष्टभाव ॥२०९॥</p>
<p>
	पाहोनि बाळारामाची अवस्था । उल्लास साईनाथांचे चित्ता । बोलूं लागले तयां समस्तां । उपदेशवार्ता प्रेमाच्या ॥२१०॥</p>
<p>
	शुक्लपक्षाचिया चढत्या कला । तेणेंपरी भजे जो मजला । धन्य जेणें मनोधर्म आपुला । नि:शेष विकला मदर्थ ॥२११॥</p>
<p>
	द्दढ विश्वास धरोनि मनीं । प्रवर्ते जो निजगुरु - भजनीं । तयाचा ईश्वर सर्वस्वें ऋणी । पाही न कोणी वक्र तया ॥२१२॥</p>
<p>
	वायां न दवडितां अर्धघडी । जयासी हरिगुरूभजनीं आवडी । तया ते देतील सुख निरवडी । भवपैलथडीं उतरतील” ॥२१३॥</p>
<p>
	परिसोनियां ऐसें वचन । सर्वां नेत्रीं आनंदजीवन । चित्त झालें सुप्रसन्न । अंत:करण सद्नदित ॥२१४॥</p>
<p>
	साईवाक्य - सुमनमाळा । अवघीं वंदोनि घातली गळां । तेणें आनंद झाला सकळां । कारण उमाळा भक्तीचा ॥२१५॥</p>
<p>
	असो हे पुढें वाडयांत आले । भोजनोत्तर थोडे विसावले । तिसरे प्रहरीं पुनश्च गेले । लोटांगणीं आले बाबांस ॥२१६॥</p>
<p>
	बाळाराम विनयसंपन्न । करूं लागले पादसंवाहन । बाबांनीं चिलीम पुढें करून । ओढावयास खूण केली ॥२१७॥</p>
<p>
	मग ती चिलीम प्रसाद म्हणून । संवयी नसतां कष्टें ओढून । पुन्हा बाबांचे हातीं देऊन । केलें अभिवंदन सद्भावें ॥२१८॥</p>
<p>
	बाळारामांस भाग्याचा दिन । लाभला पहा तैंपासून । त्यांची दम्याची व्यथा जाऊन । पूर्ण समाधान जाहलें ॥२१९॥</p>
<p>
	दमा न एका दों दिवसांचा । विकार पूर्ण सहा वर्षांचा । कानांत मंत्र सांगावा जैसा । चिलमीचा तैसा तो प्रभाव ॥२२०॥</p>
<p>
	झुरका एक चिलमीचा मारुनी । परत केली सविनय नमुनी । दमा जो गेला तैंपासुनी । उठला न परतोनी केव्हांही ॥२२१॥</p>
<p>
	मात्र मध्यें एके दिवशीं । बाळारामांस उठली खांसी । परम विस्मय तो सर्वांसी । कळेना कोणासी कारण तें ॥२२२॥</p>
<p>
	मागूनि याची करितां चौकशी । बाबांनीं निजदेह त्याच दिवशीम । ठेविला हें कळलें सर्वांसी । खूण ही भक्तांसी दाखविली ॥२२३॥</p>
<p>
	बाळारामांस ठसका जे दिवशीं । तेच दिवसीं बाबा देहासी । झले समर्पिते अवनीसी । खूण ही तयांसी दिधली कीं ॥२२४॥</p>
<p>
	तेव्हांपासूनि पुनश्च त्यांसी । कधींही आमरण उठली न खांसी । या चिलिमीच्या अनुभवासी । विसर कां कोणासी होईल ॥२२५॥</p>
<p>
	असो तो दिवस गुरुवारचा । त्यांतचि चावडी - मिरवणुकीचा । तेणें द्विगुणित आनंदाचा । स्मरणीय साचा त्यां झाला ॥२२६॥</p>
<p>
	आठांपासूनि नवांपर्यंत । बाबांसन्मुख आंगणांत । टाळमृदंगांचिया तालांत । भजनरंगांत थाटतसे ॥२२७॥</p>
<p>
	एकीकडे अभंग म्हणती । दुसरीकडे पालखी सजविती । पालखी तयार झाल्यावरती । बाबा मग निघती चावडीस ॥२२८॥</p>
<p>
	पूवीं सप्तत्रिंशत्तमाध्यायीं । चावडीची नवलाई । सविस्तरपणें वर्णिली पाहीं । द्विरुक्ति होईल ये स्थानीं ॥२२९॥</p>
<p>
	एक रात्र मशीदींत । दुजी चावडीमाजी काढीत । ऐसा बाबांचा नेम हा सतत । आमरण अव्याहत चालतसे ॥२३०॥</p>
<p>
	देखावया चावडीचा सोहळा । उल्हास बाळाराम प्रेमळा । तदर्थ येतां चावडीची वेळी । धुरंधरमेळा पातला ॥२३१॥</p>
<p>
	शिरडी  क्षेत्रींचे नारीनर । बाबांसि घेऊनि बरोबर । उल्लासें करीत जयजयकार । निघाले चावडीवर जाया ॥२३२॥</p>
<p>
	घातली ज्यावरी भरजरी पाखर । चढविले सुंदर अलंकार । नामही जयाचें श्यामसुंदर । अघाडी थयकार करीत ॥२३३॥</p>
<p>
	शिंगें कर्णे तुताच्या वाजत । त्या शृंगारल्या श्यामकर्णासहित । संगें पालखी साई मिरवत । चाले भक्तावृत छत्र शिरीं ॥२३४॥</p>
<p>
	ध्वजापताका घेती करीं । छत्र धरिती श्रीचे शिरीं । वारिती मोरचेलेंसीं चवरी । दिवटया धरिती चौपासीं ॥२३५॥</p>
<p>
	सवें घेऊनि मृदंग सुस्वर । टाळघोळादि वाद्यें मधुर । भजन करीत भक्तनिकर । दुबाजू चालत बाबांच्या ॥२३६॥</p>
<p>
	असो ऐसी ती रम्य मिरवणूक । ये जेव्हां चावडीसन्मुख । बाबा थांबूनि उत्तराभिमुख । करीत विधिपूर्वक हस्तक्रिया ॥२३७॥</p>
<p>
	दक्षिणांगीं बाबांचा भगत । निजकरीं बाबांचा पदर धरीत । वामांगीं तात्या पाटील हस्तांत । घेऊनि चालत कंदीत ॥२३८॥</p>
<p>
	आधींच बाबांचें मुख पीतवर्ण । त्यांतचि दीपादि तेजाचें मिश्रण । ताम्रमिश्रित पीत सुवर्ण । तैसें मुख शोभे अरुणप्रभा ॥२३९॥</p>
<p>
	धन्य ते काळींचें पवित्र - दर्शन । उत्तराभिमुख एकाग्र मन । वाटे करीत कोणास पाचारण । अधोर्ध्व दक्षिणकर करुनी ॥२४०॥</p>
<p>
	तेथूनि पुढें चावडीप्रती । नेऊनि बाबांस सन्मानें बसविती । दिव्यालंकारवस्त्रें अर्पिती । चंदन चर्चिती आंगास ॥२४१॥</p>
<p>
	कधीं शिरपेच कलगी तुरा । कधीं सुवर्णमुगुट साजिरा । कधीं घालिती मंदिल गहिरा । भरजरी पेहराव सुरुचिर ॥२४२॥</p>
<p>
	हिरे - मोती - पाचूंच्या माळा । प्रेमें घालीत बाबांचे गळां । कोणी तयांच्या लाविती भाळा । सुगंध टिळा कस्तुरीचा ॥२४३॥</p>
<p>
	कोणी चरण प्रक्षाळीत । अर्घ्यपाद्यादि पूजा अर्पीत । कोणी केशरउटी लावीत । तांबूल घालीत मुखांत ॥२४४॥</p>
<p>
	घेऊनियां पंचारत । नीरांजन कर्पूरवात । जेव्हां बाबांस ओवाळीत । शोभा तैं दिसत अनुपम ॥२४५॥</p>
<p>
	पांडुरंगमूर्तीचें वदन । ज्या दिव्य तेजें शोभायमान । त्याच तेजें साईमुखमंडन । पाहूनि विस्मयापन्न धुरंधर ॥२४६॥</p>
<p>
	वीज जैसी नभोमंडळीं । तळपे कोणा न लक्षे भूतळीं । तैसें तेज साईंच्या निढळीं । चमकोनि डोळे दीपले ॥२४७॥</p>
<p>
	पहांटे होती कांकडआरती । गेले तेथें धुरंधरप्रभृती । तेथेंही बाबांचे मुखावरती । तीच तेजस्थिति अवलोकिली ॥२४८॥</p>
<p>
	तेव्हांपसूनि आमरणान्त । बाळारामांची निष्ठा अत्यंत । साईपदीं जी जडली निश्चित । यत्किंचित तीन ढळली ॥२४९॥</p>
<p>
	हेमाड साईपदीं शरण । पुढील अध्यायीं ग्रंथ पूर्ण । सिंहावलोकनें होईल निरूपण । द्या मज अवधान शेवटचें ॥२५०॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । भक्तत्रयवृत्तकथनं नाम एकपंचाशत्तमोऽध्याय: संपूर्ण ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-52-122042900061_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ५२</a></strong></p>
</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 Apr 2022 15:24:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 Apr 2022 16:10:40 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ५०]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-50-122042900058_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
जन्मदाते मायतात । यांचिया उपकारा नाहीं अंत । मानवदेह दिधला मजप्रत । उपजलों न जंत त्यां पोटीं ॥१॥
झालों न सळ ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 50" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/29/full/1651225988-9208.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra part 50" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	जन्मदाते मायतात । यांचिया उपकारा नाहीं अंत । मानवदेह दिधला मजप्रत । उपजलों न जंत त्यां पोटीं ॥१॥</p>
<p>
	झालों न सळ मातेच्या उदरा । अंध पंगू काणा तोतरा । उपजलों ना मुका बहिरा । जन्मलों पुरा सुपिंड ॥२॥</p>
<p>
	जयाचे देव वंदी चरण । ऐसा जो उत्तम ब्राम्हाणवर्ण । तेथ मी ईश्वरकृपें अवतीर्ण । जाहलों पूर्ण दैवाचा ॥३॥</p>
<p>
	जन्मोजन्मीं मातापिता । कोटयनुकोटी जन्म घेतां । परी या जन्ममरणा चुकविता । तयाची दुर्मिळता अनिवार ॥४॥</p>
<p>
	जन्मदाता तोही पिता । दुजा मौंजीबंधनकर्ता । तिजा अन्नप्रदानें पाळिता । चौथा भयभीता सोडविता ॥५॥</p>
<p>
	जगीं हे सर्व समसमान । परी कृपाळू सद्नुरुवीण । खरा जनक नाहीं आन । नवलविंदान परिसावें ॥६॥</p>
<p>
	जननीगर्भीं वार्यनिक्षेपिता । योनिद्वारा जन्मदाता । हा तों केवळ लौकिकी पिता । सद्नुरु जनिता अलौकिक ॥७॥</p>
<p>
	तो न वेंचितां वीर्याचा कण । नीचयोनिद्वारावीण । देऊनियां निजपुत्रा । जनन । अनुग्रह पूर्ण करवीत ॥८॥</p>
<p>
	नमो त्या जन्ममरणनिवर्तका । करुणाघना ज्ञानप्रकाशका । वेदगुह्य सच्चित्प्रतिपादका । सर्वव्यापका गुरुवर्या ॥९॥</p>
<p>
	नमो संसारतमदिनकरा । आत्मानुभवसंतशेखरा । भक्तचित्तचकोरचंद्रा । कल्पतरुवरा गुरुवर्या ॥१०॥</p>
<p>
	अगाध गुरुरायाचें महिमान । वर्णितां गळे वाचेचा अभिमान । बरें असावें मुकियासमान । खालवोनि मान गुरुचरणीं ॥११॥</p>
<p>
	पूर्वजन्मीं अनवच्छिन्न । नसतां कोणी तप:संपन्न । होई न तया संतदर्शन । त्रितापनिरसनकारक ॥१२॥</p>
<p>
	परमार्थ मोक्ष वा निजहित । साधावें ऐसा जयासी हेत । तेणें व्हावें संतांचे अंकित । उणें न यत्किंचित मग तया ॥१३॥</p>
<p>
	धन्य धन्य सत्संगती । काय वर्णावी तिची महती । तियेपासाव विवेकविरक्ति । परमशांति सद्भक्तां ॥१४॥</p>
<p>
	साई केवळ चैतन्यमूर्ती । अव्यक्तचि ते आले व्यक्तीं । काय त्यांची निर्विषयस्थिति । कोण निश्चितीं वानील ॥१५॥</p>
<p>
	भक्त भावार्थी श्रोते प्रेमळ । तयांलागीं तोचि कनवाळ । प्रेमें वदे निजचरित रसाळ । केवळ जें राऊळ तयांचें ॥१६॥</p>
<p>
	शिरीं जयाचा पडतां कर । अहंभावाचा होई चूर । सोहंभावाचा चाले गजर । आनंदनिर्भर द्दश्यजात ॥१७॥</p>
<p>
	काय मज पामरा शक्ति । वानावया तयांची कीर्ति । ज्याचा तोच भक्तप्रीतीं । प्रकटवी पोथी कृपेनें ॥१८॥</p>
<p>
	लोटांगण त्या साईचरणां । अभिवंदन श्रोतृगणां । नमन साधुसंत - सज्जना । प्रेमालिंगन सकळिकां ॥१९॥</p>
<p>
	सहज लीलेनें वार्ता सांगती । जया गर्भीं संपूर्ण नीती । जयाचें लेणें नित्यशांती । महानुभाव ध्याती ज्या ॥२०॥</p>
<p>
	सूर्या उपमितां नाहीं सोई । कीं तो सूर्य अस्तास जाई । चंद्रा उपमूं तरी तो क्षयी । सदैव संपूर्ण साई हा ॥२१॥</p>
<p>
	तया चरणीं हेमाड विनीत । प्रेमें श्रोतयांलागीं विनवीत । परिसा जी कथा श्रद्धायुक्त । दत्तचित्त आवडीनें ॥२२॥</p>
<p>
	भूमी उत्तम नांगरून । बीज ठेविलें आहे पुरून । परी न वर्षतां तुम्ही कृपाघन । पीक निर्माण होईल का ॥२३॥</p>
<p>
	पडतां संतकथा कानीं । पातकांची नुरे कहाणी । पुण्यें अंकुरती कथाश्रवणीं । घ्या ह्या पर्वणीचा लाभ ॥२४॥</p>
<p>
	सलोकतादि चारी मुक्ति । नलगे तेथें आम्हां आसक्ति । जडो त्या साईंची निश्चळ भक्ति । परम प्राप्ति हीच आम्हां ॥२५॥</p>
<p>
	आम्ही मुळींच नाहीं बद्ध । काय आम्हां मुक्तीचा संबंध । होवो संतभक्तीचा उद्बोध । तेणेंच कीं शुद्ध अंतर ॥२६॥</p>
<p>
	जेथें न मीतूंपणस्फूर्ति । ऐसी जे कां ‘सहजस्थिति’ । आम्हां व्हाबी ते अभेदभक्ति । हेंचि साईंप्रति मागूं ॥२७॥</p>
<p>
	आतां श्रोतयां हीच विनंती । वाचूं घेतां ग्रंथ हातीं  ।  वाच्य - वाचन वाचकव्यक्ति । एकात्मस्थिति देखावी ॥२८॥</p>
<p>
	सोडूनि द्यावें हेमाडपंता । कीं तो  न कर्ता या सच्चरिता । केवळ भक्तांचिया निजहितार्था । कारण निमित्ता तो एक ॥२९॥</p>
<p>
	दैवें लाधला शिंपा त्यागिती । त्यांचे हातींचें गेलें मोतीं । काय कीजे अश्वत्थोत्पत्ति । व्हावें न स्वार्थीं उदास ॥३०॥</p>
<p>
	येथें शब्दमात्रा शब्दविता । नाहीं कोणी साईपरता । तोचि श्राव्य श्रवण श्रोता । ही एकात्मता न ढळावी ॥३१॥</p>
<p>
	ना तरी तें नाहीं वाचन । श्रवणीं सादर नाहीं कान । जेथें न वृत्ति एकतान । पारखी कवण शब्दार्था ॥३२॥</p>
<p>
	श्रवणीं धरा निरभिमानता । श्रोतेही साईच भावावें चित्ता । तरीच त्या श्रवणाची सार्थकता । अखंड अद्वैतता राखावी ॥३३॥</p>
<p>
	तेव्हांच सकल इंद्रियप्रवृत्ती । साईरूप होतील निश्चितीं । जळीं जळतंरगस्थिति । ऐसिया वृत्तीं समरसती ॥३४॥</p>
<p>
	तरीच ज्ञानियां परमार्थबोध । विनोदियांतें विनोदामोद । कविताकोविदां पदप्रबंध । ग्रंथीं या आनंद सर्वत्रां ॥३५॥</p>
<p>
	असो पूर्वीं या सच्चरितीं । अध्याय एकोनचत्वारिंशतीं । एका निजोत्तम भक्ताप्रती । समर्थ जो करिती उपदेस ॥३६॥</p>
<p>
	असतां ते भक्त बाबांपाशीं । भगवद्नीता - चतुर्थाध्यायासी । आरंभापासून आवर्तनासी । होते ते समयासी करीत ॥३७॥</p>
<p>
	एकीकडे चरणसेवा । मुखें हळूच पाठ म्हणावा । म्हणतां संपतां तेहतिसावा । घेतला चौतिसावा म्हणावया ॥३८॥</p>
<p>
	निश्चळमनें लय लावुनी । म्हणत होते मनींचे मनीं । परी नसतां कळेसें जनीं । असणार कोठुनी काय तरी ॥३९॥</p>
<p>
	म्हणूं घेतां चौतिसावा । आलें साईनाथांचिया जीवा । आतां येथें अनुग्रह करावा । सन्मार्ग दावावा भक्तोत्तमा ॥४०॥</p>
<p>
	तया भक्ताचें नाम नाना । तंव बाबा म्हणती तयांना । “नाना कायरे पुटपुटसी मना । स्पष्ट रे कां ना वदसी मुखें ॥४१॥</p>
<p>
	केव्हांपासून मुखानें पाहें । कांहीं पुटपुट चालली आहे । परी आवाज परिस्फुट नोहे । ऐसें हें गुह्य काय कीं रे” ॥४२॥</p>
<p>
	मग नाना वदती स्पष्ट । करीत आहें गीतेचा पाठ । इतरां न व्हावी कटकट । आहे ही पुटपुट तदर्थ ॥४३॥</p>
<p>
	असो ती झाली लोकांची गोष्ट । परी मजसाठीं बोल पां स्पष्ट । तुझा तुला तरी कळे कां पाठ । पाहूं दे नीट वदले श्री ॥४४॥</p>
<p>
	मग ‘तद्विद्धि प्रणिपातेन’ । उच्चस्वरें हा श्लोक म्हणून । दाविला नानांहीं प्रणिपात करून । ऐकतां समाधान बाबांस ॥४५॥</p>
<p>
	पुढें या श्लोकाचा अर्थ पुसतां । पूर्वाचार्यकथित अर्था । यथासाङ्ग नानांहीं कथितां । बाबांनीं माथा डोलविला ॥४६॥</p>
<p>
	पुन्हां नानास करिती प्रश्न । ‘उपदेक्ष्यंति ते ज्ञानं’ । नाना पाहीं हा तृतीय चरण । करीं पां मनन तयाचें ॥४७॥</p>
<p>
	त्यांतील ‘ते’ या अक्षरापाठीं । ‘अ’ कारार्थीं अवग्रहापोटीं । अज्ञानपदें अर्थपरिपाटी । होते का उफराटी पाहीं पां ॥४८॥</p>
<p>
	शंकरानंद ज्ञानेश्वर । आनंदगिरी आणि श्रीधर । मधुसूदनादि भाष्यकार । करिती ज्ञानपर । जो अर्थ ॥४९॥</p>
<p>
	तो मान्य आहे जिसा सकळिकां । तैसाच आहे मजही ठावुका । परी अवग्रहें होणारिया कौतुका । जाणूनियां व्यर्थ का मुकावें ॥५०॥</p>
<p>
	ऐसें म्हणून साई कृपाघन । भक्तचकोरचातकाकारण । वर्षले जे बोधामृतकण । झालें निरूपण पूर्वींच ॥५१॥</p>
<p>
	परी या साईलीलेचे वाचक । सर्वांसी या अर्थाचें कौतुक । वाटलें नाहीं कांहीं साशंक । राहिले आश्चर्यकारक हें ॥५२॥</p>
<p>
	असो तयांचें समाधान । जेणें होईल सप्रमाण । असा आणीक अल्प प्रयत्न । करितों ‘अज्ञान’ - समर्थना ॥५३॥</p>
<p>
	बाबांस कोठील संस्कृत ज्ञान । ऐसीही शंका घेईल कोण । संतां न अनधीत कांहींही जाण । शंकेचें कारण आणीकचि ॥५४॥</p>
<p>
	अहो ‘एकेन ज्ञातेन । सर्वं हि विज्ञातं भवति’ प्रमाण । कोणा न मान्य हें श्रुतिवचन । तें अपरोक्षज्ञान साईंस ॥५५॥</p>
<p>
	जैसा करतलस्थित आमलक । तैसें आमूळ विश्व ज्यां देख । तया संतां काय ना ठाऊक । सविताही प्रकाशक ज्यांचेनी ॥५६॥</p>
<p>
	जयातें हें एक ज्ञान । तयास कोठें उरलें अज्ञान । तया विद्याजात अवगत जाण । महत्त्व कोण संस्कृता ॥५७॥</p>
<p>
	असो या लीलेचे कांहीं वाचक । म्हणती “नाना अप्रामाणिक । त्यांचा हा स्वकपोलकल्पित अप्रयोजक । अज्ञानव्यंजक अवग्रह ॥५८॥</p>
<p>
	त्यांनींच रचिलें हे थोतांड । अवग्रहान्वित अज्ञानकांड । उगीच उठविला हा वादवितंड । निजज्ञान अखंड मिरवावया ॥५९॥</p>
<p>
	नसताचि अवग्रह केला प्रस्थापित । ज्ञानाचे जागीं अज्ञान काढीत । ऐसा कांहीं तरी विपरीत । लावीत ते अर्थ गीतेचा” ॥६०॥</p>
<p>
	परी पाहतां वस्तुस्थिती । विचार करितां सूक्ष्म चित्तीं । साईलीला एकोनचत्वारिंशतीं । कांहीं न विसंगती कथेंत ॥६१॥</p>
<p>
	असोत कोणाच्या कांहींही कल्पना । प्रामाणिक वा अप्रामाणिक नाना । परी तयांनीं केलेलिया कथना । वृथा वल्गना न म्हणावें ॥६२॥</p>
<p>
	सोडूनियां नानांचा द्वेष । वाचकीं न होतां विकारवश । दूर सारितां द्दष्टीचे दोष । दिसेल अशेष निर्दोष ॥६३॥</p>
<p>
	साईलीला उत्तमोत्तम । अध्याय एकोनचत्वारिंसत्तम । वाचिल्यावीण या अध्यायीं निर्गंम । होणार नाहीं सुगमपणें ॥६४॥</p>
<p>
	भगवद्नीता श्रीकृष्णमुखीं । चतुर्थाध्यायीं ज्ञानमुखीं । चतुस्त्रिंसत्तम श्लोकीं । अज्ञानोन्मुखी प्रवचन ॥६५॥</p>
<p>
	“तद्विद्धि प्रणिपातेन । परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यंति ते ज्ञानं । ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन:” ॥६६॥</p>
<p>
	हा तो गीतेचा मूळ श्लोक । यांतील तृतीय चरणीं देख । ज्ञानपदाआधीं अवग्रह एक । ‘अज्ञान’ निदर्शक निघतसे ॥६७॥</p>
<p>
	नाणितां मना अवग्रह । ‘ज्ञान’ हें पद ये नि:संदेह । तद्विरुद्ध न कोणाही दुराग्रह । तो अर्थ संग्राह्य सर्वत्रां ॥६८॥</p>
<p>
	‘ज्ञानादेव तु कैवल्यं’ । हें श्रुतिवचन सर्वत्रां मान्य । तरी ज्ञानचि तत्त्वज्ञां उपदेश्य । बंधन हें अनावश्यक त्यां ॥६९॥</p>
<p>
	मी आत्मा साक्षी निर्मळ । शुद्ध बुद्ध मुक्त केवळ । प्रत्यग्भूत चैतन्य सोज्ज्वळ । अद्वयानंद अढळत्वें ॥७०॥</p>
<p>
	परंतु मी नव्हे अज्ञान । अज्ञानाचें कार्यही मी न । ‘अयमात्मा ब्रम्हा’ मी जाण । ‘प्रज्ञानमानंद’ निधान मी ॥७१॥</p>
<p>
	‘अहं ब्रम्हास्मि’ नित्यस्फुरण । शुद्ध ‘विद्या’ ते हेच जाण । मी पापी अभागी दैवहीन । या वृत्तीची खाण ‘अविद्या’ ॥७२॥</p>
<p>
	या मायेच्या पुरातन शक्ति । एकीचे पायीं बंधस्थिति । दुजीपासव बंधनिर्मुक्ति । या जीवाप्रती अनादि ॥७३॥</p>
<p>
	नामरूपाचा सकळ भ्रम । हा तों अवघा मायासंभ्रम । अनिर्वचनीय माया परम । मोठी दुर्गम तरावया ॥७४॥</p>
<p>
	कल्पनेचें जें जें स्फुरण । तेंच मायेचें निवासस्थान । बद्धमुक्त स्थितीचें जनन । कल्पनेमधून निश्चित ॥७५॥</p>
<p>
	‘ज्ञानादेव तुकैवल्यं’ । अबाधित हें श्रुतिप्रमेय । परी न होतां पापकर्मक्षय । ज्ञानाचा उदय अशक्य ॥७६॥</p>
<p>
	जया बाणलें शुद्धज्ञान । संकल्पें त्यास त्यागिलें जाण । तया नाहीं मायेचें बंधन । विकारां स्थान तें नव्हे ॥७७॥</p>
<p>
	शुकासारिखा परमज्ञानी । विकल्पें झाली तयाही हानी । अज्ञान प्रकटे विकल्पापासुनी । तें गुरूवांचुनी निरसेना ॥७८॥</p>
<p>
	प्रवेशतां विकल्प ज्ञानीं । होय ज्ञानियाही अभिमानी । विटे कांजीच्या थेंबें दुधाणी । होतसे घाणी दुग्धाची ॥७९॥</p>
<p>
	म्हणोनि ‘ अज्ञान’ समजावें आधीं । तन्निरासें मन:शुद्धि । होतांच प्रकटेल ‘ज्ञान’ निरवधि । अभेदसमाधि लाधेल ॥८०॥</p>
<p>
	जया द्रव्यवैभवध्यान । विषयसेवनीं अतृप्त मन । स्त्रीपुत्रांचें अखंड चिंतन । तयाचें ज्ञान अज्ञानचि ॥८१॥</p>
<p>
	ऐसा धनसुतदारामोहित । ज्ञानी असतां नेणे निजहित । म्हणोनि जोंवर भक्तीविरहित । अज्ञानावृत ज्ञान त्याचें ॥८२॥</p>
<p>
	जीवजात अज्ञानयुक्त । अज्ञानांतूनि होऊनि मुक्त । ज्ञानी आणिक ज्ञानातीत । होणें तें निश्चित ब्रम्हारूप ॥८३॥</p>
<p>
	अज्ञान जातां प्रकटे ज्ञान । क्षमाशाली तो सज्ञान । गेला न जोंवर देहाभिमान । तोंवर तो आधीन प्रकृतीचे ॥८४॥</p>
<p>
	रामकृष्णादि जे जे अवतार । संतसनकादि शिष्टप्रवर । तयांच्या आज्ञेची प्रकृति किंकर । जियेनें तदितर भुलविले ॥८५॥</p>
<p>
	ह्रदयस्थ असतां सर्वांभूतीं । कोणी नेणे स्वरूपस्थिति । ऐसी या मायेची अतर्क्य स्थिति । आवरणशक्ति अगाध ॥८६॥</p>
<p>
	तरी ‘मी कर्ता मीचि भोक्ता’ । सोडिल्यावीण ही खोटी अहंता । तया ह्रदयस्था शरण न रिघतां । निजनिर्मुक्तता लाभेना ॥८७॥</p>
<p>
	नित्यानित्यवस्तुविवेचन । श्रवणमनननिदिध्यासन । करा व्हा शमदमादिषट्‌कसंपन्न । तेणेंच निवर्तन अज्ञाना ॥८८॥</p>
<p>
	जग मजहूनि सारें भिन्न । मी तों परिमित परिच्छिन्न । ‘देह तोचि मी’ हें भान । हें तों अज्ञान निर्भेळ ॥८९॥</p>
<p>
	ज्ञानप्रतिपादक वेदान्तशास्त्र । तेथ अनुबंधचतुष्टय प्रकार । परम कारुणिक भाष्यकार । वर्णिती विस्तारपूर्वक ॥९०॥</p>
<p>
	‘अधिकारी’ ‘विषय’ ‘संबंध’ तीन । अनुबंध चवथा म्हणजे ‘प्रयोजन’ । प्रयोजनाचें होतां विवेचन । अज्ञाननिवर्तन तैं कळतें ॥९१॥</p>
<p>
	जीवब्रह्माची जी ऐक्यता । तोच मुख्य ‘विषय’ या  वेदान्ता । त्या ऐक्यप्रमेयांतर्गत जी अज्ञानता । तन्निवर्तता तें ‘प्रयोजन’ ॥९२॥</p>
<p>
	त्या  मूलाज्ञानाची निवृत्ति । तीच कीं स्वरूपानंदप्राप्ति । म्हणोनि करूनि युक्तिप्रयुक्ति । अज्ञानोच्छित्ति आवश्यक ॥९३॥</p>
<p>
	जों न भेदाचें निरसन । तों न कोणीही सज्ञान । देहाभिमानियाचें ज्ञान । पूर्ण ‘अज्ञान’ त्या नांव ॥९४॥</p>
<p>
	स्वयें मिरवी सज्ञान । करी अविहित कर्माचरण । जळो त्याचें जागेपण । तो कुंभकर्ण निद्रिस्त ॥९५॥</p>
<p>
	वेदबाह्य ज्याचें वर्तन । न करी वर्णाश्रमपरिपालन । तयाच्या चित्तशुडीचें साधन । अविद्यानिरसन हें एक ॥९६॥</p>
<p>
	सत्त्वादि त्रिगुणत्रिप्रकारें । शब्दादि विषय नानाविकारें । उपस्थ आणि जिव्हाद्वारें । ब्रम्हादि सारे ठकियेले ॥९७॥</p>
<p>
	जगज्जंगम प्राणिजात । अनादिअविद्यामायापरिवृत । रागद्वेषादि विकारें मोहित । अज्ञानावृत हे सर्व ॥९८॥</p>
<p>
	अविद्येमाजी जीव बद्ध । त्याचें प्रकटावया रूप शुद्ध । अविद्या-काम-कर्मबंध । तुटला संबंध पाहिजे ॥९९॥</p>
<p>
	दुग्धें तुडुंब गळती सड । तेथेंच घट्ट चिकटले गोचिड । परी तया अशुद्धीं आवड । दुग्धाची चाड काय तया ॥१००॥</p>
<p>
	पहा दर्दुर आणि भ्रमर । कमळ सुंदर दोघांचें घर । परी परागीं भ्रमरा विहार । दर्दुरा आहार चिखलाचा ॥१०१॥</p>
<p>
	सन्मुख दिसे ज्ञानाचा गड्डा । अज्ञानाकडे मूर्खाचा ओढा । अज्ञानचि वाटे ज्ञान मूढा । ज्ञानाचा पाढा काय तया ॥१०२॥</p>
<p>
	होतां अविद्येचें निर्मूलन । स्वयें प्रकटे ब्रम्हाज्ञान । म्हणूनि अविद्येचें प्रतिपादन । आवश्यक जाण आरंभीं ॥१०३॥</p>
<p>
	एका ब्रम्हाज्ञानासमान । नाहीं पवित्र त्रिजगीं आन । त्याच्याच उपदेशा अत्यंत मान । त्यावीण जीवन निष्फळ ॥१०४॥</p>
<p>
	बुद्धयादिकांचा चेष्टाविषय । ब्रम्हा हें असतें ऐसें कार्य । तरी एकादें तरी इंद्रिय । तें हें होयसें दाखवितें ॥१०५॥</p>
<p>
	ब्रम्हातत्त्व बुद्धिग्राही । ‘बुद्धिग्राह्यमतींद्रिय’ पाहीं । ऐसें स्मृति गर्जतांही । श्रुतीस तें नाहीं संमत ॥१०६॥</p>
<p>
	बुद्धयादिकांचा झाल्या अभाव । ग्रहणकारणचि झालें वाव । मग ब्रम्हाचा अस्तित्वभाव । उरला न ठाव मानावया ॥१०७॥</p>
<p>
	करणगोचर जें जें कांहीं । तें तें आहे इतर नाहीं । हें तों सर्वत्र प्रसिद्ध पाहीं । ब्रम्हा कदाही असतां नये ॥१०८॥</p>
<p>
	ऐसा होईल याचा अर्थ । परी तेणें होईल अनर्थ । सूक्ष्मतारतम्यपरंपरार्थ । बुद्धिही सत् निरंतर ॥१०९॥</p>
<p>
	होईना कां तिचाही प्रलय । तेथेंही ती वसे सत्प्रत्यय । आत्मा विश्वाचें मूळ नि:संशय । अस्तित्वनिष्ठ लय सर्व ॥११०॥</p>
<p>
	खडा मारितां घटावरती । आकारविलयें खापर्‍या उरती । घटाकारा जरी निवृत्ति । खापर्‍या अनुवृत्तिदर्शक ॥१११॥</p>
<p>
	जरी  घटकार्याचा ध्वंस । घटास्तित्वा नाहीं नाश । खापर्‍या कारण अनुवृत्तीस । कार्यास्तित्वांश तेणेंपरी ॥११२॥</p>
<p>
	शून्यत्वीं ज्याचें पर्यवसान । ऐसें न केव्हांही कार्यप्रविलापन । अस्तित्वनिष्ठ लय हें प्रमाण । सत्‌ - प्रत्ययलीन सद्बुद्धि ॥११३॥</p>
<p>
	सर्व तीर्थें व्रतें पावन । पावनाहूनि पावन ज्ञान । तया ब्रम्हाज्ञानावांचून । भजनपूजन निरर्थक ॥११४॥</p>
<p>
	अविद्येनें चित्त मलिन । त्या चित्ताचें मलक्षालन । नाहीं ईशभक्तीवांचून । भक्तीवीण ज्ञान उपजेना ॥११५॥</p>
<p>
	म्हणूनि आधीं अज्ञान जाण । तयाचा बोध तयाचें निरूपण । होतां होईल तब्दंधनिरसन । भक्तीच प्रमाण तयातें ॥११६॥</p>
<p>
	पायाळाचे डोळां अंजन । पडतां देखे भूमिगत धन । तेवीं भक्तीचें होतां अवलंबन । अज्ञाननिरसन ज्ञानोदय ॥११७॥</p>
<p>
	ज्ञान तेंच स्वरूपप्राप्ति । तया मूळ अज्ञाननिवृत्ति । घडल्यावांचूनि ईशभक्ति । मायेची शक्ति अनिवार ॥११८॥</p>
<p>
	ज्ञानाज्ञानाची भेसळ । अज्ञान वेंचूनि काढावें निखळ । खडे टाकूनि घ्यावे तांदूळ । आधणीं निवळ वैरावया ॥११९॥</p>
<p>
	भूतीं भगवंत ठायीं ठायीं । ज्ञानयज्ञादि - उपासनांहीं । विश्वतोमुख कृश्णा जो पाही । अज्ञान दाही ज्ञानास्तव ॥१२०॥</p>
<p>
	आतां ज्ञानयज्ञाचें स्वरूप । “अहं ब्रम्हास्मि” जेथील यूप । पंचमहाभूतें यज्ञमंडप । जीवेश्वरभेद पशु तेथें ॥१२१॥</p>
<p>
	पंच इंद्रियें पंच प्राण । हेंच यज्ञाचें उपचारभरण । मनबुद्धीचिया कुंडांमधून । प्रदीप्तीकरण ज्ञानाग्नीचें ॥१२२॥</p>
<p>
	यज्ञकर्ता जीव यजमान । करी अज्ञानघृतावदान । आत्मानंदरसीं निमग्न । अवभृथस्नान जीवा घडे ॥१२३॥</p>
<p>
	तात्पर्य अज्ञानघृतावांचून । कदा न प्रकटे ज्ञानहुताशन । जीवेश्वरभेदातें जाळून । अभेदज्ञान प्रकट करी ॥१२४॥</p>
<p>
	स्वच्छ आदर्श मलाच्छादित । वन्हिप्रकाश धूमावृत । तैसें कामक्रोधाभिभूत । अज्ञानें तिरोहित तें ज्ञान ॥१२५॥</p>
<p>
	चंद्रबिंबा राहु ग्रासी । अथवा शैवाल जैसें जलासी । तैसें स्वयंप्रकाश ज्ञानासी । आच्छादी कैसी ही माया ॥१२६॥</p>
<p>
	मोठमोठया ज्ञात्यांची मती । भ्रष्ट होऊनि जाती अधोगती । उपाय माहिती परी न तगती । आचरण करिती यथेच्छ ॥१२७॥</p>
<p>
	डोळस असतां अंध होती । संग सोडूनि नि:संग वर्तती । तेही बळें कुसंगें नाडती । आचरण करिती यथेच्छ ॥१२८॥</p>
<p>
	वानप्रस्थ गृहस्थाश्रम घेती । करूं नये तें अचूक करिती । जिया वस्तूची चिळस घेती । तीच स्वीकारिती प्रिय म्हणुनी ॥१२९॥</p>
<p>
	प्रयत्नें जे पापें चुकविती । तेही अद्दष्टें पापांत पडती । काय म्हणावें ऐसिये स्थिती । ही काय ज्ञाती ज्ञान्याची ॥१३०॥</p>
<p>
	जरी मोठा ज्ञानी झाला । नेच्छी पापाचे सावलीला । तरी तो कार्याकार्यज्ञतेला । भुले दीपाला पतंगसा ॥१३१॥</p>
<p>
	पाप करणें हें अज्ञान । याची तया पूर्ण जाण । परी हा काम प्रवृत्तिकारण । करी ना गुमान तयाची ॥१३२॥</p>
<p>
	हेम अवघें क्रियाजात । केवळ एका कामाचें चेष्टित । काम सर्वानर्थां हेत । तोच कीं परिणत क्रोधरूपें ॥१३३॥</p>
<p>
	कामगतीस जैं अवरोध । तैंच तो काम होई क्रोध । पदोपदीं हा मोक्षास विरुद्ध । ज्ञानप्रतिबंधक ही वृत्ति ॥१३४॥</p>
<p>
	कामक्रोध यांचा त्रास । जडलाच आहे या जीवास । ब्रम्हास्वरूपा जवळपास । ज्ञानाचे पंक्तीस वास यांचा ॥१३५॥</p>
<p>
	पाण्यावाचूनि बुडवितात । अग्नीवांचूनि जाळितात । शस्त्रावांचूनि मारतात । दोरावीण करितात बंधन ॥१३६॥</p>
<p>
	तयांपुढें ज्ञानीही न टिकत । ज्ञानियां करिती पैजेनें चित । महाप्रलय करण्याचें सामर्थ्य । नकळतां ग्रासीत प्राणिया ॥१३७॥</p>
<p>
	चंदनाचे वृक्षामुळीं । जैसीं काळसर्पाचीं वेटोळीं । तैसीं कामक्रोधांची खोळी । वरूनि वेटोळी ज्ञानगर्भा ॥१३८॥</p>
<p>
	इंद्रियें बुद्धि आणि मन । हीं त्या कामाचें आयतन । तयांच्या योगें जीवाचें ज्ञान । झांकूनि मोहन घाली तया ॥१३९॥</p>
<p>
	जरी तुम्हां पाहिजे चंदन । तरी सर्पाचें करा कंदन । कामक्रोधांचें सारूनि आवरण । साधावें निधान ज्ञानाचें ॥१४०॥</p>
<p>
	न करितां सर्पाचें कंदन । लाभेल काय कवणा चंदन । कृष्णसर्प संहारिल्यावीण । पुरलेलें धन लाभेल कां ॥१४१॥</p>
<p>
	तैसें परतत्त्व आत्मज्ञान । तें पदरीं पडावया कारण । प्रकृतिजवनिका - निस्सारण । हें एकचि साधन तदर्थ ॥१४२॥</p>
<p>
	म्हणोनि आधीं इंद्रियनियमन । तेणें काम - क्रोधां निर्दळण । जीव कामक्रोधांआधीन । अज्ञान आवरण ज्ञानास ॥१४३॥</p>
<p>
	देहाहूनि इंद्रियें सूक्ष्म । मन तयांहूनि सूक्ष्म परम । बुद्धि मनाहूनही सूक्ष्मतम । बुद्धीहूनि सूक्ष्म परमात्मा ॥१४४॥</p>
<p>
	सर्वसंसारधर्मवर्जित । ऐसें हें परात्पर परम सत । तो हा परमात्मा परमहित । तेंच अमृत निजरूप ॥१४५॥</p>
<p>
	शुद्ध बुद्ध नित्य मुक्त । तेंच तत्त्व अभेदस्थित । तेंच परमानंदभूत । प्रत्यग्भूत चैतन्यातें ॥१४६॥</p>
<p>
	जया नाम पंचीकरण । तेंच कीं मायारूपदर्शन । अध्यारोपापवादैकसाधन । व्हावया प्रबोधन तयाचें ॥१४७॥</p>
<p>
	अपंचीकृत पंचमहाभूतें । पंचतन्मात्रा वदती ज्यांतें । तत्कार्य प्राणेंद्रियमनोबुद्धीतें । ‘सूक्ष्म’ - शरीरता येते आत्मयाची ॥१४८॥</p>
<p>
	पहा पंचीकृत पंचभूतें । तेथूनि विराट उदया येतें । तया आत्म्याचे ‘स्थूल’ देहातें । ‘विराट’ ज्ञाते वद्तात ॥१४९॥</p>
<p>
	स्थूल - सूक्ष्म - शरीरां कारण । केवळ स्वस्वरूपाज्ञान । तेंच साभास ‘अव्याकृत’ जाण । शरीर ‘कारण’ आत्म्याचें ॥१५०॥</p><p>
	हें कारणशरीर रव्यात । जें चैतन्यप्रतिबिंबयुत । केवलाज्ञाना कारणभूत । अव्याकृत अव्यक्त ज्या नाम ॥१५१॥</p>
<p>
	आत्म्याचें अज्ञान तें या कारण । ना निरवयव ना सावयव ना उभय जाण । केवळ ब्रम्हात्मैकत्वज्ञान । तेणेंच कीं निरसन या देहा ॥१५२॥</p>
<p>
	स्वस्वरूपीं अवस्थान । तयासीच ‘मोक्ष’ अभिधान । यावीण मोक्ष नाहीं आन । स्वरूपावस्थान तो मोक्ष ॥१५३॥</p>
<p>
	केवल ब्रम्हात्मैकत्व - ज्ञान । जाहल्या होईल अज्ञाननिरसन । म्हणूनि अज्ञान समजावया जाण । तयाचें निरूपण आवश्यक ॥१५४॥</p>
<p>
	अविद्येनें शबल झालें । तेणें ब्रम्हा शबलत्व आलें । तया ‘सत’ हें नाम ठेविलें । ऐसें तें पावलें वाच्यत्व ॥१५५॥</p>
<p>
	जरी अतींद्रिय मूळचें वहिलें । ‘बुद्धिग्राह्य’ वाचेनें केलें । तेव्हांच तें मनीं प्रविष्टलें । आकारा आलें  ॐ कारें ॥१५६॥</p>
<p>
	या ॐ कारब्रम्हाचें ध्यान । सवें करितां ईश्वरस्मरण । होई जयाचें देहावसान । पावे जनन सार्थक ॥१५७॥</p>
<p>
	असो या वाच्य - ब्रम्हापासाव । अव्यक्ताचा प्रादुर्भाव । अव्यक्तापासूनि महतत्तत्त्व । उपजे अहंभाव त्यापोटीं ॥१५८॥</p>
<p>
	पंचतन्मात्रा अहंकारीं । पंचमहाभूतें त्यामाझारीं । पंचमहाभूतांचिया उदरीं । जग विर्धारीं जन्मलें ॥१५९॥</p>
<p>
	अविद्यामायारूपदर्शन । तेंच या जगाचें रूपलक्षण । या अविद्येचें कराया निरसन । अज्ञानविवेचन आवश्यक ॥१६०॥</p>
<p>
	अत्यंत विशुद्ध आणि निर्मळ । जें चिन्मात्र स्वरूप केवळ । त्याहूनि वेगळें जें तें ‘शबल’ । दोघांची भेसळ करितां न ये ॥१६१॥</p>
<p>
	लक्ष्य ब्रम्हा जाणा निराळें । वाच्याहून तें अत्यंत निराळें । म्हणून हीं अज्ञानाचीं पडळें । उपदेशबळें सारावीं ॥१६२॥</p>
<p>
	निद्रेमाजी पडतां स्वप्न । डोळे नसतां डोळस मन । स्वयें देखे अखिल त्रिभुवन । अविद्याकारण या सर्वां ॥१६३॥</p>
<p>
	पाहूं जातां वस्तु एक । परी आभासे ती आणिक । रज्जु भासे सर्प देख । रजत शुक्तिके - गर्भांत ॥१६४॥</p>
<p>
	पहा सूर्याचे किरण केवळ । जन म्हणे तया ‘मृगजळ’ । परी हा केवळ मायेचा खेळ । ज्ञानीही हतबळ इजपुढें ॥१६५॥</p>
<p>
	पेटलेलें कोलीत हातीं । जेव्हां कोणी गरगर फिरविती । अग्निकंकण द्दष्टोत्पत्तीं । येतें ही ख्याती मायेची ॥१६६॥</p>
<p>
	पाहूं जातां अग्नि खरा । अलातचक्रा नाहीं थारा । तैसाच हा मायामोहपसारा । नसतिया संसारा उत्पादी ॥१६७॥</p>
<p>
	ऐसिया निर्धारें गेलिया भ्रम । संसार तेव्हांच पावे उपरम । मी देह माझें कलत्र धाम । व्यर्थ परिश्रम हा सारा ॥१६८॥</p>
<p>
	पुत्रपश्वादि तृष्णापाशा । इंहीं वेष्टिले जाऊनि अशेष । म्हणविती ज्ञानी पंडितेश । सुख न लवलेश गांठीस ॥१६९॥</p>
<p>
	शास्त्रकुशल प्रज्ञावान । दुजा नाहीं आपणासमान । अंतरीं मोठा हा अभिमान । असमाधानकारक ॥१७०॥</p>
<p>
	हेच माया वा अज्ञान । अथवा अविद्या - प्रकृतिप्रधान । आरंभीं ज्ञानी यांचेंच निरसन । करितां मग ज्ञान उपतिष्ठे ॥१७१॥</p>
<p>
	ज्ञान हें तों स्वयंप्रकाश । करणें नलगे याचा उपदेश । अज्ञानाचा होतां निरास । ज्ञानोल्लास प्रकटेल ॥१७२॥</p>
<p>
	तेज:पुंज एकादें रत्न । जातां केरा - मातींत दाटून । गेलीं वर्षांचीं वर्षें लोटून । बुजालें स्मरण तयाचें ॥१७३॥</p>
<p>
	कर्मधसंयोगप्राप्ती । कदाकाळीं लागतां हातीं । वाटे हरपली समूळ दीप्ती  । दगडमातीसंगतीं ॥१७४॥</p>
<p>
	पुढें तें स्वच्छ घासतां । वरील काटमाती जातां । पावे तें पूर्वील तेज:पुंजता । तैसीच अवस्था ज्ञानाची ॥१७५॥</p>
<p>
	माती - काट तें अज्ञान । याच अज्ञानें आवृत ज्ञान । करितां काट - मातीचें निरसन । उजळेल रत्न सहजेंच ॥१७६॥</p>
<p>
	पापकर्मविनाशक । नित्यानित्यवस्तुविवेक । तोचि सत्त्वशुद्धिप्रदायक । तोचि उत्पादक ज्ञानाचा ॥१७७॥</p>
<p>
	हें जग मायेचा बाजार । खर्‍या नकली वस्तु अपार । खर्‍या म्हणूनि नकली घेणार । ऐसें गिर्‍हाईक फार तेथें ॥१७८॥</p>
<p>
	तरी निवडावी कैसी नकली । भल्याभल्यांची बुद्धि थकली । जिये लक्षणीं आणावी भुली । तीं तंव समजलीं पाहिजेत ॥१७९॥</p>
<p>
	म्हणोनि सवें लागे पारखी । नकली कां दिसे खर्‍यासारखी । हे तो दावील देखादेखीं । जाईल शेखीं अज्ञान ॥१८०॥</p>
<p>
	अज्ञान जातां राहील ज्ञान । होईल सहजचि मायानिरसन । उरेल तीचि सद्वस्तू जाण । नलगे प्रमाण प्रत्यक्षा ॥१८१॥</p>
<p>
	सोज्ज्वल जरी बुद्धीचे डोळे । कल्पनातिमिरें असती झांकोळले । हें तिमिर उपदेशें पळे । उरे जें सगळें तें ज्ञान ॥१८२॥</p>
<p>
	वस्तुत: जरी मार्गीं माळ । द्दष्टी देखतां सांजवेळ । माळ असतां भासला व्याळ । अज्ञानपडळ कारण त्या ॥१८३॥</p>
<p>
	खिशामाजील गुप्त दीप । उजळितां झाला अज्ञानलोप । प्रकट झालें खरें स्वरूप । व्यालत्व आपाप मावळलें ॥१८४॥</p>
<p>
	म्हणोनि अज्ञानाचा अपाय । घालवावया उपदेश उपाय । तदर्थ ज्ञानीं झिजवोनि काय । अज्ञान तें काय उपदेशिती ॥१८५॥</p>
<p>
	असतां प्रपंचीं वर्तमान । प्रसंगें प्रारब्धें जें आपन्न । तें भूतकार्य अज्ञानजन्य । आधीं हें ज्ञान आवश्यक ॥१८६॥</p>
<p>
	‘सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रम्हा ।’ अविद्या माया सकळ भ्रम । या जैं होईल उपरम । तैंच संभ्रम ज्ञानाचा ॥१८७॥</p>
<p>
	ज्याचा गेला न देहाभिमान । तयासी कोण म्हणे सज्ञान । अभिमानाचेम अधिष्ठान । त्या नांव अज्ञान मूर्तिमंत ॥१८८॥</p>
<p>
	जयास म्हणती मायेचा पूर । जयामाजी हें जगत चूर । तो हा देखत भूलसंसार । अज्ञान मूलाधार तयास ॥१८९॥</p>
<p>
	अज्ञानापासाव याचा उद्भव । अज्ञानजनित याचें वैभव । एकत्वीं जो अनेकत्वभाव । तयाचा ठाव अज्ञान ॥१९०॥</p>
<p>
	किंचित् प्रकाश किंचिदंधार । ऐसिया समयीं मार्गींचा दोर । दोरचि असतां भासे विखार । भय अपार वाटतसे ॥१९१॥</p>
<p>
	सर्पाभास केवळ अज्ञान । त्या अज्ञानें झांकिलें ज्ञान । न होतां हें अज्ञाननिरसन । होईना मन निर्भय ॥१९२॥</p>
<p>
	कोणास भासे सुमनमाळा । कोणास दिसे दंड डोळां । एवंच हा भासचि सगळा । भ्रांतीच्या अवकळा अनिवार ॥१९३॥</p>
<p>
	केवळ आगमवचनानुसारी । जो आस्तिक्यश्रद्धानुकारी । तोच ब्रम्हाज्ञानाधिकारी । नास्तिक जन्मजन्मांतरीं नेणेच ॥१९४॥</p>
<p>
	विश्व हें विपरीतदर्शियां भ्रम । त्यांचा न फिटे जन्ममरणक्रम । ब्रम्हातत्त्व तयां जें दुर्गम । तें अत्यंत सुगम अधिकारियां ॥१९५॥</p>
<p>
	येथें न कामीं येई प्रवचन । अथवा अनेक वेदस्वीकरण । अथवा न मेधा ग्रंथार्थधारण । ग्रंथावलोकन बहुश्रुतता ॥१९६॥</p>
<p>
	शब्दें होईल शब्दज्ञान । तेणें कां होईल वस्तुविज्ञान । बुद्धि अतिविवेकसंपन्न । वस्तु न तदधीन केव्हांही ॥१९७॥</p>
<p>
	श्रुतींनीं मोठी बांधिली हाव । परी न लाधतां वस्तूचा ठाव । परतल्या ऐसें वस्तूचें वैभव । खुंटली धांव जाणिवेची ॥१९८॥</p>
<p>
	षडदर्शनें टेकीस आलीं ॥ अद्यापि वादच करीत राहिलीं । आत्मवस्तु ठायींच ठेली । शब्दा न आकळली केव्हांही ॥१९९॥</p>
<p>
	झाले मोठे शब्दपंडित । वस्तुसूर्यापुढें खद्योत । एकदां झालिया वस्तु प्राप्त । मावळे समस्त शब्दजाल ॥२००॥</p>
<p>
	जगीं पहा अंधारे रातीं । दीपप्रकाशें क्रिया चालती । परी सूर्योदय होतां प्रभातीं । उपेक्षिती दीपातें ॥२०१॥</p>
<p>
	तरी जें नव्हे वाचेचा विषय । होईल कैसें तरी उपदेश्य । म्हणोनि अज्ञाननिरसन ध्येय । असावें आख्येय वक्त्यातें ॥२०२॥</p>
<p>
	एक अस्तित्वबुद्धया उपासन । तेणेंच आत्मा होऊनि प्रसन्न । करी निजतत्त्वभाव - प्रकाशन । होई उपलभ्यमान उपासकां ॥२०३॥</p>
<p>
	आत्म्याचे ठायीं परमात्मध्यान । दोन्हीमाजी अभेदानुसंधान । येणेंपरी करितां उपासन । आत्माचि प्रसन्न उपासकां ॥२०४॥</p>
<p>
	तयां नाहीं अन्य साधन । तेणेंचि व्हावें लागे प्रसन्न । साधक पाहूनि आत्मप्रवण । आत्मा त्या आपणचि करी कृपा ॥२०५॥</p>
<p>
	होतां ग्रंथाची विषयसमाप्ति । वक्ते श्रोतयां सदैव प्रार्थिती । श्रवणश्रमार्थ क्षमा मागती । ही शिष्टरीति सर्वत्र ॥२०६॥</p>
<p>
	तैसें नव्हे या सच्चरितीं । कर्तृत्व याचें न माझे माथीं । स्वयें साईच निजकथा लिहविती । लेखणी मज हातीं देऊन ॥२०७॥</p>
<p>
	म्हणूनि नव्हे मी ग्रंथकर्ता । येथें न श्रांत कोणी मजकरितां । क्षमा कीजे श्रोतीं म्हणतां । आदळे माथां कर्तृत्व ॥२०८॥</p>
<p>
	मज नाहीं येथें भूषण । किंवा नातळे अंगा दुषण । जेथें साईच कर्ता आपण । तयाचेनि संपूर्ण हा विषय ॥२०९॥</p>
<p>
	घेऊनि साईंचें अनुज्ञापन । केलें त्यांनीं जैसें कथन । तैसें तैसें मीं केलें लेखन । अज्ञानविवेचन श्रवणार्थ ॥२१०॥</p>
<p>
	प्रकट कराया निजवैभव । आपुला प्रताप आपुला गौरव । प्रवेशोनि मजमाजी स्वयमेव । विषयार्थ गुरुदेव प्रकाशी ॥२११॥</p>
<p>
	देईल जो या ग्रंथा दूषण । अथवा त्याचें मानी जो भूषण । ते दोघे मज वंद्य पूर्ण । निजनारायणस्वरूप ॥२१२॥</p>
<p>
	भक्ताचिया परमहिता । स्वयें निर्मोनि निजचरिता । हेमाडाचिया धरोनि हाता । कथा लिहविता श्रीसाई ॥२१३॥</p>
<p>
	जयाचा शरीरपरिग्रह । केवळ करावया लोकानुग्रह । खंडावया कुतर्क दुराग्रह । लोकसंग्रह रक्षावया ॥२१४॥</p>
<p>
	म्हणोनि हेमाड तया चरणीं । अनन्यभावें येई लोटांगणीं । पुढील रसाळ कथांच्या श्रवणीं । व्हावें श्रोतृगणीं सावचित्त ॥२१५॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । अज्ञाननिरसनं नाम पंचाशत्तमोऽध्याय: संपूर्ण ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 Apr 2022 15:21:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 Apr 2022 16:09:40 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ४९]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-49-122042900056_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
साङ्गोपाङ्ग सद्नुरु स्तवणें । ठकले वेद आणि पुराणें  । तेथें मी अजाण नेणतेपणें । बरें राहणें निवान्त ॥१॥
खरें ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 49" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/29/full/1651225873-571.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra part 49" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	साङ्गोपाङ्ग सद्नुरु स्तवणें । ठकले वेद आणि पुराणें  । तेथें मी अजाण नेणतेपणें । बरें राहणें निवान्त ॥१॥</p>
<p>
	खरें पाहतां धरावें मौन । हेंच कीं वस्तुत: सद्नुरुस्तवन । परी साईंचे एकेक गुण । पाडिती विस्मरण मौनाचें ॥२॥</p>
<p>
	धन्य साईंची अगाध लीला । पाहतां निवान्त राहवे न मजला । पव्कान्न गोड लागतां जिव्हेला । मनीं आठवला श्रोतृवृंद ॥३॥</p>
<p>
	तयांसीही पंक्तीस घ्यावें । जेणें निजरसानंद दुणावे । ऐसें माझिया घेतलें जीवें । तेणें ही रससोये निडारली ॥४॥</p>
<p>
	मोठें गोड खरें पव्कान्न । पंक्तीं नसतां स्नेही सज्जन । नावडे तें एकतयालागून । फिकें गोडपण तयाचें ॥५॥</p>
<p>
	साई सकळअवाप्तकाम । साई सकळसंतललाम । साई निजभक्त-विश्रामधाम । दुर्धरभवभ्रमनिवारक ॥६॥</p>
<p>
	अनिर्वाच्य तयाची लीला । वर्णवेना मम वाणीला । अतर्क्याची अतर्क्य कला । केवीं मजला आकळेल ॥७॥</p>
<p>
	कल्याणाचें जें कल्याण । तो हा साई निजकृपें जाण । देई निजकर्थचें स्मरण । ग्रंथ हा परिपूर्ण करावया ॥८॥</p>
<p>
	गाऊं जातां अगाध महिमान । समर्थ कोण कराया कथन । परा जेथें निघे परतोन । पश्यंती मध्यमा कोण कथा ॥९॥</p>
<p>
	तिघी जेथें नुघाडती वदन । चौथी वैखरी तेथें कोण । हें मी जाणें जरी संपूर्ण । तरी हें मन राहीना ॥१०॥</p>
<p>
	सद्नुरूचे पायीं न विनटतां । यथार्थ स्वरूप येईना हाता । संत श्रीहरिस्वरूप स्वत: । कृपाहस्ता प्रार्थावें ॥११॥</p>
<p>
	गुरुचरणाची आवडी । हेचि आपुली सर्वस्वजोडी । संतसहवासाची गोडी । प्रेमपरवडी लागो आम्हां ॥१२॥</p>
<p>
	जया पूर्ण देहाभिमान । तया न साजे ‘भक्त’ अभिधान । स्वयें जो पूर्ण निरभिमान । खरें भक्तपण त्याअंगीं ॥१३॥</p>
<p>
	जजया ज्ञातृत्त्वाचा ताठ । श्रेष्ठत्वाचा अभिमान लाठा । केवळ दंभाचा जो वसवटा । तयाची प्रतिष्ठा ती काय ॥१४॥</p>
<p>
	आपुल्याच गुरुची कीर्ति । अभागी जे प्रेमें न गाती । बधिर नसूनि जे नायकती । ते मंदमति मूर्तिमंत ॥१५॥</p>
<p>
	तीर्थ व्रत यज्ञ दान । यांहूनि थोर तपाचरण । त्यांहूनि अधिक । हरिभजन । निजगुरुध्यान सर्वाधिक ॥१६॥</p>
<p>
	साईच त्याचिया भक्तांचें ध्यान । साईच त्यांचें देवदेवतार्चन । साईच त्यांचें गुप्तनिधान । रक्षावें परी अकृपणत्वें ॥१७॥</p>
<p>
	यद अकदा येई मज आळस । परी न अंतर्यामीं साईंस । विसर पडतां कथानकास । देई मज वेळेस आठवण ॥१८॥</p>
<p>
	बसूं म्हणतां क्षण निवान्त ।  माझें कांहीं न चले तेथ । कथा ऐसी स्फुरे अकल्पित । लेखणी हातांत घेणें पडे ॥१९॥</p>
<p>
	ऐसिया त्याच्या अगाध कथा । ऐकवावया त्या निजभक्तां । आणिक माझिया निजस्वार्था । मज या सच्चरिता प्रवर्तविलें ॥२०॥</p>
<p>
	नाहींतरी संताचिया कथा । ज्याचा तोच रचिता लिहिता । तयाची ती स्फूर्ती नसतां । केवळ नीरसता पदोपदीं ॥२१॥</p>
<p>
	असो कृपाळू साईनाथ । प्रवेशूनि मन्मनाआंत । करवूनि घेतला आपुला ग्रंथ । माझेही मनोरथ पुरविले ॥२२॥</p>
<p>
	मुखीं श्रीसाईनामावर्तन । चित्तीं तयाचें वचनचिंतन । मनीं तयाचे मूर्तीचें ध्यान । पूर्ण समाधान येणें मज ॥२३॥</p>
<p>
	वदनीं श्रीसाईंचें नाम । अंतरीं श्रीसाईंचें प्रेम । ज्याचें साईप्रीत्यर्थ कर्म । ऋणाईत परम त्या साई ॥२४॥</p>
<p>
	तुटावया संसारबंधन । याहूनि नाहीं अन्य साधन । साईकथा परम पावन । सदा सेवन सुखदायी ॥२५॥</p>
<p>
	पायीं साईसी प्रदक्षिण । करा श्रवणीं सच्चरितश्रवण । सर्वांगीं द्या प्रेमालिंगन । डोळां घ्या दर्शन साईचें ॥२६॥</p>
<p>
	साष्टांगीं यावें लोटांगणीं । मस्तक ठेवावें तया चरणीं । जिभा लावावी तन्नामस्मरणीं । नासिकें अवघ्राणीं निर्माल्य ॥२७॥</p>
<p>
	आतां पूर्वकथानुसंधान । गताध्यायीं श्रोतयांलागून । चमत्कारप्रिय भक्तकथाकथन । कथीन हें वचन दीधलें ॥२८॥</p>
<p>
	स्वयें न स्वार्थ - परमार्थपरायण । नसतां  संतांचे अधिकाराची जाण । केलिया कोणीं तयांचें वर्णन । अविश्वासी मन जयाचें ॥२९॥</p>
<p>
	स्नेही कथितां साईंच्या गोष्टी । ऐके परी तो दोषैकद्दष्टी । तया न मिळतां स्वानुभवपुष्टी । कांहीं न सृष्टींत मानी तो ॥३०॥</p>
<p>
	हरी कानोबा नामाभिधान । स्नेह्यांसवें मुंबईहून । करावया साईंचें परीक्षण । निघाले पर्यटण करावया ॥३१॥</p>
<p>
	परी साईंची कलाकुसरी । प्रकाशे जो सकळांतरीं । तें लाघव ती नवलपरी । कोण निर्धारीं जाणील ॥३२॥</p>
<p>
	हरीभाऊ शिरडीस निघतां । करण कळलें साईसमर्था । केवळ चमत्काराचा भोक्ता । तितुकीच पात्रता तयाची ॥३३॥</p>
<p>
	तितुकीच तया दावी चुणूक । घेई आपुलासा करूनि निष्टंक । तयाच्याही श्रमाचें सार्थक । युक्तिप्रयोजक संत खरे ॥३४॥</p>
<p>
	कोपरगांवीं स्नेहीसमेत । हरीभाऊ बैसले टांग्यांत । गोदावरींत होऊनि सुस्नात । निघाले शिर्डीप्रत अविलंबें ॥३५॥</p>
<p>
	येतांच कोपरगांवाहून । हस्तपाद प्रक्षाळून । हरीभाऊ संतावलोकन । करावया जाण निघाले ॥३६॥</p>
<p>
	पायीं कोरें पादत्राण । माथां जरीचा फेटा बांधून । साईबाबांचें घ्यावया दर्शन । उत्कंठितमन हरिभाऊ ॥३७॥</p>
<p>
	मग ते येतां मशिदीसी । दुरूनि देखूनियां साईंसी । वाटलें सन्निध जाऊनि त्यांसी । लोटांगणेंसीं वंदावें ॥३८॥</p>
<p>
	परी पादत्राणांची अडचण । ठेवावया न निर्भयस्थान । तेथेंचि एक कोपरा पाहून । त्यांतचि तीं सारून ठेवियलीं ॥३९॥</p>
<p>
	मग ते वरती दर्शना गेले । प्रेमें साईंचे चरणां वंदिलें । उदीप्रसाद घेऊनि परतले । वाडयांत निघाले जावया ॥४०॥</p>
<p>
	पायीं घालूं जातां पायतण । मिळेना पाहतां शोधशोधून । परतले अनवाणी खिन्नवदन । आशा ते सांडून समूळ ॥४१॥</p>
<p>
	कारण तेथें मंडळी फार । येती जाती वारंवार । पुसावें तरी कोणास साचार । कांहींही विचार सुचेना ॥४२॥</p>
<p>
	ऐसें तयांचें दुश्चित मन । डोळियांपुढें पादत्राण । चित्तास पादत्राणचिंतन । सर्वानुसंधान पादत्राण ॥४३॥</p>
<p>
	हौसेसारिखें विकत घेतलें । पादत्राण गेलें हरलवेलं । अर्थात् कोण्या चोरानें चोरिलें । निश्चयें वाटलें तयांस ॥४४॥</p>
<p>
	असो पुढें केलें स्नान । पूजा नैवेद्यादि सारून । पंक्तीस बैसूनि केलें भोजन । परी न समाधान चित्तास ॥४५॥</p>
<p>
	सभामंडप साईंचें स्थान । तेथूनि साइंची द्दष्टि चुकवून । कोणी न्यावें माझें पायतण । आश्चर्य लहान हें काय ? ॥४६॥</p>
<p>
	लागली तयां हुरहुर । चित्त नाहीं अन्नपानावर । मंडळीसमवेत आले बाहेर । आंचवूं कर धुवावया ॥४७॥</p>
<p>
	इतुक्यांत एक मुलगा मराठा । हरवल्या पादत्राणाचा बाहुटा । लावूनि एका काठीचे शेवटा । पातला त्या ठाया अवचित ॥४८॥</p>
<p>
	मंडळी जेवूनि आंचवीत । मुलगा आला शोध करीत । म्हणे बाबा मज पाठवीत । काठी ही हातांत देउनी ॥४९॥</p>
<p>
	“हरी का बेटा जरी का फेटा” । ऐसा पुकार करीत जा बेटा । “याच त्या माझ्या” ऐशिया उत्कंठा । झोंबेल त्या देऊनि टाकाव्या ॥५०॥</p>
<p>
	परी जो आहे हरी का बेटा । आहे तयाचा जरीचा फेटा । आधीं हें निश्चित झालिया शेवटा । द्याव्या न बोभाटा करावा ॥५१॥</p>
<p>
	येतां ऐसा पुकार कानीं । ओळखोनि त्या वहाणा नयनीं । हरिभाऊ गेले धांवुनी । साश्चर्य मनीं जाहले ॥५२॥</p>
<p>
	आनंदाश्रु आले डोळां । हरिभाऊंस गहिंवर दाटला । देखूनि गेलेल्या पायतणाला । चमत्कारला अत्यंत ॥५३॥</p>
<p>
	म्हणती मुलास ये ये इकडे । पाहूं दे आण वहाणा मजकडे । पाहूनि वदे या तुज कोणीकडे । गिवसल्या रोकडें मज सांग ॥५४॥</p>
<p>
	मुलगा म्हणे तें मी नेणें । मजला बाबांची आज्ञा मानणें । ‘हरी का बेटा’ असेल तेणें । जरीचा फेटा दावणें मज ॥५५॥</p>
<p>
	तयासचि मी देईन वहाणा । मज इतराची ओळख पटेना । पटविल जो या बाबांच्या खुणा । तोच या वहाणा घेईल ॥५६॥</p>
<p>
	“अरे पोरा त्या माझ्याच वहाणा” । हरिभाऊ म्हणतां देईना । मग तो सकळ बाबांचिया खुणा । पटवी मना पोराच्या ॥५७॥</p>
<p>
	म्हणे पोरा मींच रे हरी । कान्होबाचा बेटा ही वैखरी । सर्वथैव आहे कीं खरी । मज सर्वतोपरी लागतसे ॥५८॥</p>
<p>
	आतां पाहीं फेटा जरीचा । फिटेल तुझें संशय मनींचा । मग मी ठरेन धनी वहाणांचा । दावा न इतरांचा यावरी ॥५९॥</p>
<p>
	झाली तेव्हां मुलाची समजूत । वहाणा दिधल्या हरिभाऊप्रत । पुरले तयाचे मनोरथ । साई हे संत अनुभविले ॥६०॥</p>
<p>
	आहे माझा फेटा जरी । ही काय मोठी नवलपरी । तो तों माझिये मस्तकावरी । सर्वतोपरी द्दश्यमान ॥६१॥</p>
<p>
	परी मी असतां देशांतरीं । शिर्डीस माझी पहिलीच फेरी । साईबाबांस कैसियेपरी । मन्नास हरि ठाऊक ॥६२॥</p>
<p>
	कान्होबा हा माझा पिता । कोणीं पाहिला सवरला नसतां । “का” या नामें तया उपलक्षितां । अतिआश्चर्यता वाटली ॥६३॥</p>
<p>
	पूर्वीं साईसंतमहत्ता । माझे स्नेही मजला सांगतां । अवमानिली मी त्यांची वार्ता । पश्चात्तापता आतां मज ॥६४॥</p>
<p>
	आतां मज येतां अनुभव । कळला साईबाबांचा प्रभाव । उरला नाहीं संशया ठाव । महानुभाव श्रीसाई ॥६५॥</p>
<p>
	जया मनीं जैसा भाव । हरिभाऊस तैसाचि अनुभव । संतपरीक्षण लालसास्वभाव । परमार्थ - हाव नाहीं मनीं ॥६६॥</p>
<p>
	साईसमर्थ महानुभाव । स्नेही सोयरे कथिती अनुभव । आपण स्वयें पहावा नवलाव । शिरडीस जावया कारण हें ॥६७॥</p>
<p>
	संतचरणीं वहावा जीव । तेणें गिवसावा देवाचा ठाव । मनीं नाहीं यत्किंचित डाव । सरडयाची धांव कोठवरी ॥६८॥</p>
<p>
	जाऊनियां संताच्या दारा । पाहूं आदरिलें चमत्कारा । तंव जोड पादत्राणाचा कोरा । आला कीं घरा घरपोंच ॥६९॥</p>
<p>
	नातरी क्षुल्लक पायतण । गेल्यानें काय मोठी नागवण । परी तदर्थ मनाची वणवण । तें सांपडल्यावीण राहेना ॥७०॥</p>
<p>
	संतप्राप्तीचे मार्ग दोन । एक भक्ति दुजा ज्ञान । ज्ञानमार्गींचे सायास गहन । भक्तीचें साधन सोपारें ॥७१॥</p>
<p>
	ऐसी सोपी सुलभ भक्ति । तरीही अवघे ती कां न करिती । तिजलाही महद्भाग्य संपत्ति । असतांच तत्प्राप्ति घडतसे ॥७२॥</p>
<p>
	कोटि जन्मांचें पुण्य असतें । तेव्हांचि संताची गांठी पडते । संतसमागमसौख्य घडतें । तेणेंच विकासते निजभक्ति ॥७३॥</p>
<p>
	आम्ही सर्व जाणों प्रवृत्ति । तेथेंचि आसक्ति नेणों निवृत्ति । ऐसी जेथें मनाची वृत्ति । ती काय भक्ति म्हणावी ॥७४॥</p>
<p>
	जैसी जैसी आमुची भक्ति । तैसी तैसी आम्हांसी प्राप्ति । हें तों केव्हांही घडणार निश्चितीं । येथें न भ्रांती तिळमात्र ॥७५॥</p>
<p>
	विषयभोगार्थ अहर्निशीं । आम्ही जमलों साईपाशीं । या आम्हांतें देणगीही तैसी । परमार्थियासी परमार्थ ॥७६॥</p>
<p>
	असो आतां आणीक एक । सोमदेवस्वामी नामक । करावया साईंची पारख । पातले प्रत्यक्ष शिरडींत ॥७७॥</p>
<p>
	सन एकोणीसशें सहा । उत्तरकाशीमाजी पहा । गृहस्थ भेटला भाईजींस हा । पांथस्थनिवहामाजी स्थित ॥७८॥</p>
<p>
	प्रसिद्ध कैलासवासी दीक्षित । भाईजी त्यंचे बंधु विश्रुत । बद्रिकेदारयात्रा करीत । असतां हे भेटत मार्गांत ॥७९॥</p>
<p>
	बद्रिकेदार मागें टाकिलें । भाईजी मग खालीं उतरले । ठायीं ठायीं विसावे लागले । दिसले बसलेले पांथस्थ ॥८०॥</p>
<p>
	तयांमाजील एक असामी । तेच हे पुढें हरिद्वाराचे स्वामी । सर्वत्र विश्रुत याच नामीं । लगाले लगामीं बाबांच्या ॥८१॥</p>
<p>
	त्यांची ही कथा बोधप्रद । बाबांचें स्वरूप करील विशद । श्रवणकर्त्यां देईल मोद । निजानंद सर्वत्रां ॥८२॥</p>
<p>
	प्रातर्विधीस जातां भाईजी । भेटले मार्गीं हे स्वामीजी । गोष्टी बोलतां बोलतां सहजी । प्रेमराजी प्रकटली ॥८३॥</p>
<p>
	गंगोत्रीचा अध:प्रदेश । बुवा असतां उत्तरकाशीस । डेहराडूनहून । सत्तर कोस । तेथें हा सहवास जाहला ॥८४॥</p>
<p>
	लोटा घेऊनि बहिर्दिशेस । निघाले बुवा प्रात:समयास । भाईजीही तया स्थळास । त्याच कार्यास निघाले ॥८५॥</p>
<p>
	प्रथम उभयतां द्दष्टाद्दष्टी । पुढें मार्गांत परस्पर भेटी । परस्परांच्या कुशल गोष्टी । सुखसंतुष्टी चालल्या ॥८६॥</p>
<p>
	करूं लागतां विचारपूस । प्रेम आलें परस्परांस  । ठाव ठिकाणा एकमेकांस । पुसावयास लागले ॥८७॥</p>
<p>
	हरिद्वारीं तुमचा वास । नागपुरीं आम्हां निवास । कधीं जेव्हां त्याबाजूस । येणें झालियास दर्शन द्यावें ॥८८॥</p>
<p>
	यात्रा करीत याल जेव्हां । पुनीत करावें आमुचे गेहा । पुनर्दर्शन आम्हां घडवा । अल्प सेवा घ्या आमुची ॥८९॥</p>
<p>
	असूं द्यावें आमुचें स्मरण । लागावे आमुचे घरास चरण । हेंच आमुचें आहे विनवण । पुरवो नारायण ही इच्छा ॥९०॥</p>
<p>
	एकोणीसशें सहा सालीं । उत्तरकाशीचिया खालीं । परस्परांत हे भाषा बोली । होऊनि गेली इयापरी ॥९१॥</p>
<p>
	परस्परांचें ठाव ठिकाण । घेतलें उभयतांही पुसून । पाहूनि जवळ आलें मैदान । निघाले सोडून अन्योन्या ॥९२॥</p>
<p>
	जातां पांच वर्षांचा काळ । येतां साईसमागमवेळ । भाईजींच्या भेटीची तळमळ । लागली प्रबळ स्वामींस ॥९३॥</p>
<p>
	सन एकोणीसशें अकरा । आले स्वामीजी नागपुरा । तेथें श्रीसाईनाथांचे चरित्रा । परिसतां पवित्रा आनंदले ॥९४॥</p>
<p>
	देती भाईजी शिफारसपत्र । सुखें गांठावें शिर्डीक्षेत्र । ऐसी योजना ठरवूनि सर्वत्र । सोडिलें नागपुर स्वामींनीं ॥९५॥</p>
<p>
	उतरतां ते मनमाडावर । कोपरगांवची गाडी तयार । तेथें होऊनि टांग्यांत स्वार । आनंदनिर्भर दर्शना ॥९६॥</p>
<p>
	कोठेंही जा साधूंचें वर्तन । अथवा त्यांची राहणी - चलन । एकाचें एक एकाचें आन । नसतें समसमान कोठेंही ॥९७॥</p>
<p>
	एका संताचें आचरण । तें न दुजिया संता प्रमाण । योग्यायोग्यतेचें अनुमान । कराया साधन हे नव्हे ॥९८॥</p>
<p>
	आधीं जो जाई संतदर्शना । किमर्थ व्हावी हे तया विवंचना । पाहूं जातां तयांचे वर्तना । निजकल्याणा नागवण ॥९९॥</p>
<p>
	स्वामीजींचे मनाची रचना । तर्क कुतर्क उठती नाना । लांबूनि दिसतां शिर्डीच्या निशाणा । चालल्या कल्पाना स्वामींच्या ॥१००॥</p>
<p>
	तयांसवें असलेले जन । मशिदीचे कळसाचें निशाण । द्दष्टिपथांत येतां दुरून । करीत वंदन प्रेमानें ॥१०१॥</p>
<p>
	पुढें घडेल साईदर्शन । म्हणोनि जरी उत्कंठित मन । परी त्यांतें दिसलेलें निशाण । त्याचाही अवमान साहेना ॥१०२॥</p>
<p>
	निशाणदर्शनें प्रेमस्फुरण । हा तों सर्वत्र अनुभव जाण । हें तों भक्तिप्रेमलक्षण । कांहिंहि विलक्षण येथ नसे ॥१०३॥</p>
<p>
	परी स्वामींच्या कुत्सितमना । दुरूनि पाहूनियां त्या निशाणा । उठल्या कल्पनांवरी कल्पना । विचित्र रचना मनाची ॥१०४॥</p>
<p>
	पताकांची आवड मना । ही काय साधुत्वाची कल्पना । देवळावरी लावावें निशाणा । हा तों हीनपणा साधुत्वा ॥१०५॥</p>
<p>
	साधू मागे एणें माना । ही तों त्याची केवळ लोकेषणा । न येई ऐसियाचें साधुत्व मना । हा तों उणेपणा तयास ॥१०६॥</p>
<p>
	सारांश जैसा मनाचा ग्रह । साधुनिर्णयीं तैसाच आग्रह । झाला स्वामींच्या मनाचा निग्रह । नको मज अनुग्रह साईंचा ॥१०७॥</p>
<p>
	उगाच आलों मी येथवर । स्वामींस थोर उपजला अनादर । तेथूनि परतावयाचा निर्धार । केला मग साचार तत्काळ ॥१०८॥</p>
<p>
	लोकेषणेचा दुरभिमान । साधूस कशास पाहिजे मान । याहूनि मज दुजें अनुमान । निशाण पाहून होईना ॥१०९॥</p>
<p>
	निशाणें आपुला मोठेपणा । साधु हा आणितो निदर्शना । हाचि संतत्वासी उणेपणा । काय दर्शना जाणें म्यां ॥११०॥</p>
<p>
	घेतलिया हें ऐसें दर्शन । एणें कैसें निवावें मन । हें तों दंभध्वजप्रदर्शन । समाधान एणें ना ॥१११॥</p>
<p>
	म्हणती जावें माघारा । आल्या वाटे आपुले घरा । दिसेना हा विचार बरा । फजीत खरा झालों मी ॥११२॥</p>
<p>
	सहवासी मग म्हणती त्यांसी । इतके दूर आलां कशासी । केवळ निशाणें चित्तवृत्तीसी । खळबळ ऐसी कां झाली ॥११३॥</p>
<p>
	आतां आपण आलों जवळ । रथ पालखी घोडा सकळ । सरंजाम हा पाहतां निखळ । किती मग तळमळ लागेल ॥११४॥</p>
<p>
	परिसूनि स्वामी अधिकचि बिघडे । जया नगारे पालख्या घोडे । ऐसे साधु मिजासी बडे । म्यां काय थोडे देखिले ॥११५॥</p>
<p>
	ऐसे विचार येऊनि अंतरा । सोमदेवजी निघती माघारा । शिरडीचा विचार नाहीं बरा । रस्ता धरा कीं नदीचा ॥११६॥</p>
<p>
	मग बरोबरील वाटसरू । लागले तयांस आग्रह करूं । आलांत आपण येथवरू । नका हो फिरूं माघारा ॥११७॥</p>
<p>
	आल्यासारिखे चला कीं पुढें । नका करूं हे तर्क कुडे । हें निशाण जें मशिदीं उडे । साधूकडे ना संबंध ॥११८॥</p>
<p>
	या साधूस नलगे निशाण । नलगे लोकेषणा नलगे मान । ग्रामस्थांस हें आवडे भूषण । भक्ति प्रमाण कारण या ॥११९॥</p>
<p>
	पाहूं नक कीं तुम्ही निशाण । जाऊनि घ्या नुसतें दर्शन । राहूं नका तैं एक क्षण । जा कीं परतोन माघारा ॥१२०॥</p>
<p>
	इतुक्यांत येतां शिरडी जवळ । वाटलें उपदेश ऐकूनि तो सरळ । काढूनि टाकावी मनाची मळमळ । पुनश्च हळहळ नसावी ॥१२१॥</p>
<p>
	असो श्रीसमर्थदर्शनेंकरून । बुवा गेले विरघळून । प्रेम आलें डोळां भरून । कंठ सद्नदून दाटला ॥१२२॥</p>
<p>
	चित्त झालें सुप्रसन्न । नयन उल्हासें सुखसंपन्न । कधीं चरणरजस्नान । करीन ऐसें त्यां झालें ॥१२३॥</p>
<p>
	पहातां रूप तें नेटक । मना नयना पडलें टक । पाहातचि  राहिले टकमक । मोहें अटक पाडिली ॥१२४॥</p>
<p>
	कुतर्क मनींचे जिराले । चित्त दर्शनानंदीं विरालें । सगुणरूप नयनीं मुरालें । बुवा झाले तल्लीन ॥१२५॥</p>
<p>
	डोळां देखतां महानुभावा । परम आल्हाद सोमदेवां । आत्मारामा जाहला विसावा । वाटे वसावा हा ठाव ॥१२६॥</p>
<p>
	दर्शनेंच विकल्प मावळे । बुद्धि ठायींच ताटकळे । दुजेंपण समस्त विरघळे । ऐक्य जाहलें सबाह्य ॥१२७॥</p>
<p>
	वा़चेसि नि:शब्दत्वें मौन । निमेषोन्मेषरहित नयन । अंतर्बाह्य चैतन्यघन । समाधान समरसे ॥१२८॥</p>
<p>
	निशाणदर्शनें आधीं मुरडले । पुढें प्रेमोद्रेकें निडारले । सात्त्विक अष्टभावें उभडिले । वेढिले प्रेमें बाबांचे ॥१२९॥</p>
<p>
	जेथें मन पूर्ण रंगलें । तेंच आपुलें स्थान वहिलें । हे निजगुरूचे बोल आठवले । प्रेम दाटलें बुवांना ॥१३०॥</p>
<p>
	बुवा हळूहळू पुढें येती । तों तों महाराज रागास चढती । शिव्यांची त्या लाखोली वाहती । तों तों त्यां प्रीति द्विगुणित ॥१३१॥</p>
<p>
	समर्थ बाबांची करणी अचाट । तयांचा तों विलक्षण घाट । नारसिंहावताराचा थाट । आटोकाट आणिला ॥१३२॥</p>
<p>
	“थोतांड आमुचें आमुच्यापाशीं । राहो म्हणती चल जा घरासी । खबरदार माझ्या मशिदीसी । जर तूं येशील मागुता ॥१३३॥</p>
<p>
	जो लावितो मशिदीस निशाण । कशास व्हावें त्याचें दर्शन । हें काय संतांचें लक्षण । येथें न क्षण एक कंठावा” ॥१३४॥</p>
<p>
	असो पुढें साशंक चित्त । सभामंडपीं स्वामी प्रवेशत । दुरूनि पाहूनि साईंची मूर्त । स्वामींसी निवांत राहवेना ॥१३५॥</p>
<p>
	हा आपुलेच विचारांचा प्रतिध्वनी । शब्दश: तो आदळतां कानीं । बुवा शरमले स्थानींचे स्थानीं । अंतर्ज्ञानी महाराज ॥१३६॥</p>
<p>
	किती हो आपण अप्रबुद्ध । किती महाराज तरी प्रबुद्ध । किती त्या माझ्या कल्पना विरुद्ध । किती हें शुद्ध अंतर ॥१३७॥</p>
<p>
	साई कोणास देती आलिंगन । कोणास करिती हस्तस्पर्शन । कोणास देती आश्वासन । कृपावलोकन कोणास ॥१३८॥</p>
<p>
	कोणाकडे पाही हास्यवदन । कोणाच्या दु:खाचें करी सांत्वन । कोणास उदीप्रसाददान । करीत समाधान सकलांचें ॥१३९॥</p>
<p>
	ऐसें असतां मजवरील क्रोध । वाते हा मम वर्तनानुरोध । क्रोध नाहीं हा मजला बोध । होईल मोददायी तो ॥१४०॥</p>
<p>
	असो पुढें तैसेंच झालें । स्वामी बाबांपाशीं जे रमले । साईकृपें निर्मळ बनले । चरणीं ठेले निरंतर ॥१४१॥</p>
<p>
	साईभक्तिप्रभववीर्य । विरवो दुर्वासना मात्सर्य । उपजवो शांति - श्री - धैर्य । करो कृतकार्य निजभक्तां ॥१४२॥</p>
<p>
	गंधर्व यक्ष सुरासुर । इंहीं भरलें हें चराचर । त्या अखिल विश्वीं हा विश्वंभर । जरी निरंतर भरलेला ॥१४३॥</p>
<p>
	परी न स्वीकारितां आकार । ठाता सदैव निराकार । आम्ही मानव हे साकार । होता न उपकार लवमात्र ॥१४४॥</p>
<p>
	तात्पर्य धरोनि लीलाविग्रह । साई न करिते लोकसंग्रह । अथवा दुष्टदुर्जनमतनिग्रह । कैंचा अनुग्रह भक्तांवर ॥१४५॥</p>
<p>
	आला अध्याय संपावयाला । तों एक वृत्तांत मज आठवला । साईसदुपदेशाचा मासला । मानील त्याला हितकारी ॥१४६॥</p>
<p>
	वृत्तांत आहे अति लहान । स्मरण ठेवी तो कृतकल्याण । म्हणूनि श्रोतयां करितों विनवण । क्षण अंत:करण द्या मज ॥१४७॥</p>
<p>
	एकदां भक्त म्हाळसापती । नानसाहेब यांसमवेती । बैसले असतां मशिदीप्रती । परिसा चमत्कृति घडली ती ॥१४८॥</p>
<p>
	समर्थसाई - दर्शनोत्सुक । कोणी एक श्रीमान गृहस्थ । वैजापुनिवासी तेथ । परिवारान्वित पातले ॥१४९॥</p>
<p>
	पाहूनियां स्त्रियांचा गोषा । नाना संकोचले निज मानसा । स्वयें उठूनि द्यावें अवकाशा । वाटलें संतोषार्थ तयाम्च्या ॥१५०॥</p>
<p>
	म्हणून नाना उठूं सरती । तंव बाबा तयां वारिती । म्हणाले येणारे येतील वरती । त्वां स्वस्थ चित्तीं बैसावें ॥१५१॥</p>
<p>
	तेही आलेति दर्शनार्थ । यावें कांहीं नाहीं हरकत । ऐसें तयांस कोणी सुचवीत । येऊनि वंदीत साईंस ॥१५२॥</p>
<p>
	तयांमाजील एक नारी  । वंदूं जातां बुरखा सारी । पाहूनि सौंदर्यें अति साजिरी । नाना निजअंतरीं मोहिले ॥१५३॥</p>
<p>
	लोकांसमक्ष पाहण्या चोरी । पाहिल्यावीण राहवेना अंतरीं । वर्तावें काय कैसेपरी । मोहाची उजरी नावरे ॥१५४॥</p>
<p>
	बाबांची लज्जा मोठी अंतरीं । म्हणोनि मुख तें न करवे वरी । द्दष्टी जाऊं लागली चांचरी । सांपडे कातरीं तंव नाना ॥१५५॥</p>
<p>
	ही तों नानांची अंत:स्थिति । सर्वातर्यामी बाबा जाणती । इतरां काय तियेची प्रतीती । ते तों झगटती शब्दार्था ॥१५६॥</p>
<p>
	ऐसी नानांची वृत्ति बावरी । जाणूनि बाबा निजांतरीं । आणावया स्वस्थानीं माघारी । उपदेश जो करीत तो परिसा ॥१५७॥</p>
<p>
	“नाना किमर्थ गडबड्सी मनीं । ज्याचा निजधर्म तो स्वस्थपणीं । आचरतां आड यावें न कोणी । कांहीं न हानी तयांत ॥१५८॥</p>
<p>
	ब्रम्हादेव सृष्टी रचिता । आपण तयाचें कौतुक न करितां । व्यर्थ होऊं पाहील रसिकता । ‘बनतां बनेल’ ॥१५९॥</p>
<p>
	असतां पुढील द्वार उघडें । जावें कां मागील द्वाराकडे । एक शुद्ध अंतर जिकडे । तेथें न सांकडें कांहींही ॥१६०॥</p>
<p>
	कुढा भाव नाहीं अंतरीं । तयास काय कोणाची चोरी । द्दष्टि द्दष्टीचें कर्तव्य करी । भीड मग येथें धरिसी कां” ॥१६१॥</p>
<p>
	होते तेथें माधवराव । जात्या जयांचा चिकित्सक स्वभाव । निजजिज्ञासापूर्तीस्तव । पुसती त्यां भाव बोलाचा ॥१६२॥</p>
<p>
	ऐसें माधवरावें पुसतां । नाना वदले थांब रे आतां । सांगेत बबांचिया मनोगता । वाटेनें जातां वाडियातें ॥१६३॥</p>
<p>
	संपतां क्षेमकुशल वार्ता । अभिवंदून साईसमर्था । नान निजस्थानासी परततां । निघाले समवेता माधवराव ॥१६४॥</p>
<p>
	ते नानांस पुसती तात्काळ । नाना ‘बनतां बनतां बनेल’ । आदिकरूनि बाबांचे बोल । स्पष्टार्थ वदाल काय त्यांचा ॥१६५॥</p>
<p>
	अर्थ सांगावया होईना जीव । बहुत चालली उडवाउडव । तेणें अधिकचि संशयसमुद्भव । होई न माधवमन स्वस्थ ॥१६६॥</p>
<p>
	मग करूनियाम ह्रदय उघडें । नानांडीं जें घडलें तिकडे । तें साग्र माधवरावाचिया होडे । कथूनि कोडें उलगडिलें ॥१६७॥</p>
<p>
	काय बाब किती दक्ष । जावो कोणाचें कोठेंही लक्ष । ते तों स्वयें अंत:साक्ष । सर्व प्रत्यक्ष तयांतें ॥१६८॥</p>
<p>
	ऐसी ही त्रोटक अभिनव वार्ता । परिसतां साश्चर्य होईल श्रोता । पाहूं जातां येथील मथितार्था । स्थैर्य - गंभीरता बहुमोल ॥१६९॥</p>
<p>
	मन जातीचेंच चंचळ । होऊं न द्यावें उच्छ्टंखळ । होवो इंद्रियांची खळबळ । शरीर उतावीळ होऊं नये ॥१७०॥</p>
<p>
	इंद्रियांचा नाहीं विश्वास । विषयार्थ व्हावें न लालस । हळू हळू करितां अभ्यास । चांचल्यनिरास होईल ॥१७१॥</p>
<p>
	होऊं नये इंद्रियाधीन । तींही न सर्वथा राहती दाबून । विधिपूर्वक तयांचें नियमन । करावें पाहून प्रसंत ॥१७२॥</p>
<p>
	रूप हा तों द्दष्टीचा विषय । सौंदर्य वस्तूचें पहावें निर्भय । तेथें लाजेचें कारण काय । द्यावा न ठाय दुर्बुद्धीतें ॥१७३॥</p>
<p>
	मन करोनियां निर्वासन । ईशकृतीचें करा निरीक्षण । होईल सहज इंद्रियदमन । विषयसेवनविस्मरण ॥१७४॥</p>
<p>
	रथ न्यावया इष्टस्थानीं । सारथी जैसा मूळकारणी । तैसी ही बुद्धि हितकारिणी । दक्ष आकर्षणीं इंद्रियांच्या ॥१७५॥</p>
<p>
	सारथी करी रथनियमन । बुद्धि ही करूनि इंद्रियदमन । जावरी शरीरखैरगमन । अनिवार चंचलपण मनाचें ॥१७६॥</p>
<p>
	शरीर इंद्रियमनोयुक्त । ऐसिया जीवाचें जें भोक्तृत्व । तें संपतांच वैष्णवपद प्राप्त । ऐसें हें सामर्थ्य बुद्धीचें ॥१७७॥</p>
<p>
	चक्षुरादि इंद्रियनिचय । भिन्नभिन्न हयस्थानीय । रूपरसादि जे जे विषय । मार्ग ते निरयप्रवर्तक ॥१७८॥</p>
<p>
	यत्किंचित विषयाभिलाष । करी पारमार्थिक सुखा नाश । म्हणोनि त्यागा तो नि:शेष । तरीच तो मोक्ष तुझ लाघे ॥१७९॥</p>
<p>
	बाह्येंद्रियें जरी निवृत्त । असतां अंत:करण आसक्त । नाहीं जन्ममरणा अंत । विषय अत्यंत घातुक ॥१८०॥</p>
<p>
	लाधलिया विवेकी सारथी । विवेकें राखी लगाम हातीं । इंद्रियवाजी कुमार्गवर्ती । स्वप्नींही होती न लवमात्र ॥१८१॥</p>
<p>
	ऐसा मन:सामाधानपर । निग्रही दक्ष कुशल चतुर । भाग्यें लाधलिया सारथी चतुर । कैंचें दूर विष्णुपद ॥१८२॥</p>
<p>
	तेंच पद परब्रम्हा । ‘वासुदेव’ अपर नाम । तेंच सर्वोत्कृष्टपद परम । परंधाम परात्पर ॥१८३॥</p>
<p>
	असो झाला हा अध्याय पुरा । याहून गोड पुढील दुसरा । रिझवील सद्भक्तांच्या अंतरा । श्रवण करा क्रमानें ॥१८४॥</p>
<p>
	असो शेवटीं जगच्चलक । सद्नुरु जो बुद्धिप्रेरक । तयाचे चरणीं आभारपूर्वक । हेमाड मस्तक अर्पीतसे ॥१८५॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । संतपरीक्षण - मनोनिग्रहणं नाम एकोनपंचाशत्तमोऽध्याय: संपूर्ण ॥४९॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 Apr 2022 15:20:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 Apr 2022 16:08:41 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ४८]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/साईसच्चरित-अध्याय-४८-122042900055_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
आतां हा अध्याय करितां सुरू । जया अत्यंत श्रवणादरू । ऐसा श्रोता लागला विचारूं । गुरु कीं सद्नुरु श्रीसाई ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 48" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/29/full/1651225763-7841.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra adhyay 48" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	आतां हा अध्याय करितां सुरू । जया अत्यंत श्रवणादरू । ऐसा श्रोता लागला विचारूं । गुरु कीं सद्नुरु श्रीसाई ॥१॥</p>
<p>
	तयाचिया समाधाना । कथूं सद्नुरूच्या संक्षिप्त लक्षणा । जेणें श्रीसाईसमर्थचरणां । मिळतील खुणा सद्नुरूच्या ॥२॥</p>
<p>
	येयूनि प्राप्त वेदाध्ययन । अथवा साही शास्त्रांचें ज्ञान । जिंहीं करविलें वेदान्तनिरूपण । ज्ञाते न सद्नुरु म्हणती तया ॥३॥</p>
<p>
	कोणी एक वायु कोंडिती । तप्त मुद्रा धारण करिती । ब्रम्हानुवादें श्रोतयां रिझविती । ज्ञाते न सद्नुरू म्हणती तया ॥४॥</p>
<p>
	शिष्यां शास्त्रोक्त मंत्रही देती । जप करावया आज्ञा करिती । होईल केव्हां फलप्राप्ती । विश्वास न चित्तीं कोणाही ॥५॥</p>
<p>
	तत्त्वनिरूपण अति रसाळ । शब्दज्ञान अघळपघळ । स्वानुभवाचा मात्र दुष्काळ । शाब्दिक पोकळ तें ज्ञान ॥६॥</p>
<p>
	ऐकतेक्षणीं निरूपण नीट । उभय भोगांचा येईल वीट । परी अभुभवाची चवी चोखट । अनुभवी तोच प्रकटवी ॥७॥</p>
<p>
	असोनि संपूर्ण शब्दज्ञानी । पूर्णानुभवी अपरोक्षदानी ॥ त्याचाचि अधिकार शिष्यप्रबोधनीं । म्हणावें त्यालागोनि सद्नुरु ॥८॥</p>
<p>
	स्वयें ज्यातें अनुभव नाहीं । तो काय शिष्यातें देईल पाहीं । जया न अपरोक्ष अनुभव कांहीं । सद्नुरु कदाही न म्हणावा ॥९॥</p>
<p>
	शिष्यापासून घ्यावी सेवा ॥ स्वप्नींही न धरी ऐसिया भावा । उलट शिष्यार्थ निजदेह लागावा । इच्छी तो जाणा सद्नुरु ॥१०॥</p>
<p>
	शिष्य म्हणजे किंपदार्थ । गुरु काय तो श्रेष्ठांत श्रेष्ठ । ऐसिया अहंभावाविरहित । तोचि सद्नुरु हितकारी ॥११॥</p>
<p>
	शिष्य तोही पूर्णब्रम्हा । तयाठायींही पुत्रपेम । इच्छी न त्यापासाव योगक्षेम । सद्नुरु तो परम श्रेष्ठ जगीं ॥१२॥</p>
<p>
	परम शांतीचें जें निधान । विद्वत्तेचा न जेथें अभिमान । सान थोर समसमान । तेंच सद्नुरुस्थान जाणावें ॥१३॥</p>
<p>
	ऐसीं ही सर्वसाधारणें । सद्नुरूचीं संक्षिप्त लक्षणें । निवेदिलीं म्यां अनन्य - शरणें । श्रोतयांकारणें संकलित ॥१४॥</p>
<p>
	साईदर्शनें तुष्टले लोचन । तयां भाग्यवंतांलागून । मी काय याहूनि वर्णूं सकेन । सद्नुरुलक्षण हें सत्य ॥१५॥</p>
<p>
	जन्मोजन्मींचा पुण्यातिशय । गांठींस होता त्याचा संचय । तेणें हे आम्हांस लाधले पाय । या सद्नुरुराय साईंचे ॥१६॥</p>
<p>
	पूर्ण तारुण्यींही अपरिग्रह । निराधार ना वेस ना गृह । तमाखू चिलीम हा काय तो  संग्रह । मनोनिग्रह भयंकर ॥१७॥</p>
<p>
	वर्षें अष्टादश असतां वय । तेव्हांपासूनही पूर्ण मनोजय । सदा एकांतीं वसावें वसावें निर्भय । लावूनि लय स्वरूपीं ॥१८॥</p>
<p>
	पाहोनि भक्तांची आवडी शुद्ध । ‘भक्तपराधीन मी’ हें ब्रीद । भक्तवृंदा दावावया विशद । भक्तप्रेमास्पद वर्ते जो ॥१९॥</p>
<p>
	जय प्रब्रम्हा सनातना । जय दीनोद्धारा प्रसन्नवदना । जय चैतन्यघना भक्ताधीना । दे निजदर्शना निजभक्तां ॥२०॥</p>
<p>
	जयजया जी द्वंद्वातीता । जयजया जी अव्यक्तव्यक्ता । सर्वसाक्षी सर्वातीता । अकळ अभक्तां सकळिकां ॥२१॥</p>
<p>
	जय जय भवसंतापहरणा । जय जय भवगजविदारणा । जय जय आश्रितप्रेमपूर्णा । संकटनिरसना सद्नुरुराया ॥२२॥</p>
<p>
	तुज अव्यक्तीं समरसतां । आकार पावला निराकारता । परी तव भक्तकल्याणकारिता । देह ठेवितांही न सरे ॥२३॥</p>
<p>
	देहीं असतां जी जी कृति । तोच समरसतां अव्यक्तीं । तेच अनुभव आजही भोगिती । जे तव भक्तीं लागले ॥२४॥</p>
<p>
	त्वां मज पामरा निमित्त करुनी । निरसावया अविद्यारजनी । प्रकट केला निजचरित्रतरणी । जो भक्तोद्धरणीं समर्थ ॥२५॥</p>
<p>
	आस्तिक्यबुद्धि श्रद्धास्थिती । हीच भक्तांची ह्रदयपणती । प्रेमस्नेहें उजळिजे वाती । ज्ञानज्योती प्रकटेल ॥२६॥</p>
<p>
	प्रेमावीण शुष्क ज्ञान । तयाचें कोणा काय प्रयोजन । विनाप्रेम न समाधान । प्रेम अविच्छिन्न असावें ॥२७॥</p>
<p>
	काय वानूं प्रेममहिमान । तयापुढें तुच्छ आन । गांठीं नसल्या प्रेम गहन । श्रवण वाचन निष्फळ ॥२८॥</p>
<p>
	प्रेमापाशीं नांदे भक्ति । तेथेंच अवघी शांती विरक्ति । तेथेंच पाठीं तिष्ठे मुक्ति । निजसंपत्तीसमवेत ॥२९॥</p>
<p>
	प्रेम नुपजे भावावीण । भाव तेथें देव जाण । भावापोटीं प्रेम पूर्ण । भावचि कारण भवतरणा ॥३०॥</p>
<p>
	गंगोदकासम पवित्र । परम गोड साईचरित्र । तेणेंचि त्याचें सजविलें स्तोत्र । निमित्तमात्र हेमाड ॥३१॥</p>
<p>
	श्रवण करितां साईसच्चरित । श्रोते वक्ते नित्यपूत । पापपुण्याचा होई घाट । नित्यमुक्त दोघेही ॥३२॥</p>
<p>
	भाग्यें आगळे ऐकतां श्रोत्र । भाग्यें आगळें वक्तयाचें वक्त्र । धन्य हें श्रीसाईस्तोत्र । अतिपवित्र निजभक्तां ॥३३॥</p>
<p>
	होऊनियां शुद्धचित्त । सद्भावे जे परिसती चरित । तयांचे ते सकळ मनोरथ । होतील सुफलित सदैव ॥३४॥</p>
<p>
	परम भावार्थें आदरेंसीं । ऐकती या सच्चरितासी । निजपदभक्ति अनायासीं ।  लाभे तयांसी अविलंबें ॥३५॥</p>
<p>
	भक्तिभावें साईचरण । सेवितां करितां साईस्मरण । होईना यथेच्छ इंद्रियाचरण । सहज भवतरण रोकडें ॥३६॥</p>
<p>
	भक्तचातकां निजजीवन । ऐसें हें साईसच्चरितकथन । श्रोतां श्रवणापाठीं मनन । कीजे आयतन श्रीकृपेचें ॥३७॥</p>
<p>
	सर्वावस्थीं सावधना । होऊनि श्रोतीं केलिया श्रवण । सहज होय भवतरण । कर्मबंधन तुटोन ॥३८॥</p>
<p>
	असो मनीं म्हणतील श्रोते । केव्हां हो आरंभ होणार कथेतें । दवडितों त्यांचिया अस्वस्थतेतें । प्रस्तावनेतें करोनि ॥३९॥</p>
<p>
	पूर्वाध्यायीं झालें कथन । वैर हत्या आणि ऋण । हीं फेडावया पुनर्जन्म । येई निजकर्म भोगावया ॥४०॥</p>
<p>
	तयांस नाहीं पूर्वस्मरण । परी या संतां कदा न विस्मरण । करिती निजभक्त - संकटनिवारण । असेना जनन कोठेंही ॥४१॥</p>
<p>
	तैसीच आतां दुसरी कथा । देतां घेतां बसतउठतां । संतांपायीं विश्वास ठेवितां । पावती सफलता निजभक्त ॥४२॥</p>
<p>
	कर्मारंभ करूं जातां । आधीं हरिगुरुचरण स्मरतां । तेच निवारिती निजभक्तचिंता । कर्मीं निजदक्षता ठेविलिया ॥४३॥</p>
<p>
	कर्म मात्र मी करणार । समर्थ हरिगुरु फल देणार । ऐसा ज्याचा द्दढ निर्धार । बेडा पार तयाचा ॥४४॥</p>
<p>
	संत आरंभीं उग्र भासती । तरी त्यांपोटीं लाभेंवीण प्रीति । अल्प धीर पाहिजे चित्तीं । करितील अंतीं कल्याण ॥४५॥</p>
<p>
	शापताप - संसृतिमाया । सत्संगाची पडतां छाया । ठाय़ींचे ठायींच जातील विलया । म्हणोनि त्या पायां विनटावें ॥४६॥</p>
<p>
	सविनय आणि  अनुद्धत । होऊनि संतां शरणागत । प्रार्थावें त्यां निजगुजहित । देतील चित्त - स्वास्थ्यातें ॥४७॥</p>
<p>
	अल्पज्ञानाचिया अभिमानीं । संतवचनीं विकल्प मानी । होते त्या आधीं कैसी हानी । विश्वासें निदानीं कल्याण ॥४८॥</p>
<p>
	शुद्धमनें वा कपटें सर्वथा । खर्‍या संतांचे चरण धरितां । अंतीं पावे तो निर्मुक्तता । अगाध योग्यता संतांची ॥४९॥</p>
<p>
	ये अर्थीची बोधक कथा । श्रवण कीजे सावधानता । स्वानंदनिर्भर होईल श्रोता । तैसाचि वक्ता उल्लसित ॥५०॥</p>
<p>
	वकील अक्कलकोटनिवासी । सपटणेकर नाम जयांसी । परिसा तयांचे अनुभवासी । मन उल्लासित होईल ॥५१॥</p>
<p>
	वकीलीचा रात्रंदिवस । करीत असतां ते अभ्यास । भेटले विद्यार्थी शेवडे त्यांस । करीत विचारपूस परस्पर ॥५२॥</p>
<p>
	सहाध्यायीही इतर आले । तेथेंच खोलींत एकत्र बैसले । प्रश्न एकेकां पुसूं लागले । पहाया अभ्यासिलें पाडून ॥५३॥</p>
<p>
	पहावें कोठें कोणाचें चुकतें । कोणाचें उत्तर बरोबर येतें । करावें संशयनिवृत्तीतें । चित्तस्वस्थतेलागुनी ॥५४॥</p>
<p>
	शेवडे यांचीं चुकलीं उत्तरें । अंतीं म्हणाले विद्यार्थी सारे । कैसेनि यांची परीक्षा उतरे । अभ्यासिलें अपुरें सर्वचि ॥५५॥</p>
<p>
	केला जरी त्यांनीं उपहास । शेवडयांचा पूर्ण विश्वास । पुरा वा अपुरा अभ्यास । वेळीं मी पास होणार ॥५६॥</p>
<p>
	मी न जरी अभ्यास केला । माझा साईबाबा मजला । पास कराया आहे बैसला । करूं मी कशाला काळजी ॥५७॥</p>
<p>
	परिसतां ऐसिया बोलां । आश्चर्य वाटलें सपटणेकरांला । नेऊनि शेवडयांस एके बाजूला । पुसावयाला लागले ॥५८॥</p>
<p>
	अहो हे साईबाबा कोण । जयांचे एवढे वर्णितां गुण । जयांवर तुमचा विश्वास पूर्ण । वसतीचा ठाव कवण कीं ॥५९॥</p>
<p>
	मग त्या साईबाबांची महती । प्रत्युत्तरीं शेवडे कथिती । सवेंचि आत्मविश्वासस्थिती । तयांसी वदती प्रांजळपणें ॥६०॥</p>
<p>
	सुप्रसिद्ध नगर जिल्हा । त्यामाजील शिर्डी गांवाला । फकीर एक मशिदीं बैसला । असे बहु नांवाजला सत्पुरुष ॥६१॥</p>
<p>
	संत आहेत जागोजाग । परी तयांचे भेटीचा योग । गांठीस नसतां पुण्य अमोघ । प्रयत्नें हा सुयोग लाभेना ॥६२॥</p>
<p>
	विश्वास माझा पूर्ण त्यावर । करील तो जें तेंच होणार । वदेल वाचे तेंच घडणार । नाहीं तें चुकणार कल्पांतीं ॥६३॥</p>
<p>
	कितीही केल्या यंदा प्रयास । परीक्षेत मी होणार नापास । परी पुढील वर्षीं अप्रयास । होणार मी पास त्रिसत्य ॥६४॥</p>
<p>
	मज हें आहे त्यांचें आश्वासन । तयांवर माझा भरंवसा पूर्ण । होणें न त्यांचें अन्यथा वचन । गांठ मीं बांधून ठेविलीसे ॥६५॥</p>
<p>
	नवल काय ही तों होईल । होईल परीक्षा याच्याही पुढील । हास्यास्पद हे वाटले बोल । नि:संशय फोट सपटणेकरां ॥६६॥</p>
<p>
	विकल्पपूर्ण त्यांचें मन । त्यांना हें काय आवडे कथन । असो शेवडे गेले तेथून । परिसा तें वर्तमान पुढील ॥६७॥</p>
<p>
	पुढें कालें अनुभवांतीं । अन्वर्थ झाल्या शेवडयांच्या उक्ती । दोनीही परीक्षा पास होती । आश्चर्य चित्तीं सपटणेकरां ॥६८॥</p>
<p>
	पुढें जातां दहा सालें । सपटणेकर उद्विग्न झाले । दुर्दैव एकाएकीं ओढवलें । तंव ते पावले उदासता ॥६९॥</p>
<p>
	एकुलता एक मुलगा त्यांला । कंठरोगानें निधन पावला । सन एकूणीसशॆं तेरा सालाला । अत्यंत विटला संसारा ॥७०॥</p>
<p>
	आदिकरूनि पंढरपुर । गाणगापुरादि तीर्थें समग्र । झालीं परी न सुखावे अंतर । वाचिला नंतर वेदान्त ॥७१॥</p>
<p>
	ऐसा कांहीं काळ लोटतां । चित्तास कांहीं येते का शांतता । म्हणूनि मार्गप्रतीक्षा करितां । आठवला वृत्तांत शेवडयंचा ॥७२॥</p>
<p>
	शॆवडे यांचा निश्चय स्मरला । साइपदींचा विश्वास आठवला । आपणही जावें श्रीदर्शनाला । वाटलें मनाला तयांच्या ॥७३॥</p>
<p>
	संतदर्शानीं धरिला हेत । सन कोणीसशें तेरा सालांत । शिर्डीस जाण्याचा झाला बेत । निघाले समवेत बंधूच्या ॥७४॥</p>
<p>
	निमित्त शेवडे यांचें स्मरण । वंदावया आपुले चरण । साईच तयां करिती पाचारण । तें सावचित्त श्रवण करा ॥७५॥</p>
<p>
	पंडितराव कनिष्ठ सहोदर । तयां घेऊनियां बरोबर । संतदर्शना सपटणेकर । निघाले सपरिवार शिर्डीस ॥७६॥</p>
<p>
	असो ते दोघे तेथें आले । येतां श्रींच्या दर्शना निघाले । दुरूनि बाबांचें दर्शन झालें । अत्यंत धाले चित्तांत ॥७७॥</p>
<p>
	दुरूनि परी ती डोळेभेट । होतांच सत्वर गेले निकट । दोघेही जोडूनि करसंपुट । समोर तिष्ठत बाबांचे ॥७८॥</p>
<p>
	दोघेही ते अति विनीत । बाबांसन्मुख लोटांगणीं येत । श्रीफल साईचरणीं समर्पीत । शुद्धमावान्वित सप्रेम ॥७९॥</p>
<p>
	श्रीफल अर्पितां सपटणेकर । समर्थांचिया चरणांवर । “चल हट” शब्दें बाबा धिक्कार । करीत सपट्णेकर यांचा  ॥८०॥</p>
<p>
	सपटाणेकर चिंताग्रस्त । बाबा व्हावे कां संतप्त । मनीं म्हणती बाबांचे परिचित । पाहूनि त्यां इंगित पुसावें ॥८१॥</p>
<p>
	दर्शनें जे व्हावे प्रसन्न । तेच या शब्दें अत्यंत खिन्न । होऊनि सचिंत अधोवदन । बैसले सरकून माघारां ॥८२॥</p>
<p>
	आतां कोणापासीम जावें । कोणा भक्तालगीं पुसावें । काय बाबांच्या बोलांत असावें । मनोगत पुसावें कोणास ॥८३॥</p>
<p>
	ऐसा त्यांचा पाहूनि भाव । कोणी त्यांचिया समाधानास्तव । कथितां बाळा शिंप्याचें नांव । शोधिला ठाव तयाचा ॥८४॥</p>
<p>
	तयालागीं सपटणेकर । निवेदिते झाले वृत्तांत साग्र । म्हणाले बाबा माझा धिक्कार । करिती अत्युग्रवाचेनें ॥८५॥</p>
<p>
	तुम्ही तरी मजसवें यावें । दर्शन शांतपणें करवावें । कृपावलोकन बाबांचें व्हावें । कोपा न यावें आम्हांवरी ॥८६॥</p>
<p>
	असो हें बाळानें मान्य केलें । सपटणेकर निश्चिंत झाले । फोटो बाबांचे विकत आणविले । दर्शना निघाले बाबांच्या ॥८७॥</p>
<p>
	बाळा शिंपी होता संगतीं । फोटो घेऊनि आपुले हातीं । बाळा मग देऊनि बाबांप्रती । बाबांस विज्ञप्ति करिताहे ॥८८॥</p>
<p>
	काय हें देवा कसलें चित्र । पाहूनि बाबा देती उत्तर । हा फोटो आहे याचा यार । बोटानें सपटणेकर दावीत ॥८९॥</p>
<p>
	ऐसें बोलूनि बाबा हांसले । मंडळीसही हांसूं आलें । बाबा काय हो इंगित यांतलें । बाळानें पुसिलें बाबांस ॥९०॥</p>
<p>
	तात्काळ बाळा सपटणेकरां । म्हणे घ्या दर्शन करा त्वरा । मग ते करितां नमस्कारा “चल हट” उद्नारां परिसिलें ॥९१॥</p>
<p>
	तेंच पूर्वील “चल हट” । अजून माझी पुरवी पाठ । आतां काय करावी वाट । आश्चर्य उद्भट सपटणेकरां ॥९२॥</p>
<p>
	मग ते दोघे जोडूनि कर । तिष्ठत असतां बाबांसमोर । ‘निघूनि जा जेथूनि सत्वर’ । आज्ञा त्यां अखेर बाबांची ॥९३॥</p>
<p>
	वाक्य तुमचें स्वामीसमर्था । अनुश्ल्लंघ्य कोणाही सर्वथा । काय आम्हां पामरांची कथा । निघालों आतां येच घडी ॥९४॥</p>
<p>
	ऐकोनि आपण महाउदार । दर्शना आलों तों धिक्कार “चल हट” शब्दें आमुचा सत्कार । काय हा चमत्कार कळेना ॥९५॥</p>
<p>
	तेव्हां असावें कृपावलोकन । द्यावें आम्हां आशीर्वचन । व्हावें सत्वर पुनर्दर्शन । ऐसें आश्वासन मागितलें ॥९६॥</p>
<p>
	ऐसा कोण आहे ज्ञानी । जाणेल काय बाबांचे मनीं । परंतु झालेली आज्ञा मानुनी । गेले स्वस्थानीं माघारां ॥९७॥</p>
<p>
	ऐसें हें त्यांचें प्रथम दर्शन । तेणें ते दोघे अति उद्विग्न । गेले आपुले गांवा परतोन । यत्किंचित विलंब न करितां ॥९८॥</p>
<p>
	पुढें आणीक वर्ष गेलें । तरीही न मन स्थिर झालें । पुनश्च गाणगापुर केलें । चित्त भडकलें अधिकचि ॥९९॥</p>
<p>
	विश्रांत्यर्थ सपटणेकर । गेले माढेगांवीं नंतर । काशीक्षेत्रीं जाण्याचा विचार । केला कीं अखेर तयांनीं ॥१००॥</p>
<p>
	आतां काशीस निघावयास । उरले अवघे दोनच दिवस । झाला द्दष्टान्त निजकांतेस । राहिला प्रवास काशीचा ॥१०१॥</p>
<p>
	द्दष्टान्ताचा चमत्कार । कैसा त्याचा अभिनव प्रकार । कथितों व्हावें श्रवणतत्पर । लीलाचरित्र साईंचें ॥१०२॥</p>
<p>
	झोंपेंत असतां शेजेवर । स्वप्नसृष्टी डोळ्यांसमोर । बाई घेऊनियां घागर । जाई विहिरीवर लक्कडशाचे ॥१०३॥</p>
<p>
	तेथें एका निंबातळी । डोईस जो फडका गुंडाळी । ऐसा एक फकीर ते वेळीं । म्हणे मजजवळी पातला ॥१०४॥</p>
<p>
	“कां व्यर्थ श्रमसी बाळ” । फकीर उद्नारला स्वरें कोमळ । “भरूनि देतों तुझी ही सकळ । घागर निर्मळ उदकेंसीं” ॥१०५॥</p>
<p>
	वाटली भीति फकीराची । घेऊनि घागर रिकामीचि । वाट माघारा धरिली घराची । सवें मागेंमागेंचि फकीर ॥१०६॥</p>
<p>
	ऐसियेपरि पाहूनि स्वप्न । जागा झालें उघडले नयन । परिसूनि कांतास्वप्ननिवेदन । नेमिलें गमन शिर्डीचें ॥१०७॥</p>
<p>
	तेच मुहूर्तीं दोघें निघालीं । उदईक शिर्डीग्रामा पातलीं । येतांच मशिदीमाजीं गेलीं । बाबा ते कलीं लेंडीवर ॥१०८॥</p>
<p>
	बाबा परत येईपर्यंत । बैसतीं झालीं दोघेंही तेथ । बाबांची मार्गप्रतीक्षा करीत । बाबा तंव इतुक्यांत पातले ॥१०९॥</p>
<p>
	मूर्ति जी देखिली द्दष्टान्तांत । तीच ती पाहूनि नकशिखान्त । बाई जाहली विस्मयान्वित । मग ती न्याहाळीतचि राहिली ॥११०॥</p>
<p>
	होता बाबांचें पादक्षालन । बाई गेली घ्यावया दर्शन । करोनि साईपदाभिवंदन । बैसली अवलोकन करीतचि ॥१११॥</p>
<p>
	पाहोनि तियेची विनीतता । उल्लास साईनाथांचे चित्ता । बाबांनीं हळूच आरंभिली कथा । बाईची व्यथानिवारक ॥११२॥</p>
<p>
	तेव्हां नित्यक्रमानुसार । बाबा आपुलीच व्यथा सविस्तर । निवेदूं लागले प्रेमपुर:सर । तत्रस्थ एक्या तिसर्‍यास ॥११३॥</p>
<p>
	पाहूं जातां बाईची कथा । बाईस सांगावयाची असतां । तिच्यासमक्ष तिसर्‍यास कथितां । परिसिली अतिसावधानता बाईनें ॥११४॥</p>
<p>
	“माझे हात पोट कंबर । बहुत दिवस दुखे अनिवार । औषधें करितां झालों बेजार । होईना परिहार व्यथेचा ॥११५॥</p>
<p>
	कंटाळलों मीं औषधें खातां । गुण म्हणून येईना तत्त्वतां । परी मज आश्चर्य वाटे आतां । गेली कीं व्यथा एकाएकीं” ॥११६॥</p>
<p>
	ऐसी ही कथा तिजिया कथितां । बाईचा नामनिर्देशही न करितां । तियेचीच ही वार्ता सर्वथा । संबंध हा होता तियेचा ॥११७॥</p>
<p>
	पुढें मासादोंमासांअंतीं । बाबांनीं आपुली जी वर्णिली होई । त्याच तियेच्या व्यथेची निवृत्ति । झाली तंव प्रतीति पटली तिला ॥११८॥</p>
<p>
	पूर्ण झाली बाईची कामना । तंव सपटणेकर घेती दर्शना । त्यांची पूर्वील “चल हट” संभावना । बाबांनीं पुन्हां केलीच ॥११९॥</p>
<p>
	न कळे काय माझी चूक । धिक्कारिती मज बाबा अचूक । नमस्कारितां उत्तर एक । मजला ठराविक तयांचें ॥१२०॥</p>
<p>
	काय कीं माझें पूर्वार्जित । मजवरीच कां रागेजत । इतरांपाशीं माझियादेखत । वर्तत अत्यंत प्रेमानें ॥१२१॥</p>
<p>
	पाहूं जातां सांजसकाळीं । बाबांपाशीं अवघी मंडळी । आनंदें अनुभवीत नित्य दिवाळी । माझेच कपाळीं ‘चल हट्’ ॥१२२॥</p>
<p>
	कांहीं माझें कर्म विकोपा । गेलें पावलों धर्मविलोपा । आश्रय झालों अनंत पापा । तेणेंच ही अवकृपा मजवरी ॥१२३॥</p>
<p>
	आरंभीं मी बाबांविषयीं । होतों कुतर्की तैसाच संशयी । तेणेंच वाटलें ऐसिया उपायीं । बाबाच मज ठायीं पाडीत ॥१२४॥</p>
<p>
	म्हणूनि केला निजनिर्धार । अनुग्रह बाबांचा होयतोंवर । तेथेंच वृत्ति ठेवूनि स्थिर । रहावें सुस्थिर मानसें ॥१२५॥</p>
<p>
	त्रिविधतापें तापलेला । वरी साईंच्या दर्शना भुकेला । ऐसा कोण विन्मुख गेला । जो न निवाला अंतरीं ॥१२६॥</p>
<p>
	तरी ते दिवसीं अति उद्विग्न । गोड न लागे अन्नपान । गोड न लागे गमनागमन । उन्निद्रनयन शेजेवर ॥१२७॥</p>
<p>
	जवळ नाहीं कोणी अवांतर । बाबाच एकले असती गादीवर । साधूनियां ऐसा अवसर । धरावे चरण बाबांचे ॥१२८॥</p>
<p>
	करीत निश्चय सपटणेकर । फळासि आला त्यांचा निर्धार । होऊनियां सद्नदितांतर । धरीत चरण बाबांचे ॥१२९॥</p>
<p>
	पायांवरी ठेवितां शिर । बाबा तयावर ठेवीत निजकर । पादसंवाहन करीत सपटणेकर । आली एक बाई धनगर तों ॥१३०॥</p>
<p>
	बाई येतांच तेथवर । रगडूं बैसली बाबांची कंबर । बाबा नित्यक्रमानुसार । वार्ता तिजबरोबर करितात ॥१३१॥</p>
<p>
	वार्तेचा त्या चमत्कार । लक्षपूर्वक सपटणेकर । ऐकतां ती त्याचीच समग्र । अक्षरें अक्षर आढळली ॥१३२॥</p>
<p>
	जरी होकार धनगरी देत । सपटणेकर आश्चर्यभरित । आपुलेंच वृत्त वैसले ऐकत । तेणें ते चकित अंतरीं ॥१३३॥</p>
<p>
	गोष्ट ती एका वाणियाची । परी वस्तुत: होती त्यांची । त्यांतरी त्यांचे मयत मुलाची । वार्ता मृत्यूची निघाली ॥१३४॥</p>
<p>
	कोणी अत्यंत परिचित । नातेवाईक सांगे वृत्त । जन्मापासूनि मरणापर्यंत । तैसें तें साद्यंत कथियेलें ॥१३५॥</p>
<p>
	बाईलागीं सांगती कथा । तिचा न कथेशीं संबंध तत्त्वतां । ती तों  पितापुत्रांची वार्ता । विषय सर्वथा दोघांचा ॥१३६॥</p>
<p>
	असो ऐसी निजकथा । साईमुखें सपटणेकर ऐकतां । परम विस्मय जाहला चित्ता । बाणली आदरता साईपदीं ॥१३७॥</p>
<p>
	वाटलें तयां मोठें कौतुक । बाबांला ही कैशी ठाऊक । परी जैसा करतलामलक । तेवीं हें सकळिक बाबांना ॥१३८॥</p>
<p>
	ब्रम्हास्वरूप स्वयें आपण । तयाचें विश्व कुटुंब जाण । किंबहुना विश्वचि नटला पूर्ण । तीच ही खूण साईची ॥१३९॥</p>
<p>
	एकात्मतेचा विस्तार । तोच कीं साईचा अवतार । तयास कैंचें आपपर । स्वयें सविस्तर जगरूप ॥१४०॥</p>
<p>
	विनटला जो परमपुरुषा । तया कैंची द्वैतभाषा । द्रष्टा दर्शन अथवा द्दश्या । नातळे आकाशा जणूं लेप ॥१४१॥</p>
<p>
	बाबा महान अंतर्ज्ञानी । ऐसें येतांच तयांचे मनीं । बाना काय तयांलागुनी । वदले तें सज्जनीं परिसिजे ॥१४२॥</p>
<p>
	वोट दावुनि तयांसमोर । बाबा साश्चर्य काढिती उद्नार । “मारिलें म्हणे मीं याचें पोर । आरोप मजवर हा ठेवी ॥१४३॥</p>
<p>
	मी लोमांचीं पोरें मारितों । हा कां मशिदीस येऊनि रडतो । बरें मी आतां ऐसें करितों । पोटासी आणितों पुत्र त्याचा ॥१४४॥</p>
<p>
	जैसा मेलेला रामदास । दिला माघारा त्या बाईस । तैसाच पुनश्च त्याचिये मुलास । आणितों मी पोटास त्याचिया” ॥१४५॥</p>
<p>
	ऐसें ऐकूनि सपटणेकर । तिष्ठत लावूनि बाबांकडे नजर । ठेवूनि त्यांच्या मस्तकीं कर । बाबा त्यां धीर देतात ॥१४६॥</p>
<p>
	म्हणती “हे पाय पुरातन फार । जाहली तुझी काळजी दूर । पूर्ण भरंवसा ठेव मजवर । कृतार्थ लवकर होसील” ॥१४७॥</p>
<p>
	करीत असतां पादसंवाहन । परिसतां बाबांचें मधुरवचन । सपटणेकर सद्नदितनयन । पदाभिवंदन करीत ॥१४८॥</p>
<p>
	आले अष्टभाव दाटून । नयनीं आनंदाश्रुजीवन । तेणें बाबांचें पादक्षालन । प्रेमें प्रक्षालन मग केलें ॥१४९॥</p>
<p>
	पुन्हां बाबांनीं मस्तकीं हात । ठेवूनि म्हणाले बैसावें स्वस्थ । तेव्हां सपटणेकर बिर्‍हाडीं परत । आले आनंदित मानसें ॥१०५॥</p>
<p>
	नैवेद्याची केली तयारी । देऊनियां निजयुवतीकरीं । पूजा आरती जाहलियावरी । ताट तें सारित बाबांपुढें ॥१५१॥</p>
<p>
	मग प्रोक्षूनियां पात्रास । करोनि सविधि नेत्रस्पर्श । प्राणापानव्यानादिकांस । अर्पोनि मग बाबांस समर्पिला ॥१५२॥</p>
<p>
	मग अनुसरूनि नित्यक्रमास । बाबांस होतां हस्तस्पर्श । स्वीकारितां नैवेद्यास । वाटला हर्ष सपटणेकरां ॥१५३॥</p>
<p>
	मग तत्रस्थ इत्र भक्त । होते बाबांचे पायां पडत । शिरले सपटणेकर त्या गर्दींत । पुनश्च नमस्कारीत त्वरेनें ॥१५४॥</p>
<p>
	असो ऐसिया त्या घाईंत । मस्तका मस्तका मस्तक आथडत । बाबा तेव्हां सपट्णेकरांप्रत । कैसे अनुवादत संथपणें ॥१५५॥</p>
<p>
	अरे कशाला वारंवार । नमस्कारावर नमस्कार । पुरे तो केला एकवार । आदरसत्कारपूर्वक ॥१५६॥</p>
<p>
	असो ते रात्रीं होती चावडी । सपटणेकर अति आवडी । प्रेमें निघाले पालखीअघाडीं । आनंदपरवडी दंडधारी ॥१५७॥</p>
<p>
	असो ही चावडीमिरवणूक । श्रोतयां पूर्वींच आहे ठाऊक । तरी पुनरुक्ति आवश्यक । विस्तारकारक वर्जियेली ॥१५८॥</p>
<p>
	असो पुढें ते रात्रीला । ही बाबांची अगाध लीला । बाबा दिसले सपटणेकरांला । जणूं पांडुरंगालाच पाहतों ॥१५९॥</p>
<p>
	असो पुढें मागतां आज्ञा । जेवूनि जावें झाली अनुज्ञा । न करितां यत्किंचित अवज्ञा । निघाले मग दर्शना ॥१६०॥</p>
<p>
	इतुक्यांत मग त्यांचिये मना । एकाएकीं उठली कल्पना । बाबा आतां मागतां दक्षिणा । ती मी पुरविणार कैसेनी ॥१६१॥</p>
<p>
	पैसे गांठीस होते ते सरले । गाडीभाडयाचे पुरतेच उरले । “दक्षिणा दे” जर वदले । उत्तर ठरविलें मनानें ॥१६२॥</p>
<p>
	मागावयाचे आधींच द्यावा । रुपया एक हातीटं ठेवावा । पुन्हां मागतां आणखी अर्पावा । नाहीं म्हणावा तयापुढें ॥१६३॥</p>
<p>
	अग्निरथाचे भाडयासाठीं । आवश्यक तेचि ठेविले गांठीं । ऐसें बाबांस सांगावें स्पष्टोक्तीं । ठरवोनि भेटीस ते गेले ॥१६४॥</p>
<p>
	पूर्वील कृतनिश्चयानुसार । रुपया एक ठेवितां हातावर । आणिक एकचि मागितला त्यावर । देतां ते भरपूर अनुवादले ॥१६५॥</p>
<p>
	म्हणाले “हा घे एक नारळ । स्वस्त्रियेच्या ओटींत घाल । आणिक मग तूं जाईं खुशाल । सोडूनि तळमळ जीवाची” ॥१६६॥</p>
<p>
	पुढें जातां महिने बारा । पुत्र आला त्याचिये उदरा । घेऊनि आठां मासांचिया लेंकुरा । आलीं तीं माघारा दर्शना ॥१६७॥</p>
<p>
	मुलगा घातला बाबांचे चरणीं । काय संतांची नवल करणी । मग तीं दोघें जोडूनि पाणी । करिती विनवणी ती परिसा ॥१६८॥</p>
<p>
	या उपकारा साईनाथा । केवीं उतराई व्हावें आतां । आम्हां कांहींच कळेना सर्वथा । ठेवितों माथा चरणांवर ॥१६९॥</p>
<p>
	हीन दीन आम्ही पामर । कृपा असावी अनाथांबर । आतां येथूनि पुढें निरंतर । चरणीं तव थार असावा ॥१७०॥</p>
<p>
	जागृतीमाजीं तैसेंच स्वप्नीं । नाना तरंग उठती मनीं । उसंत नाहीं दिवसरजनीं । तरी तव भजनीं लावीं आम्हां ॥१७१॥</p>
<p>
	असो तो मुलगा पुरलीधर । आणीक दोन भास्कर दिनकर । यांचियासमवेत सपटणेकर । प्रसन्नांतर जाहले ॥१७२॥</p>
<p>
	मग ते सवें घेऊनि भार्या । करूनि वंदन साई सदया । साधूनि चंचल मनाचे स्थैर्या । होऊनि कृतकार्या परतले ॥१७३॥</p>
<p>
	कथा संगावी संकलित । होता मनीं आरंभीं हेत । परी बदविता साईनाथ । तेणें हा ग्रंथ विस्तारला ॥१७४॥</p>
<p>
	तयासी हा हेमाड शरण । पुढील कथेचें अनुसंधान । तात्पर्यार्थ दिग्दर्शन । श्रोतयांलागून करीतसे ॥१७५॥</p>
<p>
	कथा ती याहूनि बहु गोड । चमत्काराची जया आवड । ऐसिया एका भक्ताचें कोड । पुरविलें नितोड साईंनीं ॥१७६॥</p>
<p>
	लोक वर्णितां साईंचे गुण । दोषदर्शी देखे अवगुण । स्वयें न स्वार्थपरमार्थपरायण । दोषैकदर्शन हेतु मनीं ॥१७७॥</p>
<p>
	असतील साईबाबा संत । तरी ते मज देतील प्रचीत । मजला अनुभव आलियाविरहित । मी त्यां यत्किंचित मानींना ॥१७८॥</p>
<p>
	केवळ परीक्षा पहावयास । गेलियाचीही इच्छा पुरत । हीच कथा पुढील अध्यायांत । श्रवण करोत सच्छ्रोते ॥१७९॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । साशंकभक्तानुग्रहकरणं नाम अष्टचत्वारिंशोत्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-49-122042900056_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ४९</a></strong></p>
</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 Apr 2022 15:18:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 Apr 2022 16:08:05 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ४७]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-47-122042900054_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
ज्यांचें क्षणैक देखिल्या वदन । होय अनंतजन्मदु:खदलन । तें परमानंद - जननस्थान । धन्य श्रीवदन साईंचें ॥१॥
ज्यांचें ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 47" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/29/full/1651225608-363.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra part 47" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	ज्यांचें क्षणैक देखिल्या वदन । होय अनंतजन्मदु:खदलन । तें परमानंद - जननस्थान । धन्य श्रीवदन साईंचें ॥१॥</p>
<p>
	ज्यांचें झालिया कृपावलोकन । तात्काळ कर्मबंधविमोचन । स्वानंदपुष्टी निजभक्तजन । न लागतां क्षण लाधती ॥२॥</p>
<p>
	ज्यांचिया कृपाद्दष्टीपुढें । कर्माकर्माचें फिटे बिरडें । यत्कृपासूर्याचिया उजियेडें । भवखद्योत दडे निस्तेज ॥३॥</p>
<p>
	जगाचीं पापें भागीरथी धूते । तेणें ती स्वयें मलयुक्त होते । सांचला निजमल निरसावयातें । साधूंचे इच्छिते चरणरज ॥४॥</p>
<p>
	कधीं साधूंचे पाय लागती । कधीं मजमाजी स्नानार्थ येती । त्यावीण निजपापाची निर्गती । नव्हे, हें निश्चिती जाणे ती ॥५॥</p>
<p>
	ऐसिया साधूंचा मुकुटमणी । समर्थसाई यांची ही वाणी । जाणूनि अत्यादरें भाविक सज्जनीं । आकर्णिजे पावनी ही कथा ॥६॥</p>
<p>
	नवल या कथेचें महिमान । श्रोते सज्ञान वा अज्ञान । परिसतां तुटेल कर्मबंधन । परमपावन कथा हे ॥७॥</p>
<p>
	नयनांचाही नयन साई । श्रवणांचाही श्रवण पाहीं । तेणेंचि रिघोनि माझिये ह्रदयीं । वार्ता जी ही निवेदिली ॥८॥</p>
<p>
	साई स्वयें महानुभाव । परिसतां या कथेचा नवलाव । श्रोते विसरतील देहभाव । अष्टप्रेमभाव दाटतील ॥९॥</p>
<p>
	साईमुखींची हे कथा । लक्ष लावूनि तिच्या ह्रद्नता । तात्पर्यावरी द्दष्टी ठेवितां । कृतकर्तव्यता श्रोत्यांस ॥१०॥</p>
<p>
	तरी विनंती परिसिजे श्रोतां । जरी मी या कथेचा वक्ता । मीही तुम्हांसारिखाच रिता । न घेतां मथितार्था येथील ॥११॥</p>
<p>
	आठवितां तयांचें भक्तप्रेम । मन विसरे मनोधर्म । होय संसारत्रस्ता । उपरम । याहूनि परम लाभ काय ॥१२॥</p>
<p>
	पूर्वकथेचें अनुसंधान । श्रोतां परिसिजे सावधान । होईल जीवा समाधान । कथा अव्यवधान परिसतां ॥१३॥</p>
<p>
	गताध्यायाचिये अंतीं । ऐकिली शेळ्यांची कथा श्रोतीं । तयां ठायीं बाबांची प्रीती । गतजन्मस्मृती तयांची ॥१४॥</p>
<p>
	तैसीच आतां हेही कथा । द्रव्यलोभाची परमावस्था । कैसी नेई अध:पाता । सावधानता परिसावी ॥१५॥</p>
<p>
	साईच पूर्ण कृपाद्दष्टी । कथा सूचवी उठाउठी । येऊं न देई श्रवणा तुटी । सुख - संतुष्टी वाढवी ॥१६॥</p>
<p>
	कथा वक्ता आणि वदन । स्वयें साईसमर्थ आपण । तेथें हेमाड किमर्थ कवण । उगाच टोपणनांवाचा ॥१७॥</p>
<p>
	वैसलों साईकथाब्धितटीं । त्या आम्हां काय कथांची आटाआटी । कल्पतरूचिया तळवटीं । कामना उठी तों सिद्धी ॥१८॥</p>
<p>
	काय दिनकराचिया घरीं । कोण दीपाची चिंता करी । जया अमृतपान  निरंतरी । विषाची लहरी काय तया ॥१९॥</p>
<p>
	असतां आम्हां साईंसारिखा । सदैव आमुचा पाठिराखा । वाण काय कथापीयूखा । यथेच्छ चाखा त्या हरिखा ॥२०॥</p>
<p>
	कर्मसूत्र मोठें गहन । कोणासही ना होई आकलन । ठकिजेति महासज्ञान । भावार्थी अज्ञन तरिजेत ॥२१॥</p>
<p>
	तैसाच दुर्गम ईश्वरी नियम । कोण करील त्याचा अतिक्रम । आचरा नित्य लौकिक धर्म । करावें तत्कर्म सर्वदा ॥२२॥</p>
<p>
	नाहीं तरी अत्यंत अधर्म । पावूनियां मरणधर्म । जैसें जैसें जयांचें कर्म । पावती जन्म तदनुरूप ॥२३॥</p>
<p>
	‘यथाकर्म यथाश्रुत’ । शुक्रबीज - समन्वित । कांहीं योनिद्वारीं प्रवेशत । स्थावरभावाप्रत कांहीं ॥२४॥</p>
<p>
	‘यथाप्रज्ञं हि संभवा: ।’ शुत्यर्थ नाहीं कवणा ठावा । जन्म घेणें तरी तो घ्यावा । रुचेल जीवा जो जैसा ॥२५॥</p>
<p>
	जाणा हे मूढ अविद्यावंत । शरीरग्रहणालागीं उद्यत । जैसें जयांचें उपार्जित । शरीर प्राप्त तैसें तयां ॥२६॥</p>
<p>
	म्हणून शरीरपाताआधीं । नरजन्माची अमोल संधी । दवडी ना जो आत्मबोधावधी । तो एक सुधी जाणावा ॥२७॥</p>
<p>
	तोच संसारबंधमुक्त । इतर संचारचक्रीं पडत । कधींही शरीरत्वासी न मुकत । यातना न चुकत जन्माच्या ॥२८॥</p>
<p>
	आतां या कथेचा नवलाव । दुष्टवृत्तीसी अंतर्भाव । बुजे ‘मी देह’ ही आठव । सात्त्विक अष्टभाव उठतील ॥२९॥</p>
<p>
	गांठीं असतां अमूप धन । स्वभावें जो अत्यंत कृपण । धिग् धिग् तयाचें जीवन । आमरण शीण अनुभवी ॥३०॥</p>
<p>
	त्यांतही वैरवृत्तीचा वारा । कदाकाळींही नव्हे बरा । तयापासाव मनासी आवरा । करील मातेरा जन्माचा ॥३१॥</p>
<p>
	परस्परवैराचा परिणाम । उत्तमाचा जन्मे अधम । ऋण - वैर - हत्यांचा धर्म । फिटे तों जन्मपरंपरा ॥३२॥</p>
<p>
	ये अर्थींची अमृत वाणी । साईमुखोद्नार परमपावनी । करितों सादर श्रोतयांलागुनी । असावें श्रवणीं सावधान ॥३३॥</p>
<p>
	तीही कथा जैसी ऐकिली । जैसी माझिया स्मरणीं राहिली । तैसीच कथितों त्याच बोलीं । जे ती माउली वदली ते ॥३४॥</p>
<p>
	साईच स्वयें चरित्रकार । लिहवून घेई कथाविस्तार । हेमाड केवळ निमित्तमात्र । सूत्रधार ज्याचा तो ॥३५॥</p>
<p>
	‘एके प्रात:काळचे प्रहरीं । आठ वाजावयाचे अवसरीं । करूनियां नित्याची न्याहारी । पडलों बाहेरी फिरावया ॥३६॥</p>
<p>
	मार्गीं जातां जातां श्रमलों । नदीकिनारीं एका पातलों । पाय धुतले स्नान केलों । अंतरीं धालों बहुवस ॥३७॥</p>
<p>
	नदी तरी होती केवढी । या राहत्याच्या नदीएवढी । पाणी भरलें होतें दुथडी । कांठासी झाडी लव्हाळ्यांची ॥३८॥</p>
<p>
	होती तेथें पायवाट । गाडीमार्गही होता स्पष्ट । वृक्षही कांठीं होते घनदाट । छायाही उत्कृष्ट पडलेली ॥३९॥</p>
<p>
	वायु वाहे मंद मंद । तेणें मनाला बहु आनंद । द्दष्टीं देखोनि वृक्षवृंद । बैसलों स्वच्छंद छायेसी ॥४०॥</p>
<p>
	जातां चिलीम भरावयाला । तदर्थ छापी भिजवावयाला । ‘डरांव डरांव’ शब्द ऐकिला । ध्वनि मज वाटला बेडकाचा ॥४१॥</p>
<p>
	नवल काय पाणीच जेथें । बेडूक असणें सहज तेथें । छापी भिजवून तंव मी परतें । घेतली हातें चकमक ॥४२॥</p>
<p>
	गारेवरी ठिणगी पाडून । चिलीम तयार झाली पेटून । तोंच एक वाटसरू येऊन । बैसला वंदून मजपाशीं ॥४३॥</p>
<p>
	नम्रपणें मजकडून । चिलीम आपुले हातीं घेऊन । ‘लई लांब झुकलांत’ म्हणून । आदरें मज पुसून राहिला ॥४४॥</p>
<p>
	‘मशीद फार लांब येथून । तेथें जातां होईल ऊन । हें पलीकडे माझें सदन । चिलीम पिऊन जाऊं कीं ॥४५॥</p>
<p>
	तेथें वांईच खा कीं भाकर । स्वस्थ आराम करा विळभर । मग ऊन खालीं झालियावर । खुशाल माघारां परतावें ॥४६॥</p>
<p>
	मीही येईन बरावर’ । ऐसें भाषण झालियावर । चिलीम पेटवूनियां वाटसर । देई मज सादर ओढावया ॥४७॥</p>
<p>
	तिकडे तो बेडूक आर्त स्वरें । ओरड करूं लागे गजरें । चौकशी केली त्या वाटसरें । कोण बरें हा ओरडतो ॥४८॥</p>
<p>
	तंव मी वदें नदीकांठीं । बेडूक सांपडलासे संकटीं । लागलें त्याचें कर्म त्यापाठीं । ऐक ती गोठी तुज कथितों ॥४९॥</p>
<p>
	पूर्वजन्मीं जैसें करावें । इये जन्मीं तैसें भरावें । कर्मभोगा सादर व्हावें । आतां रडावें किमर्थ ॥५०॥</p>
<p>
	मग ऐसें हें परिसून । चिलीम माझिया हातीं देऊन । निघाला वाटसरू तेथून । म्हणे मी पाहून येतों जरा ॥५१॥</p>
<p>
	असे खरोखर तो बेडूक । अथवा कोणी  प्राणी आणिक । मन तरी करूं नि:शंक । काय त्या दु:ख आहे तें ॥५२॥</p>
<p>
	ऐसी तयाची इच्छा बघुनी । म्हणालों मी जा ये पाहोनी । एका मोठया सर्पाचे वदनीं । बेडूक पडुनी ओरडतसे ॥५३॥</p>
<p>
	दोघेही महा हरामखोर । दोघांचींही कृत्यें अघोर । पूर्वजन्मींचीं पापें भयंकर । पावले देहान्तर । भोगावया ॥५४॥</p>
<p>
	असतां चालले ऐसे विचार । गेला वाटसरू त्या जाग्यावर । आला पाहूनि प्रत्यक्ष प्रकार । म्हणे तो साचार वृत्तान्त ॥५५॥</p>
<p>
	सर्पही तो जैसा काळ । ऐसा मोठा जबडा विशाळ । बेडूकही मोठा विक्राळ । परी तो फराळ सर्पाचा ॥५६॥</p>
<p>
	घडी अर्धघडीचा सोबती । पडली सर्पामुखीं आहुती । काय विचित्र कर्मगती । क्षणांत निश्चिंती होईल त्या ॥५७॥</p>
<p>
	तंव मी म्हणालों तयांतें । तो काय करितो निश्चिंतीतें । त्याचा मी बाप आहें ना येथें । मग मी कशातें पाहिजे ॥५८॥</p>
<p>
	सोडूनियां आपुलें स्थान । बैसलों जो येथें येऊन । तो काय बेडूक खाऊं देईन । पहा मी सोडवीन त्या कैसा ॥५९॥</p>
<p>
	आतां ही झुंज सोडविल्यावरी । आपण जाऊं आपुले घरीं । जा जा एकदां चिलीम भरीं । पाहूं मग काय करी सर्प ॥६०॥</p>
<p>
	चिलीम तात्काळ तयार केली । वाटसरूनें स्वयें चेतविली । झुरका मारून मजपुढें केली । हातीं मीं घेतली ओढावया ॥६१॥</p>
<p>
	मारिले म्यां झुरके दोन । वाटसरूला सवें घेऊन । गेलों त्या लव्हाळ्यामधून । पावलों तें स्थान विवक्षित ॥६२॥</p>
<p>
	पुनश्च सर्प अवलोकून । वाटसरू तो गेला भिऊन । केवढें हें धूड म्हणून । निवारी मजलागून भीतीनें ॥६३॥</p>
<p>
	म्हणे नका हो जाऊं पुढें । सर्प तो येईल आपुलेकडे । पळूं म्हणतां स्थळ हें सांकडें । नका हो तिकडे जाऊं नका ॥६४॥</p>
<p>
	अवलोकितां ऐसा देखावा ।  वाटसरू तो भ्याला जीवा । मग त्या दोघांचिया वैरभावा - । संबंधें परिसावा उपदेश ॥६५॥</p>
<p>
	अरे बाबा वीरभद्राप्पा । अझून हा तुझा वैरी बसाप्पा । पावला नाहीं का अनुतापा । दर्दुररूपा आला तरी ॥६६॥</p>
<p>
	तूंही आलासी सर्पयोनी । तरीही हाडवैर अजुनी । आतां तरी शरम धरुनी । वैर त्यजुनी स्वस्थ रहा ॥६७॥</p>
<p>
	शब्द पडतां मुखांतुनी । सर्प जो पळाला बेडूक सोडुनी । सत्वर खोळ पाण्यांत शिरुनी । अद्दश्य तेथुनी जाहला ॥६८॥</p>
<p>
	मृथूचिये मुखामधला । बेडूक टणकर उडून गेला । तोही झाडींत जाऊन लपला । वाटसरू झाला साश्चर्य ॥६९॥</p>
<p>
	म्हणे हें काय न कळे मजला । शब्द मुखींचा तो काय पडला । बेडूक कैसा सापानें सोडिला । सापही दडला तो कैसा ॥७०॥</p>
<p>
	यांतील वीरभद्राप्पा कोण । तैसाच यांतील बसाप्पा कोण । वाटसरू पुसे वैराचें कारण । म्हणे मज निवेदन करा कीं ॥७१॥</p>
<p>
	बरें आधीं झाडाखालती । जाऊं ओढूं चिलीम मागुती । म्हणालों करीन जिज्ञासापूर्ती । मग मी स्वस्थळाप्रती जाईन ॥७२॥</p>
<p>
	आलों दोघे झाडाखालीं । पडली होती दाट साउली । गार वार्‍याची झुळुक चालली । पुनश्च सळगावली चिलीम ॥७३॥</p>
<p>
	वाटसरूनें आधीं ओढिली । पश्चात् माझिये करीं दिधली । ती मीं ओढितां कथिली । कथा त्या वहिली वाटसरूस ॥७४॥</p>
<p>
	पहा माझिये स्थळापासून । कोस दोन अथवा तीन । इतकेंच दूर पवित्रस्थान । महिमासंपन्न होतें जुनें ॥७५॥</p>
<p>
	तेथें एक महादेवाचें । मोडकें देऊळ कधीं काळाचें । तयाचिया जीर्णोद्धाराचें । आलें सर्वांचे मनांत ॥७६॥</p>
<p>
	तदर्थ मोठी वर्गणी केली । बरीच रक्कम गोळा झाली । पूजेअर्चेची व्यवस्था ठरविली । पूर्ण आंखिली रूपरेषा ॥७७॥</p>
<p>
	तेथील एक मोठा धनिक । नेमिलें त्या व्यवस्थापक । पैसा केला तयाचे हस्तक । पूर्ण निर्णायक तो केला ॥७८॥</p>
<p>
	तयानें कीर्द ठेवावी पृथक् । तींत आपुली वर्गणी रोख । जमा करावी हें कार्यही अचूक । करावें प्रामाणिकपणानें ॥७९॥</p>
<p>
	परी तो जात्या मोठा कंजूष । खार न लागावा पदरास । ऐसिया धोरणें चालवी कामास । तेणें तें तडीस जाईना ॥८०॥</p>
<p>
	खर्च केली सारी रकम । अर्धेंमुर्धें जाहलें काम । खर्चीना हा पदरचा दाम । गांठींचा छदाम सोडीना ॥८१॥</p>
<p>
	जरी मोठा सावकार । कृपणपणाचा पूर्णावतार । बोलाची नुसती पेरी साखर । कामासी आकार येईना ॥८२॥</p>
<p>
	पुढें त्याच्या जमली घरीं । मंडळी पैसा जमविणारी । म्हणे ही तुझी सावकारी । काय तरी रे कामाची ॥८३॥</p>
<p>
	महादेवाचा जीर्णोद्धार । तूं न लावितां हातभार । पडेल कैसा नकळे पार । कांहीं विचार कर याचा ॥८४॥</p>
<p>
	करूनि लोकांची मनधरणी । पुनश्च मिळवूं आणिक वर्गणी । तीही देऊं तुज पाठवुनी । आण कीं ठिकाणीं हें काम ॥८५॥</p>
<p>
	पुढें आणिक पैसा जमला । उत्तम प्रकारें हातीं आला । कांहीं न त्याचा उपयोग झाला । धनिक बैसला तो स्वस्थ ॥८६॥</p>
<p>
	असो जाताम कांहीं दिवस । आलें देवाजीच्या मनास । याच धनिकाचिया कुटुंबास । जाहला ते समयास द्दष्टान्त ॥८७॥</p>
<p>
	तूं तरी हो जागी ऊठ । बांधीं जा त्या देउळा घुमट । जे खर्चशील त्याची शतपट । तुज तो नीळकंठ देईल ॥८८॥</p>
<p>
	दुसरे दिवशीं तो द्दष्टान्त । पतीच्या कानीं घातला साद्यंत । कवडी खर्चतां जया प्राणान्त । तया हा अत्यंत उद्वेगक ॥८९॥</p>
<p>
	करावा अहर्निश वित्तसंचय । दुजा न ज्याच्या चित्ता विषय । तयास या स्वप्नाचा आशय । द्रव्याचा व्यय केवीं पटे ॥९०॥</p>
<p>
	त्यानें सांगितलें पत्नीस । मी न मानीं द्दष्टान्तास । मुळींच नाहीं माझा विश्वास । मांडला उपहास तियेचा ॥९१॥</p>
<p>
	जैसी जयाची चित्तवृत्ति । तैसीच तया जगत्स्थिति । स्वयें असलिया शठप्रकृति । इतरही दिसती तैसेच ॥९२॥</p>
<p>
	जरी असतें देवाचे मनीं । माझाच पैसा घ्यावा काढुनी । मी काय दूर होतों तुजपासुनी । तुझेच स्वप्नीं कां गेला ॥९३॥</p>
<p>
	तुलाच कां हा द्दष्टान्त झाला । मलाच कां तो देवें न दिधला । म्हणोनि येईना भरंवसा मजला । याचा न समजला मज भाव ॥९४॥</p>
<p>
	असावें हें खोटें स्वप्न । अथवा हा असेल ईश्वरी यत्न । नवराबायकोंत व्हावी उत्पन्न । दुही हें चिन्ह दिसतें मज ॥९५॥</p>
<p>
	जीर्णोद्धाराचिये कामीं । साह्य माझें आहे का कमी । महिन्या महिन्यास होते रिकामी । थैली आम्हीं भरलेली ॥९६॥</p>
<p>
	लोक आणिती रक्कम सारी । दिसतें खरें हें बाह्यात्कारीं । जमाखर्चाची पद्धति व्यापारी । नुकसानकारी मज बहु ॥९७॥</p>
<p>
	लोकांनाही नाहीं अवगत । कळावें तें कैसें तुजप्रत । तेव्हां हा जो तुझा द्दष्टान्त । येईना यथार्थ मानावया ॥९८॥</p>
<p>
	खरा मानितां होईल फसगत । निद्राभंगें पडती  द्दष्टान्त । ते काय कोणी मानी यथार्थ । धनिकें हा सिद्धान्त ठरविला ॥९९॥</p>
<p>
	ऐकून बाईल बसे निवान्त । पतीपुढें ती निरुत्तर होत । पैसा जरी लोक जमवीत । संतोषें देत व्कचितचि ॥११०॥</p>
<p>
	प्रेमेंवीण भिडेभाडें । पडतां आग्रह अथवा सांकडें । जें दिधलें तें देवा नावडे । गोडीचें थोडेंही बहु मोल ॥१०१॥</p>
<p>
	जैसा जैसा पैसा जमत । कामही तैसें तैसें होत । पैसा थकतां कामही थकत । ऐसें तें दिरंगत चाललें ॥१०२॥</p>
<p>
	धनिक काढीना कृपण जैसा । आपुल्या पिशवींतील एकही पैसा । पुनश्च झाला द्दष्टान्त कैसा । कांतेस तो परिसा धनिकाच्या ॥१०३॥</p>
<p>
	नको आग्रह करूं पतीस । पैसा देण्यास देउळास । भाव तुझा पुरे देवास । द्यावें तव इच्छेस येईल तें ॥१०४॥</p>
<p>
	पैसा एक मनोभावाचा । स्वसत्तेचा तो लाखाचा । अर्पण देवास करीं साचा । विचार पतीचा घेऊन ॥१०५॥</p>
<p>
	करूं नको व्यर्थ शीण । मना येईल तें द्यावें आपण । स्वसत्तेचें अल्प प्रमाण । असेना, अर्पण करीं तें ॥१०६॥</p>
<p>
	तेथें केवळ भाव कारण । तुझा तो आहे हें जाणून । कांहीं तरी दे दे म्हणून । आग्रह जाण देव धरी ॥१०७॥</p>
<p>
	तरी जें असेल अल्प वित्त । देऊनि होईं तूं निश्चिंत । भावावीण देणें तें अनुचित । देवा न यत्किंचित आवडे ॥१०८॥</p>
<p>
	विनाभाव जो देईल । त्याचें तें सर्व मातीमोल । अंतीं समूळ होईल निष्फळ । अनुभव हा येईल अविलंबें ॥१०९॥</p>
<p>
	असो हा द्दष्टान्त ऐकुनी । केला तिनें निश्चय मनीं । पितृदत्त अलंकार वेंचुनी । मागणें परिपूर्ण करावें ॥११०॥</p>
<p>
	मग तिनें  पतीलागून । केला तो निश्चय निवेदन । पतीनें तें घेतलें ऐकून । अंतरीं उद्विग्न जाहला ॥१११॥</p>
<p>
	लोभ तेथें कैंचा विचार । नाहीं देव धर्म आचार । मनीं म्हणे हा काय अविचार । भ्रांतिष्ट साचार ही झाली ॥११२॥</p>
<p>
	म्हणे हे तिचे अलंकार । करूनियां सर्वांचा आकार । मोल ठरवूनि एक हजार । जमीन खाजण । होती जी गहाण कोणाची ॥११४॥</p>
<p>
	जमीनही ती होती ओसिक । पर्जन्यकाळींही नापीक । पत्नीस म्हणे करून टाक । अर्पण पिनाकपाणीस ॥११५॥</p>
<p>
	हजाराची ऐसी जमीन । करितां देवालागीं दान । द्दष्टान्तानुरूप होईल प्रसन्न । होसील उत्तीर्ण ऋणांतुनी ॥११६॥</p>
<p>
	असो मानूनि पतीचें वचन । कृपणकांता तंव जमीन । प्रेमभावें करी अर्पण । शंकरसंतोषण व्हावया ॥११७॥</p>
<p>
	वस्तुस्थिति पाहूं जातां । दोनशेंच्या कर्जाकरितां । धनिकापाशीं गहाण असतां । डुबकीची सत्ता हिजवर ॥११८॥</p>
<p>
	डुबकी एक अनाथ बाई । जमीन तिच्या सत्तेची ही । तीही जमीन गहाण देई । आपत्तिपायीं द्र्व्याच्या ॥११९॥</p>
<p>
	परी धनिक महालोभी । शंकराही फसवितां न भी । कांतेचें स्त्रीधन दावी । कपटलाभीं सुख मानी ॥१२०॥</p>
<p>
	बहु खोटी हे विषयलालसा । करी विषयासक्ताचे नाशा । गुंतूं नये या विषयपाशा । जीविताशा असेल जरी ॥१२१॥</p>
<p>
	श्रवणलालसे मरे कुरंग । सुंदरमणिधारणें भुजंग । तेजावलोकन - गोडिये पतंग । ऐसा हा कुसंग विषयांचा ॥१२२॥</p>
<p>
	विषयभोगा लागे धन । तदर्थ यत्न करितां गहन । विषयतृष्णा वाढे दारुण । अशक्य निवारण तियेचें ॥१२३॥</p>
<p>
	नि:संशय बुडीत जमीन । प्रयत्नेंही न पिके कण । ती म्हणे करा कृष्णार्पण । काय तें पुण्य दानाचें ॥१२४॥</p>
<p>
	जेथें न यत्किंचितही संकल्प । कृश्पार्पण तें निर्विकल्प । ऐसें नव्हे तें जोडिलें पाप । अंतीं जें संतापकारक ॥१२५॥</p>
<p>
	येरीकडे गरीब ब्राम्हाण । जो त्या देवाचें करी पूजन । देवार्थ जमीन होतां संपादन । पावला समाधान अत्यंत ॥१२६॥</p>
<p>
	असो पुढें कांहीं कालें । विपरीतचि होऊनि गेलें । कृत्तिका नक्षत्र अपार वरसलें । तुफान झालें भयंकर ॥१२७॥</p>
<p>
	एकाएकीं वीज पडली । इमारत ती सारी खचली । धनी तेवढी सुरक्षित राहिली । दग्ध झाली अवशेष ॥१२८॥</p>
<p>
	धनिकावरही पडला घाला । निजकांतेसह तोही निमाला । डुबकीही पावली पंचत्वाला । शेवट हा झाला तिघांचा ॥१२९॥</p>
<p>
	पुढें हा धनिक मथुरा नगरीं । एका गरीब ब्राम्हाणाउदरीं । तयाची ती भाविक अंतुरी । पुजार्‍या घरीं जन्मली ॥१३०॥</p>
<p>
	नांव तिचें ठेविलें गौरी । डुबकीचीही आणीक परी । शंकराचिया गुरवाचे उदरीं । तिये नारीचा नर झाला ॥१३१॥</p>
<p>
	तया नराचें बारमें केलें । चनबसाप्पा नाम ठेविलें । ऐसें तिघांचें स्थित्यंतर घडलें । फलोन्मुख झालें तत्कर्म ॥१३२॥</p>
<p>
	धनिक पावतां पुनर्जन्म । वीरभद्र ठेविलें नाम । हेंच कीं प्रारब्धकर्माचें वर्म । भोगेंच उपरम तयासी ॥१३३॥</p>
<p>
	शंकराचा जो पुजारी । तयाची मज आवड भारी । नित्य येऊनि आम्हां घरीं । चिलीम मजबरोबरी पीतसे ॥१३४॥</p>
<p>
	मग आम्ही आनंदनिर्भर । गोष्टी कराव्या रात्रभर । गौरी वाढली झाली उपवर । तीसही बरोबर आणीतसे ॥१३५॥</p>
<p>
	तीही माझी भक्ति करी । एके दिवशीं पुसे पुजारी । धुंडूनि पाहिलीं स्थळें सारीं । कुठेंही पोरीचें जमेना ॥१३६॥</p>
<p>
	बाबा ठिकाण पाहतां थकलों । प्रयत्न हरले टेकीस आलों । किमर्थ वाहसी चिंता मी वदलों । वर मार्ग चालों लागला ॥१३७॥</p>
<p>
	मुलगी तुझी भाग्यशाली । होईल मोठी पैसेवाली । तिलाच शोधीत आपुले पाउलीं । वर तिचा चालीस लागला ॥१३८॥</p>
<p>
	अल्पावकाशें तुझिया सदना । येईल पुरवील तुझी कामना । करील गौरीचिया पाणिग्रहणा । तुझिया वचनानुसार ॥१३९॥</p>
<p>
	येरीकडे वीरभद्र । गरीबीचा घरसंसार । आईबापांस देऊनि धीर । सोडोनि जो घर निघाला ॥१४०॥</p>
<p>
	तो गांवोगांवीं भिक्षाटन । कधीं मोलमजूरी करून । कधीं जें मिळे तेंच खाऊन । संतुष्ट राहून फिरतसे ॥१४१॥</p>
<p>
	फिरतां फिरतां दैवें आला । पुजार्‍याचिये सदना पातला । अल्लामियाची अघटित लीला । आवडूं लागला सकळांस ॥१४२॥</p>
<p>
	होतां होतां लोभ जडला । वाटलें गौरी द्यावी त्याला । नाडी - गोत्र - गण - योग जुळला । आनंद झाला पुजारिया ॥१४३॥</p>
<p>
	सवें घेऊनि वीरभद्राला । एके दिवशीं पुजारी आला । दोघाम पाहूनि त्या समयाला । विचार स्फुरला एकाएकीं ॥१४४॥</p>
<p>
	विचारासरिसा उच्चार झाला । सांप्रत लग्नाला मुहूर्त असला । तर तूं याला या गौरीला । देऊनि मोकळा हो आतां ॥१४५॥</p>
<p>
	घेऊनियां कांतेचें अनुमत । वर वीरभद्र केला निश्चित । पाहोनियां विवाहमुहूर्त । विवाह यथोचित लाविला ॥१४६॥</p>
<p>
	पूर्ण होतां निजकार्यार्थ । कुटुंब आलें दर्शनार्थ । आणिक माझिया आशीर्वादार्थ । प्रपंचीं कृतार्थ व्हावया ॥१४७॥</p>
<p>
	दिधलें उल्हासें आशीर्वचन । मिळूं लागतां सुखाचें अन्न । वीरभद्राची मुद्रा प्रसन्न । जाहली सुखसंपन्न होतांचि ॥१४८॥</p>
<p>
	तोही माझे भक्तीस लागला । अल्पावकाशें संसार थाटला । परी भाग्याचा कोण आथिला । येथें न जो विटला पैशाविण ॥१४९॥</p>
<p>
	या पैशाचा मोठा पेंच । थोरांमोठयांसही त्याचा जाच । वीरभद्राही समयीं टांच । द्रव्याचा असाच हा खेळ ॥१५०॥</p>
<p>
	बाबा ही बेडी मोठी दुर्धर । पैशावांचून होतों बेजार । कांहीं तरी सांगा प्रतिकार । जेणें मज संसार झेपेल ॥१५१॥</p>
<p>
	घालितों पायीं लोटांगण । आतां न बरवें प्रतारण । करा माझें  संकट निवारण । तुम्हीच या कारण लग्नाला ॥१५२॥</p>
<p>
	मीही त्याला बहु बोधावें । प्रेमें आशीर्वचना द्यावें । ‘अल्ला मालीक’ त्या हें ठावें । संकट निरसावें त्यानेंच ॥१५३॥</p>
<p>
	जाणोनि वीरभद्र - मनोगत । पुरावे इच्छित मनोरथ । म्हणोनि मी त्यातें आश्वासित । व्हावें न दुश्चित्त यत्किंचित ॥१५४॥</p>
<p>
	निकट तुझा भाग्यकाळ । करूं नको व्यर्थ तळमळ । द्रव्य तुझ्या हाताचा मळ । होईल सुकाळ तयाचा ॥१५५॥</p>
<p>
	द्रव्यानें मांडिली माझी हेळणा । विसंबेना कांतेचा आणा । पुरे पुरे ही आतां विटंबना । नको हा मोठेपणा लग्नाचा ॥१५६॥</p>
<p>
	असो पुढें झालें अभिनव । पहा गौरीच्या ग्रहांचें गौरव । खाजण जमिनीस चढला भाव । कळेना माव देवाची ॥१५७॥</p>
<p>
	आला एक खरेदीदार । लाख रुपये द्यावया तयार । अर्धे रोख दिधले जागेवर । अर्धे हप्त्यावर ठरविले ॥१५८॥</p>
<p>
	प्रतिवर्षीं दोन हजार । सव्याज द्यावे झाला विचार । पैका पंचवीस वर्षांनंतर । भरपाई भरपूर गौरीची ॥१५९॥</p>
<p>
	ठराव सर्वांस पसंत पडला । चनबसाप्पा गुरव उठिन्नला । पैका म्हणे जो शंकरा अर्पिला । गुरव पहिला मालिक त्या ॥१६०॥</p>
<p>
	तो म्हणे मज गुरवासाठीं । अर्धें व्याज वर्षाकाठीं । मिळावें माझिया हिशापोटीं । त्यावीण संतुष्टी मज नाहीं ॥१६१॥</p>
<p>
	वीरभद्राप्पा नेदी कांहीं । चनबसाप्पा स्वस्थ न राही । जुपंली वादावादी पाहीं । आले ते दोघेही मजकडे ॥१६२॥</p>
<p>
	शंकर तियेचा पूर्ण स्वामी । जमीन येईना ती इतरा कामीं । न पडावें व्यर्थ लोभसंभ्रमीं । दोघांस मग मीं सांगितलें ॥१६३॥</p>
<p>
	अर्पिली जी शंकराप्रती । तिचेंच मोल आहे हें निश्चिती । गौरीवीण जे जे अभिलाषिती । तयांच्या माती तोंडांत ॥१६४॥</p>
<p>
	देवाचिया अनुज्ञेवीण । शिवेल जो या पैशाला कोण । होईल देवाचे कोपास कारण । मत्ता ही संपूर्ण देवाची ॥१६५॥</p>
<p>
	प्रभुत्व जीवर पुजारियाचें । गौरीचें नातें वारसपणाचें । काय चाले तैं परकीयांचें । गौरीचें स्वसत्तेचें तें धन ॥१६६॥</p>
<p>
	म्हणोनि मग मी त्या दोघांतें । वदलों गौराईचिया सत्तें । वर्ततां घेऊनि तिच्या अनुमतातें । कृतार्थतेतें पावाला ॥१६७॥</p>
<p>
	वर्तल्या तिचिया इच्छेबाहेर । देव नाहीं राजी होणार । वीरभद्राप्पास नाहीं अधिकार । स्वतंत्र व्यवहार करावया ॥१६८॥</p>
<p>
	ऐसा जरी मीं माझा विचार । केला परिस्फुट तेथें साचार । तरी वीरभद्र रागावला मजवर । शिव्यांचा गजर वरसला ॥१६९॥</p>
<p>
	तो म्हणे बाबा तुमचिया मनीं । माझिया पत्नीची मालकी स्थापुनी । सर्व रकमेचा ढेंकर देउनी । निजहित साधुनी बैसावें ॥१७०॥</p>
<p>
	परिसोनि हे तयाचे शब्द । झालों मी जागचे जागीं स्तब्ध । अल्लामियाची करणी अगाध । उगाच कां खेद करावा ॥१७१॥</p>
<p>
	वीरभद्राप्पा मज हें बोलला । घरीं कांतेवरी अति तणाणला । ती तंव दुपारीं दर्शनाला । येऊनि विनवायाला लागली ॥१७२॥</p>
<p>
	बाबा कोणाचिया बोलावर । लक्ष देऊनि अवकृपा मजवर । न करावी मी पसरितें पदर । लोभ मज कन्येवर असावा ॥१७३॥</p>
<p>
	ऐसे तिचे शब्द परिसोन । म्यां तीस दिधलें पूर्ण आश्वासन । सात समुद्र न्यहाल करीन । तुज, त्वां खिन्न नसावें ॥१७४॥</p>
<p>
	तेच रात्रीं असतां निद्रिस्त । गौरीबाईस झाला द्दष्टान्त । शंकरानें येऊनि स्वप्नांत । कथिलें ती मात परिसावी ॥१७५॥</p>
<p>
	पैसा हा सर्व तुझा पाहीं । देऊं नको कोणास कांहीं । व्यवस्था तुज वदतों तीही । सदा राहील ऐसें करीं ॥१७६॥</p>
<p>
	देवळाप्रीत्यर्थ जो जो पैसा  । चनबसाप्पा सांगेल तैसा । लावावा मज त्याचा भरंवसा । निर्बंध हा ऐसा राखावा ॥१७७॥</p>
<p>
	इतर कार्या पैसा लावितां । व्हावी न पैशाची अव्यवस्था । म्हणून मशिदींतील बाबांस न पुसतां । कांहींही व्यवस्था न करावी ॥१७८॥</p>
<p>
	गौरीबाईनें तो मजला । द्दष्टांत साद्यंत कथन केला । मींही सल्ला यथोचित दिधला । मानावयाला द्दष्टान्त ॥१७९॥</p>
<p>
	मुद्दल तुझें तूंच घेईं । चनवसाप्पास व्याजाची निमाई । ऐसें नित्य करीत जाईं । संबंध नाहीं वीरभद्रा ॥१८०॥</p>
<p>
	ऐसें आम्ही असतां बोलत । दोघेही ते आले भांडत । परस्परांनीं व्हावें शांत । उपाय मीं अत्यंत वेंचले ॥१८१॥</p>
<p>
	शंकराचा तो द्दष्टान्त । झाला जो होता गौराईप्रत । दोघांसही कथिला साद्यंत । परिसोनि उन्मत्त वीरभद्र ॥१८२॥</p>
<p>
	वीरभद्रें शिव्यांची लाखोली । प्रतिपक्षावर यथेच्छ वाहिली । अद्वातद्वा । भाषणें केलीं । वृत्ति गांगरली दुजियाची ॥१८३॥</p>
<p>
	तयास झाला उन्मत्त - वात । शिव्याशापांची बडबड करीत । सांपडशील तेथें घात । करीन मी म्हणत मुखानें ॥१८४॥</p>
<p>
	चनबसाप्पास अनुलक्षून । वीरभद्राप्पा उन्मत्त होऊन । म्हणे मी तुझे तुकडे करीन । खाईन गिळीन सगळेच ॥१८५॥</p>
<p>
	चनबसाप्पा भीतित्रस्त । पाय माझे घट्ट धरीत । म्हणे करा मज संकटमुक्त । अभय मग देत मी त्याला ॥१८६॥</p>
<p>
	तंव मी दीन चनबसाप्पातें । धीर देऊनि वदलों तेथें । वीरभद्राचिया हस्तें । मरूं मी तूतें देईना ॥१८७॥</p>
<p>
	असो पुढें होऊनि वात । वीरभद्राचा जाहला अंत । तो मग जन्मला सर्पयोनींत । ऐसें त्या दोहान्तर जाहलें ॥१८८॥</p>
<p>
	चनबसाप्पास पडली दहशत । तींतचि जाहला त्याचा अंत । जन्म पावे दर्दुरयोनींत । ऐसें हें चरित तयाचें ॥१८९॥</p>
<p>
	पूर्वजन्मींच्या वैरासाठीं । जन्म आला सापापोटीं । लागला बसाप्पा - दर्दुरापाठीं । धरी त्या शेवटीं वीरभद्र ॥१९०॥</p>
<p>
	दर्दुररूपें बसाप्पा दीन । भद्राप्पा - सर्पामुखीं पडून । परिसून तयाचें करुणावचन । हेलावलें कीं मन माझें ॥१९१॥</p>
<p>
	पूर्वदत्तवचन स्मरून । सर्पाचिया तोंडामधून । चनबसाप्पा मुक्त करून । पाळिलें वचन मीं आपुलें ॥१९२॥</p>
<p>
	अल्ला निजभक्तांलागून । संकटसमयीं ये धांवून । त्यानेंच येथें मज पाठवून । करविलें रक्षण भक्ताचें ॥१९३॥</p>
<p>
	हें तों प्रत्यक्ष अनुभवा आलें । वीरभद्राप्पास हांकून लाविलें । चनबसाप्पास संकटीं तारिलें । सकल हें केलें देवाचें ॥१९४॥</p>
<p>
	असो आतां भर कीं चिलीमी । पिऊन जाईन आपुले धामीं । तृंही जाईं आपुले ग्रामीं । लक्ष मन्नामीं असूं दे ॥१९५॥</p>
<p>
	ऐसें वदोनि चिलीम प्यालों । सत्संगाचें सौख्य लाधलों । फिरत फिरत परत आलों । परम मी धालों निजांतरीं’ ॥१९६॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । श्रीसाईमुखश्रुतकथाकथनं नाम सप्तचत्वारिंशोत्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 Apr 2022 15:15:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 Apr 2022 16:07:30 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ४६]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-46-122042900053_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
धन्य श्रीसाई तुझे चरण । धन्य श्रीसाई तुझें स्मरण । धन्य श्रीसाई तुझें दर्शन । जें कर्मबंधनमोचक ॥१॥
जरी सांप्रत ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 46" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/29/full/1651225396-7973.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra part 46" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	धन्य श्रीसाई तुझे चरण । धन्य श्रीसाई तुझें स्मरण । धन्य श्रीसाई तुझें दर्शन । जें कर्मबंधनमोचक ॥१॥</p>
<p>
	जरी सांप्रत अद्दश्यमूर्ति । तरी धरितां भावभक्ति । समाधिस्थ जागती ज्योति । सद्य:प्रतीति भक्तार्थ ॥२॥</p>
<p>
	दोरी सूक्ष्म धरिसी ऐसी । पाहूं जातां दिसों ना देशी । परी निजभक्तां खचून आणिशी । देशीं विदेशीं असो कीं ॥३॥</p>
<p>
	आणूनि सोडिसी पायांपाशीं । प्रेमें धरिसी त्यां पोटाशीं । माता जैसी निजबाळकासी । तैसा तूं पोशिसी अवलीला ॥४॥</p>
<p>
	ऐसें कांहीं सूत्र चाळविसी । नकळे कोणा कोठें अससी । परी परिणामीं वाटे मनासी । आहेस कीं पाठीसी भक्तांच्या ॥५॥</p>
<p>
	ज्ञानी पंडित शहाणे सुर्ते । अभिमानें रुतती संसारगर्ते । भोळे भाबडे अज्ञानी नेणते । त्यां निजसत्ते खेळविसी ॥६॥</p>
<p>
	आंतून सकल खेळ खेळसी । अलिप्ततेचा झेंडा मिरविसी । करोनि अकर्ता स्वयें म्हणविसी । नकळे कवणासी चरित्र तुझें ॥७॥</p>
<p>
	म्हणोनि कायावाचामन । करूं तुझिया पायीं अर्पण । मुखीं निरंतर नामस्मरण । होईल क्षालन पापाचें ॥८॥</p>
<p>
	सकामाचा पुरविसी काम । निष्कामा देसी निजसुखधाम । ऐसें गोड तुझें नाम। उपाय सुगम सद्भक्तां ॥९॥</p>
<p>
	तेणें पापांचा होई क्षय । रजतम जातील नि:संशय । सत्त्वगुणाचा क्रमें उपचय । धर्मसंचय त्यापाठीं ॥१०॥</p>
<p>
	धर्मवृत्ति होतां जागृत । वैराग्य येई मागें धांवत । नामशेष विषय होत । तात्काळ प्रकटत निजज्ञान ॥११॥</p>
<p>
	विवेकेंसीं लाभतां ज्ञान । स्वस्वरूपीं अनुसंधान । तेंच गुरुपदीं अवस्थान । पूर्ण ‘गुर्वर्णण’ या नांव ॥१२॥</p>
<p>
	मन साईपदीं अर्पण । जाहलें याची एकच खूण । साधक होय शांतिप्रवण । उल्हासे संपूर्ण निजभक्ति ॥१३॥</p>
<p>
	सप्रेम गुरुभक्ति या नांव ‘धर्म’ । अवघा तो मीच हें ‘ज्ञानवर्म’ । विषयीं अरति ‘वैराग्य’ परम । संसारा ‘उपरम’ ते ठायीं ॥१४॥</p>
<p>
	ऐसिया भक्तीचा महिमा धन्य । केलिया जीवेंभावें अनन्य । शांति विरक्ति कीर्ति या तीन । जियेच्या आधीन सर्वदा ॥१५॥</p>
<p>
	गुरुभक्ति ऐसी जयासी । उणें कैंचें तरी तयासी । इच्छील जें जें आपुले मानसीं । तें तें अप्रयासीं लाधेल ॥१६॥</p>
<p>
	ऐसिया त्या भक्तीपासीं । ब्रम्हास्थिति तों आंदणी दासी । तेथें कोणी न मोक्षा पुसी । तीर्थें पायांसी लागती ॥१७॥</p>
<p>
	पूर्वील अध्यायीं जाहलें कथन । दीक्षितांचें भागवतवाचन । नवयोगियांचें भक्तिवर्णन । चरणदर्शन साईंचें ॥१८॥</p>
<p>
	साईभक्त आनंदराव । पाखाडे जयांलागीं उपनांव । कथिलें तयांचें स्वप्नलाघव । भक्तीचें वैभव साईंच्या ॥१९॥</p>
<p>
	साई जयास घेती पदरीं । तो घरीं असो वा द्वीपांतरीं । तयासन्निध अष्टौ प्रहरीं । वसे निर्धारीं श्रीसाई ॥२०॥</p>
<p>
	भक्त जेथें जेथें जाई । तेथें तेथें कवण्याही ठायीं । आधींच जाऊन उभा राही । दर्शन देई अकल्पित ॥२१॥</p>
<p>
	ये अर्थींची अभिनव कथा । कथितों तुम्हां श्रोतयांकरितां । विस्मय वाटेल श्रवण करितां । आनंद चित्ता होईल ॥२२॥</p>
<p>
	येथील साईमुखींचीं अक्षरें । भावें सेवितां श्रवणद्वारें । समाधिसौख्य फिरे माघारें । स्वानंदें तरतरे सद्भक्त ॥२३॥</p>
<p>
	जेथ प्रतिपदीं चमत्कारता । ऐसी ही गोड कथा परिसतां । आपआपणा विसरेल श्रोता । अलोट गहिंवरता दाटेल ॥२४॥</p>
<p>
	काकासाहेब दीक्षितांचा । ज्येष्ठ पुत्र बाबू याचा । नागपुरीं व्रतबंध साचा । करावयाचा निश्चय ॥२५॥</p>
<p>
	नानासाहेब चांदोरकर । तयांचाही ज्येष्ठ पुत्र । तयाच्याही लग्नाचा विचार । जाणें ग्वाल्हेर शहरासी ॥२६॥</p>
<p>
	मौंजीबंधन झालियापाठीं । ग्वाल्हेरीस लग्नासाठीं । काकामुळें व्हावी न खोटी । होतें हें पोटीं नानांच्या ॥२७॥</p>
<p>
	नागपुराहूनि ग्वाल्हेरीस । काकानें यावें स्वस्थमानस । ऐसिया धरिलें सुमुहूर्तास । जो कीं उभयतांस सोयीचा ॥२८॥</p>
<p>
	नंतर साईंचे दर्शनास । लग्नाच्याही आमंत्रणास । नानासाहेब भक्तावतंस । पातले शिरडीस उत्साहें ॥२९॥</p>
<p>
	काकासाहेब तेथेंच होते । नाना जाऊन मशिदीतें । बाबांस निमंत्रिती लग्नातें । करसंपुटातें जोडून ॥३०॥</p>
<p>
	तंव बाबा बरें म्हणती ।  “सवें शाम्यास नेईं” वदती । पुढें दों दिवसीं काकाही पुसती । बाबांस आमंत्रिती मुंजीतें ॥३१॥</p>
<p>
	त्यांसही बाबा तैसेंच वदती । “शाम्यास नेईं” म्हणती संगती । काकासाहेब आग्रह करिती । स्वयें येण्याप्रती बाबांस ॥३२॥</p>
<p>
	तयावरीही तात्काळ उत्तर । काशीप्रयाग करूनि सत्वर । शाम्याचेही येतों अगोदर । मज काय उशीर यावया ॥३३॥</p>
<p>
	आतां श्रोतीं या शब्दांवर । देऊन चित्त व्हावें अर्थपर । पहावया तयांचें प्रत्यंतर । बाबांची सर्वव्यापकता ॥३४॥</p>
<p>
	असो भोजन झालियावर । माधवराव करिती विचार । एकदां पदरीं पडतां ग्वाल्हेर । काशी मग काय दूर असे ॥३५॥</p>
<p>
	रुपये खर्चीस घेतले शंभर । नंदरामाचे उसनवार । गेले बाबांचा घ्यावया रुकार । पुसती अतिआदरपूर्वक ॥३६॥</p>
<p>
	आतां लग्न - मुंजीनिमित्त । घडतसे जाणें ग्वाल्हेरीपर्यंत । काशी गया प्रसंगोपात्त । साधावी उचित वाटे मना ॥३७॥</p>
<p>
	तरी देवा पडतसें पायां । करूनि येऊं का काशी - गया । बाबांनीं आज्ञा दिधली जावया । माधवरावांस आनंदें ॥३८॥</p>
<p>
	आणीक वरती वदले तयांसी । “वावगें तरी तूं काय पुससी । सहज घडे जें अप्रयासीं । अचूक तें निश्चयेंसीं साधावें” ॥३९॥</p>
<p>
	असो ऐसी आज्ञा झाली । माधवरावांनीं गाडी केली । वाट कोपरगांवची धरली । गांठ तंव पडली आपांची ॥४०॥</p>
<p>
	आणावयास आपुली नात । आपा जात चांदवडाप्रत । ऐकूनियां ती काशीची मात । उडी ते टाकीत तांग्यांतुनी ॥४१॥</p>
<p>
	करावया काशीप्रवास  । पैसा जरी नव्हता गांठीस । माधवरावांसारखा सहवास । आपा कोत्यांस त्यागवेना ॥४२॥</p>
<p>
	माधवरावांनीं दिधला धीर । आपा कोत्यांस मग काय उशीर । आनंदें गाडींत बैसले सत्वर । प्रसंगातत्पर होऊनि ॥४३॥</p>
<p>
	आपा कोते पाटील सधन । परी न मार्गीं पैशाचें साधन । तदर्थ त्यांचें काशीप्रयाण । चुकेल ही दारुण चिंता तयां ॥४४॥</p>
<p>
	वाहत्या गंगेचिया आंत । हात धुवावे आलें मनांत । माधवरावांसारखी सोबत । साधावी हें मनोगत आपांचें ॥४५॥</p>
<p>
	असो ही त्यांची वेळ जाणून । वेळीं तयांसी धीर देऊन । माधवरावांनीं सवें नेऊन । काशी त्यां घडवून दीधली ॥४६॥</p>
<p>
	पुढें ते गेले नागपुरास । मुंजीचिया समारंभास । काकासाहेब माधवरावांस । देती खर्चावयास दोनशें ॥४७॥</p>
<p>
	तेथून गेले ग्वाल्हेरीस । तेथील लग्नसमारंभास । नानासाहेब माधवरावांस । देती ते समयास शंभर ॥४८॥</p>
<p>
	नानांचे व्याही श्रीमंत जठार । तयांनींही दिधले शंभर । ऐशिया रीतीं प्रेमसंभार । झाला गुरुबंधूवर नानांच्या ॥४९॥</p>
<p>
	काशीस मंगळघाटावर । जडावाचें कोरीव सुंदर । लक्ष्मी - नारायणाचें मंदिर । जयाचे हे जठार मालक ॥५०॥</p>
<p>
	अयोध्येंतही श्रीराममंदिर । जठारांचें आहे सुंदर । दोन्ही क्षेत्रीं आदरसत्कार । तयांचे मुनीमांवर सोंपविला ॥५१॥</p>
<p>
	ग्वाल्हेरीहून मथुरे गेले । सवें ओझें बिनीवाले । पेंढारकरही होते आले । तिघेही परतले तेथून ॥५२॥</p>
<p>
	माधवराव आणि कोते । तेथून प्रयागा झाले जाते । रामनवमीच्या उत्सवातें । अयोध्येआंतौते प्रवेशले ॥५३॥</p>
<p>
	दिन एकवीस तेथें राहिले । महिने दोन काशींत काढले । चंद्रसूर्यग्रहण झालें । दोघे मग निघाले गयेस ॥५४॥</p>
<p>
	गयेंत ग्रंथिज्वराची सांथ । गल्लोगल्लीं जन सचिंत । ऐसी तेथें परिसिली मात । असतां अग्निरथांत दोघांनीं ॥५५॥</p>
<p>
	अग्निरथ स्टेशनांत । येऊन थांबतां पडली रात । तेथेंच मग धर्मशाळेंत । दोघेही स्वस्थ विसांवले ॥५६॥</p>
<p>
	असो होतां प्रात:काळ । भेटीस आला गयावळ । तो वदे करा उतावळ । यात्राही सकळ चालली ॥५७॥</p>
<p>
	माधवराव उद्विग्नचित्त । तयांलागीं हळूच पुसत । येतों परी ज्वराची सांथ । तुमचिया वस्तींत आहे का ॥५८॥</p>
<p>
	मग तो तयां देई उत्तर । येऊनि पहा कीं हो तेथवर । तेथें नाहीं तसला प्रकार । चला मजबरोबर नि:शंक ॥५९॥</p>
<p>
	असो पुढें हे दोघेजण । गयावळाचे येथें जाऊन । पाहूनि त्याचें सदन विस्तीर्ण । प्रसन्नांत:करण जाहले ॥६०॥</p>
<p>
	प्रसन्नतेचें आणीक कारण । ते जों तेथें बैसती जाऊन । समोर बाबांची छबी पाहून । माधवराव गहिंवरून दाटले ॥६१॥</p>
<p>
	नव्हतें कधींही ध्यानीं मनीं । गयेसारिख्या दूर ठिकाणीं । पडेल साईंची छबी नयनीं । आश्चर्य मनीं दोघांच्या ॥६२॥</p>
<p>
	माधवराव अति गहिंवरले । आनंदाश्रु नयनीं लोटले । कां हो आपण रडूं लागले । ऐसें त्याम पुसिलें गयावळें ॥६३॥</p>
<p>
	कांहीं एक नसतां कारण । माधवराव करितां रुदन । गयावळ होय़ संदेहापन्न । जाहला उद्विग्नमानस ॥६४॥</p>
<p>
	गयेमाजी ग्रंथिज्वर । कैसी यात्रा घडेल निर्धार । मधवरावां मनीं हा विचार । गयावळ फार चिंतावला ॥६५॥</p>
<p>
	आधींच आपण कळविलें होतें । कीं ग्रंथिज्वर नाहीं येथें । तरीही आपण करितां चिंतेतें । आश्चर्य आम्हांतें वाटतें ॥६६॥</p>
<p>
	नसेल आम्हांवरी विश्वास । पुसुन घ्या ना या अवघियांस । येथेंन भीति तुमचिया केसास । पाणी कां डोळ्यांस आणितां ॥६७॥</p>
<p>
	घेतला ग्रन्थीचे सांथीचा धसका । मोडली जयाचे धैर्याची बैसका । म्हणून रडे हा यात्रेकरू देखा । ऐसा हा एकसारखा निष्कारण ॥६८॥</p>
<p>
	म्हणोनि गयावळ करी समजी  । माधवरावांचे मनामाजी । माझ्याआधींच माउली माझी । कैसी ही आजि मजपुढें ॥६९॥</p>
<p>
	“काशी प्रयाग करोनि सत्वर । शाम्याच्याही येतों अगोदर” ॥ हे जे बाबांचे पूर्वील उद्नार । तें हें प्रत्यंतर मूर्तिमंत ॥७०॥</p>
<p>
	छबी बाबांची डोळ्यांसमोर । दिसतां गृहप्रवेशाबरोबर ।  पाहूनि हा अकल्पित प्रकार । वाटला चमत्कार अत्यंत ॥७१॥</p>
<p>
	कंठीं प्रेमाचा गहिंवर । डोळां आनंदाश्रूंचा पूर । उठले रोमांच सर्वांगावर । फुटला पाझा घर्माचा ॥७२॥</p>
<p>
	ऐसी माधवरावांची स्थिती । गयावळाचे विपरीत चित्तीं । ग्रंथिज्वराची पडली भीति । म्हणोनि हे रडती सत्य वाटे ॥७३॥</p>
<p>
	शामाच पुढें जिज्ञासाप्रेरित । गयावळासी पृच्छा करीत । कैसेनि ही तुम्हांस प्राप्त । कथा हें साद्यंत आम्हांतें ॥७४॥</p>
<p>
	पुढें गयावळ सांगूं लागला । समग्र वृत्तान्त माधवरावाला । बारा वर्षांमागें जो घडला । नवलाव झाला परिसा तो ॥७५॥</p>
<p>
	एक ना दोनतीनशें नोकर । गयावळाचे पगारदार । मनमाड आणि पुणतांब्यावर । यात्रा सविस्तर नोंदीत ॥७६॥</p>
<p>
	यात्रेकरूंची लावावी सोय । गयावळांचा नित्य व्यवसाय । चाललें असतां ऐसें कार्य । गयावळ हा जाय शिरडीतें ॥७७॥</p>
<p>
	साई समर्थ मोठे संत । ऐसी त्यानें परिसिली मात । व्हावें तयांच्या दर्शनें पुनीत । धरिला हा हेत तयानें ॥७८॥</p>
<p>
	घेतलें साईबाबांचें दर्शन । करूनियां पायांचें वंदन । छबी तयांची संपादन । इच्छा ही निर्माण जाहली ॥७९॥</p>
<p>
	होती माधवरावांपाशीं । छबी एक टांगिली भिंतीसी । गयावळ मागूं लागला तियेसी । पुसूनि बाबांसी ती दिधली ॥८०॥</p>
<p>
	तीच कीं ती आपुली छबी । तोच गयावळ हें मग आठवी । तेथेंच बाना कैसें मज पाठवी । कैसें मज भेटवी दीर्घकालें ॥८१॥</p>
<p>
	वस्तुस्थिति पाहूं जातां । बारा वर्षांमागील वार्ता । कोण किमर्थ कीं ही स्मरतां । कधीं न चित्ता आठवली ॥८२॥</p>
<p>
	परी बाबांची अगाध लीला । तेथेंच पाठविलें शामाला । तेथेंच दिधलें निजदर्शनाला । गयावळही धाला अत्यंत ॥८३॥</p>
<p>
	हीच कीं दिधली आपुले येथून । साईबाबांची आज्ञा घेऊन । याच गयावळालागून । जाहलें स्मरण शामास ॥८४॥</p>
<p>
	यांचेच येथें पूर्वीं आपण । उतरलों होतों शिरडीस येऊन । यांनींच बाबांचें करविलें दर्शन । जाहलें स्मरण गयावळा ॥८५॥</p>
<p>
	मग परस्पर कृतोपकार । नाहीं आनंदा पारावार । ठेविली उत्तम व्यवस्था फार । त्यांनीं गयेवर शामाची ॥८६॥</p>
<p>
	तया घरची काय श्रीमंती । दारीं जयाचे झुलती हत्ती । आपण पालखीमाजीं बैसती । शामास बैसविती हत्तीवर ॥८७॥</p>
<p>
	आनंदें विष्णुपदावर जाऊन । पूजासंभार सवें घेऊन । घातलें देवास अभिषेक स्नान । केलें पिंडप्रदान यथाविधि ॥८८॥</p>
<p>
	जाहलें मग ब्राम्हाणसंतर्पण । नैवेद्यसमर्पणपूर्वक भोजन । आनंदें झाली यात्रा संपूर्ण । घेतली करवून बाबांनीं ॥८९॥</p>
<p>
	असो या सर्व कथेचें सार । सार्थ बाबांचे सुखोद्नार । अनुभवा येती अक्षरें अक्षर । प्रेमही भक्तांवर अनिवार ॥९०॥</p>
<p>
	हें तर काय भक्तप्रेम । इतर जीवांसही देखत सम । तयांसींही तादात्म्य परम । आवड ही नि:सीम तयांची ॥९१॥</p>
<p>
	कधीं लेंडीहून मशिदीं येतां । सहज मार्गें चालतां चालतां । कळप एकदां शेळ्यांचा भेटतां । परमानंदता बाबांस ॥९२॥</p>
<p>
	तंव त्या समस्त कळपावरून । निज अमृतद्दष्टी फिरवून । त्यांतून कधीं एक दोन । शेळ्या ते निवडून काढीत ॥९३॥</p>
<p>
	धणी मागेल जी ती किंमत । बाबा तत्काळ देऊनि टाकीत । कोंडाजीचे पाशीं ठेवीत । ऐसी ही पद्धत बाबांची ॥९४॥</p>
<p>
	एके दिवशीं शेळ्या दोन । किंमत बत्तीस देऊन । बाबा आले खरीदून । सकळांलागून आश्चर्य ॥९५॥</p>
<p>
	पडतां या दोनी द्दष्टीं । अवचित आवडी उपजली पोटीं । जाऊनियां तयांचे निकटीं । पाठी थोपटी तयांची ॥९६॥</p>
<p>
	पशुजन्मीं देखूनि उभयतां । कृपा उपजली साईसमर्थां । स्थिति पाहोनि कळवळले चित्ता । प्रेमोद्रेकता दाटली ॥९७॥</p>
<p>
	घेवोनियां तयांसी जवळी । साई प्रेमें तयां कुरवाळी । साश्चर्य झाली भक्तमंडळी । पाहोनि नव्हाळी बाबांची ॥९८॥</p>
<p>
	पूर्वजन्मींचा लोभ परम । स्मरला साईंस आलें प्रेम । पाहूनि तयांचा पशुजन्म । कळवळा अप्रतिम उपजला ॥९९॥</p>
<p>
	दोन रुपये जिची किंमत । तीन अथवा चार तिजप्रत । देती बाबा सोळा हें विपरीत । पाहोनि हो चकित तात्याबा ॥१००॥</p>
<p>
	‘देई वाणी घेई प्राणी’ । ऐसें प्रत्यक्ष देखूनि नयनीं । तात्यासह माधवरावांनीं । धिक्कारिली करणी बाबांची ॥१०१॥</p>
<p>
	दोहोंच्या माला सोळा कां देती । बाबांस पैशाची किंमत का नव्हती । कीं ते यथेच्छ कांहींतरी करिती । ऐसीही उपपत्ति बैसेना ॥१०२॥</p>
<p>
	दोघे अंतरीं बहु चडफडती । ऐसा कां बाबा हा सौदा करिती । दोघेही बाबांस दूषण देती । ही काय रीती सौद्याची ॥१०३॥</p>
<p>
	ऐसे कैसे बाबा फसले । पाहूं अवघे लोक तैं जमले । बाबा अंतरीं स्वस्थ ठेले । जाणों न हरवलें यत्किंचित ॥१०४॥</p>
<p>
	जरी हे दोघे ऐसे कोपले । बाबांस दूषण देऊं सरले । तरी न बाबा यत्किंचित ढळले । अचल ठेले शांतिसुखें ॥१०५॥</p>
<p>
	मग आदरोनि विनयवृत्ती । दोघेही ते बाबांस पुसती । ही काय उदारपणाची रीती । रुपये बत्तीस गेलेना ॥१०६॥</p>
<p>
	केवळ पैशाचा तो प्रश्न । परिसोनि साई हास्यवदन । मनीं म्हणे हे वेडे जन । कैसें म्यां समाधान करावें ॥१०७॥</p>
<p>
	परी बाबांची शांति विलक्षण । स्थैर्य न ढळे अणुप्रमाण । हेंच परम शांतीचें लक्षण । आश्चर्य अवघेजण करिताती ॥१०८॥</p>
<p>
	क्रोध नाहीं जयाच्या गांवीं । परमशांतीच जो अनुभवी । भूतमात्रीं जो भगवंत भावी । कैशी त्या शिवावी अविवेकता ॥१०९॥</p>
<p>
	विवेकद्दष्टीचे जे निधडे । क्रोध येऊं न देती पुढें । विपायें जैं हा प्रसंग जडे । भांडार उघडे शांतीचें ॥११०॥</p>
<p>
	‘अल्ला मालिक’ निरंतर ध्यान । तयाचें काय वानूं महिमान । चरित्र अगाध आणीक गहन । अतिपावन हितकर ॥१११॥</p>
<p>
	ज्ञानगर्भ वैराग्यनिधि । निजशांतीचा जो उदधी । करुणापरिपूर्ण जायची बुद्धि । वदला त्रिशुद्धी तें परियेसा ॥११२॥</p>
<p>
	पाहूनियां दोघांचा आग्रह  । बाबांनींही केला निग्रह । ज्या मज बसाया ठाव ना गृह । त्या मज संग्रह किमर्थ ॥११३॥</p>
<p>
	म्हणाले जाऊनि दुकानांत । आधीं आणा डाळ विकत । चारा शेरभर त्यां मनमुक्त । मग द्या त्या परत धनगरा ॥११४॥</p>
<p>
	आज्ञेनुसार मग तात्काळ । शेळ्यांस खाऊं घातली डाळ । मग कांहींही न दवडितां वेळ । पाठविल्या परत कळपांत ॥११५॥</p>
<p>
	मूर्तिमंत परोपकार । तो हा प्रत्यक्ष साई अवतार । तयास तात्या, शामा, वा इतर । काय सुविचार सुचवितील ॥११६॥</p>
<p>
	डाळ चारवूनि परम प्रीतीं । पाहूनि शेळ्या पावल्या तृप्ती । मग म्हणती द्या धनियाप्रती । घेवोत विश्रांती कळपांत ॥११७॥</p>
<p>
	रुपये गेले रुपयापरी । शेळ्या गेल्या फुकटवारी । पुढें गतजन्मींची नवलपरी । कथिली सारी बाबांनीं ॥११८॥</p>
<p>
	जैसा तात्या तैसाच शामा । दोघांवरही बाबांचा प्रेमा । तयांचिया कोपोपरमा । कथिती मनोरमा आख्यायिका ॥११९॥</p>
<p>
	साई स्वयें होऊनि आपण ॥ दोघांलागीं करिती निवेदन । शेळ्यांचें पूर्वजन्माचें कथन । श्रोतांही श्रवण कीजे तें ॥१२०॥</p>
<p>
	पूर्वजन्मीं यांचें सुदैव । तेव्हां हे जीव होते मानव । मजपाशींच बसावया ठा । कर्मप्रभाव यांनाही ॥१२१॥</p>
<p>
	या ज्या शेळ्या दिसती तुम्हां । होते हे बंधू पूर्वजन्मा । भांडतां परस्पर झाली सीमा । ते या परिणामा पावले ॥१२२॥</p>
<p>
	बंधुबंधूंत आरंभीं प्रेम । एकत्र अशन शयन नेम । नित्य चिंतिती कुशल क्षेम । एकात्मता परम उभयांसी ॥१२३॥</p>
<p>
	ऐसे दोघे जरी सहोदर । कर्मधर्मसंयोग दुर्धर । द्रव्यलोभ अति भयंकर । पाडिलें वैर परस्परीं ॥१२४॥</p>
<p>
	ज्येष्ठ बंधु महा आळसी । कनिष्ठ व्यवसायी अहर्निशीं । तेणें जोडिल्या द्रव्यराशी । मत्सर ज्येष्ठासी संचरला ॥१२५॥</p>
<p>
	काढूनियां टाकावा कांटा । मग द्रव्यास नाहीं तोटा । ऐसिया विचारें आडवाटा । आवडल्या ज्येष्ठा धनलोभें ॥१२६॥</p>
<p>
	धनमोहें द्दष्टिप्रतिबंध । डोळे असतां झाला अंध । विसरला बंधुप्रेमसंबंध । जाहला सन्नद्ध तद्‌घाता ॥१२७॥</p>
<p>
	परम कठिण प्रारब्धभोग । उपजला निष्कारण वैरयोग । फुटले गुप्त कपटप्रयोग । लोभावेग अनावर ॥१२८॥</p>
<p>
	होतें त्यांचें आयुष्य सरलें । बंधुत्वप्रेम समूळ विसरले । दुरभिमानें अत्यंत खवळले । वैरीसे झगटले परस्पर ॥१२९॥</p>
<p>
	सोटा हाणोनियां माथां । एकानें दुजिया पाडिलें खालता । तेणें कुर्‍हाडीचिया आघाता - । सरसा निजभ्राता मारिला ॥१३०॥</p>
<p>
	मग ते दोघे पडले मूर्च्छित । छिन्न भिन्न रुधिरोक्षित । अल्पावकाशें असुविरहित । पावले पंचत्व दोघेही ॥१३१॥</p>
<p>
	ऐसा त्यांचा होतां अंत । प्रवेशले ते या योनींत । ऐसा यांचा हा वृत्तान्त । स्मरला मज साद्यंत तयां पहातां ॥१३२॥</p>
<p>
	ए कृतकर्म  भोगावयासी । आले शेळीचिया जन्मासी । अवचित कळपांत देखतां त्यांसी । प्रेमावेशीं आलों मी ॥१३३॥</p>
<p>
	म्हणोनि खर्चोनि पल्लवचे दाम । वाटलें तयांसी द्यावा विश्राम । तुमचिया मिषें तयांचें कर्म । आडवें कीं ठाम तयांपुढें ॥१३४॥</p>
<p>
	शेळियांलागीं दया पोटीं । परी तुमचिया आग्रहासाठीं । मीही जाहलों कबूल शेवटीं । द्यावया त्या पाठीं धनगरा ॥१३५॥</p>
<p>
	असो येथें संपली कथा । क्षमा करावी मजला श्रोतां । पुढील अध्याय पुढां परिसतां । आनंद चित्ता होईल ॥१३६॥</p>
<p>
	तोही परम प्रेमभरित । तेंही साईमुखींचें अमृत । हेमाड साईचरणीं विनत । होऊनि विनवीत श्रोतयां ॥१३७॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । काशीगयागमन - अजाजन्मकथनं नाम षट्‍चत्वारिंशत्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 Apr 2022 15:12:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 Apr 2022 16:06:57 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ४५]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-45-122042900052_1.html</link>
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      <description><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ४५
॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
सहज जातें मांडूनि दळतां । जेणें प्रवर्तविलें निज सच्चरिता । काय अलौकिक तयाची कुशलता । भक्त ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 45" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/29/full/1651225278-5156.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra part 45" width="740" /></p>
	</p>
</p>
<p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	सहज जातें मांडूनि दळतां । जेणें प्रवर्तविलें निज सच्चरिता । काय अलौकिक तयाची कुशलता । भक्त सत्पंथा लाविले ॥१॥</p>
<p>
	मोक्ष जो कां परमपुरुषार्थ । त्याहूनही गुरुचरण समर्थ । सेवितां ऐसिया गुरुचरणींचें तीर्थ । मोक्ष नकळत घर रिघे ॥२॥</p>
<p>
	होईल गुरु करुणाकर । तरीच सुखाचा हा संसार । घडोनि येई न घडणार । लावील परपार क्षणार्धें ॥३॥</p>
<p>
	जरी जाहली इतुकी पोथी । कथा कथिलीसे अति संकलितीं । साईंची ती अगाध कीर्ति । ती म्यां किती वर्णावी ॥४॥</p>
<p>
	जिचे्नि दर्शनें नित्यतृप्ति । जिचेनि सहवासें आनंदभुक्ती । जिचेनि भवभयविनिर्मुक्ति । ती साईमूर्ति हारपली ॥५॥</p>
<p>
	जिचेनि परमार्थमार्गप्रवृत्ती । जिचेनि  मायामोहनिवृत्ती । जिचेनि आत्यंतिकक्षेमप्राप्ति । ते साईमूर्ति हारपली ॥६॥</p>
<p>
	जिचेनि नसे भवभयभीती । जिचेनि जागृत न्यायनीति । जिचेनि संकटीं मनास धृति । ते साईमूर्ति हारपली ॥७॥</p>
<p>
	ध्यानीं स्थापूनियां निजमूर्ति । साई जाई निजधामाप्रति । निजावतारा करी समाप्ति । हे योगस्थिति अतर्क्य ॥८॥</p>
<p>
	पूर्ण होतां अवतारकृति । हारपली ती पार्थिवाकृति । तरी हा ग्रंथ ही वाङ्गाय मूर्ति । देईल स्मृति पदोपदीं ॥९॥</p>
<p>
	शिवाय ह्याचिया कथा परिसतां । मना लाभे जी एकाग्रता । तज्जन्य शांतीची अपूर्वता । केवीं अवर्णीयता वर्णावी ॥१०॥</p>
<p>
	आपण श्रोते सर्व सुज्ञ । मी तों तुम्हांपुढें अल्पज्ञ । तथापि हा साईंचा वाग्यज्ञ । आदरा कृतज्ञबुद्धीनें ॥११॥</p>
<p>
	कल्याणप्रद हा वाग्यज्ञ । पुढें करूनि मजसम अज्ञ । पूर्ण करी निजकार्यज्ञ । श्रोते सर्वज्ञ जाणती ॥१२॥</p>
<p>
	करूनियां एकाग्र मन । अभिवंदूनि साईचरण । महामंगल परम पावन । करी जो श्रवण या कथा ॥१३॥</p>
<p>
	जो भक्त भक्तसमन्वित । निजस्वार्थ साधावया उद्यत । होऊनियां एकाग्रचित्त । कथामृत हें सेवील ॥१४॥</p>
<p>
	साई पुरवील तयाचे अर्थ । पुरवील स्वार्थ आणि परमार्थ । सेवा कधींही जाई न व्यर्थ । अंतीं तो कृतार्थ करील ॥१५॥</p>
<p>
	चव्वेचाळीस अध्याय पोथीं । साईनिर्याण परिसिलें अंतीं । तरीही या पोथीची प्रगती । ही काय चमत्कृति कळेना ॥१६॥</p>
<p>
	गताध्यायीं साईनिर्याण । यथानुक्रम जाहलें पूर्ण । तरी या साईलीलेची कातिण । विसंबेना क्षणभरी ॥१७॥</p>
<p>
	पाहूं जातां नवल नाहीं । निर्याण केवळ देहास पाहीं । जन्ममरणातीत हा साई ।  अव्यक्तीं राही पूर्ववत ॥१८॥</p>
<p>
	देह गेला आकार गेला । अव्यक्तीं जैसा तैसाचि ठेला  । देहनिर्याणामागूनि लीला । आहेत सकळांला अवगत ॥१९॥</p>
<p>
	वर्णूं जातां त्याही अपार । परी न व्हावा ग्रंथविस्तर । म्हणूनि त्यांतील घेऊं सार । करूं कीं सादर श्रोतयां ॥२०॥</p>
<p>
	धन्य आमुची भाग्यस्थिती । कीं जे कालीं साई अवतरती । तेच कालीं आम्हां हे सत्यंगती । सहजावृत्तीं लाधली ॥२१॥</p>
<p>
	ऐसे असतांही चित्तवृत्ति । जरी नपवे संसारनिवृत्ति । जरी न जडे भगवंतीं प्रीति । याहोनि दुर्गति ती काय ॥२२॥</p>
<p>
	सर्वेंद्रियीं साईंची भक्ति । तीच कीं खरी भजनस्थिति । ना तरी डोळां पाहतां मूर्ति । खिळी दातीं वाचेच्या ॥२३॥</p>
<p>
	कान ऐकतां साईकीर्तन । रसना मधुर आम्ररसीं निमग्न । करितां साईपादस्पर्शन । मृदूलीवर्जन खपेना ॥२४॥</p>
<p>
	साईंपासून क्षणही विभक्त । तो काय होईल साईभक्त । तो काय म्हणावा चरणासक्त । संसारीं विरक्त हों नेणें ॥२५॥</p>
<p>
	एका पतीवांचूनि कोणी । येतां तिचिया मार्गावरुनी । श्वशुर दीर भाऊ जाणूनी । होई वंदनीं सादर ॥२६॥</p>
<p>
	पतिव्रतेचें निश्चल अंतर । कदा न सांडी आपुलें घर । निजपतीचाच प्रेमा अपार । आजन्म आधार तो एक ॥२७॥</p>
<p>
	पतिव्रता साध्वी सती । अन्या भावोनियां निजपति । तयाचें दर्शन घ्यावयाप्रती । कधींही चित्तीं आणीना ॥२८॥</p>
<p>
	तीस आपुला पती तो पती । इतर केव्हांही तया न तुलती । तयाठायींच अनन्य प्रीति । शिष्यही ते रीती गुरुपायीं ॥२९॥</p>
<p>
	पतिव्रतेच्या पतिप्रेमा । गुरुप्रेमास देती उपमा । परी गुरुप्रेमास नाहीं सीमा । जाणे तो महिमा सच्छिष्य ॥३०॥</p>
<p>
	मग ना जयाचेनि संसारा साह्यता । तीं काय साह्या येतील परमार्था । असो व्याही जांवयी वा वनिता । भरंवसा कोणाचा धरिया नये ॥३१॥</p>
<p>
	माता पिता करितील ममता । सत्तेचा पुत्र लक्षील वित्ता । कुंकवालागीं रडेल कांता । कोणी न परमार्था सहकारी ॥३२॥</p>
<p>
	तरी आतां राहिलें कोण । जयाचेनि परमार्थापादन । करूं जातां विचारें निदान । आपुला आपण अंतीं उरे ॥३३॥</p>
<p>
	करोनि नित्यानित्यविवेक । त्यागोनि फळभोग ऐहिकामुष्मिक । साधोनियां शमदमादिषट्‌क । मोक्षैकसाधक तो धन्य ॥३४॥</p>
<p>
	तेणें सोडूनि दुजियाची आस । ठेवावा बळकट आत्मविश्वास । मारावी आपण आपुली कांस । साधेल तयासचि परमार्थ ॥३५॥</p>
<p>
	ब्रम्हा नित्य जग अनित्य । गुरुरेक ब्रम्हा सत्य । अनित्यत्यागें गुरु एक चिंत्य । भावनासातत्य साधन हें ॥३६॥</p>
<p>
	अनित्यत्यागें वैराग्यजनन । सद्नुरु ब्रम्हाचैतन्यघन । उपजे भूतीं भगवंतपण । अभेद - भजन या नांव ॥३७॥</p>
<p>
	भयें अथवा प्रेमें जाण । जया जयाचें नित्य ध्यान । ध्याता होई ध्येयचि आपण । कंस रावण कीटकी ॥३८॥</p>
<p>
	चिंतनीं व्हावें अनन्यपण । ध्यानासारिखें नाहीं साधन । करी जो अभ्यास आपुला आपण । तया निजोद्धरण रोकडें ॥३९॥</p>
<p>
	तेथें कैंचें जन्म - मरण । जीवभावासी पूर्ण विस्मरण । प्रपंचाचें मावळे भान । आत्मानुसंधानसुख लाहे ॥४०॥</p>
<p>
	म्हणोनि निजगुरुनामावर्तवन । तेणेनि परमानंदा जनन । भूतीं भगवंताचें दर्शन । नामाचें महिमान काय दुजें ॥४१॥</p>
<p>
	ऐसी जयाच्या मानाची महती । तया माझी सद्भावें प्रणती । कायावाचामनें मी त्याप्रती । अनन्यगती यें शरण ॥४२॥</p>
<p>
	ये अर्थींची द्योतक कथा । कथितों श्रोतयांकरितां आतां । तरी ती ऐकिजे निजहितार्था । एकाग्र चित्ता करूनियां ॥४३॥</p>
<p>
	कैलासवासी काका दीक्षित । साईसमर्थाआज्ञांकित । नित्यनेमें वाचीत भागवत । आहे कीं अवगत समस्तां ॥४४॥</p>
<p>
	एके दिवशीं दीक्षितांनीं । काका महाजनी यांचे सदनीं । चौपाटीवर भोजन सारुनी । पोथी नेमानें वाचिली ॥४५॥</p>
<p>
	एकादशाचा अद्वितीय । ऐसा तो सरस आणि द्वितीय । परिसतां अनुक्रमें अध्याय । श्रोत्यांचें धाय अंतरंग ॥४६॥</p>
<p>
	माधवराव बाबांचे भक्त । काका महाजनी तयांसमवेत । बैसले ऐकावया भागवत । एकाग्र चित्त करूनियां ॥४७॥</p>
<p>
	कथाही भाग्यें फारचि गोड । जेणें पुरेल श्रोत्यांचें कोड । जडेल भगवद्भक्तीची आवड । ऐसीच ती चोखड निघाली ॥४८॥</p>
<p>
	ऋषण - कुळींचे नऊ दीपक । कवि हरि अंतरिक्षादिक । निघालें यांचेंच गोड कथानक । आनंदजनक बोधप्रद ॥४९॥</p>
<p>
	नऊही ते भगवत्स्वरूप । पोटीं क्षमा शांति अमूप । वर्णितां भागवतधर्मप्रताप । जनक निष्कंप तटस्थ ॥५०॥</p>
<p>
	काय तें आत्यंतिक क्षेम । काय हरीची भक्ति परम । कैसेनि ही हरिमाया सुगम । नि:श्रेयस उत्तम गुरुचरण ॥५१॥</p>
<p>
	कर्म अकर्म आणि विकर्म । या सर्वांचें एकचि वर्म । गुरु हेंच रूप - परमात्म । भागवतधर्म गुरुभक्ति ॥५२॥</p>
<p>
	हरिचरित्र अवतार  गुण । द्रुमिलनाथें केलें निरूपण । पुरुषावताराची दावूनि खूण । रूपें नारायण वर्णिला ॥५३॥</p>
<p>
	पुढें अभक्तगतिविन्यास । विदेहा कथी नाथ चमस । वेदविहित कर्माची कांस । सोडिल्या हो नाश सर्वस्वीं ॥५४॥</p>
<p>
	सर्वांतरीं हरीचा वास । म्हणोनि न करावा कोणाचा द्वेष । पिंडीं पिंडी पहावा परेश । रिता न रेस त्यावीण ॥५५॥</p>
<p>
	अंतीं ननवे करभाजन । कृतत्रेतादि युगींचें पूजन । कैशा कैशा मूर्तींचें ध्यान । करिते निर्वचन जाहले ॥५६॥</p>
<p>
	कलियुगीं एकचि साधन । हरिगुरुचरणस्मरण । तेणेंच होय भवभयहरण । हें एक निजशरण शरणागता ॥५७॥</p>
<p>
	ऐसी पोथी जाहल्याअंतीं । काकासाहेब पृच्छा करिती । काय हो ही नवनाथकृति । अतर्क्य वृत्ति तयांची ॥५८॥</p>
<p>
	आवडीं माधवरावांस वदती । किती हो ही अवघड भक्ति । आम्हां मूढां कैंची हे शक्ति । जन्मजन्मांतीं न घडे हें ॥५९॥</p>
<p>
	कोठें हे नाथ महाप्रतापी । कोठें आपण ठायींचे पापी । आहे काय भक्ति हे सोपी । सच्चिद्रूपी ते धन्य ॥६०॥</p>
<p>
	आम्हां ही भक्ति घडेल काय । कैसेन होईल तरणोपाय । जाहलों हताश घळाले पाय । झाला कीं वायफळ जन्म हा ॥६१॥</p>
<p>
	काकासाहेब भक्त प्रेमळ । असावी जीवास कांहीं हळहळ । सुस्थिरवृत्ति व्हावी कां चंचळ । उडाली खळबळ शामाची ॥६२॥</p>
<p>
	शामानामें माधवराव । जयांचा काकांलागीं सद्भाव । तयांस काकांचा हा स्वभाव । दैन्याचा प्रभाव नावडला ॥६३॥</p>
<p>
	म्हणती बाबांसारिखें लेणें । भाग्य लाधलें जयासी तेणें । मुख करावें केविलवाणें । व्यर्थ कीं जिणें तयाचें ॥६४॥</p>
<p>
	साईचरणीं श्रद्धा अढळ । तरी ही कां मनाची तळमळ । नाथांची भक्ति असेना प्रबळ । आपुलीही प्रेमळ नव्हे का ? ॥६५॥</p>
<p>
	एकनाथी टीकेसहित । एकादशस्कंध भागवत । वाचावें भावार्थरामायण नित्य । आपणां निश्चित ही आज्ञा ॥६६॥</p>
<p>
	तैसेंच हरिगुरुनामस्मरण । ही बाबांची आज्ञा प्रमाण । यांतचि आपुलें भवभयतारण । चिंतेचें कारण काय तुम्हां ॥६७॥</p>
<p>
	परी त्या नवयोग्यांचें चरित । तयांचें तें असिधाराव्रत । साधेल काय आपणा यत्किंचित । चिंतन हें सतत काकांचें ॥६८॥</p>
<p>
	लागली जीवास मोठी चुटपुट । नवयोग्यांची भक्तिच उद्भट । कवण्या उपायें होईल प्रकट । तरीच मग निकट देव खरा ॥६९॥</p>
<p>
	असो ऐसी लागली हुरहुर । आसनीं शयनीं हाच विचार । दुसरे दिनीं घडला चमत्कार । श्रोतीं तो सविस्तर परिसावा ॥७०॥</p>
<p>
	अनुभवाचा पह अनवलाव । प्रात:काळींच आनंदराव । ‘पाखाडे’ हें जयां उपनांव । आले माधवरावा शोधावया ॥७१॥</p>
<p>
	तेही आले प्रात:काळीं । भागवत वाचावयाचे वेळीं । बैसले माधवरावांजवळी । स्वप्नाची नवाळी सांगत ॥७२॥</p>
<p>
	इकडे चालली आहे पोथी । तिकडे परस्पर दोघे फुसफुसती । तेणें श्रोत्यांवक्त्यांचे चित्तीं । अस्थैर्यस्थिति पातली ॥७३॥</p>
<p>
	आनंदराव चंचलवृत्तीं । माधवरावांस स्वप्न कथिती । वदतां परिसतां दोघे कुजबुजती । राहिली पोथी क्षणभर ॥७४॥</p>
<p>
	काकासाहेब तंव त्यां पुसती । काय ती ऐसी नवल स्थिति । दोघेच तुम्ही आनंद वृत्ति । सांगा न आम्हांप्रती काय कीं ॥७५॥</p>
<p>
	तंव ते माधवराव वदती । कालच कीं आपणा शंका होती । समाधान घ्या होतोहातीं । तारकभक्तिलक्षण ॥७६॥</p>
<p>
	परिसा पाखाडयांचें स्वप्न । दिधलें बाबांनीं कैसें दर्शन । होईल आपुल्या शंकेचें निरसन । गुरुपदवंदनभक्ति पुरे ॥७७॥</p>
<p>
	मग तें स्वप्न ऐकावयाची । प्रबळ जिज्ञासा त्यां सर्वांची । विशेषें काकासाहेब यांची । शंकाही तयांचीच आरंभीं ॥७८॥</p>
<p>
	पाहोनियां सर्वांचा भाव । स्वप्न सांगे आनंदराव । चित्तीं ठेवूनियां सद्भाव । श्रोत्यांसही नवलाव वाटला ॥७९॥</p>
<p>
	एका महासमुद्रांत । उभा मी कंबरभर उदकांत । तेथें माझिया द्दष्टिपथांत । आले श्रीसमर्थ अकल्पित ॥८०॥</p>
<p>
	रत्नखचित सिंहासन । वरी साई विराजमान । उदकांतर्गत जयांचे चरण । ऐसें तें ध्यान देखिलें ॥८१॥</p>
<p>
	पाहूनि ऐसें मनोहर ध्यान । जाहलें अत्यंत समाधान । तें स्वप्न हें कोणास भान । मन सुखसंपन्न दर्शनें ॥८२॥</p>
<p>
	काय त्या योगाचा नवलाव । तेथेंच उभे माधवराव । पायां पडा हो आनंदराव । वदले मज भावपुर:सर ॥८३॥</p>
<p>
	तंव मी तयां प्रत्युत्तर देत । इच्छा माझीही आहे बहुत । परी ते पाय उदकांतर्गत । कैसे मज हातांत येतील ॥८४॥</p>
<p>
	उदकामाजी पाय असतां । कैसा पायीं ठेवूं माथा । तरी मीं काय करावें आतां । नकळे मज तत्त्वतां कांहींही ॥८५॥</p>
<p>
	ऐसें परिसूनि माधवराव । परिसा बाबांस  वदले काय । देवा काढ रे वरती पाय । आहेत जे तोयप्रच्छन्न ॥८६॥</p>
<p>
	ऐसें वदतांच तत्क्षण । काढिले बाबांनीं बाहेर चरण । आनंदरावांनीं मग ते धरून । केलें अभिवंदन अविलंबें ॥८७॥</p>
<p>
	ऐसे धरितां द्दढ चरण । बाबांनीं दिधलें आशीर्वचन । “होईल जा रे तुझें कल्याण । कांहीं न कारण भीतीचें” ॥८८॥</p>
<p>
	आणिक बाबा वदले देख । “रेशीमकांठी धोतर एक । शाम्यास माझ्या देऊन टाक । तुज सुखदायक होईल” ॥८९॥</p>
<p>
	तरी ती वंदून आज्ञा शिरीं । धोतर म्यां आणिलें रेशीमधारी । काकासाहेब आपण तें स्वकरीं । माधवराव स्वीकारी ऐसें करा ॥९०॥</p>
<p>
	मान्य करा जी ही मम विनंती । माधवराव हें परिधान करिती । करा ऐसें सुखवा मजप्रती । होईन मी अती उपकारी ॥९१॥</p>
<p>
	आनंदरावाची ही मात । माधवराव स्वयें परिसत । काकासाहेब जंव तें देत । ते न स्वीकारित तें वस्त्र ॥९२॥</p>
<p>
	तयांचे मनीं हें तों स्वप्न । आम्हांस पटली पाहिजे खूण । द्दष्टान्त कांहीं जाहल्यावीण । घ्यावें न आपण हें वस्त्र ॥९३॥</p>
<p>
	काकासाहेब तेव्हां वदत । आतां बाबांची पाहूं प्रचीत । घेणें हें उचित अथवा अनुचित । होईल तें सूचित चिठ्ठयांनीं ॥९४॥</p>
<p>
	देतील बाबा चिठ्ठी जैसी । मानूं तयांची आज्ञा तैसी । चिठ्ठया बाबांचिया पायांपासीं । कृतसंकल्पेंसीं टाकिल्या ॥९५॥</p>
<p>
	काकासाहेब यांचा भार । होता सर्वस्वीं साईंचियावर । आधीं घ्यावा त्यांचा विचार । करावा तो व्यवहार पुढारा ॥९६॥</p>
<p>
	हें तों बाबांचे हयातींत । तोच कीं क्रम तयांचे पश्चात । चिठ्ठया टाकूनि आज्ञा घेत । तैसेच ते वर्तत निश्चयें ॥९७॥</p>
<p>
	कार्य मोठें अथवा सान । चिठ्ठीनें आज्ञा घेतल्यावीण । कांहीं न करणें गेलिया प्राण । अनुज्ञा प्रमाण सर्वथा ॥९८॥</p>
<p>
	देहचि जेथें नाहीं आपुला । एकदां वाबांच्या पायीं वाहिला । मग तयाच्या चलनवलनाला ।  काय आपुला अधिकार ॥९९॥</p>
<p>
	पहा या एका भावनेवर । लाखों रुपये कमाईवर । लाथ मारिली परी हा निर्धार । द्दढ आमरणान्त राखिला ॥१००॥</p>
<p>
	‘फळा येईल तुझें इमान । धाडीन मी तुजलागीं विमान । नेईन त्यांत बैसवून । निश्चिंतमन राहीं तूं’ ॥१०१॥</p>
<p>
	ही बाबांची प्रसादोक्ति । अक्षरें अक्षर आली प्रचीति । साई - लीलावाचकांप्रति । ठावी निर्गम स्थिति काकांची ॥१०२॥</p>
<p>
	होतां तया स्थितीचें स्मरण । आणीक तें काय विमानप्रयाण । काय तें आनंदाचें मरा । गुरुनामावर्तनसमवेत ॥१०३॥</p>
<p>
	ऐसे दीक्षित करारी आपण । चित्तीं निरंतर साईचरण । इष्टमित्रांही देऊनि शिकवण । जाहले विलीन गुरुपायीं ॥१०४॥</p>
<p>
	आतां पूर्वानुसंधानस्थिति । दोघांही मानली चिठ्ठयांची युक्ति । कारण दोघांची काकांवर प्रीति । चिठ्ठया मग लिहविती अविलंबें ॥१०५॥</p>
<p>
	एका चिठ्ठींत ‘घ्यावें धोतर’ । दुसरींत ‘त्याचा करावा अव्हेर’ । ऐसें लिहून साईच्या पायांवर । टाकिल्या छायाचित्रातळीं ॥१०६॥</p>
<p>
	तत्रस्थ एका अर्भकास । त्यांतील चिठ्ठी उचलावयास । लावितां धोतर घ्यावयास । माधवरावांस ये आज्ञा ॥१०७॥</p>
<p>
	जैसें स्वप्न तैसीच चिठ्ठी । आनंद झाला सकळां पोटीं । मग तें धोतर रेशीमकांठी । घातलें करसंपुटीं शामाचिया ॥१०८॥</p>
<p>
	त्यांचें स्वप्न यांची चिठ्ठी । परस्परांशीं पडतां मिठी । परमानंद न माय पोटीं । सुखसंतुष्टी उभयांतें ॥१०९॥</p>
<p>
	माधवराव अंतरीं खूष । आनंदरावासही संतोष । झाला साईभक्ति - परिपोष । आशंकानिरास काकांचा ॥११०॥</p>
<p>
	असो या सर्व कथेचें सार । ज्याचा त्यानें करावा विचार । ठेविया गुरुपायांवर शिर । गुरुवदनोद्नार लक्षावे ॥१११॥</p>
<p>
	आपणाहूनि आपुली स्थिति । आपुली भूमिका वा चित्तवृत्ति । गुरु जाणे नखशिखांतीं । उद्धारगतीही तोच ॥११२॥</p>
<p>
	जैसा रोग तैसें निदान । तैसेंच औषध वा अनुपान । सद्नुरु नेमी शिष्यालागून । भवरोगनिवारणकार्यार्थ ॥११३॥</p>
<p>
	स्वयें तो जी करितो करणी । आणूं नये आपुले अनुकरणीं । तुम्हांकारणें गुरुमुखांतुनी । निघेल ती वाणी आदरावी ॥११४॥</p>
<p>
	त्याच शब्दांवर ठेवावें मन । तयांचेंच नित्य करावें चिंतन । तेंच तुमच्या उद्धारा कारण । ठेवा हें स्मरण निरंतर ॥११५॥</p>
<p>
	गुरु सांगे तें पोथीपुराण । तें तों तद्वचन - स्पष्टीकरण । मुख्य उपदेशीं ठेवा ध्यान । तें निगमज्ञान आपुलें ॥११६॥</p>
<p>
	कोणाही संताचें वचन । त्याचा करूं नये अवमान । आपुली माय आपुली जतन । करील ती अन्य कोण करी ॥११७॥</p>
<p>
	खरा  मायेचा जिव्हाळा । लेंकुरालागीं तिचा कनवाळा । बाळ नेणे तो सुखसोहला । घेईल तो लळा ती पुरवी ॥११८॥</p>
<p>
	संत सृष्टीमाजीं उमाप । “आपुला बाप तो आपुला बाप” । साईमुखींचे हे करुणालाप । कोरा स्वह्रदयपटावरी ॥११९॥</p>
<p>
	म्हणोनि साईमुखींचें वचन । तेथेंच ठेवा अनुसंधान । अंतीं तोच कृपानिधान । तापत्रय शमन करील ॥१२०॥</p>
<p>
	तोच जाणे त्याची कळा । आपण पहावें कौतुक डोळां । काय अद्भुत तयाच्या लीला । सहज अवलीला घडती ज्या ॥१२१॥</p>
<p>
	दुसरा एक म्हणतो म्हणून । त्यांचें सर्व घ्यावें ऐकून । मोडूं न द्यावें निजानुसंधान । निजगुरुवचन विसरूं नये ॥१२२॥</p>
<p>
	यांतचि आहे परमकल्याण । यांतचि आहे भवभयतरण । यांतचि अवघें पोथीपुराण । जपतपानुष्ठानचि हें ॥१२३॥</p>
<p>
	सारांश प्रेम करा गुरुवर । अनन्यभावें नमस्कार । दिनकरापुढें कैंचा अंधार । तयांसी भवसागर नाहींच ॥१२४॥</p>
<p>
	असा ऐसें हें लिहितां । कथा एक आठवली चित्ता । एकाचें पाहूनि दुज्यानें करितां । कैसिया आपदा होत जीवा ॥१२६॥</p>
<p>
	एकदां बाबा मशिदींत । असतां म्हाळसापतींसमवेत । पूर्वील फळीची शेज अवचित । स्मरे सकल्पित तयांतें ॥१२७॥</p>
<p>
	रुंदी अवघी सव्वा वीत । दोनी टोंकांस चिंध्या बांधीत । मशिदीचिया आढयास टांगीत । झोंपाळा करीत तियेचा ॥१२८॥</p>
<p>
	निजूं नये अंधारांत । तदर्थ उशा - पायथ्यालगत । ठेवूनि रात्रौ पणत्या जळत । बाबा निजत फळीवर ॥१२९॥</p>
<p>
	या फळीचें समूळ वृत्त । पूर्वील एका अध्यायांत । आधींच वर्णिलें आहे येथ । परिसा कीं महत्त्व तियेचें ॥१३०॥</p>
<p>
	एकदां या फळीची महती । मनोभावें बाबा वर्णिती । काकासाहेब दीक्षितां चित्तीं । उदेली वृत्ती ती परिसा ॥१३१॥</p>
<p>
	म्हणती मग ते बाबांप्रती । फळीवरी शयनप्रीती । असेल तरी ती टांगतों प्रीतीं । मग  स्वस्थचित्तीं पहुडावें ॥१३२॥</p>
<p>
	बाबा तयांस प्रत्युत्तर देती । “खालीं टाकून म्हाळसापती । आपणचि वर निजावें केउती । बरा मी खालती आहें तो” ॥१३३॥</p>
<p>
	त्यावर काका अतिप्रीति । आणीक फळी टांगूं म्हणती । आपण निजावें एकीवरती । म्हाळसापती दुसरीवर ॥१३४॥</p>
<p>
	त्यावरी पहा बाबांचें उत्तर । तो का निजतो फळीवर । जयाअंगीं गुण - प्रकर । तोच फळीवर निजेल ॥१३५॥</p>
<p>
	नाहीं फळीवर शयन सोपें । कोण तियेवर मजवीण झोंपे । नयन उघडे निद्रालोपें । तयासचि झेपे हें शयन ॥१३६॥</p>
<p>
	मी जैं करूं लागें शयन । तैं मी करीं यासी आज्ञापन । ‘कर मद्‌ह्रदयावरी ठेवून । राहीं बैसून सन्निध’ ॥१३७॥</p>
<p>
	तेंही काम यास न होई । बसल्या जागीं डुलक्या घेई । तया न फळी ही कामाची कांहीं । फळी ही बिछाईत माझीच ॥१३८॥</p>
<p>
	‘नामस्मरण चाले ह्रदयांत । पाहें तेथें ठेवून हात । निजतां मी मज करीं जागृत’ । ऐसा अनुज्ञापित तो असतां ॥१३९॥</p>
<p>
	त्यासचि निद्रा लागतां जड । कर हो त्याचा जैसा दगड । “भगत” म्हणतां नेत्रांची झापड । उडूनि खडबड जो करी ॥१४०॥</p>
<p>
	बसवे न जया धरेवर । आसन जयाचें नाहीं स्थिर । जो नर निद्रातमकिंकर । निजेल उंचावर केवीं ॥१४१॥</p>
<p>
	म्हणोनि ‘आपुलें आपुल्यासंगें । दुजियाचें तें दुजियासंगें’ । हें तों बाबा वेळप्रसंगें । भक्तानुरागें अनुवदत ॥१४२॥</p>
<p>
	अगाध साईनाथांची करणी । म्हणूनि हेमाड लागला चरणीं । तयांनींही कृपाशीर्वचनीं । ठेविला निजस्मरणीं अखंड ॥१४३॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । श्रीगुरुचरणमहिमा नाम पंचचत्वारिंशोत्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-46-122042900053_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ४६</a></strong></p>
</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 Apr 2022 15:10:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 Apr 2022 16:06:28 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ४४]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-44-122042900050_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
ॐ नमो श्रीसाई श्रीसाई चिद्धन । सकळ्ल सौख्यांचें आयतन । सकल संपदांचें निधान । दैन्यनिरसन यत्कृपा ॥१॥
करितां अवलीला ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 44" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/29/full/1651225175-1935.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra chapter 44" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	ॐ नमो श्रीसाई श्रीसाई चिद्धन । सकळ्ल सौख्यांचें आयतन । सकल संपदांचें निधान । दैन्यनिरसन यत्कृपा ॥१॥</p>
<p>
	करितां अवलीला चरणवंदन । समस्त पापां होय क्षालन । मग जो भावें भजन - पूजन । करी तो त्याहूनही धन्य ॥२॥</p>
<p>
	पाहतां जयाचें सस्मित मुख । विसरे समस्त संसार दु:ख । ठायींच विरे तहान भूक । ऐसें अलौकिक दर्शन ॥३॥</p>
<p>
	‘अल्ला मालीक’ जया ध्यान । जो निष्काम निरभिमान । निर्लोभ निर्वासन जयाचें मन । तयाचें महिमान काय वानूं ॥४॥</p>
<p>
	अपकार्‍यांही जो उपकारी । ऐसी शांति जयाचे पदरीं । तया न विसंबे कोणीही क्षणभरी । द्यावा निजांतरीं निवास ॥५॥</p>
<p>
	राम - कृष्ण राजीवाक्ष । संत हीनाक्ष वा एकाक्ष । देव रूपें सुंदर सुरूप । आनंदस्वरूप संत सदा ॥६॥</p>
<p>
	देवांचें नेत्र श्रवणान्त । संतद्दष्टीस नाहीं अंत । ‘ये यथा मां’ देव वदत । संत द्रवत निंदकांही ॥७॥</p>
<p>
	राम कृष्ण आणि साई । तिघांमाजीं अंतर नाहीं । नामें तीन वस्तु पाहीं । ठायींचे ठायीं एकरूप ॥८॥</p>
<p>
	तिये वस्तूस मरणावस्था । वार्ता ही तों समूळ मिथ्या । काळावरही जयाची सत्ता । तया का व्यथा त्या हातीं ॥९॥</p>
<p>
	प्रारब्ध संचित न कळे आपणा । नेणें मी त्या क्रियमाणा । करुणाकर साई गुरुराणा । जाणोनि करुणा भाकीतसें ॥१०॥</p>
<p>
	वासनेच्या लाटा नाना । तेणें उसंत नाहीं मना । कृपा तुझी असलियाविना । स्थैर्य येईना जीवासी ॥११॥</p>
<p>
	गताध्यायारंभीं वचन । दिधलें परी न झालें पालन । घडलें न साङ्ग निरूपण । साद्यंत संपूर्ण परिसावें ॥१२॥</p>
<p>
	अंतकाल समीप जाणून । ब्रम्हाणमुखें रामायणश्रवण । केलें चतुर्दश रात्रंदिन । बाबांनीं अनुसंघानपूर्वक ॥१३॥</p>
<p>
	ऐसे दोन सप्ताह भरतां । रामायण श्रवण करितां । विजयादशमी दिवस येतां । बाबा विदेहता पावले ॥१४॥</p>
<p>
	गताध्यायीं जाहलें कथन । होतां बाबांचें प्राणोत्क्रमण । लक्ष्मणमामांनीं केलें पूजन । जोगांनीं जीरांजन आरती ॥१५॥</p>
<p>
	तेथूनि पुढें छत्तीस तास । हिंदु आणि मुसलमानांस । लागले विचार करावयास । कोवीं या कलेवरास सद्नति ॥१६॥</p>
<p>
	कैसें समाधिस्थान - नियोजन । कैसी अकल्पित इष्टिकापतन । कैसा एकदां ब्रम्हांडीं प्राण । चढविला तीन दिन बाबांहीं ॥१७॥</p>
<p>
	समाधि कीं देहावसान । सकळ झाले संशयापन्न । पाहूनि श्वासोच्छ्वासावरोधन । अशक्य उत्थान वाटलें ॥१८॥</p>
<p>
	ऐसे तीन दिवस जातां । प्राणोत्क्रमणचि वाटलें निश्चितता । मग उत्तरविधीची वार्ता । सहजचि समस्तां उदेली ॥१९॥</p>
<p>
	ऐसियाही तया अवसरीं । परम सावध बाबा अंतरीं । येऊनि अवचित निजदेहावरी । घालविली दुरी जनचिंता ॥२०॥</p>
<p>
	इत्यादि सकल कथा । प्रेमभावें परिसिजे श्रोतां । श्रवणें आनंद होईल चित्ता । कंठ गहिंवरता दाटेल ॥२१॥</p>
<p>
	कथा नव्हे ही एक संदूक । गर्भीं साईरत्न अमोलिक । उघडूनि पहा प्रेमपूर्वक । अनुभवा सुख दर्शनाचें ॥२२॥</p>
<p>
	या अवघिया अध्याया आंत । खचिला दिसेल साईनाथ । श्रवणें पुरतील मनोरथ । स्मरणें सनाथ होईजे ॥२३॥</p>
<p>
	परम उदार जयांचें आचरित । तया साईंचें हें चरित । करावया  श्रवण व्हा उद्यत । अव्यग्रचित्त सपेम ॥२४॥</p>
<p>
	ऐसी पावन कथा ऐकतां । धणी न पुरे भक्तचित्ता । पूर्ण दाटे परमानंदता । संसारश्रांता विश्राम ॥२५॥</p>
<p>
	चित्तप्रसन्नतेचा हरिख । निजानंद ठाके सन्मुख । सर्व सुखाचें सोलीव सुख । तें हें कथानक साईंचें ॥२६॥</p>
<p>
	कितीहि ऐका नित्य नूतन । रमणीयतेचें हेंचि लक्षण । म्हणोनि ही संतकथा पावन । होऊनि अनन्य परिसावी ॥२७॥</p>
<p>
	असो पुढें कलेवर सद्नती । याच वादाची ‘भवति न भवति’ । करितां करितां समस्त थकती । पहा प्रचीती अखेर ॥२८॥</p>
<p>
	बुट्टीचे वाडयाचें दालन । त्यांतील गाभार्‍याचें प्रयोजन । होणार होतें मुरलीधर - स्थापन । ठरलें तें स्थान बाबांचें ॥२९॥</p>
<p>
	आरंभीं जैं पाया खोदिला । जात असतां बाबा लेंडिला । माधवरावांच्या विनवणीला । माथा डोलविला बाबांनीं ॥३०॥</p>
<p>
	माधवराव करीत विनंती । नारळ देऊनि बाबांचे हातीं । मुरलीधराचा गाभारा खोदिती । अवलोका म्हणती कृपेनें ॥३१॥</p>
<p>
	पाहूनियां ती शुभवेळ । बाबा म्हणाले “फोडा नारळ । आपण समस्त बाळगोपाळ । येथेंचि काळ क्रमूं कीं ॥३२॥</p>
<p>
	येथेंचि आपण बसतां उठतां । सुखदु:खाच्या करूं वार्ता । येथेंचि पोरांसोरां । समस्तां । चित्तस्वस्थता लाधेल” ॥३३॥</p>
<p>
	बाबा कांहीं तरी हें वदले । ऐसेंचि आरंभीं सर्वांसी दिसलें । पुढें जेव्हां अनुभवा आलें । कळूनि चुकले ते बोल ॥३४॥</p>
<p>
	होतां बाबांचें देहावसान । राहिलें मुरलीधराचें स्थापन । हेंचि वाटलें उत्तम स्थान । साईनिधान रक्षावया ॥३५॥</p>
<p>
	“वाडियांत पडो हें शरीर” । अंतीं बाबांचे जे उद्नार । तोचि शेवटीं ठरला विचार । जाहले मुरलीधर बाबाचि ॥३६॥</p>
<p>
	श्रीमंत बुट्टी आदिकरून । हिंदु - मुसलमान सर्वत्र । याच विचारा राजी होऊन । वाडा सत्कारणीं लागला ॥३७॥</p>
<p>
	ऐसा बहुमोल वाडा असून । बाबांचा देह कुठेंही पडून । जाता, मग तो वाडाही शून्य । अत्यंत भयाण भासत ॥३८॥</p>
<p>
	आज तेथें जें भजनपूजन । कथाकीर्तन पुराणश्रवण । अतिथि - अभ्यागतां अन्नदान । होतें, त्या कारण श्रीसाई ॥३९॥</p>
<p>
	आजि तेथें जें अन्नसंतर्पण । लघुरुद्रमहारुद्रावर्तन । देशोदेशींचे येती जन । त्या सर्वां कारण श्रीसाई ॥४०॥</p>
<p>
	असो ऐसी हे संताची वाणी । अक्षरें अक्षर सांठवा श्रवणीं । कांहीं तरी ते बोलती म्हणूनी । नावमानूनि त्यागावी ॥४१॥</p>
<p>
	आरंभीं ती कितीही मुग्ध । अथवा दिसो कितीही संदिग्ध । कालें होतो अर्थावबोध । जरी ती दुर्बोध आरंभीं ॥४२॥</p>
<p>
	असतां देहपातासी अवधी । पुढील होणारे गोष्टीसंबंधीं । दुश्चिन्हें घडलीं कांहीं आधीं । मशीदीमधीं शिरडींत ॥४३॥</p>
<p>
	तयांमाजील एकचि आताम । निवेदितों मी श्रोतयांकरितां । कीं तीं सकळ सांगूं जातां । ग्रंथ विस्तरता पावेल ॥४४॥</p>
<p>
	कितीएक बहुतां वर्षापासूनी । होती एक बाबांची जुनी । वीट, जियेवरी ते हात टेंकूनी । आसन लावूनि  बैसत ॥४५॥</p>
<p>
	विटेचा त्या आधार घेउनी । नित्य एकांत होतां रजनी । बाबा मशिदींत स्वस्थ मनीं । आसन लावूनि बैसत ॥४६॥</p>
<p>
	ऐसा कित्येक वर्षांचा क्रम । निर्वेध चालाला होता अविश्रम । परी होणारासि न चले नियम । घडतसे अतिक्रम अकल्पित ॥४७॥</p>
<p>
	बाबा नसतां मशीदींत । पोरगा एक होता झाडीत । तळींचा केर काढावयाचें निमित्त । वीट ती किंचित उचल्ली ॥४८॥</p>
<p>
	फुटावयाची वेळ आली । वीट पोराचे हातूनि निसटली । धाडकिनी ती खालीं पडली । दुखंड झाली तात्काळ ॥४९॥</p>
<p>
	ऐकतां हें बाबांनीं म्हटलें । वीट नाहीं कीं कर्मचि फुटलें । ऐसें वदूनि अति हळहळले । नेत्रीं आले दु:खाश्रु ॥५०॥</p>
<p>
	नित्य योगासन ज्या विटे । घालीत बाबा ती जंव फुटे । तेणें दु:खें ह्रदय फाटे । कंठ दाटे तयांचा ॥५१॥</p>
<p>
	ऐसी बहुताकाळाची जुनाट । निजासनाचें मूळपीठ । अवचट भंगली पाहूनि वीट । मशीद सुनाट वाटे त्यां ॥५२॥</p>
<p>
	वीटचि मग ती प्राणापरती । बाबांची होती अति आवडती । पाहूनि तियेची ऐसी ती स्थिति बाबा अति चित्तीं हळहळले ॥५३॥</p>
<p>
	त्याच विटेसी टेंकूनि कोपर । बाबा घालवीत प्रहराचे प्रहराचे प्रहर । घालूनि आसन योगतत्पर । म्हणूनि तिजवर प्रेम मोठें ॥५४॥</p>
<p>
	जियेसंगें आत्मचिंतन । जी मज होती जीव कीं प्राण । ती भंगली माझी सांगातीण । मीही तिजवीण न राहें ॥५५॥</p>
<p>
	वीट जन्माची सांगातीण । गेली कीं आजि मज सांडून । ऐसे तियेचे गुण आठवून । बाबांनीं रुदन मांडिलें ॥५६॥</p>
<p>
	येथें सहजीं येईल आशंका । वीटही क्षणभंगुर नाहीं का । एतदर्थ करावें कां शोका । काय लोकांनीं म्हणावें ॥५७॥</p>
<p>
	आशंका ही प्रथमदर्शनीं । उठेल कवणाच्याही मनीं । प्रवर्तें मी समाधानीं । पाय नमुनी साईंचे ॥५८॥</p>
<p>
	कैसा होईल जगदुद्धार । कैसे तरतील दीन पामर । एतदर्थचि संतांचा अवतार । कर्तव्य इतर नाहीं त्यां ॥५९॥</p>
<p>
	हास्य रुदन क्रीडा प्रकार । लौकिक नाटयचि येथील सार । जैसा तैसा श्रेष्ठाचार । लोकव्यवहारही तैसा ॥६०॥</p>
<p>
	संत जरी पूर्ण ज्ञानी । अवाप्तसकलसंकल्प जनीं । तरी लोक तरावयालागुनी । कर्माचरणीं उद्युक्त ॥६१॥</p>
<p>
	असो हें देहावसान व्हावया आधीं । बत्तीस वर्षांपूर्वींच समाधी । होणार, परी म्हाळसापतींची बुद्धी । निवारी त्रिशुद्धि हा कुयोग ॥६२॥</p>
<p>
	टळता न जरी हा दुष्टयोग । कैंचा अवघ्यांतें साईसुयोग । त्रेचाळीस वर्षांमागेंचि वियोग । होता कीं कुयोग ऐसा तो ॥६३॥</p>
<p>
	मार्गशीर्ष शुद्ध पौर्णिमा । बाबा अस्वस्थ उठला दमा । सहन करावया देहघर्मा । ब्रम्हांडीं आत्मा चढविला ॥६४॥</p>
<p>
	आतां येथून तीन दिन । आम्ही चढवितों ब्रम्हांडीं प्राण । प्रबोधूं नका आम्हां लागून । बाबांनीं सांगून ठेविलें ॥६५॥</p>
<p>
	पहा तो सभामंडप - कोण । बाबांहीं बोटें दाविलें ठिकाण । म्हणाले तेथें समाधि खोदून । द्या मज ठेवून त्या जागीं ॥६६॥</p>
<p>
	स्वयें म्हाळसापतीस लक्षून । बाबा तदा वदती निक्षून । नका मज सांडूं उपेक्षून । दिवस तीनपर्यंत ॥६७॥</p>
<p>
	तयेस्थानीं निशाणें दोन । लावूनि ठेवा निदर्शक खूण । ऐसें वदतां वदतां प्राण । ठेविला चढवून ब्रम्हांडीं ॥६८॥</p>
<p>
	भरावी एकाएकीं भवंडी । तेवीं निचेष्टित देहदांडी । म्हाळसापतीनें दिधली मांडी । आशा ती सांडिली इतरांनीं ॥६९॥</p>
<p>
	रात्रीचा समय झाले दहा । तेव्हांचा हा प्रकार पहा । स्तब्ध झाले जन अहाहा । काय अवचित हा प्रसंग ॥७०॥</p>
<p>
	नाहीं श्वास नाहीं नाडी । वाटे प्राणें सांडिली कुडी । जनांस भयंकर अवस्था गाढी । सुखनिरवडी साईंस ॥७१॥</p>
<p>
	मग पुढें म्हाळसापती । अहोरात्र सावधवृत्ती । साईबाबांलागीं जपती । तेथेंचि बैसती जागत ॥७२॥</p>
<p>
	जरी होती साईमुखींची । आज्ञा समाधी खोदावयाची । तरी तें तैसें करावयाची । हिंमत कवणाची चालेना ॥७३॥</p>
<p>
	पाहोनि बाबा समाधिस्थ । मिळाला तेथें गांव समस्त । जन विस्मित पाहती तटस्थ । काढीना भगत मांडीतें ॥७४॥</p>
<p>
	प्राण गेला कळतां देखा । बैसेल एकाएकीं धक्का । सांगूनि तीन दिवस मज राखा । झकविलें लोकां साईनें ॥७५॥</p>
<p>
	श्वासोद्च्छवास जाहला बंद । ताटस्थ्य पावलीं इंद्रियें सबंध । नाहीं चलनवलनाचा गंध । तेजही मंद जाहलें ॥७६॥</p>
<p>
	हरपलें बाह्याव्यवहारभान । वाचेसी पडलें द्दढ मौन । कैसे शुद्धीवरी मागुतेन । चिंता ही गहन सर्वत्रां ॥७७॥</p>
<p>
	वृत्तीवरी येईना शरीर । काळ क्रमिला दोन दिंवसांवर । आले मौलवी मुलनाफकीर । मांडिला विचार पुढील ॥७८॥</p>
<p>
	आप्पा कुलकर्णी काशीराम । आले केला विचार ठाम । बाबांनीं गांठिलें निजसुखधाम । द्यावा कीं विश्राम देहासी ॥७९॥</p>
<p>
	कोणी म्हणती थांबा क्षणभरी । घाई इतुकी नाहीं बरी । बाबा नव्हेत इतरांपरी । अमोघ वैखरी बाबांची ॥८०॥</p>
<p>
	तात्काळ प्रत्युत्तर करावें इतरीं । थंडगार पडल्या शरीरीं । येईल कोठूनि चैतन्य तरी । कैसे अविचारी सकळ हे ॥८१॥</p>
<p>
	खोदा कबर दाविल्या स्थळीं । बोलवा कीं सकळ मंडळी । द्या मूठमाती वेळच्यावेळीं । तयारी सगळी करा कीं ॥८२॥</p>
<p>
	ऐसी भवती न भवती होतां । पूर्ण झाली दिनत्रययत्ता । पुढें पहांटे तीन वाजतां । चेतना येतां आढळली ॥८३॥</p>
<p>
	हळू हळू द्दष्टी विकसितां । आळेपिळे शरीरा देतां । श्वासोच्छवास चालू होतां । पोटही हालतां देखिलें ॥८४॥</p>
<p>
	दिसूं लागलें प्रसन्नवदन । होऊं लागलें नेत्रोन्मीलन । जाऊनियां निचेष्टितपण । पडावा । भांडार उघडावा ती गत ॥८६॥</p>
<p>
	देखोनि साई सावधना । जाहले सकळ पसन्नवदन । टळलें देवदयेनें विन्घ । आश्चर्यनिमग्न भक्तजन ॥८७॥</p>
<p>
	भगत पाही मुख कौतुकें । साईही मान हळूच तुके । मौलवी फकीर पडले फिके । कीं प्रसंग चुके भयंकर ॥८८॥</p>
<p>
	पाहूनि मौलवीची दुराग्रहता । भगत आज्ञापालनीं चुकता । यत्किंचितही निश्चय ढळता । वेळ तो येता कठीण तैं ॥८९॥</p>
<p>
	त्रेचाईस वर्षां आधींच कबर । होऊनि जाती कैंची मग खबर । कैंचें मग ते दर्शन मनोहर । होतें सुखकर साईंचें ॥९०॥</p>
<p>
	लोकोपकार हेंचि कारण । करूनि समाधीचें विसर्जन । साई पावते झाले उत्थान । समाधान भक्तजनां ॥९१॥</p>
<p>
	भक्तकार्यार्थ जो भागला । परमानंदीं लय लागला । कैसा आधीं जाई प्रबोधिला । अकळ लीला तयाची ॥९२॥</p>
<p>
	देखूनि बाबा सावधान । सुखावले भक्तजन । जो तो धांवे घ्यावया दर्शन । पुनरुज्जीवन सुखातें ॥९३॥</p>
<p>
	असो पूर्वील कथानुसंधान । तें अखेरचें एहावसन । जाहलें जयाचें संपूर्ण कथन । यथास्मरण आजवरी ॥९४॥</p>
<p>
	म्हणोनि आपण श्रोतां सकळिक । मनीं विचारा कीं क्षण एका । कासया वहावा हर्षशोक । दोनीही अविवेकमूलक ॥९५॥</p>
<p>
	औट हाताचा स्थूळ गाडा । देहेंद्रियांचा जो सांगाडा । तो काय आपुला साई निधडा । समूळ सोडा हा भ्रम ॥९६॥</p>
<p>
	साई म्हणावें जरी देहा । तरी त्या नांवचि नाहीं विदेहा । रूपही नाहीं वस्तूसि पहा । रूपातीत श्रीसाई ॥९७॥</p>
<p>
	हेह तरी नाशिवंत । वस्तु स्वतंत्र नाशरहित । देह पंचभूतांतर्गत । अनाद्यनंत निजवस्तु ॥९८॥</p>
<p>
	त्यांतील शुद्धसत्त्वात्मक । ब्रम्हारूप चैतन्य देख । जड इंद्रियां जो चालक । साई नामक ती वस्तु ॥९९॥</p>
<p>
	ती तों आहे इंद्रियातीत । इंद्रियें जड तीतें नेणत । तीच इंद्रियां प्रवर्तवीत । चाळवीत प्राणांतें ॥१००॥</p>
<p>
	त्या शक्तीचें नाम साई । तिजवीण रिता ठाव नाहीं । तिजवीण ओस दिशा दहाही । भरली पाहीं चराचरीं ॥१०१॥</p>
<p>
	तीच कीं ही अवतारस्थिति । तीच होती आधीं अव्यक्तीं । नामरूपीं आली व्यक्तीं । समरसली अव्यकीं कार्यांतीं ॥१०२॥</p>
<p>
	अवतारकृत्य संपवूनी । अवतारींही देह त्यजूनी । जैसे प्रवेशती निर्विकल्प भुवनीं । तैसीच ही करणी साईंची ॥१०३॥</p>
<p>
	गुप्त व्हावें येतां मनीं  । जैसे स्वामी गाणगाभुवनीं । पर्वतयात्रेसी जातों म्हणुनी । गेले निघूनी एकाकी ॥१०४॥</p>
<p>
	भक्तांनीं धरितां अडवून । तयांचें केलें समाधान । लोकाचारीं हें माझें गमन । गाणगाभुवन सोडींना ॥१०५॥</p>
<p>
	कृष्णातीरीं प्रात:स्नान । बिंदुक्षेत्रीं अनुष्ठान । मठांत करावें पादुकापूजन । तेथेंच निरंतर वास माझा ॥१०६॥</p>
<p>
	तैसीच साईबाबांची परी । निधन केवळ लोकाचारीं । पाहूं जातां स्थिरचरीं । सर्वां अंतरीं श्रीसाई ॥१०७॥</p>
<p>
	जैसी ययाची भजनस्थिति । तयासी तैसी नित्य प्रचीति । संदेह कांहीं न धरावा चित्तीं । मरणातीत श्रीसाई ॥१०८॥</p>
<p>
	साई भरला स्थिरचरीं । साई सर्वांच्या आंतबाहेरी । साई तुम्हां - आम्हांभीतरीं । निरंतरीं नांदतसे ॥१०९॥</p>
<p>
	साई समर्थ दीनदयाळ । भावार्थी भक्तप्रणतपाळ । परमप्रेमाचे ते भुकाळ । अति स्नेहाळ सकळिकां ॥११०॥</p>
<p>
	जरी चर्मचक्षूंसी न दिसती  । तरी ते तों सर्वत्र असती । स्वयें जरी सूक्ष्मत्वीं लपती । तरीही लाविती वेड आम्हां ॥१११॥</p>
<p>
	त्यांचें निधन केवळ ढोंग । आम्हां फसविण्या आणिलें सोंग । नटनाटकी ते अव्यंग । भंगोनि अभंग जाहले ॥११२॥</p>
<p>
	त्यांचिया ठायीं जो अनुराग । तेणें करूनि पाठलाग । अंतीं लावूं तयांचा माग । कार्यभाग साधूं कीं ॥११३॥</p>
<p>
	मनोभावें पूजा करितां । भक्तिभावें तयां आठवितां । अनुभव येईल सकळ भक्तां । सर्वव्यापकता दिसेल ॥११४॥</p>
<p>
	उत्पत्ति स्थिति आणि लय । चित्स्वरूपा यांचें न भय । तें सदासर्वदा चिन्मय । विकारां आश्रय ना तेथें ॥११५॥</p>
<p>
	जैसें सुवर्ण सुवर्णपणें । राही अलंकाराहीविणें । केलीं नानापरींचीं आभरणें । तरी न सोनेंपण त्यागी ॥११६॥</p>
<p>
	परोपरीचे अलंकार । हे तों सर्व विनाशी विकार । आटितां उरे हेम अविकार । नासे आकार नामही ॥११७॥</p>
<p>
	तरी या हेमीं हा हेमाडपंत । विरोनि जावो समूळ नितांत । एवंगुण साईपदांकित । आप्रलयान्त वास करो ॥११८॥</p>
<p>
	पुढें केला तेरावा दिन । बाळासाहेब भक्तरत्न । मिळवूनियाम ग्रामस्थ ब्राम्हाण । उत्तरविधान आरंभिलें ॥११९॥</p>
<p>
	करूनियां सचैल स्नान । बाळासाहेब - हस्तें जाण । करविली तिलांजुली तिलतर्पण । पिंडप्रदानही केलें ॥१२०॥</p>
<p>
	सपिंडी आदिक उत्तक्रिया । शास्त्राधारें त्या त्या समया । जाहल्या मासिकासह अवघिया । धर्मन्यायाप्रमाणें ॥१२१॥</p>
<p>
	भक्तश्रेष्थ उपासनींनीं  । जोगांसमवेत जाउनी । भागीरथीच्या पवित्र स्थानीं । होमहवनीय संपादिलें ॥१२२॥</p>
<p>
	ब्रम्हाभोजन अन्नसंतर्पण । यथासाङ्ग दक्षिणाप्रदान । करूनि सशास्त्र विधिविधान । आले ते परतोन माघारां ॥१२३॥</p>
<p>
	नाहीं बाबा ना संवाद । आतां जरी हा ऐसा भेद । परी द्दष्टी पडतां ती मशीद । गत सुखानुवाद आठवती ॥१२४॥</p>
<p>
	बाबांची नित्य आसनस्थिती । घ्यावया तियेची सुखानुभूति । उत्तमोत्तम आलेक्यमूर्ति । मशिदीं प्रीतीं स्थापिलीसे ॥१२५॥</p>
<p>
	जाहली साईदेहनिवृत्ति । प्रतिमादर्शनें होय अनुवृत्ति । वाटे निजभक्त भावार्थी । पुनरावृत्तीच ही मूर्त ॥१२६॥</p>
<p>
	शामराव उपनामें जयकर तयांनीं ही रेखिली सुंदर । ऐसी ही प्रतिमा मनोहर । स्मरण निरंतर देतसे ॥१२७॥</p>
<p>
	जैसे हे प्रसिद्ध चित्रकार । तैसेचि बाबांचे भक्तही थोर । बाबांचिया आज्ञेनुसार । वर्तती विचारपूर्वक ॥१२८॥</p>
<p>
	यंचियाही हस्तेंकरून । सुंदर छायाचित्रें घडवून । करविलीं भक्तभवनीं स्थापन । धरावया ध्यानधारणा ॥१२९॥</p>
<p>
	संतांसी नाहीं कधींही मरण । पूर्वीं अनेकदां याचें विवरण । झालेंच आहे असेल स्मरण । न लगे स्पष्टीकरण आणीक ॥१३०॥</p>
<p>
	बाबा न आज देहधारी । तरी जो तयांचें स्मरण करी । तया ते अजूनही हितकारी । पूर्वीलपरी सदेहसे ॥१३१॥</p>
<p>
	कोणास कांहीं बोलून गेले । परी न कांहीं अनुभवा आलें । जरी तें देहावसानही झालें । म्हणून तें राहिलें न मानावें ॥१३२॥</p>
<p>
	बोल बाबांचे ब्रम्हालिखित । विश्वास धरूनि पहावी प्रचीत । अनुभव आला जरी न त्वरित । येणार तो निश्चित कालांतरें ॥१३३॥</p>
<p>
	असो या जोगांचें नांव येतां । कथेंत आठवली आडकथा । ऐका तियेचीही अपूर्वता । दिसेल प्रेमळता साईंची ॥१३४॥</p>
<p>
	जरी असे हा त्रोटक संवाद । गुरुबक्तांसी अति बोधप्रद । सभाग्य तो ज्या वैराग्यबोध । अभागी बद्ध संसारीं ॥१३५॥</p>
<p>
	एकदां जोग बबांस पुसती । अजून ही माझी काय स्थिति । विचित्र माझी कर्मगति । पावेन सुस्थिती केव्हां मी ॥१३६॥</p>
<p>
	बहुत वर्षें अनन्य सेवा । घडली आपुली मजला देवा । तरी या चंचल चित्ता विसांवा । अजूनि नसावा हें काय ॥१३७॥</p>
<p>
	ऐसा कैसा मी दुर्भागी । हीच का प्राप्ति संतसंगीं । सत्संगाचा परिणाम अंगीं । कवणिया प्रसंगीं भोगीन मी ॥१३८॥</p>
<p>
	परिसूनि ही भक्ताची विनंती । साईसमर्थ परम प्रीतीं । जोगांस काय प्रत्युत्तर देती । स्वस्थचित्तीं परिसावें ॥१३९॥</p>
<p>
	दुष्कर्माची होईल होळी । पुण्यपापाची राखरांगोळी । पाहीन तुझिया कांखेस झोळी । तैं तुज भाग्यशाली मानींन ॥१४०॥</p>
<p>
	उपाधीचा होईल त्याग । नित्य भगवद्भक्तीचा लाग । तुटतील आशापाश साङ्ग । तैं मी तुज सभाग्य मानीन ॥१४१॥</p>
<p>
	विषयासक्ति मानूनि त्याज्य । मीतंपण सर्बथा अयोग्य । जिव्हा - उपस्थ जिंक हो योग्य । तैं मी तुज सभाग्य मानीन ॥१४२॥</p>
<p>
	असो यावर कांहीं कालें । बोल बाबांचे अन्वर्थ झाले । सद्नुरुकृपें जोगांस आलें । वैराग्य जें वदले बाबा तें ॥१४३॥</p>
<p>
	नाहीं पुत्रसंततीपाश । कलत्र लाविलें सद्नतीस । देहत्यागा आधीं संन्यास । झालें कीं वैराग्य सहजचि ॥१४४॥</p>
<p>
	असो हे जोगही भाग्यवान । सत्य झालें साईवचन । अंतीं होऊनि संन्याससंपन्न । ब्रम्हीं विलीन जाहले ॥१४५॥</p>
<p>
	जैसी जैसी साईंनीं कथिली । तैसीच परिणामीं स्थिति झाली । उक्ति साईंची सार्थ झाली । भाग्यशाली जोग खरे ॥१४६॥</p>
<p>
	तात्पर्य बाबा दीनदयाळ । भक्तकल्याणालागीं कनवाळ । अर्पीत बोधामृताचा सुकाळ । शिर्डींत त्रिकाळ तो परिसा ॥१४७॥</p>
<p>
	“जयां माझी आवड मोठी । तयांचे मी अखंड द्दष्टीं । तयां मजवीण ओस सृष्टी । माझियाच गोष्टी तयां मुखीं ॥१४८॥</p>
<p>
	तयां माझें अखंड ध्यान । जिव्हेसी माझेंच नामावर्तन । करूं जातां गमनागमन । चरित्र गायन माझें तयां ॥१४९॥</p>
<p>
	ऐसें होतां मदाकार । कर्माकर्मीं पडेल विसर । जेथें हा मत्सेवेचा आदर । तिष्ठें मी निरंतर तेथेंचि ॥१५०॥</p>
<p>
	मज होऊनि अनन्य - शरण । जया माझें अखंड स्मरण । तयाचें मज माथां ऋण । फेडीन उद्धरण करूनियां ॥१५१॥</p>
<p>
	आधीं मज न दिधल्यावांचून । करितां भोजन - रसप्राशन । जया माझें हें निदिध्यासन । तया आधीन मी वर्तें ॥१५२॥</p>
<p>
	माझीच जया भूकतहान । दुजें न ज्यातें मजसमान । तयाचेंच मज नित्य ध्यान । तया आधीन मी वर्तें ॥१५३॥</p>
<p>
	पितामाता गणगोत । आप्तइष्ट कांतासुत । यांपासाव जो परावृत्त । तोचि कीं अनुरक्त मत्पदीं ॥१५४॥</p>
<p>
	वर्षाकाळीं नाना सरिता । महापूर समुद्रा मिळतां । विसरती सरितापणाची वार्ता । महासागता पावती ॥१५५॥</p>
<p>
	रूप गेलें नाम गेलें । जळही जाऊनि सागरीं मिसळलें । सरिता - सागर लग्न लागलें । द्वैत हारपलें एकत्वीं ॥१५६॥</p>
<p>
	पावोनि ऐसी समरसता । चित्त विसरलें नामरूपता । तें मजसि पाहील निजस्वभावता । नाहीं मजपरता ठाव तया ॥१५७॥</p>
<p>
	परीस नव्हे मी दगड । ऐसें जना करावया उघड । पुस्तकपंडितीं करोनि बडबड । लोहाचे अगड आणिले ॥१५८॥</p>
<p>
	तयीं मजवरी करितां घाव । उलट प्रकटतां सुवर्णभाव । माझें दगडपण जाहलें वाव । अनुभव नवलाव दाटला ॥१५९॥</p>
<p>
	विना अभिमान अणुप्रमाण । मज ह्रदयस्था यावें शरण । होईल अविद्या तात्काळ निरसन । श्रवणकारण संपेला ॥१६०॥</p>
<p>
	अविद्या प्रसवे देहबुद्धी । देहबुद्धीस्तव आधि - व्याधि । तीच कीं लोटी विधिनिषेधीं । आत्मसिद्धीविघातक ॥१६१॥</p>
<p>
	म्हणाल आतां मी आहें कोठें । आतां मी तुम्हां कैसा भेटें । तरी मी तुमचिया ह्रदयींच तिष्ठें । विनाकष्टें सन्निकट ॥१६२॥</p>
<p>
	म्हणाल ह्रदयस्थ कैसा कोण । कैसें काय त्याचें लक्षण । ऐसी काय तयाची खूण । जेणें त्या आपण जाणावें ॥१६३॥</p>
<p>
	तरी व्हावें दत्तावधान । परिसा तयाचें स्पष्ट व्याख्यान । जयालागीं जाणें शरण । तो ह्रदयस्थ कोण  हें आतां ॥१६४॥</p>
<p>
	नाना नामें नाना रूपें । सृष्टीमाजीं भरलीं अमूपें । जयांचींकवणा ना करवती मापें । मायेचीं स्वरूपें तीं अवघीं ॥१६५॥</p>
<p>
	तैसेच सत्त्वरजतमगुण । तयां त्रिगुणां ओलांडून । सत्तेचें जें स्फुरे स्फुरण । तें रूप जाण ह्रदयस्थाचें ॥१६६॥</p>
<p>
	नामरूपविरहितपण । उर्वरित जें तुझें तूंपण । तेंच ह्रदयस्थाचें लक्षण । जाणूनि शरण त्या जावें ॥१६७॥</p>
<p>
	मीच  तो तूं ऐसें पाहतां । हीच द्दष्टी पुढें विस्तारतां । भूतमात्रीं ये निजगुरुता । ठाव न रिता मजविना ॥१६८॥</p>
<p>
	ऐसा अभ्यास करितां करितां । अनुभवा येईल माझी व्यापकता । मग तूं मजसीं पावूनि समरसता । पूर्ण अनन्यता भोगिसील ॥१६९॥</p>
<p>
	चित्स्वरूपीं अनुसंधान । लाधेल होशील शुद्धांत:करण । घडेल हें तुज गंगास्नान । गंगाजीवन नातळतां ॥१७०॥</p>
<p>
	प्रकृतिकर्माचा अभिमान । जेणें पावे द्दढबंधन । तया बिलगूं न देती सज्ञान । अंतरीं सावधान सदैव ॥१७१॥</p>
<p>
	स्वस्वरूपीं मांडूनि ठाण । चळे न तेथून अणुप्रमाण । तया समाधी वा उथान । नाहीं प्रयोजन उभयांचें” ॥१७२॥</p>
<p>
	म्हणोनि श्रोतयां चरणीं माथा । ठेवोनि विनवीं अति सप्रेमता । देवां - संतां - भक्तां समस्तां - । ठायीं प्रेमळता आदरावी ॥१७३॥</p>
<p>
	बाबा कितीदां सांगून गेले । कोणी कोणास छद्मीं बोललें । त्यानें माझेंच वर्म काढिलें । जिव्हारीं खोचलें मज जाण ॥१७४॥</p>
<p>
	कोणीं कोणास दुर्वचें ताडिलें । तेणें मज तात्काळ दुखणें आणिलें । तेंच जेणें तें धैर्यें सोशिलें । तेणें मज तुष्टविलें बहुकाळ ॥१७५॥</p>
<p>
	ऐसा भूतमात्राच्या ठायीं । अंतर्बाह्य भरला साई । एका प्रेमावांचून कांहीं । आवडच नाहीं तयातें ॥१७६॥</p>
<p>
	परम मंगल हें परमामृत । साईमुखीं सर्वदा स्रवत । कोणा सभाग्य हें नाहीं अवगत । प्रेम अत्यंत भक्तार्थ हें ॥१७७॥</p>
<p>
	जयां पंक्तीचा लाभ दिधला । जयांसंगें हांसला खेळला । तयांस मायेचा चटका लाविला । वाटेल मनाला काय त्यांचे ॥१७८॥</p>
<p>
	ऐसिया शिष्टाचिया भोजनीं । मी तों उच्छिष्टाचा धनी । शीतें शीत ठेविलें वेंचुनी । वांटितों शिराणी तयाची ॥१७९॥</p>
<p>
	झाल्या येथवरी ज्याच्या कथा । त्या काय ठाव्या हेमाडपंता । समर्थ साई तयांचा वक्ता । लिहिता लिहविताही तोच ॥१८०॥</p>
<p>
	ऐसी ही साईसमर्थकथा । धाये न मन माझें कथितां । सदैव ध्यास । लागला चित्ता । श्रोतेही परिसतां आनंद ॥१८१॥</p>
<p>
	शिवाय जे साईकीर्ति गाती । तैसेंच जे जे सद्भावें परिसती । उभयही साईस्वरूप होती । हें द्दढ चित्तीं जाणावें ॥१८२॥</p>
<p>
	आतां हा अध्याय करूनि पूर्ण । हेमाड साईंस करी समर्पण । प्रेमें धरी साईंचे चरण । पुढील निरूपण पुढारां ॥१८३॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । श्रीसाईनाथनिर्याणं नाम चतुश्चत्वारिंशोत्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 Apr 2022 15:08:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 Apr 2022 16:05:54 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ४३]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-43-122042900048_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
पूर्वाध्यायीं झालें निरूपण । संतसाईसमर्थ - निर्य़ाण । आतां जें अवशेष अपूर्ण । होईल कीं संपूर्ण ये ठायीं ॥१॥]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 43" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/29/full/1651225063-6038.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra part 43" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	पूर्वाध्यायीं झालें निरूपण । संतसाईसमर्थ - निर्य़ाण । आतां जें अवशेष अपूर्ण । होईल कीं संपूर्ण ये ठायीं ॥१॥</p>
<p>
	साईलागीं प्रेम अद्भुत । तेंही उपजवी तोचि समर्थ । हेमाड तयाचे चरणीं निरत । रेखाटीत कीं तच्चरित ॥२॥</p>
<p>
	तोचि देई भक्तिप्रेमा । तोचि वाढवी चरित्रमहिमा । तेणेंचि गौरव भजनधर्मा । येई उपरमा संसार ॥३॥</p>
<p>
	म्हणोनि कायावाचामनें । तया माझीं सहस्रान्त नमनें । चिंतवे न त्याच महिमा चिंतनें । केवळ अनन्यें शरण रिघें ॥४॥</p>
<p>
	सांचला पापाचा मळा । तो धुऊनि काढावया सकळ । करावया अंतर निर्मळ । इतर निष्फळ साधन ॥५॥</p>
<p>
	करणें हरिभक्तयशस्मरण । तयांचें भजन अथवा कीर्तन । त्यावीण चित्तशुद्धीसी साधन । सोपें न आन शोधितां ॥६॥</p>
<p>
	असो गतकथानुस्म्धान । करूं संकलित पर्यालोचन । साईनिजानंदावस्थान । चालवूं व्याख्यान पुढारा ॥७॥</p>
<p>
	मागां साद्यंत जाहलें कथन । विजयादशमीसचि कां प्रयाण । तात्याबामिषें  भविष्यनिवेदन । आधींच कैसेनि जाहलें ॥८॥</p>
<p>
	पुढें होतां देहावसान । राखूनियां धर्मावधान । कैसें लक्ष्मीस केलें दान । जाहलें निरूपण समग्र ॥९॥</p>
<p>
	आतां ये अध्यायीं कथान । कैसें निकट येतां निधन । साई करीत रामायणश्रवण । हितार्थ ब्राम्हाणमुखानें ॥१०॥</p>
<p>
	कैसें समाधिस्थान - नियोजन । कैसें अलक्षित इष्टिका - पतन । कैसें समाधिदस्थान - नियोजन । दत्तावधान परिसावें ॥११॥</p>
<p>
	तैसेंच एकदां ब्रम्हांडीं प्राण । चढवूनि बैसतां तीन दिन । कैंची समाधि, तेंचि देहावसान । निश्चितमन जन झाले ॥१२॥</p>
<p>
	केली उत्तरविधीची तयारी । अवचित बाबा देहावरी । येतांचि लोक दचकले अंतरीं । कैसी ते परी परिसिजे ॥१३॥</p>
<p>
	असो आतां हे निर्याणकथा । श्रोते श्रमतील श्रवण करितां । ही तों देहावसानाची वार्ता । न रुचे चित्ता कवणाच्या ॥१४॥</p>
<p>
	परी हें साधुसंतांचें निर्याण । श्रोत्यांवक्त्यां करील पावन । विस्तरभयास्तव भागश: श्रवण । करावें समाधान राही तों ॥१५॥</p>
<p>
	देहत्यागें अगम्यगति । निजप्राप्ति सुखाची वसती । बाबा पावले अक्षय स्थिति । पुनरावृत्तीविरहित ॥१६॥</p>
<p>
	देहधारणें होते व्यक्त । देहत्यागें पावले अव्यक्त । जरी एकांग - अवतार समाप्त । सर्वांग सुव्यक्त लाधलें ॥१७॥</p>
<p>
	एकदेशीयत्वा मुकले । सर्वगतत्वातें पावले । पूर्णपणें सनातन झाले । निजीं समरसले निजत्वें ॥१८॥</p>
<p>
	साई सकळांचें जीवन । साई सकळांचा जीव प्राण । साईवीण ग्रामवासी जन । हीन दीन जाहले ॥१९॥</p>
<p>
	देह पडतां निचेष्टित । जाहला एकचि आकांत । आबालवृद्ध चिंताक्रांत । जाहला प्राणान्त समस्तां ॥२०॥</p>
<p>
	न ज्वरादि लौकिकी बाधा । पाठीस लागती प्रपंचबद्धा । योगियांच्या वाटे कदा । अमर्यादा न करिती ॥२१॥</p>
<p>
	चेतवोनियां निजतेजातें । संत दाहिती निजदेहातें । तोच कीं प्रकार निजहातें । बाबा करिते जाहले ॥२२॥</p>
<p>
	न व्हावें तें होऊनि गेलें । महाराज सायुज्यीं समरसले । जन अत्यंत हिरमुसले । कुसमुसले मनांत ॥२३॥</p>
<p>
	बरें होतें नसतों गेलों । अंतसमयींच्या भेटीस मुकलों । असतों कांहीं उपयोगा आलों । भुलीं भरलों प्रसंगीं ॥२४॥</p>
<p>
	ऐशा ननाविध विचारांनीं । खिन्न झाला जो तो मनीं । बाबांच्या काय अंत:करणीं । असेल तें कोणी जाणावें ॥२५॥</p>
<p>
	नाहीं घरघर नाहीं श्वास । नाहीं खांसी नाहीं कास । नाहीं जीवाची कासावीस । केलें उल्लासें प्रयाण ॥२६॥</p>
<p>
	आतां कैंचें साईदर्शन । कैंचें साईपदसंवाहन । कैंचें साईचरणक्षाळण । तीर्थप्राशन  तें कैंचें ॥२७॥</p>
<p>
	तरी मग ते भक्त प्रेमळ । आली पाहोनि अंतवेळ । दूर केलें कां असतां जवळ । तयांस तळमळ लाविली कां ॥२८॥</p>
<p>
	सर्वचि जीवाची भक्तामंडळी । पाहूनि जवळी अंतकाळीं । समयीं बबांचे प्रेमास उसळी । अंतकाळीं येती कीं ॥२९॥</p>
<p>
	पावावया सायुज्यसदन । आडवें येतें प्रेमबंधन । वेळीं न करितां तयांचें छेदन । मन निर्वासन कैसेनी ॥३०॥</p>
<p>
	ऐसें न घडतां देह पडला । सवेंच चढला जीव घडघडला ॥ तात्काळ नवा संसार जडला । बाजार उघडला वासनेचा ॥३१॥</p>
<p>
	टाळावया हा प्रकार । साधुसंत दक्ष निरंतर । बाबांच्याही मनाचा निर्धार । लोकव्यवहार रक्षावा ॥३२॥</p>
<p>
	अंतकाळीं हीच सावधता । शांतता आणि एकांतता । ध्येयमूर्ति यावी चित्ता । विक्षेपताविरहित ॥३३॥</p>
<p>
	‘अंते मति: सा गति:’ । हें तों प्रसिद्ध सर्व जाणती । भगवद्भक्त स्वयें आचरती । लोकसंग्रह - रीती हे ॥३४॥</p>
<p>
	अवकाश चवदा दिवस राहिला । काळ बाबांचा जवळ आला । म्हणोनि बाबांनीं । वझे योजिला । वाचावयाला रामविजय ॥३५॥</p>
<p>
	मशिदींत वझे बैसले । पोथी - पारायण सुरू झालें । बाबा श्रवण करूं लागले । दिवस गेले कीं आठ ॥३६॥</p>
<p>
	पुढें बाबा आज्ञा करीत । पोथी चालवा अस्खलित । ऐसे तीन दिवस - रात । वझे ती वाचीत राहिले ॥३७॥</p>
<p>
	पूर्ण अकरा दिवस बैसले । पुढें अशक्तपणें ते थकले । वाचतां वाचतां कंटाळले । ऐसे गेले तीन दिन ॥३८॥</p>
<p>
	पुढें बाबांनीं काय केलें । पोथीवाचन समाप्त करविलें । वझ्यांस तेथूनि घालवूनि लाविलें । आपण राहिले निवांत ॥३९॥</p>
<p>
	घालवूनि लावण्याचें कारण । म्हणतील श्रोते करवा कीं श्रवण । करितों यथामति निवेदन । दत्तावधान परिसावें ॥४०॥</p>
<p>
	निकट येतां देहावसान । साधुसंत आणि सज्जन । टेती वाचवूनि पोथीपुराण । सावधान परिसती ॥४१॥</p>
<p>
	शुकाचार्य दिवस सात । कथिते झाले महाभागवत । ऐकूनि धाला राजा परीक्षित । सुखें देहान्त लाधला ॥४२॥</p>
<p>
	श्रवण करितां भगवल्लीला । भगवन्मूर्ति देखतां डोळां । अंतकाळ जयाचा जाहला । तेणेंचि साधिला निजस्वार्थ ॥४३॥</p>
<p>
	ही तों लोकप्रवृत्तिस्थिति । संत निरंतर स्वयें आचरती । लोकसंग्रहमार्ग न मोडिती  । किंबहुना अवतरती तदर्थचि ॥४४॥</p>
<p>
	जयां या भौतिकपिंडीं अनास्था । तयां देहावसानावस्था । नाहीं दु:खशोकावेगता । ही स्वाभाविकता तयांची ॥४५॥</p>
<p>
	असो तेथें श्रोतां शंकिजे । ब्रम्हासुखें सुखावले जे । तयांसी मायामोहें आतळिजे । बोल हा साजे कैसेनी ॥४६॥</p>
<p>
	जे स्वरूपीं सावधान । ‘अल्ला मालिक’ अनुसंधान । तयांसी भक्तांचें सन्निधान । प्रतिबंधन कैसेनी ॥४७॥</p>
<p>
	तयाचा तो प्रपंच सरला । परमार्थही ठाईंच ठेला । द्वंद्वभाव समूळ गेला । स्वयें संचला स्वरूप ॥४८॥</p>
<p>
	अक्ष्रें अक्षर सकळ सत्य । यांत अणुमात्र नाहीं असत्य । परी लोकसंग्रह - अवतारकृत्य । करूनि कृतकृत्य संतजन ॥४९॥</p>
<p>
	संत षड्‌भाव - विकारवर्जित । जे निरंतर अप्रकट स्थित । भक्तोद्धारार्थ प्रकटीभूत । निधन किंभूत तयांतें ॥५०॥</p>
<p>
	देहेंद्रियसंयोग तें जनन । देहंद्रियवियोग तें मरण । हें पाशबंधन वा उकलन । जन्ममरण या नांव ॥५१॥</p>
<p>
	जनानापाठीं चिकटलें मरण । एकाहूनि एक अभिन्न । मरण जीवप्रकृतिलक्षण । जीवाचें जीवन ती विकृति ॥५२॥</p>
<p>
	मरण मारूनि जे उरती । पाय काळाचे शिरीं जे देती । तयां काय आयुर्दायाची क्षिती । अवतरती जे स्वेच्छेनें ॥५३॥</p>
<p>
	भक्तकल्याणैकवासना । तेणें जे धरिती अवतार  नाना । ते काय आतळती जन्ममरणा । मिथ्या कल्पना या दोन्ही ॥५४॥</p>
<p>
	देहपाता आधींच देख । जेणें देहाची केली राख । तयासी मरणाचा कायसा धाक । मरण हें खाक जयापुढें ॥५५॥</p>
<p>
	मरण ही देहाची प्रकृति । मरण ही देहाची सुखस्थिती । जीवन ही देहाची विकृति । विचारवंतीं विचारिजे ॥५६॥</p>
<p>
	साईसमर्थ आनंदघन । ठावें न जयां देहाचें जनन । तयांच्या देहासी कैसें मरण । देहस्फुरणवर्जित ते ॥५७॥</p>
<p>
	साई परब्रम्हा पूर्ण । तयां कैंचे जन्म - मरण । ब्रम्हासतत्वें जगन्मिथ्यापण । देहाचेम भान कैंचेम त्यां ॥५८॥</p>
<p>
	प्राणधारण वा विसर्जन । अलक्ष्यरूपें परिभ्रमण । हें तों स्वच्छंदयोगक्रीडन । भक्तोद्धारणनिमित्तें ॥५९॥</p>
<p>
	म्हणती रवीसी लागलें ग्रहण । झाला कीं हो खग्रास पूर्ण । हा तों केवळ द्दष्टीचा दोषगुण । संतांसी मरण तैसेंचि ॥६०॥</p>
<p>
	देह ही केवळ उपाधि । तयां कैंची आधि - व्याधि । असल्या कांहीं प्रारब्धानुबंधीं । तयाची न शुद्धी तयांला ॥६१॥</p>
<p>
	भक्तपूर्वर्जितीं जो संचला । अव्यक्तरूपीं भक्तीं भरला । तो हा भक्तकैवारार्थ प्रकटला । शिरडींत दिसला तेव्हांचि ॥६२॥</p>
<p>
	आतां भक्तकार्यार्थ संपला । म्हणूनि म्हणती देह ठेविला । कोण विश्वासील या बोला । गति योग्याला काय हे ॥६३॥</p>
<p>
	इच्छामरणी साई समर्थ । देह जाळिला योगाग्नींत । स्वयें समरसले अव्यक्तांत । भक्तह्रदयांत ते ठेले ॥६४॥</p>
<p>
	जयाचें केवळ नाम स्मरतां । जन्म-मराणाची नुरे वार्ता । तयास कैंची मरणावस्था । पूर्वील अव्यक्तता तो पावे ॥६५॥</p>
<p>
	उल्लंघोनि जडस्थिति । बाबा समरसले अव्यक्तीं । तेथेंही भोगिती स्वरूपस्थिति । सदा जागविती भक्तांतें ॥६६॥</p>
<p>
	सचैतन्य जो मुसमुसला । भक्तह्रदयीं जो अढळ ठसला । तो देह काय म्हणावा निमाला । बोल हा मनाला मानेना ॥६७॥</p>
<p>
	म्हणोनि ह अनाद्यनंत साई । अभंग राहील विश्वप्रलयीं । जन्म - मरणांचिया अपायीं । न कदाही पडेल ॥६८॥</p>
<p>
	महाराज ज्ञानोबा काय गेले । तीन शतकांतीं दर्शन दिधलें । नाथमहाराज भेटूनि आले । उपकार केले जगावर ॥६९॥</p>
<p>
	जैसे ते नाथ कृपावंत । पैठणींची जाहली ज्योत । तुकाराम महाराज देहूंत । आळंदींत नरसिंहसरस्वती ॥७०॥</p>
<p>
	समर्थ रामदास परळींत । अक्कलकोटकर अक्कलकोटांत । प्रभुमाणिक हुमणाबादेंत । साई हे शिरडींत तैसेचि ॥७१॥</p>
<p>
	जया मनीं जैसा भाव । आजही तया तैसा अनुभव । हा सिद्धचि जयाचा प्रभाव । मरणभाव कैंचा त्या ॥७२॥</p>
<p>
	तो हा भक्तकाजकैवरी । देह ठेविला शिरडिभीतरीं । स्वरूपें भरलासे चराचरीं । लीलावतारी समर्थ ॥७३॥</p>
<p>
	आतां काय आहे शिरडींत । समर्थ झाले ब्रम्हीभूत । ऐसी न शंका यावी मनांत । मरणातीत श्रीसाई ॥७४॥</p>
<p>
	संत मुळींच गर्भातीत । परोपकारार्थ प्रकट होत । ब्रम्हास्वरूप मूर्तिमंत । भाग्यवंत अवतरती ॥७५॥</p>
<p>
	जन्म आणि मरणस्थिती । अवतारीयां कदा न ये ती । कार्य सरतां ते स्वरूपीं मिळती । समरसती ते अव्यक्तीं ॥७६॥</p>
<p>
	अवघा देह साडेतीन हात । बाबा काय त्यांतचि समात । ते विशिष्ट वर्णस्वरूपयुक्त । हें तों अयुक्त बोलणें ॥७७॥</p>
<p>
	अणिमा - गरिमादि अष्टसिद्धी । आलिया गेलिया क्षय ना बुद्धि । स्वयेंचि अखंड जयाची समृद्धि । ऐसी प्रसिद्धि तयांची ॥७८॥</p>
<p>
	ऐसिया महानुभावांचा उदय । लोककल्याण हाचि आशय । उदयासी आहे स्थिति विलय । लोकसंग्रहमय संत ॥७९॥</p>
<p>
	जन्मभ्रांति मृत्युभ्रांति । आत्मैकत्व अविनाशा स्थिति । स्वप्नामाजील सुखसंपत्ति । तेचि परिस्थिति तयांची ॥८०॥</p>
<p>
	ना तरी जो ज्ञाननिधान । सदैव जया आत्मानुसंधान । तयासी देहाचें जोपासून । आणीक पतन सारिकें ॥८१॥</p>
<p>
	असो पडलें बाबांचें शरीर । कोसळला दु:खाचा डोंगर । हाहाकार शिरडीभर । एकचि कहर उसळला ॥८२॥</p>
<p>
	ऐकूनि बाबांचें निर्याण । वार्ता खोंचली जैसा बाण । पडलें नित्य व्यवसाया खाण । दाणादाण उडाली ॥८३॥</p>
<p>
	पसरतां ती अमंगल मात । सकळांसी गमला वज्राघात । विचारी बैसले निवांत  । इतरीं आकांत मांडिला ॥८४॥</p>
<p>
	अति आवडीचेनि पडिभारें । कंठ तयांचा दाटे गहिंवरें । दु:खाश्रुनीर नयनीं पाझरे । ‘शिव शिव हरे’ उद्भारले ॥८५॥</p>
<p>
	घरोधरीं झाली हडबद । उडाली एकचि गडबड । छातींत भरली धडधड ।  लोक दडदड धांविन्नले ॥८६॥</p>
<p>
	महाराजांचें देहावसान । प्राणांतचि ओढवला ग्रामस्थां पूर्ण । म्हणती देवा हा प्रसंग दारुण । ह्रदयविदारण झालें गा ॥८७॥</p>
<p>
	जो उठे तो पळत सुटे । मशीद मंडप गच्च दाटे । अवस्था पाहोनि ह्रदय फाटे । कंठ दाटे दु:खानें ॥८८॥</p>
<p>
	गेलें शिरडीचेम वैभव सरलें । सुखसौभाग्य सर्व हारपलें । डोळे सर्वांचे अश्रूंनी भ्रले । धैर्य भंगले सकळांचें ॥८९॥</p>
<p>
	काय त्या मशिदीची महती । सप्तपुर्‍यांत जिची गणती । ‘द्वारकामाई’ जीस म्हणती । बाबा निश्चितीं सदैव ॥९०॥</p>
<p>
	असो निर्याण, निर्वाण वा निधन । द्वारका सायुज्यमुक्तीचें स्थान । जया ईश्वरीं नित्यानुसंधान । तया अवस्थान ये ठायीं ॥९१॥</p>
<p>
	तो हा गुरुराज साईराय । भक्तकनवाळू बापमाय । भक्तां विश्रांतीचा ठाय । आठव होय नित्याची ॥९२॥</p>
<p>
	बाबांवीण शिरडी ओस । दाही दिशा शून्य उदास । प्राण जातां जे शरीरास । कळा शिरडीस ते आली ॥९३॥</p>
<p>
	सुकोनि जातां तळ्यांतील जीवन । तळमळती जैसे आंतील मीन । तैसे झाले शिरडीचे जन । कलाहीन उद्विग्न ॥९४॥</p>
<p>
	कमलावीण सरोवर । पुत्रावीण शून्य़ घर । कीं दीपावीण मंदिर । मशीदपरिसर तो तेवीं ॥९५॥</p>
<p>
	कीं घरधन्यावीण घर । कीं राजयावीण नगर । कीं द्रव्यावांचूनि भांडार । शिरडी कांतार बाबांविणें ॥९६॥</p>
<p>
	जननी जैसी कर्भका । किंवा मेघोदक चातका । तेंचि प्रेम शिरडीचे लोकां । आणिक भक्तां सकळिकां ॥९७॥</p>
<p>
	शिरडी झाली कलाहीन । मृतप्राय हीन दीन । जीवनेंवीण जेवीं मीन । तेवीं जन तळमळती ॥९८॥</p>
<p>
	वर्जितां कांता निज - भ्रतारें । अथवा माता स्तनींचीं पोरें । जैसीं गाईचीं चुकलीं वासरें । लहान थोरें त्यापरी ॥९९॥</p>
<p>
	अनिवार हे दु:खावस्था । झाली शिरडीच्या जनां समस्तां । बिदोबिदीं अस्तावेस्ता । जन चौरस्ता धांवती ॥१००॥</p>
<p>
	साईंमुळेंच शिरडी पवित्र । साईंमुळेंच शिरडी चरित्र । साईंमुळेंच शिरडी क्षेत्र । साईच छत्र सर्वांतें ॥१०१॥</p>
<p>
	कोणी करी आक्रंदन । कोणी तेथें घेई लोळण । कोणी पडे मूर्च्छापन्न । दु:खापन्न जन झाले ॥१०२॥</p>
<p>
	दु:खाश्रूंनीं स्रवती नयन । नरनारी अति उद्विग्न । टाकोनियां अन्नपान । दीनवदन तीं झालीं ॥१०३॥</p>
<p>
	पाहोनि बाबांची ते अवस्था । ग्रामस्थांसी परमावस्था । आबालवृद्ध भक्तां समस्तां । महदस्वस्थता पातली ॥१०४॥</p>
<p>
	जेथें गोड कथा सुरस । जेथें रोज आनंद बहुवस । जेथें शिरावया न मिळे घस । ते मशीद उद्वस तंव दिसे ॥१०५॥</p>
<p>
	‘नित्यश्री नित्यमंगल’ । होती जी शिरडी पूर्वीं सकळ । बाबाचि एक कारण मूळ । तेणें हळहळ ग्रामस्थां ॥१०६॥</p>
<p>
	आनंदकंदा आनंदविग्रहा । भक्तकार्यार्थ धरिलें देहा । तो अर्थ संपादूनि अहाहा । नगरीं, विदेहा पावलासी ॥१०७॥</p>
<p>
	अष्टौप्रहर निरलस । कळकळीचा हितोपदेश । करीतसां कीं रात्रंदिस । बुद्धिभ्रंश आम्हां तैं ॥१०८॥</p>
<p>
	जैसें उपडया घडयावर पाणी । उपदेश तैसा आम्हांलागुनी । गेला वरचेवर वाहुनी । बिंदुहि ठिकाणीं लाधेना ॥१०९॥</p>
<p>
	“तुम्ही कोणासी बोलतां उणें । मजला तात्काळ येतें दुखणें” । पदोपदीं हें आपुलें सांगणें । परी न मानणें तें आम्ही ॥११०॥</p>
<p>
	ऐसे आपुले अपराधी किती । मानिली नाहीं न्यांनीं ही सदुक्ति । तयांची आज्ञाभंगनिष्कृति । एणे रीतीं फेडिली कां ॥१११॥</p>
<p>
	बाबा त्या सकळांचें पाप । त्याचें भरलें कां हें माप । आतां होऊनि काय अनुताप । भोगावें आपाप भोक्तृत्व ॥११२॥</p>
<p>
	तेणेंचि आम्हांतें कंटाळलां । तरीच का पडद्या आड झालां । आम्हांवरी हा अवचित घाला । काळें घातला कैसा कीं ॥११३॥</p>
<p>
	कानीं कपाळीं ओरड करितां । कंठासि तुमचे कोरड पडतां । कंटाळलां वाटतें चित्ता । आमुची उदासता देखोनि ॥११४॥</p>
<p>
	म्हणोनि आम्हांवरी रुसलां । पूर्वप्रेम सारें विसरलां । कीं ऋणानुबंधचि आजि सरला । कीं ओसरला स्नेहपान्हा ॥११५॥</p>
<p>
	आपण इतुके सत्वर जाते । ऐसें जरी आधीं समजतें । तरी फारचि बरवें होतें । सावध राहते जन आधीं ॥११६॥</p>
<p>
	आम्ही सकळ सुस्त राहिलों । झोंपा घेत स्वस्थ बैसलों । अखेर हे ऐसे फसलों । असलों नसलों सारिखे ॥११७॥</p>
<p>
	झालों आम्ही गुरुद्रोही । वेळीं कांहींच केलें नाहीं । स्वस्थ बैसावें तरी तेंही । घडलें नाहीं आम्हांतें ॥११८॥</p>
<p>
	लांबलांबून शिरडीसी जावें । तेथेंही चकाटया पिटीत बैसावें । तीर्थासी आलों हें समूळ विसरावें । तेथेंही आचरावें यथेच्छ ॥११९॥</p>
<p>
	तर्‍हेतर्‍हेचे भक्ता अनेक । ज्ञानी अभिमानी भावार्थी तार्किक । जया सद्रूपें अवघे एक । नेणे न्यूनाधिक जो भेद ॥१२०॥</p>
<p>
	जगीं भगवंतावांचून । द्दष्टीं न ज्याच्या पदार्थ आन । ऐसें जयाचें देखणेपण । जो न आपणही दुजा ॥१२१॥</p>
<p>
	भक्त हेही स्वयें ईश्वर । मी गुरूही, नव्हे इतर । उभयतांसी स्वस्वरूपविसर । भेद हे परस्पर त्यायोगें ॥१२२॥</p>
<p>
	वस्तुत:  ईश्वरचि आहों आपण । परी परमार्थस्वरूपविस्मरण । हेंचि मुख्य भेदाचें लक्षण । अध:पतन तें हेंच ॥१२३॥</p>
<p>
	सार्वभौमा स्वप्न होईअ । भिक्षार्थ दारोदारीं जाई । निजबोधाची जाग येई । अवलोकी ठायींच आपणा ॥१२४॥</p>
<p>
	प्रवृत्ति ही जी जागृती । ईच निवृत्ति स्वप्नस्थिती । खरी जागृती निजानुभूती । पूर्ण अद्वैतीं समरसणें ॥१२५॥</p>
<p>
	ज्ञानी अज्ञानी सर्व आश्रित । सर्वांवरी प्रेम अत्यंत । जीवाहूनि मानी आप्त । भेद ना तेथ यत्किंचित ॥१२६॥</p>
<p>
	मनुष्यरूपें देवचि होते । जरी हें आणिलें प्रचीतीतें । परी त्याचिया लडिवाळतेतें । बळी पडले ते समस्त ॥१२७॥</p>
<p>
	कोणासी दिधली धनसंपत्ति । कोणासी संसारसुख संतति । तेणें महान पडली भ्रांति । ज्ञानप्राप्तीस आंचवले ॥१२८॥</p>
<p>
	कधीं जयासवें हांसत । तया अंगीं अभिमान दाटत । कीं त्यावरीत प्रेम अद्भुत । इतरां न दावीत तें तैसें ॥१२९॥</p>
<p>
	तेंच कोणा क्रोधें वदतां । म्हणती न तो तयां आवडता । आम्हांविशींच अधिक आदरता । इतरां न देतात तो मान ॥१३०॥</p>
<p>
	ऐसेच आम्ही नंबर लावितां । बाबांच्या तें स्वप्नींही नसतां । उगाच नागवलों निजस्वार्था । कृतकर्तव्यता विसरलों ॥१३१॥</p>
<p>
	परब्रम्हा सगुणमूर्ति । दैवें असतां उशागतीं । खर्‍या कार्याची होऊनि विस्मृति । विनोदीं प्रीति धरियेली ॥१३२॥</p>
<p>
	येतांच बाबांचें दर्शन घ्यावें । फळफूल अवघें समर्पावें । दक्षिणा  मागतां मग कचरावें । नच रहावें ते ठायीं ॥१३३॥</p>
<p>
	सांगतां हितवादाच्या गोष्टी । पाहुनी आमुची क्षुद्र द्दष्टि । झालां वाटतें खरेंच कष्टी । गेलां उठाउठी निजधामा ॥१३४॥</p>
<p>
	आतां ती आपुली स्वानंदस्थिति । पुनश्चका हे नयन देखती । गेली हरपली ती आनंदमूर्ति । जन्मजन्मांतीं अद्दश्य ॥१३५॥</p>
<p>
	हा हा दारुण कर्म देखा । अंतरला ठाईंचा साई सखा । निर्हेतुक दयार्द्र तयासारिखा । झाला पारखा आम्हांसी ॥१३६॥</p>
<p>
	“बरें नव्हे कोणातें छळणें । तेणें येतें मजला दुखणें” । मना नाणिलें हें बाबांचें म्हणणें । केलीं भांडणें यथेच्छ ॥१३७॥</p>
<p>
	छळ करितां भक्तांभक्तां । आम्ही मुकलों की साईनाथा । होतो तयाचा अनुताप आतां । आठवती वार्ता तयांच्या॥१३८॥</p>
<p>
	आठा वर्षांचा बाळ जनीं । प्रकट होईन मी मागुतेनी । ऐसें महाराज  भक्तांलागुनी । आहेति सांगुनी राहिले ॥१३९॥</p>
<p>
	आहे ही संताची वाणी । वृथा मानूं नये कोणीं । कृष्णावतारीं चक्रपाणी । केली करणी ऐसीच ॥१४०॥</p>
<p>
	आठ वर्षांची सुंदर कांति । चतुर्भुत आयुधें हातीं । देवकीपुढें बंदीशाळेप्रति । कृष्णमूर्ति प्रकटली ॥१४१॥</p>
<p>
	तेथें कारण भूभारहरण । येथें दीनभक्तोद्धारण । तरी किमर्थ शंकाजनन । अतर्क्य विंदान संतांचें ॥१४२॥</p>
<p>
	हा काय एका जन्माचा निर्बंध । बहात्तर पिढयांचा ऋणानुबंध । भक्तांचा बाबांनीं पूर्वसंबंध । कथानुबंध कथियेला ॥१४३॥</p>
<p>
	ऐसें बांधुनी प्रेमफांसा । वाटती महाराज गेले प्रवासा । येतील मागुतेनी हा पूर्ण भरंवसा । भक्तमानसा झालासे ॥१४४॥</p>
<p>
	साक्षात्कार कित्येकांसी । द्दष्टान्तानुभव बहुतेकांसी । चमत्कार तो अनेकांसी । गुप्तरूपेंसीं दाविती ॥१४५॥</p>
<p>
	अभाविकां गुप्त असती । भक्तां भाविकां ठाईंचि दिसती । जैसी जयाची चित्तवृत्ति । तैसीचि अनुभूति रोकडी ॥१४६॥</p>
<p>
	चावडींत गुप्तरूप । मशिदींत ब्रम्हारूप । समाधींत समाधिरूप । सुखस्वरूप सर्वत्र ॥१४७॥</p>
<p>
	असो सांप्रत हाचि विश्वास । भक्तीं धरावा निज जीवास । भंग नाहीं समर्थसाईंस । अक्षय रहिवास अखंड ॥१४८॥</p>
<p>
	देव जाती निजधामाप्रति । संतां ठायींच ब्रम्हास्थिति । गमनागमन ते नेणती । समरसती आनंदीं ॥१४९॥</p>
<p>
	म्हणोनि आतां हेचि विनंती । नम्रपूर्वक करितों प्रणती । साना थोरां अवघियांप्रती । सादर चित्तीं अवधारा ॥१५०॥</p>
<p>
	जडो उत्तमश्लोकसंगती । गुरुचरणीं निष्काम प्रीती । गुरुगुणानुकथनासक्ति । निर्मळ भक्ति प्रकट हो ॥१५१॥</p>
<p>
	जडो प्रीति अनवच्छिन्न । न होत स्नेहपाश भिन्न । असोत भक्त सुखसंपन्न । रात्रंदिन गुरुपदीं ॥१५२॥</p>
<p>
	असो पुढें त्या देहाचें उचित । करावें काय तें निश्चित । येच विचारीं जन समस्त । शिष्य ग्रामस्थ लागले ॥१५३॥</p>
<p>
	श्रीमंत बुट्टी मोठे भावुक । जणूं या पुढील भविष्याचें स्मारक । टोलेजंग वाडा सुखकारक । बांधूनि स्थाईक ठेविला ॥१५४॥</p>
<p>
	मग पुढें तें कलेवर । कुठें असावें या विषयावर । होऊनि छत्तीस तास विचार । घडलें होणार जें होतें ॥१५५॥</p>
<p>
	एक म्हणे या कलेवरासी । स्पर्शूं न द्यावें आतां हिंदुंसी । मुसलमानांच्या कबरस्थानासी । समारंभेंसी नेऊंया ॥१५६॥</p>
<p>
	दुजा म्हणे हें कलेवर । ठेवावें नेऊनि उघडयावर । थडगें एक बांधावें सुंदर । तयांत निरंतर रहावें हें ॥१५७॥</p>
<p>
	खुशालचंद अमीर शक्कर । यांचाही होता हाचि विचार । परी ‘वाडियांत पडो हें शरीर’ । होते हे उद्नार बाबांचे ॥१५८॥</p>
<p>
	पाटील रामचंद्र मोठे करारी । तेही एक ग्रामाधिकारी । बाबांचे प्रेमळ सेवेकरी । वदती ते गांवकरियांसी ॥१५९॥</p>
<p>
	असोत तुमचे विचार कांहीं । समूल कांहीं आम्हांतें मान्य नाहीं । वाडयाबाहेरी इतरां ठायीं । क्षणभरीही साई ठेवूं नये ॥१६०॥</p>
<p>
	हिंदू आपले धर्मानुसार । मुसलमानही तैसाच विचार । योग्यायोग्य चर्चाप्रकार । सबंध रात्रभर जाहले ॥१६१॥</p>
<p>
	इकडे लक्ष्मणमामा घरीं । असतां पहांटे निद्रेच्या भरीं । बाबा तयांच्या धरूनिरे करीं । म्हणाले “झडकरी ऊठ चल” ॥१६२॥</p>
<p>
	“बापूसाहेब न येणार आज । मी मेलों हा तयाचा समज । तूं तरी काकड आरती मज । करीं पूजन समवेत” ॥१६३॥</p>
<p>
	तात्काळ नित्यक्रमानुसार । सवें घेऊनि पूजासंभार । लक्ष्मणमामा आले वेळेवर । पूजेसी सादर जाहले ॥१६४॥</p>
<p>
	ग्रामजोशी हे शिरडीचे । सखे मामा माधवरावांचे । पूजन करीत नित्य बाबांचें । प्रात:काळचे समयास ॥१६५॥</p>
<p>
	मामा मोठे कर्मठ ब्राम्हाण । प्रात:काळीं करूनि स्नान । करूनि धूतवस्त्रपरिधान । घेत दर्शन बाबांचें ॥१६६॥</p>
<p>
	पादप्रक्षालन गंधाक्षत - चर्चन । पुष्पपत्री तुलसीसमर्पण । धूप दीप नैवेद्य नीरांजन । दक्षिणाप्रदान मग करिती ॥१६७॥</p>
<p>
	प्रार्थनापूर्वक साष्टांग नमन । होतां घेती आशीर्वचन । मग समस्तां प्रसाद देऊन । तिलक रेखून ते जात ॥१६८॥</p>
<p>
	तेथूनि पुढें गजानन । शनिदेव उमारमण । मारुतिराय अंजनीनंदन । यांचें पूजन करीत ते ॥१६९॥</p>
<p>
	ऐसे सर्व ग्रामदेवां । नित्य पूजीत जोशीबुवा । म्हणोनि साग्र पूजा त्या शवा । प्रेमभावा आणिली ॥१७०॥</p>
<p>
	मामा आधींच निष्ठावंत । तयावरी साक्षात हा द्दष्टान्त । आले काकड आरती हातांत । केला प्रणिपात साष्टांग ॥१७१॥</p>
<p>
	मुखावरील वस्त्र काढून । करूनि सप्रेम निरीक्षण । करचरणक्षाळण शुद्धाचमन । सारिलें पूजन यथाविधि ॥१७२॥</p>
<p>
	मौलवी आदिकरूनि अविंध । स्पर्श कराया करिती प्रतिबंध । मामांनीं न मानितां लाविलें गंध । पूजाही सबंध सारिली ॥१७३॥</p>
<p>
	शव तरी तें समर्थांचें । आपुल्या आराध्यदैवताचें । हिंदूचें कीं अविंधाचें । नाहीं मामांचे स्वप्नींही ॥१७४॥</p>
<p>
	पूज्य शरीर असतां सजीव । तया पूजेचा केवढा उत्सव । तेंचि आतां होतां शव । पूजावैभव ना औपचारिक ॥१७५॥</p>
<p>
	तशांत पाहूनि बाबांचें चिन्ह । आधींच मामा दु:खानें खिन्न । करूं आले अखेरचें पूजन । पुनर्दर्शन दुर्लभ ॥१७६॥</p>
<p>
	भरले अश्रूंहीं लोचन । करवेना त्या स्थितीचें आलोचन । हस्तपाद कंपायमान । उदास मन मामांचें ॥१७७॥</p>
<p>
	असो वळलेल्या मुठी उघडून । विडा दक्षिणा त्यांत ठेवून । शव तें पूर्ववत झांकूत । मामा निघून मग गेले ॥१७८॥</p>
<p>
	पुढें मग दुपारची आरती । नित्याप्रमाणें मशिदींत वरती । बापूसाहेब जोग करिती । इतरांसमवेती साईंची ॥१७९॥</p>
<p>
	असो येयूनि पुढील वृत्त । पुढील अध्यायीं होईल कथित । कैसा बाबांचा देह संस्कारित । अति प्रशस्त स्थानांत ॥१८०॥</p>
<p>
	कैसी तयांची अति आवडती । बहुतां वर्षांची सांगाती । वीट भंगतां दुश्चिन्हस्थिती । देहान्त सुचविती जाहली ॥१८१॥</p>
<p>
	कैसा जो आला प्रसंग आतां । बत्तीस वर्षांपूर्वींच येता । ब्रम्हांडीं प्राण चढविला असतां । कठिण अवस्था देहासी ॥१८२॥</p>
<p>
	कैसे भक्त म्हाळसापती । अहोरात्र बाबांसी जपती । कैसी आशा सोडितां समस्तीं । अवचित मग पावती उत्थान ॥१८३॥</p>
<p>
	ऐसा आमरण ब्रम्हाचर्य । आचरला जो योगाचार्य । जो ज्ञानियांचा ज्ञानिवर्य । काय तें ऐश्वर्य वानावें ॥१८४॥</p>
<p>
	असो ऐसी जयाची महती । करूं तया सद्भावें प्रणती । दीन हेमाड अनन्यगती । शरण तयाप्रती येतसे ॥१८५॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । श्रीसाईनाथनिर्याणं नाम त्रिचत्वारिंशोत्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 Apr 2022 15:06:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 Apr 2022 16:04:43 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ४२]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-42-122042900047_1.html</link>
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      <description><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ४२
॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
ॐ नमो जी सद्नुरु दातारा । श्रीमद्नोदातटविहारा । ब्रम्हामूर्ते कौपीनांबरा । संतवरा नमो तुजा ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 42" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/29/full/1651224949-7433.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra Marathi adhyay 42" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	ॐ नमो जी सद्नुरु दातारा । श्रीमद्नोदातटविहारा । ब्रम्हामूर्ते कौपीनांबरा । संतवरा नमो तुजा ॥१॥</p>
<p>
	दावी भवनदी उतरूं दिना दे निजपदीं अवसरू । तो हा भक्तकाजकल्पतरू । संतावतारू साईंचा ॥२॥</p>
<p>
	गाताध्यायीं जाहले कथन । गोड कथा नवलविंदान । साईछबीचें जलनिमज्जन । टळूनि रक्षण झालें कसें ॥३॥</p>
<p>
	तैसीच एका भक्ताची कामना । साईंनीं पुरविली येऊनि स्वप्ना । लाविलें तया ज्ञानेश्वरीवाचना । देऊनि अनुज्ञा विस्पष्ट ॥४॥</p>
<p>
	सारांश गुरुकृपा - उजियेडें । फिटे भवभयाचें सांकडें । नि:श्रेयसमार्गद्वार उघडे । असुख रोकडें सुख होय ॥५॥</p>
<p>
	नित्य स्मरतां सद्नुरुचरण । विरे विन्घांचें विन्घपण । मरणासीही येईल मरण । पडे विस्मरण बवदु:खा ॥६॥</p>
<p>
	म्हणोनि या समर्थाची कथा । श्रोतां परिसिजे आपुलाल्या हिता । जयाचिया श्रवणें तत्त्वतां । अति पावनता लाधेल ॥७॥</p>
<p>
	आतां ये अध्याय़ीं आपण  । करूंया साईस्वभावनिरूपण । कैसें मनाचें तीव्रपण । अथवा मवाळपण तयांचें ॥८॥</p>
<p>
	आतां चित्त करूनि समाहित । परिसिलें आतांपर्यंत आचरित । तैसेंच बाबांचें देहोत्सर्ग - चरित । तेंही सुचित्त अवधारा ॥९॥</p>
<p>
	धन्य धन्य शिरडीचे लोक । जयां बाबांचें सहवाससुख । अर्ध - शतकाहुनीही अधिक । अति सुखकारक जाहलें ॥१०॥</p>
<p>
	शके अठाराशें चाळिसांत । दक्षिणायन प्रथम मासांत । विजयादशमी शुक्लपक्षांत । दिवसा देहान्त बाबांचा ॥११॥</p>
<p>
	नऊ तारीख मुसलमानी । कत्तलची रात्र तया दिनीं । तिसरे प्रहरीं साईनाथांनीं । केली निर्याणीं तयारी ॥१२॥</p>
<p>
	बुद्धाची तैं बुद्धजयंती । साईंची तैं पुण्यतिथी । देवादिकांची जी जयंती । तीच पुण्यतिथी संतांची ॥१३॥</p>
<p>
	साडेबारांचा घंटा पडला । दशमीचा काळ संपूर्ण झाला । एकादशी आली उदयाला । निर्याणकाला एकादशीं ॥१४॥</p>
<p>
	सूर्योदयाची उदयतिथी । तीच दसर्‍याचि तिथी मानिती । म्हणोनि विजयादशमी धरिती । उत्सव करिती ते दिनीं ॥१५॥</p>
<p>
	मंगळवार कक्तलची रात । ऐसा तो दिव्स अति विख्यात । म्हणवूनि ते दिनीं साई महंत । ज्योतींत ज्योत मिळविती ॥१६॥</p>
<p>
	वंगदेशींचा प्रसिद्ध सण । दुर्गापूजा - समाप्तिदिन । तो हा उत्तर हिंदुस्थानामधून । उत्सवदिन सकळांचा ॥१७॥</p>
<p>
	शके अठराशें अडतिसीं । विजयादशमीचेच दिवशीं । सायंकाळीं प्रदोषसमयासी । भविष्यासी सूचविलें ॥१८॥</p>
<p>
	कैसें ती कथितों अपूर्व लीला । होईल विस्मय श्रोतयांला । समर्थ साईंच्या अकळ कळा । तेणें सकळां कळतील ॥१९॥</p>
<p>
	इसवीसन एकूणीसशें सोळा  । सण दसरा शिलंगण वेळा फेरी परतातां सायंकाळा । लीला अद्भुत वर्तली ॥२०॥</p>
<p>
	नभप्रदेशीं मेघ गडगडे । अवचित विद्युल्लता कडकडे । तेवीं जमदग्नी - स्वरूप रोकडें । प्रकट केलें बाबांनीं ॥२१॥</p>
<p>
	सोडोनि शिरींचा सुडका । काढूनि कफनी तडकाफडका । फेडूनि कौपीन लंगोटा । केला भडका धुनींत ॥२२॥</p>
<p>
	आधींच तो अन्गि सोज्ज्वळ । साध्य होतां आहुती प्रबळ । उसळला शिखांचा कल्लोळ । भक्तांस घोळ पडियेला ॥२३॥</p>
<p>
	हें सर्व घडले अवचितीं । नकळे काय बाबांचे चित्तीं । शिलंगणकाळींची ती वृत्ति । महद्भीतिप्रद होती ॥२४॥</p>
<p>
	अग्नीनें पसरिलें निजतेज । त्याहूनि बाबा दिसले सतेज । झांकोळले नयन सहज । पराङमुख जन झाले ॥२५॥</p>
<p>
	संतहस्तींचें हें अवदान । सेवूनि प्रसन्न अग्निनारायण । दिगंबर बनले ते जामदग्य । धन्य नयन देखत्यांचे ॥२६॥</p>
<p>
	त्वेषें टवकारिले नयन । क्रोधें झाले आरक्त नयन । म्हणती “करा रे आतां निदान । मी मुसलमान कीं हिंदू” ॥२७॥</p>
<p>
	गर्जोनि बाबा वदती “पहा जी । मी हिंदू कीं यवन आजी । निर्धारा यथेच्छ मनामाजी । आशंका घ्या जी फेडूनियां” ॥२८॥</p>
<p>
	देखावा हा अवलोकून । मंडळी झाली कंपायमान । होईल कैसें शांतवन । नित्य चिंतन चाललें ॥२९॥</p>
<p>
	भागोजी शिंदा महाव्याधिष्ट । परी बाबांचा भक्त श्रेष्ठ । धीर केला आला निकट । नेसवी लंगोट बाबांसी ॥३०॥</p>
<p>
	म्हणे बाबा हें काय चिन्ह । आज शिलंगण दसर्‍याचा सण । म्हणती माझें हेंच शिलंगण । हाणित्ती सणसण सटक्यानें ॥३१॥</p>
<p>
	एणेपरी धुनीपाशीं । उभे बाबा दिगंबरवेषी । चावडी होती ते दिवशीं । घडते कैशी हे चिंता ॥३२॥</p>
<p>
	नवांची चावडी दहा झाले । परी बाबा नाहीं स्थिरावले । लोक जागजागीं तटस्थ ठेले । टकमक उगले पाहती ॥३३॥</p>
<p>
	होतां होतां झाले अकरा । बाबाही तेव्हां निवळले जरा । नेसोनियां लंगोटा कोरा । कफनी पेहराव मग केला ॥३४॥</p>
<p>
	चावडीची घंटा झाली । मंडळी होती तटस्थ बैसली । पालखी फुलांनीं शृंगारिली । अंगणीं आणिली आज्ञेनें ॥३५॥</p>
<p>
	रजतदंड पताका चवरी । छत्रध्वजादि राजोपचारीं । शृंगारिलीसे मिरवणूक - स्वारी । निघे बाहेरी एकांतरा ॥३६॥</p>
<p>
	झाला एकचि महागजर । साईनाथांचा जयजयकार । काय वर्णावा तो गिरागजर । आनंदा पूरलोटला ॥३७॥</p>
<p>
	मग शोधूनि शुभ्र धडका । बाबा डोक्यास गुंडिती फडका । घेती चिलीम - तमाखू सटका । जणूं तोच नेटका सुमुहूर्त ॥३८॥</p>
<p>
	कोणी छत्री कोणी चवरी । कोणी मोरचलें साजिरीं । कोणी गरुडटके अबदागिरी । घेती निजकरीं वेत्रदंड ॥३९॥</p>
<p>
	एणेपरी करूनियां मीस । बाबांनीं सुचविलें सर्वत्रांस । भवसागर - सीमोल्लंघनास । दसराच एक सुमुहूर्त ॥४०॥</p>
<p>
	तदनंतर एकचि दसरा । बाबांनीं दाखविला शिरडीकरां । पुढीलचि दसरा सुमुहूर्त बरा । देह धरार्पण केला कीं ॥४१॥</p>
<p>
	हें न केवळ सूचविलें । स्वयें अनुभवा आणूनि दाविलें । निजदेह शुद्ध वस्त्र वाहिलें । योगाग्नींत हविलें येच दिनीं ॥४२॥</p>
<p>
	सन एकोणीसशें अठरा । ते सालींचा तो सण दसरा । तोच सुमुहूर्त केला खरा । निज - परात्परा समरसले ॥४३॥</p>
<p>
	ऐसीच बाबांची आणीक प्रचीती । लिहितां लिहितां आठवली चित्तीं । कीं याच विजयादशमीची तिथी । निश्चित होती आधींच ॥४४॥</p>
<p>
	सिर्डीचे पाटील रामचंद्र दादा । झाले अति दुखणाईत एकदां । जीवास सोसवती न आपदा । अति तापदायक भोक्तृत्व ॥४५॥</p>
<p>
	उपाय कांहीं बाकी न राहिला । पडेना जंव दुखण्यास आळा । आला जीविताचा कंटाळा । अति कदरले पाटील ॥४६॥</p>
<p>
	होतां ऐसी मनाची स्थिती । एके दिवशीं मध्यरातीं । एकाएकीं बाबांची मूर्ति । त्यांचे उशागती प्रकटली ॥४७॥</p>
<p>
	तंव ते पाटील पाय धरिती । निराश होऊनि बाबांस वदती । कधीं येईल मज मरण निश्चिती । एवढेंच मजप्रती वद जी ॥४८॥</p>
<p>
	आला आतां जीवाचा वीट । नाहीं मज मरणाचें संकट । मरण कधीं मज देईळ भेट । पाहें मी वाट एवढीच ॥४९॥</p>
<p>
	तंव त्या बाबा करुणामूर्ति । म्हणती न करीं चिंता चित्तीं । टळली तुझी गंडांतरभीति । किमर्थ खंती करिसी रे ॥५०॥</p>
<p>
	तुजला नाहीं कंहींच भीती । तुझी हुंडी परतली पुरती । परी न तात्याची धडगती । दिसे मजप्रती रामचंद्रा ॥५१॥</p>
<p>
	शके अठाराशें चाळीस । दक्षिणायन आश्विणायन आश्विनमास । विजयादशमी शुक्लपक्ष । पावेल अक्षयपद तात्या ॥५२॥</p>
<p>
	परी न बोलावें तयापाशीं । हाय घेऊनि बैसेल जीवाशीं । झुरणीस पडेल अहर्निशीं । मरण कोणासी आवडेना ॥५३॥</p>
<p>
	अवघीं दोनच वर्षें उरलीं । तात्याचीवेळा जवळी आली । रामचंद्रास काळजी उद्भवली । बाबांची बोली वज्रलेप ॥५४॥</p>
<p>
	तात्यापासोनि गुप्त ठेवली । बाळा शिंप्याचे कानीं घातली । कोणी न कळवावी प्रार्थना केली । चिंता ती लागली उभयांतें ॥५५॥</p>
<p>
	खरेंच रामचंद्र पाटील उठला । त्याचा बिछाना तेथूनि सुतला । दिवस मोजतां मोजतां लोटला । नकळत गेला तो काळ ॥५६॥</p>
<p>
	नवल बाबांचे बोलाचा ताळा । चाळीसाचा भाद्रपद सरला । मास आश्निन डोकावूं लागला । तात्याबा पडला पथारीवर ॥५७॥</p>
<p>
	तिकडे तात्या तापानें आजारी । इकडे बाबांस भरली शिरशिरी । तात्याचा भरंवसा बाबांवरी । बाबांचा श्रीहरि रक्षिता ॥५८॥</p>
<p>
	सुटेना तात्याचा बिछाना । येववेना बाबांचे दर्शना । अनिवार देहाच्या यातना । सोनवेना तयातें ॥५९॥</p>
<p>
	एक तो निजव्यथाव्यथित । बाबांपाशीं लागलें चित्त । नाहीं चालवत ना हालवत । दुखणेंही वाढत गेलें तें ॥६०॥</p>
<p>
	इकडे बाबांचें कण्हणें कुंथणें । दिवसेंदिवस वाढलें द्विगुणें । हां हां म्हणतां तेंही दुखणें । अनावरपणें हटेना ॥६१॥</p>
<p>
	म्हणतां म्हणतां जवळ आला । दिवस बाबांनीं जो भाकित केला । बाळा शिंप्यास घाम सुटला । तैसाच पाटिला रामचंद्रा ॥६२॥</p>
<p>
	म्हणती बाबांचें खरें होतें । ऐसेंच आतां वाटूं लागलें तें । बरनें न कीं हें चिन्ह दिसतें । प्रमाण वाढतेंच दुखण्याचें ॥६३॥</p>
<p>
	झालें आली शुद्ध दशमी । नाडी वाहूं लागली कमी । तात्या पडला मरणसंभ्रमीं । आप्तेष्ट श्रमी जाहले ॥६४॥</p>
<p>
	असो पुढें नवल वर्तलें । तात्यांचेंही गंडांतर टळलें । तात्या राहिले बाबाच गेले । जणुं मोबदले केले कीं ॥६५॥</p>
<p>
	पह आतां बाबांची वाणी । नांव दिधलें तात्याचें लावुनी । केली तयारी निजप्रयाणीं । वेळा न चुकवुनी अणुभर ॥६६॥</p>
<p>
	नाहीं म्हणावें तरी ही सूचना । देउनी आणिलें भविष्य निदर्शना । गोष्ट घडेपर्यंत ही रचना । दिसली न मना कवणाचे ॥६७॥</p>
<p>
	जन म्हणती तात्यांचें मरण । निजदेहाचा बदला देऊन । बाबांनीं ऐसें केलें निबारण । तयांचें विंदान त्यां ठावें ॥६८॥</p>
<p>
	बाबांनीं देह ठेविल्यारातीं । अरुणोदयीं सुप्रभातीं । बाबा स्वप्नांत पंढरपुराप्रती । द्दष्टान्त देती गणुदासा ॥६९॥</p>
<p>
	“मशीद पडली ढांसळोनी । अवघे शिरडीचे तेली वाणी । त्रासवूनि सोडिलें मजलागुनी । जातों तेथूनि मी आतां ॥७०॥</p>
<p>
	म्हणोनि आलों येथवरी  । फुलांही मज ‘बख्खळ’ ड्बरी । इच्छा एवढी पुरी करीं । चल झडकरी शिरडींत” ॥७१॥</p>
<p>
	इतुक्यांत शिरडीहून पत्र जातां । कळली बाबांची समाधिस्थता । ऐकूनि गणुदास निघाले ही वार्ता । क्षण न लागतां शिरडीस ॥७२॥</p>
<p>
	सर्वें घेऊनि शिष्यपरिवार । येऊनियां समाधीसमोर । मांडिला कीर्तन - भजनगजर । अष्टौप्रहर नामाचा ॥७३॥</p>
<p>
	हरिनामाचा कुसुमहार । स्वयें गुंफोनि अति मनोहर । प्रेमें चढविला समाधीवर । अन्नसंतर्प्ण समवेत ॥७४॥</p>
<p>
	ऐकतां नामच गजर अकुंठ । शिरडी गमली भूबैकुंठ । नामघोषाची भरली पेठ । करविली लूट गणुदासीं ॥७५॥</p>
<p>
	दसर्‍याचीच कां बाबांस प्रीति । कीं तो मुहूर्त साडेतीन मुहूर्तीं । शुभ्रकाळ विशेषें प्रयाणकृत्यीं । हें तों विश्रुत सकळांतें ॥७६॥</p>
<p>
	हेंही बोअलणें नाहीं र्पमाण । जयास नाहीं गमनागमन । तयास कोठूनि असेल निर्याण । मुहूर्तप्रयोजन काय त्या ॥७७॥</p>
<p>
	जया न धर्माधर्मबंधन । जाहलें सकल बंधोपशमन । जयाचे प्राणास नाहीं उत्क्रमण । तयासी निर्याण तें काय ॥७८॥</p>
<p>
	“ब्रम्हौव सन्ब्रम्हाप्येति” । ऐशिया साईमहाराजांप्रती । नाहीं आगती अथवा गती । निर्याण स्थिती कैंची त्यां ॥७९॥</p>
<p>
	असो उत्तर वा दक्षिणायन । करणेंच नाहीं जया प्रयाण । ठायींच समरसती जयाचे प्राण । दीपनिर्वाणसम काळें ॥८०॥</p>
<p>
	देह तो आहे उसनवारि । पंचभूतांची सावकारी । निजस्वार्थ साधलियावरी । परतणें माघारीं ज्याचा त्या ॥८१॥</p>
<p>
	यापुढील होणाराचें सूचक । आधींच बाबांनीं दाविलें कौतुक । निघूनि गेली वेळ अमोलिक । कीर्ति स्थाईक राहिली ॥८२॥</p>
<p>
	ज्वर आलियाचें निमित्त । लौकिकी रीतीचा अनुकार करीत । कधीं कुंथत, कधीं कण्हत । सदैव सावचित्त अंतरीं ॥८३॥</p>
<p>
	दिवसा अष्ट घटका भरतां । निर्य़ाणकाळ निकट येतां । उठूनि बैसले ते निजसत्ता । अविकळ चित्तामाझारीं ॥८४॥</p>
<p>
	पाहोनि बाबांची तईं मुद्रा । भरती आली आशासमुद्रा । कीं ती वेळा भयंकर अभद्रा । टळली समग्रां वाटलें ॥८५॥</p>
<p>
	असो यापरी करीत खंत । सर्व बैसले असतां सचिंत । पातला बाबांचा निकट अंत । घडल वृत्तांत परिसा तो ॥८६॥</p>
<p>
	क्षणैक अवकाश प्राणोत्क्रमणाला । नकळे काय आलें मनाला । हस्त कफनीचे खिशांत घातला । ती धर्मवेळा जाणोनि ॥८७॥</p>
<p>
	लक्ष्मी नामें सुलक्षणी । नामासारिखी जिची करणी । नित्य निरत जी साईचरणीं । ती सन्निधानीं तैं होती ॥८८॥</p>
<p>
	तिजला कांहीं द्रव्यदान । बाब करीत अति सावधान । क्षणांत होणार देहावसान । चुकले कळून बाबंना ॥८९॥</p>
<p>
	हीच लक्ष्मीबाई शिंदे । बबांपाशीं मशिदीमध्यें । अक्षयी कामकाजासंबंधें । नेमनिर्बंधें वर्ततसे ॥९०॥</p>
<p>
	दिवसा नित्य हे परिपाटी । दरबार खुला सर्वांसाठीं । बहुश: कोणा न आडकाठी । मर्यादा मोठी रात्रीची ॥९१॥</p>
<p>
	सायंकाळची फेरी जैं सरते । तेथूनि मंडळी घरोघर परते । ती जंव दुसरे दिवशीं उजाडतें । तेव्हांच येते मशीदीं ॥९२॥</p>
<p>
	परी भगत म्हाळसापती । दादा लक्ष्मी यांची भक्ती । पाहूनि तयांस रात्रीच्याही वक्तीं । मनाई नव्हती बाबांची ॥९३॥</p>
<p>
	हीच लक्ष्मी अतिप्रीतीं । प्रत्यहीं पाठवी बाबांप्रती । भाजी भाकर वेळेवरती । सेवा ही किती वानावी ॥९४॥</p>
<p>
	या भाकरीचा इतिहास परिसतां । कळूं सरेल बाबांची दयार्द्रता । श्वानसूकरीं बाबांची ऐक्यता । आश्चर्य चित्ता होईल ॥९५॥</p>
<p>
	बाबा एकदां सायंकाळीं । भिंतीस टेकून वक्ष:स्थळीं । वार्ता चालतां प्रेमसमेळीं । लक्ष्मी आली ते स्थानीं ॥९६॥</p>
<p>
	तात्या पाटील जवळ होते । आणीक वरकड असतां तेथें । लक्ष्मीनें अभिवंदिलें बाबांतें । बाबा तियेतें तंव वदती ॥९७॥</p>
<p>
	“लक्ष्मी लागलीसे भूक मातें” । बाबा मी भाकर घेऊनि येतें । निघालें ही आतां आणितें । ऐसीच जातें माघारीं ॥९८॥</p>
<p>
	ऐसें म्हणूनि विघूनि गेली । भाकर्‍या भाजूनि घेऊनि परतली । कोरडयासमवेत अविलंबें आली । सन्मुख ठेविली ती न्याहारी ॥९९॥</p>
<p>
	बाबांनीं तें पान उचलिलें । कुत्र्यासमोर तैसेंच मांडिलें । बाबा हें काय आपण केलें । लक्ष्मीनें पुसिलें तात्काळ ॥१००॥</p>
<p>
	मी जी इतुकी गेलें सत्वरी । हातोहातीं भाजिल्या भाकरी । तयांची ही काय नवलपरी । श्वानाची खरी धन केली ॥१०१॥</p>
<p>
	लागली होती तुम्हांस भूक । त्या भुकेचें हें काय कौतुक । वदनीं सुदिला न एकही कुटक । लाविली चुटक मज ॥१०२॥</p>
<p>
	मग बाबा तियेस वदती । “व्यर्थ कशाची करितेस खंटी । या कुत्र्याची जे उदरपूर्ती । माझीच तृप्ति ती जाण ॥१०३॥</p>
<p>
	या श्वानाचा जीव नाहीं का । प्राणिमात्राच्या एकच भुका । जरी तो मुका आणि मी बोलका । मेद असे का भुकेंत ॥१०४॥</p>
<p>
	क्षुधेनें व्याकूळ जयाचे प्राण । तयांस देती जे अन्नावदान । माझिया मुखींच तें सूदिलें जाण । सर्वत्र प्रमाण मानीं हें” ॥१०५॥</p>
<p>
	प्रसंग सोपा व्यवहाराचा । बोध अवघा परमार्थाचा । ऐसी उपदेशपर साईंची वाचा । प्रेमरसाचा परिपाक ॥१०६॥</p>
<p>
	बोलूनि सोपी प्रपंचभाषा । आंखीत परमार्थरूपरेषा । न काढितां कोणाच्या वर्मा दोषा । शिष्यसंतोषा राखीत ॥१०७॥</p>
<p>
	तेथूनियां उपदेशानुसार । सुरू झाली लक्ष्मीची भाकर । करूनि ठेवी दुग्धांत कुस्कर । प्रेमपुस्सर प्रत्यहीं ॥१०८॥</p>
<p>
	पुढें बाबाही भक्तिप्रेमें । भाकर ती खाऊं लागले नियमें । वेळीं होतां विलंब न करमे । जेवण न गमे बाबांस ॥१०९॥</p>
<p>
	होतां लक्ष्मीच्या भाकरीस वेळ । जरी पात्रें तैं वाढिलीं सकळ । जेवावयाचा टळेना काळ । मुखीं न कवळ घालीत ॥११०॥</p>
<p>
	निवून जाईल पात्रींचें अन्न । भुकेनें बसतील खोळंबून । परी लक्ष्मीची भाकर आलियावीण । अन्नसेवन होईना ॥१११॥</p>
<p>
	पुढें कांहीं दिव्सवरी । बाबांनीं प्रत्यहीं तिसरे प्रहरीं । शेवया मागवाव्या लक्ष्मीच्या करीं । सेवाव्या शेजारीं बैसून ॥११२॥</p>
<p>
	बाबा सेवीत अति परिमित । शेष राधाकृष्णेस देत । याच लक्ष्मीचे हस्तें देववीत । उच्छिष्टप्रीत बहु तिजला ॥११३॥</p>
<p>
	असतां चालली देहविसर्जनवार्ता । ही भाकरीची भाकडकथा । किमर्थ ऐसें न म्हणिजे श्रोतां । साईव्यापकतानिदर्शक हे ॥११४॥</p>
<p>
	हें सकल द्दश्य चराचर । याच्याही पैल परात्पर । साई भरलासे निरंतर । जो अज अमर तो साई ॥११५॥</p>
<p>
	हें एक तत्त्व या कथेच्या पोटीं । ऐसी ही गोड लक्ष्मीची गोठी । सहज स्मरली उठाउठी । श्रोतयांसाठींच मी मानीं ॥११६॥</p>
<p>
	असो ऐसी लक्ष्मीची सेवा । कैसा विसर साईंस व्हावा सावधानाचा काय नवलावा । वृत्तांत परिसावा सादरता ॥११७॥</p>
<p>
	जरी आला कंठीं प्राण । शरीर विगलित नाहीं त्राण । बबा निजहस्तें करिती दान । देहावसानसमयीं तिस ॥११८॥</p>
<p>
	एकदां पांच एकदां चार । रुपये खिशांतूनि काढूनि बाहेर । ठेवीत तियेचे हातांवर । तीच कीं अखेर बाबांची ॥११९॥</p>
<p>
	कीं ही नवविधा - भक्तीची खूण । किंवा नवरात्र - अंबिकापूजन । झालें आज आहे शिलंगण । सीमोल्लंघन - दक्षिणा ही ॥१२०॥</p>
<p>
	किंवा श्रीमद्भागवतीं । श्रीकृष्णें कथिली उद्धवाप्रती । ती नवलक्षण शिष्यस्थिती । तियेची स्मृती देत बाबा ॥१२१॥</p>
<p>
	एकादशाच्या दशमाध्यायीं । षष्ठ्मश्लोकाची पहा नवलाई । शिष्यें कैसी करावी कमाई । कवण्या उपायीं वर्तावें ॥१२२॥</p>
<p>
	आधीं पूर्वार्धीं कथिलीं पांच । उत्तरार्धीं चारचि साच । बाबाही धरिती क्रम असाच । वाटे जणूं हाच हेतु पोटीं ॥१२३॥</p>
<p>
	अमानीं दक्ष निर्मत्सर । शिष्य निर्मम गुरुसेवापर । असावा परमार्थजिज्ञासातत्पर । निश्चल अंतर जयाचें ॥१२४॥</p>
<p>
	जया ठावी नाहीं असूया । वाचाविग्लापन करी न वायां । इंहीं लक्षणीं । निजगुरुराया । संतोषवाया झटावें ॥१२५॥</p>
<p>
	हाच श्रीसाईनाथांचा हेत । ऐसिया रूपीं व्यक्त करीत । केवळ स्वकीय भक्तहितार्थ । करुणावंत संत सदा ॥१२६॥</p>
<p>
	लक्ष्मी खाऊनि पिऊनि सधन । नवांची कथा काय तिजलागून । तीही तितुके टाकील ओवाळून । तथापि तें दान अपूर्व तिस ॥१२७॥</p>
<p>
	परम थोर भाग्यें आगळी । तेणेंच ऐशिया कृपेची नवाळी । पावती झाली नवरत्नावली । निजकरकमळीं साईंच्या ॥१२८॥</p>
<p>
	गेले जातील कितीसे नव । परी हें दान अति अभिनव । कीं जों तिचा जीवांत जीव । देईल कीं आठव साईंची ॥१२९॥</p>
<p>
	आलें सन्निध देहावसान । तरीही राखूनि अनुसंधान । चारापांचाची सांगड घालून । आमरण स्मरण दिधलें तिस ॥१३०॥</p>
<p>
	ऐसा दावोनि सावधपणा । निकटवर्ती पाठविले भोजना । मात्र ग्रामस्थांतील एका दोघांना । बैसवितांना देखिलें ॥१३१॥</p>
<p>
	परी कांहीं प्रेमळ भक्तांनीं । हट्टचि धरिला कित्येकांनीं । जाऊं नये बाबांपासुनी । वेळ ती कठिण मानुनी ॥१३२॥</p>
<p>
	परी प्रसंगीं अंतसमयीं । पडेन काय मोहाचे अपायीं । म्हणोनियां जणूं घाईघाई । अवघियांही दवडिलें ॥१३३॥</p>
<p>
	निर्याणसमय निकट अति । जानोनि बुट्टी - काकादिकांप्रती । बाबा वाडियांत जा जा म्हणती । भोजनांतीं मग यावें ॥१३४॥</p>
<p>
	पाहोनि इतरांची ही व्यग्रता । बाबा दुश्चित्त निजचित्ता । जा जा जेवूनि या जा आतां । ऐसें समस्तां आज्ञापिती ॥१३५॥</p>
<p>
	ऐसें हें नित्याचें सांगती । सखे अहर्निस निकटवर्ती । जरी मनाची दुश्चित्तवृत्ति । आज्ञेनें उठती जावया ॥१३६॥</p>
<p>
	आज्ञा तरी नुल्लंगवे । वेळीं सान्निध्यही न त्यागवे । बाबांचें मनही न मोडवे । गेले वाडिया भोजन ॥१३७॥</p>
<p>
	भयंकर दुखण्याचेम प्रमण । कैचें जेवन कैचें खाण । बाबांपाशीं गुंतले प्राण । विस्मरण क्षण साहेना ॥१३८॥</p>
<p>
	असो जाऊनि जेवूं बैसले । इतुक्यांत मागूनि बोलावूं आले । अर्धपोटींच धांवत आले । तंव ते अंतरले भेटीला ॥१३९॥</p>
<p>
	आयुर्दायस्नेह सरतां । प्राणज्योती मंद होतां । बयाजीचे अंकावरता । देह विश्रामता पावला ॥१४०॥</p>
<p>
	नाहीं पडून वा निजून । स्वस्थपणें गादीसी बैसून । ऐसा स्वहस्तें धर्म करून । केलें विसर्जन देहाचें ॥१४१॥</p>
<p>
	समर्थांचें मनोगत । न होतां कोणासही अवगत । देह विसर्जिला हातोहात । ब्रम्हीभूत जाहले ॥१४२॥</p>
<p>
	घेऊनि देहमायोचि बुंथी । संत सृष्टीमाजी अवतरती । होतां उद्धार - कार्यपूर्ती । तात्काळ समरसती अव्यक्तीं ॥१४३॥</p>
<p>
	नट धरितो वेष नाना । अंतरीं पूर्ण जाणे आपणा । तया अवतारिया परिपूर्णा । सांकडें मरणाचें तें काय ॥१४४॥</p>
<p>
	लोकसंग्रहार्थ जो अवतरला । कार्य संपतां अवतार संपविला । तो काय जन्म - मरणाचा अंकिला । विग्रह स्वलीला धरितो जो ॥१४५॥</p>
<p>
	परब्रम्हा ज्याचें वैभव । तया कैंचा निधनसंभव । निर्ममत्व जयाचा अनुभव । कैंचा भवाभव त्या बाधी ॥१४६॥</p>
<p>
	दिसला जरी कर्मीं प्रवृत्त । कधीं न कर्में केलीं यत्किंचित । सदा कर्मीं अकर्म देखत । अहंकाररहितत्वें ॥१४७॥</p>
<p>
	“नाभुक्तं क्षीयते कर्म । हें तों स्मृत्युक्त कर्माचें वर्म । परी ब्रम्हाज्ञात्याचा न संभ्रम । देखे जो ब्रम्हाचि वस्तुमात्रीं ॥१४८॥</p>
<p>
	क्रियाकारक फलजात । हें तों अवघें प्रसिद्ध द्वैत । तेंही ब्रम्हाविद मानित । जेवीं कां रजत शुक्तिकेवरी ॥१४९॥</p>
<p>
	बाबांसारखी मायाळू जननी । पडली कैसी काळाचे वदनीं । दिवसा ग्रासी अंधारी रजनी । तैसीच ही कहाणी झाली कीं ॥१५०॥</p>
<p>
	आतां हा अध्याय संपवूं येथें । राखूं मासिक मर्यादेतें । अति विस्तारें दुश्चित्ततेतें । नातरी श्रोते पावतील ॥१५१॥</p>
<p>
	पुढील अवशेष निर्याणकथा । येईल यथाक्रम पुढें परिसतां । शरण हेमाड साईसमर्था । पावला कृतार्था यत्कृपें ॥१५२॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । श्रीसाईनाथनिर्याणं नाम द्विचत्वारिंशोत्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 Apr 2022 15:04:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 Apr 2022 16:05:02 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ४१]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-41-122042900045_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
हेंच सईकथेचें महिमान । कितीही परिसा नलगे प्रोत्साहन । श्रोतेच राखूनि पूर्वानुसंधान । अति सावधान श्रवणार्थीं ॥१॥]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 41" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/29/full/1651224830-2674.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra chapter 41" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	हेंच सईकथेचें महिमान । कितीही परिसा नलगे प्रोत्साहन । श्रोतेच राखूनि पूर्वानुसंधान । अति सावधान श्रवणार्थीं ॥१॥</p>
<p>
	करावया कथापान । जेथें श्रोतेच सावधान । किमर्थ मग प्रार्थवें अवधान । वृत्ति जैं एकतान आधींच ॥२॥</p>
<p>
	गातां परिसतां निजगुरुमहती । होईल निर्मळ चित्तवृत्ती । द्दढा ध्यान नामानुवृत्ती । सुखैकमूर्ती प्रकटेल ॥३॥</p>
<p>
	गताध्यायीं जाहलें कथन । कैसें एका व्रताचें उद्यापन । तथासांग जाहलें पूर्ण । द्दष्टान्तखूणसमवेत ॥४॥</p>
<p>
	तैसीच साईंची पार्थिव छबी । कवण्यापरी आकस्मित यावी । कैसी वेळेवर इच्छा पुरवावी । कथा परिसावी ही आतां ॥५॥</p>
<p>
	एका होळीचिया सणा । येतों मी आज घालीं भोजना । साई ऐसिया देऊनि स्वप्ना । होय मनकामना पुरविता ॥६॥</p>
<p>
	कथा ही पूर्वींच कथिली सविस्तर । परी ती प्रतिमा कैसी वेळेवर । यावी हा कैसा काय चमत्कार । तें आज सादर परिसावें ॥७॥</p>
<p>
	कथा सांगे अल्ली महंमद । वाटली परम आश्चर्यप्रद । ही तरी एक लीलाच विशद । अति विनोदकारक ॥८॥</p>
<p>
	यांनींच ती होळीच्या दिवसीं । आम्ही दुपारा जेवावयासी । बैसावयाचे ऐन समयासी । आणूनि उल्लासित केलें मज ॥९॥</p>
<p>
	हें तों पूर्वील कथानुसंधान । आतां श्रोतां सावधान । परिसिजे पुढील निरूपण । चरित्र पावन साईंचें ॥१०॥</p>
<p>
	ती ही कथा सरस पूर्ण । श्रोते आधींच दत्तावधान । वक्ता साईपदीं लीन । चरित्र गहन साईंचें ॥११॥</p>
<p>
	परोपकाराची ती प्रतिमा । परोपकारार्थ झिजवी आत्मा । सदा सर्वदा निर्वैरधर्मा । अखंड सत्कर्मा वाहिला ॥१२॥</p>
<p>
	बरी वाईट कैसीही स्थिति । देहकर्में देहा न सुटती । परी ती लावा अंतर्वृत्ति । गुरुचरणीं प्रीतिपूर्वक ॥१३॥</p>
<p>
	मग निजभक्ताचा योगक्षेम । गुरु कैसा चालवी अविश्रम । तें गुरुचरणीं ठेवूनि प्रेम । पहा अत्युत्तम अनुभवें ॥१४॥</p>
<p>
	हे स्थिति मागितल्या न मिळे । ठायीं पडे गुरुकीर्तनमेळें । जें न महत्प्रयत्नेंही आतळे । तें गुरुकृपाबळें चालत ये ॥१५॥</p>
<p>
	धरोनियां दुरभिमान । करूं आले जे सूक्ष्मनिरीक्षण  । तेही सर्व परतले त्यक्ताभिमान । स्खायमान दर्शनसुखें ॥१६॥</p>
<p>
	यश - श्री - औदार्य - ज्ञान । शांति - वैराग्य हे षड्‌गुण । इंहीं श्रीसाई भगवंत पूर्ण । ऐश्वर्यें संपूर्ण हरि जैसा ॥१७॥</p>
<p>
	किती हो आमुचें भाग्य गहन । जेणें हा साई चैतन्यघन । विना अर्चन - पूजन - भजन । देई दर्शन आम्हांतें ॥१८॥</p>
<p>
	म्हणती भक्तीपाशीं देव । आम्हांपाशीं भक्तीचा अभाव । परी हा साई महानुभाव । कनवाळू स्वभाव दीनार्थ ॥१९॥</p>
<p>
	असो तो अल्लीच वदे जी आतां । श्रोतां साद्यंत ऐकिजे वार्ता । कळेल साईलीला - गहनता । आणीक निजसत्ता तयाची ॥२०॥</p>
<p>
	एके दिवशीं मुंबानगरीं । फिरत असतां रस्त्यावरी । चित्रें मनोहर आणि तसबिरी । विकणारा व्यापारी अवलोकिला ॥२१॥</p>
<p>
	चित्रें सुंदर नानापरींचीं । संता - महंता - अवलियांची । पाहोनि जाहली वृत्ति मनाची । कवणा कवणाचीं तीं पाहूं ॥२२॥</p>
<p>
	म्हणोनि एकेक पाहूं लागतां । आवडली ही तसबीर चित्ता । सर्वांहूनि तिची मोहकता । शिवाय ती आराध्य देवताही ॥२३॥</p>
<p>
	आधींच मनीं साईंची आवड । सन्मुख तयांची मूर्तीही उघड । पाहूनिग्यावया जहाली तांतड । किंमत मी रोकड मोजिली ॥२४॥</p>
<p>
	मग ती तसबीर आणिली घरीं । टांगूनि ठेविली  भिंतीवरी । आनंदें नित्य दर्शन करीं । प्रेमही मज भारी बाबांचें ॥२५॥</p>
<p>
	दिधली मीं ही तुम्हांपाशीं । तया आधीं तिसरे मासीं । आराम नव्हता माझिये जीवासी । राहिलों सहवासीं मेहुण्याच्या ॥२६॥</p>
<p>
	नूरमहमद पीरभॉय । मेहुणा हा मजला होय । सुजला होता माझा पाय । केला मज उपाय शस्त्रक्रियेचा ॥२७॥</p>
<p>
	ऐसा असतां दुखणाईत । तीन महिने राहिलों तेथ । कोणीच नव्हतें माझिये घरांत । या तीन महिन्यांत वस्तीस ॥२८॥</p>
<p>
	प्रसिद्ध बाबा अबदुल रहिमान । मौलाना साब महमद हुसेन । बाबासाई बाबा ताजुद्दिन । इंहीं न तें स्थान त्यागिलें ॥२९॥</p>
<p>
	हे सर्व आणि ऐसे च इतर । यांचीं छायाचित्रें भिंतीवर । होतीं माझिये घरांत मनोहर । सोडी न हें कालचक्र तयांही ॥३०॥</p>
<p>
	माझी इकडे ऐसी गती । चित्रांमागें कां साडेसाती । वाटे वस्तूसी होतां उत्पत्ती । प्रलयस्थितीही दुर्लंघ्य ॥३१॥</p>
<p>
	असो ऐसी असतां परिस्थिती । साईच कैसे त्यांतूनि चुकती । हें तों हा काळवरीही मजप्रती । कोणीही न सकती सांगावया ॥३२॥</p>
<p>
	येविषयींची समूळ कथा । विस्मय वाटेल तुम्हां परिसतां । कळेल साईंची स्थिरचरात्मकता । अतर्क्य विंदानता तयांची ॥३३॥</p>
<p>
	संतबाबा अबदुल रहिमान । यांचें एक चित्र लहान । महमदहुसेन थारियाटोपण  । यांचे स्वाधीन होतें कीं ॥३४॥</p>
<p>
	तेणें तयाची मज एक प्रत । दिधल्या जाहलीं वर्षें बहुत । ती मी माझे मेहुण्यास देत । कीं ते अंकित तयांचे ॥३५॥</p>
<p>
	तीही आठ वर्षेंपर्यंत । होती तयाचे मेजाचे खणांत । सहज एकदां आढळतां अवचित । नेली ती दुकानांत मुंबईस ॥३६॥</p>
<p>
	जितुके बाबा अबदुल मोठे । चित्रही करविलें तेवढें गोमटें । कीं तें न्यावें तयांचिया भेटे । प्रेमही दाटेल तदंतरीं ॥३७॥</p>
<p>
	तयावरूनि घेतल्या नकला । आप्तेष्टमित्रां दिधल्या सकळां । त्यांतीलचि एक दिधली मजला । होती मीं भिंतीला लाविलेली ॥३८॥</p>
<p>
	मग ती परम सुंदर तसबीर । भरतां अबदुल रहिमान दरबार । नूरमहमद जाहला तत्पर । करावया सादर त्या संता ॥३९॥</p>
<p>
	पाहूनि हें तयाचें मन । चित्र पाहतांच अबदुल रहिमान । जाहले अत्यंत कोपायमान । उठले त्या ताडण करावया ॥४०॥</p>
<p>
	करूनियां निर्भर्त्सन । दिधलें तयास घालवून । तेणें तो अत्यंत खिन्नवदन । चिंता गहन उद्भवली ॥४२॥</p>
<p>
	होतों आज गुरुकृपासंपन्न । तोच मी झालों रोषास कारण । ऐसें वदूनि साशंक होऊन । चित्रविसर्जन आरंभी ॥४३॥</p>
<p>
	म्हणे आतां या संतप्रतिमा । कधींही न घरीं ठेवितां कामा । तेणेंच अंतरलों निजगुरुपेमा । किमर्थ रिकामा ह धंदा ॥४४॥</p>
<p>
	म्हणे जया चित्राच्या पायीं । गुरु माझा मज नाराज होई । पाडील कधीं तरी तें अपायीं । तें मज नाहीं कामाचें ॥४५॥</p>
<p>
	हें तरी एक प्रतिमापूजन । नावडे मम गुरूलागून । तरी मग या नाराज ठेवून । चित्राचें प्रयोजन काय मज ॥४६॥</p>
<p>
	जाहला बहु द्रव्यव्यय । करावया या चित्रांचा संचय । तरी त्या आतां न दुजा उपाय । शिवाय तोयविर्जना ॥४७॥</p>
<p>
	म्हणोनि मग माझा मेहुणा । सवें घेऊनि ती छबी जाणा । न देतांही मागतिया कवणा । पातले विसर्जना धक्क्यावर ॥४८॥</p>
<p>
	गेले अपोलो बंदरीं थेट । ठरविली एक भाडयानें बोट । जाववेल तों जाऊनि थेट । समुद्रीं ती शेवट विसर्जिली ॥४९॥</p>
<p>
	असो ते येथेंच नाहीं थांबले । वांद्रें येथेंही तेंच आरंभिलें । सर्वां आप्तेष्टमित्रां विनविलें । फोटो घेतले मागून ॥५०॥</p>
<p>
	म्हणाले बाबा अबदुल कोपले । फोटो ज्यांणीं त्यांणीं आपले । परत द्यावे पाहिजे विसर्जिले । सकळां विनविलें एणेपरी ॥५१॥</p>
<p>
	मजकडूनही दिधलेली प्रत । घेतली माझे भावाचीही परत । बहिणीचीही केली हस्तगत । मिळविल्या समस्त सहा प्रती ॥५२॥</p>
<p>
	मग तो घेऊनि सहाही प्रती । वांद्रें शहरीं समुद्रावरती । थेट जेथें जमीन सरती । पातला ते प्रांतीं सरोष ॥५३॥</p>
<p>
	पाचारूनि एक कोळी । मग तीं अवघीं चित्रें ते काळीं । करूनियां तयाचे हवालीं । निक्षेपियेलीं अब्धिजलीं ॥५४॥</p>
<p>
	मीही तेव्हां व्यथाग्रस्त । होतों तयाचिया घरांत । मलाही तो ऐसेंच उपदेशीत । संकटें आणीत या प्रती ॥५५॥</p>
<p>
	तरी त्या अवघ्या गोळा करून । करिसील जेव्हां समुद्रीं विसर्जन । तेव्हांच तुझिया व्यथेचें निरसन । होईल जाण निर्धारें ॥५६॥</p>
<p>
	मीही माझा पाचारिला मेथा । किल्ली देऊन त्याचिये हाता । आणविल्या तसबिरी संतांच्या समस्ता । सोंपिली व्यवस्था मेहुण्यातें ॥५७॥</p>
<p>
	त्यानें आपुला बोलाविला माळी । तयाकरवीं त्या तात्काळीं । चिंबाईच्या देवळाजवळी । समुद्रजळीं निक्षेपविल्या ॥५८॥</p>
<p>
	पुढें जातां दोन मास । होतां आराम मम जीवास । जातां मी आपुलिया बिर्‍हाडास । अति आश्चर्यास पावलों ॥५९॥</p>
<p>
	तुम्हांस म्यां जी दिली तसबीर । ती द्वारासमोरचि भिंतीवर । पाहोनियां पूर्ववत स्थिर । वाटला मज थोर विस्मय ॥६०॥</p>
<p>
	अवघीं चित्रें मेथानें आणिलीं । हीच तसबीर कैसी कीं चुकली । म्हणोनि मीं ती तात्काळ काढिली । छपवूनि ठेविली कपाटीं ॥६१॥</p>
<p>
	पडतांच मेहुण्याची द्दष्टि । घेईल तो ती उठाउठीं । नेईल जलसमाधीसाठीं । ऐसें मज पोटीं वाटलें ॥६२॥</p>
<p>
	ठेवों न लाहे निजगृहातें । मेहुणा पाहताम्चि बुडवीत हातें । देवों न लाहे आणिकातें । नि:शंकचित्ते अभक्ता ॥६३॥</p>
<p>
	विना विचारें देईन कवणा । तरी न झालिया योग्य जोपासना । राहील अस्वस्थता सदैव मना । ही दीर्घ विवंचना सर्वदा ॥६४॥</p>
<p>
	तरी ती जेथें राहील सुरक्षित । पाहावें ऐसें स्थळ त्या उचित । ठेवील आपुले घरीं जो व्यवस्थित । तयाच्या हस्तगत करावी ॥६५॥</p>
<p>
	ऐसें मन पडतां अडकित्तां । साईच सुविचार सुचवी चित्ता ।  जावें मौलाना दरबारीं आतां । इसमूस वृत्तांत कथावें ॥६६॥</p>
<p>
	मग मी तेव्हां तैसाचि सत्वरी । गेलीं पीर मौलाना दरबारीं । मुजावर इस्मूस ही वार्ता सारी । कळविली अत्यादरीं एकांतीं ॥६७॥</p>
<p>
	आम्हां उभयतांचा निर्णय । आपुलेपाशीं राहील ही निर्भय । म्हणोनि ते दिनींच आम्ही उभय । केला कीं निश्चय मनाचा ॥६८॥</p>
<p>
	कीं ही समर्थ साईंची छबी । आपुले येथेंच ठेविली जावी । स्वयें आपणा समर्पावी । तेणेंच ती ठायीं पडेल ॥६९॥</p>
<p>
	तंव त्या कृतनिश्चयानुसार । केली ती प्रतिमा आपणं सादर । पाहूनि आपुलें जेवण तयार । तैसाच मी सत्वर परतलों ॥७०॥</p>
<p>
	ही लांब कथा परिसावयास । नव्हता आपणां तेव्हां अवकाश । पुढें मागें कथूं ती सावकाश । धरूनि हा उद्देश गेलें मी ॥७१॥</p>
<p>
	आज उद्यां करितां करितां । सबंध नऊ वर्षें भरतां । आज ही झाली भेट अवचिता । आपणां उभयतां परस्पर ॥७२॥</p>
<p>
	तेणें ही आठवली । पूर्वपीठिका । आपणही कथिलें स्वप्नकौतुका । संबंध जुळला अपूर्व कथानका । नाहीं अद्भुत कां ही लीला ॥७३॥</p>
<p>
	अतां एक द्जी कथा । सावध चित्तें परिसिजे श्रोतां । साई कैसे प्रेमळ भक्तां । अति सप्रेमता वागवीत ॥७४॥</p>
<p>
	जयां परमार्थीं खरी गोडी । तयांची साईस मोठी आवडी । वारूनि सर्व तयांचीं सांकडीं । स्वानंदजोडी दे तयां ॥७५॥</p>
<p>
	ये अर्थींचा अनुभव गोडा । बाळासाहेब देवांची होड । पुरविली पुरवूनि तयांचीं कोड । दिधली त्यां जोड भक्तीची ॥७६॥</p>
<p>
	दिवसा नोकरी केल्याशिवाय । योगक्षेमा नव्हता उपाय । परी रात्रौ परमार्थव्यवसाय । कराया व्यत्यय कां यावा ॥७७॥</p>
<p>
	इच्छा फारा दिवसांपासून । करावें नित्य ज्ञानेश्वरीवाचन । परी कांहीं ना कांहीं विन्घ । येऊनि तें हातून घडेना ॥७८॥</p>
<p>
	भगवद्नीता एक अध्याय । जैसा रोज नेमानें होय । तैसाच ज्ञानेश्वरीचा निश्चय । विनाअंतराय तगेना ॥७९॥</p>
<p>
	हातीं घेतां इतर ग्रंथ । नित्य नेमें वाचिले जात । ज्ञानेश्वरीवरी प्रबल हेत । नियम न जात तडीस ॥८०॥</p>
<p>
	घेऊनि रजा तीन मास । एकदां देव गेले शिर्डीस । तेथूनि निजगृहीं पौंडास । सुखें घ्यावयास विश्रांती ॥८१॥</p>
<p>
	तेथेंही इतर कार्यें झालीं । इतर नेमाची पोथी वाचिली । ज्ञानेश्वरीची हौस न पुरली । वेळ न आली तियेला ॥८२॥</p>
<p>
	हातीं घेतां ज्ञानेश्वरी । विकल्प कांही उठावे अंतरीं । जेणें वाचन होई वरिवरी । प्रेम अंतरीं उपजेना ॥८३॥</p>
<p>
	काय करूनि कासाविसी । केला निश्चय न पावे सिद्धीसी । पांच ओंव्याही नित्यनेमेंसीं । घडलें न प्रतिदिवशीं वाचावया ॥८४॥</p>
<p>
	प्रत्यहीं पांच ओंव्या निदान । निश्चय केला मनापासून । त्याही न नेमें मह्जहातून । उल्हासे वाचून जाहल्या ॥८५॥</p>
<p>
	म्हणोनि मग केला नेम ।  साईच जेव्हां देतील प्रेम । म्हणतील “वाच” तेव्हांच उपक्रम । करीन संभ्रमविरहित ॥८६॥</p>
<p>
	निष्ठा साईंच्या पायापाशीं । जेव्हा साई देतील आज्ञेसी । तेव्हांच वाचीन ज्ञानेश्वरीसी । कृतनिश्चयेंसीं बैसलों ॥८७॥</p>
<p>
	असो येतां महोदय पर्व । सवें मातोश्री भगिनी सर्व । पहावया गुरुपूजागौरव । पातले मग देव शिर्डीस ॥८८॥</p>
<p>
	कां हो आतांशा नाहीं वाचत । ज्ञानेश्वरी आपण नित्य । जोग तेथें देवांसी पुसत । प्रत्युत्तर देत तें परिसावें ॥८९॥</p>
<p>
	ज्ञानेश्वरीची मोठी हौस । परी न ती जाई सिद्धीस । आतां बाबाच जेव्हां वाचावयास । वदतील ते वेळेस वाचीन ॥९०॥</p>
<p>
	तंव जोग कथिती युक्ती । ज्ञानेश्वरीची आणूनि पोथी । द्यावी साईबाबांचिये हातीं । वाचावी ते देती तंव तुम्हीं ॥९१॥</p>
<p>
	नलगे मज कांहीं युक्ती । बाबा माझें अंतर जाणती ते कां न माझी अढी पुरविती । ‘वाच’ स्पष्टोक्ति वदतील ॥९२॥</p>
<p>
	घेतां समर्थांचें दर्शन । रुपया एक केला अर्पण । एकचि कां वीस आण । म्हणती त्यालागून तंव बाबा ॥९३॥</p>
<p>
	आणूनि वीस रुपये दिधले । रात्रीं बालकरामास भेटले । साईकृपा कैसी पावले । वृत्त त्यां पुसिलें पूर्वील ॥९४॥</p>
<p>
	उद्यां आरती झाल्यावरती । सांगेन मी सकळ तुम्हांप्रती । ऐसें बालकराम आश्वासिती । बरें म्हणती देव तयां ॥९५॥</p>
<p>
	पुन्हां देव दुसरे दिवशीं । जातां मशिदीं दर्शनासी । वीस रुपये गामितले त्यांशीं । दिधले सुखसंतोषीं देवांनीं ॥९६॥</p>
<p>
	पाहूनि तेथें अत्यंत भीड । देव राहिले बाजूस आड । बाबा पुसती कोठें रे सांगड । जागेंत अवघड तो ददला ॥९७॥</p>
<p>
	देती देव प्रत्युत्तर तेथें । बाबा हा मी आहें  ना येथें । कां सातचि ना झालेत देते । बाबा तंव तयांतें पुसतात ॥९८॥</p>
<p>
	देव वदती वीस दिधले । ‘पैसे कोणाचें’ बाबांनी पुसिलें । ‘बाबा आपुले’  तंव ते वदले । ‘कां मग सुटले पळत तुम्ही ॥९९॥</p>
<p>
	यावें ऐसें जवळ  यावें । स्वस्थ चित्तें निकट बैसावें’ । आज्ञेप्रमाणें केलें देवें । मनोभावें ते बैसले ॥१००॥</p>
<p>
	नित्यनेम आरती झाली । मंडळी स्वस्थानीं परतली । बाळकरामा - देवा गांठ पडली । पृच्छा ती आरंभिली पूर्वील ॥१०१॥</p>
<p>
	तयांचा पूर्ववृत्तांत पुसिला । तयांनीं तो साद्यंत कथिला । कैसें लावियलें उपासनेला । देव मग तयांला वदतात ॥१०२॥</p>
<p>
	केलें काय तुम्हां निवेदन । कैसें करावें ब्रम्हाचिंतन । करा कीं माझी जिज्ञासा पूर्ण । देव मग त्यांलागून प्रार्थिती ॥१०३॥</p>
<p>
	बालकरामही देवांप्रती । करावया तयांची जिज्ञासापूर्ती । उत्तर द्याया जों आरंभ करिती । बाबाच बोलाविती देवांस ॥१०४॥</p>
<p>
	कैसा साई परम लाघवी । चंद्रूस देवांतें बोलावूं पाठवी । देव न क्षण विलंब लावी । आले श्रीसाईंस भेटाया ॥१०५॥</p>
<p>
	झाले होते तीन प्रहर । मशिदीचिया तटावर । टेकूनियां दोन्ही कर । दिसले समोरचि श्रीसाई ॥१०६॥</p>
<p>
	देव जातांच केलें वंदन । बाबा तयांस पुसती प्रश्न । कोठें कोणासीं काय आपण । करीत संभाषण होतां कीं ॥१०७॥</p>
<p>
	मग देव उत्तर देती । काकांचिया माडीवरती । बालकरामाचिया संगती । आपुलीच कीर्ती परिसियली ॥१०८॥</p>
<p>
	रुपये आण पंचवीस । बाबा आज्ञापिती देवांस । आणूनियां तेच समयास । रुपये बाबांस समर्पिले ॥१०९॥</p>
<p>
	किती पुसती आणिलेस । देव वदती पंचवीस । बाबा म्हणती चल ये बैस । गेले तंव मशीदीस बाबांसह ॥११०॥</p>
<p>
	बाबा बैसले खांबापाशीं । दुजें न कोणीही मशीदीसी । म्हणती तुवां माझिये चिंधीसी । चोरियेलेंसी मज न कळतां ॥१११॥</p>
<p>
	मला चिंधी ठाऊक नाहीं । म्हणोनि देव देती ग्वाही । येथेंच कोठें तरी पाहीं । झाले मग साई वदते तया ॥११२॥</p>
<p>
	येथें आहे कोठें चिंधी । ऐसें देव वदले ते संधीं । बाबा उठले म्हणती तूं शोधीं । खोटी ही बुद्धी चोरीची ॥११३॥</p>
<p>
	कवण्या कारटयानें ती नेली । बघ बघ पाहिजे येथेंच असली । ऐकून देवांनीं आणीक शोधिली । नाहीं ती आढळली तरीही ॥११४॥</p>
<p>
	मग भ्रुकुटीस घालूनि आंकडे । पाहूनियां इकडे तिकडे । द्दष्टि टवकारुनी देवांकडे । साई कडकडे देवांवर ॥११५॥</p>
<p>
	म्हणे तूंच लबाड होसी । तुजवीण कोण ये  समयासी । येईल चिंधी चोरावयासी । चोर मी तुजसीच समजतों ॥११६॥</p>
<p>
	ऐसा येथें जो येतोस । तो काय चोर्‍या करावयास । झाले काळ्याचे पाढंरे केंस । खोड न लवलेश कीं जाई ॥११७॥</p>
<p>
	तुला कुर्‍हाडीनें हाणीन । तुला कापीन, ठार करीन । जाशील कोठें माझिया हातून । येईन मारीन तेथें तुज ॥११८॥</p>
<p>
	घरून येतोस जो शिरडीस । तो काय चोर्‍या करावयास । घे हे आपुले वापस । आणून चिंधीस दे माझ्या ॥११९॥</p>
<p>
	क्रोधें लाल झाले साई । दुद्धारियेली आई माई । शिव्या - शापांची लागली रय़ी । संतापें लाही जाहली ॥१२०॥</p>
<p>
	कोपले देखूनि साईनाथ । देव कौतुक पाहतात । उगचे उभे राहतात । आश्चर्यभरित मानसें ॥१२१॥</p>
<p>
	देव सन्निध आणि एकटे । पाळी माराची येणार वाटे । कीं हें विश्वरूपदर्शन गोमटें । जाणूनि दाटे आनंद ॥१२२॥</p>
<p>
	घेतील काय सटका आतां । करितील काय त्वेषें आघाता । एकला मी सांपडलों हाता । येईल चित्ता तें करो ॥१२३॥</p>
<p>
	परी हें चिंधीचें काय कोडें । तें तों देवांस कांहींही नुलगडे । जा निघून जा म्हणतां एकीकडे । तंव ते पायरीकडे सरकले ॥१२४॥</p>
<p>
	काय चिंधीचा गुह्यार्थ । जाणावया मी नाहीं समर्थ । पावेन साईकृपेचा स्वार्थ । तयीं तो श्रोत्यांर्थ निवेदीन ॥१२५॥</p>
<p>
	होतां अर्ध घटकाभर । आले देव बाबांसमोर । चालूच होता शिव्यांचा गजर । ‘आलास कां वर’ म्हणाले ॥१२६॥</p>
<p>
	‘जा हो चालता वाडियांत’ । म्हणतां देव आज्ञा वंदीत । नमन करूनि चरणांप्रत । पातले परत वाडियामाजीं ॥१२७॥</p>
<p>
	झालेली सर्व हकीकत  । घडली जैसी तैसी यथार्थ । जोगांस आणि बालकरामाप्रत । केली निवेदित साद्यंत ॥१२८॥</p>
<p>
	पुढें एक सबंध घटका । उडाला शिव्याशापांचा दणका । प्रहारा - दोंप्रहरांमागें मग लोकां । बाबाच अवलोका आमंत्रीत ॥१२९॥</p>
<p>
	देवही मग तेथें आले । इत्रांकाणीं जाऊन बैसले । म्हातार्‍याचिया जीवा लागलें । असेल मग बोले श्रीसाई ॥१३०॥</p>
<p>
	“चिंधीची ती कथा काय  । तरी म्यां दुरुक्तीं केलें घाय । होतीच चोरिली त्या काय उपाय । बोलल्याशिवाय रहावेना ॥१३१॥</p>
<p>
	असो अल्ला सारें बघील । तोडी तयाचें बरें करील । तंव ए भाऊ दक्षिणा देसील” । पुसती क्षमाशील श्रीसाई ॥१३२॥</p>
<p>
	किती आणूं देव पुसती । बारा घेऊनि येईं त्वरिती । पाहूं जातं नोटचि होती । रुपये न मिळती तियेचे ॥१३३॥</p>
<p>
	देवें तैसेंच बाबांस कथिलें । ‘राहूं दे मज नको’ ते वदले । ‘सकाळीं त्वां दोनदां दिधले । स्मरण न राहिलें मज त्याचें’ ॥१३४॥</p>
<p>
	तरीही देवांनीं रुपये मिळविले । बाबांलागीं आणूनि दिधले । सवें तयांचे चरणही वंदिले । परिसा मग निघाले जे बोल ॥१३५॥</p>
<p>
	“काय रे तूं करीत अससी” । ‘कांहीं नाहीं’ वादतां तयासी । पोथी वाचीत जा नेमेंसीं । केले देवांसी आज्ञापन ॥१३६॥</p>
<p>
	“वाडियामाजी जाऊनि बसावें । नित्यनेमें वाचीत जावें । वाचितांना सांगतही असावें । निरूपण भावें सकळिकां ॥१३७॥</p>
<p>
	सबंध भरजरी सुंदर शेला । बसलों असतां तुज द्यावयाला । जासी कां चिंध्या चोरावयाला । सवई कां तुजला चोरीची” ॥१३८॥</p>
<p>
	असो करावें पोथीवाचन । साईमुखींचे हें वचन । पावूनि माझी मी अंतरीं खूण । अतिसुखसंपन्न जाहलों ॥१३९॥</p>
<p>
	मानूनि ती आज्ञा प्रमाण । मग म्या तया दिवसापासून । नित्य ज्ञानेश्वरीचें वाचन । तैसेंच निरूपण आरंभिलें ॥१४०॥</p>
<p>
	मिळाली आज्ञा वांछिली आतां । फिटली व्रतस्थ मनाची चिंता । येथूनि मज ज्ञानेश्वरी वाचितां । येईल नियमितता वाचना ॥१४१॥</p>
<p>
	आतां मी गुर्वनुज्ञाधर । आतां प्रसन्न मज ज्ञानेश्वर । माजी पडलें जें झालें आजवर । वर्तणें अत:पर नियमानें ॥१४२॥</p>
<p>
	साक्ष मजला माझें मन । वरी साईआज्ञा प्रमाण । आज्ञाबळें पोथी पारायण । आतां मज निर्विन्घ घडेल ॥१४३॥</p>
<p>
	बाबा मी येतों लोटांगण । अनन्यभावें तुम्हां शरण । पदरीं घ्या या लेंकरा । आपण । करवूनि घ्या वाचन मजकरवीं ॥१४४॥</p>
<p>
	चिंधी तें काय ध्यानांत आलें । बालकरामास होतें जें पुसिलें । त्याच चिंध्या तेंच न रुचलें । साईंस, जैं भरले रागानें ॥१४५॥</p>
<p>
	कैसें तुम्हांस उपासनेस । कैसें परब्रम्हाचिंतनास । लाविलें म्हणूनि बालकरामास । पुसिलें तें बाबां नावडलें ॥१४६॥</p>
<p>
	वाटेल त्या प्रश्नाचें उत्तर । स्वयें द्यावया असतां तत्पर । किमर्थ चौकशा कराव्या परस्पर । म्हणोनि मज दुर्धर छळियेलें ॥१४७॥</p>
<p>
	‘छळियेलें’ हे बोलचि उद्धत । प्रेमें भक्तार्थ जो ओथंबत । भक्तच्छल ज्या स्वप्नींही न दिसत । छळणें त्या अनुचित क्रियापद ॥१४८॥</p>
<p>
	छळिलें नव्हे मज शिकविलें । चित्तीं तुझिया जें जें उद्भवलें । तें तें म्यां पाहिजे स्वयें पुरविलें । कधीं न चोरिलें कामा ये ॥१४९॥</p>
<p>
	साई बाह्यक्रोधाभिभूत । अंतरीं ते नित्य मुदित । बाह्यसंतापें दिसत संतप्त । अंतरीं ते तृप आनंदें ॥१५०॥</p>
<p>
	क्रोधाचें बाह्य लौकिक लाघव । अंतरीं पमानंद - गौरव । तया साईंचें लीलावैभव । गावया सुदैवचि पाहिजे ॥१५१॥</p>
<p>
	साधावया निजस्वार्थ । जयापोतीं अत्यंत आर्त । शिव्या पुष्पलाखोल्या मानीत । द्दष्टीं निजहिततत्पर ॥१५२॥</p>
<p>
	परिसूनि कर्णकटु अश्लील वचन । डळमळेना देवांचें मन । पोटीं प्रेमाचें भरतें गहन । वाटे तें ताडण पुष्पांचें ॥१५३॥</p>
<p>
	दुग्धें भरली धेनूची कांस । भाग्यवानास  लाभे गोरस । कांसेपासींच गोचिडा वास । अशुद्धचि कर्मास तयाच्या ॥१५४॥</p>
<p>
	दर्दुरा कमलकंदा शेजार । लुटी कमललमकरंद भ्रमर । दर्दुरा पंकाचा आहार । दैवास न पार भ्रमराच्या ॥१५५॥</p>
<p>
	तैसे तुम्ही भाग्यवान । तुम्हां आम्हां संनिधान । मानेल तें घ्या रे पुसून । शंकासमाधान साई वदे ॥१५६॥</p>
<p>
	पहा माझी पोथीची अढी । वाचीन ‘वाच’ वदतील ते घडी । तोंवर ज्ञानेश्वरी मी नुघडीं । पुरविली रोकडी बाबांनीं ॥१५७॥</p>
<p>
	कैसी माउली करी लाड । निजबालकाचे पुरवी कोड । तयाची ही प्रतीती गोड । भक्तीची जोड ही कथा ॥१५८॥</p>
<p>
	वाच म्हणूनि नाहीं थांबले । देव वदती वर्ष न उलटलें । स्वप्नीं येऊनि दर्शन दिधलें । आश्चर्य मज पुसिलें तें परिसा ॥१५९॥</p>
<p>
	सन एकूणीसशें चवदा । एप्रील दुसरी तारीख तदा । वार ग्रुरुवार उजाडतां एकदां । स्वप्नप्रसादा पावलों ॥१६०॥</p>
<p>
	समर्थ साई स्वप्नीं आले । आहेत माडीवरती बैसले । पोथी समजते कां मज विचारिलें । उत्तर दिधलें नकारीं ॥१६१॥</p>
<p>
	तैसाच प्रश्न झाला नंतर । मग ती केव्हां समजणार । आलें माझिया नेत्रांस नीर । काय म्यां प्रत्युत्तर दिधलें ॥१६२॥</p>
<p>
	कृपा आपुली झालियावीण । पोथी वाचणें केवळ शीण । समजणें तो त्याहूनही कठिण । बाबा मी निक्षून सांगतों ॥१६३॥</p>
<p>
	बाबा वदती “पोथी पढतां । फारचि आपण घाई करितां । वाचा पाहूं ती मजदेखतां । निकट बैसतां मजपाशीं” ॥१६४॥</p>
<p>
	काय वाचूं देव वदती । अध्यात्माची आज्ञा देती । देव पोथी आणूं जाती । नेत्र उघडती तात्काळ ॥१६५॥</p>
<p>
	देव तेव्हां जागे होती । स्वप्नस्थिती पाहुनी निश्चिती । काय वाटावें तयांचे चित्तीं । कल्पना श्रोतीं कीजे ती ॥१६६॥</p>
<p>
	पाहूनियां वर्षभर वाट । मानी कीं बाळ आज्ञा नीट । करितो कीं नित्य । चुके कोठें वा किनिमित्त । कवण हें सतत पाहील ॥१६८॥</p>
<p>
	वाचकें असावें कैसें दक्ष । ठेवणें कोठें विशेष लक्ष । साईमाउलीवीण प्रत्यक्ष । कवण ही साक्ष पटवील ॥१६९॥</p>
<p>
	ऐसी साईसमर्थलीला । ऐसा स्वानंदाचा सोहळा । भक्तीं भोगिला असंख्य वेळां । देखिला म्यां डोळां प्रत्यक्ष ॥१७०॥</p>
<p>
	आतां आपण श्रोते मंडळी  । होऊं कीं लीन गुरुपदकमळीं । परिसूं पुढील कथेची नव्हाळी । यथाकाळीं पुढारा ॥१७१॥</p>
<p>
	आठवूनि श्रीसमर्थचरण । सद्भावें मी येई लोटांगण । तेणेंच सकल भवदु:खविमोचन । भावार्थें शरण हेमाड ॥१७२॥</p>
<p>
	साईच एक तयाचा स्वार्थ । साईच निरतिशय - सुखपरमार्थ । साईच तया करील कृतार्थ । निश्चित हा भावार्थ तयाचा ॥१७३॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । साईकृपानुग्रहदानं नाम एकचत्वारिंशत्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-42-122042900047_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ४२</a></strong></p>
</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 Apr 2022 15:01:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 Apr 2022 16:03:14 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ४०]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-40-122042600070_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
धन्य धन्य श्रीसाईसमर्थ । ग्रंथरूपें स्वार्थ परमार्थ । बोधूनि भक्तां करी कृतार्थ । जो कृतकार्यार्थ संपादी ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 40" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650967713-5493.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra chapter 40" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	धन्य धन्य श्रीसाईसमर्थ । ग्रंथरूपें स्वार्थ परमार्थ । बोधूनि भक्तां करी कृतार्थ । जो कृतकार्यार्थ संपादी ॥१॥</p>
<p>
	माथां पडतां जयाचा हात । करी जो तात्काळ शक्तिपात । अप्राप्यवस्तु करी प्राप्त । भेदाचा नि:पात करूनि ॥२॥</p>
<p>
	विरवूनि मी - तूंभाव भिन्न । जया करिताम साष्टांग नमन । ह्रययीं धरी आलिंगून । अनन्य शरण रिघतांचि ॥३॥</p>
<p>
	नामें भिन्न सागर - सरिता । परी रूपें एकरूपता । वर्षाकाळीं मिळणी मिळतां । उरे न भिन्नता ताद्दश ॥४॥</p>
<p>
	तेवींच भावें सद्नुरुनाथा । भक्तीं अनन्य शरण जातां । तोही भक्तांस देई निजगुरुता । पाहोनि सद्भक्तता भक्तांची ॥५॥</p>
<p>
	जयजयाची दीनदयाळा । भक्तोद्धारा परमप्रेमळा । व्यापूनि अखिल ब्रम्हांदमाळा । वससी निराळा शिर्डींत ॥६॥</p>
<p>
	जातें मांडूनि पाय पसरितां । संत असतां दळण दळीतां । खुंटा ठोकूनि वैरा रिचवितां । विस्मय चित्ता माझिया ॥७॥</p>
<p>
	तेंच कीं या ग्रंथा मूळ । मनीं इच्छा उद्भवली प्रबळ । कीं हीं ऐसीझं कर्में सकळ । वर्णितां कश्मल हरेल ॥८॥</p>
<p>
	हरि स्वयें होईल प्रसन्न । तया आवडे तयाहून । कोणीं केलिया निजभक्तकीर्तन । अथवा गुणवर्नन भक्तांचें ॥९॥</p>
<p>
	आशंकतील श्रोते सज्जन । जयां निराधार वाटेल हें विधान । तिंहीं पहावें भविष्योत्तर - पुराण । त्रिपुरारी कथन करी हें ॥१०॥</p>
<p>
	हीही सकळ साईंची प्रेरणा । परी लौकिक रीति निदर्शना । तेणेंच अनुमोदिली ही रचना । भक्तकल्याणाकारणें ॥११॥</p>
<p>
	तैपासाव मासोमासीं । साइसमर्थकथानकासी । या श्रीसाईलीलावलीसी । श्रोते बहु प्रेमेंसी परिसती ॥१२॥</p>
<p>
	तोचि कीं सई अनुमोदिता । तोच तो माझा बुद्धिदाता । तोच मूळ चेतना चेतविता । तयाची कथा तोच करी ॥१३॥</p>
<p>
	कीं हा हेमाड निजमतीं । रचितो हा विकल्प न धरा चित्तीं । म्हणोनि श्रोतयां करितों । विनंती । गुणदोष माथीं मारूं नका ॥१४॥</p>
<p>
	गुण तरी ते साईचे । दोष दिसलिया तरी ते त्याचे । मी तों बाहुलें साईखडयाचें । आधारें नाचें सूत्राच्या ॥१५॥</p>
<p>
	सूत्रधाराहातीं सूत्र । त्याला वाटेल तें तें चित्र । रंगीबेरंगी अथवा विचित्र । नाचवील चरित्रसमन्वित ॥१६॥</p>
<p>
	असो आतां हा प्रस्ताव । काय नूतन कथानवलाव । उत्कंठाप्रचुर श्रोतृस्वभाव । गुरुभक्तगौरव त्यां गाऊं ॥१७॥</p>
<p>
	गताध्याय पूर्ण करितां । पुढील अध्याय सूतोवाचता । ठेविली होती स्मरणाचे माथां । स्फुरे ती आतां परिसावी ॥१८॥</p>
<p>
	आतां हें गोड आख्यान । श्रोतां परिसिजे सावधान । भक्त प्रेमें घालितां भोजन । परम समाधान साईंन ॥१९॥</p>
<p>
	निज तान्हिया कनावाळू माई । तैसा निजभक्तां प्रत्यक्ष साई । वसो कुठेंही धांवत येई । कवण त्या होईल उतराई ॥२०॥</p>
<p>
	देहें वावरत शिर्डींत । परी संचार त्रैलोक्यांत । ये अर्थींचा गोड वृत्तांत । परिसा निजशांत मानसें ॥२१॥</p>
<p>
	एकदां साईपदसंनिष्ठ । बाळासाहेव भक्तश्रेष्ठा । माता जयांची व्रतवैकल्यनिष्ठ । सर्वांचें अभीष्ठ संपादी ॥२२॥</p>
<p>
	परोपरीचीं अनेक व्रतें । होतीं घडलीं तियेचे हातें । तयांचें उद्यापन राहिलें होतें । सांग तीं समस्तें व्हावया ॥२३॥</p>
<p>
	व्रतसंक्या होतां पूर्ण । करावें लागे उद्यापन । ना तों पदरीं न पदे पुण्य । व्रत तें अपूर्ण त्यावीण ॥२४॥</p>
<p>
	व्रतें पंचवीस अथवा तीस । इतुक्यांचिया उद्यापनास । देव शें - दोनशें ब्राम्हाणांस । जेवावयास आमंत्रित ॥२५॥</p>
<p>
	म्हणून एक नेमिली तिथी । हें उद्यापन करावयाप्रती । देव जोगांस पत्र लिहिती । कराया विनंती बाबांस ॥२६॥</p>
<p>
	पहा आपण आलियाविना । नाहीं सांगता या उद्यापना । तरी मान्य करूनि ही प्रार्थना । करावें या दीना आभारी ॥२७॥</p>
<p>
	मी तों सरकारचा सेवेकरी । पोटालागीं करितों चाकरी । त्यांतचि साधल्या परमार्थही करीं । जाणतसां अंतरीं आपणही ॥२८॥</p>
<p>
	डहाणूहूनि इतुका दूर । स्वयें यावया मी लाचार । तरी या आमंत्रणाचा स्वीकार । कराल ही फार मज आशा ॥२९॥</p>
<p>
	ऐसें बापूसाहेब जोग । पत्र बाबांस ऐकविती साङ्ग । म्हणती संपादा हा कार्यभाग । यथासांग देवांचा ॥३०॥</p>
<p>
	शुद्धभावाचें आमंत्रण । बाबांनीं ऐकूनि घेतलें संपूर्ण । म्हणती “जया माझें स्मरण । निरंतर आठवण मज त्याची ॥३१॥</p>
<p>
	मज न लागे गाडीघोडी । विमान अथवा आगिनगाडी । हांक मारी जो मज आवडी । प्रकटें मी ते घडी अविलंबें ॥३२॥</p>
<p>
	तूं मी आणि तिसरा एक । तिघे मिळुनि जाऊं देख । पाठवूनि दे ऐसा लेक । पावेल हरिख लिहिणारा” ॥३३॥</p>
<p>
	असो बाबा जें जें बोलले । तें तें जोगांनीं देवां कळविलें । देव मनीं आनंदित जाहले । अमोघ बोलें बाबांच्या ॥३४॥</p>
<p>
	देवांचाही पूर्ण विश्वास । बाबा आतां येतील खास । परी हें जेव्हां अनुभवास । येईल तो दिवस सोनियाचा ॥३५॥</p>
<p>
	परी देवांस हेंही ठावें । शिरडीखेरीज तीनच गांवें । तेथेंही व्कचितचि बाबांनीं जावें । शिरडींत असावें निरंतर ॥३६॥</p>
<p>
	मना आलिया सटी - सामासीं । कधीं बाबा जात राहत्यासी । कधीं रुई वा निमगांवासी । वस्ती शिरडीसी अखंड ॥३७॥</p>
<p>
	या तीन गांवांपलीकडे । जात न केव्हांही कोणीकडे । ते मग इतके लांब इकडे । डहाणूस मजकडे यावे कसे ॥३८॥</p>
<p>
	परि ते पूर्ण ते पूर्ण लीलावतारी । इच्छामात्रें स्वच्छंचारी । येणें जाणें हें लोकाचारीं । सबाह्याभ्य़ंतरीं परिपूर्ण ॥३९॥</p>
<p>
	तेथूनि येथें होईल येणें । अथवा येथूनि तेथें जाणें । हीं दोनीही आकाश नेणे । परिपूर्ण पूर्णपणें सबाह्य ॥४०॥</p>
<p>
	तैसीच बाबांची  दुर्गमगती । स्थिरचरीं ते भरले असती । तयां कैंची आगती निर्गती । प्रकट होती  स्वच्छंदें ॥४१॥</p>
<p>
	असो याआधीं एक संन्यासी । एका मासाचिया अजमासीं । आला स्टेशनमास्तरापाशीं । डहाणू - स्टेशानासी निजकार्या ॥४२॥</p>
<p>
	तो गोशाळाप्रचारक । गोसंस्थेचा स्वयंसेवक । आला वर्गणी मागावया देख । स्थिति सांपत्तिक सुधारावया ॥४३॥</p>
<p>
	वेष पाहतां दिसे बंगाली । मास्तरानें युक्ति कथिली । गांवांत जा तेथेंच आपुली । व्यवस्था चांगली लागेल ॥४४॥</p>
<p>
	तेथें आहेत मामलेदार । तयांपुढें मांडा हा विचार । मिळतील शेटसावकार । लावितील हातभार तुम्हांस ॥४५॥</p>
<p>
	एक मामलेदार वळतां । पट्टी होईल हां हां म्हणतां । या धर्माचिया कार्याकरितां । स्वस्थचित्ता जा तेथें ॥४६॥</p>
<p>
	हें जों आंत मास्तर बोले । बाहेर घोडयाचे टाप वाजले । स्वयें मामलेदारचि तेथें आले । उतरले गेले स्टेशनांत ॥४७॥</p>
<p>
	मास्तरातें भेटावयातें । खोलींत जेव्हां प्रवेशले ते । मास्तर संन्यासिया झाले वदते । आले कीं येथेंच मामलेदार ॥४८॥</p>
<p>
	घ्या आतां बोला काय तें । दैवें हे भेटले तुम्हां आयते । संन्यासी निजमनोगतातें । जाहले निवेदिते त्यांपाशीं ॥४९॥</p>
<p>
	मग ते दोघे बाहेर आले । तेथेंच एका पेटीवर बैसले । देवांस संन्यासी विनविते झाले । कार्य हें संपादिलें पाहिजें ॥५०॥</p>
<p>
	गोरक्षणाचें धर्मकार्य । आपण हातीं धरिल्याशिवाय । मज परकिया हातून हें कार्य । होईल का तिळप्राय तरी ॥५१॥</p>
<p>
	आपण  तालुक्याचे अधिकारि । मीतो हा सिसा भिकारी । फिरें लोकाम्चिया दारोदारीं । टाळाया उपासमारी गाईंची ॥५२॥</p>
<p>
	टाकाल जरी एक शब्द । होईल माझें कार्य जलद । मिळवाल गोमातांचे आशीर्वाद । यश निर्विवाद लाधला ॥५३॥</p>
<p>
	परिसूनि संन्यासियाची विनंती । देव काय प्रत्युत्तर करिती । गांवांत दुजिया कार्या संप्रती । वर्गणी हातीं घेतलीसे ॥५४॥</p>
<p>
	रावसाहीब नरोत्तम शेटी । जयां दीनांची दया पोटीं । नगरशेट जे मोठे खटपटी । ते एक पट्टी उगरावती ॥५५॥</p>
<p>
	त्यांतचि तुमचिया पट्टीस जागा । होईल कैसी तरी सांगा । समय हा नाहीं तुमचिया उपेगा । असो मग मागाहून पाहूं ॥५६॥</p>
<p>
	तरी आपण दों चार मासीं । थांबूनि या कीं या गांवासी पुढें मग पाहूं त्या समयासी । आज न यासी अनुकूलता ॥५७॥</p>
<p>
	असो मग तो तेथूनि गेला । झाला असेल महिना याला । तों तो तंग्यांत बैसूनि आला । पुनश्च डहाणूला माधारा ॥५८॥</p>
<p>
	देवांचिया दारासमोर । वकीर परांजपे यांचें घर । तेथेंच तांगा तांगा थांबल्यानंतर । संन्यासी उतरतां देखिला ॥५९॥</p>
<p>
	तोचि कीं हा पूर्वील निश्चित । आला कीं आधींच वर्गणीनिमित्त । ऐसें देव मुलातें वदत । अंतरीं शंकित होऊनि ॥६०॥</p>
<p>
	नाहीं पुरा महिना झाला । तोंच हा येथें किमर्थ आला । विसरला कां पूर्वील बोला । साशंकतेला हें मूळ ॥६१॥</p>
<p>
	तेणें तेथेंच तांगा सोडिला । तेथेंच कांहीं काळ क्रमिला । आला मग देवांचिया घराला । काय मग लागला वदावया ॥६२॥</p>
<p>
	दहा वाजावयाचा वेळ । ब्राम्हाणभोजनारंभकाळ । पाहूनि देवांची घालमेल । वदे न मज उतावेळ पैशाची ॥६३॥</p>
<p>
	‘आया हूं न पैसेके लिये । आज तो हमकू भोजन चाहिये’ । देव म्हणाले ‘आवो आनंद हें । घर ये समझिये आपका’ ॥६४॥</p>
<p>
	तंव संन्यासी वदे इतुक्यांत । ‘हमारे दोन बच्चे हैं साथ’ । ‘बहोत अच्छी है ए बात’ । देव मग म्हणतात तयातें ॥६५॥</p>
<p>
	होता जेवावया अवकाश । म्हणोनि देव पुसती तयांस । ‘कहां आपका उतारा है खास । जहां मैं तपासकूं भेंजूं’ ॥६६॥</p>
<p>
	‘क्या जरूर कब मैं आवूं । किस घंटे मैं हाजर रहूं । जब बोलोगे तब आता हूं’ । संन्यासी बोलूं लागला ॥६७॥</p>
<p>
	‘अच्छा बच्चे लेके साथ । बारा घंटे होनेके बखत । आवो भोजन पावो संत’ । ऐसें तंव वदत देव तया ॥६८॥</p>
<p>
	असो मग ते संन्यासी गेले । बरोबर बारा होतां परतले । जेवावया तिघेही बैसले । भोजनीं  धाले यथेष्ट ॥६९॥</p>
<p>
	होऊनियां पाकनिष्पत्ती । ब्राम्हाणांच्या बैलल्या पंक्ती । सपरिवार संन्यासियाप्रती । तृप्त करिती यजमान ॥७०॥</p>
<p>
	सवें घेऊनि दोघेजण । आला संन्यासी आपण होऊन । तरी तयाचें पूर्व प्रयोजन । पसरी आवरण मायेचें ॥७१॥</p>
<p>
	तेणें हा कोणीतरी अतिथी । पावावया भोजनप्राप्ति । आला, इतुकेंच देवांचे चित्तीं । द्दढावली वृत्ति मोहाची ॥७२॥</p>
<p>
	एणेपरी झालीं भोजनें । उत्तरापोशनें शुद्धाचमनें । सुंगधशीतल पदकप्राशनें । मुखशुद्धिदानें संपादिलीं ॥७३॥</p>
<p>
	शिष्टाचार गंधसुमनें । तांबूल अत्तर गुलाबदानें । दिधलीं सर्वत्रांप्रति बहुमानें । आनंदानें देवांनीं ॥७४॥</p>
<p>
	असो मग ऐसिया उपरी । मंडळी गेली घरोघरीं । संन्यासीही निजपरिवारीं । गेले माधारीं निजस्थळीं ॥७५॥</p>
<p>
	जरी आगंतुक अनिमंत्रित । तरी ते वेळीं येऊनि जेवत । परी देवां न बाबासे वाटत । संशय राहत मनांत ॥७६॥</p>
<p>
	ऐसें जरी घडलें प्रत्यक्ष । तिघे अयाचित वाढिले समक्ष । तरीही देव मनीं साकांक्ष । जोगांची साक्ष घेतातचि ॥७७॥</p>
<p>
	असो होतां उद्यापनपूर्ती । देव तंव जोगां पत्र लिहिती । ऐसें कैसें तरी साक्ष पटेल । कैसें न वाटेल हें मजला ॥७९॥</p>
<p>
	तरी ही ऐसी गत कां झाली । माझीच कां ही निराशा केली । बहुसाक्षेपें वात पाहिली । कांहीं न आली प्रचीती ॥८०॥</p>
<p>
	प्रेमें बाबांस इमंत्रितां । येतों वदले मज शारणागता । परी तें सर्व झालें अन्यथा । कैसें हें सर्वथा न कळे मज ॥८१॥</p>
<p>
	माझी य्ण्याची परतंत्रता । अति काकुळती पत्रीं लिहितां । तरीही आपण येणार हें परिसतां । मज बहु धन्यता वाटली ॥८२॥</p>
<p>
	आतां आपण कवण्याही मिषें । येणार वाटलें कवण्याही वेषें । परी तें कांहीं न घडलें कैसें । आश्चर्य विशेषें वाटतें ॥८३॥</p>
<p>
	जोगांनीं तें सकल वृत्त । साईचरणीं केलें निवेदित । बाबा होऊनि आश्चर्यचकित । काय तयांप्रत बोलत ॥८४॥</p>
<p>
	“पत्र उकलतां मजपुढती । पत्रांतर्गत मनोवृत्ती । वाचावयाचे आधींच निश्चिती । उभ्याच ठाकती मूर्तिमंत ॥८५॥”</p>
<p>
	तो वदे मी माझिया बोलें । विश्वास देऊनि तया फसविलें । सांग तया त्वां मज नोळखिलें । कां मग बोलविलें होतेंस ॥८६॥</p>
<p>
	लौकिकीं ना येथूनि हाललों । परी मी उद्यापनीं जेवूनि आलों । दोघांसमवेत येईन बोललों । तैसाचि गेलों दोघांसवें ॥८७॥</p>
<p>
	होत जिवावया अवकाश । तेव्हांच आधीं एकटा सावकाशा । तुज नाठवे का संन्यासवेष । प्रथम प्रवेश ये रीती ॥८८॥</p>
<p>
	पाहूनि आलों अकल्पित वृत्ति । पैसे मागेन तुज ही भीती । वाटली नव्हती का तव चित्तीं । संशयनिवृत्ती म्यां केली ॥८९॥</p>
<p>
	येईन केवळ जेवावयास । सवें घेऊनियां दोघांस । ऐसें सांगूनियां वेळेस । नाहीं का दोघांसह जेवलों ॥९०॥</p>
<p>
	पहा मी माझिया वचनाकारणें । मरोनि जाईन जीवें प्राणें । परी माझिया मुखींचीं वचनें । अन्यथा होणें नाहीं कदा” ॥९१॥</p>
<p>
	ऐसें वदतां साईनाथा । आनंद नावरे जोगांच्या चित्ता । दिधलें वचन व्हावें न अन्यथा । अनुभव हा सर्वथा सर्वांचा ॥९२॥</p>
<p>
	पुढें मग हें वृत्त । जोग कळविती देवांप्रत । पत्र एक सविस्तर धाडीत । अतिमुदित मानसें ॥९३॥</p>
<p>
	देवांनीं जैं पत्र वाचिलें । प्रेमोद्रेकें नेत्र ओथंबले । धिक् धिक् । व्यर्थ साईंस दुषिलें । बहु हिरमुसले मनांत ॥९४॥</p>
<p>
	धन्य बाबांचें महिमान । धिक् माझ्या जाणिवेचा अभिमान । परी बाबाच संन्यासी हें अनुमान । व्हावें तें कैसें न मज कळे ॥९५॥</p>
<p>
	कारण बाबांस केलें निमंत्रण । त्या आधींच त्या प्रथमाभिगमन । तेंही तयाच्या कार्यालागून । भेटीस प्रयोजन पट्टीचें ॥९६॥</p>
<p>
	तया दिधली होती मुदत । दों चार मासां यावें परत । तोच तो जरी भोजन । माझियासंगें येतील दोन । विसरलों मी भान तयाचें ॥९८॥</p>
<p>
	बाबांचिया आमंत्रणापाठीं । पदती जरी यासी प्रथम गांठी । तीही केवळ जेवणासाठीं । तरीन हे दिठी चाकाटति ॥९९॥</p>
<p>
	परी तो आला गोरक्षणा निमित्त । मिळवावया गोग्रासवित्त । तयानंतर तें साईंप्रत । आमंत्रण जात उद्यापना ॥१००॥</p>
<p>
	म्हणोनि ऐसा मोह पडला । तेणें हा ऐसा प्रकार घडला । जरी दोघांसह येऊनि जेवला । तरी तो भासला अन्नार्थी ॥१०१॥</p>
<p>
	नसतां कोणी पूर्वपरैचित । भॊजनसमयीं येतां अकल्पित । घेऊनि कोणीही दोघे समवेत । साईच ते निश्चित वाटते ॥१०२॥</p>
<p>
	परी या संतांची ऐसीच रीती अघटित लीला अद्भुत कृती । भक्तांघरींची कार्यस्थिती । स्वयेंचि योजिती त्या आधीं ॥१०३॥</p>
<p>
	भक्त विनटतां निजचरणीं । तयाचिया शुभकार्याची संपादणी । ऐसीच होते अकल्पितपणीं । अतर्क्य करणी संतांची ॥१०४॥</p>
<p>
	चिंतिलेंचि दे चिंतामाणी । कल्पवृक्ष दे कल्पिलें मनीं । कामधेनु ते कामप्रसविणी । अचिंत्यदानीं गुरुमाय ॥१०५॥</p>
<p>
	असो ये ठायीं बाबा निमंत्रित । संन्यासियाच्या रूपें प्रकटत । परी तयांची लीला अघटित । अयाचितही येत कधीं ॥१०६॥</p>
<p>
	कधीं छायाचित्ररूपें । कधीं पार्थिव मूर्तिस्वरूपें । पार नाहीं तयांच्या कृपे । प्रकटती आपेआप कधीं ॥१०७॥</p>
<p>
	ये अर्थींचा माझा अनुभव । परिसतां श्रोतयां वाटले नवलाव । कळेल साईलीलाप्रभाव । कथा ही अभिनव अपूर्व ॥१०८॥</p>
<p>
	ही काकथा कीं ही कहाणी । ऐसेंही ईस वदेल कोणी । म्हणावें तें खुशाल त्यांणीं । परी ये श्रवणीं सादर व्हा ॥१०९॥</p>
<p>
	आळस निद्रा तंद्रा टाकून । होऊनियां साबधान । कथा ही परिसा द्या हें दान । होईल समाधान मग माझें ॥११०॥</p>
<p>
	व्यग्रता क्षण झुगारून । स्वस्थचित्त अव्यग्र मन । झालिया काम येईल श्रवण । पुढें मग मनन निजध्यास ॥१११॥</p>
<p>
	तेथूनि पुढें साक्षात्कार । परी या सर्वां श्रवण आधार । तेंच कीं या सर्वांचें सार । निश्चयें भवपार त्याचेनी ॥११२॥</p>
<p>
	सन एकोणीसशें सतरा इसवीसी । फाल्गुन शुद्ध पौर्णिमेसी । शेजे निद्रिस्त असतां पहाटेसी । स्वप्न एक मजसी जाहलें ॥११३॥</p>
<p>
	पहा साईंचें विचेष्टित । सुंदरवेष संन्यासी होत । देऊनि दर्शन मज जागवीत । ‘भोजना मी येत आज’ वदे ॥११४॥</p>
<p>
	स्वप्नामाजील जागृतपण । तेंही केवळ स्वप्नचि पूर्ण । कारण जागृत होतां मी आपण । कराया आठवण लागलों ॥११५॥</p>
<p>
	डोळे उघडूनि पाहूं लागें । नाहीं साई न कोणी ते जागे । स्वप्नचि तें जें क्षणामागें । यक्तिंचित्त जागेपण नव्हतें ॥११६॥</p>
<p>
	ऐसी होतां मनाची निश्चिती । आठवूं लागलों स्पप्नस्थिति । अक्षरें अक्षर आठवलें चित्तीं । लवमात्र विस्मृतिविरहित ॥११७॥</p>
<p>
	‘योतों मी आज भोजनास’ । या साईंच्या स्पष्टोक्तीस । ऐकूनि आनंदलों जीवास । कळविलें कलत्रास हें वृत्त ॥११८॥</p>
<p>
	ध्यानीं मनीं मनीं साईंचा ध्यास । हा तों निरंतरचा अभ्यास । सात वर्षांचा जरी सहवास । आस न भास भोजनाचा ॥११९॥</p>
<p>
	असो तिजला ठेविलें सांगून । आहे आज होळीचा सण । एक टिपरी अधिक आधण । घालाया आठवण ठेवावी ॥१२०॥</p>
<p>
	हें इतुकेंचि कळवितां तीस । लागली कारण पुसावयास । मी म्हणें आज जेवावयास । पाहुणा या सणास येणार ॥१२१॥</p>
<p>
	तंव ती म्हणे सांगा कोण । जिज्ञासा तीस जाहली दारूण । परी मीं सांगतां खरें कारण । उपहासा भाजन होणार ॥१२२॥</p>
<p>
	हेंही मज ठावें पूर्ण । तरीही न व्हावें । सत्यप्रतारण । म्हणोनि श्रद्धापूर्वक जाण । केलें मीं निवेदन सत्यत्वें ॥१२३॥</p>
<p>
	तरी हें आहे श्रद्धेवरी । जैसी जया जाणीव अंतरीं । वार्ता खोटी अथवा खरी । हें तो मनावरी सर्वथैव ॥१२४॥</p>
<p>
	कितीही तिची करितां खातरी । वार्ता पटेना तियेचे अंतरीं । ती म्हणे बाबा शिरडीहूनि दुरी । कशासही तरी येतील ॥१२५॥</p>
<p>
	आपुले येथील काय भोजन । कशाचा आपुला होळीचा सण । टाकूनिया शिरडीचें मिष्टान्न । सेवितील कदन्न का येथें ॥१२६॥</p>
<p>
	येणेंपरी तिचें भाषण । मी म्हणें एक टिपरीचें आधण । ठेवितां आपणा सायास कोण । टिपरीची वाण नाहीं तुज ॥१२७॥</p>
<p>
	प्रत्यक्ष येतील साईच पाहुणे । ऐसें तुजला मीही न म्हणें । परी घडेल कोणाचें तरी येणें । हें नि:शंकपणें मज वाटे ॥१२८॥</p>
<p>
	मग तूं मनीं कैसेंही मान । मी त्या मानीन साईंसमान । किंबहुना प्रत्यक्ष साई न आन । अन्वर्थ स्वप्न होईल मज ॥१२९॥</p>
<p>
	असो ऐसें जाहलें भाषण । पुढें पातला समय माध्यान्ह । होतां यथाविधि होलिकापूजन । मांडिली भोजनपत्रावली ॥१३०॥</p>
<p>
	आदिकरूनि पुत्र - पौत्र । दुहिता जामात इष्टमित्र । पंक्ती मांडिल्या सपीठपात्र । घातल्या विचित्र रांगोळ्या ॥१३१॥</p>
<p>
	त्यांतचि एका मुख्यपंक्ती । पाट मांडिला मध्यवर्ती । पात्र एक साईंप्रती । इतरांसमवेती वाढलें ॥१३२॥</p>
<p>
	पात्राभोंवती रांगोळी । घातली रंगीबेरंगी निळी । प्रत्येका तांब्या पंचपात्री पळी । सर्वासमेळी समसगट ॥१३३॥</p>
<p>
	पापड सांडगे कोशिंबिरी । वाढिलीं लोणचीं रायतीं साजिरीं । परोपरीच्या भाज्या खिरी । जाहली तयारी बहुतेक ॥१३४॥</p>
<p>
	पाहूनियां बारा झाले ॥ जेवणारे सोंवळीं नेसले । येऊनि एकेक पाटीं बैसले । तोंही न आलें कोणी दुजें ॥१३५॥</p>
<p>
	सर्व पात्रें गेलीं भरोन । वाढिलें भात पोळी वरान्न । रित्या मध्यवर्ती पात्रावांचून । कांहीं न न्य़ून ते जागीं ॥१३६॥</p>
<p>
	कोणी पाहूणा अथवा अतिथी । येईल म्हणूनि मार्ग लक्षिती । जाहलों मी साशंक चित्तीं । वाट ती किती पहावी ॥१३७॥</p>
<p>
	म्हणोनि दिधली दारास कडी । अन्नशुद्धि वाढिली तांतडी । वैश्वदेव नैवद्य परवडी । अन्नार्पणघडी पातली ॥१३८॥</p>
<p>
	आतां घेणार प्राणाहुती । इतुक्यांत जिन्यावर पाउलें वाजती । ‘रावसाहेब कोठें’ कीं वदती । बैसले बैसती निवांत ॥१३९॥</p>
<p>
	तंव मी तैसाच गेलों दारीं । वाटलें कोणी आलें अंतरीं । हळून दाराची कडी जों सारीं । दिसले जिन्यावरी दोघेजण ॥१४०॥</p>
<p>
	त्यांतील एक अल्लीमहमद । दुजे संत मौलाना - शाग्रीद । इस्मू मुजावर नामाभिध । आनंदप्रद दोघेही ॥१४१॥</p>
<p>
	पानें वाढूनि मंडळी बैसली । भोजनाची तयारी देखिली । पाहोनि अल्लीनें विनंती केली । तसदी मी दिधली क्षमा करा ॥१४२॥</p>
<p>
	वाटतें आपण जेवणावरून । आलां मजकरितां धांवून । आपणालागीं हात धरून । पंक्तीही खोळंबून राहिली ॥१४३॥</p>
<p>
	तरी घ्या ही आपुली वस्त । मग मी भेटेन होतां फुरसत । सांगेन नवलाव इत्थंभूत । अत्यद्भुत येविषयींचा ॥१४४॥</p>
<p>
	ऐसें वदूनि खाकेंतून । अल्ली एक पुडकें काढून । टेबलावर सन्मुख ठेवून । सोडवूं गांठवण लागला ॥१४५॥</p>
<p>
	काढितां वृत्तपत्राचें वेष्टण । दिसली साईंची मूर्ति तत्क्षण । म्हणे ही ठेवा वस्तु आपण । करा ही विनवण मान्य माझी ॥१४६॥</p>
<p>
	पाहतां साईंची तसबीर । रोमांच उठले शरीरावर । चरणांवरी ठेविलें शिर । जाहलें अंतर सद्नदित ॥१४७॥</p>
<p>
	वाटला मोठा चमत्कार । ही साईंची लीला विचित्र । वाटलें मज केलें पवित्र । दावूनि चरित्र हें ऐसें ॥१४८॥</p>
<p>
	उठली प्रबळ उत्कंठा मनीं  । आणिली ही तसबीर कोठुनी । तो म्हणे मीं एका दुकानीं । विकत घेउनी आणिलीसे ॥१४९॥</p>
<p>
	पुढें मग ते दोघेजण । उभे न राहती एकही क्षण । म्हणाले आतां जातों आपण । करावें भोजन स्वस्थपणें ॥१५०॥</p>
<p>
	आतांच या गोष्टीचें कारण । कथूं जातां केवळ निष्कारण । खोळंबेल मंडळीचें जेवण । तें मी मग कथीन सावकाश ॥१५१॥</p>
<p>
	मलाही तें वाटलें समर्पक । तसबीर वेळीं आली हा हरिख । तयांतचि मी जाहलों गर्क । आभारप्रदर्शक उद्नारलों ॥१५२॥</p>
<p>
	बरें आतां यावें आपण । आम्हीही पुढें करूम निवेदन । तसबीर येथें येण्याचें कारण । आजचि प्रयोजन काय तिंचें ॥१५३॥</p>
<p>
	असो पुढें ते गेलियापाठीं । यथानिश्चित साईंसाठीं । मध्यवर्ती । मधवर्ती स्थापिल्या पीठीं । नेऊनि ती पाटीं प्रस्थापिली ॥१५४॥</p>
<p>
	सुखावलें अवघ्यांचें मन । अतर्क्य साईंचें विंदान । एणें मिषें करूनि आगमन । स्वप्नींचें वचन सत्य केलें ॥१५५॥</p>
<p>
	आलाच तर कोणी अतिथी । येऊनि तेथें बैसेल पंक्तीं । हीच अपेक्षा ज्यांचिये चित्तीं । आश्चर्य किती हें तयां ॥१५६॥</p>
<p>
	पाहोनि चित्रींची सुंदर मूर्ती । परम आल्हाद सकळांप्रती । कैसें हे घडलें अकल्पित रीतीं । आश्चर्य करिती समस्त ॥१५७॥</p>
<p>
	ऐसें होतां प्रतिष्ठापन । केलें अर्ध्यपाद्यादि पूजन । भक्तिप्रेमें नैवेद्य समर्पण । अवघीं मग भोजन आरंभिलें ॥१५८॥</p>
<p>
	तैंपासाव हा काळवर । प्रत्येक होळीस ही तसबीर । करवूनि घेई हे शिष्टाचार । अष्टोपचार पूजेसह ॥१५९॥</p>
<p>
	इतर पूजेंतील देवांसहित । हीही देव्हारीं पूजिली जात । ऐसें हें साई अपूर्व चरित । भक्तांसी दावीत पदोपदीं ॥१६०॥</p>
<p>
	असो पुढें हे दोघेजण । आज उद्यां भेटूं म्हणून । वर्षें नऊ गेलीं निघून । तरीही न दर्शन तयांचें ॥१६१॥</p>
<p>
	कर्मधर्मसंयोगें शेवट । अल्ली महमद याची गांठ । पडली यंदा याहली भेट । सहज मी वाट चालतां ॥१६२॥</p>
<p>
	भेट होतांचि जाहलों उत्सुक । तसबिरीचें पुसावया कौतुक । का हो इतुकीं वर्षें मूक - । वृत्तीचे सेवक बनलां तुम्ही ॥१६३॥</p>
<p>
	जैसी पूर्वीं तैसी आज । पडली अवचित गांठी मज । योग आला आहे सहज । सांगा ती मौज समग्र ॥१६४॥</p>
<p>
	तुम्हीही श्रीसाईंच भक्त । आहे ठावें हें मज समस्त । परी ते दिवसींच कैसे अवचित । यावें हें उचित वाटालें ? ॥१६५॥</p>
<p>
	मग तो अल्ली वदे वृत्तांत । परिसा म्हणे कथितों साद्यंत । पहा साईंची लीला अत्यद्भुत । आश्चर्यभरित ती सर्व ॥१६६॥</p>
<p>
	या लीलेचा काय अर्थ । काय यांतील निजकार्यार्थ । यांत भक्तांचें काय इगित । साईच सुसंगत जाणता ॥१६७॥</p>
<p>
	आपण केवळ एकमेकांनीं । परिसाव्या या लीला कानीं । किंवा त्या गाव्या निजमुखांनीं । नि:श्रेयसदानी म्हणवोनि ॥१६८॥</p>
<p>
	असो आतां पुढील भाग । पुढील अध्यायीं कथूं सांग । आनंद पावेल श्रोतृसंघ । चरित्र अमोघ साईंचें ॥१६९॥</p>
<p>
	साई निर्द्वेष आनंदघन । सदा भजावा अनवच्छिन्न । पावाल निजसुख - समाधान । मन निर्वासन होईल ॥१७०॥</p>
<p>
	चातक निजस्वार्था विनवी । मेघ सकळ सृष्टीतें निववी । बाळासाहेब बाबांस बोलवी । बाबा तंव पालवीत भक्तांसवें ॥१७१॥</p>
<p>
	भक्तपंक्ती श्रोतेही बैसती । प्रेमें उद्यापनकथा परिसती । साईसमागम - आनंद भोगती । ढेंकरही देती तृप्तीचे ॥१७२॥</p>
<p>
	अनाहुतही कैसे येती । कैसे पार्थिवस्वरूपें प्रकटती । कैसे निजदासां आभारी करिती । कैसे ते जागविती पदोपदीं ॥१७३॥</p>
<p>
	असो हेमाड साईंसी शरण । पुढील कथेची हीचि मांडण । मांडील घेईल करूनि निरूपण । आपुली आपण यथेष्ट ॥१७४॥</p>
<p>
	शरणागता घालितो पाठीं । याच त्याचिया ब्रीदासाठीं । हेमाड घाली पायीं मिठी । परता न लोटी तो तया ॥१७५॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । उद्यापनकथाकथनं नाम चत्वारिंशत्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 15:37:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 Apr 2022 16:02:33 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ३९]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-39-122042600069_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
धन्य धन्य शिरडी स्थान । धन्य द्वारकामाईभुवन । जेथें श्रीसाई पुण्यपावन । आनिर्वाण वावरले ॥१॥
धन्य धन्य शिरडीचे जन ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 39" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650967620-2268.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra adhyay 39" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	धन्य धन्य शिरडी स्थान । धन्य द्वारकामाईभुवन । जेथें श्रीसाई पुण्यपावन । आनिर्वाण वावरले ॥१॥</p>
<p>
	धन्य धन्य शिरडीचे जन । जयालागीं इतुक्या लांबून । जेणें कवण्याही निमित्तें येऊन । ऋणी करून ठेविलें ॥२॥</p>
<p>
	गांव शिरडी आधीं लहान । साईसहवासें झाला महान । त्याचेनि झाला अति पावन । त्याचेनि तीर्थपण तयाला ॥३॥</p>
<p>
	त्या शिरडीच्या बायाही धन्य । धन्य त्यांची श्रद्धा अनन्य । न्हातां दळितां कांडितां धान्य । गाती असामान्य साईंतें ॥४॥</p>
<p>
	धन्य धन्य तयांचें प्रेम । गीतें गाती अत्युत्तम । ऐकतां तयांतील कांहीं अनुत्तम । होतसे उपरम मनास ॥५॥</p>
<p>
	म्हणोनियां श्रोतयांप्रती । यथाकाळें कथानुसंगती । व्हावया तयांची जिज्ञासातृप्ती । देईन विश्रांतीदायक ती ॥६॥</p>
<p>
	साई निजामशाहींत प्रकट । आम्रतळीं मार्गानिकट । धूपखेडयाचे वर्‍हाडासकट । शिर्डीस अवचट पातले ॥७॥</p>
<p>
	या खेडयांतील पुण्यवान । चांद पाटील नामाभिधान । तया आरंभीं जडलें हें निधान । इतरां दर्शन त्याचेनी ॥८॥</p>
<p>
	कैसी तयाची घोडी हरवली । कैसी साईंची गांठी पडली । कैसी तयांनीं चिलीम पाजिली । घोडी त्या दिधली मिळवून ॥९॥</p>
<p>
	चांदभाईचे कुटुंबाचा । भाचा एक होता लग्नाचा । वधूच योग जुळला  शिरडीचा । वर्‍हाड वधूच्या गांवीं ये ॥१०॥</p>
<p>
	येविषयींची साद्यंत कथा । पूर्वींच कथिलीसे श्रोतयांकरितां । तथापि स्मरली प्रसंगोपात्तता । नको पुनरुक्तता तयाची ॥११॥</p>
<p>
	चांद पाटील केवळ निमित्त । भक्तोद्धाराची चिंता अत्यंत । म्हणोनि साई हा अवतार धरीत । स्वयेंच कीं येत शिरडींत ॥१२॥</p>
<p>
	जड मूढ हीन दीन । व्रततपसंस्कारविहीन । साळेभोळे भावार्थी जन । कोण साईवीण उद्धरिता ॥१३॥</p>
<p>
	अष्टादशा वर्षांचें वय । तेथूनि एकांताची संवय । रात्रीं कुठेंही पडावे निर्भय । सर्वत्र ईश्वरमय ज्यासी ॥१४॥</p>
<p>
	होता जेथें पूर्वीं खड्डा । अवघ्या गांवचा जो उकिरडा । दिवसा फिरावें चहूंकडा । रात्रीं पहुडावें ते स्थानीं ॥१५॥</p>
<p>
	ऐसीं गेली वर्षें बहुसाल  । आला खड्डयाचा उदयकाळ । उठला सभोंर्वतींवाडा विशाळ । या दीनदयाळा साईचा ॥१६॥</p>
<p>
	अंतीं त्याच खड्डयाचा गाभारा । झाला विसांवा साईशरीरा । तेथेंच त्यांना अक्षय थारा । झाला उभारा समाधीचा ॥१७॥</p>
<p>
	तोच प्रणतवत्सल साईसमर्थ । दुस्तर भवार्णवसंतरणार्थ । ही निजचरित्रनौका यथार्थ । भक्तजनहितार्थ निर्मीतसे ॥१८॥</p>
<p>
	कीं ही भवनदी महा दुस्तर । अंधपंगू हा भक्तपरिवार । तयालागीं कळवळा फार । पावेल पैल पार कैसेनी ॥१९॥</p>
<p>
	सर्वां आवश्यक भवतरण । तदर्थ व्हावें शुद्धांत:करण । चित्तशुद्धि मुख्य साधन । भगद्भजन त्या मूळ ॥२०॥</p>
<p>
	श्रवणासारिखी नाहीं भक्ति । श्रवणें सहज गुरुपदासक्ति । उपजे निर्मळ शुद्ध मति । जेथूनि उत्पत्ति परमार्था ॥२१॥</p>
<p>
	या साईंच्या अगणित कथा । गातां गातां होईल गाथा । तरीही संकलित वानूं जातां । नावरे विस्तृतता अनावर ॥२२॥</p>
<p>
	जों जों श्रोतयां श्रवणीं चाड । तों तों वाढे निवेदनीं आवड । पुरवूनि घेऊं परस्पर कोड । साधूं कीं जोड निजहिताची ॥२३॥</p>
<p>
	साईच येथील कर्णधार । द्दढ अवधान हाचि उतार । कथाश्रवणीं श्रद्धा आदर । त्या पैलपार अविलंबें ॥२४॥</p>
<p>
	गताध्यायीं निरूपण । जाहलें संक्षेपें हंडीचें वर्णन । दत्तभक्तिद्दढीकरण । भक्तसंतर्पण नैवेद्यें ॥२५॥</p>
<p>
	प्रत्येक अध्याय संपवितांना । पुढील अध्याय विषयसूचना । होत गेली ऐसी रचना । समस्तांना अवगत हें ॥२६॥</p>
<p>
	परी संपतां गताध्याय । नव्हती पुढील कथेची सय । साई आठवूनि देतील जो विषय । तोचि कीं आख्येय होईल ॥२७॥</p>
<p>
	ऐसें जें होतें स्पष्ट कथिलें । तैसेंचि साईकृपें जें आठवलें । तेंचि कीं श्रोतयांलागीं वहिलें । सादर केलें ये ठायीं ॥२८॥</p>
<p>
	तरी आतां श्रोतयां प्रार्थना । दूर सारूनियां व्यवधाना  । शांत चित्तें द्या अवधाना । होईल मना आनंद ॥२९॥</p>
<p>
	एकदां चांदोरकर सद्भक्त । बैसूनियां मशिदींत । असतां चरणसंवाहन करीत । गीताही गुणगुणत मुखानें ॥३०॥</p>
<p>
	भगवद्नीता चतुर्थाध्याय । जिव्हेस लावूनि दिधला व्यवसाय । हस्तें चेपीत साईंचे पाय । पहा नवल काय वर्तलें ॥३१॥</p>
<p>
	भूत - भविष्यवर्तमान । साईसमर्था सर्व ज्ञान । नानांस गीतार्थ समजावून । द्यावा हें मन जाहलें ॥३२॥</p>
<p>
	ज्ञानकर्म - संन्यासन । ब्रम्हार्पणयोगाध्यायाचें पठण । नानांची ती अस्पष्ट गुणगुण । केली कीं कारण प्रश्नास ॥३३॥</p>
<p>
	“सर्वं कर्माखिलं पार्थ” । होय ज्ञानीं परिसमाप्त । संपतां हा त्रयस्त्रिंशत । ‘तद्विद्धि प्रणिपात’ चालला ॥३४॥</p>
<p>
	हा जो श्लोक चवतिसावा । येथेंच पाठास आला विसावा । बाबांच्या चित्तीं प्रश्न पुसावा । निजबोध ठसावा नानांस ॥३५॥</p>
<p>
	म्हणती नाना काय गुणगुणसी । म्हण रे स्पष्ट हळू जें म्हणसी । येऊंदे कीं ऐकूं मजसी । पुटपुटसी जें गालांत ॥३६॥</p>
<p>
	म्हण म्हणतां आज्ञा प्रमाण । श्लोक म्हटला चारी चरा । बाबा पुसती अर्थनिवेदन । स्पष्टीकरणपूर्वक ॥३७॥</p>
<p>
	तंव तो नाना अतिविनीत । बद्धांजुली होऊनि मुदित । मधुर वचनें प्रत्युत्तर देत । वदत भगवंत मनोगत ॥३८॥</p>
<p>
	आतां हा साई - नानासंवाद । व्हावया सर्वत्रांना विशद । मूळ श्लोक पदप्रपद । करूं कीं उद्धृत गीतेंतुनी ॥३९॥</p>
<p>
	कळावया प्रश्नाचें वर्म । तैसेच संतांचे मनोधर्म । करावा वाटे ऐसा उपक्रम । जेणें ये निर्भ्रम अर्थ हाता ॥४०॥</p>
<p>
	आधीं गीर्णाव भाषा दुर्गम । साईंस कैसी झाली सुगम । आश्चर्य करिती प्रश्न सधर्म । ज्ञान हें अगम्य संतांचें ॥४१॥</p>
<p>
	कधीं अध्ययन केलें संस्कृता । कधीं नकळे वाचिली गीता । कीं तो गीतार्थह्रद्नतज्ञाता । तैसा हो करिता प्रश्नातें ॥४२॥</p>
<p>
	श्रोतयांचिया समाधाना । व्हावी मूळ श्लोकाची कल्पना । म्हणोनि अक्षरश: भगवंतवचना । वदतों जें विवेचना साह्यभूत ॥४३॥</p>
<p>
	“तद्विद्धि प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यंति ते ज्ञानं, ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन: ॥४४॥”</p>
<p>
	हा तो गीतेचा मूळश्लोक । भाषानुसार अर्थ देख । टीककारही झाले अनेक । ते एकवाक्यात्मक समस्त ॥४५॥</p>
<p>
	नानाही मोठे बहुश्रुत गीताभाष्यपारंगत । कथूं लागती पदपदार्थ । यथाविदित श्लोकार्थ ॥४६॥</p>
<p>
	रसपूरित मधुरवाणी । नाना सविनय नम्रपणीं । अन्वय अर्थ आणूनि ध्यानीं । अर्थनिवेदनीं सादर ॥४७॥</p>
<p>
	म्हणती गुरुपदीं प्रणिपात । गुरुसेवेसी विकी जो जीवित । प्रश्नादिकीं आदरवंत । ज्ञानी त्या ज्ञानार्थ उपदेशिती ॥४८॥</p>
<p>
	सारांश कृष्ण कृपामूर्ति । अर्जुना जें प्रेमें वदती । गुरुसेवा गुरूप्रणती । ज्ञानसंवित्तिदायक ही ॥४९॥</p>
<p>
	अर्जुना एणें मार्गें जातां । तत्त्वदर्शी ज्ञानी तुजकरितां । दावितील ज्ञानाचा रस्ता । बाबा या अर्था मी जाणें ॥५०॥</p>
<p>
	शांकरभाष्य आनंदगिरी । शंकरानंदी व्याख्या श्रीधरी । मधुसूदन नीलकंठाधारीं । उपदेशपरी ही देवाची ॥५१॥</p>
<p>
	प्रथम दोन चरणांचा अर्थ । मान्य करिती साई समर्थ । परी उत्तर श्लोकार्धमथित । साई जें कथित तें परिसा ॥५२॥</p>
<p>
	इतरही भक्तचकोरगण । साईमुखचंद्र अनुलक्षून । करावया अमृतकणसेवन । आ पसरूनि आस्थित ॥५३॥</p>
<p>
	म्हणती “नाना तृतीय चरण । पुनश्च लक्षांत घेईं पूर्ण । ‘ज्ञान’ शब्दामागील जाण । अवग्रह आण अर्थास ॥५४॥</p>
<p>
	हें मी काय वदें विपरीत । अर्थाचा काय करितों अनर्थ । असत्य काय पूर्वील भाष्यार्थ । ऐसेंही निरर्थ ना मानीं ॥५५॥</p>
<p>
	ज्ञानी आणि तत्त्वदर्शी । ज्ञान उपदेशिती ऐसें जें म्हणसी । तेथें अज्ञान पद जैं घेसी । यथार्थ घेसील प्रबोद ॥५६॥</p>
<p>
	ज्ञान नव्हे बोलाचा विषय । कैसें होईल तें उपदेश्य । म्हणोनि ज्ञान शब्दाचा विपर्यय । करीं मग प्रत्यय अनुभवीं ॥५७॥</p>
<p>
	परिसिला तुझा ज्ञान - पदार्थ । अज्ञान घेतां काय रे वेंचन । ‘अज्ञान’ वाणीचा विषय होत । ज्ञान हें शब्दातीत स्वयें ॥५८॥</p>
<p>
	वार वेष्टी गर्भासी । अथवा मल आदर्शासी । विभूति आच्छादी वन्हीसी । तैसेंच ज्ञानासी अज्ञान ॥५९॥</p>
<p>
	अज्ञानानें आवृत ज्ञान । केलें या गीती भगवंतें कथन । एतदर्थ होतां अज्ञाननिरसन । स्वभावें ज्ञान प्रकाशे ॥६०॥</p>
<p>
	ज्ञान हें तो स्वत:सिद्ध । शैवालावृत तोयसें शुद्ध हे शैवाल जो सारील प्रबुद्धा । तो जल विशुद्धा लाधेल ॥६१॥</p>
<p>
	जैसें चंद्रसूर्यांचें ग्रहण । ते तों सर्वदा प्रकाशमान । राहू केतु आड येऊन । आमुचे नय अवरोधिती ॥६२॥</p>
<p>
	चंद्रसूर्यां नाहीं बाध । हा तों आमुचे द्दष्टीस अवरोध । तैसें ज्ञान असे निर्बाध । स्वयंसिद्ध स्वस्थानीं ॥६३॥</p>
<p>
	डोळा करी अवलोकन । तयाची देखणी शक्ति तें ज्ञान । वरी पडळ वाढे तें अज्ञान । तयाचें निरसन आवश्यक ॥६४॥</p>
<p>
	तें पडळ अथवा सारा । हस्तकौशल्यें दूर सारा । देखणी शक्ति प्रकट करा । अज्ञानतिमिरा झाडोनी ॥६५॥</p>
<p>
	पहा हें सकल द्दश्यजात । अनिर्वचनीय़ मायाविजृंभित । हीच अनादि । अविद्या अव्यक्त । अज्ञानविलसित तें हेंच ॥६६॥</p>
<p>
	ज्ञान ही वस्तु जाणावयाची । नव्हे ती विषय उपदेशाची । प्रणिपात परिप्रश्न सेवा हींचि । गुरुकृपेचीं साधनें ॥६७॥</p>
<p>
	विश्वाचें सत्यत्व महाभ्रम । हेंचि ज्ञानावरण तम । निरसूनि जावें लागे प्रथम । प्रज्ञान ब्रम्हा प्रकटे तैं ॥६८॥</p>
<p>
	संसारबीज जें अज्ञान । डोळां पडतां गुरुकृपांजन । उडे मायेचें आवरण । उरे तें ज्ञान स्वाभाविक ॥६९॥</p>
<p>
	ज्ञान हें तों नव्हे साध्य । तें तों आधींच स्वयंसिद्ध । हें तो आगमनिगमप्रसिद्ध । अज्ञान हा विरोध ज्ञानाला ॥७०॥</p>
<p>
	देवां भक्तां जें भिन्नपण । हेंच मूळ अज्ञान विलक्षण । तया अज्ञानाचें निरसन । होतांच पूर्ण ज्ञान उरे ॥७१॥</p>
<p>
	दोरापोटीं सर्पा जनन । हें तों शुद्धस्वरूपाज्ञान । स्वरूपोपदेशें निरसे अज्ञान । उरे तें ज्ञान दोराचें ॥७२॥</p>
<p>
	पोटीं सुवर्ण वरी काट । काटापोटीं लखलखाट । परी तो व्हावयालागीं प्रकट । हव्यवाटचि आवश्यक ॥७३॥</p>
<p>
	मायामूळ देहजनन । अद्दष्टाधीन देहाचें चलन । द्वंद्वें सर्व अद्दष्टाधीन । देहाभिमान अज्ञान ॥७४॥</p>
<p>
	म्हणोनि जे स्वयें निरभिमान । तयां न सुखदु:खाचें भान । विरे जैं अहंकाराचें स्फुरण । तैंच अज्ञाननिरास ॥७५॥</p>
<p>
	स्वस्वरूपाचें अज्ञान । तेंच मायेचें जन्मस्थान । होतां गुरुकृपा मायानिरसन । स्वरूपज्ञान स्वभावें ॥७६॥</p>
<p>
	एका भगवद्भक्तीवीण । किमर्थ इतर साधनीं शीण । ब्रम्हादेवही मायेअधीन । भक्तीच सोडवण तयाही ॥७७॥</p>
<p>
	हो कां ब्रम्हासदनप्राप्ति । भक्तीवांचूनि नाहीं मुक्ति । तेथेंही चुकल्या भगवद्भक्ति । पडे तो पुनरावृत्तींत ॥७८॥</p>
<p>
	तरी व्हावया मायानिरसन । उपाय एक भगवद्भजन । भगवद्भक्ता नाहीं पतन । भवबंधनही नाहीं तया ॥७९॥</p>
<p>
	जन म्हणती माया लटली । परी ती आहे महाचेटकी । ज्ञानियां फसवी घटकोघटकीं । भक्त नाचविती चुटकीवरी ॥८०॥</p>
<p>
	जेथें ठकती ज्ञानसंपन्न । तेथें टिकती भाविकजन । कीं ते नित्य हरिचरणीं प्रपन्न । ज्ञानाभिमान धन ज्ञानी ॥८१॥</p>
<p>
	म्हणोनि व्हावया मायातरण । धरावे एक सद्नुरुरचण । रिघावें तया अनन्य - शरण । भवभयहरण तात्काळ ॥८२॥</p>
<p>
	अवश्य येणार अयेवो मरण । परी न हरीचें पडो विस्मरण । इंद्रियीं आश्रमवर्णाचरण । चित्तें हरिचरण चिंतावे ॥८३॥</p>
<p>
	रथ जैसा जुंपल्या हयीं । तैसेंच हें शरीर इंद्रियीं । मनाच्या द्दढ प्रग्रहीं । बुद्धि निग्रही निजहस्तें ॥८४॥</p>
<p>
	मन संकल्पविकल्पभरीं । धांवें यथेष्ट स्वेच्छाविहारी । बुद्धि त्या निजनिश्चयें निवारी । लगाम आवरी निजसत्ता ॥८५॥</p>
<p>
	बुद्धीसारिखा कुशल नेता । ऐसा सारथी रथीं असतां । रथस्वामींसी काय चिंता । स्वस्थ चित्ता व्यवहरे ॥८६॥</p>
<p>
	देहगत सकल कार्य । हें बुद्धीचें निजकर्तव्य । ऐसी मनासी लागतां संवय । सर्व व्यवसाय हितमय ॥८७॥</p>
<p>
	शब्दस्पर्शरूपादि विषय । येणें मार्गें लागल्या इंद्रिया । होईल व्यर्थ शक्तिक्षय । पतनभय पदोपदीं ॥८८॥</p>
<p>
	शब्दस्पर्शरूपादिक । पंचविषयीं जें जें सुख । तें तों अंतीं सकळ असुख । परम दु:ख अज्ञान ॥८९॥</p>
<p>
	शाब्दविषया भुले हरिण । अंतीं वेंची आपुला प्राण । स्पर्शविषया सेवी वारण । साहे आकर्षण अंकुशें ॥९०॥</p>
<p>
	रूपविषया भुले पतंग । जाळूनि निमे आपुलें अंग । मीन भोगी रसविषयभोग । मुके सवेग प्राणास ॥९१॥</p>
<p>
	गंधालागीं होऊनि गुंग । कमलकोशीं पडे भृंग । एकेका पायीं इतुका प्रसंग । पांचांचा संघ भयंकर ॥९२॥</p>
<p>
	ही तों स्थावर जलचर पंखी । ययांची  दु:स्थिती देखोदेखी । ज्ञाते मानवही विषयोन्मुखी । अज्ञान आणस्वी तें काय ॥९३॥</p>
<p>
	अज्ञाननाशें विषयविमुख । होतां, होईल उन्मनीं हरिख । जीव ज्ञानस्वरू पोन्मुख  । आत्यंतिक सुख लाधेल ॥९४॥</p>
<p>
	चित्तें कारा हरिगुरुचिंतन । श्रवणें करा चरित्रश्रवण । मनें करा ध्यानानुसंधान । नामस्मरण जिव्हेनें ॥९५॥</p>
<p>
	चरणीं हरिगुरुग्रामागमन । घ्राणीं तन्निर्माल्याघ्राणन । हस्तीं वंदा तयाचे चरण । डोळां घ्या दर्शन तयाचें ॥९६॥</p>
<p>
	ऐशा या सकल इंद्रियवृत्ति । तयांकारणें लावितां प्रीति । धन्य तया भक्तांची स्थिति । भगवद्भक्ति काय दुजी ॥९७॥</p>
<p>
	सारांश समूळ अज्ञान खाणा । उरे तें ज्ञान सिद्ध जाणा । ऐसें या श्लोकाचें ह्रद्नत अर्जुना । श्रीकृष्णराणा सूचवी” ॥९८॥</p>
<p>
	आधींच नाना विनयसंपन्न । परिसूनि गोड हें निरूपण । पायीं घाळूनि लोटांगण । वंदिले चरण दों हातीं ॥९९॥</p>
<p>
	मग ते श्रद्धानिष्ठ प्रार्थना । करिती दवडा मम अज्ञाना । दंडा माझिया दुरभिमाना । यथार्थ शासन तें तरी काय दुजें ॥१०१॥</p>
<p>
	पोटीं प्रतिष्ठेची उजरी । ध्यानाविर्भाव दावी वरी । कामक्रोध धुमसे भीतरीं । अज्ञान तें तरी काय दुजें ॥१०२॥</p>
<p>
	आंतूनि सकळ कर्में नष्ट । बाहेर मिरवूं ब्रम्हानिष्ठा । आचारहीन चिचारभ्रष्ट । अज्ञान स्पष्ट काय दुजें ॥१०३॥</p>
<p>
	बाबा आपण कृपाघन । करोनियां कृपाजलसिंचन । करा हा अज्ञानदावानल शमन । होईन मी धन्य इतुकेनी ॥१०४॥</p>
<p>
	नलगे मज ज्ञानाची गोठी । निरसा माझिया अज्ञानकोटी । ठेवा मजवरी कृपाद्दष्टी । सुखसंतुष्टी तेचि मज ॥१०५॥</p>
<p>
	साई सप्रेम करुणाधन । नानांस निमित्ता पुढें करून । तुम्हां आम्हां सकलांलागून । गीतार्थप्रवचन हें केलें ॥१०६॥</p>
<p>
	गीता भगवंताचें वचन । म्हणोनि हें प्रत्यक्ष शास्त्र जाण । कालत्रयींही याचें प्रमाण । कधींही अवगणन होतां नये ॥१०७॥</p>
<p>
	परी अत्यंत विषयसक्त । अथवा जो खरा जीवन्मुक्त । या दोघांसीही नलगे शास्त्रार्थ । मुमुक्षूप्रीत्यर्थ या जन्म ॥१०८॥</p>
<p>
	विषयापाशीं द्दढ आकळिला । कधीं पावेन मी मुक्ततेला । ऐसें वदतिया मुमुक्षूला । तारावयाला हीं शास्त्रें ॥१०९॥</p>
<p>
	पाहूनि ऐशा निजभक्तांला । संतांस जेव्हां येतो कळवळा । काढूनि कांहीं निमित्ताला । उपदेश अवलीला प्रकटिती ॥११०॥</p>
<p>
	देव अथवा गुरु पाहें । भक्तांआधीन सर्वस्वीं राहे । भक्तकल्याण चिंता वाहे । सांकडीं साहे तयांचीं ॥१११॥</p>
<p>
	आतां एक दुजें लहान । करितों साईंचें वृत्त कथन । कैसी एकाद्या कार्याची उठावण । करितां नकळतपण दाविती ॥११२॥</p>
<p>
	असो सान वा तें मोठें । खरें कारण कधींही न फुटे । कार्य मात्र हळू हळू उठे । वाच्यता न कोठें केव्हांही ॥११३॥</p>
<p>
	सहजगत्या एकादें काम । निघावें करावा उपक्रम । न मूळ कारणनिर्देश  ना नाम । वरिवरी संभ्रम आणीक ॥११४॥</p>
<p>
	‘बोलेल तो करील काय । गरजेल तो वरसेल काय’ या रूढ म्हणीचा प्रत्यय । विनाव्यत्यय साई दे ॥११५॥</p>
<p>
	बाबांसारिख्या अवतारमूर्ति । परोपकारार्थ जगीं अवतरती । होतां इच्छितकार्या समाप्ती । अंतीं अव्यक्तीं समरसती ॥११६॥</p>
<p>
	आम्हां न ठावें मूळ कारण । कोठूनि आलों कोठें प्रयाण । किमर्थ आम्ही झालों निर्माण । काय कीं प्रयोजन जन्माचें ॥११७॥</p>
<p>
	बरें स्वच्छंदें जन्म कंठला । पुढें मृत्यूचा समय आला । सकळ इंद्रियगण विकळ झाला । तरीही न सुचला सुविचार ॥११८॥</p>
<p>
	कलत्र पुत्र बंधु जननी । इष्टमित्रादि सकल स्वजनीं । देह त्यागितां पाहूं नयनीं । तरीही न मनीं सुविचार ॥११९॥</p>
<p>
	तैसे नव्हती संतजन । ते तों अत्यंत सावधान । अतंकालाचें पूर्ण ज्ञान । ठावें निजनिर्वाण तयांतें ॥१२०॥</p>
<p>
	देह असेतों अतिप्रीती । भक्तांलागीं देहें झिजती । देहावसानीं ही देहावस्थिति । निजभक्तहितीं लाविती ॥१२१॥</p>
<p>
	देह ठेवावयाचे आधीं । कोणी आपुली बांधिती समाधी । कीं पुढें निजदेहा विश्रांति । मिळावी निश्चितीं ते स्थानीं ॥१२२॥</p>
<p>
	तैसेंच पहा बाबांनीं केलें । परी तें आधीं कोणा न कळेलें समाधइमंदिर बांधवून घेतलें । अघटित केलें तयांनीं ॥१२३॥</p>
<p>
	नाग्पुरस्थ मोठे धनिक । बाबपूसाहेब बुट्टी नामक । तयां हस्तें हें बाबांचें स्मारण । उभविलें देख बाबांनीं ॥१२४॥</p>
<p>
	बापूसाहेब परमभक्त । साईचरणीं नित्यानुरक्त । आले निजपरिवारासहित । राहिले शिरडींत सेवेस ॥१२५॥</p>
<p>
	धरुनि साइचरणीं हेत । नित्यानुवर्ती तेथेंच वसत । पुढेंच वसत । पुढेंही तैसेंच नित्यांकित । रहावें शिरडींत वाटलें ॥१२६॥</p>
<p>
	घ्यावी एकादी जागा विकत । उठवावी एक छोटी इमारत । स्वतंत्रपणें वसावें तेथ । आलें कीं मनांत तयांच्या ॥१२७॥</p>
<p>
	येथें हें पेरिलें मूळ बीज । त्याचाच वृक्ष हें मंदिर आज । द्दश्य स्मारक भक्तकाज । साईमहाराजप्रेमाचें ॥१२८॥</p>
<p>
	कैसा कैसा याचा उभारा । झाला उपक्रम कवण्या प्रकारा । कैसा हा आला या आकारा । वृत्तांत सारा अवधारा ॥१२९॥</p>
<p>
	विचार हे ऐसे चित्तीं । दीक्षितांचिया माडीवरती । बापूसाहेब निद्रिस्त स्थितीं । द्दष्टान्त देखती मौजेचा ॥१३०॥</p>
<p>
	तेथेंच एका बिछान्यांत । माधवरावही असतां निद्रिस्त । त्यांसही तोच द्दष्टान्त । परमविस्मित दोघेई ॥१३१॥</p>
<p>
	बापूसाहेब स्वप्न देखती । बाबा तयांतें आज्ञापिती । आपणही आपुला वाडा निश्चितीं । देउळासमवेती बांधावा ॥१३२॥</p>
<p>
	होतांक्षणींच हा द्दष्टान्त । बापूसाहेब जाहले जागृत । आमूल - स्वप्न आठवीत । आसनस्थित निजशेजे ॥१३३॥</p>
<p>
	इकडे ऐसें चाललें असतां । माधवराव ऐकिले रडतां । बुट्टी तयांस जागे व्हा ओरडतां । निद्रितावस्था मावळली ॥१३४॥</p>
<p>
	कां हो आपण काम रडत होतां । ऐसें माधवरावांस पुसतां । म्हणती श्रींचे प्रेमोद्नार परिसतां । प्रेमोद्रेकता पावलों ॥१३५॥</p>
<p>
	बाष्पगद्नद जाहला कंठ । नयनीं आंसुवें वाहिलीं उद्भट । प्रेम नावरे आवरिताम उत्कट । जाहलें परिस्फुट रुदनांत ॥१३६॥</p>
<p>
	येऊनि बाबा माझियानिकट । आज्ञा दिधली मजला स्पष्ट । वाडा देऊळ होऊंद्या प्रकट । पुरवीन अभीष्ट सर्वांचें ॥१३७॥</p>
<p>
	बापूसाहेब अंतरीं विस्मित । दोघांलागीं एकचि द्दष्टान्त । मन जाहलें संशयरहित । कार्यार्थोद्यत निश्चित ॥१३८॥</p>
<p>
	बुट्टी स्वयें गर्भश्रीमंत । वाडा देऊळ बांधूं समर्थ । माधवराव केवळ सुखवस्त । एकचि द्दष्टान्त उभयांतें ॥१३९॥</p>
<p>
	परस्परांचीं स्वप्नें जुळलीं । परमानंदा भरती आली । रूपरेखा निश्चित केली । योजना अनुमोदिली काकांनीं ॥१४०॥</p>
<p>
	असो उदयीक प्रात:काळीं । तिघेही असतां बाबांजवळी । बाबा नित्य प्रेमसमेळीं । मुख न्याहाळीत शामाचें ॥१४१॥</p>
<p>
	शामा वदे देवा हा खेल । काय आहे तुझा अकळ । झोंपही न घेऊं देसी निश्चळ । तेथेंही आम्हांतें बरळविसी ॥१४२॥</p>
<p>
	तेव्हां बाबा तें परिसुनी । हस्त ठेवीत आपुले कानीं । वदत “आम्ही आपुले ठिकाणीं । म्हणोत कोणी कांहींही” ॥१४३॥</p>
<p>
	असो मग ती पूर्वोक्त योजना । मांडिली बाबांचिया अनुमोदना । जाहली तात्काळ बाबांची अनुज्ञा । समंदिर सदना बांधावया ॥१४४॥</p>
<p>
	माधवरावांनीं बांधिली कंबर । झाला तळमजल तळघर । त्यांचेच हातून झाली विहीर । काम हें येथवर पोहोंचलें ॥१४५॥</p>
<p>
	लेंडीवरी जात असतां । अथवा तेथूनि मागें परततां । खिडक्या बार्‍या दारें बसवितां । बाबा उत्सुकता अवलोकीत ॥१४६॥</p>
<p>
	वदत करूनि तर्जनी वरी । येथें दार येथें बारी । येथें पूर्वेस काढा ग्यालरी । शोभा बरी दिसेल ॥१४७॥</p>
<p>
	पुढें कार्यकरणनिमित्तें । बापूसाहेब जोगांचे हस्तें । पुढील काम होणारें होतें । तें मग त्यांतें सोंपविलें ॥१४८॥</p>
<p>
	ऐसें काम होतां । स्फुरण झालें बुट्टींच्या चित्ता । यांतचि एक गाभारा धरितां । मुरलीधर स्थापितां येईल ॥१४९॥</p>
<p>
	कल्पनेचा झाला उदय । परी न पुसतां बाबांचा मनोदय । बुट्टी न आंरभीत कांहींही कार्य । विना गुरुवर्य आज्ञापन ॥१५०॥</p>
<p>
	हा तों त्यांचा नित्यनेम । अनुज्ञा बाबांची हेंच वर्म । नाहीं असिएं एकही कर्म । त्यावीण उपक्रम जयातें ॥१५१॥</p>
<p>
	किमर्थ व्हावें मध्यें दालन । काय आहे त्याचें प्रयोजन । दोन्हीकडील भिंती पाहून । करावें स्थापन मुरलीधरा ॥१५२॥</p>
<p>
	दालनाचें व्हावें देवालय । बापूसाहेब यांचा मनोदय । परी पुसावा बाबांचा आशय । असल्यास नि:संशय करावें ॥१५३॥</p>
<p>
	म्हणोनि वदले माधवरावा । आपण बाबांचा विचार घ्यावा । मग पुढील आक्रम योजावा । रुचेल देवा तैशापरी ॥१५४॥</p>
<p>
	बाबा फेरीवर असतां । वाडियाच्या सन्निध येतां । द्वारानिकट स्वारी पावतां । काय पुसतात शामराव ॥१५५॥</p>
<p>
	देवा बापूसाहेब वदती । दालनाच्या दोन्ही भिंता । पाहूनि तेथें स्थापूं प्रीतीं । कृष्णमूर्ति मुरलीधरा ॥१५६॥</p>
<p>
	मध्यभागीं चौक साधून । करूं तेथें सिंहासन । वरी मुरलीधर विराजमान । शोभायमान दिसेल ॥१५७॥</p>
<p>
	ऐसें बापूसाहेब योजिती । परी पाहिजे आपुली अनुमति । देऊळ वाडा दोनी ये रीतीं । हातोहातीं होतील ॥१५८॥</p>
<p>
	ऐकूनि ही शाअमाची उक्ती । बाबा आनंदें बरें म्हणती । “देऊळ पूर्ण झालियावरती । येऊं कीं वस्तीस आपणही” ॥१५९॥</p>
<p>
	लावूनि वाडियाकदे द्दष्टी । बाबा करीत मधुर गोष्टी । “वाडा पुरा झालियापाठीं । आपुलेसाठींच तो लावूं ॥१६०॥</p>
<p>
	तेथेंच आपण बोलूं चालूं । तेथेंच आपण अवघे खेळूं । प्रेमें आपापणा कवटाळूं । भोगूं सुकाळू आनंदाचा” ॥१६१॥</p>
<p>
	असो तेव्हां श्रीसाईंप्रत । माधवरावजी जसेंही पुसत । हेचि जरी अनुज्ञा निश्चित । पायासी मुहूर्त करूं कीं ॥१६२॥</p>
<p>
	बरी आहे ना देवा वेळ । फोडावया आणूं ना नारळ । ‘फोड फोड’ म्हणतां तात्काळ । आणूनि श्रीफळ फोडिलें ॥१६३॥</p>
<p>
	असो पुढें झाला गाभारा । मुरलीधर देवाचा चौथरा । मूर्तिही एका कारागिरा । सोंपविली कीं करावया ॥१६४॥</p>
<p>
	पुढें आली ऐसी वेळ । बाबांस आलें दुखणें प्रबळ  । निकट पातला अंतकाळ । अंतरीं तळमल भक्तांच्या ॥१६५॥</p>
<p>
	बापूसाहेब अस्वस्थ चित्तीं । आतां पुढें या वाडयाची स्थिति । काय होईल नकळे निश्चितीं । म्हणोनि खंती उद्भवली ॥१६६॥</p>
<p>
	इत उत्तर बाबांचे पाय । मांदिरास या लागती काय । लाखों रुपये जाहले व्यय । अंतीं हा व्यत्यय पातला ॥१६७॥</p>
<p>
	बाबांनीं देह ठेविल्यावर । कशास मुरलीधर वा घर । कशास वाडा अथवा मंदिर । दुश्चित्त अंतर बुट्टीचें ॥१६८॥</p>
<p>
	पुढें कर्मधर्मसंयोगें । अंतसमय साई - नियोगें । जाहलें वाडयाचिया महद्भाग्यें । मनाजोगें सकळांच्या ॥१६९॥</p>
<p>
	“मजला वाडयांत द्या ठेवून” । हें अंतकाळींचें बाबांचें वचन । निघतां बाबांचिया मुखांतून । जाहलें निश्चिंत मन सर्वांचें ॥१७०॥</p>
<p>
	मग तें पवित्र साईशरीर । जाहलें गाभारियामाजी स्थिर । वाडा जाहला समाधिमंदिर । अगाध चरित्र साईंचें ॥१७१॥</p>
<p>
	धन्य भाग्य त्या बुट्टीचें । जयांचिया गृहीं स्वसत्तेचें । विसांवे शरीर श्रीसाईंचें । नाम जयाचें अतिपावन ॥१७२॥</p>
<p>
	असो ऐसी ही कथा पावन । परिसोनिष्ट । साई एक राखितां संतुष्ट । वर्ततां मार्गें यथोपदिष्ट । लाधेल अभीष्ट अचूक ॥१७४॥</p>
<p>
	कथा वक्ता आणी वदन । जेथें साई समर्थ आपण । तेथें हेमाड कोठील कवण । उगाच टोपणनांवाचा ॥१७५॥</p>
<p>
	म्हणोनि पुढे होईल प्रेरणा । तैसीच कथा येईल श्रवणा । वेळीं होईल जी जी रचना नियेची विवंचना कां आज ॥१७६॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । गीताविशिष्टश्लोकार्थ - निवेदनं तथा समाधिमंदिरनिर्माणं नाम एकोनचत्वारिंशत्तमोऽध्या: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 15:35:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 15:47:13 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ३८]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-38-122042600067_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
सकलजगदानंदकरा । भक्तेष्टसंपादनतत्परा । चरणाश्रितत्रितापहरा । नमन गुरुवरा तव पायां ॥१॥
प्रणतपाला परमउदारा । ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 38" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650967520-2735.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra chapter 38" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	सकलजगदानंदकरा । भक्तेष्टसंपादनतत्परा । चरणाश्रितत्रितापहरा । नमन गुरुवरा तव पायां ॥१॥</p>
<p>
	प्रणतपाला परमउदारा । शरणागतभक्तोद्धारा । करावया कोलोपकारा । त्वां अवतारा धरियेलें ॥२॥</p>
<p>
	जयजयाजी द्वैतदलना । जयजयाजी भक्तमनमोहना । जयजयाजी भवापहरणा । जय करुणाघना गुरुराया ॥३॥</p>
<p>
	कोठील भाग्य आलें फळा । जेणें हे चरण पाहिले डोळां । भोगिला समागमसुखसोहळा । गेली ती वेळा परती न ये ॥४॥</p>
<p>
	केवळ ब्रम्हाची जी मूस । ओतूनि शुद्ध स्वरूपरस । आकारली जी मूर्ति सुरस । तीच कीं संतवतंस साई ॥५॥</p>
<p>
	साई तोचि आत्माराम । तोचि पूर्णानंदधाम । स्वयें अवाप्त सकलकमा । करीत निष्काम भक्तांस ॥६॥</p>
<p>
	जो सर्वधर्मविधारक । ब्रम्हाक्षात्रतेज एक । तयांसह मृत्य़ूचा घोटक । लक्षण हें त्रोटक जयाचें ॥७॥</p>
<p>
	जन्ममरणादि संबंध । तोडी तडतडा जो हे बंध । तया मी जड अंध । साष्टांग वंदन करीतसें ॥८॥</p>
<p>
	गताध्यायीं अति आवडीं । अर्णिली साईनाथांची चावडी । आतां ये अध्यायीं हंडी । परिसा अखंडित सुखदायी ॥९॥</p>
<p>
	तान्हें बाळ खाऊं जाणे । काय खाऊं तें तें नेणे । दुध वा कवळ लावूनि भरवणें । काळजी ही घेणें मातेनें ॥१०॥</p>
<p>
	तैसीच माझी साईमाता । लेखणी लेववूनि माझिये हाता । लिहवूनि घेई हा प्रबंध आयता । आवडीं निजभक्तांकारणें ॥११॥</p>
<p>
	युगायुगाचें सिद्ध साधन । मानवधर्मशास्त्रीं वचन । कृतीं तप, त्रेतीं ज्ञान । द्वापरीं यज्ञ, दान कलीं ॥१२॥</p>
<p>
	सदा सर्वदा दानधर्म । क्षुधाशांती परम वर्म । अन्नदान नित्यनेम । कर्मांत कर्म हें आद्य ॥१३॥</p>
<p>
	होतां दोनप्रहरचे बारा । अन्नावीण जीव घाबरा । जैसें आपणा तैसेंच इतरां । जाणील अंतरा तोचि भला ॥१४॥</p>
<p>
	आचारधर्मामाजीं प्रधान । अग्रगण्य अन्नदान । पाहूं जातां तयाहून । कांहीं न आन श्रेष्ठत्वें ॥१५॥</p>
<p>
	परब्रम्हास्वरूप अन्न । त्यांतूनि भूतें होती निष्पन्न । अन्नचि जीवें जगाया साधन । अन्नांतर्लीन अवसानीं ॥१६॥</p>
<p>
	वेळीं अवेळीं येतां अतिथि । अन्नदानें सुखवावा गृहस्थीं । अन्नावीण जे माघारा लाविती । अचूक दुर्गती आमंत्रिती ॥१७॥</p>
<p>
	वस्त्रपात्रादिदानीं विचार । अन्नदानीं नलगे आधार । कोणी कधींही येवो दारावर । बरवा न अनादर तयाचा ॥१८॥</p>
<p>
	ऐसी अन्नदानाची महती । एतदर्थ प्रमाण श्रुती । म्हणूनि बाबाही अन्न संतर्पिती । लौकिकरीती आचरिती ॥१९॥</p>
<p>
	पैसा अडका इतर दान । अपूर्ण अन्नदानावीण । कायसे उडुगण शशीविहीन । शोभे कां पदकावीण हार ॥२०॥</p>
<p>
	षड्रसान्नीं जैसें वरान्न । पुण्यांत पुण्य अन्नदान । शिखर शोभे न कळसावीण । कमलविहीन सर तैसें ॥२१॥</p>
<p>
	भजन जैसें प्रेमावीण । कुंकुमावीण सुवाशीण । सुस्वरावीण गाण्याचा शीण । तक्र अलवण अस्वादू ॥२२॥</p>
<p>
	त्यांतही व्याधिष्ट शक्तिहीन । अंध पंगू बधिर दीन । तयांला आधीं घालावें अन्न । आप्तेष्ट जन त्यामागें ॥२३॥</p>
<p>
	आतां बाबांच्या हंडीची कल्पना । साधारणत: श्रोतयां मना । व्हावी म्हणोनि करितों यत्ना । जिज्ञासुजनाप्रीत्यर्थ ॥२४॥</p>
<p>
	मशिदीचिया अंगणांत । चूल एक मोठी रचीत । वरी विस्तीर्ण पातेलें ठेवीत । पाणी तें नियमित घालुनी ॥२५॥</p>
<p>
	कधीं ‘मिठ्ठे चावल’ करीत । कधीं पुलावा मांसमिश्रित । कधीं कणिकेचीं मुटकुळीं वळीत । वरान्नीं शिजवीत डाळीच्या ॥२६॥</p>
<p>
	कधीं करूनि कणिकेचे रोडगे । अथवा थापूनि कणिकेचे पानगे । सोडीत शिजत्या वरणांत अंगें । मुटकुळ्यांसंगें हळुवार ॥२७॥</p>
<p>
	मसाला वाटूनि पाटयावरती । स्वयें करीत पाकनिष्पत्ती । मुगवडया करूनि स्वहस्तीं । हळूच सोडिती हंडींत ॥२८॥</p>
<p>
	स्वर्गादि भुवनाचिया आशा । यज्ञार्थी करवूनियां पशुहिंसा । ब्राम्हाणही सेविती पुरोडाशा । सशास्त्र हिंसा ही म्हणती ॥२९॥</p>
<p>
	तैसेच मुल्लास आज्ञापून । करवूनि शास्त्रोक्त मंत्रोच्चारण । बाबाही करवीत अजाहनन । विधिविधानपुर:सर ॥३०॥</p>
<p>
	कधीं मोठी कधीं लहान । हंडीचे या प्रकार दोन । तियेमाजीं शिजवूनि अन्न । करवीत भोजन अन्नार्थियां ॥३१॥</p>
<p>
	पन्नास जणां पुरेसें अन्न । पुरवी जी ती हंडी लहान । जियेंत शंभर पात्रें जेवून । उरे जैं अन्न ती मोठी ॥३२॥</p>
<p>
	तदर्थ आपण वाणियाकडे । स्वयें जाऊनि ठरवीत आंकडे । उधारीची वार्ता न तिकडे । पैसे ते रोकडे हातावरी ॥३३॥</p>
<p>
	मीठ, मिरची, जिरें, मिरें । भाजीपाला नारळ खोबरें । स्वयें बाबा आणीत सारें । पूर्ण विचारें ठरवून ॥३४॥</p>
<p>
	स्वयें बैसूनि मशिदीतें। जातें मांडूनियां निज हातें । गहूं डाळ जोंधळियातें । बाबांनीं तेथें दळावें ॥३५॥</p>
<p>
	हंडीप्रीत्यर्थ मुख्य परिश्रम । बाबाच आपण करीत अविश्रम । मसाला वांटावयाचेंही कर्म । करीत कीं परम मनोभावें ॥३६॥</p>
<p>
	करावया सौम्य वा प्रखर । चुल्लीमाजील वैश्वानर । इंधनें हीं स्वयें खालवर । करीत वरचेवर बाबा ॥३७॥</p>
<p>
	डाळ घाळूनियां भिजत । स्वयें पाटयावर वाटूं लागत । हिंग जिरें कोथिंबीर मिश्रित । खमंग बनवीत खाद्य स्वयें ॥३८॥</p>
<p>
	तिंबूनिया कणकीचे गोळे । करूनि सव्वा हात वेटोळें । लाटूनियां मग तें सगळें । करीत पोळे विस्तीर्ण ॥३९॥</p>
<p>
	जोंधळ्याचें पीठ आंत । पाणी घालूनि प्रमाणांत । करूनियां तें तक्रमिश्रित । आंबीलही करीत हंडींत ॥४०॥</p>
<p>
	तीही आंबील अवघियांतें । परमप्रेमें बाबा हातें । वाढीत इतर अन्नासमवेतें । अति आदरें ते समयीं ॥४१॥</p>
<p>
	असो हंडी शिजली पूर्ण । ऐसी नीट पारख करून । चुल्लीखालीं उतरून । मशिदीं नेऊन ठेवीत ॥४२॥</p>
<p>
	विधिपूर्वक मौलवीहस्तें । फात्या देववून त्या अन्नातें । प्रसाद पाठवीत म्हाळसापतीतें । आणीक अतात्यांतें आरंभीं ॥४३॥</p>
<p>
	मग तेंशेष सकळ आन्न । बाबा वाढीत निजहस्तेंकरून । गरीब दुबळे तृप्त करून । सुख समाधान पावत ॥४४॥</p>
<p>
	ते अन्नार्थी यावत्तृप्ति । अन्न सेविती उल्लासवृत्ती । वरी बाबा आग्रह करिती । घ्या घ्या म्हणती प्रीतीनें ॥४५॥</p>
<p>
	काय तयांचें पुण्य गहन । जयां हें लाधलें तृप्तिभोजन । स्वयें बाबा ज्यां ओगरिती अन्न । काय ते धन्य भाग्याचे ॥४६॥</p>
<p>
	येथें सहज येईल आशंका । प्रसाद म्हणूनि बाबा लोकां । समांस अन्नही भक्तां अनेकां । नि:शंक मनें कां वांटीत ॥४७॥</p>
<p>
	तरी या शंकेचें निराकरण । करावया न लागे शीण । जयांस नित्याचें मांसाशन । तयांसीच हें अन्न वाढीत ॥४८॥</p>
<p>
	आजन्मांत नाहीं सहवास । तया स्पर्शूं न देती मांसास । कधींही न करिती हें साहस । प्रसादीं लालसा त्यां देती ॥४९॥</p>
<p>
	गुरु स्वयें प्रसाद देतां । सेव्यासेव्याचा विकल्प येतां । शिष्य पावे निजात्मघाता । अध:पातातें जाई ॥५०॥</p>
<p>
	या तत्त्वाची कोठवर जाण । जाहली आपुल्या भक्तांलागून । म्हणोनि थट्टाविनोदेंकरून । बाबा हें आपण अनुभवीत ॥५१॥</p>
<p>
	ये अर्थीची अल्प वार्ता । आठवली जी लिहिता लिहितां । श्रोतीं परिसिजे स्वस्थचित्ता । निजहितार्थालागून ॥५२॥</p>
<p>
	आली एकदां एकादशी । बाबा वदती दादांपाशीं । “कोर्‍हाळ्याहूनि सागोतीशी । आणविशी कां मजलागीं” ॥५३॥</p>
<p>
	तदर्थ साईंनीं रुपये काढिले । दादांपाशीं मोजूनि दिधले । “जातीनें जा” आज्ञापिलें । “तूंच हें केलें पाहिजे” ॥५४॥</p>
<p>
	नामें गणेश दामोदर । उपनाम जयांचें केळकर । जन जाणोनि ते वयस्कर । दादाच सर्व संबोधिती ॥५५॥</p>
<p>
	हरी विनायक साठयांचे श्वशुर । साईपदीं प्रेम अनिवार । ब्राम्हाण ब्रम्हाकर्मीं आदर । आचारविचारसंपन्न ॥५६॥</p>
<p>
	करितां रांत्रदिन निजगुरुसेवा । धणी न पुरे जयांच्या जीवा । तयांस या आज्ञेचा नवलावा । नकळे वाटावा कैसेनी ॥५७॥</p>
<p>
	जयाचीं गात्रें अविकळ । जया पूर्वाभ्यासाचें बळ । तयाचें मन कधीं न चंचळ । बुद्धिही अचळ गुरुपदीं ॥५८॥</p>
<p>
	धनधान्यवस्त्रार्पण । हेंच नव्हे दक्षिणादान । गुर्वाज्ञेचें अनुष्ठान । गुरुसंतोषण दक्षिणा ॥५९॥</p>
<p>
	कायावाचामनादिकांची । करी जो कुरवंडी सर्वांची । अंतीं जो साधी गुरुकृपेची । प्राप्ति तयाची निजश्रद्धा ॥६०॥</p>
<p>
	मग ती आज्ञा वंदूनि शिरीं । कपडे करूनि आले सत्वरी । निघाले जाऊं त्या गांवावरी । तंव माघारीं वोलाविलें ॥६१॥</p>
<p>
	“अरे ही खरेदी करावयास । कोणास तरी पाठवीनास” । म्हणाले “जाण्यायेण्याचा त्रास । उगी न सायास करावे” ॥६२॥</p>
<p>
	मग ती सागोती आणावयास । दादांनीं पाठविलें पांडू गडयास । इतुक्यांत बाबा वदती दादांस । पहा त्या समयास काय तें ॥६३॥</p>
<p>
	पांडू निघाला जावयास । पाहूनि लागला तो रस्त्यास । राहूं दे म्हणती आजचा दिवस । परतवीं तयास माघारा ॥६४॥</p>
<p>
	असो पुढें एक्या काळीं । आली हंडी बनविण्याची उकळी । चुलीवर डेग चढविली । सागोती रिचविली तियेंत ॥६५॥</p>
<p>
	तांदूळ धुऊनि टाकिले तींत । यथाप्रमाण पाणी घालीत । लांकडें सारूनि खालीं चुलींत । बाबा तीं फुंकीत बैसले ॥६६॥</p>
<p>
	गांव सगळा त्यांना अंकित । कोणीही आनंदें बसता फुंकीत । परी बाबांच्या आज्ञेविरहित । चालेना हिंमत कवणाची ॥६७॥</p>
<p>
	अन्नही रांधूनि आणावयास । आज्ञाच करण्याचा अवकाश । परम सोत्कंठ साईंचे दास । साईच उदास एतदर्थ ॥६८॥</p>
<p>
	उदास म्हणणें हेंही न सार्थ । स्वयंपाकीं जया स्वार्थ । तो इतरांतें कष्टवील किमर्थ । अन्नदानार्थ परकियां ॥६९॥</p>
<p>
	निजनिर्वाहा पोटापुरी । स्वयें जो मागे माधुकरी । हिंडे तदर्थ दारोदारीं । मागे भाकरी चतकोर ॥७०॥</p>
<p>
	तोच करावया अन्नदान । सोशील जेव्हां कष्ट आपण । तेव्हांच तयातें समाधान । राहीना अवलंबून कोणावरी ॥७१॥</p>
<p>
	शंभर पात्रांचा स्वयंपाक । होईल इतुकें पीठ कणीक । तांदुळ डाळ पाहूनि चोख । आणीत रोख बाबा स्वयें ॥७२॥</p>
<p>
	स्वयें सूप घेऊनि हातीं । वणियाचे दुकानीं जे जाती । व्यवहारीं चोख असावें किती । जन हें शिकती जयाचेनी ॥७३॥</p>
<p>
	वस्तु स्वयें हातीं घेऊनि । करीत दरदाम कसून । कोणी जाऊं न शके छकवून । गर्व हरून जातसे ॥७४॥</p>
<p>
	ऐसा हिशेबीं आव घालिती । पैही न तेथें जाऊं देती  । पांच मागतां दहा देती । दाम चुकाविती हातोहात ॥७५॥</p>
<p>
	स्वयें कामाची मोठी हौस । दुजियानें केलें न चले त्यांस । न धरती कधीं कुणाची आस । परी न त्रास कवणाचा ॥७६॥</p>
<p>
	हें एक तत्त्व बाबांपाशीं । होतें जागृत अहर्निशीं । म्हणून या हंडीचे कार्यासी । साह्य न कोणाशीं मगत ॥७७॥</p>
<p>
	हंडीच काय धुनीच्या लगत । सर्पणाचे खोलीची भिंत । पूर्वभागाची तीन चतुर्थ । स्वहस्तरचित बाबांची ॥७८॥</p>
<p>
	महादू करी कर्दमगारा । बाबा थापी घेऊनि निजकरा । रचीत विटांच्या भरावर थरा । भिंती उभारावयास ॥७९॥</p>
<p>
	आणीक बाबा काय न करिती । मशीद आपण स्वयें सारविती । हातीं कफनी लंगोट शिवती । आस न ठेविती कवणाची ॥८०॥</p>
<p>
	हंडींतूनि येतां वर । वाफा उसळत असतां भयंकर । अस्तनी सारूनि बाबा निजकर । घालूनि खालवर ढवळीत ॥८१॥</p>
<p>
	पाहूनि तपेलें खतखतलें । ढवळण्याचे योग्य झालें । नवल बाबा ऐसिया वेळे । अगाध लीले दावीत ॥८२॥</p>
<p>
	कोठें रक्तमांसाचा हात । कोठें तपेलें प्रखर रखरखीत । परी न भाजल्याची खूण यत्किंचित । न भयभीत मुखचर्या ॥८३॥</p>
<p>
	जो भक्तांचिया पडतां मस्तकीं । तात्काळ वारी त्रिताप समस्त कीं । तयासी कैसें दुखवावें पावकीं । महती न ठावुकी काय तया ॥८४॥</p>
<p>
	भिजली डाळ पाटयावरती । घालूनियां स्वयें निवडिती । स्वरीं वरवंटा घेऊनि वाटिती । मुगवडया बनविती निजहस्तें ॥८५॥</p>
<p>
	मग त्या हंडींत हळूच सोडिती । खालीं न लगाव्या म्हणुनी घाटिली । तयार होतां हंडी उतरिती । प्रसाद वांटिती सकळिकां ॥८६॥</p>
<p>
	सकळिकां कां म्हणतील श्रोते । साईबाबा तों यवन होते । मग ऐसिया अधर्माचरणातें । जाहए करविते कैसेनी ॥८७॥</p>
<p>
	या शंकेचें एकचि उत्तर । धर्म आणि अधर्म विचार । साईंपाशीं हें साचार । निरंतर जागत ॥८८॥</p>
<p>
	हंडींतील शिजलेले पदार्थ । घ्यावेत सर्वांनीं सेवनार्थ । ऐसा दुराग्रह यत्किंचित । साई न धरीत केव्हांही ॥८९॥</p>
<p>
	परी तो प्रसाद व्हावा प्राप्त । ऐसिया सदिच्छें जे जे प्रेरित । तयांची केवळ वासना पुरवीत । प्रपंच न करीत केव्हांही ॥९०॥</p>
<p>
	शिवाय ठावी कोणास ज्ञाती । मशिदीं वसती यवन म्हणती । परी तयांची आचरिती रीती । पाहूनि जाती कळेना ॥९१॥</p>
<p>
	भक्त जयास देव मानिती । जयाच्या ते पदरजीं लोळती । तयाची अवलोकिती काय जाती । परमार्थप्राप्ति धिक्  त्याची ॥९२॥</p>
<p>
	इहामुत्रीं जो बाणला विरक्ती । विवेक वैराग्य जयाची संपत्ति । काय तयाची पहाणें जाती । परमार्थप्राप्ति धिक् त्याची ॥९३॥</p>
<p>
	धर्मधर्मातीत स्थिती । जयाची शुद्ध आनंदवृत्ति । काय तयाची पाहणें जाती । परमार्थप्राप्ति धिक् त्याची ॥९४॥</p>
<p>
	ऐसें हें बाबांचें चरित । मी तों गाईं निजसुखार्थ । असेल कोणा श्रवणाची आर्त । पुरेलही भावार्थ तयाचा ॥९५॥</p>
<p>
	असो या कथेचें अनुसंधान । राहिलें मागेंच पहा परतून । बाबा दादांस अनुलक्षून । वदती अवधान द्या तेथें ॥९६॥</p>
<p>
	खारा पुलावा आहे केला । पाहिलास कां कैसा झाला । दादांनीं उपचारार्थ नांवाजिला । हो  हो चांगला म्हणूनि ॥९७॥</p>
<p>
	दादा पुराणे भक्त वरिष्ठ । स्नानसंध्यानियमनिष्ठ । पाहती सदा शिष्टाशिष्ट । तयां न हें इष्ट वाटलें ॥९८॥</p>
<p>
	नाहीं कधीं द्दष्टीं देखिला । नाहीं कधीं जिव्हे चाखिला । ऐसियास कैसा म्हणसी चांगला । म्हणती दादाला तंव बाबा ॥९९॥</p>
<p>
	काढ कीं रे डेगीचें पुढें म्हणती हात काढ । पळा घे हा ताटांत वाढ । सोंवळ्याची न धरीं चाड । उगीच बाड मारूं नको ॥१०१॥</p>
<p>
	संत म्हणतील शिष्यास बाट । कल्पनाच ही आधीं अचाट । संत कृपेनें भरले घनदाट । तयांची वाट त्यां ठावी ॥१०२॥</p>
<p>
	खर्‍या प्रेमाची उठतां लहरी । माताही घे चिमटा करीं । मग जैं बाळ आरोळी मारी । तंव तीच धरी पोटासीं ॥१०३॥</p>
<p>
	अभक्ष्य भक्षार्थीं जयाचें मन । तयाची वासना करिती शमन । तेंच करी जो मनाचें दमन । तयास अनुमोदन दे साई ॥१०४॥</p>
<p>
	ही आज्ञापालन - मीमांसा । जाई कधीं ती इतुकी कळसा । स्पर्शले जे न आजन्म मांसा । तयांचा भरंवसा डळमळे ॥१०५॥</p>
<p>
	पाहूं जातां वस्तुस्थिति । ऐसिया भक्ता कवणाहीप्रती । कधीं न बाबा स्वयें प्रवर्तविती । उन्मार्गवर्ती व्हावया ॥१०६॥</p>
<p>
	असो सन एकोणीसशें दहा । तया वर्षापूर्वीं पहा । योग हंडीचा वरचेवर हा । बहु उत्साहासमन्वित ॥१०७॥</p>
<p>
	तेथून पुढें मुंबाशहरीं । दासगणूंची आली फेरी । साईमाहात्म्य कीर्तनगजरीं । कोंदिलें अंतरीं सकळांच्या ॥१०८॥</p>
<p>
	तेव्हांपासूनि बाबांची महती । कळूनि आबालवृद्धांप्रती । तेथूनि जन जाऊं लागती । शिरडीं न गणती तयांची ॥१०९॥</p>
<p>
	पुढें पूजा पंचोपचार । नैवेद्याचे नानाप्रकार । सुरू झाले आहार - उपहार । दुपारतिपार बाबांस ॥११०॥</p>
<p>
	वरण भात शिरा पुरी । चपात्या चटणी कोशिंबिरी । नानाविध पंचामृत खिरी । अन्नसामुग्री लोटली ॥१११॥</p>
<p>
	यात्रा लोटली अपरिमित । जो तो दर्शना जाई धांवत । साईचरणीं नैवेद्य अर्पीत । क्षुधार्त संतृप्त सहजेंच ॥११२॥</p>
<p>
	होऊं लगले राजोपचार । ढाळूं लागले छत्रचामर । टाळ घोळ वाद्यगजर । भजकपरिवार वाढला ॥११३॥</p>
<p>
	महिमा वाढला सर्वत्र । गाऊं लगले स्तुतिस्तोत्र । पुढें शिरडी जाहलें क्षेत्र । परम पवित्र यात्रार्थियां ॥११४॥</p>
<p>
	तेणें हंडीचें कारण सरलें । नैवेद्य इतुके येऊं लागले । त्यांतचि फकीर फुकरे धाले । उरूं लागलें अन्न बहु ॥११५॥</p>
<p>
	आतां कथितों आणिक कथा । परिसतां आनंद होईल चित्ता । आराध्य वस्तूचा अनादर करितां । बाबा निजचित्ता अप्रसन्न ॥११६॥</p>
<p>
	करूनि कांहींतरी अनुमान । कोणी साईस म्हणती ब्राम्हाण । कोणी तया मुसलमान । ज्ञातिविहीन असतां तो ॥११७॥</p>
<p>
	नाहीं जयाचें ठावठिकाण । कवण्या ज्ञातीं केव्हां जनन । कवण माता पिता हे ज्ञान । मुसलमान ब्राम्हाण वा ॥११८॥</p>
<p>
	असता जरी मुसलमान । कैसें मशिदींत अग्न्याराधन । असतें का तेथ तुलसीवृंदावन । घंटावादन साहता का ॥११९॥</p>
<p>
	करूं देता शंखस्फोरण । सवादित्र कथा कीर्तन । टाळ घोळ मृदंगवादन । हरिनामगर्जन मशीदीं ॥१२०॥</p>
<p>
	असता जरी मुसलमान । मशिदींत स्वयें बैसून । करूं देता कां गंधचर्चन । तेथ सहभोजन करिता का ॥१२१॥</p>
<p>
	असता जरी मुसलमान । असते काय सविंध कान निजपल्लवचे दाम वेंचून । करिता का जीर्णोद्धारण देउळाचें ॥१२२॥</p>
<p>
	धारण करिता का स्नानोत्तर । महवस्त्र पीतांबर । उलट आराध्य दैवतीं अनादर । झालिया क्षणभर खषत नसे ॥१२३॥</p>
<p>
	ये अर्थींची बोधक कथा । आठवली जी लिहितां लिहितां । सादर करितों अतिविनीतता । स्वस्थचित्ता परिसिजे ॥१२४॥</p>
<p>
	पहा एकादा ऐसें घडलें । बाबा लेंडीहूनि परतले । मशिदीसी येऊनि बैसले । भक्त पातले दर्शना ॥१२५॥</p>
<p>
	त्यांतचि बाबांच्या बहुप्रीतीचे । होते भक्तवर चांदोरकर साचे । आले भुकेले दर्शनाचे । बिनीवाल्यांचे समवेत ॥१२६॥</p>
<p>
	नमस्कारोनि साईनाथां । सन्मुख बैसले ते उभयतां । चालल्या असतां कुशलवार्ता । बाबा अवचितां रगावले ॥१२७॥</p>
<p>
	म्हणती नान अतुजकदून । व्हावें कैसें हें विस्मरण । हेंच काय त्वां केलें संपादन । मजसवें दिन घालवूनि ॥१२८॥</p>
<p>
	त्वां जी माझी केली संगती । अखेर तिची हीच का गती । ऐसी कैसी भ्रमली मती । यथानिगुती मज सांग ॥१२९॥</p>
<p>
	परिसोनि नाना अधोवदन । मनीं विचारिती कोपकारण । होईना कांहींही आठवण । मन उद्विग्न जाहलें ॥१३०॥</p>
<p>
	चुकलें कोठें कांहीं कळेना । कोपास कांहीं कारण दिसेना । परी कांहीं तरी जाहल्याविना । बाबा न कोणा दुखविती ॥१३१॥</p>
<p>
	म्हणोनि बाबांचे पाय धरिले । बहुतांपरी विनविलें । अखेर नानांनीं पदर पसरिले । पुसिले भरले कां रागें ॥१३२॥</p>
<p>
	“वर्षानुवर्ष माझी संगती । असतां तुझी हे का गती  । काय झालें तुझिया मती” । बाबा वदती नानांतें ॥१३३॥</p>
<p>
	“कोपरगांवीं कधीं आलां । वृत्तांत काय वाटेसी घडला । मार्गांत मध्यें कोठें उतरलां । तांगा हांकिला कीं थेट ॥१३४॥</p>
<p>
	नवल कांहीं घडलें वाटे । साद्यंत परिसावें ऐसें वाटे । सांग पां झालें काय कोठें । असो मोठें सान वा” ॥१३५॥</p>
<p>
	ऐसें परिसतां नाना उमजले । तात्काळ त्यांचें तोंड उतरलें । जरी बोलावया मनीं शरमले । तरी तें केलें निवेदन ॥१३६॥</p>
<p>
	लपवालपवी न चले येथ । मनांत केलें हें निश्चित । मग जें घडलें तें साद्यंत । नाना सांगत बाबांतें ॥१३७॥</p>
<p>
	असत्य चालेना साईंप्रती । असत्यें नाहीं साईंची प्राप्ति । असत्यें जाणें अधोगति । अंतीं दुर्गती असत्यें ॥१३८॥</p>
<p>
	गुरुवंचन महादुष्कृति । पापास नाहीं तया निष्कृति । जाणोनि नाना बाबांप्रती । घडलेलें कळविती साद्यंत ॥१३९॥</p>
<p>
	म्हणती प्रथम तांगा ठरविला । थेट शिरडीचा ठराव केला । गोदातटींचा दत्त अंतरला । बिनीवाल्यांना त्यायोगें ॥१४०॥</p>
<p>
	बिनीवाले दत्तभक्त । लागतां दत्तमंदिर मार्गांत । उतरावें खालीं आलें मनांत । दर्शनार्थ दत्ताच्या ॥१४१॥</p>
<p>
	परी होती मजला घाई । मींच तयांतें केली मनाई । शिरडीहून परततां पाहीं । घेतां हें येईल दर्शन ॥१४२॥</p>
<p>
	ऐसा होऊनि उतावेळ । शिरडीस यावया होईल वेळ । म्हणोनि केली म्यां टाळाटाळ । भेट हेळसिली दत्ताची ॥१४३॥</p>
<p>
	पुढे करितां गोदास्नान । कंटक मोठा पायीं रुतून । मार्गीं अत्यंत जाहला शीण । काढिला उपटून प्रयत्नें ॥१४४॥</p>
<p>
	तंव बाबा देती इषारा । “बरी ही नव्हे ऐसी त्वरा । सुटलासि कांटयावरी तूं बरा । करूनि अनादरा दर्शनीं ॥१४५॥</p>
<p>
	दत्तासारिखें पूज्य दैवत । असतां सहज मार्गीं तिष्ठत । अभागी जो दर्शनवर्जित । मी काय पावत तयासी” ॥१४६॥</p>
<p>
	आतां असो हंडीची वार्ता । मशिदीमाजीं साईसमवेता । काय ती अपराण्हभोजन - पावनता । भक्तप्रेमळता साईंची ॥१४७॥</p>
<p>
	माध्यान्हपूजा झालियावरती । प्रत्यहीं होतां बाबांची आरती । भक्तजन जंव माघारा परतती । उदी तंव देती समस्तां ॥१४८॥</p>
<p>
	मशिदीचिया धारेवरती । बाबा येऊनि उभे ठाकती । भक्तगण अंगणीं तिष्ठती । चरण वंदती एकेक ॥१४९॥</p>
<p>
	पायांवरी ठेवुनी डोई । जो जो सन्मुख उभा राही । तया एकेका भाळीं ते समयीं । लावीत साई उदीतें ॥१५०॥</p>
<p>
	‘आतां समस्तीं लहानथोरीं । जावें जेवाया आपुलाल्या घरीं । वंदूनि बाबांची आज्ञा ही शिरीं । जन माघारीं परतत ॥१५१॥</p>
<p>
	फिरतां मग बाबांची पाठ । पडदा ओढीत यथा परिपाठ । ताटावाटयांचा खणखणाट । होई मग थाट प्रसादाचा ॥१५२॥</p>
<p>
	साईकरस्पर्शें पूत । नैवेद्यशेष मिळावा परत । म्हणोनि मार्गप्रतीक्षा करीत । कित्येक बैसत अंगणीं ॥१५३॥</p>
<p>
	येरीकडे निंबरानिकट । बाबा जंव बैसती करूनि पाठ । दोहीं बाजूंस पंक्तींचा थाट । आनंद उद्भट सकळिकां ॥१५४॥</p>
<p>
	जो तो आपापला नैवेद्य सारी । साई समर्थांचिया पुढारीं । तेही मग एका ताटाभीतरीं । निजकरें करीत एकत्र ॥१५५॥</p>
<p>
	तें बाबांच्या हातीचें शित । लाधाया पाहिजे भाग्य अमित । जेणें भोक्ता सबाह्या पुनीत । सफल जीवित तयाचें ॥१५६॥</p>
<p>
	वडे अपूप सांजोर्‍या पुरिया । कधीं शिखरिणी घारगे फेणिया । विविध शाका खिरी कोशिंबिरीया । बाबा मग बरविया एकवटती ॥१५७॥</p>
<p>
	एणें विधी मग तें अन्न । बाबा करीत ईश्वरार्पण । मग शामा - नानांकडून । ताटें भरभरून वाढवीत ॥१५८॥</p>
<p>
	पुढें एकेकास बोलावून । आपुलेपाशीं बैसवृन । परमानंदें प्रीतीकरून । आकंठ भोजन करवीत ॥१५९॥</p>
<p>
	खमंगघृतें जो सुखाडला । पोळीवरान्न इंहीं मिसळिया । ऐसा करूनि गोड काला । बाबा सकळांला वाढीत ॥१६०॥</p>
<p>
	सेवितां हा प्रेमाचा काला । काय गोडी ब्रम्हानंदाला । भोक्ता बोटें चोखीत निघाला । अखंड धाला तृप्तीनें ॥१६१॥</p>
<p>
	कधीं मांडे पूर्णपोळिया । कधीं पुरिया शर्करे घोळलिया । कधीं बासुंदी शिरा सांजोरिया । वाढिती गुळवरिया स्वादिष्ट ॥१६२॥</p>
<p>
	कधीं शुभ्र अंबेमोहोर । तयावरी वरान्न सुंदर । घृत लोणकढें स्वादिष्ट रुचिर । शाखापरिकर वेष्टित ॥१६३॥</p>
<p>
	लोणचें पापड आणि रायतें । नानापरींचीं भजीं भरितें । व्कचिदाम्लदधितक्रपंचामृतें । धन्य ते सेविते दिव्यान्ना ॥१६४॥</p>
<p>
	जेथें भोक्ता श्रीसाईनाथ । भोजनाची त्या काय मात । भक्त तेथ आकंठ जेवीत । ढेंकरही देत तृप्तीचे ॥१६५॥</p>
<p>
	ग्रासोग्रासीं समाधान । तुष्टि - पुष्टि - क्षुधानाशन । ऐसें तें गोड सुग्रास अन्न । परम पावन प्रेमाचें ॥१६६॥</p>
<p>
	ग्रासोग्रासीं नाम समस्त । दिव्यान्नाच्या आहुती देत । पात अणुमात्र रितें न होत । ओगरिलें जात वरिचेवरी ॥१६७॥</p>
<p>
	जया पव्कान्नीं जयां आसक्ति । प्रेमें वाढिती तयांस तीं तीं । कितीएकांस आम्ररसीं प्रीती । रस त्यां वाढिती प्रीतीनें ॥१६८॥</p>
<p>
	ऐसें हें अन्न वाढावयासी । नानासाहेब निमोणकरांसी । अथवा माधवराव देशपांडयांसी । बाबा प्रतिदिवशीं आज्ञापीत ॥१६९॥</p>
<p>
	तयांचाही नित्य नेम । नैवेद्य वाढणें हेंचि काम । तदर्थ करीत अति परिश्रम । परमप्रेमसमन्वित ॥१७०॥</p>
<p>
	भात सुग्रास जिरेसाळी । जैसी मोगरियाची कळी । वरी तुरीची दाळी पिवळी । घृत पळी पळी समस्तां ॥१७१॥</p>
<p>
	वाढितां ये आमोद घमघमित । चटणियांसीं भोजन चमचमित । अपव्क अरुचिर नाहीं किंचित । यथेष्ट निश्चित जेविती ॥१७२॥</p>
<p>
	त्या स्वानंदताटींच्या शेवया । सप्रेम भक्तीचिया कुरडिया । शांतिसुख स्वानुभविया - । वांचून जेवावया कोण ये ॥१७३॥</p>
<p>
	‘हरिरन्नं हरिर्भोक्ता’ । हरीच रसाची चवी चाखिता । धन्य तेथील अन्न वाढिता । धन्य तो सेविता दाताही ॥१७४॥</p>
<p>
	या सर्व गोडियेचें जें मूळ । ती एक निष्ठा गुरुपदीं प्रबळ । गोड नव्हे शर्करा गूळ । गोड ती समूळ श्रीश्रद्धा ॥१७५॥</p>
<p>
	ऐसें नित्यश्रीर्नित्यमंगळ । खीर शिरा काल्याची चंगळ । पात्रीं बसल्यावर टंगळमंगळ । चाले न अंमळही तेथें ॥१७६॥</p>
<p>
	परोपरीची पाकनिष्पत्ति । सेवूनि होतां उदरपूर्ति । विना - दध्योदन नाहीं तृप्ति । नसल्यास मागती तक्र तरी ॥१७७॥</p>
<p>
	एकदां स्वच्छ तक्राचा प्याला । जो गुरुरायें निजहस्तें भरिला । प्यावया मज प्रेमें दिधला । म्यां जंव लाविला ओठास ॥१७८॥</p>
<p>
	शुभ्र स्वच्छ तक्र द्दष्टीं । पाहोनि जाहली सुखसंतुष्टी । लावितां तो प्याला ओष्ठीं । स्वानंदपुष्टी लाधलों ॥१७९॥</p>
<p>
	आधींच पव्कान्नीं धालें पोट । तेथ हें होईल कैसेन प्रविष्ट । आशंका ऐसी घेतां क्लिष्ट  । घुटका तो स्वादिष्ट लागला ॥१८०॥</p>
<p>
	पाहोनि ऐसा मी संकोचित । बाबा अति काकुळती वदत । “पिऊन घे रेतें समस्त” । योग न हा परत जणुं गमला ॥१८१॥</p>
<p>
	असो पुढें आलीच प्रचीती । तेथूनि पुढें दों मासांतीं । बाबा आपुला अवतार संपविती । खरेंच पावती निर्वाण ॥१८२॥</p>
<p>
	आतां तया ताकाची तहान । भागवावया मार्ग न आन । विना साईकथामृतपान । तेंच कीं अवलंबन आपुलें ॥१८३॥</p>
<p>
	हेमाड साईनाथांसी शरण । साईच देतील पुढां जें स्मरण । तेंचि कीं होईल कथानिवेदन । श्रोतीं निजावधान राखावें ॥१८४॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । हंडीवर्णनं  नाम अष्टत्रिंशत्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 15:34:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 15:46:44 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ३७]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-37-122042600065_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
धन्य धन्य साईचें चरित । धन्य तयाचें नित्यचरित । क्रियाही अकळ अत्यद्भुत । इत्थंभूत अकथ्य ॥१॥
अगाध त्याचेम सच्चरित  ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 37" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650967393-4969.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra chapter 37" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	धन्य धन्य साईचें चरित । धन्य तयाचें नित्यचरित । क्रियाही अकळ अत्यद्भुत । इत्थंभूत अकथ्य ॥१॥</p>
<p>
	अगाध त्याचेम सच्चरित  । धन्य तयाचें जीवनवृत्त । धन्य धन्य तें अप्रतिहत । असिधाधराव्रत तयाचें ॥२॥</p>
<p>
	कधीं ब्रम्हानंदें उन्मत्त । कधीं ते निजबोधे तृप्त । कधीं सर्व करूनि अलिप्त । ऐसी अनिश्चित ती स्थिती ॥३॥</p>
<p>
	कधीं सर्वप्रवृत्तिशून्य । तरी तो नव्हे निद्रासंपन्न । निजस्वार्थीं ठेवूनि मन । सदा सावधान निजरूपीं ॥४॥</p>
<p>
	कधीं सागरासम प्रसन्न । परी तो दुरंत दुर्विगाह्य गहन । कोणा हें अगाधरूप निरूपण । यथार्थपणें करवेल ॥५॥</p>
<p>
	पुरुषांसवें धरी बंधुता । स्त्रिया तयाच्या बहिणी माता । ब्रम्हाचारी ऊर्ध्वरेता । ठावा समस्तां सर्वदा ॥६॥</p>
<p>
	ऐसियाचे सत्संगतीं । प्राप्त झाली जी मति । तीच राहो निश्चल स्थिति । निधनप्राप्तीपर्यंत ॥७॥</p>
<p>
	उदंड व्हावी सेवावृत्ति । चरणीं जडावी अनन्य भक्ति । भगवद्भाव सर्वांभूतीं । अखंड प्रीति तन्नामीं ॥८॥</p>
<p>
	पाहोनि त्याच्या एकेक कृती । जे जे कारण शोधूं जाती । ते ते कुंठित होऊनि अंतीं । स्वस्थचि बैसती तटस्थ ॥९॥</p>
<p>
	कितीएक स्वर्गसौख्या झघडती । वानिती अत्यंत स्वर्गाची महती । ते भूलोका तुच्छ मानिती । मरणाची भीति म्हणती इथें ॥१०॥</p>
<p>
	परी अव्यक्तांतूनि आकारा येती । तियेसाचि म्हणती ‘व्यक्त’ स्थिति । पुढें तीच प्रवेशतां अव्यक्तीं । ‘मृत्यु’ म्हणती तियेस ॥११॥</p>
<p>
	अधर्म अज्ञान राग द्वेष । इत्यादिक हे मृत्युपाश । यांचें उल्लंघन । करी जो अशेष । त्यासीच प्रवेश स्वर्लोकीं ॥१२॥</p>
<p>
	स्वर्ग स्वर्गत तो काय आणिक । वैराज तोच स्वर्गलोक । विराट आत्मस्वरुप देख । मानसदु:खविवर्जित ॥१३॥</p>
<p>
	जेथें नाहीं रोगादि निमित्त । नाहीं चिंता व्याधी दु:ख । जेथें न क्षुधातृषाकुलित । कोणी न व्यथित जराभयें ॥१४॥</p>
<p>
	जेथें नाहीं मृत्युभय । नाहीं विधि - निषेध द्वय । जीव वावरे अत्यंत निर्भय । तीच कीं दिव्य स्वर्गस्थिति ॥१५॥</p>
<p>
	जें आब्रम्हास्थावरान्त । पूर्ण स्थावर - जंगमांत । तेंचि तत्त्व परत्रीं वा येथ । नानात्वविरहित तेंच तें ॥१६॥</p>
<p>
	असतां संसारधर्मवर्जित । होतां उपाधिसमन्वित । तेंचि आभासे अब्रम्हावा । अविद्यामोहित जीवास ॥१७॥</p>
<p>
	परब्रम्हा तें मजहूनि भिन्न । तें मी नव्हे मी तों आन । ऐसें जयाचें भेदज्ञान । तो मरणाधीन सर्वदा ॥१८॥</p>
<p>
	जननापाठीं लागलें मरण । मरणापाठीं पुनर्जनन । हें संसृतिचक्र परिवर्तन । पाठीस चिरंतन तयाच्या ॥१९॥</p>
<p>
	दुष्कर यज्ञतपोदान । इंहीं जयाचें होया आपादन । तें नारायणपद स्मृतिविहीन । स्वर्गायतन किमर्थ ॥२०॥</p>
<p>
	केवळ विषयभोगाचें स्थान । नलगे  आमुतें स्वर्गभुवन । जेथें न गोविंदनामस्मरण । काय कारण तयाचें ॥२१॥</p>
<p>
	स्वर्गा जा अथवा नरका । फरक नाहीं विषयसुखा । इंद्रा वा गर्दभा देखा । सुख विलोका एकचि ॥२३॥</p>
<p>
	जेथूनि पुण्यक्षयें पतन । किंनिमित्त तदर्थ यत्न । त्याहूनि बरवें एथील जनन । महत्त्वें गहन भूलोक ॥२४॥</p>
<p>
	जेथें आयुष्य कल्पवरी । काय त्या ब्रम्हालोकाची थोरी । अल्पायुष्य हो का क्षणभरी । भूलोकपरी आणीक ॥२५॥</p>
<p>
	क्षणभंगुर आयुष्यपण । केलें कर्म एक क्षण । करी जो सर्व ईश्वरार्पण । अभय स्थान पावे तो ॥२६॥</p>
<p>
	जेथें न भगवद्भक्त जन । करिती न हरिगुरुकथावर्णन । संगीत - नृत्य - भगवत्पूजन । तें काय स्थान कामाचें ॥२७॥</p>
<p>
	ब्रम्हात्मैकत्व - विज्ञान । आत्यंतिक नि:श्रेयससाधन । तें तों या स्वर्गाहूनि गहन । भूलोक हें स्थान तयाचें ॥२८॥</p>
<p>
	कायावाचामनेंकरून । करा पंचही प्राण समर्पण । निश्चयात्मक बुद्धिही लीन । होवो गुर्वधीन सर्वस्वीं ॥२९॥</p>
<p>
	एवं सद्नुरूसी शरण जातां । भवभयाची कायसी वार्ता । प्रपंचाची किमर्थ चिंता । असतां निवारिता सर्वस्वीं ॥३०॥</p>
<p>
	अविद्येचा जेथें वास । तेथें पुत्र - पश्वादिपाशा । संसारचिंता अहर्निश । नाहीं लवलेश सुविचार ॥३१॥</p>
<p>
	अविद्या सर्वां मूळ कारण । उपस्थापी नानत्वविंदान । आचार्यागम - संस्कृतज्ञान । तदर्थ संपादन करावें ॥३२॥</p>
<p>
	होतां अविद्यानिवर्तन । उरे न अणुमात्र नानात्वज्ञान । चुके तयाचें जन्ममरण । एकत्वविज्ञान या मूळ ॥३३॥</p>
<p>
	धरी  जो अत्यल्प भेदद्दष्टी । पडेल जन्ममरणाचे कष्टीं । तयास विनाश आणि सृष्टी । लागली पाठीं सदोदित ॥३४॥</p>
<p>
	‘श्रेय’ हाचि जिचा विषय । तीच ती विद्या नि:संशय । जिचा विषय केवळ ‘प्रेय’ । अविद्या नामधेय तियेस ॥३५॥</p>
<p>
	मृत्यु हेंच मोठें भवभय । तयापासूनि व्हावया निर्भय । घट्ट धरा गुरुचरणद्वय । देतील अद्वयबुद्धीतें ॥३६॥</p>
<p>
	जेथें द्वितीय - अभिनिवेश । तेथेंच कीं या भयासी प्रवेश । म्हणोनि जेथें न भय लवलेश । तें निर्विशेष पद सेवा ॥३७॥</p>
<p>
	शुद्धप्रेम - मलयागर । लावा तयाचिया बाळावर । नेसवा भावार्थ - पीतांबर । दावील विश्वंभर निजभक्तां ॥३८॥</p>
<p>
	द्दढ श्रद्धेचें सिंहासन । अष्टभावमंडित पूर्ण । आनंदाश्रुजलें स्नपन । सद्य: प्रसन्न प्रकटेल ॥३९॥</p>
<p>
	भक्ति - मेखळा कटीभोंवतीं । बांधोनि आकळा तयाप्रती । सर्वस्वाचें निंबलोण प्रीतीं । करा मग आरती ओंवाळा ॥४०॥</p>
<p>
	कोण्याही कार्याचा प्रविलय । होई धरूनि अस्तित्वाश्रय । खडयानें घट फोडिला जाय । निवृत्त होय आकारचि ॥४१॥</p>
<p>
	घटास्तित्वांश लवमात्रही । नाहीं ऐसा होत नाहीं । फुटक्या खापर्‍यांचियाही ठायीं । अनुवृत्ति होई घटाची ॥४२॥</p>
<p>
	म्हणूनि कार्याचें जें प्रविलापन । तें अस्तित्वनिष्ठ चिरंतन । म्हणूनि कोणाचेंही देहावसान । नव्हे पर्यवसान शून्यत्वीं ॥४३॥</p>
<p>
	कार्य न कारणाव्यतिरिक्त । झाले व्यक्त जरी अव्यक्त । तरी तें सदैव सदन्वित । हें तों सुप्रतीत सर्वत्र ॥४४॥</p>
<p>
	सूक्ष्मतेचिया न्यूनाधिक्याची । परंपराही दर्शवी हेंचि । स्थूलकार्यविलयीं साची । सूक्ष्मकारणचि अवशिष्ट ॥४५॥</p>
<p>
	तयाचाही विलय होतां । त्याहूनि सूक्ष्म अवशिष्ट राहतां । सकलेंद्रिय - मन - बुद्धि - ग्राहकता । पावे विकलता ग्रहणार्थीं ॥४६॥</p>
<p>
	तात्पर्य बुद्धि ही जेथें ठके । येथेंचि मूर्त अमूर्तीं ठाके । परी त्याचा न सद्भाव झांके । सन्मात्र झळके सर्वत्र ॥४७॥</p>
<p>
	बुद्धि कामास देई आश्रय । म्हणोनि तिचा होताम विलय । तात्काळ होई आत्मोदय । पडे अक्षय पद ठायीं ॥४८॥</p>
<p>
	अविद्या माया काम कर्म । हेच मुख्य म"उत्यूचे धर्म। होतां या सर्वांचा उपरम । होई उपशम बंधाचा ॥४९॥</p>
<p>
	होतां सर्व बंधननाश । प्रकटे आत्मा अप्रयास । जैसा मेघ जाण्याचा अवकाश । स्वयंप्रकाश चमके रवि ॥५०॥</p>
<p>
	शरीर मी, हें माझें धन । या नांव द्दढ ‘देहाभिमान’ । हेंचि ह्रदयग्रंथिनिबंधन । दु:खाधिवेशन मायेचें ॥५१॥</p>
<p>
	जरी हा देह एकदां निमाला । कर्मबीजें देहांतर लाधला । तें बीज नि:शेष जाळावयाला । चुकला कीं आला पुनर्जन्म ॥५२॥</p>
<p>
	पुनश्च बीजांचे वृक्ष होती । वासनाबीजें जे देहांतरप्राप्ति । ऐसें हें चक्र अव्याहतगति । वासना निमती तोंवरी ॥५३॥</p>
<p>
	कामांचा जैं समूळ विनाश । तैसा ह्रदयग्रंथिनिरासन । तैंच अमर मर्त्य मनुष्य । हाच उपदेश वेदांतीं ॥५४॥</p>
<p>
	धर्माधर्मविहित स्थिती । जिये नाम ‘विरजा’ वदती । अविद्याकामनिर्मूलनकर्ती । जेथेंन लव गति मृत्यूतें ॥५५॥</p>
<p>
	वासनांचा परित्याग । तोच ब्रम्हानंदाचा योग । ‘निरालेख्या’ त्या शब्दप्रयोग । वाचाविनियोग ‘अनिर्वाच्या’ ॥५६॥</p>
<p>
	झालिया परब्रम्हांसंवित्ति । तीच सकलानिष्टनिवृत्ति । तीच मनेप्सित इष्टप्राप्ति । हें श्रुतिस्मृतिप्रामाण्य ॥५७॥</p>
<p>
	‘ब्रम्हाविदाप्नोति परं’ । हेंच ब्रम्हानंदसाध्य चरम । याहूनि अन्य काय परम । “तरति शोकमात्मवित” ॥५८॥</p>
<p>
	संसारार्णव तमोमूळ । पावावया परकूल । ब्रम्हाज्ञानचि उपाय निखळ । साधन सकळ प्राप्तीचें ॥५९॥</p>
<p>
	पूर्ण श्रद्धा आणि धीर । हेचि मूर्त उमा -- महेश्वर । मस्तकीं नसतां यत्कृपाकर । दिसे न विश्वंभार ह्रदयस्थ ॥६०॥</p>
<p>
	वदले साईनाथ गुरुवर्य । उद्नार ज्यांचे अमोघवीर्य । पाहिजे निष्ठेचें अल्प धैर्य । महदैश्वर्य पावाल ॥६१॥</p>
<p>
	असन्मात्र अवघें द्दश्य । हें तों मानणें येतें अवश्य । स्वप्नदर्शन घ्या प्रत्यक्ष । सर्वही अद्दश्य प्रबोधीं ॥६२॥</p>
<p>
	येथवरी बुद्धीची धांव । येथवरीच आत्म्याशीं सद्भाव । परी जेथें न सदसता ठाव । तो तत्त्वभाव तो आत्मा ॥६३॥</p>
<p>
	सदसदादिप्रत्ययवर्जित । अलिंग सर्वविशेषरहित । तेंच शब्दशब्दांतरवर्णित । तेंच सर्वगत गुरुरूप ॥६४॥</p>
<p>
	आत्मा सर्वविशेषरहित । जराजन्ममरणातीत । हा पुराण आणि शाश्चत । अपक्षयवर्जित सर्वदा ॥६५॥</p>
<p>
	हा नित्य अज पुरातन । सर्वगत जैसें गगन । अनादि आणि अविच्छिन्न  । वृद्धिशून्य अविक्रिय ॥६६॥</p>
<p>
	जें अशब्द आणि अरूप । अनादि अनंत आणि अमूप । अव्यय अगंध अरस अलेप । कवणातें स्वरूप वर्णवेल ॥६७॥</p>
<p>
	परी दिसेना ऐसिया निर्गुणा । नेणतपणें जरी नेणा । ज्ञानें दवडा हा अज्ञानपणा । कधींही न म्हणा शून्य़ तया ॥६८॥</p>
<p>
	काय ती परमहंसस्थिती  । श्रीसाईंची निजसंपत्ती । काळें चोरिली हातोहातीं । दिसेल मागुती ती काय ॥६९॥</p>
<p>
	धनसुतदारासक्त भक्त । राहूं द्या कीं यांची मात । दर्शना येत योगी विरक्त । राहत आसक्त पदकमलीं ॥७०॥</p>
<p>
	काम - कर्म - बंधविमुक्त । सर्वैषणा - विनिर्मुक्त । देह - गेहादिकीं विरक्त । जगीं भक्त तो धन्य ॥७१॥</p>
<p>
	साई जयाचा द्दष्टिविषय । तया वस्त्वंतर दिसेल काय । द्दश्यमात्रीं साईंशिवाय । रिकामा ठाय दिसेना ॥७२॥</p>
<p>
	वदनीं श्रीसाईचें नाम । ह्रदयीं श्रीसाईचें प्रेम । तया नित्य आराम क्षेम । रक्षी स्वयमेव साई त्या ॥७३॥</p>
<p>
	श्रवणाचीही तीच गत । शब्द नाहीं साईव्यतिरिक्त । घ्राणीं साईपरिमळ भरत । रसना पघळत साईरसें ॥७४॥</p>
<p>
	सुखाचें जें सोलींव सुख । काय साईचें सुहास्य मुख । धन्य भाग्याचा तो देख । जेणें तें शब्दपीयूख सेविलें ॥७५॥</p>
<p>
	कल्याणाचें निधान । सुखशांतीचें जन्मस्थान । सदसद्विवेकवैराग्यवान । सदा सावधान अंतरीं ॥७६॥</p>
<p>
	गोरसेंसी वत्स धालें । तरी न मायेपासूनि हाले । तैसें मन हें पाहिजे बांधिलें । दावणीं दाविलें गुरुपायीं ॥७७॥</p>
<p>
	व्हावया गुरुकृपानुरागा । वंदा तत्पदकमलपरागा । केलिया हितबोधा जागा । अनुभव घ्या गा पदोपदीं ॥७८॥</p>
<p>
	यथेच्छ रमतां इन्द्रियार्थीं । अंतरीं ठेवा साईप्रीती । तोचि कामा येईल अंतीं । स्वार्थीं परमार्थीं उभयत्र ॥७९॥</p>
<p>
	मंत्रसिद्ध मांत्रिक अंजन । दावी पायाळूस भूमिगत धन । तैसेच गुरुपदरजधूसर नयन । ज्ञानविज्ञान पावती ॥८०॥</p>
<p>
	सिद्धांचीं जीं लक्षणें । साधकांचीं तीं तींच साधनें । साध्य कराया दीर्घप्रयत्नें । अभ्यास सुज्ञें करावा ॥८१॥</p>
<p>
	दुग्धापोटीं आहे घृत । परी न करितां तें आम्लयुत । नाहीं तक्र ना नवनीत । तेंही अपेक्षित संस्कारा ॥८२॥</p>
<p>
	तक्र घुसळल्याविरहित । प्राप्त होईना नवनीत । तेंही न करितां अग्निसंयुक्त । स्वादिष्ट घृत लाभेना ॥८३॥</p>
<p>
	पाहिजे संस्कारबलवत्तता । पूर्वाभ्यासें बुद्धिमत्ता । अभ्यासावीण न चित्तशुद्धता । तिजवीण दुर्गमता ज्ञानास ॥८४॥</p>
<p>
	व्हावी निर्मळ चित्तवृत्ती । तरीच होईल आत्मप्राप्ति । हाता न ये जों ती स्वरूपस्थिति । भगवद्भक्ति सोडूं नये ॥८५॥</p>
<p>
	लागे भगवद्भक्तीचा पाया । मंदिर आत्मज्ञानाचें उठाया । चारी मुक्तींचे कळस झळकाया । ध्वजा फडकाया विरक्तीची ॥८६॥</p>
<p>
	रात्रंदिन कर्दमीं लोळती । श्वानसूकरें विष्ठा भक्षिती । विषयभोग तींही भोगिती । तीच का महती नरदेहीं ॥८७॥</p>
<p>
	होय जेणें चित्तशुद्धि । जेणें अखंड ब्रम्हासिद्धि । तें स्वधर्माचरण आधीं । तप हें साधी नरदेहें ॥८८॥</p>
<p>
	साधुसेवा मुक्तीचें घर । स्त्रैणसंग नरकद्वार । हे पूज्य वृद्धजनोद्नार । विचाराई सर्वथा ॥८९॥</p>
<p>
	सदा सदाचारसंपन्न । देहनिर्वाहापुरतें अन्न । गृहदारादि स्पृहाशून्य । ऐसा जो धन्य तो साधु ॥९०॥</p>
<p>
	जे जे अनिमेष चिंतिती साई । प्रचीतीची पहा नवलाई । स्वयें साई तयांस ध्याई । होऊनि उतराई तयांचा ॥९१॥</p>
<p>
	धन्य नामस्मरणमहती । गुरूही भक्तस्मरण करिती । ध्याता प्रवेशे ध्येयस्थिति । पूर्ण विस्मृति परस्परां ॥९२॥</p>
<p>
	“तुम्ही जाणा तुमची करणी । मज तों अहर्निश तुमची घोकणी" । ऐशी बाबांची प्रेमळ वाणी । असेल स्मरणीं बहुतांच्या ॥९३॥</p>
<p>
	नलगे आम्हां ज्ञानकथा । पुरे हा एक साईचा गाथा । कितीही पापें असोत माथां । संकटीं त्राता हा आम्हां ॥९४॥</p>
<p>
	जरी न करवती पारायणें । तरी यांतील गुरुभक्ति - प्रकरणें । श्रोतां कीजे ह्रदयाभरणें । नित्यश्रवणें नेमानें ॥९५॥</p>
<p>
	दिवसाच्या कोणत्याही प्रहरीं । वाचील नित्य हें चरित्र जरी । निजगुरुराजसह श्रीहरी । भेटेल निर्धारी भाविकां ॥९६॥</p>
<p>
	अखंड लक्ष्मी नांदेल घरीं । वाचितील जे निरंतरीं । निदान जो एक सप्ताह करी । दरिद्र दूरी तयाचें ॥९७॥</p>
<p>
	हें मी वदतों ऐसें न म्हणा । तेणें संशय घेरील मना । साईच वदवी माझिये वदना । क्लिष्ट कल्पना सोडावी ॥९८॥</p>
<p>
	तो हा सकळगुणखाणी । साई निजभक्त कैवल्यदानी । कथा जयाची कलिमलहरणी । श्रोतां श्रवणीं परिसिजे ॥९९॥</p>
<p>
	ऐसिया संतकथांपुढें । स्वर्गसौख्य तें काय बापुडें । कोण ढुंकून पाहील तिकडे । टाकून रोकडें सत्कथन ॥१००॥</p>
<p>
	सुख दुख हे तों चित्तविकार । सत्संग सर्वदा निर्विकार । करी चित्त चैतन्याकार । सुखदु:खां थार देईना ॥१०१॥</p>
<p>
	जें सुख विरक्ता एकांतीं । कीं जें भक्ता करितां भक्ति । असो इंद्र कीं चक्रवर्ती । न मिळे कल्पांतीं तयांना ॥१०२॥</p>
<p>
	प्रारब्धभोग बलवत्तर । बुद्धि उपजे कर्मानुसार । उपजो परी हे नेमनेमांतर । भक्त तत्पर टाळील ॥१०३॥</p>
<p>
	करा कीं भगीरथ उद्योग । चुकेना प्रारब्धकर्मभोग । अवश्यभावित्वाचा योग । तयाचा वियोग अशक्य ॥१०४॥</p>
<p>
	जैसें ये दु:ख अवांछित । सुखही तैसेंच अकल्पित । देहप्रारब्धाची ही गत । आधींच अवगत संतांस ॥१०५॥</p>
<p>
	अखंड तन्नामावर्तन । हेंचि आम्हां व्रत तप दान । वेळोवेळीं शिरडी - प्रयाण । हेंचि तीर्थाटण आमुचें ॥१०६॥</p>
<p>
	‘साईसाई’ ति नामस्मरण । याच मंत्राचें अनुष्ठान । हेंच ध्यान हेंच पुरश्चरण । अनन्य शरण या जावें ॥१०७॥</p>
<p>
	निष्कपट प्रेमानुसंधान । इतुकेंच खरें तयाचें पूजन । मग अंतरीं घ्या अनुभवून । अतर्क्य विंदान तयाचें ॥१०८॥</p>
<p>
	पुरे आतां हें गुर्‍हाळ । आम्हां पाहिजे सत्वर गूळ । पूर्वसूचित कथा रसाळ । श्रवणार्थ सकळ उत्सुक ॥१०९॥</p>
<p>
	ऐसा श्रोतृवृंदांचा भाव । जाणूनि सूचित कथानवलाव । आवरिला हा ग्रंथगौरव । अवधानसौष्ठव राखाया ॥११०॥</p>
<p>
	काव्यपदबंधव्युत्पत्ती । नेणें मी पामर मंदमती । करधृत लेखणी धरोनि हातीं । साईच लिहविती तें लिहितों ॥१११॥</p>
<p>
	साई नसता बुद्धिदात । तरी मी कोण चरित्र लिहिता । त्याची कथा तोचि वदविता । आणीक लिहविताही तोच ॥११२॥</p>
<p>
	असो आतां कथानुसंधान । चावडी हंडी प्रसाद कथन । करूं म्हणूनि दिधलें आश्वासन । कथानिरूपण तें परिसा ॥११३॥</p>
<p>
	आणीकही तदंगभूत । अथवा दुजिया कथा ज्या स्मरत । त्या त्या सांगूं श्रोतयांप्रत । त्या सावचित्त परिसाव्या ॥११४॥</p>
<p>
	धन्य साईकथांचा नवलाव । धन्य धन्य श्रवणप्रभाव । मननें प्रकटे निजस्वभाव । थोरावे सद्भाव साईपदीं ॥११५॥</p>
<p>
	आतां आधीं चावडीवर्णन । समारंभाचें करूं दिग्दर्शन । बाबा करीत एकांतरा शयन । चावडीलागून नियमानें ॥११६॥</p>
<p>
	एक रात्र मशिदींत । दुजी क्रमीत चावडीप्रत । ऐसा हा क्रम बाबांचा सतत । समाधीपर्यंत चालला ॥११७॥</p>
<p>
	पुढें एकूणीसशें नऊ सन । दहा डिसेंबर तैंपासून । चावडीमाजीं साईंचें अर्चन । भजन पूजन हों लागें ॥११८॥</p>
<p>
	तो चावडीचा समारंभ । यथामति करूं आरंभ । करील साई कृपासंरंभ । तडीस विश्वंभर नेईल ॥११९॥</p>
<p>
	चावडीचा येतां रात । भजमंडळी मशिदीं येत । भजन दोन प्रहरपर्यंत । मंडपांत चालतसे ॥१२०॥</p>
<p>
	मागें रथ शोभायमान । दक्षिणांगीं तुलसीवृंदावन । सन्मुख बाबा स्थानापन्न । मध्यें भक्तजन भजनार्थी ॥१२१॥</p>
<p>
	हरिभजनीं जयां आदर । ऐसे भक्त नारी नर । सभामंडपीं घेऊनि सत्वर । भजनतत्पर ठाकती ॥१२२॥</p>
<p>
	कोणी करीं घेऊनि टाळ । कोणीई चिपळिया करताळ । कोणी मृदंग खंजिरी घोळ । भजनकल्लोळ मांडीत ॥१२३॥</p>
<p>
	साइसमर्थ चुंबकमणी । निजसत्तेचिया आकर्षणीं । जडलोहभक्तां लावूनि ओढणी । नकळत चरणीं ओढील ॥१२४॥</p>
<p>
	हलाकारे दिवटया पाजळती अंगणीं । तेथेंच पालखीं शृंगारिती कोणी । द्वारीं सज्ज वेत्रपाणी । करीत ललकारणी जयघोष ॥१२५॥</p>
<p>
	चव्हाटयावरी मखरें तोरणें । वरी अंबरीं झळकती निशाणें । नूतन वस्त्रें दिव्याभरणें । बालकें भूषणीं शृंगारिलीं ॥१२६॥</p>
<p>
	मशिदीचिया परिसरी । उजळत दीपांच्या बहु हारी । वारू श्यामकर्ण अंगणद्वारीं । पूर्ण शृंगारीं विराजत ॥१२७॥</p>
<p>
	इतुक्यांत तात्या पाटील येत । घेऊनियां मंडळी समवेत । बाबांपाशीं येऊनि बैसत । निघाया उद्यत बाबांसवें ॥१२८॥</p>
<p>
	बाबा जरी तयार असत । तात्या पाटील येईपर्यंत । जागचे जागीं बैसूनि राहत । वाट पाहत तात्यांची ॥१२९॥</p>
<p>
	जेव्हां खाकेंत घालूनि हात । तात्या पाटील बाबांस उठवीत । तेव्हांच बाबा निघाया सजत । चावडीप्रत तेथुनी ॥१३०॥</p>
<p>
	तात्या बाबांस म्हणत मामा । ऐसा परस्पर तयांचा प्रेमा । ऐशा तयांच्या आप्तधर्मा । नाहीं उपमा द्यावया ॥१३१॥</p>
<p>
	अंगांत नित्याची कफनी । सटका आपुला बगलेस मारुनी । तमाखू आणि चिलीम घेउनी । फडका टाकुनी स्कंधावर ॥१३२॥</p>
<p>
	बाबा जंव ऐसे तयार । घालिती तात्या अंगावर । जरीकाठी शेला सुंदर । करिती शिरावर सारिखा ॥१३३॥</p>
<p>
	बाबा मग पाठील भिंतीतळीं । असे पडली सर्पणाची मोळी । तदग्रीं दक्षिणपादांगुळीं । हालवीत ते स्थळीं क्षणभर ॥१३४॥</p>
<p>
	लगेच तेथील जळती जोत । स्वयें मारुनी दक्षिण हात । आधीं साई बुझावीत । मागूनि निघत चावडीतें ॥१३५॥</p>
<p>
	साई निघतां जावया । वाद्यें लागत वाजावया । नळे चंद्रज्योती हवया । प्रकाशती दिवटिया चौपासीं ॥१३६॥</p>
<p>
	कोणी वर्तुळ धनुष्याकृती । शिंगें कर्णे तुतार्‍या फुंकिती । कोणी तास झांज वाजविती । नाहीं मिती टाळकरियां ॥१३७॥</p>
<p>
	मृदंग वीणा झणत्कारीं । साईनामाचिया गजरीं । भजनसमवेत हारोहारी । प्रेमें नरनारी चालत ॥१३८॥</p>
<p>
	दिंडी पताका झेलीत । कोणीं गरुडके मिरवीत । नाचत उडत भजन करीत । निघत मग समस्त जावया ॥१३९॥</p>
<p>
	अति आनंद सकल लोकां । घेऊनि निघती दिंडया पताका । तासे तुतारे कर्ण्यांचा दणका । जयकार थयकार वारूचा ॥१४०॥</p>
<p>
	ऐसिया वाजंतरांचे गजरीं । मशिदींतूनि निघे स्वारी । भालदार देत ललकारी । पायरीवरी बाबा जों ॥१४१॥</p>
<p>
	टाळ झांज मृदंग मेळीं । कोणी वीणा कोणी चिपळी । भजन करीत भक्तमंडळी । सुखसमेळीं ते स्थानीं ॥१४२॥</p>
<p>
	टके पताका घेऊनि करीं । भक्त चालती आनंदनिर्भरीं । दुबाजू दोन चवरधरी । पंखे करीं वीजिती ॥१४३॥</p>
<p>
	शेले दुशेले एकेरी । पायघडया मार्गांत अंथरिती । बाबांस हातीं धरोनि चालविती । चवर्‍या ढाळिती तयांवरी ॥१४४॥</p>
<p>
	तात्याबा वाम हस्त धरी । म्हाळसापति दक्षिण करीं । बापूसाहेब छत्र शिरीं । चालली स्वारी चावडीसी ॥१४५॥</p>
<p>
	आघाडी घोडा तो ताम्रवर्ण । नाम जयाचें श्यामकर्ण । घुंगुरें झणत्कारिती चरण । सर्वाभरणमंडित जो ॥१४६॥</p>
<p>
	वेत्रपाणी पुढें चालत । साईनामाचा ललकार करीत । छत्रधारी छत्र धरीत । चवर्‍या वारीत चवरधर ॥१४७॥</p>
<p>
	ताशे वाजंत्रें वाजत । भक्त जयजयकारें गर्जत । ऐसा भक्तसंभार चालत । प्रेमें पुकारत भालदार ॥१४८॥</p>
<p>
	हरिनामाचा एकचि गजर । टाळ झांज मृदंग सुस्वर । सवें तालावर भक्तसंभार । गर्जत ललकारत चालती ॥१४९॥</p>
<p>
	ऐसा भजनीं भक्तसंभार । होऊनियां आनंदनिर्भर । वाटेनें साईंचा जयजयकार । करीत चव्हाटयावर ठाकत तैं ॥१५०॥</p>
<p>
	टाळ झांज ढोळ घोळ । वाद्यें वाजती अति तुंबळ । साईनामाचा गजर । नादें अंबर कोंदाटे ॥१५२॥</p>
<p>
	गगन जर्गे वाजंतरीं । प्रेक्षकसमुदाय प्रसन्न अंतरीं प्रेक्षणीय चावडीची स्वारी । शोभा साजिरी अनुपम्य ॥१५३॥</p>
<p>
	अरुणसंध्यारागें नमा । जैसी तप्तकांचनप्रभा । तैसी जयाची श्रीमुखशोबा । सन्मुख जैं उभा चावडीच्या ॥१५४॥</p>
<p>
	ते समयींची ती मुखशोभा । पसरली जणूं बालारुणप्रभा । केवळ चैतन्याचा गाभा । कोण त्या लाभा टाळील ॥१५५॥</p>
<p>
	धन्य ते समयींचें दर्शन । मुखप्रभा आरक्तवर्ण । उत्तराभिमुख एकाग्र मन । करी पाचारण जणुं कोणा ॥१५६॥</p>
<p>
	ताशे वाजंत्र्यांचा गजर । महाराजा आनंदभिर्भर । करिती अधोर्ध्व दक्षिणकर । वरचेवर तेधवां ॥१५७॥</p>
<p>
	रौप्यताटीं कुसुमनिकर । घेऊनि दीक्षित भक्तप्रवर । पुष्पवृष्टी सर्वांगावर । करीत वरचेवर ते समयीं ॥१५८॥</p>
<p>
	साईंचिया मस्तकावरती । गुलाबपुष्पें गुलालमिश्रिती । काकासाहेब उधळीत राहती । प्रेमभक्तीसंयुक्त ॥१५९॥</p>
<p>
	ऐशा जंव त्या पुष्पकळिका । गुलालयुक्त उधळिती काका । तासे झांज टाळांचा ठोका । एकचि कडाका वाद्यांचा ॥१६०॥</p>
<p>
	ग्रामलोक बाबांचे भक्त । दर्शना येती प्रीतियुक्त । मुखचर्या अरुणरक्त । अभिनव सुव्यक्त ते वेळीं ॥१६१॥</p>
<p>
	पाहोनियां तो तेजविलास । प्रेक्षकनेत्र पावती विकास । प्रेमळां मना होई उल्हास । भवसायासनिवृत्ति ॥१६२॥</p>
<p>
	अहा तें दिव्य तेज अद्भु । शोभे जैसा बाल भास्वत । सन्मुख ताशे कहाळा गर्जत । उभे राहत बहुसाल ॥१६३॥</p>
<p>
	करूनि सता खालीं वर । हेलकावीत दक्षिण कर । उदङमुख एका स्थळावर । अर्धप्रहरपर्यंत ॥१६४॥</p>
<p>
	पीतवर्ण केतकी गाभा । किंचित् आरक्त मुखप्रभा । जिव्हा न वर्णूं शके ती शोभा । नेत्रेंच लाभा सेवावें ॥१६५॥</p>
<p>
	तितुक्यांत जेव्हां कां म्हाळसापती । संचार होऊनि नाचूं लागती । तेव्हां ही बाबांची एकाग्र स्थिती । पाहतां चित्तीं आश्चर्य ॥१६६॥</p>
<p>
	दक्षिणांगीं उभा भगत । अंचल बाबांचा करें धरीत । वामांगीं तात्या कोते चालत । घेऊनि हस्तांत कंदील ॥१६७॥</p>
<p>
	काय मौजेचा तो उत्सव । भक्तिप्रेमाचें तें गौरव । पाहावया तयाचा नवलाव । अमीर उमराव एकवटती ॥१६८॥</p>
<p>
	निजतेजें घवघवीत । मुखचंद्र सोज्ज्वळ आरक्त । अवर्णनीय शोभा शोभत । स्वानंदपूरित जननयन ॥१६९॥</p>
<p>
	हळूहळू चालती वाटे । भक्तसमुदाय दुभाजु थाटे । अनिवार भक्तिप्रेम दाटे । स्वानंद कोंदाटे घनदाट ॥१७०॥</p>
<p>
	आतां पुढें ऐसा सोहळा । कोणीही पाहूं न शके डोळां । गेले ते दिवस आणि ती वेळा । मनासी विरंगुळा स्मरणेंच ॥१७१॥</p>
<p>
	वाजती वाजंत्रीं अपार । मार्गीं करिती जयजयकार । नेऊनि चावडीसी आसनावर । दिव्योपचार अर्पिती ॥१७२॥</p>
<p>
	वरी बांधीत शुभ्र वितान । हंडया झुंबरें शोभायमान । आरसां प्रकाश - परावर्तन । दैदीप्यमान देखावा ॥१७३॥</p>
<p>
	भक्तमंडळी सर्व मिळून । चावडीतें जाती जमून । तात्याबा मग घालिती आसन । बाबांस धरून बैसवीत ॥१७४॥</p>
<p>
	ऐसें तें तयार वरासन । पाठीसी लोडाचें ओठंगण । बाबा होतांच स्थानापन्न । अंगरखा परिधान करवीत ॥१७५॥</p>
<p>
	घालीत अंगावर दिव्यांबरें । पूजा करीत हर्षनिर्भरें । करीत आरत्या महागजरें । हारतुरे जढवीत ॥१७६॥</p>
<p>
	सुगंध चंदन चर्चून । करीत साईंस करोद्वर्तन । उंच वस्त्रीं अलंकारून । मुकुट घालून पाहत ॥१७७॥</p>
<p>
	कधीं सुवर्णमुकुट साजिरा । कधीं शिरपेंची मंदील गहिरा । झळके जयावरी कलगी तुरा । कंठीं हिरा माणिकें ॥१७८॥</p>
<p>
	धवळ मुक्ताफळांच्या माळा । घालिती मग तयांच्या गळां । दिवाबत्तीच्या योगें झळाळा । तेजें जागळा पेहराव ॥१७९॥</p>
<p>
	सुगंध कस्तूरीरचित काळी । ऊर्ध्वरेषा रेखिती निढळीं । कृष्ण तिलक लाविती भाळीं । वैष्णवकुळीं जेणेंपरी ॥१८०॥</p>
<p>
	तो जांभळा मखमाली भरजरी । अंगरखा दों खांद्यांवरी । हळूच मागूनि वरचेवरी । सरकतां सावरीत दोबाजूं ॥१८१॥</p>
<p>
	तैसेंच डोईल मुगुटाभरण । अथवा मंदील पालटून । वरिचेवरीच धरीत झेलून । हळूच मागून नकळत ॥१८२॥</p>
<p>
	हो कां मुकुट अथवा मंदील । स्पर्श होतां फेकूनि देतील । होती जरी ही चिंता प्रबळ । प्रेमकुतूहल नि:सीम ॥१८३॥</p>
<p>
	साई जो सर्वांतर्ज्ञानी । तो काय नेणे भक्तांची छपवणी । परी तयांचें कौतुक पाहुनी । बुद्धयाच जाणूनि मौन धरी ॥१८४॥</p>
<p>
	ब्रम्हानुभवें विराजमान । तयास भरजरी अंगरखा भूषण । निजशांतीनें शोभायमान । तया अलंकरण मुकुटाचें ॥१८५॥</p>
<p>
	तरीही नाना परीचे सुरुचिर । बाबांस घालिती अलंकार । कपाळीं टिळक मनोहर । रेखिती केशरमिश्रित ॥१८६॥</p>
<p>
	हिरे मोतियांच्या माळा । कोणी तेथें घालिती गळां । कोणी ललाटीं लाविती टिळा । चालवी लीला भक्तांच्या ॥१८७॥</p>
<p>
	शृंगार जेव्हां चढती समस्त । मस्तकीं जैं मुकुट विराजित । मुक्ताहार कंठीं झळकत । दिसे अत्यद्भुत तैं शोभा ॥१८८॥</p>
<p>
	नानासाहेब निमोणकर । धरीत बाबांवर छत्र पांडूर । काठीसवें तें वर्तुलाकार । फिरे झालर समवेत ॥१८९॥</p>
<p>
	बापूसाहेब अतिप्रीतीं । गुरूचरण प्रक्षालिती । अर्ध्यपाद्यादि भावें अर्पिती । पूजा करिती यथोचित ॥१९०॥</p>
<p>
	पुढें ठेवूनि रौप्यताम्हण । तयांत बाबांचे ठेवूनि चरण । अत्यादरें करीत क्षाळण । करोद्वर्तन मागुतें ॥१९१॥</p>
<p>
	घेऊनि केशराची वाटी । मग लावीत हस्तां उटी । तांबूल अर्पीत करसंपुटीं । प्रसन्न द्दष्टी साईंची ॥१९२॥</p>
<p>
	बाबा जंव गादीस बैसत । तात्याबादि उभेच ठाकत । हातीं धरूनि बाबांस बैसवीत । आदरें नमित तच्चरणां ॥१९३॥</p>
<p>
	निर्मळ चावडी भूमिका शुद्धा । घोटीव आणि स्फटिकबद्ध । मिळणीं मिळती आबालवृद्ध । प्रेमें निबद्ध श्रीपदीं ॥१९४॥</p>
<p>
	होतां गदीवर विराजमान । बसतां तक्कयास टेंकून । चवरी चामर चामर आंदोलन । वीजिती व्यजन दोबाजूं ॥१९५॥</p>
<p>
	माधवराव तमाखू चुरिती । चिलीम तात्काळ तयार करिती । देती तात्याबांचे हातीं । तात्याबा फुंकिती आरंभीं ॥१९६॥</p>
<p>
	तमाखूची ज्वाला निघतां । तात्याबा देत बाबांचे हाता । बबांचा प्रथम झुरका संपतां । मग ती भगतांस अर्पीत ॥१९७॥</p>
<p>
	मग ती चिलमी संपे तोंवर । इकडूनि तिकडे वर्तुलाकार । भगत शामा तात्याबरोबर । वरचेवर भ्रमतसे ॥१९८॥</p>
<p>
	धन्य ती निर्जीव वस्तु परी । काय तिचिया भाग्याची थोरी । आम्हां सजीवां न तिची सरी । सेवा ती खरी तियेची ॥१९९॥</p>
<p>
	तपश्चर्या ही महाकठिण । लाथां तुडविलें बाळकपण । पुढें सोसूनि शीतोष्णतपन । अग्नींत तावून निघाली ॥२००॥</p><p>
	भाग्यें बाबांचें करस्पर्शन । पुनश्च धुनीमाजीं भर्जन । मागुती गैरिका उटी चर्चन । मुखचुंबन तैं लाधे ॥२०१॥</p>
<p>
	असो कर्पूर केशर चंदन । करिती उभयहस्तां विलेपन । गळां सुमनमाळा घालून । गुच्छावघ्राणन करविती ॥२०२॥</p>
<p>
	सदा जयाचें सुहास्यवदन । अति सप्रेम सदय अवलोकन । तयास काय शृंगाराभिमान । राखिला हा मान भक्तांचा ॥२०३॥</p>
<p>
	जया अंगीं भक्तीचीं लेणीं । शॄंगारिला जो शांतिभूषणीं । तया या लौकिकी माळामणी । अलंकरणीं काय होत ॥२०४॥</p>
<p>
	कीं जो वैराग्याचा पुतळा । तयास किमर्थ पाचूंच्या माळा । परी अर्पितां ओढवी गळा । भक्तांचा सोहळा पुरवी तो ॥२०५॥</p>
<p>
	स्वर्णपाचू दिव्यहार । गळां विराजती मुक्तासर । अष्टाष्ट षोडश जयांचे पदर । अभिनव पुष्करमिश्रित ॥२०६॥</p>
<p>
	जाईजुई - तुलसीमाळा । आपाद जयाचे रुळती गळां । मुक्तकंठा कंठनाळा । मिरवी झळाळा अपूर्व ॥२०७॥</p>
<p>
	सवें पाचूचा हेमहार । सुवर्णपदक ह्रदयावर । निढळीं श्य्माम तिलक सुंदर । अति मधुर शोभा दे ॥२०८॥</p>
<p>
	तयास काय म्हणावें फकीर । भासे सतेच वैषणवप्रवर । वरी डोलती छत्रचामर । शेला जरतार शिरीं शोभे ॥२०९॥</p>
<p>
	बहुधा जोग प्रेमनिर्भरीं । मंगळवाद्यांचिया गजरीं । पंचारती घेऊनि करीं । बाबांवरी ओवाळीत ॥२१०॥</p>
<p>
	पंचोपचार पूजासमेत । घेऊनि पंचारत घवघवित । नीरांजन कर्पूर वात । ओवाळीत बाबांस ॥२११॥</p>
<p>
	मग ही आरती जेव्हां संपत । एकेक एकेक सकळ भक्त । बाबांस करोनि साष्टांग प्रणिपात । निघूनि जात घरोघर ॥२१२॥</p>
<p>
	चिलीम अत्तर गुलाबपाणी । देऊनि बाबांची अनुज्ञा घेउनी । तात्याबा निघतां जावया निजसदनीं । म्हणावें बाबांनीं ‘सांभाळ मज’ ॥२१३॥</p>
<p>
	‘जातोस जा परी रात्रीमाजी । मधून मधून खबर घे माझी’ । बरें हो म्हणून मग तात्याजी । चावडी त्यजी जाई घरीं ॥२१४॥</p>
<p>
	ऐसे लोक जातां समस्त । बाबा स्वहस्तें गांठोडें सोडीत । धोतरांच्या घडया पसरीत । स्वहस्तें रचित निजशेज ॥२१५॥</p>
<p>
	साठ पांसष्ट शुभ्र चादरी । घडिया मांडूनियां पुढारी । स्वयें तयांच्या रचूनि हारी । पहुडती वरी मग बाबा ॥२१६॥</p>
<p>
	ऐसिया चावडीची परी । इत्थंभूत झाली इथवरी । आतां कथा जी राहिली दुसरी । अध्यायांतरीं वर्णिजेल ॥२१७॥</p>
<p>
	तरी श्रोतां कीजे क्षमा । अगाध या साईंचा महिमा ॥ संक्षिप्त वदतां राही न सीमा । गुरुत्वधर्मा पावे तो ॥२१८॥</p>
<p>
	आतां साईंची हंडीची कथा । आणीक ज्या ज्या राहिल्या वार्ता । पुढील अध्यायीं कथीन समस्ता । मादरचित्ता असावें ॥२१९॥</p>
<p>
	अखंड गुरुस्मरण स्वार्थ । तोच हेमाडा निजपरमार्थ । गुरुचरणाभिवंदनें कृतार्थ । चारीही पुरुषार्थ त्यापोटीं ॥२२०॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । चावडीवर्णनं नाम सप्तत्रिंशत्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 15:32:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 15:46:15 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ३६]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-36-122042600064_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
आतां गताध्यायानुसंधान । रम्य चौर्यकथानिरूपण । दिधलें होतें आश्वासन । दत्तावधान व्हा तया ॥१॥
कथा नव्हे हें ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 36" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650967282-5664.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra marathi adhyay 36" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	आतां गताध्यायानुसंधान । रम्य चौर्यकथानिरूपण । दिधलें होतें आश्वासन । दत्तावधान व्हा तया ॥१॥</p>
<p>
	कथा नव्हे हें स्वानंदजीवन । पीतां वाढेल तृष्णा दारूण । तियेचेंही करया शमन । कथांतर कथन होईल ॥२॥</p>
<p>
	जेणें श्रवणें सुखावे श्रोता । ऐसी रसाळ ती ही कथा । निवारे सांसारश्रांतव्यथा । सुखावस्था आतुडे ॥३॥</p>
<p>
	निजहित साधावयाची कामना । असेल जया सभाग्याच्या मना । तयानें साईकथानिरूपणा । सादर श्रवणा असावें ॥४॥</p>
<p>
	संतमहिमा अपरंपार । कवणा न वर्णवे साचार । तेथें काय माझा अधिकार । जाणीव साचार ही मजला ॥५॥</p>
<p>
	इतुक्या पुरे वक्त्याचें मीपण । साई लाघवी घेऊनि आपण । कोणाहीकरवीं निजगुणकथन । करवी श्रवण निजभक्तां ॥६॥</p>
<p>
	तो हा परात्परसरोवरहंस । हंस:सोहंवृत्ति - उदास । ब्रम्हा - मुक्तसेवनोल्लास । असमसाहस जयास ॥७॥</p>
<p>
	जया नसतां नांव गांव । अंगीं अपरंपार अवैभव । क्षणें करील रंकाचा राव । भुकुटीलाघव हें ज्याचें ॥८॥</p>
<p>
	तो हा तत्त्वज्ञानावतार । दावी साक्षित्वें साक्षात्कार । नामानिराळा राहूनि दूर । घडवी प्रकार नानाविध ॥९॥</p>
<p>
	तो जयावरी करी कृपा । दावी तया विविधरूपा । अघटित घटना रची अमूपा । प्रौढप्रतापा परिसा त्या ॥१०॥</p>
<p>
	तया जे जे आकळिती ध्यानें । अथवा गाती प्रेमळ भजनें । पडों नेदी तयांचें उणें । सांभाळी पूर्णपणें तयांतें ॥११॥</p>
<p>
	आवड निजकथांची बहुत । म्हणोनि आठव देई अनवरत । करोनि श्रोत्यावक्त्यांचें निमित्त । पुरवी मनोरथ भक्तांचे ॥१२॥</p>
<p>
	परमार्थाचा पूर्ण अभिमानी । प्रपंचावर सोडोनि पाणी । जयानें जोडिला चक्रपाणी । अनंत प्राणी उद्धरिले ॥१३॥</p>
<p>
	देशीं विदेशीं जयातें भज्त । भक्तिध्वज जयाचा फडकत । दीना दुबळ्या पालवीत । कामना पुरवीत सकळांच्या ॥१४॥</p>
<p>
	असो आतां हें परम पवित्र । परिसा सादर साईचरित्र । श्रोत्यावत्क्यांचें श्रोत्र वक्त्र । पावन सर्वत्र होवोत ॥१५॥</p>
<p>
	गोमांतकस्थ दोघे गृहस्थ । आले साईदर्शनार्थ । दोघेही साईचरणीं विनटत । होऊनि आनंदित दर्शनें ॥१६॥</p>
<p>
	दोघे जरी बरोबर येत । साई दक्षिणा एकासींच मागत । पंधरा रुपये दे मज म्हणत । तो मग ते देत आनंदें ॥१७॥</p>
<p>
	दुजिपापाशीं कांहीं न मागतां । आपण होऊनि पसतीस देतां । साई तात्काळ ते अव्हेरितां । अति आश्चर्यता तयातें ॥१८॥</p>
<p>
	ऐसिया तय समयातें । माधवरावही तेथेंच होते । पाहूनियां त्या विषमतेतें । पुसती साईंतें तें परिसा ॥१९॥</p>
<p>
	बाबा ऐसें कैसें करितां । दोघे स्नेही बरोबर येतां । एकाची दक्षिणा मागूनि घेतां । परततां देतां स्वयें दुजा ॥२०॥</p>
<p>
	संतांपासीं कां ही विषमता । आपण होऊनि एका मागतां । स्वेच्छें कोणी देतां परततां । हिरमोड करितां तयाचा ॥२१॥</p>
<p>
	अल्पवित्तीं धरितां प्रीति । बहुतालागीं निर्लोभ वृत्ति । असतों मी जरी आपुले  स्थ्तिती । ऐसी न रीती आचरितों ॥२२॥</p>
<p>
	“शम्या तुजला ठाऊक नाहीं । मी तो कोणाचें कांहीं न घेईं । येणें मागे मशीद आई । ऋणमुक्त होई देणारा ॥२३॥</p>
<p>
	मजला काय आहे घर । किंवा माझा आहे संसार । जे मज लागे वित्ताची जरूर । मी तों निर्घोर सर्वापरी ॥२४॥</p>
<p>
	परी ऋण वैर आणि हत्या । कल्पांतींही न चुकती कर्त्या । देवी नवसिती गरजेपुरत्या । मज उद्धरित्या सायास ॥२५॥</p>
<p>
	तुम्हांस नाहीं त्याची काळजी । वेळेपुरती करितां अजीजी । अनृणी जो भक्तांमाझी । तया मी राजी सदैव ॥२६॥</p>
<p>
	आरंभीं हा अकिंचन तयासी । पंधरा देतांच केलें नवसासी । पहिली मुशाहिरा देईन देवासी । भूल तयासी पडली पुढें ॥२७॥</p>
<p>
	पंध्रांचे तीस झाले नंतर । तिसांचे साठ, साठांचे शंभर । दुप्पट चौपट वाढतां पगार । बळावला विसर अत्यंत ॥२८॥</p>
<p>
	होतां होतां जाहले सातशें । पातले येथें निजकर्मवशें । तेव्हां मीं माझे पंधरा हे ऐसे । दक्षिणामिषें मागितले” ॥२९॥</p>
<p>
	“आतां ऐकदुसरी गोठी । फिरतां एकदां समुद्रकांठीं । लागली एक हवेली मोठी । बैसलों ओटीवर तियेच्या ॥३०॥</p>
<p>
	हवेलीचा ब्राम्हाण मालक । होता कुलीन मोठा धनिक । केलें स्वागत प्रेमपूर्वक । यथेष्ट अन्नोदक अर्पूनी ॥३१॥</p>
<p>
	तेथेंच एका फडताळापासीं । स्वच्छ सुंदर जागा खाशी । दिधली मजला निजावयासी । निद्रा मजसी लागली ॥३२॥</p>
<p>
	पाहूनि झोंप लागली सुस्त । दगड सारूनि फोडिली भिंत । खिसा माझा कातरिला नकळत । नागविलें समस्त मज त्यानें ॥३३॥</p>
<p>
	जागा होतां हें जंव कळलें । एकाएकीं रडूं कोसळलें । रुपये तीस हजार गेले । मन हळहळलें अत्यंत ॥३४॥</p>
<p>
	त्या तोम होत्या अवघ्या नोटा । होतां ऐसा अवचित तोटा । भरला माझे ह्रदयीं धडका । ब्राम्हाण उलटा समजावी ॥३५॥</p>
<p>
	गोड न लागे अन्नापाणी । होऊनि ऐसा दीनवाणी । पंधरा दिवस तेच ठिकाणीं । राहिलों बैसूनि ओटीवर ॥३६॥</p>
<p>
	पंधरावा दिवस संपता । सवाल करीत रस्त्यानें फिरतां । फकीर एक आला अवचितां । मज रडतांना पाहिलें ॥३७॥</p>
<p>
	पुसे तो मज दु:खाचें कारण । केलें म्यां तें समस्त निवेदन । तो म्हाणे हें होईल निवारण । करिशील सांगेन मी तैसें ॥३८॥</p>
<p>
	फकीर एक तुज सांगेन । देईन त्याचें ठावठिकाण । तयालागीं जाईं तूं शरण । तो तुज देईल धन तुझें ॥३९॥</p>
<p>
	परी मी सांगें तें आचरें व्रत । इच्छितार्थप्राप्तीपर्यंत  । त्याग तुझा आवडता पदार्थ । तेणें तव कार्यार्थ साधेल ॥४०॥</p>
<p>
	ऐसें करितां फकीर भेटला । पैका माझा मजला मिळाला । मग मीं तो वाडा सोडिला । किनारा धरिला पूर्ववत ॥४१॥</p>
<p>
	मार्ग क्रमितां लागली नाव । होई न तेथें मज शिरकाव । तों एक शिपाई सुस्वभाव  । देई मज ठाव नावेंत ॥४२॥</p>
<p>
	लागोनि सुदैवाचा वारा । आली नाव ती परतीरा । गाडींत बैसलों आलों जंव घरा । दिसली या नेत्रां मशीदमाई” ॥४३॥</p>
<p>
	येथें बाबांची गोष्ट सरली । पुढें शामासी आज्ञा झाली । घेऊनि जाईं ही पाहुणे मंडळी । जेवूं त्यां घालीं घरासी ॥४४॥</p>
<p>
	असो; पुढें पात्रें वाढिलीं । माधवरावांस जिज्ञासा झाली । पाहुण्यांलागीं पृच्छा केली । गोष्ट ती पटली कीं तुम्हां ॥४५॥</p>
<p>
	पाहूं जातां वास्तविक । साईबाबा इथले स्थायिक । नाहीं समुद्र नाव नाविक । तयां हें ठाऊक केव्हांही ॥४६॥</p>
<p>
	कैंचा ब्राम्हाण कैंची हवेली । जन्म गेला वृक्षाचे तळीं । कोठूनि एवढी संपत्ति आणिली । जी मग चोरिली चोरानें ॥४७॥</p>
<p>
	म्हणोनि ही गोष्ट निवेदिली । तीही तुम्ही येतांच आरंभिली । येणें मिषें तुम्हांसी  पटविली । वाटे घडलेली पूर्वकथा ॥४८॥</p>
<p>
	तेव्हां पाहूणे होऊन सद्नद । म्हणाले साई आहेत सर्वविद । परब्रम्हा - अवतार निर्द्वंद्व । अद्वैत अभेद व्यापक ॥४९॥</p>
<p>
	तयंनी जी कथिली आतां । अक्षरें अक्षर ती आमुचीच कथा । चला हें गोड भोजना सरतां । कथितों सविस्त्रता तुम्हांतें ॥५०॥</p>
<p>
	बाबा जें जें बोलूनि गेले । तें तें सर्वचि कीं घडलेलें । ओळख नसतां त्यां कैसें कळलें । म्हणूनि सगळें अघटित हें ॥५१॥</p>
<p>
	असो; पुरें होतां भोजन । माधवरावांसहवर्तमान । चाललें असतां तांबूलचर्वण । कथानिरूपण आरंभिलें ॥५२॥</p>
<p>
	वदे दोघांमाजील एक । घांटचि माझा मूळ मुलूख । परी त्या समुद्रपट्टीचा देख । होता अन्नोदकसंबंध ॥५३॥</p>
<p>
	तदर्थ गेलों गोमांतकांत । नोकरी मिळवावी आलें मनांत । आराधिला तत्प्रीत्यर्थ दत्त । नवसिला अत्यंत आदरें ॥५४॥</p>
<p>
	देवा कुटुंबरक्षणार्थ । नोकरी करणें आहे प्राप्त । तरी होऊनि कृपावंत । देईं तीं, लागत पायांस ॥५५॥</p>
<p>
	अद्यप्रभृति अल्पावकाशीं । जरी तूं निजब्रीद राखिशी । प्राप्ती जी होईल प्रथम मासीं । समग्र तुजसी अर्पीन ॥५६॥</p>
<p>
	भाग्यें दत्त प्रसन्न झाला । अक्पावकाशीं नवसा पावला । रुपये पंधरा पगार मजला । मिळूं लागला आरंभीं ॥५७॥</p>
<p>
	पुढें साईबाबांनीं वर्णिली । तैशीच माझी बढती जाहली । सय नवसाची समूळ बुजाली । ती मज दिधली ये रीती ॥५८॥</p>
<p>
	कोणास वाटेल घेतली दक्षिणा । दक्षिणा नव्हे ती फेडिलें ऋणा । दिधलें येणें मिषें मज स्मरणा । अत्यंत पुराण्या नवसाचे ॥५९॥</p>
<p>
	तात्पर्य साई द्रव्य न याचीत । निजभक्तांसही याचूं न देत । अर्थ हा नित्य अनर्थ मानीत । भक्तां न पाडीत तन्मोहीं ॥६०॥</p>
<p>
	म्हाळसापतीसारिखा भक्ता । सदा साईपदीं अनुरक्त । जरी संकटें चालवी चरितार्थ । तया न लव अर्थ जोडूं दे ॥६१॥</p>
<p>
	स्वयें साई लोकां अनेकदा । दक्षिणामिषें आलेली संपदा । वांटी, परी कपर्दिक कदा । देई न आपदात्रस्ता त्या ॥६२॥</p>
<p>
	तोही मोठा बाणेदार । जरी साई ऐसा उदार । कधीं न तेणें पसरिला कर । याचनातत्पर होउनी ॥६३॥</p>
<p>
	सांपत्तिक स्थिति निकृष्ट । परी वैराग्य अति उत्कृष्ट । वेठी गरीबीचेही कष्ट । अल्पसंतुष्ट सर्बदा ॥६४॥</p>
<p>
	एकदां एक दयाळू व्यापारी । ‘हंसराज’ अभिधानधारी । म्हाळसापतीस कांहींतरी । द्यावेंसें अंतरीं वाटलें ॥६५॥</p>
<p>
	पाहूनि गरिबीचा संसार । करावा  शक्य तो उपकार । लावावा कांहीं हातभार । सहज सुविचार हा स्फुरला ॥६६॥</p>
<p>
	ऐसी जरी तयाची अवस्था । इतर कोणीही देऊं जातां । तेंही नावडे साईनाथा । द्रव्यीं उदासता आवडे ॥६७॥</p>
<p>
	मग तो व्यापारी काय करी । द्रवूनि त्या भक्तार्थ अतरीं । दोघेही समक्ष असतां दरबारीं । द्रव्य सारीत त्याकरीं ॥६८॥</p>
<p>
	होऊनियां अति विनीत । म्हाळसापती करी तें परत । म्हणे साईंचिया आज्ञेविरहित । मजला न करवत स्वीकार ॥६९॥</p>
<p>
	भक्त नव्हता हा पैशाचा । मोठा भुकेला परमार्थाचा । पदीं विनटला कायावाचा । पेमळ मनाचा नि:स्वार्थीं ॥७०॥</p>
<p>
	हंसराज साईंतें विनवी । साई एका  कवडीस न शिववी । वदे मद्भक्तांही द्रव्य न भुलवी । वित्ताच्या वैभवीं न गवे तो ॥७१॥</p>
<p>
	पुढें मग तो दुसरा पाहुणा । म्हणे माझ्याही पटल्या खुणा । परिसा करितों समग्र कथना । येईल श्रवणा उल्हास ॥७२॥</p>
<p>
	पस्तीस वर्षांचा माझा ब्राम्हाण । निरालस आणि विश्वासू पूर्ण । दुदैर्वे बुद्धिभ्रंश होऊन । करी तो हरण मम ठेवा ॥७३॥</p>
<p>
	माझिया घराच्या भिंतींत । फडताळ आहे बसविलें आंत । तेथील चिरा सारूनि अलग । पाडिलें नकळत छिद्र तया ॥७४॥</p>
<p>
	बाबा वर जें फडताळ वदले । त्यासचि त्यानें छिद्र पाडिलें । तदर्थ भिंतीचे चिरे काढिले । सर्वांनिजलेले ठेवून ॥७५॥</p>
<p>
	पुढें बाबा आणीक वदले । रुपये माझे चोरूनि नेले । तेंही अवघें सत्यत्वें भरलें । पुडकें नेलें नोटांचें ॥७६॥</p>
<p>
	तीस हजारचि त्यांची किंमत । न कळे बाबांस कैसें अवगत । श्रमसंपादित जातां वित्त । बसलों मी रडत अहर्निस ॥७७॥</p>
<p>
	शोध लावितां थकली मति । न कळे कैशी करावी गति । पंधरा दिवस चिंतावर्तीं । पडलों निर्गती लागेना ॥७८॥</p>
<p>
	एके दिवशीं ओटीवर । बसलों असतां अति दिलगीर । वाटेनें चालला एक फकीर । सवाल करीत करीत ॥७९॥</p>
<p>
	पाहूनि मज खिन्नवदन । फकीर पुसे खेदाचें कारण । मग मीं करितां साद्यंत निवेदन । सांगे निवारण तो मज ॥८०॥</p>
<p>
	कोपरगांव तालुक्यास । शिरडी नामक एका गांवास । करी साई अवलिया वास । करीं तयास तूं नवस ॥८१॥</p>
<p>
	आवड तुझी जयावर । तयाचें सेवन वर्ज्य कर । ‘दर्शन तुमचें होईतोंवर । वर्जिलें’ साचार वद तयां ॥८२॥</p>
<p>
	ऐसें मज फकीरें कथितां । अन्न वर्जिलें क्षण न लागतां । वदलों ‘बाबा चोरी मिळतां । दर्शन होतां सेवीन तें’ ॥८३॥</p>
<p>
	पुढें एकचि पंधरावडा गेला । नकळे काय आलें मनाला । ब्राम्हाण आपण होऊनि आला । ठेवा दिधला मज माझा ॥८४॥</p>
<p>
	म्हणे माझी बुद्धि चळली । तेणें ही ऐसी कृति घडली । आतां पायीं डोई ठेविली । ‘क्षमा मीं केली’ ऐसें वदा ॥८५॥</p>
<p>
	असो; पुढें झालें गोड । साईदर्शनीं उदेली आवड । तेंही आज पुरविलें कोड । धन्य ही जोड भाग्याची ॥८६॥</p>
<p>
	असतां खिन्न दु:खी संकटीं । बसलों असतां आपुले ओटीं । आला जो मम सांत्वनासाठीं । पुनरपि भेटी न तयाची ॥८७॥</p>
<p>
	जया माझी कळकळ पोटीं । जेणें कथिली साईंची गोठी । जेणें दाविली सिरडि बोटीं । पुनरपि भेटी न तयाची ॥८८॥</p>
<p>
	जयाची मज अवचित गांठी । सवाल घालीत आला जो वाक्पुटीं । नवस करवूनि गेला शेवटीं । पुनरपि भेटी न तयाची ॥८९॥</p>
<p>
	तोच फकीर वाटे साचा । साईच हा अवलिया तुमचा । लाभ आम्हां निजदर्शनाचा । द्यावया लांचावला स्वयें ॥९०॥</p>
<p>
	कोणी कांहीं घेऊं लांचावती । मज या दर्शनीं इच्छाही नव्हती । फकीर आरंभीं करी प्रवृत्ति । वित्तप्राप्तीप्रीत्यर्थ ॥९१॥</p>
<p>
	तेंही वित्त जयाच्या नवसें । प्राप्त झालें अप्रयासें । तो काय माझ्या या पसतिसें । लांचावे ऐसें न घडेच ॥९२॥</p>
<p>
	उलटा आम्ही अज्ञान नर । आम्हां करावया परमार्थतत्पर । आमुच्या कल्याणीं झटे निरंतर । आणी वाटेवर या मिषें ॥९३॥</p>
<p>
	एतदर्थचि हा अवतार । ना तों आम्ही अभक्त पामर । होता कैंचा हा भव पार । करा कीं विचार स्वस्थपणें ॥९४॥</p>
<p>
	असो; चोरी मिळाल्यावर । झाला मज जो हर्ष फार । परिणामीं पडला नवसाचा विसर । मोह दुर्धर वित्ताचा ॥९५॥</p>
<p>
	पुढें पहा एक दिवस । असतां कुलाब्याचे बासूस । स्वप्नीं पाहिलें मीं साईंस । तैसाच शिर्डीस निघालों ॥९६॥</p>
<p>
	समर्थें कथिला निजप्रवास । मनाई नावेंत चढावयास । शिपायानें करितां प्रयास । चुकला सायास तें सत्य ॥९७॥</p>
<p>
	या तों सर्व माझ्या अडचणी । पातलों जेव्हां नावेच्या ठिकाणीं । खरेंच एक शिपाई कोणी । करी मनधरणी मजसाठीं ॥९८॥</p>
<p>
	तेव्हांच नावेचा अधिकारी । आरंभीं जरी मज धिक्कारी । देऊनि मज वाव नावेवरी । केलें आभारी मज तेणें ॥९९॥</p>
<p>
	शिपाईही अगदीं अनोळखी । म्हणे यांची माझी ओळखी । म्हणोनि आम्हां कोणी न रोखी । बैसलों सुखी नावेंत ॥१००॥</p>
<p>
	ऐसी ही नावेची वार्ता । तैशीच ती शिपायाची कथा । आम्हांसंबंधें घडली असतां । घेती निजमाथां साई हे ॥१०१॥</p>
<p>
	पाहूनि ऐसी अद्भुत स्थिति । कुंठित होते माझी मति । वाटे मज इत्थंभूत जगतीं  । भरले असती हे साई ॥१०२॥</p>
<p>
	नाहीं अणुरेणूपुरती । जागा ययांच्यावीण रिती । आम्हांस जैसी दिधली प्रचीती । इतरांही देतील तैशीच ॥१०३॥</p>
<p>
	आम्ही कोण, वास्तव्य कोठें । केवढें आमुचें भाग्य मोठें । ओढूनि आम्हांस नेटेंपाटें । आणिलें वाटेवर हें ऐसें ॥१०४॥</p>
<p>
	काय आम्हीं नवस करावा । काय आमुचा ठेवा चोरावा । काय नवसफेडीचा नवलावा । ठेवाही मिळावा आयता ॥१०५॥</p>
<p>
	काय आमुचें भाग्य गहन । नाहीं जयाचें पूर्वीं दर्शन । नाहीं चिंतन नाहीं श्रवण । तयाही स्मरण आमुचें ॥१०६॥</p>
<p>
	मग तयाचिया संगतींत । वर्षोनुवर्षें जे जे विनटत । जे जे अहर्निश तत्पद सेवित । भगवद्भक्त ते धन्य ॥१०७॥</p>
<p>
	जयांसंगें साई खेळले  । हंसले, बैसले, बोलले, चालले । जेवले, पहुडले, रागेजले । भाग्यागळे ते सर्व ॥१०८॥</p>
<p>
	कांहींही न घडतां आम्हांहातीं  । इतुके आम्हां जैं कळवळती । तुम्हांतेंही नित्य संगती । भाग्यस्थिती धन्य तुमची ॥१०९॥</p>
<p>
	वाटे तुमच्या पुण्यार्जित सत्कृती । धारण करवूनि मनुष्याकृती । तुम्हींच परम भाग्यवंतीं । आणविली ही मूर्ती शिरडींत ॥११०॥</p>
<p>
	अनंत पुण्याईच्या कोडी । तेणें आम्हां लाधली शिरडी । वाटे श्रीसाईंच्या दर्शनपरवडी । करावी कुरवंडी सर्वस्वीं ॥१११॥</p>
<p>
	साई सज्जन स्वयें अवतार । महा - वैष्णवसा आचार । ज्ञानद्रुमाचा कोंमचि साचार । शोभे हा भास्कर चिदंबरीं ॥११२॥</p>
<p>
	असो, आमुची ही पुण्याई । म्हणोनि भेटे ही मशीद आई । नवस आमुचे फेडूनि घेई । दर्शन देई सवेंच ॥११३॥</p>
<p>
	आम्हां हाच आमुचा दत्त । एणेंचि आज्ञापिलें तें व्रत । एणेंचि आम्हां बैसविलें नावेंत । दर्शना शिरडींत आणिलें ॥११४॥</p>
<p>
	ऐसी सर्वव्यापकतेची । निजसर्वांतर्यामित्वाची । दिधली साईंनीं जाणीव साची । साक्षित्वाची सर्वत्र ॥११५॥</p>
<p>
	पाहोनियां सस्मित मुख । झालें मनीं परम सुख । प्रपंचीं विसरे प्रपंचदु:ख । न समाये हरिख परमार्थीं ॥११६॥</p>
<p>
	होणार होवो प्रारभ्धगतीं । ऐशी व्हावी निश्चित मती । साईचरणीं अखंड प्रीती । राहो ही मूर्ती नित्य नयनीं ॥११७॥</p>
<p>
	अगाध अगम्य साई - लीला । सीमा नाहीं उपकाराला । वाटे तुम्हांवरुनी दयाळा । ओंवाळावा हा देह ॥११८॥</p>
<p>
	असो, आतां ऐका कथांतर । सावधान होऊनि क्षणभर । साई मुखीं वदले जें अक्षर । तें तों निर्धार ब्रम्हालेख ॥११९॥</p>
<p>
	सखारामा औरंगावादकर । निवासस्थान सोलापुर शहर । पुत्रसंतानालागीं आतुर । पातलें कलत्र शिरडीस ॥१२०॥</p>
<p>
	साईबाबा संत पवित्र । ऐकूनि त्यांचेम अगाध चरित्र । सवें घेऊनि सापत्नपुत्र । आली सत्पात्रदर्शना ॥१२१॥</p>
<p>
	सत्तावीस वर्षें न्हातां । गेलीं परी न संतानवार्ता । थकली देवदेवी नवसितां । निराश चित्ता जाहली ॥१२२॥</p>
<p>
	असो, ऐसी ती सुवासिनी । हेतु धरूनि बाबांचे दर्शनीं । आली ऐसी शिरडीलागुनी । विचार मनीं उद्भवला ॥१२३॥</p>
<p>
	वाबा सदा भक्तजनवेष्टित । कैसे मज सांपडती निवांत । कैसें कथिजेल माझें ह्रद्नत । म्हणोनि सचिंत जाहली ॥१२४॥</p>
<p>
	उघडी मशीद अंगन । बाबांभोवते सदा भक्तगण । कैआ मिळेला निवांत क्षण । आर्त निवेदन व्हावया ॥१२५॥</p>
<p>
	ती आणि तिचा सुत । नाम जयाचें विश्वनांथ । राहिले दोन महिनेपर्यंत । सेवा करीत बाबांची ॥१२६॥</p>
<p>
	एकदां माधवरावां विनवणी । विश्वनाथ अथवा कोणी । बाबांपाशीं नाहीं पाहुनी । करी ती कामिनी ती परिसा ॥१२७॥</p>
<p>
	तुम्ही तरी पाहूनि  अवसर । माझिया मनींचें हें हार्द । पाहूनि बाबा शांतस्थिर । घाला कीं कानावर तयांचे ॥१२८॥</p>
<p>
	तेही जेव्हां असती एकले । नाहीं भक्तपरिवारें वेढिले । तेव्हांच कीं हें सांगा  वहिलें । कोणीं न ऐकिलें जाय असें ॥१२९॥</p>
<p>
	माधवराव प्रत्युत्तर करिती । मशीद ही तों कधीं न रिती । कोणी ना कोणी दर्शनार्थीं । येतचि असती निरंतरीं ॥१३०॥</p>
<p>
	साईंचा हा दरबार खुला । येथें मज्जाव नाहीं कुणाला । तथापि ठेवितों सांगूनि तुजला । आण कीं खुलासा हा ध्यानीं ॥१३१॥</p>
<p>
	प्रयत्न करणें माझें काम । यशदाता मंगलधाम । अंतीं तोचि देईल आराम । चिंतेचा उपशम होईल ॥१३२॥</p>
<p>
	तूं मात्र बैस घेऊनि हातीं । नारळ एक आणि उदबत्ती । सभामंडपीं दगडावरती । बाबा जेवूं बैसती तैं ॥१३३॥</p>
<p>
	मग मी भोजन झालियावरती । पाहीन जेव्हा आंनदित वृत्ति । खुणावीन कीं तुजप्रती  तेव्हांच  वरत यावें त्वां ॥१३४॥</p>
<p>
	असो: ऐसें करितां करितां । प्राप्त घडीचा योग येतां । एकदां साईंचें भोजन उरकतां । पातली अवचिता ती संधी ॥१३५॥</p>
<p>
	साई आपुले हस्त धूतां । माधवराव वस्त्रानें पुसतां । आनंदवृत्तीमध्यें असतां । ते काय करितात पहावें ॥१३६॥</p>
<p>
	प्रेमोल्हासें माधवरावांचा । बाबा तंव घेती गालगुच्चा । ऐसिये संधीचा देव - भक्तांचा । संवाद वाचा प्रेमाचा ॥१३७॥</p>
<p>
	माधवराव विनयसंपन्न । परी रागाचा आव दावून । विनोदें म्हणती बाबांलागून । हें काय लक्षण बरें का? ॥१३८॥</p>
<p>
	नलगे ऐसा देव खटयाळ । गालगुच्चे जो घेई प्रबळ । आम्ही काय तुझे ओशाळ । सलगीचें फळ हें काय ? ॥१३९॥</p>
<p>
	तंव बाबा प्रत्युत्तर देत । “कधीं अवघ्या बहात्तर पिढींत । लाविला रे म्यां तुज हात । असे कां स्मरत पहा बरें” ॥१४०॥</p>
<p>
	तंव बोलती माधवराव । आम्हां पाहिजे ऐसा देव । देईल जो भुके सदैव । मिठाई अभिनव खावया ॥१४१॥</p>
<p>
	नलगे आम्हां तुझा मान । अथवा स्वर्गलोकींचें विमान । जागो तुझिये पायीं इमान । इतुकेंचि दान देईं मज ॥१४२॥</p>
<p>
	तंव बाबा लागले बोलों । एतदर्थचि मी येथें आलों । तुम्हांस खाऊं घालूं लागलों । लागला लोलो मज तुमचा ॥१४३॥</p>
<p>
	इतुकें होतां कठडयापाशीं । बाबा बैसतां निजासनासी । माधवराव करितां खुणेसी । बाई निजकार्यासी सावध ॥१४४॥</p>
<p>
	खूण होतांच तात्काळ उठली । लगबगीनें पायर्‍या चढली । बाबांचिया सन्मुख आली । नम्र झाली सविनय ॥१४५॥</p>
<p>
	तात्काळ चरणीं अर्पिलें श्रीफळ । वंदिले मग चरणकमळ । बाबांनीं निजहस्तें तो  नारळ । हाणितला सबळ कठडयावरी ॥१४६॥</p>
<p>
	म्हणती शामा हा काय म्हणतो । नारळ फारचि रे गुडगुडतो । शामा मग ती संधी साधतो । काय वदतो बाबांस ॥१४७॥</p>
<p>
	माझिये पोटीं असेंच गुडगुडो । बाई ही मनीं म्हणे तें घडो । अखंड मन तव चरणीं जडो । कोडें उलगडो तियेचें ॥१४८॥</p>
<p>
	पाहीं तिजकडे कृपाद्दष्टीं । टाक तो नारळ तिचे ओटीं । तुझिया आशीर्वादें पोटीं । बेटा बेटी उपजोत ॥१४९॥</p>
<p>
	तंव बाबा तया वदती । “काय नारळें पोरें होती । ऐशा कैशा वेडया समजुती । चळले वाटती जनलोक” ॥१५०॥</p>
<p>
	शामा वदे आहे ठाऊक । तुझिया बोलाचें कौतुक । लेंडार मागें लागेल आपसुख । ऐसा अमोलिक बोल तुझा ॥१५१॥</p>
<p>
	परी तूं साप्रत धरिशी भेदा । नेदिशी खरा आशीर्वाद । उगाच घालीत बैससी वाद । नारळप्रसाद देईं तिस ॥१५२॥</p>
<p>
	‘नारळ फोड’ बाबा वदत । शामा वदे टाक पदरांत । ऐसी बरीच होतां हुज्जत । हारीस येत तंव बाबा ॥१५३॥</p>
<p>
	“म्हणती होईल जा रे पोर” । शामा म्हणे ‘कधीं’ दे उत्तर । वदतां “बारा महिन्यांनंतर” । नारळ ताडकर फोडिला ॥१५४॥</p>
<p>
	अर्धभाग दोघीं सेविला । अर्ध राहिला बाईतें दिधला । माधवराव वदे बाईला । माझिया बोला तूं साक्षी ॥१५५॥</p>
<p>
	बाई तुज आजपासून । बारा महिने नव्हतां पूर्ण । जाहलें नाहीं पोटीं संतान । काय मी करीन तें परिस ॥१५६॥</p>
<p>
	‘ऐसाच नारळ डोकींत घालून । या देवाला मशिदीमधून । मी न जरी लावीं काढून । तरी न म्हणवीन माधव ॥१५७॥</p>
<p>
	ऐसा देव न मशिदींत । ठेवूं देणार वदतों खचित । येईल वेळीं याची प्रचीत । निर्धार निश्चित हा मान’ ॥१५८॥</p>
<p>
	ऐसें मिळतां आश्वासन । बाई मनीं सुखायमान । पायीं घालोनि लोटांगण । गेली स्वस्थमन निजग्रामा ॥१५९॥</p>
<p>
	पाहूनि शामा नित्यांकित । रक्षावें भक्तमनोगत । साई प्रेमरज्जुनियंत्रित । आला न किंचित कोप तया ॥१६०॥</p>
<p>
	खरें कराया भक्तवचन । प्रणतपाळ करुणाघन । साई दयाळ भक्ताश्वासन । लडिवाळपण पुरवीत ॥१६१॥</p>
<p>
	शामा आपुला लाडका भक्ता । लडिवाळ नेणे युक्तायुक्त । संत भक्तसंकल्प पुरवीत । हेंच निजव्रत तयाचें ॥१६२॥</p>
<p>
	असो, भरतां बारा मास । कृतनिर्धार नेला तडीस । तीनचि महिने होतां बोलास । पातलें गर्भास संतान ॥१६३॥</p>
<p>
	भाग्यें जाहली पुत्रवती । पांचां महिन्यांचें बाळ संगती । घेऊनि आली शिरडीप्रती । पतिसमवेती दर्शना ॥१६४॥</p>
<p>
	पतीनेंही आनंदोनी । साईसमर्थचरण वंदोनी । पायीं पंचशत रुपये अर्पुनी । कृतज्ञ निज - मनीं जाहाला ॥१६५॥</p>
<p>
	बाबांचा वारू श्यामकर्ण । तयाचें सांप्रत वसतिस्थान । तयाच्या भिंती घेतल्या बांधून । रुपये लावून हेच पुढें ॥१६६॥</p>
<p>
	म्हणोनि ऐसा साई ध्यावा । साई स्मरावा साई चिंतावा । हाच हेमाडा निज विसावा । करी न धांवाधांव कुठें ॥१६७॥</p>
<p>
	निज नाभींत असतां जवादी । किमर्थ भ्रमावें बिदोबिदीं । अखंड विनटत साईपदीं । हेमाड निरवधि सुख लाहे ॥१६८॥</p>
<p>
	पुढील अध्याय याहूनि रसाळ । कैसे बाबांसी भक्त प्रेमळ । मशिदींतून चावडीजवळ । मिरवीत सकळ आनंदें ॥१६९॥</p>
<p>
	तैसीच बाबांच्या हंडीची कथा । प्रसाददान विनोदवार्ता । पुढील अध्यायीं परिसिजे श्रोतां । चढेल उल्हासता श्रवणास ॥१७०॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । साईसर्वव्यापकता तदाशीर्वचनसाफल्यता नाम षट्‌‍त्रिंशत्तमोऽध्या: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-37-122042600065_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ३७</a></strong></p>
</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 15:30:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 15:45:21 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ३५]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-35-122042600062_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
मागां गताध्यायाअंतीं ॥ दिग्दर्शन कथानुसंगती । कथिली तीच कथितों संप्रती । ती स्वस्थांचेत्तीं परिसिजे ॥१॥
करूं ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 35" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650967136-489.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra adhyaay 35" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	मागां गताध्यायाअंतीं ॥ दिग्दर्शन कथानुसंगती । कथिली तीच कथितों संप्रती । ती स्वस्थांचेत्तीं परिसिजे ॥१॥</p>
<p>
	करूं जातां परमार्थविचार । पंथाभिमान अडवी भयंकर । विन्घ नाहीं अति दुर्धर । या अभिमानासम दुजें ॥२॥</p>
<p>
	आम्ही निराकाराचे भजक । साकार देव हा भ्रममूलक । साधुसंत हे मानवचि देख । नमवावें कां मस्तक तयांपुढें ॥३॥</p>
<p>
	तयां न घालावें लोटांगण । तयां न द्यावें दक्षिणादान । खालवावी न यत्किंचित मान । विडंबन हें भक्तीचें ॥४॥</p>
<p>
	शिरडीसंबंधें अनेकांही । कोणीं कांहीं कोणीं कांहीं । अनेक वार्ता । कथिल्या पाहीं । विश्वसनीय नाहीं सकळ पां ॥५॥</p>
<p>
	म्हणती तेथें जातां दर्शना । साईबाबा मागती दक्षिणा । साधू जैं लागती द्रव्यसंपादना । साधुत्वा हीनपणा तयांच्या ॥६॥</p>
<p>
	अंधश्रद्धा नव्हे बरी । प्रत्यक्ष अनुभय घेतल्याउपरी । ठरवूं निर्णय आपुल्या अंतरीं । कैसियेपरी वर्तावें ॥७॥</p>
<p>
	आपण नाहीं देणार दक्षिणा । जया मनीं वित्ताची कामना । तयाचें साधुत्व येईना मना । अपात्र नमना तो आम्हां ॥८॥</p>
<p>
	असो आम्ही शिरडीस जाऊन । येऊं तयांची भेट घेऊन । करणार नाहीं चरणवंदन । अथवा प्रदान दक्षिणेचें ॥९॥</p>
<p>
	जो जो ऐसिया कुतर्कें निघे । जरी आपुल्या कृतनिश्चया जागे । अखेर तोही दर्शनयोगें । शरण रिघे साईंस ॥१०॥</p>
<p>
	जो जो साईंस पाहूं सरला । तो तो जागचे जागींच ठेला । पुनश्च नाहीं मागें परतला । पायींच रतला साईंच्या ॥११॥</p>
<p>
	धरूनियां दांतीं तृण । जैसें कोणीं यावें शरण । तैसियेपरी वंदी चरण । पावोनि विस्मरण निश्च्या ॥१२॥</p>
<p>
	पंथाभिमाना जेथें विसांवा । सौख्य वाटेल अत्यंत जीवा । तो हा अध्याय पस्तिसावा । श्रोतीं परिसावा सादर ॥१३॥</p>
<p>
	तैसीच सूचित उदीची ख्याती । बाळा नेवासकराची प्रतीती । कैसा सर्प संभाविला प्रीती । साईच तयाप्रति भावून ॥१४॥</p>
<p>
	कृपा करा श्रोते मजवर । मी तों केवळ आज्ञेचा किंकर । आज्ञा पाळूं जाणें सादर । उद्भवलें अक्षर चरित्र हें ॥१५॥</p>
<p>
	द्दष्टि ठेवितां चरणावरी । तेथूनि उमटती पदलहरी । पवित्र चरित्र कुंभांतरीं । वरिचेवरी मी भरितों ॥१६॥</p>
<p>
	कासवीचीं आम्हीं पिलीं । केवळ द्दष्टिक्षेपें पोसिलीं । नाहीं तान्हेलीं भुकेलीं भागलीं । सदैव ठेलीं संतृप्त ॥१७॥</p>
<p>
	असतां एक द्दष्टीचें सुख । नलगे आम्हां अन्नउदक । द्दष्टीच हरी तहान भूक । किती तें कौतुक वानावें ॥१८॥</p>
<p>
	आम्हांही सकल द्दष्टीचा विषय । कृपासिंधु साईराय । द्दश्य - द्रष्टा - दर्शन जाय । पुसोनि ठाय त्रिपुटीचा ॥१९॥</p>
<p>
	तैसेच आम्हां त्वचा स्पर्श । दोहीं ठायीं साईप्रकाश । अथवा घ्राण आणि वास । तेथेंही निवास साईंचा ॥२०॥</p>
<p>
	अथवा श्रवणीं शब्द पडे । पडतांच प्रकटे साईंचें रूपडें । श्राव्य श्रावक श्रवण उडे । त्रिपुटी झडे एकसरा ॥२१॥</p>
<p>
	अथवा जेथें रसना रसें । घोळली तेथें साई समरसे । रसना - रस - रसास्वाद कायसें । बापुडें कोडें त्रिपुटीचें ॥२२॥</p>
<p>
	हेच गति कर्मेंद्रियां । तिंहीं एक साई सेविलिया । सकल कर्में जाती विलया । पडेल ठाय नैष्कर्म्य ॥२३॥</p>
<p>
	असो आतां हा ग्रंथ लांबला । साईप्रेमें कोठेंच वाहवला । पूर्वानुसंधान लक्षूं चला । चालवूं आपुला कथाभाग ॥२४॥</p>
<p>
	एक मूर्तिपूजापराङमुख । निराकाराचे परम भजक । जाहले शिरडी - गमनोत्सुक । केवळ चिकित्सैकबुद्धीनें ॥२५॥</p>
<p>
	म्हणती आम्ही शिरडीस येऊन । घेऊं केवळ साधूचें दर्शन । आम्ही न केव्हांही वांकवूं मान । करूं न प्रदान दक्षिणेचें ॥२६॥</p>
<p>
	मान्य कराल या दोन शर्ती । तरी येऊं कीं शिरडीप्रती । बरें म्हणतां निजमित्रासंगतीं । जावया निघती स्थस्थ मनें ॥२७॥</p>
<p>
	काका महाजनी त्यांचे मित्र । संतार्थ जयांची भावना पवित्र । परी ते शंकाकुशंकापात्र । स्नेही होते तयांचे ॥२८॥</p>
<p>
	दोघे निघाले शनिवारीं । मुंवईहून रात्रीचे प्रहरीं । येऊनि पातले शिरडीभीतरीं । आदित्यवारीं सकाळीं ॥२९॥</p>
<p>
	दोघे गेले मशिदीस । साईदर्शन घ्यावयास । काय वर्तलें ते समयास । स्वस्थमानस परिसिजे ॥३०॥</p>
<p>
	पाऊल वेवितां पायरीवरी । तया मित्रा पाहूनि दूरी । “कां यावें जी” ऐसिये परी । बाबा मधुरोत्तरीं बाहती ॥३१॥</p>
<p>
	ऐकूनि हें प्रेमवचन । तया मित्रास पटली खूण । शब्दोच्चाराची ती ठेवण । देई त्या स्मरण वडिलांचें ॥३२॥</p>
<p>
	“कां यावें जी” हा उच्चार । काढितां बाबा करिती जो स्वर । तो ऐकतां काकांचे मित्र । विस्मितांतर जाहले ॥३३॥</p>
<p>
	परिसोन मोहक स्वराची ठेवण । गतपित्याचें झालें स्मरण । त्याचेच स्वराची तर्‍हा ही पूर्ण । वाटलें अनुकरण यथार्थ ॥३४॥</p>
<p>
	काय वाणीची मोहनशक्ति । ककांचे मित्र विस्मित चित्तीं । म्हणाले ही मम पित्याचीच उक्ती । स्वर हा निश्चितीं ओळखीचा ॥३५॥</p>
<p>
	वडिलां - मुखींची तैसी ती वैखरी । ऐकतां ते मित्र द्रवले अंतरीं । वंदिले बाबांचे चरण शिरीं । विसरूनि पूर्वील निश्चय ॥३६॥</p>
<p>
	पुढें बाबा दक्षिणा मागती । तीही केवळ काकांचे प्रती । काका देती, दोघेही परतती । पुनश्च जाती दुपारा ॥३७॥</p>
<p>
	तेव्हांही हे सवेंचि जाती । दोघांही जाणें मुंबईप्रती । काका तेव्हां आज्ञा प्रार्थिती । दक्षिणा मागती बाबा त्यां ॥३८॥</p>
<p>
	तीही केवळ काकांचे पाशीं । म्हणती सत्रा रुपये दे मजसी । कांहीं न मागत तन्मित्रासी । मन ते मनाशींच चुटपुटले ॥३९॥</p>
<p>
	तंव ते काकांस हळूच पुसती । तुम्हांसचि कां दक्षिणा मागती । सकाळींही तुम्हांचप्रती । आतांही मागती तुम्हांसचि ॥४०॥</p>
<p>
	मी असूनि तुम्हांसंगतीं । दक्षिणेलागीं मज कां वगळती । काका हळूच उत्तर देती । बाबांप्रतीच पुसा हें ॥४१॥</p>
<p>
	इतुक्यांत बाबा काकांस वदती । तो काय सांगे रे तुजप्रती । तों स्वयेंच ते मित्र बाबांस पुसती । दक्षिणा म्हणती देऊं का ॥४२॥</p>
<p>
	तंव बाबा उत्तर देती । “तुझे मनीं देण्याची नव्हती । म्हणूनि नाहीं मागितली तुजप्रती । देणें चित्तीं तर देईं ॥४३॥</p>
<p>
	बाबा मागतां भक्त देत । तयां ते मित्र हिणवीत । तेच न मागतां जैं देऊं का म्हणत । आश्चर्यभरित तंव काका ॥४४॥</p>
<p>
	म्हणतां चित्तीं असल्यास देईं । तया मित्रास जाहली घाई । सत्रा रुपायंची भरपाई । केली पायीं न मागतां ॥४५॥</p>
<p>
	बाबा मग वदती तयास  । “जासील रे क्षण एक बैस” । करिते झाले गोड उपदेश । निरसावया सभेदात्मता ॥४६॥</p>
<p>
	“तुम्हा - आम्हांतील तेल्याची भिंत । पाडूनियां ती टाक समस्त । होईल मग मार्ग प्रशस्त । अरस परस भेटावया” ॥४७॥</p>
<p>
	पुढें आज्ञा झाले देते । माधवराव जाहले प्रार्थिते । पाहूनि अभ्राच्छादित नभातें । पाऊस यांतें भिजवील ॥४८॥</p>
<p>
	बाबा प्रत्युत्तर त्यां देती । जाऊं दे त्यां स्वस्थचित्तीं । पाउसाची कांहींही भीती । नाहीं तयांप्रती मार्गांत ॥४९॥</p>
<p>
	अभिवंदूनि साईंचे पाय । तैसच गाडींत बसैले उमय। विजा चमकत दाटत धूय़ । गंगेस पय - पूर लोटला ॥५०॥</p>
<p>
	गडगडाटें गर्जे आकाश । नौकागमन आलें वांटयास । काका - मनीं पूर्ण विश्वास । होतें आश्वासन बाबांचें ॥५१॥</p>
<p>
	पडला विचार त्या मित्रास । कैसा सुखाचा होईल प्रवास उगीच मिघालों यावयास । होतील सायास मार्गांत ॥५२॥</p>
<p>
	असो पुढें सुखें गेले । अग्निरथांत आरूढ झाले । मेघ मग तेथून वरसूं लागले । निर्भय पावले मुंबईस ॥५३॥</p>
<p>
	पुढें जेव्हां आले सदनीं । पाहती खिडक्या द्वारें खोलुनी । गेली अडकली चिमणी उडुनी । गतप्राण दोनी आढळल्या ॥५४॥</p>
<p>
	पाहूनि ऐसा तो देखावा । वाईट बहुत वाटलें जीवा । अन्नपाण्यावांचूनि देवा । बिचार्‍या जीवा मुकल्या या ॥५५॥</p>
<p>
	निघालों जेव्हां जावया शिरडी । वातायनें जरी ठेवितों उघडीं । पडती नाहीं काळाची उडी । मेलीं बापुडीं मजहातें ॥५६॥</p>
<p>
	म्हणे आतां उडाली जी । तिचीच जणूं बाबांस काळजी । म्हणोनि दिधली होऊनि राजी । अनुज्ञा आजी परतावया ॥५७॥</p>
<p>
	नाहींतरी तीही मरती । अन्नावीण कैसी जगती । आयुष्य सरलें तेणें हे गती । पावली निश्चिती ती एक ॥५८॥</p>
<p>
	आणीक यांचा अनुभव एक । तोही श्रवणार्ह आहे सुरेख । एका पायांच्या टांचेचें दु:ख । भोगीत हे  कित्येक मासवरी ॥५९॥</p>
<p>
	शिरडीस जाणें घडल्या आधीं । बहुत महिने भोगिली ही व्याधी । तेथून परतल्यापाठीं न बाधी । नासली अल्पावधींतचि ॥६०॥</p>
<p>
	ऐसीच आणिक दुसरी कथा । संतांचा अंत लावूं जातां । पायीं नमवावा लागला माथा । मनीं नसतां ती परिसा ॥६१॥</p>
<p>
	तैसीच दक्षिणा देण्याची नसतां । मोहपाशीं अडकले जातां । भंगूनि आपुली द्दढनिश्चयता । दक्षिणा देतात कैसी ती ॥६२॥</p>
<p>
	ठक्कर धरमसी जेठाभाई । साँलिसीटर रहिवास मुंबई । बळावली पूर्वपुण्याई  । भेटूं साईंस मन झालें ॥६३॥</p>
<p>
	महाजनींचे हेच शेट । उभयतांचा परिचय दाट । वाटलें शिरडीस जाऊन थेट । घ्यावी कीं भेट प्रत्यक्ष ॥६४॥</p>
<p>
	ठक्करजींच्या पेढीवरी । काका मुख्य कारभारी । सुटी साधोनी हाहोहारी । करीत तयारी शिरडीची ॥६५॥</p>
<p>
	काका तरीं काय वेळीं परतती । आठाठ दिन शिरडीस काढिती । आज्ञा नाहीं साईंची म्हणती । ही काय रीती कामाची ॥६६॥</p>
<p>
	ऐसे कैसे तरी हे संत । बंड नव्हे हें आम्हां पसंत । निघाले शेट शिमग्याचे सुटींत । लावाया अंत साईंचा ॥६७॥</p>
<p>
	अंगीं दुर्धर देहाभिमान । निजैश्वर्याचेंच महिमान । संत तरी मानवासमान । किमर्थ मान वांकवावी ॥६८॥</p>
<p>
	पाहूनि साईंची अधिकारस्थिति । शास्त्री पंडित टेंकीस येती । तेथें बापुडे धरमसी ते किती । ते काय तगती निश्चया ॥६९॥</p>
<p>
	परी न अंधश्रद्धा बरी । करूनि घेऊं आपुली खातरी । करूनि ऐसा निश्चय अंतरीं । केली तयारी शिर्डीची ॥७०॥</p>
<p>
	वर्णिल्या एका स्नेह्याच्या वरती । धरमसीही तेच रीती । सवें काकांस घेऊनि निघती । आणीक वदती तयांस ॥७१॥</p>
<p>
	शिरडीस जातां तेथेंच रहातां । चालेना या खेपे ही वार्ता । परतलें पाहिजे मजसमवेता । हें निश्चितता जाणावें ॥७२॥</p>
<p>
	तंव काका तयां वदती । हें तों नाहीं आम्हांहातीं । तदा धरमसी सवें घेती । आणीक सांगाती मार्गार्थ ॥७३॥</p>
<p>
	न जाणों काका नाहींच परतले । सांगात्यावीण मार्गांत न चले । म्हणूनि आणिक तिजया घेतलें । तिघे निघाले शिर्डीस ॥७४॥</p>
<p>
	जगांत ऐशा कित्येक जाती । परोपकारी भक्तांच्या असती । तयांची कराया संशयनिवृत्ती । बाबा आणिती धरधरूं ॥७५॥</p>
<p>
	मग ते जेव्हां माघारा जाती । आपुले अनुभव इतरां कथिती । लिहवूनि घेती कोणाही हातीं । जना सत्पथीं लावया ॥७६॥</p>
<p>
	तात्पर्य हे जे कोणी जाती । दर्शनसुखें तृप्त होती । आरंभीं कैसीही तयांची वृत्ति । परमानंदप्राप्ति अखेर ॥७७॥</p>
<p>
	म्हणोत आपुले पायीं जाती । असे ना कां चिकित्सा - प्रीती । परी निराळी वस्तुस्थिती । कार्य साधिती बाबांचें ॥७८॥</p>
<p>
	बाबाचि तयां देती स्फूर्ती । तेव्हांचि बाहेर पाय काढ्ती । चेववूनि स्वाभाविक वृत्ति । लाविती परमार्थीं तयांस ॥७९॥</p>
<p>
	कोण जाणे तयांच्या कळा । जाणूं जातां होतील अवकळा । होऊनि निरभिमान पायीं लोळा । भोगाल सोहळा सुखाचा ॥८०॥</p>
<p>
	बरवें न जाणें रिक्तकरीं  । देव - द्विज- गुरु - द्वारीं । म्हणवूनि द्राक्षांची दो - शेरी । काका खरीदीत मार्गांत ॥८१॥</p>
<p>
	पोटीं नाहीं बीज ज्यांत । असे ऐसी ही द्रक्षांची जात । परी सबीज जीं वेळीं प्राप्त । घेतलीं विक्रींत काकांनीं ॥८२॥</p>
<p>
	असो गोष्टी वार्ता करीत । पातली ही त्रयी शिरडींत । सवें तिघेही दर्शनार्थ । गेले मशिदींत बाबांच्या ॥८३॥</p>
<p>
	बाबासाहेब तर्खड भक्त । हेही होते तेथें स्थित । शेट धरमसी जिज्ञासाप्रेरित । पुसती तयांप्रत तें परिसा ॥८४॥</p>
<p>
	येथें काय आहे कां येतां । तर्खड वदती दर्शनाकरितां । शेट म्हणती ऐकिली वार्ता । येथें तों घडतात चमत्कार ॥८५॥</p>
<p>
	तंव तर्खड वदती त्यांना । ही तों नाहीं माझी भावना । जैसी उत्कंठा जयाचे मना । पावे ती कामना सिद्धीतें ॥८६॥</p>
<p>
	काकांनीं पायीं डोई ठेविली । द्राक्षें बाबांच्या करीं अर्पिलीं । वांटावयाची सुरवात झाली । मंडळी जमली होतीच ॥८७॥</p>
<p>
	बाबा तंब इतरांसमवेत । धरमसीसही कांहीं देत । परी तयां ती नावडती जात । निर्बीजीं प्रीत तयांस ॥८८॥</p>
<p>
	या द्राक्षांची तयांस चीड । आरंभींच उपजली नड । कैसीं सेवावीं वाटलें अवघड । अव्हेरही जड वाटे मना ॥८९॥</p>
<p>
	शिवाय डॉक्टरें केलें मना । द्राक्षें न खावीं धुतल्याविना । आपणचि धुणें योग्य वाटेना । उठल्या कल्पना नानाविध ॥९०॥</p>
<p>
	पुढें तैशींच टाकिलीं तोंडांत । बिया चघळूनि ठेविल्या खिशांत । साधूंचें तें स्थान पुनीत । करवेना अपुनीत उच्छिष्टें ॥९१॥</p>
<p>
	तंव ते शेट मनीं म्हणती । साधु असतां कैसें हें नेणती । कीं हीं द्राक्षें मज नावडती । बळेंच कां देती मजप्रती ॥९२॥</p>
<p>
	उठतां ऐसी तयांची वृत्ति । बाबा तींच आणीक त्यां देती । तीं सबीज जाणूनि हातींच ठेविती । मुखीं न घालिती धरमसी ॥९३॥</p>
<p>
	सबीज नावडती द्राक्षें खरीं । परी तीं बाबांनीं दिधलीं करीं । धरमसी शेट अवघडले अंतरीं । कैसियेपरी वर्तावें ॥९४॥</p>
<p>
	तोंडीं घालावया होईना मन । करूनि ठेविलीं मुठींत जतन । तंव बाबा वदती “टाक रे खाऊन” । मानिलें आज्ञापन शेटीनें ॥९५॥</p>
<p>
	“खाऊन टाक” बाबा वदतां । धरमसींनीं तोंडांत टाकितां । बीजरहित तीं सर्वही लागतां । अति आश्चर्यता पावले ॥९६॥</p>
<p>
	ऐसीं निर्बीज द्राक्षें लागतां । धरमसी होऊनि विस्मितचित्ता । मनीं म्हणे अजब सत्ता । काय या संतां अशक्या ॥९७॥</p>
<p>
	जाणोनि माझे मनींचा हेत । असतां सबीज आणि निर्धूत । साई मज जीं जीं देत । तीं तीं बीजरहित हितकारी ॥९८॥</p>
<p>
	थक्क झाली चित्तवृत्ती । चिकित्सेची पडली विस्मृती । गळाली सर्व अहंकृती । संतीं प्रीती उपजली ॥९९॥</p>
<p>
	पूर्वसंकल्प गेले विलया । साईप्रेम उपजलें ह्रदया । उत्कंठा जी शिरडीस यावया । कृतनिश्चया सारखी ॥१००॥</p>
<p>
	बाबा तर्खड हेही तेथें । बावांपाशींच बसले होते । बाबा साई जाहले वांटिते । त्यांतील त्यांतेंही काहीं ॥१०१॥</p>
<p>
	तेव्हां धरमसी तयांही पुसती । आपुलीं द्राक्षें कैसीं होतीं । बाबा जेव्हां सबीज म्हणती । विस्मित चित्तीं अतिशय ॥१०२॥</p>
<p>
	तेणें ते साधु ही श्रद्धा बसली । द्दढीकरणार्थ कल्पना स्फुरली । साधु असाल तरी हीं पुढलीं । जातील दिधलीं काकांना ॥१०३॥</p>
<p>
	बाबा वांटीत होते बहुतां । परी हें स्फुरतां शेटीचे चित्ता । काकांपासूनच शेज धरितां । अति नवलता शेटीस ॥१०४॥</p>
<p>
	ऐशा साधुत्वाच्या खुणा । ऐसा हा मनकवडेपणा । पुरा झाला धरमसीच्या मना । साधु साईंना मानावया ॥१०५॥</p>
<p>
	माधवराव होते तेथें । ते मग झाले बाबांस निवेदिते । काकांचे मालक शेट हे ते । झाले समजाविते बाबांस ॥१०६॥</p>
<p>
	“हा कुठला काकाचा मालक । त्याचा मालक आहे आणिक” । बाबा प्रत्युत्तर देती चोख । काकांस तोखदायकसें ॥१०७॥</p>
<p>
	आणिक कैसी नवलपरी । आप्पा नामें एक आचारी । उभा तेथेंच धुनीशेजारीं । बाबा तयावरी घालिती ॥१०८॥</p>
<p>
	म्हणती हे शेटजी इथवर आले । ते मजकरितां नाहीं श्रमले । आप्पालागीं प्रेम दाटलें । म्हणून पातले शिरडीस ॥१०९॥</p>
<p>
	असो ऐसें हें भाषण झालें । धरमसी आपुले निश्चय विसरले । आपण होऊन पायां पडले । मग ते परतले वाडयांत ॥११०॥</p>
<p>
	असो माध्यान्हीं आरती झाली । घरीं जाण्याची तयारी चालली । आज्ञा घेण्याची वेळ आली । मंडळी निघाअली मशीदीं ॥१११॥</p>
<p>
	धरमसी तेव्हां काकांस वदत । मी तों नाहीं आज्ञा मागत । तुम्हीच मागा तुम्हां ती लागत । तंव काय म्हणत माधवराव ॥११२॥</p>
<p>
	काकांचें तों नाहीं प्रमाण । आठवडा एक भरल्यावीण । होणार नाहीं आज्ञापन । आपणचि विचारून घ्याना कां ॥११३॥</p>
<p>
	पुढें हे तिघे जाऊन बैसतां । माधवराव आज्ञा मागतां । बाबांनीं सांगूं आंरभिली वार्ता । ती स्वस्थचित्ता परिसावी ॥११४॥</p>
<p>
	“होता एक चंचलबुद्धि । घरीं धनधान्याची समृद्धि । शरीरीं नाहीं आधिव्याधि । नसती उपाधि आवडे ॥११५॥</p>
<p>
	उगाच बोजा वाही माथां । हिंडे इतस्तत:  नाहीं स्वस्थता । खालीं ठेवी उचली मागुता । नाहीं निश्चलता मनास ॥११६॥</p>
<p>
	पाहूनि ऐसी तयाची अवस्था । कींव आली माझिया चित्ता । ‘वाटेल त्या एका ठायीं आतां । ठेव रे निश्चितता’ म्हणालों ॥११७॥</p>
<p>
	उगाचि ऐसा भ्रमतोस । एका ठायींच स्वस्थ बैस” । वार्ता खोंचली धरमसीस । मानीत आपणास इशारा तो ॥११८॥</p>
<p>
	असोनि वैभव यथास्थित । कारण नसतां यत्किंचित । धरमसी सदा चिंताक्रांत । डोकें पिकवीत उगाच ॥११९॥</p>
<p>
	असतां विपुल संपत्ति मान । मनास नाहीं समाधान । पाठीसी काल्पनिक दु:खें गहन । त्यांतचि निमग्न सर्वदा ॥१२०॥</p>
<p>
	ऐकतां साईमुखींची कथा । शेटजी परमविस्मित चित्ता । ही तों आपुले मनाची अवस्था । अति सादरता परिसिली ॥१२१॥</p>
<p>
	काकांस इतुकी लवकर आज्ञा । अशक्य कोटीची ही घटना । परी तीही मिळतां प्रयासाविना । धरमसी मनांत संतुष्ट ॥१२२॥</p>
<p>
	काकानें निघावें बरोबर । धरमसीची इच्छा फार । तीही बाबांनीं पाडिली पार । देऊनि होकार जावया ॥१२३॥</p>
<p>
	हाही एक शेटजींचा पण । कैसी बाबांनीं जाणिली खूण । हेंही एक साधुत्वलक्षण । पटलें विलक्षण धरमसींना ॥१२४॥</p>
<p>
	जाहली संशयनिवृत्ति । साई साधु ही अभिव्यक्ति । जया मनीं जैसी वृत्ति । तैसीच अनुभूति दाविली ॥१२५॥</p>
<p>
	ज्या ज्या मार्गें जाऊं इच्छिती । तो तोच  मार्ग तया लाविती । साई जाणती अधिकारसंपत्ति । परमार्थप्राप्तिही त्या मानें ॥१२६॥</p>
<p>
	भक्त भावार्थी अथवा टवाळू । साई समत्वें दोघांसी कृपाळू । एकास टाळूं दुजिया कवटाळूं । नेणे ही कनवाळू माउली ॥१२७॥</p>
<p>
	तंव ते दोघे जेव्हां निघती । पंधरा रुपये काकांप्रती । बाबा दक्षिणा मागूनि घेती । सवेंच वदती काकांस ॥१२८॥</p>
<p>
	“दक्षिणेलागीं ज्यानें मजला । असेल एक रुपया दिधला । दशगुणें मज तया मोबदला । द्यावा लागला मोजून ॥१२९॥</p>
<p>
	मी काय कोणाचें घेईंना फुकट । मागें न मी सर्वां सरसकट । फकीर जयासी दावी बोट । तयासींच गोष्ट दक्षिणेची ॥१३०॥</p>
<p>
	तोही फकीर जयाचा ऋणी । तयासींच ही करी मागणी । दाता घेऊनि करी पेरणी । पुढें संवगणी करावया ॥१३१॥</p>
<p>
	वित्त हें केवळ धर्मद्वारा । वित्तवंता पडेल पाहें उपकारा । धर्मैकफळ हें येणेंच खरा । ज्ञानासी थारा लाधतो ॥१३२॥</p>
<p>
	दु:खसंपाद्य हें वित्त । केवळ आहे इष्टोपभोगार्थ । व्यर्थ निष्कारण वेंचितात । धर्मसंचित अवगणुनी ॥१३३॥</p>
<p>
	करूनियां कवडी । अर्बुदान्त धन जें जोडी । तें विषयस्वार्थाचिया आवडी । कदा न दवडी तो सुखी” ॥१३४॥</p>
<p>
	‘नादत्तमुपतिष्ठति’ । सकळांस ठावी कीं ही श्रुति । पूर्वदत्त ठाके पुढती । तदर्थ मागती दक्षिणा ॥१३५॥</p>
<p>
	रामावतारीं रघुनंदनें । अपार स्वर्णस्त्रियांचीं दानें । करितां षोडश सहस्र प्रमाणें । घेतलें कृष्णें तत्फल ॥१३६॥</p>
<p>
	भक्तिज्ञानवैराग्यहीन । ऐसा जो भक्त तो अति दीन । तयास प्रथम वैराग्यीं स्थापून । भक्तिज्ञान मग देती ॥१३७॥</p>
<p>
	करविती जें दक्षिणाप्रदान । तीच वैराग्याची खूण । पुढें भक्तिपंथास लावून । ज्ञानप्रवीण करवीत ॥१३८॥</p>
<p>
	“आम्ही तरी काय करितों । एकपट घेतों दसपट देतों । क्रमें क्रमें ज्ञानपथा लावितों” । लोभ उठतो धरमसीतें ॥१३९॥</p>
<p>
	आपण होऊनि रुपये पंधरा । ठेविते झाले बाबांचे कारा । विसरले पूर्वकृत निर्धारा । प्रकार साराच अपूर्व ॥१४०॥</p>
<p>
	वाटलें आधीं वृथा जल्पलों । बरें केलें समक्ष आलों । साधू कैसे असतात बोधलों । तयांचे लोधलों अनुभवीं ॥१४१॥</p>
<p>
	असो द्दढ न विचारितां मनीं । आम्ही येणार नव्हतों नमनीं । तेही आलों आपण होउनी । साधूंची करणी अगम्य ॥१४२॥</p>
<p>
	“अल्ला मालिक”  मुखीं निरंतर । तयास काय आहे दुष्कर । आम्ही पहावया होतों आतुर । केवळ चमत्कार साधूंचे ॥१४३॥</p>
<p>
	वृथा झाला आमुचा पण । घातलें मानवा लोटांगण । न मागतांही दक्षिणाप्रदान । केलें आपण होऊन ॥१४४॥</p>
<p>
	वृथा आमुची सारी बडाई । आपण होऊनि आपुली डोई । पूज्यभावें साईपायीं । वाहिली, नवाई काय दुजी ॥१४५॥</p>
<p>
	काय वानूं ही साईची कुसरी  । हें सर्व जरी तो स्वयेंच करी । बाह्यात्कारी अलिप्तता धरी । नवलपरी ती काय दुजी ॥१४६॥</p>
<p>
	कोणी करा वा न करा वंदन । द्या अथवा न द्या दक्षिणादान । आनंदकंद साई दयाघन । करीन अवगणन कोणाचें ॥१४७॥</p>
<p>
	पूजियाचा नाहीं आनंद । अवमानिल्याचा नाहीं खेद । हर्ष न येथें कैंचा विषाद । पूर्ण निर्द्वंद्व ते हे स्थिति ॥१४८॥</p>
<p>
	असो कोणाचा कांहींही हेत । एकदां जयासी दर्शन देत । तयाची भक्ति पायीं जडवीत । शक्ति ही अद्भुत साईंची ॥१४९॥</p>
<p>
	असो पुढें उदीप्रसाद । पावूनि घेऊनि आशीर्वाद । परतले ते निर्विवाद । ख्याती ही अगाध साईंची ॥१५०॥</p>
<p>
	करावया तेथूनि निर्गमन । लागे बाबांचें आज्ञापन । करितां आज्ञेचें उल्लंघन । निमंत्रण तें विन्घांसी ॥१५१॥</p>
<p>
	आपमतीं करितां निष्क्रमण । अनुताप आणि विटंबन । मार्गांत व्यत्यय येती दारुण । तयांचें निवारण दुष्कर ॥१५२॥</p>
<p>
	ऐसी वर्णिली तेथील निर्गती । आमुचीही तेच स्थिती । “मी न आणितां कोणी न येती” । ऐसी वदंती बाबांची ॥१५३॥</p>
<p>
	“माझी इच्छा झालियावीण । दारवंठा त्यागील कवण । कोणा स्वेच्छें होईल दर्शन । घडेल आगमन शिर्डीचें” ॥१५४॥</p>
<p>
	साईसमर्थ कृपामूर्ति । तयां आधीन आमुची गती । कृपा उद्भवेल तयांचे चित्तीं । तेव्हांच येतील दर्शना ॥१५५॥</p>
<p>
	ऐसें तेथील गमनागमन । नसतां साईंचें चित्त प्रसन्न । होई न कोणासही  आज्ञापन । उदीप्रदानसमवेत ॥१५६॥</p>
<p>
	करूनियां अभिवंदन । मागूं जातां आज्ञापन । उदीसमवेत आशीर्वचन । तेंच आज्ञापन निघावया ॥१५७॥</p>
<p>
	आतां एक विभूतीचा अनुभव । श्रोतयालागीं कथितों अभिनव । मग नेवासकर भक्तिप्रभाव । महानुभाव साईकृपा ॥१५८॥</p>
<p>
	वांद्रें शहरचा एक गृहस्थ । तोही जातीचा प्रभु कायस्थ । रात्रीं निद्रा येऊं नये स्वस्थ । जाहली शिकस्ता यत्नांची ॥१५९॥</p>
<p>
	डोळ्यास डोळा लागूनि निद्रित । असतां क्षणैक अकस्मात । स्वप्नीं तयाचा मृत तात । करी जागृत प्रतिदिनीं ॥१६०॥</p>
<p>
	पूर्वील युक्तायुक्त प्रकार । गुप्त गर्ह्य क्लिष्ट विचार । शिव्याशापपूर्वक उच्चार । वाक्‌प्रहार प्रेरी तो ॥१६१॥</p>
<p>
	प्रतिदिनीं ऐसा प्रसंग । प्रतिदिनीं होय निद्राभंग । पडेना कांहीं उमंग । चुकेना भोग पाठीचा ॥१६२॥</p>
<p>
	तेणें तो गृहस्थ कंटाळला । उपाय कांहीं न सुचे तयाला । पुसे एका साईभक्ताला । करावा इलाज काय तरी ॥१६३॥</p>
<p>
	आम्ही  न जाणूं अन्य उपाव । साईमहाराज महानुभाव । ठेवाल जरी तुम्हीही भाव । उदी निजप्रभाव प्रकटील ॥१६४॥</p>
<p>
	जैसें जैसें तया कथिलें । तैसें तैसें तयानें केलें । अनुभवाही तैसेंच आलें । दु:स्वप्न पडलें नाहीं पुन: ॥१६५॥</p>
<p>
	कर्म - धर्म - वशें ते मित्र । होते साईसमर्थछात्र । वानूनि उदीचा महिमा विचित्र । अर्पीत लवमात्र तयांस ॥१६६॥</p>
<p>
	म्हणती जातां निजावयास । लावा थोडी मस्तकास । पुडी बांधूनि ठेवा उशास । मनीं श्रीसाईंस आठवा ॥१६७॥</p>
<p>
	पोटीं ठेवा भक्तिभाव । पहा मग या उदीचा प्रभाव । तात्काळ करील पीडेचा अभाव । सहज स्वभाव हा तिचा ॥१६८॥</p>
<p>
	ऐसें होतांच लागली त्याला । गाढ निद्रा त्या रात्रीला । दुष्ट स्वप्नाचा ठावचि पुसिला । अति आनंदला गृहस्थ ॥१६९॥</p>
<p>
	मग त्या त्याच्या आनंदास । काय पाहिजे पुसावयास । पुडी ती नित्य रक्षी उशास । स्मरे साईंस नित्यश: ॥१७०॥</p>
<p>
	घेऊं लागला छबीचें दर्शन । गुरुवारीं माळासमर्पण । करी नित्य मानसिक पूजन । पीडा निवारण जाहली ॥१७२॥</p>
<p>
	ऐसी चालविली नेमनिष्ठा । पावला तो स्थाई अभीष्टा । निद्राभंगादि दु:स्वप्नानिष्टा । विसरला कष्टा पूर्वील ॥१७३॥</p>
<p>
	हा तों उदीचा एक उपयोग । कथितों आणीक अद्भुत योग । कैशाही संकटीं करितां प्रयोग । अभीष्ट भोग देई ती ॥१७४॥</p>
<p>
	होता एक भक्त थोर । बाळाजी पाटील नेवासकर । बाबांलागीं झिजविलें शरीर । सेवा लोकोत्तर करूनि ॥१७५॥</p>
<p>
	गांवांत नित्य जाण्यायेण्याचे । तैसेच लेंडीची फेरी फिरण्याचे । हे बाबांचे रस्ते झाडण्याचें । नेवासकरांचें नित्य काम ॥१७६॥</p>
<p>
	याच सेवेची परिपाटी । चालू राहिली तयांचे पाठीं । राधाकृष्णाबाईची हातोटी । अलौकिक मोठी ये कामीं ॥१७७॥</p>
<p>
	वर्ण ब्राम्हाण अखिल वंद्य । आणि ही सेवा ऐशी निंद्य । शिवलें न केव्हांही हें विचारमांद्य । तियेच्या अनवद्य अंतरा ॥१७८॥</p>
<p>
	उठोनियां सकाळचे प्रहरीं । झाडू घेऊनियां निजकरीं । स्वयें ही बाबांचे रस्ते वारी । धन्य चाकरी तियेची ॥१७९॥</p>
<p>
	काम निर्मळ आणि सत्वर । कोण अन्य पावेल ती सर  । पुढें मग जातां कांहीं अवसर । अबदुल सरकला पुढारा ॥१८०॥</p>
<p>
	असा तो पाटील महाभाग । संसारीं वर्तूनि संसार - विराग । केवढा तयाचा स्वार्थत्याग । परिसा तो भाग कथेचा ॥१८१॥</p>
<p>
	होतां शेताची संवगणी । धान्य समस्त मशिदीं आणी । रिचवूनि ढिगार तेथेंच अंगणीं । समर्पी चरणीं बाबांच्या ॥१८२॥</p>
<p>
	मानूनि बाबा सर्वस्व धनी । ते जें देतील त्यांतून उचलुनी । तितुकेंच धान्य घरीं नेउनी । गुजरा करूनि राही तो ॥१८३॥</p>
<p>
	महाराजांनीं स्नान करूनी । हात पाय व तोंड धुवूनी । आलेलें मोरीचें सांडपाणी । बाळा पिऊनि रहातसे ॥१८४॥</p>
<p>
	हे नेवासकर असेपर्यंत । चालला हा नेम अव्याहत । अजूनि तयांचा प्रेमळ सुत । चालवी हें व्रत अंशत: ॥१८५॥</p>
<p>
	तोही धान्य पाठवीत सतत । त्यांतील जोंधळ्याची भाकर नित । महाराज निजनिर्वाणान्त । खात असत चार वेळां ॥१८६॥</p>
<p>
	असो एकदां काय घडलें । वर्षश्राद्ध बाळाचें आलें । अन्न शिजवूनि तयार झालें । वाढूं लागले वाढपी ॥१८७॥</p>
<p>
	येणार्‍यांचा अंदाज धरूनी । पाकसिद्धि होती सदनीं । वाढतेवेळीं अंदाजाहुनी । संख्या त्रिगुणित जाहली ॥१८८॥</p>
<p>
	नेवासकरीण मनीं घाबरली । सासूबाईंशीं कुजबुजूं लागली । फजीतीची पाळी आली । कैसी निवारिली जाईल ॥१८९॥</p>
<p>
	सासूबाईंची निष्ठा थोर । आपुले साईसमर्थ खंबीर । असतां किमर्थ करावा घोर । राहीं तूं निर्घोर म्हणे ती ॥१९०॥</p>
<p>
	ऐसें सासूनें आश्वासुनी । उदी एक मूठभर घेऊनी । घातली अन्नाच्या प्रत्येक बासनीं । बासनें वस्त्रांनीं आच्छादिलीं ॥१९१॥</p>
<p>
	म्हणे तूं जा खुशाल वाढ । वाढण्यापुरताच कपडा काढ । पुनश्च पूर्ववत् कपडा ओढ । खूण ही द्दढ सांभाळीं ॥१९२॥</p>
<p>
	हें साईंच्या घरचें अन्न । आपुला नाहीं एकही कण । तोच करील लज्जा रक्षण । त्याचें उणेंपण तयाला ॥१९३॥</p>
<p>
	असो जैसा त्या सासूचा निश्चय । तैसाच तिजला आला प्रत्यय । कांहींएक न येतां व्यत्यय । जेवले पाहुणेपय सुद्धां ॥१९४॥</p>
<p>
	आलेगेले सर्व जेवले । यथासाङ्ग सर्व झालें । तरीही अन्न शिल्लक राहिलें । पात्रीं भरलेलें पूर्ववत ॥१९५॥</p>
<p>
	उदीचा हा ऐसा प्रभाव । संतांचा हा सहज सवभाव । जया मनीं जैसा भाव । तया अनुभवही तैसाच ॥१९६॥</p>
<p>
	असो उदीचा महिमा गातां । नेवासकरांची आणिक कथा । पाहोनि त्यांची भक्तिमत्ता । आठवली चित्त ती ऐका ॥१९७॥</p>
<p>
	होईल काय विषयांतर । एक्दां शंकूं लागलें अंतर । होईल तें होवो परी ती सादर । प्रसंगानुसार करावी ॥१९८॥</p>
<p>
	ऐसा निश्चय विषयांतर । एकदां शंकूं लागलें अम्तर । होईल तें होवो परी ती सादर । प्रसंगानुसार करावी ॥१९८॥</p>
<p>
	ऐसा निश्चय करूनि मनीं । कथा कथितों इये स्थानीं । जरी वाटली ती अस्थानीं । क्षमा श्रोत्यांनीं करावी ॥१९९॥</p>
<p>
	एकदां शिरडीचा रहिवासी । रघू पाटील नाम जयासी । पाहुणा गेला नेवाशासी । याचेच गृहासी उतरला ॥२००॥</p><p>
	गुरें ढोरें दावणीसी । बांधिलीं असतां एके निशीं । भुजंग एक फूंफूं शब्देंशीं । गोठयांत प्रवेशी अवचित ॥२०१॥</p>
<p>
	पाहोनियां ऐसा प्रसंग । जाहली सर्वांची मति गुंग । करोनियां तो फणा भुजंग । यथासाङ्ग बैसला ॥२०२॥</p>
<p>
	गुरें करूं लागलीं गडबड । सुटावयालागीं धडपड । नेवासकारांचा ग्रह सुद्दढ  । साईच प्रकट जाहले ॥२०३॥</p>
<p>
	आतां गुरें सोडिल्याशिवाय । येथें नाहीं अन्य उपाय । नाहींतरी पडून पाय । होईल अपाय एकादा ॥२०४॥</p>
<p>
	दुरोनि देखिला भुजंग । हर्षित नेवासकरांतरंग । जाहला पुलकित सर्वांग । केला साष्टांग प्रणिपात ॥२०५॥</p>
<p>
	म्हणे साईंची कृपाद्दष्टि । भुजंगरूपें आले भेटी । आणिली दुग्ध भरोनि वाटी । भुजंगासाठीं तयानें ॥२०६॥</p>
<p>
	काय त्या बाळाजीची वृत्ति । चित्ता न ज्याच्या अनुमात्र भीति । पहा काय वेद भुजंगाप्रती । सावध श्रोतीं परिसिजे ॥२०७॥</p>
<p>
	कां हो बाबा फों फों करितां । काय आम्हां भिववूं पहातां । घ्या ही दुधाची वाटी आतां । स्वस्थचित्ता सेवा हो ॥२०८॥</p>
<p>
	वाटीनें त्यास काय होय । तपेलें भरूनि आणिलें पय । पुढें ठेविलें अंतरीं निर्भय । भावनेचें भय सारें ॥२०९॥</p>
<p>
	दूध ठेवूनि तयाचे जवळी । जाऊनि बैसला पूर्वस्थळीं । नाहीं दूर नाहीं जवळी । मुखीं नवाळी भुजंगाची ॥२१०॥</p>
<p>
	भीतिप्रद भुजंगागमन । सर्वांचें काय सारखें मन । गेले सर्व गांगरून । कैसें हें विन्घ निरसेल ॥२११॥</p>
<p>
	बाहेर जावें तरी भीति । भुजंग गेलिया अंतर्गृहाप्रती । कठीण तेथून बहिर्नि:सृती । बैसले पाळती ठेवूनि ॥२१२॥</p>
<p>
	इकडे भुजंग तृप्त झाला । चुकवूनियां सर्वांचा डोला । नकळे गेला कवण्या स्थळा । आश्चर्य सकलां वाटलें ॥२१३॥</p>
<p>
	मग तो सर्व गोठा शोधिला । परी न यत्किंचित थांग लागला । बहुतेकांचा जीव स्थिरावला । मनीं चुकचुकला नेवासकर ॥२१४॥</p>
<p>
	आरंभीं गोठयां जेव्हां प्रवेशला । तेव्हां जैसा द्दष्टीस पडला । तैसाव जातांना असता दिसला । हीच तयाला चुकचुक ॥२१५॥</p>
<p>
	बाळास होत्या स्त्रिया दोन । पुत्रसंतती होती लहान । कधीं कधींनेवाशहून । येती दर्शन घ्यावया ॥२१६॥</p>
<p>
	बाबा तयां दोघींप्रत । चोळ्या लुगडीं विकत घेत । आशीर्वाद तयां अर्पीत । ऐसा तो भक्त बाळाजी ॥२१७॥</p>
<p>
	हा सच्चरित मार्ग धोपट । जेथें याचा पाठ । तेथेंच द्वारकामाईचा मठ । साईही प्रकट निश्चयें ॥२१८॥</p>
<p>
	तेथेंच गोदावरीचें तट । तेथेंच शिरडी क्षेत्र निकट । तेथेंच साई धुनीसकट । स्मरतां संकट निवारी ॥२१९॥</p>
<p>
	जेथें साईचरित्रपठण । तेथें सदैव साईनिवसन । श्रद्धापूर्वक चरित्रावर्तन । करितां तो प्रसन्न सर्वभावें ॥२२०॥</p>
<p>
	स्मरतां  साई स्वानंदघन । जपतां तन्नाम अनुदिन । नलगे इतर जपतप - साधन । धारणाध्यान खटपट ॥२२१॥</p>
<p>
	साईचरणीं ठेवूनि प्रीती । जे जे या साईंची विभूती । नित्यनेमें सेविती लाविती । ते ते पावती मनेप्सित ॥२२२॥</p>
<p>
	धर्माद चारी पुरुषार्थ । पावोनि होती ते कृतार्थ । प्रकट होतील सकल गुह्यार्थ । स्वार्थपरमार्थसमवेत ॥२२३॥</p>
<p>
	महापापादि पापें प्रबळ । तैसींच उपपातकेंही सकळ । उदीसंपर्कें होती निर्मूळ । लाधे निर्मळता सबाह्य ॥२२४॥</p>
<p>
	ऐसें हें विभूतिधारण । भक्तांसी ठावें हें महिमान । श्रोत्यांचेंही व्हावें कल्याण । म्हणून हें वर्णन वाढविलें ॥२२५॥</p>
<p>
	वाढविलें ही भाषा असार्थ । नेणें मीही महिमा यथार्थ । तरीही श्रोत्यांचिया हितार्थ । संकलितार्थचि निरूपिला ॥२२६॥</p>
<p>
	म्हणूनि श्रोतयांस हीच प्रार्थना । करूनि साईंप्रति वंदना । आपणचि आपुला अनुभव घ्याना । इतुकेंचि माना मद्वच ॥२२७॥</p>
<p>
	येथें नाहीं तर्काचें काम । पूज्यभाव व्हावा प्रकाम । नलगे बुद्धिचापल्योपक्रम । पाहिजे परम श्रद्धाळू ॥२२८॥</p>
<p>
	श्रद्धाविहीन केवळ तार्किक । वादोन्मुख आणि चिकित्सक । तया नं संतज्ञान सम्यक । शुद्ध भाविक तें पावे ॥२२९॥</p>
<p>
	कथांतर्गत न्यूनातिरिक्त । सर्व मानूनि साईप्रेरित । होऊनि दोषद्दष्टीविरहित । साईसच्चरित वाचावें ॥२३०॥</p>
<p>
	साई परम कनवाळू प्रीतीं । रसिक वाचकवृंद चित्तीं । येणें मिषें स्थापो निजमूर्ति । नित्य स्मृति व्हावया ॥२३१॥</p>
<p>
	कोठें गोमांतक कोठें शिरडी । तेथील चोरीची कथा उघडी । साई साद्यंत कथी सुख - परवडी । कथा चोखदी पुढारा ॥२३२॥</p>
<p>
	म्हणूनि हेमाड साईचरणीं । ठेवी मस्तक अंत:करणीं । विनवी श्रोतयां अति नम्रपणीं । सादर श्रवणीं व्हावया ॥२३३॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । चिकित्साखंडन - विभूतिमंडनं नाम पंचत्रिंशत्तमोऽध्या: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-36-122042600064_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ३६</a></strong></p>
</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 15:27:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 15:44:51 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ३४]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-34-122042600060_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
पूर्वील अध्यायीं उदीमहिमान । केलें यथातथ्य कथन । प्रकृताध्यायींही तेंच निरूपण । विवरूं गुणलक्षण पुढारा ॥१॥]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 34" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650967025-7447.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra adhyay 34" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	पूर्वील अध्यायीं उदीमहिमान । केलें यथातथ्य कथन । प्रकृताध्यायींही तेंच निरूपण । विवरूं गुणलक्षण पुढारा ॥१॥</p>
<p>
	तीच मागील कथेची संगती । तेंच उदीचें वैभव संप्रती श्रोतीं परिसिजे स्वस्थचित्तीं । सुखसंवित्तीप्रीत्यर्थ ॥२॥</p>
<p>
	रोग दुर्धर हाडयाव्रण । कोण्याही उपायीं होईना शमन । साईहस्तींच्या उदीचें चर्चन । करी निर्मूलन व्यथेचें ॥३॥</p>
<p>
	ऐशा या उदीच्या कथा अनेक । दिग्दर्शनार्थ कथितों एक । श्रवण करितां वाटेल कौतुक । अनुभवपूर्वक म्हणोन ॥४॥</p>
<p>
	जिल्हा नाशीक मालेगांवीं । डॉक्टर एक पदवीधर पाहीं । होती तयांचे पुतण्यास कांहीं । व्यथा जी राही न औषधें ॥५॥</p>
<p>
	स्वयें वैद्य,  स्नेही वैद्य । केले उपचार नानाविध । कुशल शस्त्रक्रियाप्रबुद्ध । थकले निर्बुद्ध जाहले ॥६॥</p>
<p>
	रोग तो होता हाडयाव्रण । रूढ अपभ्रंश हाडयावर्ण । व्याधी महादुर्धर विलक्षण । येईना गुण औषधें ॥७॥</p>
<p>
	सर्वोपचार देशी विदेशी । झालें, फिटली सर्व असोशी । करोनि पाहिलें शस्त्रक्रियेशीं । कांहींही यशस्वी होईना ॥८॥</p>
<p>
	पुतण्या तों वयानें लहान । वेदन त्या न होती सहन । कष्टें कासावीस प्राण । उद्विग्नमन आप्तेष्ट ॥९॥</p>
<p>
	जाहली उपाय - परमावधी । यत्किंचितही शमेना व्याधी । तया आप्तेष्ट - संबंधी । म्हणती आराधा दैवतें ॥१०॥</p>
<p>
	देवदैवतें कुलस्वामी । यांतून कोणीही येईआ कामीं । कानीं आलें शिरडी ग्रामीं । अवलिया नामी वसे हें ॥११॥</p>
<p>
	ते शिरडीचे संतप्रवर । साईमहाराज योगीश्वर । केवळ दर्शनें व्याधिपरिहार । करिती साचार परिसिलें ॥१२॥</p>
<p>
	हेत उपजला साईदर्शनीं । निश्चित केलें मातापितयांनीं । पाहूं हा तरी उपाय करूनी । नांव घेउनी देवाचें ॥१३॥</p>
<p>
	म्हणती तो महान अवलिया । तेणें निजहस्तें उदी लाविलिया । दुर्धर रोग जाती विलया । अनुभव घ्यावया काय वेंचे ॥१४॥</p>
<p>
	चला वंदूं तयाचे पाय । करून पाहूं शेवटचा उपाय । तेणें तरी टळो हा अपाय । तरणोपाय हा एक ॥१५॥</p>
<p>
	असो पुढें ते मातापितर । करूनियां आवराआवर । होऊनि साईदर्शना आतुर । शिरडीस सत्वर पातले ॥१६॥</p>
<p>
	येतांच बाबांचें दर्शन घेतलें । चरण वंदूनि लोटांगणीं आले । दु:ख बाळाचें निवेदन केलें । उभे ठेले सन्मुख ॥१७॥</p>
<p>
	विकळवाणी जोडूनि पाणी । विनटोनि श्रीसाईचरणीं । मुख करोनि केविलवाणी । करिती विनवणी साईंशीं ॥१८॥</p>
<p>
	व्यथापीडित हें बाळ म्हणती । दु:खन देखवे आम्हांप्रती । सुचे न काय करावें पुढती । दिसेना धडगती आम्हांतें ॥१९॥</p>
<p>
	पुत्रदु:खाच्या अवकळा पाहतां । थोर शिणलों साईसमर्था । तरी अभयकर याचिये माथा । ठेवूनि व्यथा निवारावी ॥२०॥</p>
<p>
	परिसोन आपुलें महिमान । केलें आम्हीं येथवर आगमन । अनन्यभावें आलों शरण । एवढें जीवदान द्या आम्हां ॥२१॥</p>
<p>
	तंव तो साई करुणामूर्ति । आश्वासिता होय तयांप्रती । मशिदीच्या आश्रया जे येती । तयां न दुर्गती कल्पांतीं ॥२२॥</p>
<p>
	आतां तुम्ही निश्चिंत असा । उदी घ्या त्या व्रणावर फांसा । येईल गुणा आठांचौंदिवसां । ठेवा भरवसा देवावरी ॥२३॥</p>
<p>
	मशीद नव्हे ही द्वारावती । येथें जयांचे पाय लागती । तात्काळ क्षेम आरोग्य पावती । येईल प्रतीति तुम्हांही ॥२४॥</p>
<p>
	येथें येतां आराम न पडे । हें तों कालत्रयींही न घडे । जो या मशिदीची पायरी चढे । तयाचे बेडे पार जाणा ॥२५॥</p>
<p>
	पुढें बाबांचे आज्ञेकरून । व्यथितास सन्मुख बैसवून । पायावर बाबांनीं हात फिरवून । कृपावलोकन तैं केलें ॥२६॥</p>
<p>
	व्यथा ही तों केवळ दैहिक । असेना कां ती दैविक । अथवा दुर्धर मानसिक । समूलहारक दर्शन ॥२७॥</p>
<p>
	पाहोनि श्रीसाईंचें मुख । ठायींच विरालें सकळ दु:ख । सेवन करितांचि वचनपीयूख । परम सुख रोगिया ॥२८॥</p>
<p>
	असो पुढें ते तैसेच तेथ । राहिले चार दिवसपर्यंत । गेला व्याधीस आराम पडत । विश्वासही जडत साईपदीं ॥२९॥</p>
<p>
	तदनंतर तीं तिघेंजणें । बाबांचिया पूर्ण अनुमोदनें । परतलीं आनंदनिर्भर मनें । संतुष्टपणें गांवासी ॥३०॥</p>
<p>
	हा काय लहान चमत्कार । हाडयाव्रणास पडला उतार । उदी आणि कृपेची नजर । हाच कीं उपचार अपूर्व ॥३१॥</p>
<p>
	ऐसें हेंमहापुरुषदर्शन । भाग्यें लाधतां आश्वासन । कल्याणकारक आशीर्वचन । तेणेंच निर्मूलन व्याधींचें ॥३२॥</p>
<p>
	असो कांहीं दिवस जातां । उदी व्रणावर लावितां सेवितां । घाय भरला सुकतां सुकतां । लाधला आरोग्यता तो मुलगा ॥३३॥</p>
<p>
	ऐकून मालेगांवीं हें चुलता । साईदर्शनीं उपजली उत्सुकता । मनीं म्हणे मुंबईला परततां । पुरवूं आतुरता एवढी ॥३४॥</p>
<p>
	पुढें मुंबईलागीं जैं निघती । मालेगांवीं - मनमाडावरती । घातला कोणीं विकल्प चित्तीं । निश्चय त्यागिती शिरडीचा ॥३५॥</p>
<p>
	सत्कार्याची ऐसीच रीती । आरंभीं कुत्सित जन मोडा घालिती । लोकप्रवादा बळी न पडती । अंतीं सद्नती तयांसचि ॥३६॥</p>
<p>
	मग ते संतदर्शन डावलुनी । गेले थेट मुंबईलागुनी । उरली रजा अलीबागेस राहूनी । भोगावी मनी हा संकेत ॥३७॥</p>
<p>
	ऐसा निश्चय जाहल्यावरी । तीन रात्रीं हारोहारी । ऐकिला ध्वनी निद्रेमाझारीं । ‘अजून मजवरी अविश्वास ना’ ॥३८॥</p>
<p>
	लागोपाठ ही अशरीर - वाणी । ऐकूणि डॉक्टर विस्मित मनीं । निश्चय केला शिरडी - प्रयाणीं । अन्वर्थ ध्वनी वाटला ॥३९॥</p>
<p>
	परी एकासी दूषित ज्वर । डॉक्टरांचेच तया उपचार । तयास आराम पडलियावर । निघणें सत्वर ठरविलें ॥४०॥</p>
<p>
	परी तो ज्वर मोठा प्रखर । गुणा न येती कांहीं उपचार । पडे न लवमात्रही उतार । घडे न सत्वर निर्गमन ॥४१॥</p>
<p>
	मग ते मनीं करिती निर्वाण । जरी आज यास येईल गुण । तरी मी उद्यांचन दवडितां क्षण । शिरडीस प्रयाण करीन ॥४२॥</p>
<p>
	ऐसा करितां द्दढ संकेत । प्रहरां दो प्रहरां ज्वरही उतरत । जाहला सफल तयांचा हेत । निघाले शिरडीप्रत डॉक्टर ॥४३॥</p>
<p>
	यथासंकल्प शिरडीस गेले । मनोभावें चरण वंदिले । बाबांहीं अंतरींचे अनुभव पटविले । लक्ष जडविलें निजसेवे ॥४४॥</p>
<p>
	मस्तकीं हस्त साशीर्वाद । ठेविला दिधला उदीप्रसाद । पाहूनि साईंचा महिमा अगाध । विस्मयाविद्ध जाहले ॥४५॥</p>
<p>
	राहिले तेथें चार दिवस । परतले डॉक्टर आनंदमानस । पुरे न होतां पंधरा दिवस । गेले विजापुरास बढतीवर ॥४६॥</p>
<p>
	हाडयाव्रणाचिया ओढी । आली साईदर्शन - परवडी । जडली संतचरणीं गोडी । जोडिली जोडी अक्षयी ॥४७॥</p>
<p>
	असेच एकदां डॉक्टर पिल्ले । नारू - व्यथेनें व्याकुळ झाले । एकावर एक सात झाले । बहुत कष्टले जीवाला ॥४८॥</p>
<p>
	साईबाबांचें भारी प्रेम । ‘भाऊ’ आवडतें टोपणनाम । भाऊचें नित्य कुशल क्षेम । पुसावें परम आवडीनें ॥४९॥</p>
<p>
	मशिदीमाजी सांजसकाळ । कठडयासन्निध भाऊचें स्थळ । भाऊपाशीं बहुत काळ । गोष्टींचा सुकाळ परस्परां ॥५०॥</p>
<p>
	भाऊ पाहिजे चिलीम ओढितां । भाऊ पाहिजे विडी फुंकितां । भाऊ पाहिजे न्याय निवडितां । जवळ नसतां करमेना ॥५१॥</p>
<p>
	असो ऐसी तयांची कथा । दु:सह होऊनि नारूची व्यथा । भाऊंनीं अंथरूण धरिलें विकलता । दु:खोद्वेगता दुर्धर ॥५२॥</p>
<p>
	ऐसा तो प्रसंग दारुण । मुखीं ‘साई’ नामस्मरण । पुरे यातना बरें तें मरण । पातले शरण साईंतें ॥५३॥</p>
<p>
	पाठविती बाबांस सांगून । कंटाळलों हें दु:ख भोगून । काय हे किती आंगाला व्रण । नाहीं मज त्राण सोसावया ॥५४॥</p>
<p>
	शुद्धाचरणें वर्ततों । कां मजला हे दु:खावस्था । दुष्कर्माच्या वाटे न जातां । कां मम माथां पाप हें ॥५५॥</p>
<p>
	मरणप्राय नारूच्या वेदना । बाबा न आतां सोसवती आपणां । याहून आतां येऊं द्या मरणा । भोगीन यातना पुढारा ॥५६॥</p>
<p>
	भोगिल्यावीण नाहीं गती । आणिक जन्म घेऊं लागती । परी प्रारब्धभोग कधींही न चुकती । मीही मंदमती हें जाणें ॥५७॥</p>
<p>
	सुखें घेईन दहा जन्म । तेथें हें भोगीन माझें कर्म । कराया प्रकृत जन्माचा उपरम । एवढा हा धर्म मज वाढा ॥५८॥</p>
<p>
	पुरे आतां या जन्माचें जिणें । सोडवा मज जीवेंप्राणें । नको आतां हें कष्ट सोसणें । हेंच मागणें मागतों ॥५९॥</p>
<p>
	परिसून प्रार्थना सिद्धरणा । दया उपजली अंत:करणा । डॉक्टर पिल्ल्यांचिया समाधाना । वर्षलें करुणामृत तें सेवा ॥६०॥</p>
<p>
	मग भक्तकामकल्पद्रुम । पाःउनि द:खावस्था ती परम । करावयालागीं तिचा उपशम । काय उपक्रम मांडिला ॥६१॥</p>
<p>
	निरोप आणिला दीक्षितांनीं । बाबांनीं तें वृत्त परिसुनी । म्हणाले सांग तयास जाऊनी । “निर्भय मनीं राहीं तूं” ॥६२॥</p>
<p>
	आणिक तयास पाठविती सांगूं । “किमर्थ दहा जन्मांचा पांगू । अवघ्या दहा दिवसांचा भोगू । भोगूं विभागून परस्पर ॥६३॥</p>
<p>
	मोक्ष स्वार्थ वा परमार्थ । द्यावया मी असतां समर्थ । हाच का तुझा पुरुषार्थ । मरणानर्थ मागसी ॥६४॥</p>
<p>
	आणवा तयास उचलूनी । भोग हा साहूं कीं तो भोगुनी । जावेंन ऐसें गांगरूनि । आणावा मारूनि पाठीवर” ॥६५॥</p>
<p>
	असो डॉक्टर ऐसिये स्थितीं । आणिले तात्काल मशिदीप्रती । पाठीचा तक्या काढुनी हातीं । दिधला तयाप्रती बाबांनीं ॥६६॥</p>
<p>
	ठेविला आपुले सव्यभागीं । फकीर बाबा  बैसत ते जागीं । म्हणाले टेंकून पड ये उगी । चिंता वाउगी करूं नको ॥६७॥</p>
<p>
	करीं स्वस्थ लांब पाय । जेणें तुजला आराम होय । संचित संपेना भोगिल्याशिवाय । खरा उपाय तो हाचि ॥६८॥</p>
<p>
	इष्टानिष्ट सुखदु:ख । संचितानुसार अमृत वा विख । हें प्रवाहपतित द्वंद्व देख । धरीं न हरिख वा शोक ॥६९॥</p>
<p>
	जें जें येईल तें तें साहें । अल्ला मालीक वाली आहे । सदा तयाच्या चिंतनीं राहें । काळजी वाहे तो सारी ॥७०॥</p>
<p>
	चित्त - वित्त - काया - वाणी - । सहित रिघावें तयाचे चरणीं । असतां निरंतर तयाचे स्मरणीं । दिसेल करणी तयाची ॥७१॥</p>
<p>
	तंव ते वदती पिल्ले डॉक्टर । पट्टी बांधिती नारूवर । नानासाहेब चांदोरकर । परी न उतार कांहींच ॥७२॥</p>
<p>
	बाबा म्हणती “नाना पागल । पट्टी सोड तूं मरशील आतां काऊ येऊन टोंचील । मग तूं होशील चांगला” ॥७३॥</p>
<p>
	असो ऐशा वार्ता चालतां । अब्दुल आला तात्काळ वरता । पणत्यांत तेल घालायवयाकरितां । काय अवचिता तैं घडलें ॥७४॥</p>
<p>
	मशीद आधीं ती सांकड । भक्तांची होत बहुत भीड । त्यांतचि पिल्ले यांची गडबड । वावरूं अवघडला अब्दुल ॥७५॥</p>
<p>
	अब्दुला निजकार्यीं दक्ष । पणत्यांकडे तयाचें लक्ष । तेणें पिल्ल्यांकडे जाहलें दुर्लक्ष । प्रकार विलक्षण घडला तैं ॥७६॥</p>
<p>
	अब्दुल्ला तरी करील काय । होणारापुढें नाहीं उपाय । पिल्ल्यांनीं लांबविला होता जो पाय । चुकून पाय पडला वरी ॥७७॥</p>
<p>
	आधींच पाय होता सुजला । तेथेंच अब्दुलचा पाय पडला । मग पिल्ल्यांनीं जो ठणाणा केला । अति कळवळला जीव तैं ॥७८॥</p>
<p>
	मारिली एकदांचि किंकाळी । मस्तकीं जाऊनि भिनलि कळी । विनवीत बाबांस बद्धांजुळी । करुणासमेळीं तें परिसा ॥७९॥</p>
<p>
	नारू फुटून वाहूं लागती । पिल्ले अत्यंत अस्वस्थ चित्तीं । एकीकडे आक्रोश करिति । गाऊं अनुसरती दुसरीकडे ॥८०॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	“ करम कर मेरे हाल परतू करीम । तेरा नाम रहिमान है और रहीम । तूंही दोनों आलमला सुलतान है । जहांमें नुमाया तेरी शान है । फना होनेवाला है सब कारोबारा । रडे नूर तेरा सदा आशकार । तूं आसिकका सदा मदतगार है ।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	राहून राहून उठतसे कळ । जीव कळवळला पडले विकळ । साईबाबांचा हा खेळ । झाली अटकळ सर्वांची ॥८१॥</p>
<p>
	बाबा वदती “पहा भाऊ । लागला बरें आतां गाऊं” । पिल्ले तयांस पुसती तो काऊ । अजून खाऊं येणार का ॥८२॥</p>
<p>
	तेव्हां बाबा वदती “तूं जाईं । स्वस्थ वाडयांत पडून राहीं । आतां काऊ फिरून नाहीं । येणार पाहीं टोंचावरया ॥८३॥</p>
<p>
	तोच नाहीं का येऊन गेला । तोच तो ज्यानें पाय दिधला । तोच तो काऊ टोंचून पळाला । नारू तळाला घातला” ॥८४॥</p>
<p>
	कैंचा काऊ आणि काउळा । होणार वृत्तान्त समक्ष घडविला । काक अब्दुल्लारूपें प्रकटला । केलें बोला अन्वर्थ ॥८५॥</p>
<p>
	बोल नव्हे तो ब्रम्हालेख । कर्मावरीही मारील मेख । अल्पावकाशेंच भाऊस देख । लागलें सुख वाटावया ॥८६॥</p>
<p>
	उदीलेपन उदीसेवन । हेंच औषध हेंच अनुपान । जाहलें समूळ रोगनिरसन । उगवला जों दिन दहावा ॥८७॥</p>
<p>
	निघाले सजीव सप्त जंतु । जखमांमाजील बारीक तंतु । वेदना दुर्धर जाहल्या शांतु । दु:खासी अंतु जाहला ॥८८॥</p>
<p>
	जाणोनि ऐशिया चमत्कारा । पिल्ले साश्चर्य जाहले अंतरा । नेत्र स्रवले प्रेमधारा । पाहोनि उदाराचरित तें ॥८९॥</p>
<p>
	बाबांचिया चरणसंपुटीं । पिल्ले तेथेंच घालिती मिठी । बाष्पावरोध जाहला कंठीं । फुटे न ओष्टीं कीं वाचा ॥९०॥</p>
<p>
	सांगून आणीक एक अनुभव । करूं हा संपूर्ण उदीप्रभाव । जया मनीं जैसा भाव । हाच गौरव ग्रंथाचा ॥९१॥</p>
<p>
	एकदां माधवराव ज्येष्ठा । बापाजी तयांचा बंधु कनिष्ठ । कैसें तयांवरी येतां अरिष्ट । उदीनें अभीष्ट पावले ॥९२॥</p>
<p>
	ऐसा या उदीचा प्रभाव । किती वानावा म्यां नवलाव । ग्रंथिज्वरादि रोग सर्व । औषध अपूर्व नाहीं दुजें ॥९३॥</p>
<p>
	असतां साऊळ विहिरीवर । कुटुंबासी आला ज्वर । ग्रंथी उद्भवल्या जांघेवर । मनीं घाबरला बापाजी ॥९४॥</p>
<p>
	पाहून कुटुंब अति हैराण । तैसाच रात्रीचा समय भयाणा । जाहला बापाजी भ्रांतमन । गळालें अवसान तयाचें ॥९५॥</p>
<p>
	धांव ठोविली रातोरात । सकंप भयभीत शिरडीस येत । जाहला कथिता समस्त वृत्त । निजबंधूप्रत तेधवां ॥९६॥</p>
<p>
	म्हणती आल्या दोन गांठी । ज्वरसंतप्त झालीसे कष्टी । चला पहा कीं आपुल्या दिठीं । दिसे न गोठी मज बरवी ॥९७॥</p>
<p>
	बापाजी बोलतां केविलवाणी । माधवरावजी दचकले मनीं । गेलें पळोनि तोंडचें पाणी । मन ठिकाणीं पडेना ॥९८॥</p>
<p>
	माधवराव मोठे विवेकी । ग्रंथी म्हणतां भरली धडकी । ग्रंथिज्वराची तडकाफडकी । आहेच ठावुकी अवघियां ॥९९॥</p>
<p>
	प्रसंग बरवा वा बिकटा । कार्य असो इष्टानिष्ट । आधीं साईंस पुसावी वाट । परिपाठा हा धोपट शिरडींत ॥१००॥</p>
<p>
	मग ते जैसें जैसें कथिती । आचरावें तैसे स्थितीं । तेच भक्तसंकट निवारिती । वर्णावे किती अनुभव ॥१०१॥</p>
<p>
	असो या नित्यपाठानुसार । माधवरावही करिती विचार । आधीं बाबांस केलें हें सादर । साष्टांग नमस्कारपूर्वक ॥१०२॥</p>
<p>
	म्हणती जय जय साईनाथा । दया करावी आम्हां अनाथां । हें संकट काय ओढवलें आतां । नसती चिंता उद्भवली ॥१०३॥</p>
<p>
	तुजवांचून कवणा आना । आम्ही जाऊं कराया याचना । दूर करीं त्या पोरीच्या यातना । आशीर्वचना देईं गा ॥१०४॥</p>
<p>
	करीं एवढें संकटहरण । आम्हां कैवारी कोण तुजविण । करीं या दुर्धर ज्वराचें शमन । ब्रीदसंरक्षण करीं गा ॥१०५॥</p>
<p>
	पुसती अनुज्ञा जावयास । बाबा वदती तंव तयास । “नको जाऊं अपरात्रीस । उदी दे तियेस पाठवुनी ॥१०६॥</p>
<p>
	कशाच्या ग्रंथी कशाचा ताप । आपुला अल्ला मालिक बाप । बरें होईल आपोआप । होईल सुखरूप निर्घोर ॥१०७॥</p>
<p>
	मात्र तूं सकाळीं सूर्योदयीं । साऊळ विहिरीस जाऊन येईं । आतांच नको जाण्याची घाई । स्वस्थ राहीं तूं येथें ॥१०८॥</p>
<p>
	उदयीकही जाऊन यावें । नलगे निरर्थक कुचंबावें । उदी लावितां सेवितां भावें । किमर्थ भ्यावें आपण” ॥१०९॥</p>
<p>
	परिसतां हें बापाजी भ्याला । तयाचा मोठा हिरमोड झाला । माधवराव जाणती औषधीपाला । परी न समयाला उपयोग ॥११०॥</p>
<p>
	एक साईकृपेविण । औषधींस नाहीं गुण । हें एक वर्म ही एक खूण । माधवराव पूर्ण जाणती ॥१११॥</p>
<p>
	आज्ञा बाबांची वंदून । उदी दिधली पाठवून । राहिले माधवराव स्वस्थमन । परतला उद्विग्न बापाजी ॥११२॥</p>
<p>
	पाण्यांत उदी कालवून । पोटांत पाजिली अंगा लावून । घाम सुटला डवडवून । निद्रा लागून राहिली ॥११३॥</p>
<p>
	सूर्योदय जाहल्यावरी । कुटुंबास वाटली हुषारी । नाहीं ज्वर नागांठी विषारी । बापाजी करी आश्चर्य ॥११४॥</p>
<p>
	इकडे माधवराव जे उठले । शौच मुखमार्जन आटपलें । साऊळ विहिरीस जावया निघाले । दर्शना आले मशीदीं ॥११५॥</p>
<p>
	घेतलें बाबांचें दर्शन । घातलें पायीं लोटांगण । उदीसमवेत आशीर्वचन । मिळतांच तेथून निघाले ॥११६॥</p>
<p>
	मशिदीची पायरी उतरतां । बाबा तयांस ऐकिलें आज्ञापितां । “शामा उठाउठी ये मागुता । विलंब लागतां कामा नये” ॥११७॥</p>
<p>
	असेल कीं भावजयी विव्हाळ । कैसी साहील दों ग्रंथींची जळजळ । पडली असेल करीत तळमळ । वाटेनें  हळहळ दीरास ॥११८॥</p>
<p>
	करिती बाबा कांहीं इषारा । कां ये सत्वर म्हणती माघारा । तेणें शामा होय घाबरा । चाले झरझर मार्गानें ॥११९॥</p>
<p>
	घाई घाई साऊळ विहीर । गांठेपर्यंत नव्हता धीर । पाऊल ठेवितां उंबरठयावर । चमत्कारले अंतरीं ॥१२०॥</p>
<p>
	जियेस गतरात्रीं ग्रंथिज्वर । चहा ठेवितां पाही चुलीवर । माधवराव विस्मितांतर । जाहले स्थित्यंतर पाहुनी ॥१२१॥</p>
<p>
	तंव ते बापाजीस पुसत । ही तों नित्यव्यवसायरत । बापाजी म्हणे ही सर्व करामत । उदीची निश्चित बाबांच्या ॥१२२॥</p>
<p>
	म्हणे मीं येतांच उदी पाजिली । चोळून चोळून सर्वांगा चर्चिली । तात्काळ घर्मांचित तनू झाली । निद्रा लागली स्वस्थपणें ॥१२३॥</p>
<p>
	पुढें जंव सूर्योदय होत । उठूनि बैसली खडखडीत । ग्रंथी विराल्या ज्वरासहित । हें सर्व चरित्र साईंचें ॥१२४॥</p>
<p>
	शामा पाहूनि ऐसी स्थिति । तात्काळ आठवली साईंची उक्ति । “उठाउठीं येईं तूं मागुतीं” । साश्चर्य चित्तीं जाहला ॥१२५॥</p>
<p>
	जाण्या आधींच कार्य संपलें । चहा घेऊन माधवराव परतले । मशिदींत जाऊन पहिले । चरण वंदिले बाबांचे ॥१२६॥</p>
<p>
	म्हणती देवा काय हा खेळ । तूंचि उडविसी मनाची खळबळ । बसल्या जागीं उठविशी वावटळ । मागुती निश्चळ तूंचि करिसी ॥१२७॥</p>
<p>
	बाबा तयास प्रत्युत्तर देती । “पहा कर्माची गहन गहन गती । मी करीं ना करवीं कांहींही निश्चिती । कर्तृत्व मारिती मजमाथां ॥१२८॥</p>
<p>
	कर्में जीं जीं अद्दष्टें घडत । मी तों तेथील साक्षीभूत । कर्ता करविता तो एक अनंत । मी यादगार । बंदा मी लाचार अल्लाचा ॥१३०॥</p>
<p>
	सांडूनियां अहंकार । मानूनि तयाचे आभार । तयावरी जो घालील भार । बेडा तो पार होईल” ॥१३१॥</p>
<p>
	असाच एका इराणीयाचा । अनुभव ऐका महत्त्वाचा । तयाच्या तान्ह्या मुलीची वाचा । बसतसे तासा - तासास ॥१३२॥</p>
<p>
	तासागणिक आंकडी येई । पडे धनुकली होऊनि ठायीं । अत्यवस्थ बेशुद्ध होई । उपाय कांहीं चालेना ॥१३३॥</p>
<p>
	पुढें तयाचा एक मित्र । वर्णी तयास उदीचें चरित्र । म्हणे ऐसें रामबाण विचित्र । औषध अन्यत्र असेना ॥१३४॥</p>
<p>
	जावें अविलंबें पारल्यास । उदी मागावी दीक्षितांस । असे तयांचे संग्रहास । अति उल्हासता देतील ॥१३५॥</p>
<p>
	ती उदी मग रोज थोडी । साईस्मरण श्रद्धाआवडीं । पाजितां ही जाईल आंकडी । सौख्यपरवडी लाधाल ॥१३६॥</p>
<p>
	ऐसें ऐकूनि मग तो पारशी । उदी मागून दीक्षितांपाशीं । मुलीस पाजितां नित्यनेमेंसीं । आरोग्य तिजसी लाधलें ॥१३७॥</p>
<p>
	तासातासां जी होतसे घाबरी । तत्काळ उदीनें जाहली बरी । जाऊं लागले मध्यंतरीं । लहरी - लहरींत सात तास ॥१३८॥</p>
<p>
	तासातासानें येणारी लहर । पडतां सातां तासांचें अंतर । कांहीं काळ क्रमिलियानंतर । परिहार समग्र जाहला ॥१३९॥</p>
<p>
	हर्द्यानजीक एका गांवांत । रहातसे एक वृद्ध गृहस्थ । मूतखडयाच्या व्याधीनें ग्रस्त । जाहला त्रस्त अतिशय ॥१४०॥</p>
<p>
	हा रोग शस्त्रक्रियेवीण । अन्यथा नाहीं याचें निवारण । म्हणूनि शस्त्रक्रियाप्रवीण । पहा तरी कोण जन वदती ॥१४१॥</p>
<p>
	रोगी परम चिंतातुर । कर्तव्यार्थीं न सुचे विचार । मरणोन्मुख कृश शरीर । दु:ख अनिवार सोसेना ॥१४२॥</p>
<p>
	शस्त्रप्रयोगा लागे धैर्य । रोगिया अंतरीं नाहीं स्थैर्य । सुदैवें तयाचें नष्टचर्य । संपलें आश्चर्य तें परिसा ॥१४३॥</p>
<p>
	येरीकडे हा ऐसा प्रकार । तोंच त्या ग्रामींचे इनामदार । साईबाबांचे भक्त थोर । आले गांवावर समजलें ॥१४४॥</p>
<p>
	तयांपाशीं बाबांची विभूती । नित्य राही हें सर्व जाणती । रोगार्ताचे आप्तेष्ट येती । उदी प्रार्थिती तयांतें ॥१४५॥</p>
<p>
	इनामदारांनीं उदी दिधली । मुलानें बापाअस पाण्यांत पाजिली । पांचही मिनिटें नसतील लोटालीं । तोंच कीं वर्तली नवलपरी ॥१४६॥</p>
<p>
	उदीप्रसाद अंगीं जों भिनला । मूतखडा ठायींचा ढळला । मूत्रद्वारें बाहेर निसटला । आराम पडला तात्काळ ॥१४७॥</p>
<p>
	मुंबापुरीचे एक गृहस्थ । होते जातीचे प्रभु कायस्थ । होतां प्रसूतिसमय प्राप्त । स्त्री अत्यवस्थ सर्वद ॥१४८॥</p>
<p>
	मग कितीही उपाय करा । गुण न एकाही उपचारा । बाईचा जीव होतसे घाबरा । ऐसा बिचारा त्रासला ॥१४९॥</p>
<p>
	‘श्रीराममारुती’ नामें विख्यात । होते एक साईंचे भक्त । तयांच्या विचारें हे गृहस्थ । जावया शिरडीप्रत निघाले ॥१५०॥</p>
<p>
	प्रसूतीचा येतां समय । महत् संकटीं पडत उभय । जाहला एकदां मनाचा निश्चय । पावूं निर्भय शिरडींत ॥१५१॥</p>
<p>
	होणार होईना कां निदानीं । होवो तें बाबांचे संनिधानीं । ऐसा संकल्प द्दढ करोनी । शिरडीस येउनी राहिले ॥१५२॥</p>
<p>
	ऐसाही उभयतां कित्येक मास । करितीं जाहलीं शिरडींत वास । पूजा अर्चा साईसहवास । आनंद उभयांस जाहला ॥१५३॥</p>
<p>
	ऐसा क्रमितां कांहीं काळ । प्रसूतिसमय आला जवळ । काळजी उद्भवली प्रबळ । संकट टळणार कैसें हें ॥१५४॥</p>
<p>
	ऐसें म्हणतां म्हणतां म्हणतां आला । प्रसूतीचा दिवस पातला । गर्भद्वाराचा मार्ग अडला । सर्वांस पडला विचार ॥१५५॥</p>
<p>
	बाईस होऊं लागल्या यातना । काय करावें कांहीं सुचेना । मुखें चालली बाबांची प्रार्थना । त्यावीण कवणा करुणा ये ॥१५६॥</p>
<p>
	धांवूनि आल्या शेजारणी । घालूनि बाबांना गार्‍हाणीं । एकीनें प्याल्यांत ओतूनि पाणी । उदी कालवूनि पाजिली ॥१५७॥</p>
<p>
	पांच मिनिटें गेलीं न गेलीं । तोंच बाईची सुटका झाली । गर्भस्थिति निर्जीव दिसली । गर्भींच मुकली चैतन्या ॥१५८॥</p>
<p>
	असो गर्भाची कर्मगति । होईल पुढारा गर्भप्राप्ति । बाई पावली भयनिर्मुक्ति । लाधली संस्थिति सौख्याची ॥१५९॥</p>
<p>
	वेदनाविरहित गर्भ स्रवली । हातीं पायीं सुखें सुटली । महच्चिंतेची वेळ टळली । ऋणी झाली जन्माची ॥१६०॥</p>
<p>
	पुढील अध्याय याहूनि गोड । परिसतां पुरले श्रोत्यांचें कोड । निरसूनि चिकित्सकपणाची खोड । भक्तीची जोड लाधेल ॥१६१॥</p>
<p>
	आम्हां निराकाराची उपासना । आम्ही देणार नाहीं दक्षिणा । आम्ही वांकविणार नाहीं माना । तरीच दर्शना येऊं कीं ॥१६२॥</p>
<p>
	ऐसा जयांचा कृतनिश्चय । तेही पाहतांच साईंचे पाय । दक्षिणेसहित साष्टांग काय । वाहती हा काय चमक्तार ॥१६३॥</p>
<p>
	उदीचाही अपूर्व महिमा । नेवासकरांचा भक्तिप्रेमा । कैसें दुग्ध पाजूनि भुजंगमा । गृहस्थधर्मा संरक्षिलें ॥१६४॥</p>
<p>
	ऐसाइसिया कथा उत्तम । परिसतां उपजेल भक्तप्रेम । संसारदु:खा होईल उपशम । याहूनि परमसुख काय ॥१६५॥</p>
<p>
	म्हणोनि हेमाड करी विनंती । साईचरणीं करोनि प्रणती । प्रेम द्या जी श्रोतयांप्रती । निज सच्चिरितीं रमावया ॥१६६॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । उदीमहिमा नाम चतुस्त्रिंशत्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 15:26:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 15:44:06 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ३३]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-33-122042600056_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
आतां नमूं संतसज्जन । होतां जयांचें कृपावलोकन । तात्काळ पातकपर्वत - दहन । कलिमलक्षालन रोकडें ॥१॥
जयांच्या ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 33" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650966559-1779.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra part 33" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	आतां नमूं संतसज्जन । होतां जयांचें कृपावलोकन । तात्काळ पातकपर्वत - दहन । कलिमलक्षालन रोकडें ॥१॥</p>
<p>
	जयांच्या उपकारांच्या राशी । फिटती न जन्मजन्मांतरासी । सहज बोलणें हितोपदेशी । परम अविनाशी सुखदाई ॥२॥</p>
<p>
	हें आपुलें हें पराचें । नाहीं जयांचे चित्तास ठावें । भेदभावावृत संसृतीचे उठावे । मनीं नुमटावे जयांचे ॥३॥</p>
<p>
	पूर्वील अधययीं जाहलें श्रवण । गुरुगरिमेचें अंशनिरूपण । आतां ये अध्यायीं श्रोतेजन । परिसा कीं महिमान उदीचें ॥४॥</p>
<p>
	मागमागोनि दक्षिणा घेत । दीनां दुभळ्यांस धर्म करीत । उरल्याच्या मोळ्या खरीदीत । ढीग रिचवीत काष्ठांचे ॥५॥</p>
<p>
	तयां शुष्क काष्ठांप्रत । सन्मुख धुनीमाजीं होमीत । तयांची राख होई जी अमित । उदी ती ओपीत भक्तांस ॥६॥</p>
<p>
	शिरडीहूनि गांवीं परततां । बाबांपाशीं रजा मागतां । उदी देण्याचा परिपाठ होता । ठावें हें समस्तां भक्तांस ॥७॥</p>
<p>
	किंबहुना आणा उदी म्हणतां । खरी अनुज्ञा झाली आतां । म्हणोन ज्याचे त्याचे चित्ता । परताया उल्हासता वाटतसे ॥८॥</p>
<p>
	तैसेंच शिरडींत वास्तव्य असतां । माध्यान्हीं आणि सायंप्रात: । बाबा कोणासही उदी न देतां । रिक्तहस्ता पाठवीत ॥९॥</p>
<p>
	हाच प्रत्यहीं होता क्रम । परि त्या उदीचा काय धर्म । मशिदींत धुनी कां अविश्रम । कां हा उपक्रम नित्याचा ॥१०॥</p>
<p>
	विभूतिदानीं मनोगत । बाबा काय सुचवीत । हें द्दश्य सकळ विश्वांतर्गत । राख हें निश्चित मनीं उमजा ॥११॥</p>
<p>
	देहही पंचभूतांचें काष्ठा । भोग भोगावया अवशिष्ट । भोग सरतां पडेल निचेष्ट । होईल विस्पष्ट ही राख ॥१२॥</p>
<p>
	तुमची माझी हीच स्थिति । तियेची तुम्हांस व्हावी स्मृति । अहर्निश मजही जागृती । तदर्थ विभूति देतसें ॥१३॥</p>
<p>
	अखिल विश्व मायाविजृंभित । ब्रम्हा सत्य, ब्रम्हांड अनृत । याची खूण ही उदी सत्य । निश्चितार्थ हा माना ॥१४॥</p>
<p>
	येथें नाहीं, कोणी कुणाचें । दारा, पुत्र, मामे, भाचे । नग्न आलों नग्न जायाचें । उदी ही याचें स्मारक ॥१५॥</p>
<p>
	उदीचें या केलिया चर्चन । आधि - व्याधि होती निरसन । परी या उदीचा तत्त्वार्थ गहन । विवेकपूर्ण वैराग्य ॥१६॥</p>
<p>
	देववेल ती देऊनि दक्षिणा । साधाया प्रवृत्ति वैराग्यलक्षणा । पुढें मग निवृत्ति वैराग्यखुणा । कळतील आपणां हळू हळू ॥१७॥</p>
<p>
	आलें जरी वैराग्य हातीं । विवेक जरी नाहीं संगतीं । तरी तयाची होईल माती । म्हणून विभूती आदरा ॥१८॥</p>
<p>
	विवेक - वैराग्यांची जोड । तीच ही विभूति - दक्षिणेची सांगड । बांधिल्यावीण भवनदीची थड । अति अवघड गांठावया ॥१९॥</p>
<p>
	लहान थोर दर्शना येत । चरणीं बाबांचे होऊनि विनत । जेव्हां जेव्हां माघारां जात । विभूती देत त्यां बाबा ॥२०॥</p>
<p>
	मशिदींत नित्याची धुनी । अक्षयी प्रदीप्त निशिदिनीं । त्यांतील मूठमूठ रक्षा देउनी । बाबा बोळवणी करीत ॥२१॥</p>
<p>
	प्रसाद म्हणून रक्षा देत । निजांगुष्ठें निढळा फांसीत । सवेंचि तो हस्त शिरीं ठेवीत । कल्याण इच्छीत भक्तांचें ॥२२॥</p>
<p>
	रक्षा विभूती आणि उदी । शब्द तीन परी एकार्थवादी । हाचि प्रसाद नित्य निरवधी । बाबा अबाधित वांटीत ॥२३॥</p>
<p>
	संसार आहे उदीसमान । हें एक या उदीचें महिमान । येईल ऐसा एक दिन । मनीं आठवण ही ठेवा ॥२४॥</p>
<p>
	कमल - दल - जलसमान । नश्वर हा देह होईल पतन । म्हणूनि याचा त्यागा अभिमान । उदीप्रदान दावी हें ॥२५॥</p>
<p>
	सकळ विश्वाचा हा पसारा । राखरांगोळीसम निर्धारा । करा जगन्मिथ्यात्वविचारा । सत्यत्वा थारा उदींत ॥२६॥</p>
<p>
	उदी म्हणजे केवळ माती । नामरुपची अंतिम गती । वाचारंभण विकार जगतीं । मृत्तिके प्रतीती सत्यत्वें ॥२७॥</p>
<p>
	स्वयें बाबाही प्रेमांत येतां । ऐकिले आहेत गाणें गातां । त्यांतील चुटका उदीपुरता । परिसिजे श्रोतां सादरता ॥२८॥</p>
<p>
	“रमते राम आयोजी आयोजी । उदियांकी गोनियां लायोजी” ॥ध्रु०॥</p>
<p>
	लागतां मनाची लहर । होऊनियां हर्षनिर्भर । इतुकेंच ध्रुपद वरचेवर । अति सुस्वर म्हणत ते ॥२९॥</p>
<p>
	सारांश,  ही बाबांची धुनी । प्रसवली कितीक उदीच्या गोणी । नाहीं गणाया समर्थ कोणी । परम कल्याणी ही  उदी ॥३०॥</p>
<p>
	परिसोनि उदीदानगुह्यार्थ । तैसाच परमार्थ आणि भावार्थ । पुसती श्रोते शुद्ध स्वार्थ । योगक्षेमार्थ उदीचा ॥३१॥</p>
<p>
	उदीपोटीं हाही गुण । महती कैसी वाढेल यावीण । साई परमार्थमार्गींचा धुरीण । स्वार्थ साधून परमार्थ दे ॥३२॥</p>
<p>
	या उदीच्या योगक्षेमकथा । सांगूं येतील असंख्याता । परी त्या कथितों अति संकलिता । ग्रंथविस्तरता टाळावया ॥३३॥</p>
<p>
	एकदां नारायण मोतीराम । जानी हें जयांचें उपनाम । ब्राम्हाण औदीच्य गृहस्थाश्रम । वसतीचें स्थळ नाशीक ॥३४॥</p>
<p>
	तैसेच बाबांचे आणीक भक्त । नामें रामचंद्र वामन मोडक । हे नारायणराव तयांचें सेवक । भक्त भाविक बाबांचे ॥३५॥</p>
<p>
	सवें घेऊन मातोश्रीतें । बाबा जैं देहधारी होते । नारायणराव जाहले जाते । दर्शनातें बाबांच्या ॥३६॥</p>
<p>
	तेव्हांच आपण होऊन तीतें । बाबांनीं आधींच सुचविलें होतें । आतां न येथून सेवाधर्मातें । राहिला आमुतें संबंध ॥३७॥</p>
<p>
	पुरे ही ताबेदारी आतां । स्वतंत्र धंदा बरवा यापरता । पुढें मग अल्पकाल जातां । दया भगवंता उपजली ॥३८॥</p>
<p>
	सुटली नोकरी पराधीनता । आवडूं लागली स्वतंत्रता । भोजन वसतिगृह - व्यवस्था । स्थापिली स्वसत्ता तेथेंच ॥३९॥</p>
<p>
	नाम ठेविलें ‘आनंदाश्रम’ । त्यांतचि केले परिश्रम । दिवसेंदिवस वाढलें नाम । जाहला आराम चित्ताला ॥४०॥</p>
<p>
	पाहूनि ऐसी वार्ता घडली  । निष्ठा साईपदीं वाढली । ती मग द्दढभक्तिस्वरूपा चढली । अनुभवें ठसली अढळता ॥४१॥</p>
<p>
	प्रत्यया आली साईंची वाणी । श्रवणार्थियां जाहली कहाणी । प्रेम वाढलें साईचरणीं । अघटित करणी साईंची ॥४२॥</p>
<p>
	बोलणें अवघें प्रथमपुरुषीं । परी तें नित्य दुजियाविषीं । लक्ष ठेवूनि देखणारासी । अहर्निशीं प्रत्यय हा ॥४३॥</p>
<p>
	पुढें जैसा जैसा अनुभव । वाढलें भक्तिप्रेमवैभव । आणखी एक तयांचा अभिनव । भक्तिभाव परिसावा ॥४४॥</p>
<p>
	असो एकदां एक दिवस । नारायणरावांचे मित्रास । जाहला एकाकीं वृश्चिकदंश । वेदनाविवश बहु झाला ॥४५॥</p>
<p>
	लावावया दंशाचे जागीं । बाबांची उदी फार उपयोगी । परी जातां शोधावयालागीं । लाधेना मागी तियेची ॥४६॥</p>
<p>
	स्नेह्यास सोसवती न वेदना । उदीचा कांहीं शोध लागेना । घेऊनि बाबांच्या छबीच्या दर्शना । भाकिली करुणा बाबांना ॥४७॥</p>
<p>
	मग तेथेंच त्या छबीचे तळीं । जळत्या उदबत्तीची कोजळी । होती पडलेली रक्षा ते स्थळीं । उदीच भाविली क्षणभरी ॥४८॥</p>
<p>
	घेऊनि त्यांतील एक चिमटी । दंश जाहल्या जागीं फांसटी । मुखें साईनाममंत्र पुटपुटी । भावनेपोटीं अनुलव ॥४९॥</p>
<p>
	ऐकतां वाटेल नवल मोठें । रक्षा चोळितांक्षणींच बोटें । वेदना पळाल्या आलिया वाटे । प्रेम दाटे उभयांसी ॥५०॥</p>
<p>
	ही तरी उदबत्तीची विभूती । व्यथिताप्रती लाविली होती । परी उदी म्हणूनि मार्गींची माती । ऐसीच अनुभूती प्रकटिते ॥५१॥</p>
<p>
	माती परी तियेचा संसर्ग । जयास झालें दुखणें वा रोग । तयावीण इतरांवरी प्रयोग । करितांही उपयोग घडतसे ॥५२॥</p>
<p>
	एकदां एका भक्ताची दुहिता । ग्रंथिज्वरें घेरली ही वार्ता । ग्रामांतराहूनि येतां अवचिता । उद्भवली चिंता पितयास ॥५३॥</p>
<p>
	पिता वांद्रेंशहरवासी । मुलगी अन्य ग्रामीं रहिवासी । उदीचा संग्रह नाहीं पाशीं पाशीं । निरोप नानांशीं पाठविला ॥५४॥</p>
<p>
	करावी आपण बाबांची प्रार्थना । दूर करावी माझी विवंचना । म्हणून प्रार्थिलें चांदोरकरांना । उदी धाडाना प्रासादिक ॥५५॥</p>
<p>
	निरोप घेऊन जाणारियास । नानाही भेटले मार्गास । जात होते कल्याणास । कुटुंबासमवेत ते समयीं ॥५६॥</p>
<p>
	ठाणें शहरीं स्टेशनापाशीं । निरोप पावला हा नानांशीं । उदी पाहतां नाहीं हाताशीं । उचलिलें मृत्तिकेसी मार्गींच्या ॥५७॥</p>
<p>
	तेथेंच उभे राहूनि रस्तां । गार्‍हाणें घालूनि साईसमर्थां । मागें वळूनि स्वस्त्रीचे माथां । चिमुट तत्त्वतां लाविली ॥५८॥</p>
<p>
	येरीकडे तो भक्त निघाला । मुलगी होती त्या गांवीं पातला । तेथें तयास जो वृत्तांत कळला । ऐकून सुखावला अत्यंत ॥५९॥</p>
<p>
	मुलगीस तीन दिवस ज्वर । आला होता अत्यंत प्रखर । वेदनांनीं जाहली जर्जर । कालचि तिळभर आराम ॥६०॥</p>
<p>
	पाहूं जातां तीच ती वेळा । उदी जाऊनि मृत्तिकेचा टिळा । करूनि नानांहीं जैं साई गार्‍हाणिला । उतार  पडला तेथूनि ॥६१॥</p>
<p>
	असो त्या दुखण्याची ही कथा । योग्य प्रसंगीं सविस्तरता । पुढें मागें येईल कथितां । उदीपुरताच चुटका हा ॥६२॥</p>
<p>
	हेच प्रेमळ चांदोरकर । असतां जामनेरीं मामलतदार । साई निजभक्तकल्याणैकतत्पर । करीत चमत्कार तो परिसा ॥६३॥</p>
<p>
	उदीचा या महिमा अपार । श्रोतां होइजे श्रवणतत्पर । कथितों दुजा तो चमत्कार । आश्चर्य थोर वाटेल ॥६४॥</p>
<p>
	आसन्नप्रसव नानांची दुहिता । असह्य चालल्या प्रसूतिव्यथा । जामनेराहून साईसमर्थां । हांका सर्वथा मारिती ॥६५॥</p>
<p>
	जामनेरींची ही स्थिती । शिरडीस कोणास ठावी नव्हती । बाबा सर्वज्ञ सर्वगती । कांहीं न जगतीं अज्ञात त्यां ॥६६॥</p>
<p>
	बाबांसीं भक्तांची एकात्मता । जाणून नानांचे एथील अवस्था । समर्थ साई द्रवले चित्ता । करिती तत्त्वतां तें काय ॥६७॥</p>
<p>
	उदी धाडावी आलें जीवा । इतुक्यांत गोसावी रामगीरबुवा । जाहला तयाच्या मनाचा उठावा । आपुले गांवा गमनार्थीं ॥६८॥</p>
<p>
	गांव तयांचा खानदेशीं । निघाला सर्व तयारीनिशीं । पातला बाबांचे पायांपाशीं । दर्शनासी मशीदीं ॥६९॥</p>
<p>
	बाबा देहधारी असतां । आधीं तयांचे पायां न पडतां । कोणीही कवण्याही कार्यानिमित्ता । अनुज्ञा न घेतां जाईना ॥७०॥</p>
<p>
	असो लग्न वा मौंजीबंधन । मंगलकार्य विधिविधान । कार्य कारण वा प्रयोजन । लागे अनुमोद बाबांचें ॥७१॥</p>
<p>
	विना तयांचें पूर्ण अनुज्ञापन । उदीप्रसाद आशीर्वचन । होणार नाहीं कार्य निर्विन्घ । भावना पूर्ण सकळांची ॥७२॥</p>
<p>
	असो ऐशी त्या गांवीं रीत । तदनुरोधें रामगीर येत । पायांस बाबांचे लागत । अनुज्ञा मागत निघावया ॥७३॥</p>
<p>
	म्हणे बाबा खानदेशीं । येतों जाऊनियां गांवासी । द्या कीं उदी - आशीर्वाद मजसी । अनुज्ञा दासासी निघावया ॥७४॥</p>
<p>
	जयास बाबा प्रेमभावा । बाहती ‘बापूगीर’ या नांवा । म्हणती जाईं खुशाल तूं गांवा । मार्गीं विसांवा घे थोडा ॥७५॥</p>
<p>
	आधीं जाईं जामनेरा । उतर तेथें नानांच्या घरा । घेऊनि तयांच्या समाचारा । मग तूं पुढारा मार्ग धरीं ॥७६॥</p>
<p>
	म्हणती माधवराव देशपांडायांप्रती । उतरून दे रे कागदावरती । शामा ती अडकराची आरती । गोसाव्या हातीं नानांतें ॥७७॥</p>
<p>
	मग गोसाविया उदी देती । आणीक थोडी पुडींत बांधिती । पुडी देऊन त्याचे हातीं । बाबा पाठविती नानांस ॥७८॥</p>
<p>
	वदती ‘ही पुडी आणि ही आरती । नेऊनि देईं नानांप्रती । पुसूनि क्षेम कुशल स्थिती । निघें पुढती निज गांवा’ ॥७९॥</p>
<p>
	जैसी रामाजनार्दनकृती । ‘आरती ज्ञानराजा’ ही आरती । तैसीच ‘आरती साईबाबा’ निश्चितीं । समान स्थिती उभयांची ॥८०॥</p>
<p>
	रामाजनार्दन जनार्दनभक्त । माधव अडकर साईपदांकित । रचना प्रसादपूर्ण अत्यंत । भजन तद्रहित अपूर्ण ॥८१॥</p>
<p>
	असो ही बाबांची आवडती । श्रोतां परिसिजे साद्यंत आरती । उदीसमवेत बाबा जी पाठविती । पुढें फलश्रुती दिसेल ॥८२॥</p><p>
	<p>
		( आरती )</p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		आरती साईबाबा ।  सौख्यदातारा जीवा । चरणरजातळीं  । द्यावा दासां विसांवा । भक्तां विसांवा ॥ आरती ॥ ध्रु० ॥</p>
	<p>
		जाळुनियां अनंग । स्वस्वरूपीं राहे दंग । मुमुक्षु जना दावी । निजडोळां श्रीरंग । डोळां श्रीरंग ॥ आरती ॥१॥</p>
	<p>
		जया मनीं जैसा भाव । तया तैसा अनुभव । दाविसी दयाघना । ऐसी तुझी ही माव । तुझी ही माव ॥ आरती ॥२॥</p>
	<p>
		तुमचें नाम ध्यातां । हरे संसृतिव्यथा । अगाध तव करणी । मार्ग दाविसी अनाथा । दाविसी अनाथा ॥ आरती ॥३॥</p>
	<p>
		कलियुगीं अवतार । सगुण ब्रम्हा साचार । अवतीर्ण जाहलासे । स्वामी दत्तदिगंबर । दत्तदिगंबर ॥ आरती ॥४॥</p>
	<p>
		आठां दिवसां गुरूवारीं । भक्त करिती वारी । प्रभुपद पहावया । भवभय निवारी । भय निवारी ॥ आरती ॥५॥</p>
	<p>
		माझा निज द्रव्यठेवा । तव चरणाजसेवा । मागणें हेंचि आतां । तुम्हां देवाधिदेवा । देवाधिदेवा ॥ आरती ॥६॥</p>
	<p>
		इच्छित दीन चातक । निर्मळ तोय निजसुख । पाजावें माधवा या । सांभाळ आपुली ही भाक । आपुली ही भाक ॥ आरती ॥७॥</p>
	<p>
		गोसावी वदे बाबांलागून । मजपाशीं अवघे रुपये दोन । इतुकेन केवीं मी पोहोंचेन । बाबा जाऊन जामनेरीं ॥८३॥</p>
	<p>
		बाबा वदती “तूं स्वस्थ जाईं । लागेल तुझी सर्व सोयी” । विश्वास ठेवूनि साईंचे पायीं । निघाले गोसावी जावया ॥८४॥</p>
	<p>
		आज्ञा वंदूनि बापूगीर । घेऊनि ऐसा बाबांचा विचार । उदीप्रसाद पावूनि सत्वर । कार्यतत्पर निघाला ॥८५॥</p>
	<p>
		जामनेरास जैसा आतां । नव्हता तेव्हां अग्निरथाचा रस्ता । नव्हती प्रवासाची सुलभता । उपजली चिंता गोसाविया ॥८६॥</p>
	<p>
		बैसूनियां अग्निरथांत । प्रवासी उतरले जळगांवांत । तेथून पुढील मार्ग समस्त । जावें लागत पादचारीं ॥८७॥</p>
	<p>
		एक रुपया चवदा आणे । भरलें अग्निरथाचें देणें । उरलें अवघें चवलीचें नाणें । कैसेनि जाणें पुढारा ॥८८॥</p>
	<p>
		ऐसा गोसावी चिंतातुर । असतां जळगांव स्टेशनावर । तिकीट देऊन पडे जों बाहेर । शिपाई दूर देखिला ॥८९॥</p>
	<p>
		शिपाई आधींच शोधावर । येऊनियां उतारूसमोर । पुसे शिर्डीचा बापूगीर । तो कोण साचार कथा हो ॥९०॥</p>
	<p>
		तें त्या शिपायाचें पुसणें । जाणूनि केवळ आपुल्याकारणें । गोसावी पुढें होऊनि म्हणे । मीच तो म्हणे काय कीं ॥९१॥</p>
	<p>
		तो म्हणे मज तुम्हांलागूनि । पाठविलेंसे चांदोरकरांनीं । चला सत्वर तांग्यांत बैसुनी । राहिले पाहुनी मार्ग तुमचा ॥९२॥</p>
	<p>
		बुवांस अत्यंत आनंद झाला । नानांस शिर्डीहून निरोप गेला । तरीच हा वेळेवर तांगा आला । घोरचि चुकला हा मोठा ॥९३॥</p>
	<p>
		शिपाई दिसला मोठा चतुर । दाढी मिशा कल्लेदार । नीट नेटस ल्यालेला इजार । तांगाही सुंदर देखिला ॥९४॥</p>
	<p>
		जैसा तांगा तैसेच घोडे । ते काय होते भाडयाचे थोडे ? । निघती इतर तांग्यांचे पुढें । उत्साह - ओढें कार्याच्या ॥९५॥</p>
	<p>
		भरतां द्वादश घटका निशी । सृटला तांगा जो वेगेंसीं । थांबविला तो पहांटेसी । ओढियापाशीं वाटेंत ॥९६॥</p>
	<p>
		तंव तो तांगेवाला सोडी । पाणी पाजावया आपुलीं घोडीं । म्हणे आतांच येतों तांतडी । करूं सुखपरवडी फराळ ॥९७॥</p>
	<p>
		पाणी घेऊनि येतों थोडें । खाऊं आपण आंबे पेढे । आणीक गुळपापडीचे तुकडे । जुंपूनि घोडे निधूं मग ॥९८॥</p>
	<p>
		दाढी पेहेराव मुसलमानी । परिसूनि ऐसी तयाची वाणी । होय साशंकित रामगीर मनीं । फराळ हा कोणीं करावा ॥९९॥</p>
	<p>
		म्हणोनि तयासी विचारी जात । म्हणे तूं कां झालासी शंकित । मी हिंदू गरवाल क्षत्रयपूत । असें मी रजपूत जातीचा ॥१००॥</p>
	<p>
		फराळही हा नाना देती । तुझियालागीं मजसंगतीं । शंकूं नको यत्किंचित निश्चितीं । स्वस्थचित्तीं सेवीं हा ॥१०१॥</p>
	<p>
		ऐसा जेव्हां विश्वास पटला । मग त्या दोघांनीं फराळ केला । तांगेवाल्यानें तांगा जोडिला । प्रवास संपला अरुणोदयीं ॥१०२॥</p>
	<p>
		तांगा प्रवेशतां गांवाभीतरीं । दिसूं लागली नानांची कचेरी । घोडेही विसंवले क्षणभरी । सुखावे अंतरीं रामगीर ॥१०३॥</p>
	<p>
		बुवांस दाटली लघुशंका । बसाया गेले बाजूस एका । पूर्वस्थळीं परतती जों कां । आश्चर्य देखा वर्तलें ॥१०४॥</p>
	<p>
		नाहीं तांगा, नाहीं घोडीं । दिसेना तांगेवाला गडी । कोणीही तेथें न दिसे ते घडी । जागा उघडी देखिली ॥१०५॥</p>
	<p>
		रामगीर मनीं विचारी । चमत्कार हा काय तरी । आणोनियां मज येथवरी । इतुक्यांत दूरी गेला कुठें ॥१०६॥</p>
	<p>
		बुवा जावोनि कचेरीआंत । नानांची भेट घ्यावया उत्कंठित । असती निजगृहीं हे कळतां वृत्त । जावया तैं प्रवृत्त जाहला ॥१०७॥</p>
	<p>
		बुवा वाटेनें पुसत चालला । सहज नानांचा पत्ता लागला । ओटीवर जों जाऊन बैसला । आंत बोलाविला नानांहीं ॥१०८॥</p>
	<p>
		परस्परांची भेट जाहली । उदी आरती बाहेर काढिली । नानांचिया सन्मुख ठेविली । वार्ता निवेदिली संपूर्ण ॥१०९॥</p>
	<p>
		नवल ही जंव उदी आली । मुलगी नानांची त्याच कालीं । प्रसूत्यर्थ होती अडली । जाहलेली अति कष्टी ॥११०॥</p>
	<p>
		व्हावया तें संकटनिरसन । मांडिलें होतें नवचंडीहवन । पाहूनि सप्तशती - पाठ पठण । विस्मयापन्न गोसावी ॥१११॥</p>
	<p>
		जैसें क्षुधार्ता अकल्पित । ताट यावें पव्कान्नपूरित । किंवा तृषित चकोरा मुखीं अमृत । तैसें तंव होत नानांला ॥११२॥</p>
	<p>
		हांक मारिली कुटुंबाला । उदी दिधली पाजावयाला । स्वयें आरती म्हणावयाला । आरंभ केला नानांहीं ॥११३॥</p>
	<p>
		वेळ क्षणभर गेला न गेला । बाहेर आंतून निरोप आला । ओठास लावितां उदीचा प्याला । आराम पडला मुलगीस ॥११४॥</p>
	<p>
		तात्काळ क्लेशनिर्मुक्ति जाहली । मुलगी निर्विन्घ प्रसूति पावली । सुखानें हातींपायीं सुटली । काळजी फिटली सर्वांची ॥११५॥</p>
	<p>
		तांगेवाला कुठें गेला । येथेंही मज नाहीं आढळला । रामगीर पुसे नानांला । तांगा धाडिला तो कुठें ॥११६॥</p>
	<p>
		नाना वदती म्यां न धाडिला । तांगा कुठला ठावा न मजला । तुम्ही येतां हें ठावें कुणाला । तांगा कशाला धाडीन मी ॥११७॥</p>
	<p>
		मग बुवांनीं तांग्याची कथा । आमूलाग्र कथिली समस्तां । विस्मय दाटला नानांचे चित्ता । पाहूनि वत्सलता बाबांची ॥११८॥</p>
	<p>
		कुठला तांगा, कुठला शिपाई । नट नाटकी ही माउली साई । संकटसमयीं धांवत येई । भावापायीं भक्तांच्या ॥११९॥</p>
	<p>
		असो;  आतां कथानुसंधन । पुढें चालवूं पूर्वील कथन । पुढें कांहीं कालांतरेंकरून । बाबाही निर्वाण पावले ॥१२०॥</p>
	<p>
		सन एकूणीसशें अठरा । विजयादशमी सण दसरा । पाहोनि बाबांनीं हा शुभदिन बरा । केला धरार्पण निजदेह ॥१२१॥</p>
	<p>
		मग पुढें जाहली समाधी । नारायणराव तयाआधीं । बाबा देहधारी तधीं । दर्शन साधी दों वेळां ॥१२२॥</p>
	<p>
		समाधीस झाले तीन संवत्सर । दर्शनेच्छा जरी बलवत्तर । परी येतां येईना योग्य अवसर । तेणें अधीर जाहले ॥१२३॥</p>
	<p>
		समाधीमागें वर्ष भरलें । नारायणराव व्याधींनीं पीडिले । औषधोपचार  सर्व सरले । उपाय हरले लौकिकी ॥१२४॥</p>
	<p>
		गेले जरी व्याधीनें गांजून । रात्रंदिन बाबांचें ध्यान । गुरुरायांस कैंचें मरण । दिधलें दर्शन नारायणा ॥१२५॥</p>
	<p>
		एके रात्रीं पडलें स्वप्न । साई एका भुयारामधून । नारायणरावांपाशीं येऊन । देती आश्वासन तयांतें ॥१२६॥</p>
	<p>
		काळजी कांहीं न धरीं मनीं । उतार पडेल उद्यांपासुनी । एक आठवडा संपतांक्षणीं । बसशील उठूनी तूं स्वयें ॥१२७॥</p>
	<p>
		असो; मग आठ दिवस लोटले । अक्षरें अक्षर प्रत्यंतर प्रत्यंतर आलें । नारायणराव उठून बैसले । अंतरीं धाले अनिवार ॥१२८॥</p>
	<p>
		ऐसेच कांहीं जातां दिवस । आले नारायणराव शिर्डीस । समाधीचे दर्शनास । तेव्हां  या अनुभवास कथियेलें ॥१२९॥</p>
	<p>
		देहधारी म्हणूनि जित । समाधिस्थ जे ते काय मृत । साई जननमरणातीत । सदा अनुस्तूत स्थिरचरीं ॥१३०॥</p>
	<p>
		वन्ही जैसा काष्ठीं गुप्त । दिसेना परी तदंतर्हित । घर्षणप्रयोगें होई प्रदीप्त । तैसाच भक्तार्थ हा साई ॥१३१॥</p>
	<p>
		एकदां जो प्रेमें देखिला । तयाचा आजन्म अंकित झाला । केवळ अनन्य प्रेमाचा भुकेला । तयाच्या हांकेला ओ देई ॥१३२॥</p>
	<p>
		नलगे तयासी स्थळ वा काळ । उभा निरंतर सर्व काळ । कैसी कोठून दाबील कळ । करणी अकळ तयाची ॥१३३॥</p>
	<p>
		ऐसी कांहीं करील रचना । मनांत येतील कुतर्क नाना । तों तों द्दष्टी ठेवितां चरणां । ध्यानधारणा वाढेल ॥१३४॥</p>
	<p>
		ऐसें झालिया एकाग्र मन । घडेल अत्यंत साईचिंतन । हेंच हा साई घेई करवून । कार्यही निर्विन्घ पार पडे ॥१३५॥</p>
	<p>
		व्यवहार नलगे सोडावयास । सुटेल आपोआप हव्यास । ऐसा हा मना लावितां अभ्यास । कार्यही अप्रयास घडेल ॥१३६॥</p>
	<p>
		कर्मभूमीस आलासे देह । कर्में घडतील नि:संदेह । स्त्री, पुत्र, वित्त आणि गेह । यथेच्छ परिग्रह होवो कां ॥१३७॥</p>
	<p>
		होणार तें होऊं द्या यथेष्ट । सद्नुरुचिंतन आपुलें अभीष्ट । संकल्प विकल्प होतील नष्ट । संचित अनिष्ट ट्ळेल ॥१३८॥</p>
	<p>
		पाहोनियां भक्तभाव । कैसे साई महानुभाव । दावीत भक्तांस एकेक अनुभव । वाढवीत वैभव भक्तीचें ॥१३९॥</p>
	<p>
		वाटेल तैसा वेष घेती । मानेल तेथें प्रकट होती । भक्तकल्याणार्थ कुठेंही फिरती । शिष्य भावार्थी पाहिजे ॥१४०॥</p>
	<p>
		ये अर्थींची आणिक कथा । श्रोतां परिसिजे सादर चित्ता । संत आपुल्या भक्तांकरितां । कैसे श्रमतात अहर्निश ॥१४१॥</p>
	<p>
		खोलूनियां कानांचीं कवाडें । ह्रदयमंदिर करा कीं उघडें । रिघूं द्या ईस आंतुलीकडे । भवभय सांकडें वारील ॥१४२॥</p>
	<p>
		हें जें सांप्रत सरलें प्रसिद्ध । शार्मण्यदेशीयांशीं युद्ध । लष्कर करूं लागे सिद्ध । शत्रूविरुद्ध संग्रामा ॥१४३॥</p>
	<p>
		आंग्लभौम राज्याधकारी । या भरतभूमीचिया भीतरीं । लष्करभरती शहरोशाहरीं । होते करीत चोहींकडे ॥१४४॥</p>
	<p>
		सन एकोणीसशें सतरा सालीं । एका भक्ताची वेळ आली । ठाणें जिल्ह्यास नेमणूक झाली । कथा वर्तली नवलपरी ॥१४५॥</p>
	<p>
		आप्पासाहेब कुळकर्णी नांव । जडला साईचरणीं भाव । हा तरी एक साईंचा प्रभाव । लीला अथाव तयांची ॥१४६॥</p>
	<p>
		तयांतें बहुतां वर्षांपूर्वीं । बाळासाहेब भाटयांकरवीं । प्राप्त जाहली बाबांची छबी । होती लाविली पूजेस ॥१४७॥</p>
	<p>
		कायावाचामनेंकरून । प्राप्त गंधाक्षता - पुष्प घालून । नित्यनेमें छबीचें पूजन । नैवेद्य समर्पण करीत ॥१४८॥</p>
	<p>
		सरेल केव्हां कर्मभोग । होईल केव्हां मनाजोग । साई प्रत्यक्ष दर्शनयोग । आप्पांस ह्रद्रोग लागला ॥१४९॥</p>
	<p>
		साईबाबांच्या छबीचें दर्शन । तेंही प्रत्यक्ष दर्शनासमान । भाव मात्र असावा पूर्ण । वेळेवर खूण पावाल ॥१५०॥</p>
	<p>
		केवळ छबीचें दर्शन होतां । प्रत्यक्ष दर्शनाची त्या समता । येविषयींची अन्वर्थता । श्रोतां सादरता परिसिजे ॥१५१॥</p>
	<p>
		एकदां बाळाबुवा सुतार । मुंबापुरस्थ भजनकार । अर्वाचीन तुकाराम - नामधर । गेले शिर्डीस दर्शना ॥१५२॥</p>
	<p>
		हीच तयांची प्रथम भेट । पूर्वीं कधींही नसतां गांठ । होतांच उभयतां द्दष्टाद्दष्ट । साई तों स्पष्ट त्या वदले ॥१५३॥</p>
	<p>
		चार वर्षांपासून पाहें । मजला याची ओळख आहे । बाळाबुवा विस्मित होये । ऐसें कां हे वदतात ॥१५४॥</p>
	<p>
		बाबांनीं नाहीं शिरडी सोडिली । मींही डोळां आजचि देखिली । त्या मज चारवर्षांपहिली । ओळख पडली हें कैसें ॥१५५॥</p>
	<p>
		ऐसा विचार करितां करितां । चारचि वर्षांमागील वार्गा । छबी एकदां बाबांची नमितां । आठवली चित्ता बुवांच्या ॥१५६॥</p>
	<p>
		मग त्या बोलाची अन्वर्थता । बाळाबुवांस पटली तत्त्वता । म्हणती पहा संतांची व्यापकता । भक्तवत्सलता ही त्यांची ॥१५७॥</p>
	<p>
		मीं तों केवळ छबी नमिली । प्रत्यक्ष मूर्ति आजचि पाहिली । बाबांनीं परी ओळख धरिली । मीं ती हरविली कधींच ॥१५८॥</p>
	<p>
		हरविली म्हणणें हेंही न सार्थ । कीं तात्काळ कळेना बोलाचा अर्थ । छबी - नमनीं ओळख हा पदार्थ । जाणाया समर्थ नव्हतों मीं ॥१५९॥</p>
	<p>
		माझी ओळख बाबांस ठावी । माझ्याही तों नव्हती गांधीं । संतांनीं जैं आठवण द्यावी । तेव्हांच पडावी ठाय़ीं ती ॥१६०॥</p>
	<p>
		निर्मल आरसा निर्मल उदक । तैं बिंबाचें प्रतिबिंब देख । छबी हेंही प्रतिबिंबएक । शुद्ध प्रतीक बिंबाचें ॥१६१॥</p>
	<p>
		म्हणून संतांच्या छबीचें दर्शन । आहे प्रत्यक्ष दर्शनासमान । सर्वदर्शी संतांची जाण । तीच ही शिकवण सर्वांतें ॥१६२॥</p>
	<p>
		असो आतां पूर्वील कथा । परिसावया साबधानता । असावी श्रोतयांचे चित्ता । अनुसंधानता राखावी ॥१६३॥</p>
	<p>
		वास्तव्य आप्पांचें ठाणें शहरीं । आली भिवंडीची कामगिरी । आठां दिवसां येईन माघारीं । पडले बाहेरी सांगून ॥१६४॥</p>
	<p>
		दिवस दोनचि गेलियावरी । घडलें अपूर्व पहा माघारीं । पातला एक फकीर दारीं । तयांचे घरीं ठाण्यास ॥१६५॥</p>
	<p>
		होतां तयाची द्दष्टद्दष्ट । साईच सर्वांस वाटले स्पष्ट । छबीचें साम्य नखशिखांत । रूपरेखेंत संपूर्ण ॥१६६॥</p>
	<p>
		कुटुंब आणि मुलें बाळें । फकीराकडे सर्वांचे डोळे । विस्मयापन्न जाहले सगले । बाबाच आले वाटलें ॥१६७॥</p>
	<p>
		पूर्वी न कोणास प्रत्यक्ष दर्शन । परी छबीच्या साद्दश्यावरून । हेच ते बाबा ऐसें जाणून । जिज्ञासासंपन्न जाहले ॥१६८॥</p>
	<p>
		साई शिरडीचे तेच की आपण । अवघीं फकीरास केला प्रश्न । तयां तो  फकीर करी जें निवेदन । श्रोतीं सावधान परिसिजे ॥१६९॥</p>
	<p>
		साई स्वयें मी नव्हे साचा । परी मी बंदा आज्ञांकित त्यांचा । समाचारार्थ मुलांबाळांच्या । आलोंसें तयांच्या आज्ञेनें ॥१७०॥</p>
	<p>
		पुढें तो मागूं लागतां दक्षिणा । मुलांची माता करी संभावना । एक रुपया देई तत्क्षणा । उदीप्रदाना तोही करी ॥१७१॥</p>
	<p>
		देई साईबाबांची विभूती । पुडींत बांधून बाईप्रती । म्हणे ठेवीं त्या छबीचे संगतीं । सौख्यप्राप्ति होईल ॥१७२॥</p>
	<p>
		ऐसा संपादूनि निजकार्यार्थ । साई असेल मार्ग लक्षीत । ऐसें म्हणून निरोप घेत । जाहला मार्गस्थ फकीर ॥१७३॥</p>
	<p>
		मग तो तूथूनियां जो निघाला । आलिया मार्गें चालून गेला । येरीकडे जो वृत्तांत घडला । अपूर्व लीला साईंची ॥१७४॥</p>
	<p>
		आप्पासाहेब भिवंडीस गेले । पुढें न जातां मागें परतले । घोडे तांग्याचे आजारी झाले । गमन राहिलें पुढारा ॥१७५॥</p>
	<p>
		ते मग दुपारीं ठाण्यास आले । वृत्त सर्व झालेलें कळलें । आप्पासाहेब मनीं चुरचुरले । कीं ते अंतरले दर्शना ॥१७६॥</p>
	<p>
		अवघी रुपयाच दक्षिणा दिधली । तेणें मनाला लज्जा वाटली । मी असतों तर दहांचे खालीं । नसतीच झाली बोळवणी ॥१७७॥</p>
	<p>
		ऐसें आप्पासाहेब वदले । चित्तास किंचित खिन्नत्व वाट्लें । फकीर मशिदींत सांपडतील वाटलें । शोधार्थ निघाले उपवासी ॥१७८॥</p>
	<p>
		मशीद तकिया ठिकठिकाणीं । जेथें जेथें उतरती कोणी । स्थानें समस्त शोधिलीं आप्पांनीं । फकीरालागूनि तेधवां ॥१७९॥</p>
	<p>
		शोधाशोध करितां थकले । फकीर कोठेंही तो नाढळे । मग ते भुकेले जाऊन जेवले । निराश झाले तेधवां ॥१८०॥</p>
	<p>
		परी तयांस नाहीं ठावें । रित्या पोटीं न शोधा निघावें । आधीं निजात्म्यास संतुष्टवावें । पाठीं उठावें शोधार्थ ॥१८१॥</p>
	<p>
		ये अर्थाची बाबांची कथा । दावील या निजतत्त्वाची यथार्थता । किमर्थ येथें तिची द्विरुक्तता । अध्याय तो श्रोतां अवगत ॥१८२॥</p>
	<p>
		गुरुगरिमा नामे एक । गताध्यायीं कथा सुरेख । तेथ स्वमुखें निजगुरूची भाक । वर्णिली कारुणिक श्रीसाईंनीं ॥।१८३॥</p>
	<p>
		तेंच सत्य अनुभवा आलें । आप्पा जेव्हां जेवून निघाले । सवें स्नेही चित्रे घेतले । सहज चालले फिरावया ॥१८४॥</p>
	<p>
		असो, कांहीं मार्ग क्रमितां । अनुलक्षून आपणांकरितां । देखिलें येतां एका गृहस्था । अतिसत्वरता ते स्थळीं ॥१८५॥</p>
	<p>
		येऊनि उभे राहतां जवळी । आप्पासाहेब हळूच न्याहाळी । हेच आले असतील सकाळीं । वाटलें ते वेळीं तयांस ॥१८६॥</p>
	<p>
		आधीं जयातें शोधीत होतों । हाचि गमे मज फकीर कीं तो । आनखाग्र छबीसीं जुळतो । विस्मय होतो बुद्धीसी ॥१८७॥</p>
	<p>
		ऐसें आप्पा तर्किती अंतरीं । तोंच तो फकीर हात पसरी । ठेविती एक रुपया करीं । आप्पा ते अवसरीं तयाचे ॥१८८॥</p>
	<p>
		आणीक मागतां आणीक एक । दिधला तयावरी तिसरा देख । तरी तो फकीर मागे आणिक । नवल कौतुक पुढेंच ॥१८९॥</p>
	<p>
		चित्र्यांपासीं होते तीन । तेही आप्पा घेती मागून । देती तया फकीरालागून । तरी तो राही न मागतां ॥१९०॥</p>
	<p>
		आप्पासाहेब वदती तयास । आणि देईन येतां घरास । बरें म्हणून घराकडेस । तिघे ते समयास परतले ॥१९१॥</p>
	<p>
		घरीं येतांच आणिक तीन । हातीं दिधले रुपये काढून । झाले नऊ तरी अजून । फकीर समाधान पावेना ॥१९२॥</p>
	<p>
		पुढें अधिक दक्षिणा मागतां । आप्पासाहेब वदती तत्त्वतां । बंदी दहांची नोटचि आतां । बाकी रहातां राहिली ॥१९३॥</p>
	<p>
		सुटे रुपये सर्व सरले । नाहीं दुसरें कांहीं उरलें । नोट देईसना फकीर बोले । तैसेंही केलें आप्पांनीं ॥१९४॥</p>
	<p>
		नोट जंव ती हातीं लागे । नऊ देऊनि टाकी मागें । फकीर मग तो आलिया मार्गें । गेला अतिवेगें परतोनि ॥१९५॥</p>
	<p>
		पाहतां या कथेचें सांर । जया भक्ताचे जैसे उद्नार । तैसे ते पूर्ण करवून घेणार । ब्रीद हेंसाचार सईंचें ॥१९६॥</p>
	<p>
		पाहूनि श्रोत्यांची श्रवणोत्सुकता । येच अर्थींची आणिक वार्ता । स्मरली जी मज प्रसंगोपात्तता । अति सादरता परिसावी ॥१९७॥</p>
	<p>
		आहेत एक भक्त भाविक । नामें हरीभाऊ कर्णिक । डहाणू ग्रामींचे स्थाईक । अनन्य पाईल साईंचे ॥१९८॥</p>
	<p>
		सन एकोणीसशें सतरा । पाहोनि गुरुपौर्णिमा पवित्रा । करूं आले शिरडीची यात्रा । त्या अल्प चरित्रा सांगतों ॥१९९॥</p>
	<p>
		यथाविधि पूजा झाली । दक्षिणा वस्त्रें अर्पण केलीं । आज्ञा घेऊनि उतरतां खालीं । कल्पना आली मनास ॥२००॥</p>
</p>
<br /><p>
	वाटलें आणिक एक रुपया । वरती जाऊन बाबांस द्यावा । तोंच तो विचार लागला त्यागावा । रुपया ठेवावा तैसाच ॥२०१॥</p>
<p>
	ज्या गृहस्थें आज्ञा देवविली । त्यानेंच वरून खूण केली । आतां एकदां आज्ञा झाली । पुढील पाउलीं मार्गक्रमा ॥२०२॥</p>
<p>
	विश्वास ठेवूनियां संकेतीं । कर्णिक जातां दर्शनार्थ । नरसिंगमहाराज संत । दर्शन अवचित जाहलें ॥२०४॥</p>
<p>
	भक्तपरिवार असतां भोंवतीं । महाराज अकस्मात उठती । कर्णिकांस मणिबंधीं धरिती । रुपया म्हणती दे माझा ॥२०५॥</p>
<p>
	कर्णिक मनीं जाहले विस्मित । रुपया मोठया आनंदें देत । कैसा साईही मनोदत्त । रुपया स्वीकारीत वाटलें ॥२०६॥</p>
<p>
	साई स्वीकारीत हेंही न साच । ध्यानीं मनींही नसतां तसाच । खेंचून बलात्कारें ते मागत । तैसीच ही मात जाहली ॥२०७॥</p>
<p>
	मन हें संकल्प -विकल्पात्मक । तरंगांवर तरंग अनेक । सकृद्दर्शनीं भावी एक । प्रसंगीं आणीक कल्पना ॥२०८॥</p>
<p>
	आरंभीं चित्तीं उठे जी लहरी । मात्र ती सद्वटत्ति असावी बरी । होईल तियेचाच परिपोष जरी । कल्याणकारी । ती एक ॥२०९॥</p>
<p>
	तियेचेंच अनुसंधान । द्दढाभ्यसन निदिध्यासन । होऊं न द्यावें मना विस्मरण । राखावें वचन प्रयत्नें ॥२१०॥</p>
<p>
	आप्पासाहेब बोलून गेले । पुढें मागें असते विसरले । बोल उठतांच पुरवून घेतले । नवल दर्शविलें भक्तीचें ॥२११॥</p>
<p>
	नाहीं तरी त्या फकीरापाशीं । नोटी - समवेत एकोनविंशी । असतां नऊच कां दिधले आप्पांशीं । होती असोसी दहांचीच ॥२१२॥ </p>
<p>
	जयास बाबांस लागला कर । तो हा नऊ पुतळ्यांचा हार । नवविधभक्तिप्रेमनिकर । स्मरणप्रकार बाबांचा ॥२१३॥</p>
<p>
	देहविसर्जनकथा ऐकतां । स्वयें बाबा निजदेह त्यागितां । कळून येईन अभिनव दानता । नव - दान देतां ते समयीं ॥२१४॥</p>
<p>
	दिधला कायवाचामनें  । एकचि रुपया कुटुंबानें । स्वीकारिला अति संतुष्टापणें । अधिक मागणें नव्हतें तैं ॥२१५॥</p>
<p>
	परी तें निजकुटुंबाचें देणें । आप्पांचे मनास वाटलें उणें । मी असतों तर देतों दशगुणें । फकीराकराणें तेव्हांच ॥२१६॥</p>
<p>
	ऐसें आप्पा जैं वाचादत्त । दहा रुपये देतों म्हणत । ते संपूर्ण न देतां वचननिर्मुक्त । होतील ऋणमुक्त कैसे ते ॥२१७॥</p>
<p>
	फकीर नव्हता हाइतरांपरी । हा काय कोणी होता भिकारी । कांहींही पडतां जयाचे करीं । जाईल माघारी परतोन ॥२१८॥</p>
<p>
	जाहले नव्हते दिवसगत । बोलल्याच दिशीं मागुता येत । परी ते कोणीही फकीर अपरिचित । म्हणून साशंकित आप्पा तैं ॥२१९॥</p>
<p>
	आरंभीं मागणें कंरितेवेळीं । सहा रुपये होते जवळी । परी ती रक्कम हातावेगळी । तदर्थ केली ना त्यांनीं ॥२२०॥</p>
<p>
	असो आप्पांवरी प्रेम नसतें । फकीरवेषें बाबाकां येते । जरी दक्षिणेचें मिष न करिते । कथेस येते रस कैंचे ॥२२१॥</p>
<p>
	आप्पासाहेब केवळ निमित्त । तुम्हां आम्हां एकचि गत । जरी आरंभीं गोड हेत । प्रसंगीं आचरित प्रसंगासम ॥२२२॥</p>
<p>
	आपण सर्व वाग्दानीं तत्पर । दानकाळीं शंका फार । जीव होई खालींवर । निश्चितता तर दुर्लभ ॥२२३॥</p>
<p>
	तथापि हित आणी मित बोलेल । बोलाऐसेंच जो वागेल । खरे करून दावील निजबोल । एकादाच लाल हरीचा॥२२४॥</p>
<p>
	असो जो भक्त अनन्यभाविक । जो जो जे जे अर्थीं कामुक । असो ऐहिक वा आमुष्मिक । साई फलदयक समर्थ ॥२२५॥</p>
<p>
	जरी हे आप्पासाहेब हुशार । आंग्लविद्याविभूषित चतुर । आरंभीं चाळीस टिकल्याच पागर । देतसे सरकार तयांतें ॥२२६॥</p>
<p>
	ते पुढें ही छबी लाधतां । हळू हळू वाढूं लागतां । चाळिसांच्या बहुगुणें वरता । पगार आतां झालासे ॥२२७॥</p>
<p>
	एकाचिया दशणुणें देतां । दशगुणें अधिकार दशगुणें सत्ता । हा तों अनुभव हातोहाता । सकळांदेखतां बाबांचा ॥२२८॥</p>
<p>
	शिवाय परमार्थाची द्दष्टी । वाढीस लागे निष्ठेच्या पोटीं । ही काय आहे सामान्य गोठी । विचित्र हातोटी बाबांची ॥२२९॥</p>
<p>
	पुढें आप्पासाहेब मागती । फकीरानें दिलेली विभूती । पाहूं जातां ती पुडी होती । प्रेमें पाहती उघडून ॥२३०॥</p>
<p>
	उदीसमवेत पुष्पें अक्षता । पुडीमाजी निघालीं तत्त्वतां । ताईत बनवून अतिपूज्यता । बांधिली निजहस्तामाझारी ॥२३१॥</p>
<p>
	पुढें बाबांचें दर्शन घेतां । स्वयें बाबांनीं जो दिधला होता । तो केंसही अति प्रेमळता । घातला ताइतामाझारीं ॥२३२॥</p>
<p>
	काय बाबांच्या उदीचें महिमान । उदी शंकराचेंही भूषण । भावें भाळीं करी जो चर्चन । विन्घनिरसन तात्काळ ॥२३३॥</p>
<p>
	करूनि मुखमार्जन स्नान । करी जो नित्य उदी विलेपन । चरणतीर्थसमवेत पान । पुण्यपावन होईल तो ॥२३४॥</p>
<p>
	शिवाय या उदीचा विशेष । सेवितां होईल पुर्णायुष । होईल पातकनिरसन अशेष । सुखसंतोष सर्वदा ॥२३५॥</p>
<p>
	ऐसें या गोड कथामृताचें पारणें । साईनें केलें आप्पांकारणें । तेथ आपण आगांतुक पाहुणे । यथेष्ट जेवणें पंक्तीस ॥२३६॥</p>
<p>
	पाहुणे अथवा घरधनी । उभयांसी एकचि मेजवानी । प्रपंच नाहीं रसास्वादनीं । स्वानंदभोजनीं व्हा तृप्त ॥२३७॥</p>
<p>
	हेमाड साईचरणीं शरण । पुरे आतां हें इतुकेंच श्रवण । पुढील अध्यायीं होईल कथन । याहून महिमान उदीचें ॥२३८॥</p>
<p>
	उदीचर्चन सईदर्शंन । हाडयाव्रण निर्मूल निरसन । नारूनिवारण ग्रंथिज्वरहरण । अवधानपूर्ण परिसावें ॥२३९॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । उदीप्रभावो नाम त्रयस्त्रिंशत्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 15:18:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 15:43:35 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ३२]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-32-122042600055_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
आतां पूर्वाध्यायीं कथन । पावला विजयानंद निर्वाण । बाळकरामही निजानंदलीन । साईचरणसंनिध ॥१॥
तैसेच तात्यासाहेब नूलकर ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 32" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650966440-7935.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra adhyay 32" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	आतां पूर्वाध्यायीं कथन । पावला विजयानंद निर्वाण । बाळकरामही निजानंदलीन । साईचरणसंनिध ॥१॥</p>
<p>
	तैसेच तात्यासाहेब नूलकर । मेघाही नि:सीम भक्तप्रवर । उभयतांहीं अर्पिलें शरीर । द्दष्टीसमोर साईंच्या ॥२॥</p>
<p>
	याहून मोठा चमत्कार । व्याघ्रासारिखा प्राणी क्रूर । तयाचाही निधनप्रकार । परिसिला सविस्तर श्रोत्यांनीं ॥३॥</p>
<p>
	आतां सांप्रत अध्यायांत । स्वयें बाबांच्या मुखें वर्णित । ऐसा गोड कथितों वृत्तांत । श्रोतयां अत्यंत हितकारी ॥४॥</p>
<p>
	असतां एकदां बाबा वनांत । झालें गुरुदर्शन अकल्पित । कैसी गुरूची करणी अद्भुत । परिसा तें चित्त देऊनी ॥५॥</p>
<p>
	या कथेची परम नवलाई । वानूं मी पामर किती काई । भक्तिश्रद्धामुक्तिदाई । स्वमुखें साई वदले जी ॥६॥</p>
<p>
	तैसेंच एका बाईचें मन । होतां घ्यावें बाबांचें दर्शन । वसावें तेथें दिवस तीन । रहावें निरशन व्रतस्थ ॥७॥</p>
<p>
	कैसा तियेसी आणिला प्रसंग । कैसा करविला निर्धारभंग । कैशा पुरणपोळिया सुरंग । करविल्या खमंग तिजकरवीं ॥८॥</p>
<p>
	पोळ्या केवळ नाहीं करविल्या । यथेच्छ तिजकरवीं खावविल्या । परकार्यार्थ देह झिजविल्या । सार्थकीं लाविल्या हें श्रेय ॥९॥</p>
<p>
	यांतचि आहे प्रम कल्याण । उपासाहून अनेक गुण । कैसें तिजला दिलें ठसवून । कधींही विस्मरण न घडेसें ॥१०॥</p>
<p>
	तैसेंच जया परमार्थीं आवड । कैसा करावा अभ्यास द्दढ । करावें कैसें साहस अवघड । साधाया जोड नित्याची ॥११॥</p>
<p>
	ये अर्थींचा कथानुक्रम । अमृताहूनही गोड परम । श्रोतयां उपजेल भक्तिप्रेम । दु:खाचा उपरम होईल ॥१२॥</p>
<p>
	आतां येथोनि कथा गोड । श्रवणार्थियांचें पुरेल कोड । वक्त्यां श्रोतयां स्वानंदजोड । पुरेल होड श्रवणाचें ॥१३॥</p>
<p>
	प्रेमभरित अलोलिक । वदवितील साई कथानक । मज पामरा मूर्खा देख । लिहितांही कौतुक पदोपदीं ॥१४॥</p>
<p>
	जेवीं गंगादर्शनें पाप । अथवा चंद्राच्या दर्शनें ताप । तेवीं साईमुखींचे आलाप । पाप - संताप - हारक ॥१५॥</p>
<p>
	आतां आपण श्रोतेजन । करा श्रवणार्थीं सादर मन । महाराज साईमुखींचें वचन । निजगुरुदर्शनकारक ॥१६॥</p>
<p>
	जरी वेदवेदाङ्ग अध्ययन । केलें श्रुतिशास्त्रपारायण । गुरुकृपेवीण नाहीं ज्ञान । इतर तो शीण केवळ ॥१७॥</p>
<p>
	अव्यक्तादि स्थावरान्त । हा संसारवृक्ष अति विस्तृत । जन्ममरणशोकाकुलित । द्दष्टजात नाशिवंत ॥१८॥</p>
<p>
	छेड आणि नाशयुक्त । म्हणोनि यातें वृक्ष वदत । तो हा अव्यक्त स्थावरान्त । वृक्षोपमित संसार ॥१९॥</p>
<p>
	तो हा द्दष्ट नष्टस्वरूप्प । ऊर्ध्वमूळ संसारविटप । जयाचा अपार शाखाव्याप । नाकळे अत्यल्पही कवणा ॥२०॥</p>
<p>
	क्षणामागें क्षण लोटे । तैसा हा पसरे फुटती फाटे । कधीं दुरून रमणीय वाटे । आलिंगितां कांटे सर्वांगीं ॥२१॥</p>
<p>
	कदलीस्तंभसम नि:सास । जैसें मृगजळ वा गंधर्वनगर । तृष्णाजलें बद्धापरिकर । ऐसा हा तरुवर साजिरा ॥२२॥</p>
<p>
	अविद्याकामकर्मोद्भव । अव्यक्तबीजामाजीं प्रभव । जो प्रतिक्षण अन्यथा - स्वभाव । असतां अभावात्मक स्वयें ॥२३॥</p>
<p>
	अनर्थात्मक हा ठायींचा । अविद्येपोटीं जन्म याचा । ईषणातृष्णादि पाणियाचा । सांठा तयाच्या सभोंवतीं ॥२४॥</p>
<p>
	धन - धान्य - पुत्र - दारा । परिग्रहाचा जया पसारा । देहबुद्धीमुळें या थारा । तया आधारा तो वर्ते ॥२५॥</p>
<p>
	अनंत प्राणी लिंगभेद । हेच जया वृक्षाचे स्कंध । कर्मवासानादि पारंब्या निर्बंध । तेणें हा सबंध फोफावे ॥२६॥</p>
<p>
	श्रुतिस्मृत्यादि पत्रीं जो भरला । शब्दस्पर्शादि पल्लवीं तरतरला । यज्ञदान - क्रियाकुसुमीं डवरला । रसरसला जो द्वद्वरसीं ॥२७॥</p>
<p>
	अंत नाहीं याचिये फळां । उपजीविकाभूत हा सकळां । भूर्भुवादि  लोक हा सगळा । ययावेगळा राहीना ॥२८॥</p>
<p>
	कधीं नृत्य गीत वादन । कधीं क्रीडा हास्य रुदन । ऐसा हा अश्वत्थ सनातन । अधोवदन सर्वदा ॥२९॥</p>
<p>
	शबलब्रम्हीं आविर्भाव । असंगशस्त्रें जयातें अभाव । शुद्धमूलाधार जो सद्बाव । ज्योतिस्वभाव तो जाणा ॥३०॥</p>
<p>
	तें ब्रम्हा सत्य सर्वाधार । जग हें मिथ्या स्वप्नाकार । जया न आद्यंत निर्धार । मध्येंच वसणार कैसें तें ॥३१॥</p>
<p>
	यदर्थ परिश्रम करिती निरक्त । संत संतत जेथें अनुरक्त । मुमुक्षूंचें जें अपेक्षित । जें अभीप्सित साधकां ॥३२॥</p>
<p>
	असेल इच्छा तें ठायीं पडावें । तेणें संतांशीं शरण रिघावें । मग ते वदतील तें तें ऐकावें । समूळ वर्जावें कुतर्का ॥३३॥</p>
<p>
	बांधूनियां मनाची मोट । करूनि बुद्धीचा कडेलोट । होऊनियां नि:संग निपट । लक्षावें नीट गुरुचरणां ॥३४॥</p>
<p>
	कुतर्कांचा करा झाडा । ना तों करितील मार्गांत झगडा । अभिमान पायातळीं रगडा । तरीच पैलतडा पावाल ॥३५॥</p>
<p>
	ये अर्थींची गोड आख्यायिका । बाबा स्वयें वदले ती ऐका । सेवितां गुरुवचनपीयूखा । परम हरिखा पावाल ॥३६॥</p>
<p>
	एकदां आम्ही चौघेजण । वाचूनि पोथीपुस्तक पुराण । करूं लागलों ब्रम्हानिरूपण । ज्ञानसंपन्न होऊनि ॥३७॥</p>
<p>
	‘उद्धरेदात्मनात्मानं’ । हें गीतेचें घेऊनि वचन । अयुक्त सर्वथैव परावलंबन । ऐसें प्रवचन एक करी ॥३८॥</p>
<p>
	तया प्रत्युत्तर करी अन्य । मन स्वाधीन तोचि धन्य । असावें संकल्प - विकल्पशून्य । कांहीं न आपणावीन जगीं ॥३९॥</p>
<p>
	अनित्य सर्व सविकार नित्य एक निर्विकार । म्हणोनि नित्यानित्याविचार । करा निरंतर तिजा वदे ॥४०॥</p>
<p>
	चवथ्या नावडे पुस्तकी ज्ञान । करूं आदरी विहिताचरण । कायावाचा पंचप्राण । करी समर्पण गुरुचरणीं ॥४१॥</p>
<p>
	गुरु परमात्मा चराचर । भरला असे सबह्याभ्यंतर । ऐसा व्हावया निजनिर्धार । निष्टा अपार आवश्यक ॥४२॥</p>
<p>
	अनागमज्ञ केवळ तार्किक । वादोन्मुख आणि चिकित्सक । तयां न स्वप्नींही ज्ञान सम्यक । शुद्ध भाविक पाहिजे ॥४३॥</p>
<p>
	ऐसे आम्ही चौघे सुबुद्धा । निघालों लावूं कांहीं शोध । स्वबुद्धीनेंच व्हावा तो शोध स्वतंत्र निर्वेधमानसें ॥४४॥</p>
<p>
	ऐसी इच्छा तिघांच्या अंतरीं । वनीं विचरतां स्वच्छंद परी । भेटला मार्गांत एक वणजारी । प्रश्न तो करी आम्हांतें ॥४५॥</p>
<p>
	ऊन पडलें आहे प्रखर । प्रयाण किमर्थ आणि कुठवर । चाललों तयास केलें प्रत्युत्तर । वनवनांतर धुंडाया ॥४६॥</p>
<p>
	पुसे आम्हांस तो वणजारी । शोध कशाचा लावितां तरी । आम्ही वदते जाहलों उत्तरीं । गुप्तार्थीं न बरी परिस्फुटता ॥४७॥</p>
<p>
	पाहुनी तयांची धांवाधांव । वणजारियाचा कळवळला जीव । म्हणे वन दुर्गम नकळतां ठाव । स्वेच्छास्वभाव विचरूं नये ॥४८॥</p>
<p>
	रानींवनीं हिंडावयास । सवें घ्यावें वाटाडियास । भर दुपारीं ऐसें साहस । करितां आयास किमर्थ ॥४९॥</p>
<p>
	नका सांगूं गुप्तार्थ परी । बसा खा भाकर तुकडा तरी । पाणी प्या जा तदनंतरीं । राखा सबूरी अंतरीं ॥५०॥</p>
<p>
	आला जरी इतुका काकुळती । आम्ही तैसेच निघालों पुढती । धिक्कारिली तयाची विनंती । थकलों कीं अतीव मार्गांत ॥५१॥</p>
<p>
	आम्ही अवघेच बुद्धिमान । काढूं आपुला मार्ग शोधून । वाटाडियाचेम काय प्रयोजन । होता कीं अभिमान हा पोटीं ॥५२॥</p>
<p>
	परी तें रान अति विस्तीर्ण । विशाल - तुंग विटपीं विकीर्ण । रिघे न जेथें सूर्यकिरण । मार्गक्रमण कैं तेथें ॥५३॥</p>
<p>
	होऊनियां दिशाभूल । भ्रमलों इतस्तत: निष्फल । थोर दैवाचे तेणेंच हें स्थल । मागुती निश्चल पावलों ॥५४॥</p>
<p>
	दैवें लाविलें आल्या वाटे । पुनश्च पूर्वील वणजारी भेटे । म्हणे भरलां वाटतें अव्हाटे । चातुर्य आटे बुद्धीचें ॥५५॥</p>
<p>
	कार्य सान अथवा मोठें । मार्ग दावावया लागे बोटें । शोध न लागे रित्या पोटें । बुद्धीचे फाटे अफाट ॥५६॥</p>
<p>
	असल्यावीण ईश्वरी घाट । मार्गीं होई न कोणाची गांठ । देऊं नये अन्नासी पाठ । वाढिलें ताट डावलूं नये ॥५७॥</p>
<p>
	भाकरतुकडा देई कोण । घे खा म्हणे तयाचें वचन । मानावा पूर्ण शुभशकुन । कार्यनिर्विन्घकारक ॥५८॥</p>
<p>
	करा आतां अल्पाहार । धरा चित्तीं किंचित धीर । परी त्यां रुचेना हा सुविचार । पुनश्च निराहार निघाले ॥५९॥</p>
<p>
	न लावितां शोध कांहीं । अन्नसेवन करणें नाहीं । ऐसें वदून मग ते पाहीं । दुराग्रहीं नाडले ॥६०॥</p>
<p>
	मज लागली होती भूक । तृषेणें कोरड कंथास सोक । वणजारियाचेंही प्रेम अलोलिक । वाटलें कवतुक तयाचें ॥६१॥</p>
<p>
	आम्ही विद्वान मोठे पढीक । दयामाया नाहीं ठाऊक । उष्टया हातें असतां धनिक । हांकिला न काक एकानें ॥६२॥</p>
<p>
	हा तों अविद्वान अनधिकारी । नीच वर्ण ज्ञात वणजारी । परी स्वाभाविक प्रेम अंतरीं । भाजी भाकर खा म्हणे ॥६३॥</p>
<p>
	ऐसें लाभावीण प्रेम । करी जो तोच सुबुद्ध परम । तयाचा आदर हाचि अप्रतिम । विद्योपक्रम वाटला ॥६४॥</p>
<p>
	म्हाणोनियां आदरपूर्वक । वणजारियानें दिधलेला एक । चतकोर खावोनि प्यालों मी उदक । तों काय कौतुक वर्तलें ॥६५॥</p>
<p>
	गुरुराज आले अकल्पित । म्हणती वादावादी किमर्थ । मग निवेदिला इत्थंभूत । वर्तला वृत्तांत तयांस ॥६६॥</p>
<p>
	येतां काय मजसमेत । लावूनि देतों शोध त्वरित । परी जो आदरील मद्वचनार्थ । तयाचाच स्वार्थ फळेल ॥६७॥</p>
<p>
	इतरांनीं तें नाहीं मानिलें । परि म्यां शिरसामान्य केलें । इतर सर्व निघून गेले । मग मज घेतलें गुरुरायें ॥६८॥</p>
<p>
	नेलें एका विहिरीवर । दोन्ही पायांस बांधिला दोर । वरती पाय खालती शिर । पाण्याबरोबर सोडिला ॥६९॥</p>
<p>
	पाण्यास पोहोंचूं नयेत हात । पाणीही जाऊं नये मुखांत । ऐसें मज अलगत लोंबत । सोडिलें विहिरींत गुरुरायें ॥७०॥</p>
<p>
	झाड होतें कांठीं एक । तयास दोरीचें दुसरें टोंक । बांधून गेले गुरुराय नि:शंक । कोणा न ठाऊक कोठें तें ॥७१॥</p>
<p>
	घटका गेल्या दहा बारा । परतले मग ते माघारा । काढोनि बाहेर मज झरझरा । पुसलें कीं बरा आहेस तूं ॥७२॥</p>
<p>
	मग म्यां दिधलें प्रत्युत्तर । होतों अत्यंत आनंदनिर्भर । भोगिलें जें सौख्य अपार । तें काय पामर मी वानूं ॥७३॥</p>
<p>
	परिसतां हें माझें वचन । जाहले गुरुराय सुखसंपन्न । निजहस्त अंगावरी फिरवून । जवळी राहवून घेतलें ॥७४॥</p>
<p>
	सांगतां येती प्रेमाचे उमाळे । मग मज नेलें गुरूनें शाळे । पक्षिणी पिलियां पांखीं कवळे । मजलागीं कळवळे ते रीतीं ॥७५॥</p>
<p>
	काय गो गुरूची शाळा । सुटला जनक - जननींचा लळा । तुटली मोहममतेची शृंखळा । लाधलों अवलीळा भुक्तता ॥७६॥</p>
<p>
	सुटला दुरापाश सगळा । भंगली प्रवृत्ति - प्रतिबंध -  अर्गळा । वाटे या गुरूच्या गळ्यांतचि गळा । घालूनि त्या डोळां वसवावें ॥७७॥</p>
<p>
	तयाचें प्रतिबिंब नसतां डोळां । तो काय शुद्ध मांसाचा गोळा । अथवा त्याहून बरा मी आंधळा । ऐसी ही शाळा मज झाली ॥७८॥</p>
<p>
	लागतां या शाळेस पाय । कोण हतभागी माघारा जाय । माझें घरदार बापमाप । सर्वचि गुरुराय जाहले ॥७९॥</p>
<p>
	इतर इंद्रियें सहितमना । सोडूनियां निजस्थाना । ठेलीं येऊनि एका नयना । ध्यानावधानाकारणें ॥८०॥</p>
<p>
	गुरु एक द्दष्टीचें ध्यान । इतर सर्व गुरूसमान । नाहीं गुरूविण दुजें आन । ‘अनन्य अवधान’ या नांव ॥८१॥</p>
<p>
	करितां गुरूस्वरूपध्यान । कुंठित होय बुद्धिमन । म्हणोनि शेवटीं करावें नमन । नि:शब्द मौन धरोनियां ॥८२॥</p>
<p>
	ना तों ज्ञानार्थ गुरू करावे । शून्य सदुपदेशाच्या नांवें । दक्षिणा देतां वित्ता मुकावें । अनुतापा पावावें परिणामीं ॥८३॥</p>
<p>
	गुह्यज्ञानाची केवळ चावटी । मिरवे प्रांजळपणाची दिवटी । पाजिली दंभें जया बाळगुटी । देईल शेवटीं तो काय ॥८४॥</p>
<p>
	बाह्यात्कारीं मोठा सोंवळा । अंतर्यामीं नाहीं कोंवळा । प्रतीतीच्या नांवें आंवळा । तयाची शाळा निकामी ॥८५॥</p>
<p>
	जेथें शब्दज्ञानाला ऊत । ब्रम्हाज्ञानाची नाहीं प्रचीत । स्वमुखें गुरु निजगरिमा गात । शिष्या निजहित तें कैंचें ॥८६॥</p>
<p>
	जयाचा बोल झोंबेना वर्मीं । साक्षी न पटे अंतर्यामीं । तयाचें गुरुत्व काय कामीं । व्यर्थ रिकामी वटवट ती ॥८७॥</p>
<p>
	असो ऐसी दिधली सेवा । दाविला मज ज्ञानाचा ठेवा । लागला न मज शोध करावा । अर्थ गिंवसावा किंचितही ॥८८॥</p>
<p>
	अर्थजात स्वयें प्रकटलें । अप्रयासीं हातीं चढलें । गुरुकृपेचें ऐसें केलें । शोधणें ठेलें ठायींच ॥८९॥</p>
<p>
	खालीं डोकें वरती पाय । टांगी उफराटें जैं गुरूराय । तैं मज आनंद कैसा होय । समर्थ गुरुमाय जाणाया ॥९०॥</p>
<p>
	संतांघरची उलटीच खूण । हें तों अनुभवजन्य ज्ञान । एथें निष्ठाच एक प्रमाण । एक साधन गुरुकृपा ॥९१॥</p>
<p>
	कर्मठास विधिनिषेधपण । ज्ञानियातें ज्ञानाभिमान । योगियातें दंभाचा शीण । विश्वासावीण चालेना ॥९२॥</p>
<p>
	पंडितांचे गर्वांध डोळे । अभिमानाचे प्रत्यक्ष पुतळे । ज्ञाइया तयास पाहूनि पळे । संगें न मेळे तयांच्या ॥९३॥</p>
<p>
	ज्ञानी वदे माझीयावीण । देव तरी दुसरा कोण । मी तों स्वयेंच ज्ञानसंपन्न । चिद्धन परिपूर्ण तो मीच ॥९४॥</p>
<p>
	भक्त स्वकीय भक्तिभावीं । ज्ञानाची ती प्रौढी न मिरवी । तनुमनधनेंसीं स्वामीसी गोंवी । स्वामीसी निरवी सर्वस्व ॥९५॥</p>
<p>
	ही एक माझी कर्तबगारी । ही मत्सामर्थ्याची थोरी । ही मद्बुद्धिवैभवाची उजरी । नसे ही फुंजरी तयातें ॥९६॥</p>
<p>
	जें जें घडे तें देव घडवी । तोच उतरवी तोच चढवी । तोच लढे अथवा लढवी । कर्ता करवी तो एक ॥९७॥</p>
<p>
	कर्तृत्व ठेवून स्वामीचे माथां । स्वयें स्वीकारी अति नम्रता । भक्ता सदैव देवतंत्रता । नाहीं स्वतंत्रता तयातें ॥९८॥</p>
<p>
	असो हे जे चौघे प्रबुद्ध । करीत होते कशाचा शोध । हें तों येथवर राहिलें मुग्ध । परिसावा उद्बोध तयाचा ॥९९॥</p>
<p>
	हे सर्व कर्मठ घनपाठी । विद्वत्तेची घमंडी पोटीं । करितां शब्दज्ञानाची चावटी । निघाली गोठी देवाची ॥१००॥</p>
<p>
	निजज्ञानाचिया नेटेंपाटें । देव कैसा कोठें राहाटे । आपणां कैसा कवण्या वाटे । युक्तीनें भेटे हा हेत ॥१०१॥</p>
<p>
	प्रबुद्धांमाजी श्रीसाई एक । मूर्तिमंत वैराग्य विवेक । परब्रम्हा स्वयें देख । कां हा अविवेक आलंबिती ॥१०२॥</p>
<p>
	ऐसी श्रोते घेतील आशंका । तरी हालोकसंग्रह देखा । साईसमर्था भक्तोद्धारका । हीनत्व हें कां आणील ॥१०३॥</p>
<p>
	स्वयें आपण असतां अवतारी । वंद्य मानूनियां वणजारी । अन्नब्रम्हा निजानिर्धारीं । सेवूनि थोरी गाइली ॥१०४॥</p>
<p>
	तैसेंच तया जो अवमानी । तयाची कैसी होते हानी । गाइली ही प्रबुद्धांची कहाणी । कोणी न ज्ञानी गुरूविण ॥१०५॥</p>
<p>
	मातृपित्राचार्यानुशासन । यांवीण अशक्य धर्मज्ञान । तेंही सर्व अध्ययनाधीन । विनाअनुष्ठान तें व्यर्थ ॥१०६॥</p>
<p>
	संपादूं लागे आशीर्वचन । होईं मातृवान पितृवान । आणिक होईं आचार्यवान । श्रुतिवचन विश्रुत हें ॥१०७॥</p>
<p>
	या त्रयींचें जें अनुसंधान । अथवा ईज्याध्ययनदान । जन्ममृत्यूंचें व्हावया उल्लंघन । परम साधन हें एक ॥१०८॥</p>
<p>
	हीं सर्व चित्तशुद्धीचीं साधनें । यांवीण आत्मवस्तूचें नाणें । हातीं न चढे ऐसें तें जिणें । व्यर्थ येणें जन्मास ॥१०९॥</p>
<p>
	शरीर इंद्रिय आणि मन । बुद्धिही नेणे करूं आकलन । ऐसें जें आत्मस्वरूप गहन । तयाचें दर्शन गुरुकृपें ॥११०॥</p>
<p>
	जेथें ‘प्रत्यक्ष’ वा ‘अनुमान’ । उभय प्रमाणें अप्रमाण । तया करतलगत आमलकासमान । कोण गुरूविण दावील ॥१११॥</p>
<p>
	धर्म अर्थ तिसरा काम । प्राप्त होतील करितां श्रम । परी चवथा पुरुषार्थ परम । गुरूविण श्रम सर्वथा ॥११२॥</p>
<p>
	या शिर्डीसंताचिया दरबारा । जोशीही येती देती मुजरा । संगती नरदेहाचा होरा । भविष्य थोरां - मोठयांस ॥११३॥</p>
<p>
	धन - धान्य - वैभवभोगी  । राजे रजवाडे आणि जोगी । तडी तापडी रागी विरागी । दर्शनालागीं उत्कंठित ॥११४॥</p>
<p>
	जपी तपी व्रती संन्यासी । यात्रेकरू क्षेत्रनिवासी । गायक नर्तक परिवारेंसीं । येत शिर्डीसी दर्शना ॥११५॥</p>
<p>
	महारही येई जोहारा । या श्रीसाईचिया दरबारा । म्हणे हाचि एक मायबाप खरा । चुकवील येरझारा जन्माच्या ॥११६॥</p>
<p>
	आत्मलिंग जयाचे गळां । विभूति फांसिली जयाचे भाळा । जयाचा कोरान्न भिक्षेवर डोळा । पहावा सोहळा जंगमाचा ॥११७॥</p>
<p>
	मानभाव गारोडी येती । गोंधळी प्रेमें गोंधळ घालिती । भवानीचा जोगवा मागती । अति प्रीती बाबांसी ॥११८॥</p>
<p>
	अंध पंगू कानफाटे । जोगी नानक भाट दिवटे । समर्थ साईंच्या भक्तिपेठे । धांवती मोठे प्रेमानें ॥११९॥</p>
<p>
	डुगडुगे सरोदे पांगूळ । कोल्हाटिणीही करिती खेळ । तेथेंच हा वणजारी प्रेमळ । आला कीं वेळ साधुनी ॥१२०॥</p>
<p>
	धन्य धन्य साईंची आकृती । वैराग्याची ओतीव मूर्ती । निर्विषय नि:संग नि:स्वार्थी । भक्तभावार्थीं अनुपम्य ॥१२१॥</p>
<p>
	असो आतां पूर्वानुसंधान । मुख्य कथेचा धागा धरून । सुरू करूं कीं आख्यान । श्रोतीं अवधान देइंजे ॥१२२॥</p>
<p>
	बाबा न स्वयें उपाशी राहत । कोणासही न राहूं देत । उपोषिताचें न स्वस्थ चित्त । कैंचा परमार्थ तयाचा ॥१२३॥</p>
<p>
	देव न लाधे रित्या पोटीं । आधीं आत्म्याची करा संतुष्टी । या उपदेशाची आणिक गोष्टी । श्रोतयांसाठीं निवेदितों ॥१२४॥</p>
<p>
	भुकेनें ऐन दुपारचे वक्तीं । खालची माती जैं होते वरती । अन्नब्रम्हापदाभिव्यक्ति । उपजते वृत्तीस चित्ताच्या ॥१२५॥</p>
<p>
	अति दुर्धर ऐसी वेळा । तोंडीं न देतां अन्नाचा गोळा । हीनदीन इंद्रियमेळा । विसरे निजकळा सर्वस्वी ॥१२६॥</p>
<p>
	पोटीं नसतां अन्नाचा ओलावा । देव कवण्या डोळां पहावा । कवण्या वाचे महिमा वर्णावा । कर्णें परिसावा तो कवण्या ॥१२७॥</p>
<p>
	सारांश सकल इंद्रियां शक्ति । तरीच घडे देवाची भक्ती । जरी अन्नावीण क्षीणत्वा येती । तरी त्यां न गति परमार्थीं ॥१२८॥</p>
<p>
	अतिभोजन तेंही न हितकर । मितभोजन खरें सुखकर । उपास - अतिरेक भयंकर । असुख निरंतर भोगवी ॥१२९॥</p>
<p>
	एकदां एक बाई शिर्डीस । पत्र घेऊन केळकरांस । आली साईंचे दर्शनास । परम उल्लास मानसीं ॥१३०॥</p>
<p>
	महाराजांचे पायांपाशीं । बसावें तीन दिवस उपवासी । बाईनें निर्धारिलें मानसीं । तिचें तिजपाशींच रहिलें ॥१३१॥</p>
<p>
	बाबांच्या नित्यक्रमानुसार । परमार्थाचा करितां विचार । आधीं कंबरेस बांधावी भाकर । बाईचा निर्धार उफराटा ॥१३२॥</p>
<p>
	जया मनीं देव गिंवसावा । भाकरतुकडा आधीं खावा । असल्यावीण समाधान जीवा । कैसेनि देवा उमगावें ॥१३३॥</p>
<p>
	भुकेल्या पोटीं देव सांपडे । हें तों कल्पांतींही न घडे । उपासतापास यांचें सांकडें । चालेना इकडे साईंसी ॥१३४॥</p>
<p>
	अंत:साक्षी महाराजांसी । होतेंच हें ठावें पूर्वील दिवसीं । आधींच दादा केळकरांपाशीं । होतें कीं भाषित झालेलें ॥१३५॥</p>
<p>
	आतां या शिमग्याच्या सणाशीं । राहतील कां माझीं पोरें उपाशी । कैसें मी राहूं देईन त्यांसी । मग मी कशासी पाहिजे ॥१३६॥</p>
<p>
	साईमुखावाटे बाहेर । पडले नाहींत जों हे उद्नार । तोंच दुसरे दिवशीं तयार । पातली शिरडीवर ही बाई ॥१३७॥</p>
<p>
	उपनांव बाईचें गोखले । उक्त प्रकारें मनीं निर्धारिलें । दादांच्या येथेंच गांठोडें लाविलें  । पत्र दिधलें तयांस ॥१३८॥</p>
<p>
	कानीटकर काशीबाहेर । आप्तसंबंधें पत्र देई । विनवी दादांस लावाया सोई । दर्शनार्थ साईबाबांच्या ॥१३९॥</p>
<p>
	बाई शिरडीस पातल्या । तात्काळ बाबांच्या दर्शना गेल्या । दर्शन होऊन क्षणभर बसल्या । तोंच तयांस उपदेश ॥१४०॥</p>
<p>
	कोणाचें काय अंतर्गत । साईनाथ जाणे समस्त । ऐसें न कांहीं भूमंडळात । नसे जें अवगत तयांस ॥१४१॥</p>
<p>
	‘अन्नमन्नाद’ विष्णुरूप । उपास तापास आणि निर्लेप । निराहार आणि निराप । किमर्थ हा व्याप वाउगा ॥१४२॥</p>
<p>
	काय आवश्यकता आपुल्याला । उपास तापास करावयाला । बाबा आपण होऊन तियेला । ऐसिया बोला बोलले ॥१४३॥</p>
<p>
	जा त्या दादाभटाचे घरीं । खुशाल पुरणाच्या पोळ्या करीं । तयाच्या पोरांबाळांस चारीं । स्वयेंही पोटभरी तूं खाईं ॥१४४॥</p>
<p>
	नवल तो शिमग्यासारिखा सण । बाई येण्याचा योगही विलक्षण । दादांचें कुटुंबही  तत्क्षण । अस्पर्श होऊन बसलेलें ॥१४५॥</p>
<p>
	विराली उपोषणाची उकळी । स्वयंपाकाची आली पाळी । मग ती परम प्रेमसमेळीं । आज्ञा पाळी बाबांची ॥१४६॥</p>
<p>
	चरण बाबांचे अभिवंदून । दादांचिया घरीं जाऊन । पुरणपोळीचें जेवण करून । सर्वांस वाढून जेवली ॥१४७॥</p>
<p>
	काय आख्यायिका ही सुंदर । काय अंतर्गत अर्थोपसंहार । व्हावें ऐसें गुरुवचनीं स्थिर । नाहीं मग उशीर उद्धारा ॥१४८॥</p>
<p>
	ऐशीच एक आणिक कथा । आठवली होती साई समर्थां । कथिली प्रेमें भक्तां समस्तां । सादर श्रोतां परिसिजे ॥१४९॥</p>
<p>
	जया मनीं परमार्थीं आस । तयानें केले पाहिजेत सायास । करूं लागे द्दढ अभ्यास । व्हावें साहसही स्वल्प ॥१५०॥</p>
<p>
	ऐसें हें सत्कथामृत चरणतीर्थ । सेवावें नित्य कल्याणार्थ । होतां संतचरणीं विनीत । होईल पुनीत अंतर ॥१५१॥</p>
<p>
	एकदां मी लहान असतां । फडका बांधोन पोटाभोंवता । धंदा मिळावा निर्वाहापुरता । आणुनि चित्ता निघालों ॥१५२॥</p>
<p>
	चालतां चालतां बीडगांवा । आलों तेथें घेतला विसांवा । फकीराचा माझ्या न्याराच कावा । आनंद जीवा वाटला ॥१५३॥</p>
<p>
	तिकडे मिळालें जरीचें काम । मीही खपलों अविश्रम । फळले ते माझे सकळ श्रम । पहा पराक्रम फकीराचा ॥१५४॥</p>
<p>
	माझ्या आधींच लाविलेले । हुशार हुशार नांवाजलेले । चार पोरांहीं काम केलें । तेंही मापिलें ते समयीं ॥१५५॥</p>
<p>
	एकानें पन्नास रुपयाचें केलें । शंभरांचें दुजियाचें झालें । तिजियाचें दीडशांचें भरलें । माझें सर्वांहुनी द्विगुणित ॥१५६॥</p>
<p>
	पाहूनियां माझी हुशारी । धनी बहु आनंदला अंतरीं । बहुतांपरी मज गौरव करी । प्रेम भारी मजवरी ॥१५७॥</p>
<p>
	मज तयानें पोषाख दिधला । डोईस पागोटें अंगावर शेला । परी मीं तो बांधून ठेविला । जैसा दिधला तैसाच ॥१५८॥</p>
<p>
	कोणाचें देणें कोणास पुरतें । कितीही द्यावें सदा अपुरतें । माझें सरकार जैं देऊं सरतें । न सरतें तें कल्पांतीं ॥१५९॥</p>
<p>
	देणें एक माझ्या सरकारचें । तयासी तुळे काय तें इतरांचे । अमर्यादास मर्यादेचें । भूषण कैंचें असावें ॥१६०॥</p>
<p>
	माझें सरकार न्या न्या वदे । मजलाच जो तो म्हणे दे दे । कोणी न माझ्या बोलासीं लक्ष दे । एकही सुधें ऐकेना ॥१६१॥</p>
<p>
	उतून चालिला आहे खजिना । एकही कोणी गाडया जाणीना । खणा म्हणतां कोणीही खणीना । प्रयत्न कोणा करवेना ॥१६२॥</p>
<p>
	मी म्हणें तो पैका खणावा । गाडयावारीं लुटून न्यावा । खरा माईचा पूत असावा । तेणेंच भरावा भांडार ॥१६३॥</p>
<p>
	आमुची तरी काय गती । मातीची होऊन जाईल माती । वारा जाईल वार्‍याच्या संगती । येईना मागुती हा वेळ ॥१६४॥</p>
<p>
	असो माझिया फकीराची कळा । माझिया भगवानाची लीळा । माझिया सरकाराचा ताळा । लई निराळा न्याराच ॥१६५॥</p>
<p>
	मीही कधींच कोठें जातों । कोणाही ठायीं जाऊन बैसतों । परी हा जीव मायेंत घोंटाळतो । गोते खातो अनिवार ॥१६६॥</p>
<p>
	माया आहे फार कठिण । तिणें केलों मी हीन दीन । माझिया माणसांची रात्रंदिन । घोंकणी करून असतों मी ॥१६७॥</p>
<p>
	‘जो जो जैसें जैसें  करील । तो तो तैसें तैसें भरील’ । ध्यानांत ठेवी जो माझे बोल । सौख्य अमोल पावेल तो ॥१६८॥</p>
<p>
	हेमाड साईंसी शरण । अपूर्व हें कथानिरूपण । साईच स्वयें करी जैं आपण । माझें मीपण फिकें तैं ॥१६९॥</p>
<p>
	तोच या कथेचा निवेदिता । तोच वाचिता तोच परिसता । तोच लिहिता आणि लिहविता । अर्थबोधकताही तोच ॥१७०॥</p>
<p>
	साईच स्वयें नटे ही कथा । तोच इये कथेची रुचिरता । तोच होई श्रोता वक्ता । स्वानंदभोक्ताही तोच ॥१७१॥</p>
<p>
	मग ऐसिया श्रवणाची गोडी । ही काय थोडी परमार्थजोडी । भक्त सभाग्य जे हे सुखपरवडी । आनंद निरवडी भोगिती ॥१७२॥</p>
<p>
	आतां पुढील अध्यायाचें सार । साईंच्या उदीचा महिमा अपार । श्रोते सज्जन पसरितों पदर । होऊनि सादर परिसावा ॥१७३॥</p>
<p>
	हेमाड वदे अति विनीतता । कृपा उपजली साईसमर्था । त्यांनींच वदविलें निजसच्चरिता । कथा रसभरिता अपूर्व ॥१७४॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । गुरुमहिमाबर्णनं नाम द्वात्रिंशतितमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-33-122042600056_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ३३</a></strong></p>
</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 15:16:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 15:42:37 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ३१]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-31-122042600054_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
गताध्यायीं जाहलें कथन । सप्तशृंगीच्या भक्ताचें आख्यान । माधवरावांचा नवसही पूर्ण । साई फेडून घेववीत ॥१॥
कैसें ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 31" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650966340-8058.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra chapter 31" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	गताध्यायीं जाहलें कथन । सप्तशृंगीच्या भक्ताचें आख्यान । माधवरावांचा नवसही पूर्ण । साई फेडून घेववीत ॥१॥</p>
<p>
	कैसें दिधलें स्वप्नीं दर्शन । खुशालशेट रामलालालागून । कैसियापरी घेतलें ठेवूनि । आनिर्वाण रामलालाला ॥२॥</p>
<p>
	त्याहून अपूर्व ही प्रकृत कथा । श्रोतां परिसिजे अति सादरता । संन्यासी एक मानसा जातां । कैसा निजमुक्तता लाधला ॥३॥</p>
<p>
	कैसा मानकर नूलकर मेघा । यांचाही हेतु पुरविला अवघा । हे तर नर परी एका क्रूर वाघा । निजपदीं जागा दीधली ॥४॥</p>
<p>
	कथा आहेत अति विस्तृत । ग्रंथविस्तार होईल बहुत । कथीन संक्षिप्त सारमूत । होईल निजहितसाधक ॥५॥</p>
<p>
	अंतकाळीं जैसी मति । तैसी प्राण्यांस लाभे गति । किडे भीतीनें भ्रमर होती । हरिणप्रीती जडमरत ॥६॥</p>
<p>
	अंतकाळीं जें जें ध्यान । तें तेंच रूपें पुनर्जनन । भगवत्पदीं झालिया लीन । जन्मविहीन होई तो ॥७॥</p>
<p>
	याचकरितां नामस्मरण । लाविला अभ्यास हेंच कारण । प्रसंगीं जावें न गांगरून । अंतीं आठवण रहावी ॥८॥</p>
<p>
	आयुष्यभर जागृत राहिला । अंतकाळीं जरी कां निदेला । तरी तो शेवटीं फुकट गेला । यदर्थ केला सत्संग ॥९॥</p>
<p>
	म्हणूनि जे भक्त भावार्थी । ते झीव निरविती संतांहातीं । कीं ते जाणती गती - निर्गती । अंतींचे सांगाती ते एक ॥१०॥</p>
<p>
	ये अर्थींची गोड कथा । साईंसमोर घडलेली वार्ता । ऐकतां दिसेल श्रोतयां चित्ता । भक्तवत्सलता साईंची ॥११॥</p>
<p>
	कोठें मद्रास कोठें शिरडी । कोठें मानससरोवरदरडी । कैसी भक्तांची भरतां घडी । आणीत ओढीत पायांपाशीं ॥१२॥</p>
<p>
	एकदां एक मद्रासी संन्यासी । विजयानंद नाम जयासी । मद्रासेहून  मानस - सरोवरासी । महदुल्लासीं निघाला ॥१३॥</p>
<p>
	एका जपानी प्रवाशाचा । नकाशा मानस - सरोवराचा । पाहून निश्चय झाला मनाचा । दर्शनाचा उत्कट ॥१४॥</p>
<p>
	वाटेंत लागला शिरडी गांव । कर्णीं पडला बाबांचा प्रमाव । दर्शनाची धरूनि हांव । आले ठाव शोधीत ॥१५॥</p>
<p>
	साईमहाराज मोठे संत । कीर्तिमंत जगविख्यात । ऐकूनि धरिला दर्शनीं हेत । थांबले मार्गांत जातांना ॥१६॥</p>
<p>
	होते तेव्हां शिरडीमाजी । हरिद्वारचे स्वामी सोमदेवजी । उभयतांची भेट सहजीं । भक्तसमाजीं जाहली ॥१७॥</p>
<p>
	तयांस मग संन्यासी पुसती । मानससरोवर तें दूर किती । पांचशें मैल स्वामी म्हणती । गंगोत्रीवरती आहे तें ॥१८॥</p>
<p>
	तेथें बर्फ फारचि पडतें । पन्नास कोसांत भाषा बदलते । भूतान - वासियां शंका येते । परस्थांतें बहु पीडा ॥१९॥</p>
<p>
	स्वामीमुखींचें वर्तमान । परिसोनि संन्यासी खिन्नवदन । जाहलें तयाचें दुश्चित्त मन । चिंतानिमग्न झाला तो ॥२०॥</p>
<p>
	घेतलें साईबाबांचें दर्शन । घातलें पायीं लोटांगण । चित्त झालें सुप्रसन्न । बैसले आसन घालुनी ॥२१॥</p>
<p>
	तों बाबांची खवळली वृत्ति । मग ते तेथील मंडळीस म्हणती । द्या हाकलून या संन्याशाप्रती । नाहीं संगती कामाची ॥२२॥</p>
<p>
	आधीं संन्यासी तो नवा । स्वभाव बाबांचा नाहीं ठावा । जरी खजील झाला जीवा । पहात सेवा बैसला ॥२३॥</p>
<p>
	प्रात:काळींचा दरबार । मशिदींत मंडळी चिकार । भक्रोपचार  पूजासंभार । पाहूनि तो गार झाला ॥२४॥</p>
<p>
	कोणी बाबांचे पाय धूती । पळींत अंगुष्ठतीर्थ घेती । शुद्ध सद्भावें सेवन करिती । नेत्र स्पर्शिती तैं कोणी ॥२५॥</p>
<p>
	कोणी लाविती तयांस गंध । कोणी फांसिती अत्तर सुगंध । ब्राम्हाण - शूद्रादि जातिनिर्बंध । गेले संबंध विसरूनि ॥२६॥</p>
<p>
	बाबा जरी भरले रागें । संन्यासी उचंबळला  अनुरागें । तयाचें पाऊल न निघे मागें । बैसल्या जागें उठेना ॥२७॥</p>
<p>
	राहिला शिरडींत दोन दिवस । इतुक्यांत पत्र आलें तयास । अत्यवस्थ माता गांवास । तेणें उदास तो झाला ॥२८॥</p>
<p>
	आईस भेटावें आलें मनीं । परत जावें स्वदेशालागुनी । परी न बाबांचे आज्ञेवांचुनी । पाऊल तेथूनि काढवे ॥२९॥</p>
<p>
	मग तें पत्र घेऊनि हातीं । संन्यासी गेला मशिदीप्रती । बाबांस करूं लागला विनंती । मातेची स्थिती निवेदुनी ॥३०॥</p>
<p>
	महाराज साई समर्था । मनीं मातेच्या भेटीची आस्था । आज्ञा दीजे प्रसन्नचित्ता । मज मार्गस्था कृपा करीं ॥३१॥</p>
<p>
	धांवोनि लागला बाबांचे चरणीं । होईल कीं आज्ञा कृपा करुनी । माता प्राण कंठीं धरुनी  । असेल धरणीं खिळलेली ॥३२॥</p>
<p>
	असेल पाहत माझी वाट । घेऊं द्या मज द्दष्टिभेत । होतील तिचे सह्य कष्ट । सुखें शेवट होईल ॥३३॥</p>
<p>
	साई समर्थ अंतर्ज्ञानी । त्याचेंच आयुष्य सरलें जाणुनी । वदती काय तयालागुनी । चित्त देउनी तें परिसा ॥३४॥</p>
<p>
	होता इतुका मातेचा लळा । तरी कां हा वेष स्वीकारिला । साजेना ममत्व या वेषाला । कलंक भगव्याला लाविला ॥३५॥</p>
<p>
	जा बैस त्वां व्हावें न उदास । जाऊं दे कीं थोडे दिवस । करूं मग पुढील विचारास । धीर त्वां चित्तास धरावा ॥३६॥</p>
<p>
	वाडयांत असती बहुत चोर । कवाडें लावोनि रहावें हुशार । सर्वस्वाचा करितील अपहार । घाला अनिवार घालितील ॥३७॥</p>
<p>
	वैभव कधींही नव्हे शाश्वत । शरीर हें तों सर्वदा अनित्य । जाणूनि मृत्यु नित्य सन्निहित । धर्म जागृत ठेवावा ॥३८॥</p>
<p>
	देहस्त्रीपुत्रादिकीं । अहंममाभिमान जो लोकीं । तत्प्रयुक्त तापत्रिकीं । अनर्थ ऐहिकी या नांव ॥३९॥</p>
<p>
	दुजा अनर्थ आमुष्मिक । जन जे जे परलोककामुक । परलोकही मोक्षप्रतिबंधक । अधोमुख सर्वदा ॥४०॥</p>
<p>
	तेथें नाहीं पुण्योपचय । तेथील प्राप्ति नाहीं निर्भय । क्षीणपुण्यें पतनभय । आहे नि:संशय तेथेंही ॥४१॥</p>
<p>
	तरी हे ऐहिक - आमुष्मिक । उभयही भोग अनर्थावहक । तयांचा त्याग  नि:शेख । आद्योत्पादक आनंदा ॥४२॥</p>
<p>
	संसारास जे जे विटले । अढळ हरिपदीं जे जे विनटले । तयांचा बंधाचें बिरडेंच फिटलें । धरणें उठलें अविद्येचें ॥४३॥</p>
<p>
	हरिभजनस्मरणाची घडी । पाप ताप दैन्य दवडी । ध्यानासी आणितां बहु आवडी । संकटीं उडी घाली तो ॥४४॥</p>
<p>
	तुझी पूर्वपुण्याई गहन । तेणेंच आलासि हा ठाव ठाकून । आतां मद्वचनीं द्यावें अवधान । करूनि घे साधन जीवाचें ॥४५॥</p>
<p>
	उद्यांपासून भागवताचें । परिशीलन करावें साचें । तीन सप्ताह त्या ग्रंथाचे । कायावाचामनें करीं ॥४६॥</p>
<p>
	होऊनियां निर्वासन । करीं त्या ग्रंथाचें श्रवण । अथवा मनोभावें वाचन । निदिध्यासनतत्पर ॥४७॥</p>
<p>
	प्रसन्न होईल भगवंत । सर्व दु:खांचा करील अंत । होईल मायामोह शांत । सौख्य अत्यंत लाभेल ॥४८॥</p>
<p>
	होऊनियां शुचिर्भूत । ठेवुनी हरिचरणीं चित्त । संपादीं हें साङ्ग व्रत । मोहनिर्पुक्त होशील ॥४९॥</p>
<p>
	आला निकट स्वदेहा अपाय । पाहूनि बाबांनीं हाच उपाय । योजिला वाचविला रामविजय । जेणें मृत्युंजय संतुष्टे ॥५०॥</p>
<p>
	दुसरे दिवशीं प्रात:काळीं । सारोनि मुखमार्जन अंघोळी । वाहूनि बाबांस पुष्पांजुळी । चरणधुळी वंदिली ॥५१॥</p>
<p>
	बगलेस मारिलें भागवत । पाहिजे वाचावयास एकांत । लेंडीस्थान मौजेचें शांत । पडलें पसंत तयांसी ॥५२॥</p>
<p>
	गेले बैसले घालूनि आसन । सुरू केलें पारायण । संन्यासीच ते भगवत्परायण । केले संपूर्ण दोन सप्ते ॥५३॥</p>
<p>
	करूं घेतां तिसरा सप्ता । वाटली एकाएकीं अस्वस्थता । वाढूं लागली अशक्तता । टाकिला अपुरता तैसाच ॥५४॥</p>
<p>
	आला वाडियांत परतोन । काढिले कष्टें दिवस दोन । उजाडतां तिसरा दिन । बुवांनीं नयन झांकिले ॥५५॥</p>
<p>
	ठेवूनियां निजशिर । फकीर बाबांचे मांडीवर । संन्यासी झाला तेथें स्थिर । मुक्तशरीर विदेही ॥५६॥</p>
<p>
	संन्याशाचें देहावसान । होतां बाबांस निवेदन । जाहलें तयांचें आज्ञापन । देह दिनभर ठेवावा ॥५७॥</p>
<p>
	इतुक्यांत टाकूं नका पुरून । होईल त्याचें पुनर्जीवन । लोकांनीं बहु आशा धरून । केलें रक्षण देहाचें ॥५८॥</p>
<p>
	गेला एकदां प्राण निघून । तो काय ये मागें परतोन । परी बाबांचा शब्द प्रमाण । देहाचें जतन तें केलें ॥५९॥</p>
<p>
	परिणामीं तें फळा आलें । निवारसी प्रेत रक्षितें गेलें । पोलिसांचे संशय फिटले । जीवन कसलें मेल्याचें ॥६०॥</p>
<p>
	हें काय बाबांस नव्हतें ठावें । कीं मेलेलें कैसें उठवावें । हेतु न योग्य चौकशीअभावें । भुईंत दाटावें त्या प्रेता ॥६१॥</p>
<p>
	निवारसीचा राजा धणी । चौकशी करी आकस्मिक मरणीं । व्हावी न आधींच प्रेताची दाटणी । म्हणोन बतावणी बाबांची ॥६२॥</p>
<p>
	असो पुढें हें सर्व झालें । यथाविधि प्रेत तें संस्कारिलें । योग्य स्थळीं मग तें पुरलें । कार्य उरकलें संताचें ॥६३॥</p>
<p>
	ऐसीच आणीक एक वार्ता । श्रोतयांलागीं कथितों आतां । परिसा क्षणभर सादर चित्ता । दिसेल व्यापकता साईंची ॥६४॥</p>
<p>
	भक्त एक बाळाराम । मानकर जयाचें उपनाम । होते बाबांचे भक्त परम । गृहस्थाश्रम करून ॥६५॥</p>
<p>
	परी पुढें तयांची भार्या । पंचत्व पावूनि आश्रमकार्या । व्यत्यय आला अंतरले स्थैर्या । परमैश्वर्या ते चढले ॥६६॥</p>
<p>
	पूर्वार्जित फलप्राप्ति । लाधली साईचरणसंगती । जडली तेथें निश्चल भक्ति । पूर्ण विरक्ति संसारीं ॥६७॥</p>
<p>
	आशापाश मुलें बाळें । तोडूनियां हे बंध सगळे । पहा मानकर दैवाआगळे । संसारावेगळे जाहले ॥६८॥</p>
<p>
	परमार्थद्वाराची अर्गळा । परसेवेची मोहनमाळा । घालूनियां निजपुत्रांचे गळां । ऐहिका टाळा दीधला ॥६९॥</p>
<p>
	हाही एक जातीचा संन्यास । संन्यासाच्या परी बहुवस । परी जों नव्हे ज्ञानगर्भन्यास । उपजवी त्रास पदोपदीं ॥७०॥</p>
<p>
	म्हणून हा साई उदारमूर्ति । मानकरांची अनन्यभक्ति । कृपा करावी आलें चित्तीं । केली विरक्ती द्दढ त्यांची ॥७१॥</p>
<p>
	अनंत जन्मींचें संस्कारपटल । चंचल मन राहीना अचल । मनोराज्याचे तरंग प्रबळ । वैराग्य अढळ ठरेना ॥७२॥</p>
<p>
	शिरडीच नव्हे माझें स्थान । मी तों देशकालानवच्छिन्न । दावावया हें सप्रमाण । करीत आज्ञापन मानकरां ॥७३॥</p>
<p>
	पुरे झाली आतां शिरडी । ही घे खर्चीं बारा रोकडी । तपार्थ जाईं मच्छिंदरगडीं । सुखनिरवडीं वस तेथें ॥७४॥</p>
<p>
	परिसूनि ऐसें साईवचन । आज्ञा करूनि शिरसा वंदन । घालूनि साष्टांग लोटांग लोटांगण । केलें अभिवंदन पायांचें ॥७५॥</p>
<p>
	होऊनियां अति विनीत । वदे बाळाराम साईंप्रत । नाहीं आपुलें दर्शन जेथ । काय म्यां तेथ करावें ॥७६॥</p>
<p>
	येथें नित्य पायांचे दर्शन । घडे चरणतीर्थसेवन । होई अहर्निश सह्जीं चिंतन । तेथें मी अकिंचन एकला ॥७७॥</p>
<p>
	तरी बाबा आपणांविरहित । काय तेथें माझें स्वहित । हें आकळाया नाहीं मी समर्थ । धाडितां मज किमर्थ ते स्थानीं ॥७८॥</p>
<p>
	परी न भक्तें धरावा अल्प । निजगुरुवचनीं ऐसा विकल्प । तात्काळ मनांत उठला संकल्प । निर्विकल्प मानकर ॥७९॥</p>
<p>
	म्हणे बाबा क्षमा कीजे । क्षुद्रबुद्धीचे विचार माझे । झालों शंकित तेणें मी लाजें । शंका न साजे ही मज ॥८०॥</p>
<p>
	मी तों आपुला आज्ञाघर । राहून नामस्मरणतत्पर । केवळ आपुल्या सामर्थ्यावर । गडावरही राहीन ॥८१॥</p>
<p>
	तेथेंही करीन आपुलें ध्यान । आपुल्या कृपामूर्तीची आठवण । आपुल्याच पायांचें चिंतन । हेंचि निरंतर तप माझें ॥८२॥</p>
<p>
	अनन्य - शरण मी तुम्हांप्रती । माझी गमनागमनस्थिती । दिधली असतां तुम्हां हातीं । हा कां चित्तीं विचार ॥८३॥</p>
<p>
	तावज्ञेची निजसत्ता । तेथेंही मनास देईल शांतता । ऐसी तुमची असतां समर्थता । व्यर्थ कां चिंता बाहूं मी ॥८४॥</p>
<p>
	साईसमर्थ ब्रम्हा सनातन । ब्रम्हालिखित तयांचें वचन । पाहील जो विश्वास ठेवून । घेईल पूर्ण अनुभव तो ॥८५॥</p>
<p>
	मग बाबा वदती तयासी । सावधान होऊनि मनासीं । परिस गा तूं मद्वचनासी । विकल्यासायासीं पडूं नको ॥८६॥</p>
<p>
	जाईं मच्छिंदरगडीं सत्वर । करीं प्रत्यहीं तप त्रिवार । कांहीं काळ क्रमिल्यावर । स्वानंदनिर्भर होसील ॥८७॥</p>
<p>
	ऐकतां ऐसें आश्वासन । मानकरांसी पडलें मौन । पुढें मी काय बोलूं दीन । गडाभिगमन आरंभीं ॥८८॥</p>
<p>
	पुनश्च लागोनि साईचरणा । पावोनि उदी प्रसादासीर्वचना । मग मानकर स्वस्थमना । मच्छिंदरभुवना निघाले ॥८९॥</p>
<p>
	ठाकोनियां तें रम्य स्थान । जेथें शुद्ध निर्मळ जीवन । मंद मंद वाहे पवन । समाधान पावले ॥९०॥</p>
<p>
	ऐसे मानकर साईप्रयुक्त । असतां गडावर साईवियुक्त । आचरिते झाले तप यथोक्त । यथानियुक्त राहूनि तैं ॥९१॥</p>
<p>
	पहा बाबांचा चमत्कार । तपनिमग्न असतां मानकर । प्रत्यक्ष दिधलें दर्शन गडावर । झाला साक्षात्कार तयांस ॥९२॥</p>
<p>
	होईल दर्शन समाधिस्था । यदर्थीं कांहीं नाहीं आश्चर्यता । परी आसनस्थित उत्थानावस्था । असतां श्रीसमर्था देखिलें ॥९३॥</p>
<p>
	नाहीं केवळ द्दष्टी देखिलें । बाळकरामें समक्ष पुसलें । कां मज बाबा येथें धाडिलें । काय दिधलें प्रत्युत्तर ॥९४॥</p>
<p>
	“शिरडींत असतां अनेक कल्पना । उठूं लागले तरंग नाना । म्हणोनि तुझिया चंचल मना । गडप्रयाणा नेमियलें ॥९५॥</p>
<p>
	पृथ्वी - आपादिकांच्या गारा । रचोनि रचियेल्या या अगारा । साडेतीन हातांचिया घरा । शिरडीबाहेरा नव्हतों तुज ॥९६॥</p>
<p>
	आतां जो येथें तोच कीं तेथें । पाहूनि घेईं स्वस्थचित्तें । तेथूनि जें म्यां पाठविलें तूतें । तें येच निमित्तें तूं जाण” ॥९७॥</p>
<p>
	असो पुढें हे मानकर । उद्दिष्ट काळ क्रमिल्यावर । यावया आपुल्या मुक्कामावर । सोडिला मच्छिंदरगड त्यांनीं ॥९८॥</p>
<p>
	वांद्रें ग्राम वसतिस्थान । यावें तेथें जाहलें मन । दादरपर्यंत पुण्हाहून । योजिलें प्रयाण अग्निरथें ॥९९॥</p>
<p>
	गेले पुणाचे स्टेशनावर । येतां तिकीट घेण्याचा अवसर । होतां खिडकीपाशीं सादर । वर्तला चमत्कार तंव एक ॥१००॥</p>
<p>
	लंगोटी एक कटिप्रदेशीं । खांदां कांबळी कुणबी वेषीं । ऐसा एक अनोळखी प्रवासी । खिडकीपाशीं देखिला ॥१०१॥</p>
<p>
	घेऊनि दादरचें तिकीट । कुणबी मागें फिरे जों नीट । बालकरामाची द्दष्टाद्दष्ट । होतांचि निकट पातला ॥१०२॥</p>
<p>
	म्हणे तुम्ही कोठें जातं । ‘दादरास’ बाळकराम वदतां । तिकीट देऊनि टाकिलें तत्त्वतां । म्हणे हें आतां तुम्ही घ्या ॥१०३॥</p>
<p>
	मीही जाणार होतों तेथें । परी महत्कार्यांतर येथें । कर्तव्य आहे आठवलें मातें । म्हणून जाणें तें राहिलें ॥१०४॥</p>
<p>
	वेंचितांही गांठीचे दाम । तिकीट मिळविणें कठीण काम । तें जैं लाधे अविश्रम । संतोष परम मानकरां ॥१०५॥</p>
<p>
	पुढें तें मोल चुकवावयाला । खिशांतून जों पैका काढिला । तोंच तो कुणवी दाटींत घुसला । कोठें निसटला कळेना ॥१०६॥</p>
<p>
	तेव्हां तो कुणबी शोधावयाला । बाळकरामें प्रयत्न वेंचिला । परी तो सर्व निष्फळ गेला । येऊनि ठेला अग्निरथ ॥१०७॥</p>
<p>
	नाहीं जोडा वहाण पायीं । फटकूर एक वेष्टिलें डोई । कांबळ लंगोटी लावी । कुणबी भाई हा कोण ॥१०८॥</p>
<p>
	भाडें नाहीं थोंडे थोडकें । तेंही देऊनि पल्लवचें रोकडें । कां मज आभाराचें सांकडें । घातलें हें कोडें नुलगडे ॥१०९॥</p>
<p>
	उदार आणि निरपेक्ष स्वांतीं  । ऐसा हा कोण कुणबी वरकांती । राहून गेलें अनिश्चित अंतीं । लागली खंती मानकरां ॥११०॥</p>
<p>
	तैसेच मग ते आश्चर्यचकित । धरोनि भेटीचा पोटीं हेत । अग्निरथ जागेचा हालेपर्यंत । ठेले तटस्थ द्वारांत ॥१११॥</p>
<p>
	पुढें जेव्हां गाडी सुटली । समूळ भेटीची आशा खुंटली । जाणून गाडीची खीळ पकडिली  । उडी मारिली गाडींत ॥११२॥</p>
<p>
	गडावरील प्रत्यक्ष गांठ । तैसाच इकडे हा निराळा घाट । पाहून कुणब्याचा विचित्र थाट । लागली चुटपुट मानकरां ॥११३॥</p>
<p>
	असो पुढें हे सद्भक्त । साईपदीं पूर्णानुरक्त । द्दढ श्रद्धा भक्तिसंयुत । जाहले कृतार्थ शिरडींत ॥११४॥</p>
<p>
	साईसंलग्नपदाब्जरजीं । साईनामाची घालीत रुंजी । भक्त - भ्रमर बालकरामजी । शिरडीमाजींच राहिले ॥११५॥</p>
<p>
	घेऊनि बाबांचें अनुज्ञापन । मुक्तारामजी सवें घेऊन । कधीं कधीं हे शिरडी सोडून । करीत भ्रमण बाहेर ॥११६॥</p>
<p>
	परी शिरडी केंद्रस्थान । वेळोवेळीं येत परतोन । अखेर जाहलें देहविसर्जन । परम पावन शिरडींत ॥११७॥</p>
<p>
	धन्य पूर्वकृत भागधेय । होऊनि साईंचा द्दष्टिविषय । लागून तयां पायीं लय । मरण निर्भय पावे जो ॥११८॥</p>
<p>
	धन्य तात्यासाहेब नूलकर । धन्य मेघा भक्तप्रवर । अंतीं शिरडींत भजनतत्पर । जिंहीं कलेवर विसर्जिले ॥११९॥</p>
<p>
	मेघा जेव्हां पावला पंचत्व । पहा तैं रत्तरविधानमहत्त्व । आणीक बाबांचें भक्तसख्यत्व । मेघा तो कृतकृत्य आधींच ॥१२०॥</p>
<p>
	सवें  घेऊन भक्त समस्त । स्मशानयात्रेस गेले ग्रामस्थ । बाबाही गेले स्मशानाप्रत । पुष्पें वर्षत मेघावर ॥१२१॥</p>
<p>
	होतां मेघाचें उत्तरविधान  । बाबाही झाले साश्रुलोचन । मायानुवर्ती मानवासमान । शोकनिर्विण्ण मानस ॥१२२॥</p>
<p>
	प्रेमें बाबांनीं जिजकरें । प्रेत आच्छादिलें सुमननिकरें । शोकही करूनि करुणस्वरें । मग ते माघारे परतले ॥१२३॥</p>
<p>
	मानवांचा उद्धार करिती । ऐसे संत देखिले बहुतीं । परी साईबाबांची ती महती । वर्णन किती करावी ॥१२४॥</p>
<p>
	व्याघ्रासारिखा क्रूर प्राणी । तो काय मनुष्यापरी ज्ञानी । परी तोही लागे तयांचे चरणीं । अघटित करणी बाबांची ॥१२५॥</p>
<p>
	ये अर्थींची रम्य कथा । परिसा नीट देऊनि चित्ता । मग कळेल बाबांची व्यापकता । समचित्तता सकळिकीं ॥१२६॥</p>
<p>
	शिरडीस एकदां चमत्कार झाला । असतां सप्त दिन निर्याणाला । गाडा एक बैलांचा आला । राहिला उभा द्वारांत ॥१२७॥</p>
<p>
	वरी एक व्याघ्र प्रचंड । गळां जयाचे साखळदंड । जखडून टाकिला उदंड । भेसूर तोंड मागिलीकडे ॥१२८॥</p>
<p>
	त्याला कांहीं होती व्यथा । दरवेशी थकले उपाय करितां । संतदर्शनोपाय सरता । मानला चित्ता तयांचे ॥१२९॥</p>
<p>
	होते ते दरवेशी तीन । तो व्याघ्र त्यांच्या जीविकेचें साधन । गांवोगांवीं खेळ करून । करिती गुजराण आपुली ॥१३०॥</p>
<p>
	फिरतां फिरतां त्या बाजूला । कर्णीं आली बाबांची लीला । म्हणती दर्शन घेऊं चला । वाघही नेऊं ते ठायीं ॥१३१॥</p>
<p>
	चरण तयांचे चिंतामणी । अष्टसिद्धी लोटांगणीं । नवनिधी येती लोळणीं । घेती पायवणी तयांचें ॥१३२॥</p>
<p>
	माथा ठेवूं तयां चरणीं । दुवा मागूं व्याघ्रालागुनी । संतांच्या आशीर्वादवचनीं । कल्याण होईल सर्वांचें ॥१३३॥</p>
<p>
	एतदर्थ ते दरवेशी । व्याघ्रास उतरविती द्वारापाशीं । घट्ट धरूनि साखळदंडासी । तिष्ठत द्वारासीं राहिले ॥१३४॥</p>
<p>
	आधींच हिंस्र भयानक मस्त । वरी होता तो रोगग्रस्त । तेणें तो अत्यंत अस्वस्थ । कौतुक समस्त पाहती ॥१३५॥</p>
<p>
	व्याघ्राची स्थिती बाबांचे कानीं । घातली समग्र दरवेशांनीं । बाबांची आधीं संमति मिळवुनी । आले परतोनी दाराशीं ॥१३६॥</p>
<p>
	साखळदंड द्दढ कसिती । तोडून न पळे ऐसें करिती । मग त्यास सांभाळूनि आणिती । साईप्रती समोर ॥१३७॥</p>
<p>
	पाहोनि साई तेजोराशी । व्याघ्र येतांच पायरीपासीं । नकळे काय दचकला मानसीं । अत्यादरेंसीं अधोमुख ॥१३८॥</p>
<p>
	काय पहा चमत्कार । होतां परस्पर नजरानजर । व्याघ्र चढतांच पायरीवर । प्रेमपुर:सर निरीक्षी ॥१३९॥</p>
<p>
	लगेच पुच्छाचा गोंडा फुलविला । त्रिवार धरित्रीं प्रहार केला । साईचरणीं देह ठेविला । विकळ पडला निश्चेष्ट ॥१४०॥</p>
<p>
	एकदांच भयंकर डरकला । तात्काळ ठायींच पंचत्व पावला । जन सकळ विस्मयापन्न झाला । व्याघ्र निमाला पाहूनि ॥१४१॥</p>
<p>
	एकेपरी दरवेशी खिन्न । पुनश्च तेच दिसले प्रसन्न । कीं रोगग्रस्त आसन्नमरण। प्राणी निर्वाण पावला ॥१४२॥</p>
<p>
	साधुसंतांचे द्दष्टीसमोर । प्राणोत्क्रमणीं पुण्य थोर । कृमि कीटक वा व्याघ्र । पाप समग्र तो तरला ॥१४३॥</p>
<p>
	कांहीं मागील जन्माचा ऋणी । फेडिलें ऋण झाला अनृणी । देह ठेविला साईचरणीं । अघटित करणी विधीची ॥१४४॥</p>
<p>
	ठेवितां संतपदीं डोई । जया प्राणिया मरण येई । सवेंच तो उद्धरोनि जाई । हीच कमाई जन्माची ॥१४५॥</p>
<p>
	असल्यावीण भाग्याचा थोर । संतांचिया द्दष्टीसमोर । पडेल काय उगाच शरीर । होईल उद्धार तयाचा ॥१४६॥</p>
<p>
	साधूंचिया द्दष्टीसन्मुख  । देह ठेवितां परमसुख । पीतां विख होय पीय़ूख । मरणाचा हरिख ना दु:ख ॥१४७॥</p>
<p>
	द्दष्टीपुधें संतचरण । असतां जया प्राणिया मरण । धन्य देह तो कृष्णार्पण । पुनर्जनन नाहीं त्या ॥१४८॥</p>
<p>
	संतांचिया द्दष्टीसन्मुख । मरण नव्हे तें वैकुंठसुख । जिंकिला तेणें मृत्युलोक । न पुनर्भव शोक तया ॥१४९॥</p>
<p>
	संतांचेखतां देह त्यागिती । तयां नाहीं पुनरावृत्ति । तीच सर्व पापांची निष्कृती । उद्धारगती पावला ॥१५०॥</p>
<p>
	आनखाग्र संतावलोकन । करितां करितां जें देहपतन । तया काय म्हणावें मरण । निजोद्धरण तें साचें ॥१५१॥</p>
<p>
	पाहूं जातां पूर्वविधान । कोणी तरी हा पुण्यवान । मिरवूं जातां विद्याभिमान । पावला अवमान हरिभक्त ॥१५२॥</p>
<p>
	तयाचिया शापापासुनी । पावला ही क्रूर योनी । उ:शापयोगें लागला चरणीं । अभिनव करणी भक्तांची ॥१५३॥</p>
<p>
	वाटे जाहला त्या उ:शाप । साईदर्शनें जळलें पाप । तुटले बंध सरले ताप । झाला आपाय उद्धार ॥१५४॥</p>
<p>
	पूर्ण सभाग्य असल्यावीण । कैंचें संतद्दष्टीपुढें मरण । त्रिताप त्रिपुटी त्रिगुण मर्दन । होऊनि निर्गुण ठाकला ॥१५५॥</p>
<p>
	ऐसा पूर्वकर्मानुबंध । सुटला क्रूरदेहसंबंध । तुटला लोहशृंखलाबंध । ईश्वरी निर्बंध हा एक ॥१५६॥</p>
<p>
	साधुतांच्या चरणांपरती । इतरत्र कोठें उद्धारगती । ती लाधतों या व्याघ्राप्रती । प्रसन्न चित्तीं दरवेशी ॥१५७॥</p>
<p>
	व्याघ्र तयांचें चरितार्थसाधन । व्याघ्र तयांचें कुटुंबपोषण । तया व्याघ्राला येतां मरण । खिन्नवदन दरवेशी ॥१५८॥</p>
<p>
	दरवेशी महाराजांस पुसती । आतां पुढें कैसी गती । कैसी द्यावी मूठमाती । लावा सद्नति निजहस्तें ॥१५९॥</p>
<p>
	महाराज म्हणती न करा खंत । येथेंच होता तयाचा अंत । तोडी मोठा पुण्यवंत । सौख्य अत्यंत पावला ॥१६०॥</p>
<p>
	त्या तक्क्याचे पलीकडे । शंकराचें देऊळ जिकडे । नेऊन त्याला पुरा तिकडे । नंदीनिकट द्या गती ॥१६१॥</p>
<p>
	पुरलिया तेथें तयाप्रती । लाधेल तोही सद्नती । ॠणनिर्मुक्ति बंधमुक्ति । तुमचिया हस्तीं पावेल ॥१६२॥</p>
<p>
	गतजन्मींचा देणेदार । फेडावया ऋण हा अवतार । तुमचिया बंधनीं साचार । तो आजवर राहिला ॥१६३॥</p>
<p>
	दरवेशी मग उचलून तयासी । जाते जाहले देउळापाशीं । नंदीचिया पश्चात्प्रदेशीं । तया खांचेशीं दाटिती ॥१६४॥</p>
<p>
	काय तरी चमत्कार वहिला । व्याघ्र तात्काळ कैसा निमाला । प्रकार इतुकाचि असता घडला । विसर पडला असता कीं ॥१६५॥</p>
<p>
	परी येथूनि सातवेच दिनीं । बाबांनीं देह ठेविला धरणीं । तेणें ही आठवण वरचेवर मनीं । उचंबळोनी येतसे ॥१६६॥</p>
<p>
	पुढील अध्याय याहून गोड । बाबांहीं वर्णिलें निजगुरुचें कोड । पुरविली गोखलेबाईंची होड । अनुग्रह जोड देउनी ॥१६७॥</p>
<p>
	हेमाड साईनाथांसी शरण । गुरुहस्तें कूपीं उफराटें टांगवून । कैसा बाबांनीं कृपा संपादन । केली तें श्रवण करावें ॥१६८॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । दर्शनमहिमा नाम एकत्रिंशतितमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 15:14:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 15:41:55 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ३०]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-30-122042600050_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
ॐ नमो जी साई सदया । भक्तवत्सला करुणालया । दर्शनें वारिसी भक्तभवभया । नेसी विलया आपदा ॥१॥
आरंभीं वसती निर्गुणीं । ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 30" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650963767-7225.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra chapter 30" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	ॐ नमो जी साई सदया । भक्तवत्सला करुणालया । दर्शनें वारिसी भक्तभवभया । नेसी विलया आपदा ॥१॥</p>
<p>
	आरंभीं वसती निर्गुणीं । तों तूं भक्तभावांचिया गुणीं । ओवूनि आणिलासी सगुणीं । संतचूडामणी साईनाथा ॥२॥</p>
<p>
	निजभक्तोद्धारणकार्य । संतां सर्वदा अपरिहार्य । तूं तर संतवृंदाचा आचार्य । तुजसीही अनिवार्य तें आहे ॥३॥</p>
<p>
	जिंहीं धरिलें तव चरणद्वय । पावले सकळ किल्मिष लय । जाहला पूर्वसंस्कारोदय । मार्ग निर्भय निष्कंटक ॥४॥</p>
<p>
	आठवूनियां आपुले चरण । येती महातीर्थींचे ब्राम्हाण । करिती गायत्रीपुरश्वरण । पोथीपुराण वाचिती ॥५॥</p>
<p>
	संस्कारहीन अल्पशक्ति । काय आम्ही जाणूं भक्ति । टाकिलें जरी आम्हां समस्तीं । साई न देती अंतर ॥६॥</p>
<p>
	जयावरी ते कृपा करिती । अचित्य महाशक्ति पावती । आत्मानात्मविवेकसंपत्ति । सवेंचि प्राप्ति ज्ञानाची ॥७॥</p>
<p>
	साईमुखवचनलालसे । भक्तजन होऊनि पिसे । शब्दशब्दांचे जोढूनि ठसे । पाहत भरंवसे प्रतीति ॥८॥</p>
<p>
	निजभक्तांचा मनोरथ । जाणे संपूर्ण साईनाथ । पुरविताही तोच समर्थ । तेणेंचि कृतार्थ तद्भक्त ॥९॥</p>
<p>
	धांव पाव गा साईनाथा । ठेवितों तुझिया चरणीं माथा । विसरोनियां अपराधां समस्तां । निवारीं चिंता दासाची ॥१०॥</p>
<p>
	ऐसा संकटीं गांजितां । भक्त स्मरे जो साईनाथा । तयाचिया उद्विग्न चित्ता । शांतिदाता तो एक ॥११॥</p>
<p>
	ऐसे साई दयासागर । कृपा करिते झाले मजवर ॥ तेणेंच वाचकां झाला हा सादर । ग्रंथ मंगलकारक ॥१२॥</p>
<p>
	नातरी माझा काय अधिकार । कोण हें कार्य घेता शिरावर । ज्याचा तोच निरविता असल्यावर । कायसा भार मजवरता ॥१३॥</p>
<p>
	असतां मद्वाचाप्रकाशाक । साई समर्थ ज्ञानदीपक । अज्ञानतमविध्वंसक । किमर्थ साशंक असावें ॥१४॥</p>
<p>
	त्या दयाघन प्रभूचा भरंवसा । तेणें न वाटला श्रम अणुमात्रसा । पुरला माझे मनींचा धिंवसा । कृपाप्रसाद हा त्याचा ॥१५॥</p>
<p>
	ही ग्रंथरूपी संतसेवा । माझ्या पूर्वपुण्याईचा ठेवा । गोड करूनि घेतली देवा । धन्य दैवाचा तेणें मी ॥१६॥</p>
<p>
	गताध्यायीं जाहलें श्रवण । नानापरीचे द्दष्टान्त देऊन । कैसें भक्तांस बोधप्रदान । साई दयाघन करीत ते ॥१७॥</p>
<p>
	आतां प्रकृतध्यायींही एक । सप्तशृंगी देवीचे उपासक । तयांचें हें गोड कथानक । आनंददायक परिसिंजे ॥१८॥</p>
<p>
	देवदेवी निजभक्तांप्रती । कैसे निरविती संतांहातीं । ही तरी एक चमत्कृती । सादर चित्तीं अवलोका ॥१९॥</p>
<p>
	महाराजांच्या कथा बहुत । एकाहूनि एक अद्भुत । हीही कथा श्रवणोचित । सावचित्त परिसावी ॥२०॥</p>
<p>
	कथा नव्हे हें अमृतपान । येणें पावाल समाधान । कळोन येईल साईंचें महिमान । व्यापकपणही तैसेंच ॥२१॥</p>
<p>
	चिकित्सक आणि तर्कवादी । इंहीं न लागावें यांच्या नादीं । येथें नाहीं वादावादी । प्रेम निरवधी पाहिजे ॥२२॥</p>
<p>
	ज्ञानी असून व्हावा भाविक । श्रद्धाशील विश्वासूक । किंवा संतांघरींचा पाईक ।  इतरां या माईक काहण्या ॥२३॥</p>
<p>
	हा साईलीलाकल्पतरु । निर्विकल्प फलपुष्पधरू । असेल भक्त भाग्याचा सधरु । तोचि उतारू ये तळीं ॥२४॥</p>
<p>
	ऐका हो कथा परम पावनी । परमार्थियां मोक्षदानी । सकळ साधनां पोटीं मुखरणी । कृतकल्याणी सकळिकां ॥२५॥</p>
<p>
	सहजें  जडजीवोद्धारण । तें हें साईकथामृतपान । प्रापंचिकांचें समाधान । मोक्षसाधन मुमुक्षुवां ॥२६॥</p>
<p>
	करितां एक कल्पना एथ । पावे आणीक कल्पनातीत । म्हणोन हेमाड होऊनि विनीत । श्रोतयां पालवीत श्रवणार्थ ॥२७॥</p>
<p>
	ऐसी एकेक कथा कथितां । वाढेल लीलारसास्वादता । होईल समाधान भवदवार्ता । साईसमर्थता ती हीच ॥२८॥</p>
<p>
	जिल्हा नाशीक ग्राम वणी । काकाजी वैद्य नामक कोणी । असती तेथें वास्तव्य करुनी । उपाध्यें ते स्थानीं देवीचे ॥२९॥</p>
<p>
	देवीचें नाम सप्तशृंगी । उपाध्ये अस्थिर अंतरंगीं । अनेक दुर्धर आपत्तिप्रसंगीं । संसारसंगीं गांजले ॥३०॥</p>
<p>
	येतां कालचक्राचा फेर । मन हें भोंवे जैसा भोंवरा । देहही धांवे सैरावैरा । शांति क्षणभरा लाधेला ॥३१॥</p>
<p>
	तेणें काकाजी अति दु:खित । जाऊनियां देवळाआंत । देवीपाशीं करुणा भाकीत । चिंताविरहित व्हावया ॥३२॥</p>
<p>
	मनोभावें केला धांवा । देवीही तुष्टली पाहूनि भावा । तेच रात्रीं द्दष्टांत व्हावा । श्रोतीं परिसावा नवलावा ॥३३॥</p>
<p>
	देवी सप्तशृंगी आई । काकाजीच्या स्वप्नीं येई । म्हणे तूं बाबांपाशीं जाईं । मन होईल सुस्थिर ॥३४॥</p>
<p>
	हे बाबा कोठील कवण । करील देवी स्पष्टीकरण । म्हणवून काका जैं उत्कंठित मन । नयनोन्मीलन पावले ॥३५॥</p>
<p>
	जिज्ञासा ती तैसीच राहिली । स्वप्नवृत्ति तात्काळ मावळली । काकाजीनें बुद्धि चालविली । ‘बाबा’ जे वदली ते कोण ॥३६॥</p>
<p>
	असतील ‘बाबा’ त्र्यंबकेश्वर । काकाजी - मनीं हाच निर्धार । निघाले घेतलें दर्शन सत्वर । राहीना अस्थिरता मनाची ॥३७॥</p>
<p>
	काकाजीनें दहा दिवस । त्र्यंबकेश्वरीं केला वास । अखेरपर्यंत राहिला उदास । मनोल्लास लाधेना ॥३८॥</p>
<p>
	जाईना मनाची दुश्चित्तता । शमेना तयाची चंचलता । दिवसेंदिवस वाढे उद्विग्नता । निघाला मागुता काकाजी ॥३९॥</p>
<p>
	नित्य प्रात:स्नान करी । रुद्रावर्तन लिंगावरी । संतत धार अभिषेक धरी । परी अंतरीं अस्थिर ॥४०॥</p>
<p>
	पुनश्च जाऊनि देवीद्वारीं । वदे कां धाडिलें त्र्यंबकेश्वरीं । आतां तरी मज स्थिर करीं । या येरझारी नको गे ॥४१॥</p>
<p>
	एणेंपरी अति काकुळती । धांवा करी तो देवीप्रती । देवी त्या दर्शन दे रातीं । वदे द्दष्टान्तीं तयातें ॥४२॥</p>
<p>
	म्हणे मी जे बाबा वदत । ते शिरडीचे साई समर्थ । त्र्यंबकेश्वरीं गमन किमर्थ । केलें कां निरर्थक कळेना ॥४३॥</p>
<p>
	कोठें शिरडी कैसें जावें । बाबा हे न आपणा ठावे । आतां हें जाणें कैसें घडावें । नकळे व्हावें कैसें कीं ॥४४॥</p>
<p>
	परी जो संतचरणीं रत । मनीं धरी दर्शनहेत । संतचि काय परी अनंत । सदिच्छा पुरवीत तयाची ॥४५॥</p>
<p>
	जो जो  संत तो तो अनंत । नसे लवलेश उभयांत  । किंबहुना उभय मानणें हेंचि द्वैत । संतां अद्वैत अनंतीं ॥४६॥</p>
<p>
	चालून जाईन संतदर्शना । स्वेच्छा पुरवीन मनींची कामना । ही तों केवळ अभिमान - वल्गना । अघटित घटना संतांची ॥४७॥</p>
<p>
	विना आलिया संतांच्या मना । कोण जाईल तयांचे दर्शना । आश्चर्य तयांच्या सत्तेविना  । पान हालेना वृक्षाचें ॥४८॥</p>
<p>
	जैसी जयाची दर्शनोत्कंठा । जैसा भाव जैसी निष्ठा । सानंदानुभव पराकाष्ठा । भक्तश्रेष्ठा लाधते ॥४९॥</p>
<p>
	कैसें जावें साईदर्शना । इकडे काकाजीस ही विवंचना । तिकडे तयांचा शोधीत ठिकाणा । पातला पाहुणा शिरडीचा ॥५०॥</p>
<p>
	पाहुणा तरी काय सामान्य । अवघ्यांपरीस जो बाबांस मान्य । जयाच्या प्रेमास तुळेना अन्य । अधिकारही धन्य जयाचा ॥५१॥</p>
<p>
	माधवराव  नामाभिधान । देशपांडेपणाचें वतन । बाबांपाशीं अति लडिवाळपण । चालेना आन कवणाचें ॥५२॥</p>
<p>
	सदा सर्वदा पेमाचें भांडण । अरेतुरेचें एकेरी भाषण । पोटच्या पोरासम प्रेम विलक्षण । पातला तत्क्षण वणीस ॥५३॥</p>
<p>
	बाळास जंव जाहलें दुखणें । आईनें देवीस घातलें गार्‍हाणें । तुझ्या ओटींत घातलें हें ताहें । तारणें मारणें तुजकडे ॥५४॥</p>
<p>
	बाळ माझें बरें होतां । चरणांवरी घालीन तत्त्वतां । एणेंपरी देवीस नवसितां । लाधली आरामता बाळास ॥५५॥</p>
<p>
	वैद्य काय देव काय । कार्य उरकतां विसर होय । वोपत्कालींच नवसाची सय । पावे जंव भय न फेडितां ॥५६॥</p>
<p>
	कित्येक वर्षें महिनें दिवस । लोटले विसरले केलेला नवस । अंतीं मातेनें अंतसमयास । माधवरावांस विनविलें ॥५७॥</p>
<p>
	बहुतां वर्षांचा हा नवस । फेडतां फेडतां आले हे दिवस । बरवी न दीर्घसूत्रता बहुवस । जाईं गा दर्शनास देवीच्या ॥५८॥</p>
<p>
	तैसेंच मातेच्या दोनी स्तनांस । खांडकें पडूनि त्रासली असोस । होऊनियां बहु दु;सह क्लेश । आणीकही देवीस नवसिलें ॥५९॥</p>
<p>
	येतें माते लोटांगणीं । तारिसील जरी या यातनांतुनी । रौप्य - स्तनद्वय तुजवरुनी । ओवाळूनि वाहीन ॥६०॥</p>
<p>
	तोही नवस राहिला होता । फेडूं फेडूं म्हणतां म्हणतां । तोही आठवला मातेच्या चित्ता । देहावसानता - समयास ॥६१॥</p>
<p>
	देऊनि बब्यास याचीही आठवण । फेडीन म्हणून घेऊनि वचन । माता होऊनियां निर्वासन । गेली समरसोन हरिचरणीं ॥६२॥</p>
<p>
	पुढें मग जाऊं जाऊं म्हणतां । दिवस महिने वर्षें लोटतां । माधवरावांस जाहली विस्मरणता । नवस फेडितां रहिले ॥६३॥</p>
<p>
	एणेंपरी वर्षें तीस । होतां काय घडलें शिर्डीस । ज्योतिषी एक करीत प्रवास । त्याच स्थानास पातला ॥६४॥</p>
<p>
	ज्योतिर्विद्येचें ज्ञान गहन । जाणे भूत - भविष्य - वर्तमान । अनेक जिज्ञासु तृप्त करून । वाहवा मिळवून राहिला ॥६५॥</p>
<p>
	श्रीमंत केशवरावजी बुट्टी । आदिकरूनि बहुतांच्या गोष्टी । वर्तवूनि सकळांची संतुष्टी । उठाउठी संपादिली ॥६६॥</p>
<p>
	माधवरावांचा कनिष्ठ भ्राता । बापाजी आपुलें भविष्य पुसतां  । ज्योतिषी तो जाहला वर्तविता । देवीची अप्रसन्नता तयावर ॥६७॥</p>
<p>
	म्हणे मातेनें केलेले नवस । तिच्या देहांताचिया समयास । तिणें तुझिया ज्येष्ठ बंधूस । फेडावयास आज्ञापिलें ॥६८॥</p>
<p>
	ते न फेडितां आजवरी । नडा देते देवी भारी । माधवराव येतां घरीं । बापाजी सारी कथी कथा ॥६९॥</p>
<p>
	माधवरावांस पटली खूण । सुवर्णकार आमंत्रून । करविले दोन रौष्य - स्तन । गेले कीं घेऊन मशीदीं ॥७०॥</p>
<p>
	घालूनि बाबांस लोटांगण । पुढें ठेवून दोनी स्तन । वदते झाले बाबांलागून । म्हणती घ्या फेडून ते नवस ॥७१॥</p>
<p>
	तूंच आमुची सप्तशृंगी । तूंच देवी आम्हांलागीं । ही घे वाचादत्त देणगी । घेऊनि उगी रहावें ॥७२॥</p>
<p>
	बाबा वदती प्रत्युत्तरीं । जाऊनि सप्तशृंगीच्या मंदिरीं । वाहें तिचीं तीस चरणांवरी । स्तनें हीं साजिरीं निजहस्तें ॥७३॥</p>
<p>
	पडतां ऐसा बाबांचा आग्रह । माधवरावांच्या मनाचाही ग्रह । तैसाच होऊनि सोडिलें गृह । जाहला निग्रह दर्शनाचा ॥७४॥</p>
<p>
	घेतलें बाबांचें दर्शन । प्रार्थिलें शुभ आशीर्वचन । करोनि उदी - प्रसाद ग्रहण । अनुज्ञा घेऊन निघाले ॥७५॥</p>
<p>
	आले पहा ते सप्तशृंगीस । लागले कुलोपाध्याय शोधावयास । सुदैवें काकाजीचेच गृहास । अनायास प्राप्त ते ॥७६॥</p>
<p>
	काकाजीच्या उत्कंठा पोटीं । शीघ्र व्हावी बाबांची भेटी । तोंच ही माधवरावांची गांठी । हे काय गोठी सामान्य ॥७७॥</p>
<p>
	आपण कोण कोठील पुसतां । शिर्डीहूनचि आले समजतां । काय त्या आनंदा पारावारता । पडली उभयतां मिठीच ॥७८॥</p>
<p>
	ऐसे ते दोघे प्रसन्नचित्त । साईलीला गात गात । पूर्ण होतां नवसकृत्य । उपाध्ये निघत शिरडीतें ॥७९॥</p>
<p>
	माधवरावांसारखी सोबत । तीही लाधली ऐसी अकल्पित । उपाध्येबुवा आनंदभरित । मार्ग लक्षीत शिरडीचा ॥८०॥</p>
<p>
	नवस फिटतां शीघ्रगतीं । दोघे पातले शिरडीप्रती । येतांच साईदर्शना निघती । परमप्रीतीं सोत्कंठ ॥८१॥</p>
<p>
	आधीं जैसी मनाची आवडी । तैसाच पाउलीं निघाले तातडीं । पातले काकाजी गोदेथडीं । जेथून शिरडी सन्निध ॥८२॥</p>
<p>
	पुजारी वंदी बाबांचे चरण । करीत सजलनयनीं स्नपन । होऊनि दर्शनसुखसंपन्न । चित्त प्रसन्न जाहलें ॥८३॥</p>
<p>
	देवीचा द्दष्टान्त होता यदर्थ । द्दष्टी देखतां ते बाबा समर्थ । काकाजी सुखावले यथार्थ । पुरला मनोरथ तयांचा ॥८४॥</p>
<p>
	असो काकाजी सुखसंपन्न । दर्शनसेवनें चित्त प्रसन्न । जाहले खरेंच निश्चिंत मन । कृपाघन वर्षणें ॥८५॥</p>
<p>
	हरपलें मनाचें चंचलपण । स्वयें जहाले विस्मयापन्न । आपणांसचि पुसती आपण । काय विलक्षण ही करणी ॥८६॥</p>
<p>
	नाहीं कांहीं वदले बचन । नाहीं प्रश्न - समाधान । नाहीं दिधलें आशीर्वचन । केवळ दर्शन सुखदाई ॥८७॥</p>
<p>
	माझी चंचल चित्तवृत्ति । केवळ दर्शनें पावली निवृत्ति । लाधली अलौकिक सुखसंवित्ति । ‘दर्शनमहती’ या नांव ॥८८॥</p>
<p>
	साईपायीं जडली  द्दष्टी । तेणें वाचेस पडली मिठी । कर्णीं परिसतां बाबांच्या गोष्टी । आनंद पोटीं न समाये ॥८९॥</p>
<p>
	उपाध्येबुवा निजभावेंसीं । शरण गेले समर्थांसीं । पावते झाले निजसुखासी । विसरले वृत्तीसी पूर्वील ॥९०॥</p>
<p>
	ऐसे काकाजी बारा दिवस । राह्ते झाले तैं शिरडीस । होऊनियां सुस्थिरमानस । सप्तशृंगीस परतले ॥९१॥</p>
<p>
	स्वप्नांसही लागे काळा । उष:काळ वा प्रात:काळ । तेव्हां जीं पडती तीं तींच सफळ । स्वप्नें निर्फळ तदितर ॥९२॥</p>
<p>
	ऐसी सार्वत्रिक प्रसिद्धी । परी या शिरडीच्या स्वप्नांची सिद्धी । पडोत तीं कुंठें आणि कधीं । भक्तां अबाधित अनुभव ॥९३॥</p>
<p>
	ये अर्थींची अल्प वार्ता । सादर करितों श्रोतयांकरितां । कौतुक वाटेल परम चित्त । श्रवणोल्लासता वाढेल ॥९४॥</p>
<p>
	दोनप्रहरीं एके दिवशीं । बाबा वदती दीक्षितांपाशीं । टांगा घेऊन जा रहात्यासी । खुशाल - भाऊंसी घेऊन ये ॥९५॥</p>
<p>
	जाहले कीं दिवस बहुत । भेटावयाची मनीं आर्त । म्हणावें बाबांनीं तुम्हांप्रत । भेटीप्रीत्यर्थ बोलाविलें ॥९६॥</p>
<p>
	करूनियां आज्ञाभिवंद । दीक्षित गेले टांगा घेऊन । खुशालभाऊ भेटले तत्क्षण । निवेदिलें प्रयोजन आगमनाचें ॥९७॥</p>
<p>
	ऐकूनियां बाबांचा निरोप । खुशालभाऊंस आश्चर्य अमूप । म्हणती हाच उठलों घेऊन झोंप । झोंपेंत आज्ञापत हेंचि मज ॥९८॥</p>
<p>
	आतांच मी दुपारा जेवुनी । करीत असतां आराम शयनीं । डोळ्यास डोळा लागतांक्षणीं । बाबाही स्वप्नीं हेंच वदत ॥९९॥</p>
<p>
	म्हणाले आतांच शिरडीस चल । माझीही इच्छा जाहली प्रबळ । करूं काय घोडें न जवळ । मुलास कळवाया धाडिलें ॥१००॥</p>
<p>
	मुलगा वेशीच्या बाहेर पडला । तोंच हा आपुला टांगा आला । दीक्षित विनोदें म्हणती तयाला  । तदर्थच मजला आज्ञापिलें ॥१०१॥</p>
<p>
	आतां स्वयें येत असलां तर । टांगा बाहेर आहे तयार । मग ते शिर्डीस आनंदनिर्भर । दीक्षितांबरोबर पातले ॥१०२॥</p>
<p>
	तात्पर्य खुशालभाऊ भेटले । बाबांचेही मनोरथ पुरले । खुशालभाऊही बहु गहिंवरले । पाहून या लीलेस बाबांच्या ॥१०३॥</p>
<p>
	एकदां एक पंजाबी ब्राम्हाण । रामलाल नामाभिधान । मुंबईमध्यें वसतां जाण । बाबांनीं स्वप्न दिलें तया ॥१०४॥</p>
<p>
	दिङ - वायु - रवि - वरुणादि देवता । यांच्या अनुग्रहाचिया सत्ता । बाह्यांत:करण - विषयग्राहकता । जागरितता त्या नांव ॥१०५॥</p>
<p>
	विरमे जंव सकल इंद्रियगण । होई जाग्रत्संस्कारप्रबोधन । ग्राह्यग्राहकरूपें स्फुरण । असें हें लक्षण स्वप्नाचें ॥१०६॥</p>
<p>
	त्याचें स्वप्न तों विलक्षण । ठावें न बाबांचें रूपलक्षण । पूर्वीं कधीं नाहीं दर्शन । ‘मजकडे येऊन जा’ म्हणत ॥१०७॥</p>
<p>
	आकृतीवरून दिसले महंत । परी न ठावें ते कोठें वसत । रामलाल होऊन जागृत । विचाराकुलित जाहला ॥१०८॥</p>
<p>
	जावें ऐसें वाटलें मना । पत्ता नाहीं ठावठिकाणा । परी जो तयासी बोलावी दर्शना । तयाची रचना तो जाणे ॥१०९॥</p>
<p>
	मग तेच दिवशीं दुपारीं । सहज रस्त्यानें मारितां फेरी । छबी एके दुकानावरी । पाहूनि अंतरीं चमकला ॥११०॥</p>
<p>
	स्वप्नीं जें रूप दिसलें तयाला । तेंच तें गमलें रामलालाला । विचारपूस कराया लागला । दुकानदाराला तात्काळ ॥१११॥</p>
<p>
	लक्ष लावून छबी पाहे । कोण कोठील आहेत हो हे । कळतां हा अई शिरडींत आहे । स्वस्थ राहे रामलाल ॥११२॥</p>
<p>
	पुढील पत्ता पुढें लागला । रामलाल शिरडीस गेला । बाबांचिया निर्वाणकाला  - । पर्यंत राहिला त्यांपाशीं ॥११३॥</p>
<p>
	आपुल्या भक्तांचे पुरवावे हेत । आणावें तयांस दर्शनार्थ । पुरवावे स्वार्थ वा परमार्थ । हेचि मनोरथ बाबांचे ॥११४॥</p>
<p>
	नातरी ते अवाप्तकाम । स्वयें सर्वदा निष्काम । नि:स्वार्थ निरहंकार निर्मम । भक्तकामैक - अवतार ॥११५॥</p>
<p>
	क्रोध ज्याचा घेई न वारा । द्वेषास जेथें न लभे थारा । डोळां न देखे जो उदरंभरा । साधु खरा तो समजावा ॥११६॥</p>
<p>
	सर्वांठायीं प्रेम नि:स्वार्थ । हाच ज्याचा परमपुरुषार्थ । वेंची न धर्मविषयाव्यतिरिक्त । वाचा ही व्यर्थ पळभरी ॥११७॥</p>
<p>
	सारांश माझा धरूनि हात । लिहवून घेतां हें निजचरित । भक्तीं व्हावें निजस्मरणरत । हेंचि कीं इंगित येथील ॥११८॥</p>
<p>
	म्हणवूनि हेमाड अति विनीत  । नित्य श्रोतयां हेंचि विनवीत । होऊनि श्रद्धाभक्तिसमन्वित । साईसच्चरित परिसावें ॥११९॥</p>
<p>
	तेणें मनास होईल शांती । उपजेल व्यसनमग्ना उपरती । जडेल साईचरणीं भक्ती । भवनिर्मुक्तिदायक ॥१२०॥</p>
<p>
	असो पुढील अध्यायीं आतां । संन्यासी विजयानंदाची कथा । जयास मानस - सरासी जातां । लाधली निर्मुक्तता निजपदीं ॥१२१॥</p>
<p>
	भक्त मानकर बाळाराम । तयाही तैसाच दिधला विश्राच । तोच नूलकर - मेघांचा काम । पुरवी प्रकाम साईनाथ ॥१२२॥</p>
<p>
	व्याघ्रासारखा क्रूर प्राणी । तयाही दिधला ठाव चरणीं । ऐसी अगाध साईंची करणी । श्रवणा पर्वणी - महोत्सव ॥१२३॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । नवसादिथाकथनं नाम त्रिंशतितमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 14:31:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 15:41:23 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय २९]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-29-122042600048_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
गताध्यायीं जाहलें कथन । त्याहूनि या अध्यायीं श्रवण । करवितों श्रीचें अतर्क्य विंदान । कथानुसंधान एकचि ॥१॥]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 29" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650963503-24.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra chapter 29" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	गताध्यायीं जाहलें कथन । त्याहूनि या अध्यायीं श्रवण । करवितों श्रीचें अतर्क्य विंदान । कथानुसंधान एकचि ॥१॥</p>
<p>
	ऐकून बाबांची अगाध लीला । इसवी सन एकूणीसशें सोळा । ते वर्षीं एक भजनी मेळा । शिरडीस आला दर्शनार्थ ॥२॥</p>
<p>
	मंडळी ही सर्व प्रवासी । कीर्ति परिसिली मद्रदेशीं । जात असतां काशीयात्रेसी । वाटेंत शिरडीसी उतरली ॥३॥</p>
<p>
	साईबाबा महासंत । धीर उदार आणि दान्त । यात्रेकरूंसी कृपावंत । पैसे अत्यंत वांटिती ॥४॥</p>
<p>
	दिडक्या चवल्या हाताचा कीस । अधेल्या - पावल्यांचा पाऊस । रुपये दहा कोणास वीस । कोणास पन्नास ते देत ॥५॥</p>
<p>
	हें काय सणासुदा दिसीं । कार्यविशेषीं कां पर्वकाळासी । प्रतिदिवशीं उक्त प्रमाणेंसीं । संतोषेंसीं अर्पीत ॥६॥</p>
<p>
	पहूड येती भवय्ये नाचती । गवय्ये गाती भाट वानिती । तमासगीर मुजरे देती । भजनीं रंगती हरिभक्त ॥७॥</p>
<p>
	ऐसे महाराज उदारवृत्ति । दानधर्मीं सढळ स्थिति । ऐकूनि कर्णोपकर्णीं ही कीर्ति । इच्छा धरिती दर्शनाची ॥८॥</p>
<p>
	कधीं आलिया बाबांचे चित्तीं । पांथस्थांतेंही पैसे वांटिती । दीनादुबळ्यांचा परामर्ष घेती । कृपामूर्ति साईनाथ ॥९॥</p>
<p>
	पुरुष एक बाया तीन । मेळा अवघा चौघांमिळून । मेहुणी स्वस्त्री दुहिता आपण । संतदर्शनकामुक ॥१०॥</p>
<p>
	घेऊइ साईंचें दर्शन । मंडळी पावली समाधान । करीत साईंपाशीं । अनुदिन । प्रेमळ भजन नेमानें ॥११॥</p>
<p>
	सांप्रदाय रामदासी । भजन करीत अति उल्हासीं । बाबाही रुपया आठ आणे तयांसी । आलिया मनासी अर्पीत ॥१२॥</p>
<p>
	कधीं तयास बर्फी देत । कधीं परतवीत रिक्तहस्त । बाबांचें हें ऐसें सदोदित । परी न निश्चित कांहींही ॥१३॥</p>
<p>
	पैसे वांटीत हें तों सत्य । नव्हतें यांत कांहींही असत्य । परी ते नव्हते सर्वांस देत । धर्म न करीत सर्वांतें ॥१५॥</p>
<p>
	जयाची लाभकाळाची घडी । तयासीच ही सुखपरवडी । संतहस्तस्पर्शाची कवडी । लाभेल जोडी भाग्याची ॥१६॥</p>
<p>
	ये अर्थींची  एक गोष्ट । ऐकतां श्रोते होतील संतुष्ट । करूनि तयांपुढें ती प्रविष्ट । धरूं मग वाट पुढील ॥१७॥</p>
<p>
	होऊनि प्रात:काळची न्याहारी । बैसतां बाबा स्तंभाशेजारीं । धुनीसंनिध मशिदीमाझारीं । येतसे पोरी अमनी तैं ॥१८॥</p>
<p>
	पोरी तीन वर्षांची नागडी । हातीं जिनतानी डबी उघडी । आई - जमलीसह तांतडी । येतसे ती घडी साधूनि ॥१९॥</p>
<p>
	अमनी बैसे मांडीवरी । डबी देई बाबांचे करीं । ‘बाबा रुपय्या रुपय्या’ करी । हात धरी बाबांचा ॥२०॥</p>
<p>
	बाबांस मुलांचें वेड भारी । पोरही होती गोंडस साजिरी । मुके घेत कुरवाळीत करीं । पोरीस धरीत पोटाशीं ॥२१॥</p>
<p>
	बाबांनीं धरावें पोटाशीं । अमनीचें चित्त रुपयापाशीं । ‘बाबा देना देना मजशीं’ । म्हणे खिशाशीं लक्ष सारें ॥२२॥</p>
<p>
	अमनीचा तों पोरस्वभाव । थोरामोठयांही तीच हांव । स्वार्थासाठींच धांवाधांव । परमार्थीं भाव एकाद्या ॥२३॥</p>
<p>
	पोरीनें बसावें मांडीवरी । आईनें दूर कठयाबाहेरी । हालूं नको देत तोंवरी । खुणावी पोरीस दुरूनि ॥२४॥</p>
<p>
	“तुझ्या बापाचें मी काय लागें । उठली ती सुटली माझ्या मागें । फुकटखाऊ मेले निलागे” । म्हणावें रागें बाबांनीं ॥२५॥</p>
<p>
	परी हा राग बाह्यात्कारीं । अंतरीं प्रेमाच्या उसळती लहरी । हस्त घालूनि खिशाभीतरीं । रुपया बाहेरी काढावा ॥२६॥</p>
<p>
	घालूनियां तो डबींत घट्टा । झांकितां आवाज होई जों खट्ट । डबी हातीं पडतां ती झट्टा । घराची वाट धरीतसे ॥२७॥</p>
<p>
	हें तो होई न्याहारीवक्तीं । तैसेंच जंव ते लेंडीवर निघती । तेव्हांही अमनीस रुपय्या देती । रागें भरती तैसेंचि ॥२८॥</p>
<p>
	ऐसें प्रति दिनीं दोन तिजला । सहा देत त्या जमलीला । पांच दादा केळकरांला । भाग्या सुंदरीला दोन दोन ॥२९॥</p>
<p>
	दहा ते पंधरा तात्याबासी । पंधरा ते पन्नास फकीरबाबांसी । आठ वांटिती गोरगरीबांसी । नित्यनेमेंसीं हें देणें ॥३०॥</p>
<p>
	असो ऐसी ही दानशीलता । मद्रासियांनीं ऐकोनि वार्ता । सहज उपजोनि अर्थस्वार्थता । भजनोपक्रमता मांडिली ॥३१॥</p>
<p>
	बाह्यत: तें भजन सुंदर । अंतरीं द्रव्याचा लोभ दुर्धर । पैसे देतात या आशेवर । राहिले सपरिवार शिरडींत ॥३२॥</p>
<p>
	त्यांतून तिघांस मोठी हाव । बाबांनीं द्यावें बहुत द्रव्य । परी साईपदीं । भजन - सद्भाव । हा एक निजभाव स्त्रियेचा ॥३३॥</p>
<p>
	पाहूनियां मेघा समोर । आनंदें एक नाचेल मोर । चंद्रालागीं जैसा चकोर । तैसाच आदर तियेचा ॥३४॥</p>
<p>
	एकदां माध्यान्हींची आरती । चालतां साई कृपामूर्ति  । पाहूनि बाईची सद्भावस्थिति । दर्शन देती रामरूपें ॥३५॥</p>
<p>
	इतरांस नित्याचे साईनाथ । बाईच्या द्दष्टी जानकीकांत । डोळां घळघळ अश्रु स्रवत  । पाहोनि विस्मित जन झाले ॥३६॥</p>
<p>
	दोहीं हातीं वाजवी टाळी । सवेंच नयनीं असुवें ढाळी । देखून हें अपूर्व ते वेळीं । जाहली मंडळी विस्मित ॥३७॥</p>
<p>
	ऐसा पाहोनि तो देखावा । जिज्ञासा जाहली सकळांचे जीवा । इतुका प्रेमाचा पूर कां लोटावा । आनंद व्हावा तियेसचि कां ॥३८॥</p>
<p>
	पुढें स्वपतीस तिसरे प्रहरीं । आपण होऊन आनंदनिर्भरीं । रामदर्शन - नवलपरी । वदे आचरित साईंचें ॥३९॥</p>
<p>
	नीलोत्पलदलश्याम । भक्तकामकल्पद्रुम । तो हा भरताग्रज सीताभिराम । दाशरथी राम मज दिसला ॥४०॥</p>
<p>
	किरीटकुंडलमंडित । वनमालाविराजित । पीतवास चतुर्हस्त । जानकीनाथ मज दिसला ॥४१॥</p>
<p>
	शंख - चक्र - गदाधर । श्रीवत्सलांछन कौस्तुभहार । तो हा पुरुषोत्तम परात्पर । रूपमनोहर देखिला ॥४२॥</p>
<p>
	म्हणे हा मानवरूपधारी  । असामान्य लीलावतारी । जानकीजीवन मनोहारी । धनुर्धारी मज दिसला ॥४३॥</p>
<p>
	फकीर दिसो हा बाह्यात्कारीं । भिक्षाही मागो दारोदारीं । जानकीजीवन मनोहारी । धनुर्धारी मज दिसला ॥४४॥</p>
<p>
	असो हा अवलिया उपराउपरीं । कोणास कैसाही दिसो अंतरीं । जानकीजीवन मनोहारी । धनुर्धारी मज दिसला ॥४५॥</p>
<p>
	बाई मोठी परमभावार्थी । पति तियेचा अत्यंत स्वार्थी । ऐसीच भोळी स्त्रियांची जाती । कैंचा रघुपति ये स्थळीं ॥४६॥</p>
<p>
	मनीं वसे जैसें जैसें । भोळ्या भाविकां आभासे तैसें । आम्हां सकळां साई दिसे । हिलाच कैसें रामरूप ॥४७॥</p>
<p>
	ऐसे कुतर्क करुनी नाना । केली तियेची अवहेलना । विषाद नाहीं बाईच्या मना । असत्य कल्पना ती नेणे ॥४८॥</p>
<p>
	ती पूर्वीं मोठी अधिकारी । अशी तियेची आख्या भारी । होतसे रामदर्शन सुखकारी । प्रहरोप्रहरीं तियेस ॥४९॥</p>
<p>
	पुढें जाह्ला द्रव्यलूमोद्भ । द्रव्यापाशीं नाहीं देव । जाहला रामदर्शनीं अभाव । ऐसा हा स्वभाव लोभाचा ॥५०॥</p>
<p>
	साईंस हें तों सर्व अवगत । जाणूनि तिचें सरलें दुरित । पुनरपि रामदर्शन देत । पुरवीत हेत तियेचा ॥५१॥</p>
<p>
	असो पुढें तेच रात्रीं । कैसी वर्तली नवलपरी । गृहस्थ देखे निद्रेमाझारीं । स्वप्न भारी भयंकर ॥५२॥</p>
<p>
	आपण आहोंत एका शहरीं । पोलीस एक आपणा घरी । मुसक्या बांधून आंवळी करकरी । टोकें निजकरीं मागे उभा ॥५३॥</p>
<p>
	तेथेंच एक पिंजरा ते जागीं । निकट तयाचिया ब्राह्यभागीं । साईही सर्व पहावयालागीं । उभेच कीं उगी निश्चळ ॥५४॥</p>
<p>
	पाहूनि महाराज संनिधानीं । जोडूनियां दोनी पाणी । करोनियां मुख केविलवाणी । दीनवाणी तंव वदे  ॥५५॥</p>
<p>
	बाबा आपुली कीर्ति ऐकुनी । पातलों असतां आपुले चरणीं । प्रसंग हा कां आम्हां - लागुनी । तुम्हीही असूनि प्रत्यक्ष ॥५६॥</p>
<p>
	महाराजीं प्रत्युत्तर दिधलें । “कृतकर्म अवघें पाहिजे भोगिलें” । गृहस्थ अति विनीत बोले । कांहीं न केलें ऐसें म्यां ॥५७॥</p>
<p>
	या जन्मीं तरी कांहीं न केलें । जेणें हें ऐसें संकट गुजरलें । तयावरी महाराज बोलले । “असेल केलें जन्मांतरीं” ॥५८॥</p>
<p>
	दिधलें मग प्रत्युत्तर तेणें । मागील जन्माचें मी काय जाणें । असलें तरी तें आपुले दर्शनें । भस्म होणें आवश्यक ॥५९॥</p>
<p>
	होतां आम्हां आपुलें दर्शन । अग्नीपुढें जैसें तृण । तैसें तें समूळ भस्म होऊन । कैसा न त्यापासून मुक्त मी ॥६०॥</p>
<p>
	तंव महाराज वदती तयास । “ऐसा तरी  आहे काय विश्वास” । होय म्हणतां गृहस्थास । डोळे मिटावयास आज्ञापिती ॥६१॥</p>
<p>
	आज्ञेप्रमाणें डोळे मिटुनी । उभाच आहे तंव तत्क्षणीं । धाडदिशीं जैसें पडलें कोणी । आवाज श्रवणीं ऐकिला ॥६२॥</p>
<p>
	आवाज कानीं पडतां दचकला । डोळे उघडूनि पाहूं लागला । आपण बंधनिर्मुक्त दिसला । पोलीस पडला रक्तबंबाळ ॥६३॥</p>
<p>
	तेणें मनीं अत्यंत घाबरला । महाराजांकडे पाहूं लागला । हांसून मग ते म्हणती तयाला । “भला सांपडलास तूं आतां ॥६४॥</p>
<p>
	आतां येतील अमलदार । पाहून येथील सर्व प्रकार । तूंच दांडगा म्हणतील अनिवार । पुन: गिरफदार करतील” ॥६५॥</p>
<p>
	मग तो गृहस्थ वदे तत्त्वतां । बाबा आपण खरेंच बोलतां । कसेंही करा सोडवा आतां । दिसेना त्राता तुम्हांविण ॥६६॥</p>
<p>
	ऐसें ऐकूनि साई वदती । “पुनश्च लावीं नेत्रपातीं” । तैसें करूनि डोळे जों उघडिती । नवल स्थिति आणीक ॥६७॥</p>
<p>
	आपण पिंजर्‍याचे बाह्यदेशीं । महाराज साई आपुलेपाशीं  । घाललें साष्टांग नमन त्यांसी । बाबा मग पुसती तयातें ॥६८॥</p>
<p>
	“आतांचा तुझा नमस्कार । आणि यापूर्वीं जे घालीस निरंतर । आहे काय दोहींत अंतर । करून विचार सांगें मज” ॥६९॥</p>
<p>
	तंव तो गृहस्थ देई उत्तर । जमीन - अस्मानाचें अंतर । केवळ द्रव्यार्थ पूर्वनमस्कार । सांप्रत परमेश्वरभावानें ॥७०॥</p>
<p>
	पूर्वीं कांहींही भाव नव्हता । इतकेंच नव्हे मुसलमान असतां । आपण आम्हां हिंदूंस भ्रष्टवितां । होता चित्तीं हा रोष ॥७१॥</p>
<p>
	तयावरी बाबा पुसती । “नाहीं काय तुझिया चित्तीं । मुसलमानाच्या देवांची भक्ति” । नाहीं म्हणती गृहस्थ ॥७२॥</p>
<p>
	पुसती बाबा तयालागुनी । “पंजा नाहीं का तुझिया सदनीं । पूजीत नाहींस का ताबुताचे दिनीं । पाहीं मनीं विचारूनी ॥७३॥</p>
<p>
	‘काड - बिबी’ ही आहे सदनीं । लग्नकार्यासी तिजला पूजुनी । तुष्टवितोस ना मानपानीं । मुसलमानी दैवत हें” ॥७४॥</p>
<p>
	होय म्हणूनी मान्य करितां । आणीक काय इच्छा पुसतां । निजगुरु रामदासदर्शनता । उपजली आस्था गृहस्था ॥७५॥</p>
<p>
	महाराज मग तयाप्रती । मागें वळून पहा म्हणती । मग जों मागें वळून पाहती । समर्थ मूर्ति सन्मुख ॥७६॥</p>
<p>
	पडतांच समर्थांचे पायीं । अद्दश्य जाहले ठाईंचे ठायीं । मग तो जिज्ञासापूर्वक पाहीं । आणीक कांहीं विचारी ॥७७॥</p>
<p>
	बाबा आपुलें जाहलें वय । म्हातारा हा दिसतो काय । आहे आपणा ठावा काय । आयुर्दाय आपुला ॥७८॥</p>
<p>
	काय वदसी मी म्हातारा आहें । माझिया सवें धांवूनि पाहें । म्हणोनि साई जों धांवताहे । हा लागलाहे माघारा ॥७९॥</p>
<p>
	महाराज सवेग धांवतां । धुळोरा जो उसळला वरता । तेच संधीस पावले अद्दश्यता । पावली जागृतता गृहस्थास ॥८०॥</p>
<p>
	असो तो जैं लाधला जागृती । मनीं विचारितां स्वप्नस्थिती । तत्काळ पालटली चित्तवृत्ती । वानी महती बाबांची ॥८१॥</p>
<p>
	पाहूनि ऐसी चमत्कृती । साईपदीं जडली भक्ति । बाबांविषयीं संशयवृत्ती । मावळली परिस्थिती पूर्वील ॥८२॥</p>
<p>
	पाहूं जातां अवघें स्वप्न । परी तीं उत्तरें आणि ते प्रश्न । ऐकूनि श्रोतां करावा ग्रहण । भावार्थ गहन आंतील ॥८३॥</p>
<p>
	हा प्रश्नोत्तर - अनुवाद । मद्रासी पावला परमबोध । विराला साईंसंबंधीं विरोध । हास्यविनोदरूपानें ॥८४॥</p>
<p>
	दुसरे दिवशीं प्रात:काळीं । मंडळी मशिदीं दर्शना आली । दोन रुपयांची बर्फी दिधली । कृपा केली साईनाथें ॥८५॥</p>
<p>
	तैसेच पल्लवचे रुपये दोन । बाबांनीं तयां समस्तां देऊन । घेतलें कांहीं दिवस ठेवून । भजन - पूजन चाललें ॥८६॥</p>
<p>
	पुढें कांहीं काळ क्रमिला । निघाली मंडळी जाण्याला । नाहीं जरी बहु पैसा लाधला । भरपूर लाभला आशीर्वाद ॥८७॥</p>
<p>
	“अल्ला मालीक बहोत देगा । अल्ला तुमारा अच्छा करेगा” । पुढें हेंच कीं आलें उपेगा । लागले मार्गा ते जेव्हां ॥८८॥</p>
<p>
	साईंचिया आशीर्वचनीं । साईंची आठवण ध्यानीं मनीं । मार्ग चालतां दिवसरजनीं । दु:ख ना स्वप्नीं तिळभरी ॥८९॥</p>
<p>
	घडली आशीर्वादानुरूप । यथासांग यात्रा अमूप । वाटेस न होतां यत्किंचित ताप । पातले सुखरूप निजगृहा ॥९०॥</p>
<p>
	मनीं चिंतिल्या होत्या एका । त्या घडून, घडल्या यात्रा अनेका । वानीत साईवचनकौतुका । आनंद सकळिकां अनुपम ॥९१॥</p>
<p>
	शिवाय संताचें आशीर्वचन । ‘अल्ला अच्छा करील’ हें वचन । अक्षरें अक्षर सत्य होऊन । मनोरथ पूर्ण जाहला ॥९२॥</p>
<p>
	ऐसे ते समस्त तीर्थोपासक । भगवद्भक्त मद्रासी लोक । सकळ सत्त्वस्थ सात्त्विक । बंधमोचक साई त्यां ॥९३॥</p>
<p>
	ऐसीच सुरस आणिक कथा । सांगतों परिसिजे सादर श्रोतां । भक्तिभावें श्रवण करितां । आश्चर्य चित्ता प्रकटेल ॥९४॥</p>
<p>
	भक्तकाजकल्पद्रुम । कैसे साई दयाळू परम । कैसे सप्रेम भक्तांचे काम । पुरवीत अविश्रम सर्वदा ॥९५॥</p>
<p>
	ठाणें जिल्ह्यांत वांद्रें शहर । तत्रस्थ एक भक्तप्रवर । रघुनाथराव तेंडूलकर । चतुर - धीर बहुश्रुत ॥९६॥</p>
<p>
	सदा आनंदी मोठे प्रेमी । विनटले साईंचे पादपद्मीं । तेथील बोधमकरंदकामीं । अखंड नामीं गुणगुणत ॥९७॥</p>
<p>
	रूप देऊनि ‘भजनमाला’ । वर्णिली जयांनीं साईलीला । ती भक्तिप्रेमें वाचील त्याला । साईच पावला पावलीं ॥९८॥</p>
<p>
	सावित्री नामें तयांचें कलत्र । बाबू तयांचा ज्येष्ठ पुत्र । पहा तयांचा अनुभव विचित्र । परिसा तें चरित्र साईंचें ॥९९॥</p>
<p>
	एकदां बाबू साशंकितमन । वैद्यकीय पाठशाळेमधून । घेऊन परदेशीय वैद्यकी शिक्षण । परीक्षेलागून बैसेना ॥१००॥</p>
<p>
	तयानें रात्रीचा दिवस करून । अभ्यास केला अति कसून । सहज ज्योतिष्यास केला प्रश्न । परीक्षेंत उत्तीर्ण होईन का ॥१०१॥</p>
<p>
	चाळूनि पंचांगाचीं पानें । ज्योतिषी पाही ग्रहांचीं स्थानें । राशी नक्षत्रें मोजूनि बोटानें । सचिंत मुद्रेनें अवलोकी ॥१०२॥</p>
<p>
	म्हणे केलात परिश्रम थोर । परी ये वर्षीं न ग्रहांचा जोर । पुढील वर्ष फार श्रेयस्कर । परीक्षा निर्घोर ते वर्षीं ॥१०३॥</p>
<p>
	बैसून परीक्षेस काय सार्थक । होणार जरी श्रम निरर्थक । विद्यार्थ्यानें हा घेतला वचक । तेणें तो दचकला मनासी ॥१०४॥</p>
<p>
	पुढें तया विद्यार्थ्याची माता । अल्पावकाशीं शिरडीस जातां । नमितां साईचरण माथां । कुशल वार्ता चालल्या ॥१०५॥</p>
<p>
	निघाली तैंही ही कथा । करुणावचनीं बाबांसी प्रार्थितां । म्हणे मुलगा परीक्षेस बसता । असती अनुकूलता ग्रहांची ॥१०६॥</p>
<p>
	पत्रिका पाहिली ज्योतिष्यांहीं । म्हणती यंदा योग नाहीं । असून अभ्यासाची तयारीही । मुलगा न जाई परीक्षेस ॥१०७॥</p>
<p>
	तरी बाबा ही काय ग्रहदशा । यंदा अशी कां ही निराशा । पडेल एकदां पदरीं परीक्षा । ऐसी बहु आशा समस्तां ॥१०८॥</p>
<p>
	ऐकून बाबा वदले वचन । “सांगें तयास माझें मान । पत्रिका ठेवीं गुंडाळून । बैसें जा स्वस्थमन परीक्षे ॥१०९॥</p>
<p>
	नादा कुणाच्या लागूं नका । जन्मपत्रिका पाहूं नका । सामुद्रिका विश्वासूं नका । चालवा निका अभ्यास ॥११०॥</p>
<p>
	म्हणावें मुलास येईल यश । स्वस्थचित्तें परीक्षेस बैस । होऊं नको असा निराश । ठेवीं विश्वास मजवरी” ॥१११॥</p>
<p>
	असो बाबांची आज्ञा घेउनी । आई परतली ग्रामालागुनी । मुलास बाबांचा निरोप कथुनी । उत्साहें जननीं आश्वासी ॥११२॥</p>
<p>
	ऐसा तो साईवचनोल्हास । मुलगा बैसला परीक्षेस । उत्तरेंही लेखी प्रश्नांस । यथावकाश दीधलीं ॥११३॥</p>
<p>
	लेखी परीक्षा पूर्ण झाली । उत्तरेंही संपूर्ण लिहिलीं । परी आत्माविश्वासें घेरली । संशयें चळली स्थिरबुद्धि ॥११४॥</p>
<p>
	असतां लिहिलीं सम्यगुत्तरें । उत्तीर्ण व्हावया तितुकीं पुरे । परी विद्यार्थिया वाटे तें अपुरें । सोडिला धीर तयानें ॥११५॥</p>
<p>
	वस्तुत: लेखी परीक्षेंत पास । होता तरी त्यास वाटे मी नापास । तेणें होऊन तो उदास । तोंडी परीक्षेस बैसेना ॥११६॥</p>
<p>
	तोंडी परीक्षेस आरंभ झाला । प्रथम दिवस तैसाच गेला । दुसरे दिवशीं एक स्नेही आला । विद्यार्थी देखिला भोजनस्थित ॥११७॥</p>
<p>
	म्हणे ही काय आश्चर्यता । परीक्षकाला तुझी चिंता । म्हणे जा पाहून ये आतां । तेंडूलकर नव्हता कां काल ॥११८॥</p>
<p>
	लेखी परीक्षेंत तो नापास । तया तोंडीचे किमर्थ सायास । म्हणून घरीं तो बैसला उदास । स्पष्ट मीं तयास सांगितलें ॥११९॥</p>
<p>
	तेव्हां परीक्षक वदे तूं जाईं । असेल तैसा घेऊन येईं । “लेखी परीक्षेंत पास” ही देईं । आनंददायी खबर त्या ॥१२०॥</p>
<p>
	मग तो आनंद काय पुसावा । केला महाराज साईंचा धांवा । न घेतां एक क्षणाचा विसावा । उल्हासभावें धांवला ॥१२१॥</p>
<p>
	असो पुढें जाहलें गोड । परीक्षेची पुरली होड । दिधली द्दढ निजपदीं जोड । साईंनीं कोड पुरवुनी ॥१२२॥</p>
<p>
	दळावयाच्या जात्याचा खुंट । हालहालवूनि बसविती घट्ट । तैसीच गुरुपदनिष्ठेची गोष्ट । हालवूनि चोखट साई करी ॥१२३॥</p>
<p>
	ऐसें न कोणा केव्हांही कथिती । जेणें न हालेल चित्तवृत्ती । हे तों बाबांची नित्य प्रचीती । निष्ठा ये रीतीं द्दढ करिती ॥१२४॥</p>
<p>
	चालूं जातां कथिल्या वाटे । आरंभीं आंरभीं गोड वाटे । पुढें ऐसे पसरितील सराटे । कांटेच कांटे चोंहींकडे ॥१२५॥</p>
<p>
	मग त्या निष्ठेस फुटतील फांटे । सहज मनीं संशय दाटे । किमर्थ साई या आडवाटे । आणी हें वाटे मनाला ॥१२६॥</p>
<p>
	परी हें ऐसें जेथें वाटे । तेथेंच श्रद्धा धरा नेटें । कसोटीच हीं प्रत्यक्ष संकटें । तेणेंच पैठे द्दढ श्रद्धा ॥१२७॥</p>
<p>
	देऊनियां संकटां तोंडा । करितां साईस्मरण अखंड । होतील सकळ अपाय दुखंड । शक्ति ही प्रचंड नामाची ॥१२८॥</p>
<p>
	हेंच या अंतरायांचें प्रयोजन । तेंही करी साईच निर्माण । तेव्हांच घडेल साईस्मरण । संकटोपशमनही तेव्हांच ॥१२९॥</p>
<p>
	असो याच मुलाचे वडील । भक्त बाबांचे अति प्रेमळ । धीर उदार सत्त्वशील । गात्रें शिथिल जाहलीं ॥१३०॥</p>
<p>
	प्रसिद्ध परदेशीय व्यापारी । पेढी जयांची मुंबई शहरीं । इमानें इतबारें तयांचे पदरीं । केली नोकरी तयांनीं ॥१३१॥</p>
<p>
	पुढें होतां वृद्धापकाळ । नेत्रांस येऊं लागली झांकळ । इंद्रियें निजकार्यीं विकळ । वांछिती निश्चळ आराम ॥१३२॥</p>
<p>
	काम कराया उरली न शक्ति । म्हणून सुधारावया प्रकृति । रघुनाथराव रजा घेती । स्वस्थ विश्रांति भोगिती ॥१३३॥</p>
<p>
	पुढें ती रजा संपूर्ण भरली । नाहीं पूर्ण विश्रांति लाभली । म्हणून मागुती अर्जी लिहिली । रजा प्रार्थिली आणीक ॥१३४॥</p>
<p>
	अर्जी देखूनियाम उपरी । अपेक्षित रजेची शिफारस करी । परी त्या पेढीचे वरिष्ठाधिकारी । पूर्ण विचारी दयाळू ॥१३५॥</p>
<p>
	धनी मनाचा उदार । पाहुनि आपुला इमानी चाकर । देई प्रेमाची अर्धी भाकर । पुढील चरितार्थ चालावया ॥१३६॥</p>
<p>
	ऐसी ही सरकारी पद्धत । उत्तम पेढयाही प्रसंगोपात । प्रामाणिक सेवकांनिमित्त । उत्तेजनार्थ अवलंबिती ॥१३७॥</p>
<p>
	परी ही भाकर माझा धनी । देईल काय मजलागुनी । पडेन जेव्हां मी बेकार होउनी । ऐसिया चिंतनीं पडले ते ॥१३८॥</p>
<p>
	दीडशें अवघा माझा पगार । पाऊणशेंच्या पेन्शनावर । पडेल दिनचर्येचा भार । मनांत विचार घोळत ॥१३९॥</p>
<p>
	परी पुढें जाहली मौज । पहा बाबांचें नवल भोज । रघुनाथरावांचे कुटुंबा हितगुज । पुसती तें चोज परिसिजे ॥१४०॥</p>
<p>
	अखेरचा हुकूम व्हावया आधीं । असतां पंधरा दिसांचा अवधी । जाऊनि तियेच्या स्वप्नामधीं । पुसती बुद्धी तियेस ॥१४१॥</p>
<p>
	शंभर द्यावे माझी मनीषा । पुरेल ना तव मनींची आशा” । बाई वदे हें काय पुसा । आम्हां भरंवसा आपुलाच ॥१४२॥</p>
<p>
	तिकडे ठराव अर्जीवर । रघुनाथराव इमानी नोकर  । बहुत जाहली सेवा आजवर । अर्धी भकर द्यावी त्यां ॥१४३॥</p>
<p>
	मुखें जरी वदले शंभर । दहा दिधले आणीक वर । ऐसे हे समर्थ करुणाकर । प्रेम अनिवार भक्तांचें ॥१४४॥</p>
<p>
	आतां परिसा आणीक एक । कथा सुंदर मनोरंजक । भक्तप्रेमोल्हासकारक । आनंददायक  श्रोतयां ॥१४५॥</p>
<p>
	डॉक्टर नामें क्यापटन हाटे । बाबांचे भक्त श्रद्धाळू मोठे । बाबांनीं स्वप्नांत दर्शन पहांटे । दिधलें तें गोमटें कथानक ॥१४६॥</p>
<p>
	हाटे राहती ग्वालेरीं । बाबांस देखती स्वप्नामाझारी । पहा बाबांची प्रश्नकुसरी । हाटेही उत्तरीं काय वदती ॥१४७॥</p>
<p>
	म्हणती बाबा मज विसरलासि काय । तात्काळ हाटयांनीं धरिले पाय । जरी विसरलें लेंकरूं माय । तरणोपाय कैसेनी ॥१४८॥</p>
<p>
	उठून बागेंत गेले तांतडी । खुडिली ताजी वालपापडी । शिधा साहित्य दक्षिणा रोकडी । भक्ति परवडी सिद्ध केली ॥१४९॥</p>
<p>
	ऐसी पाहोनि सिद्धी पूर्ती । हाटे तें सूप जों समर्पूं सरती । अवचित उघडलीं नेत्रपातीं । स्वप्नस्थिती हें तैं कळलें ॥१०५॥</p>
<p>
	तात्काळ हाटयांचें जाहलें मन । पदार्थ हे समस्त मिळवून । करावे बाबांस प्रत्यक्ष अर्पण । तदर्थ जाऊन शिरडीस ॥१५१॥</p>
<p>
	परी ते तेव्हां ग्वालेरीस । पत्र लिहिलें मुंबईस । वृत्तान्त साद्यंत कळविला स्नेह्यास । विनविलें शिरडीस जावें स्वयें ॥१५२॥</p>
<p>
	टपालमार्गें येईल पैसा । शिधा घ्यवा योग्य तैसा । शेंगा पापडीच्या सुंदर खाशा । मिळवाव्या कैशातरीही ॥१५३॥</p>
<p>
	उरला पैका सवें न्यावा । शिध्यासमवेत बाबांस द्यावा । चरण वंदूनि प्रसाद मागावा । तो मज द्यावा पाठवून ॥१५४॥</p>
<p>
	पैसा येतांच स्नेही निघाले । शिरडीस जाऊन सामान घेतलें । पापडीवांचून किंचित अडलें । तों एक टोपलें तैं आलें ॥१५५॥</p>
<p>
	तें होतें जिये बाईचे माथां । तियेस बोलावून पाहूं जातां । शेंगाच पापडीच्या लागल्या हाता । अतिआश्चर्यता सकळांतें ॥१५६॥</p>
<p>
	मग तें सर्व साहित्य आणिलें । महाराजांसी सादर केलें ।  त्यांनीं निमोणकरांतें दिधलें । उदयीक निवेदिलें शिजवून ॥१५७॥</p>
<p>
	पुढें बाबा भोजना बैसतां । वरण - भातादिकां न शिवतां । शेंगाच तेवढया उचलून घेतां । आश्चर्य समस्तां वाटलें ॥१५८॥</p>
<p>
	शेंगाच तेवढया ग्रहण केल्या । त्याच तेवढया मुखीं घातल्या । हाटयांना बहु आनंद झाला । वृत्तांत कळला हा तेव्हां ॥१५९॥</p>
<p>
	जया मनीं जैसा भाव । तैसाच कीं हा हाटयांना अनुभव । पुढील कथेचा परिसा नवलाव । गोड लाघव साईंचें ॥१६०॥</p>
<p>
	साईहस्तस्पर्शपूत । असावा एक रुपया गृहांत । इच्छा उद्भवली हाटयांचे मनांत  । पुरवीत मनोगत तो साई ॥१६१॥</p>
<p>
	मनाच्या वृत्ति कोटयनुकोटी । त्यागून ओखटी धरावी गोमटी । मग पहा साईची कैंची हतवती । उभाच पाठीं भक्तांच्या ॥१६२॥</p>
<p>
	होतां ऐसी सदिच्छा निर्माण । सफळ व्हावया नलगे क्षण । निघाला एक स्नेही तत्क्षण । साईदर्शनकामुक ॥१६३॥</p>
<p>
	वृत्ति असावी मात्र गोड । नवल साई पुरवितो होड । जया सद्वृत्तीची आवड । तयाचें कोड त्या हातीं ॥१६४॥</p>
<p>
	तंव हाटे एक रुपया देती । तया स्नेहासी अतिप्रीतीं । म्हणती नका पडूं देऊं विस्मृती । घाला हा हातीं बाबांच्या ॥१६५॥</p>
<p>
	स्नेही जेव्हां शिरडीस गेले । तात्काळ बाबांचें दर्शन घेतलें । चरण तयांचे माथां वंदिले । सन्मुख बैसले बाबांचे ॥१६६॥</p>
<p>
	दक्षिणेलागीं कर पसरितां । आपुली दक्षिणा दिधली प्रथमता । बाबांनीं खिशांत सूदिली अविलंबता । काढी तो मागुता हाटयांची ॥१६७॥</p>
<p>
	तोही रुपया जोडूनिज कर । ठेवी बाबांचे करतलावर । म्हणे ही दक्षिणा मजबरोबर । हाटे डॉक्टर पाठविती ॥१६८॥</p>
<p>
	हा साई सर्वह्रदयवासी । हाटे जरी ग्वालेरनिवासी । जाणूनि मनीषा तयांचे मानसीं । बैसले रुपयासी न्याहाळीत ॥१६९॥</p>
<p>
	होऊनियां प्रेमोन्मुख । बाबा रुपया धरिती सन्मुख । नवल अवलोकिती लावोनि टक । लोक टकमक देखती ॥१७०॥</p>
<p>
	दक्षिणांगुष्ठें वरचेवरी । उडवूनि झेलिती बाबा निजकरीं । ऐसी क्रीडा करूनि क्षणभरी । रुपया करीत ते परत ॥१७१॥</p>
<p>
	म्हणती “हा ज्याचा त्यास देईं । सवें ह उदीचा प्रसाद नेईं । नलगे आम्हांस तुझें कांहीं । स्वस्थ राहीं म्हणें तया” ॥१७२॥</p>
<p>
	घालूनि लोटांगण बाबांचे पायीं । उदीप्रसाद पाठवूनि ठायीं । घेऊनि बाबांची आज्ञा तो स्नेही । आला निजगेहीं ग्वालेरीस ॥१७३॥</p>
<p>
	आलियावरी ग्वालेरीतें । रुपया देऊनि डॉक्टरांतें । कळविलें सकळ वृत्तांतातें । दाटलें भरतें हाटयांतें ॥१७४॥</p>
<p>
	म्हणे मनीं जैसा हेत । केला होता जैसा संकत । जाणोनि माझें मनोगत । पुरविला मनोरथ बाबांनीं ॥१७५॥</p>
<p>
	ऐसें वाटलें हाटयांचे मना । परी ही तरी त्यांची कल्पना । कोण जाणील संतांची योजना । प्रयोजना तयांच्या ॥१७६॥</p>
<p>
	हें जरी म्हणावें निश्चित । तीच पहा दुसरी प्रचीत । ती तों याहून विपरीत । ज्याचें मनोगत त्या ठावें ॥१७७॥</p>
<p>
	एकाचा रुपया परत देती । एकाचा तो खिशांत सूदती । कारण काय वदावें निश्चितीं । काय चित्तीं बाबांच्या ॥१७८॥</p>
<p>
	त्यांचीं कारणें तयांस ठावीं । जापण केवळ मौज पहावी । ऐसी गोड संधी न दवडावी । कथा परिसावी ये अर्थीं ॥१७९॥</p>
<p>
	एकदां वामन नार्वेकर । जयांस बाबांचें प्रेम अपार । आणिला एक रुपया सुंदर । भक्तिपुर:सर अर्पाया ॥१८०॥</p>
<p>
	एका बाजूस कोरिली होती । राम लक्ष्मण सीतासती । दुजिया बाजूस रम्य मूर्ति । होता मारुती बद्धांजळी ॥१८१॥</p>
<p>
	तया अर्पणीं पोटीं हेत । हस्तस्पर्शापाठीं तो परत । मिळावा उदीप्रसादासहित । म्हणून हस्तांत ठेविला ॥१८२॥</p>
<p>
	कोणा मनीं काय ह्रद्नत । बाबा हे तों सकळ जाणत । तरी तो रुपया पडतां हस्तांत । तात्काळ खिशांत सूदिला ॥१८३॥</p>
<p>
	वामनरावांचा मानस । माधवरावांनीं कळविला बाबांस । रुपया परत करावयास । विनविलें तयांस अत्यंत ॥१८४॥</p>
<p>
	“त्याला कसला द्यावयाचा । आपणांसचि तो ठेवावयाचा” । वदले बाबा स्पष्ट वाचा । वामनरावांच्या समक्ष ॥१८५॥</p>
<p>
	“तरीही तो देईल । रुपये पंचवीस याचें मोल । हा मी यासी देईन बदल” । म्हणाले बोल तयाला ॥१८६॥</p>
<p>
	मग त्या एका रुपयालागीं । वामनरावानें लागवेगीं । तेही मिळवून जागोजागीं । बाबांलागीं दीधले ॥१८७॥</p>
<p>
	तेही पूर्ववत खिशांत ठेविले । म्हणती रुपयांचे ढिगार लाविले । तरी त्या रुपयासवें न तोले । उणें ते मोलें तयापुढें ॥१८८॥</p>
<p>
	म्हणती शामा हा तूं घेईं । असूं दे हा आपुले संग्रहीं । देव्हार्‍यामाजीं ठेवून देईं । करीत जाईं पूजन ॥१८९॥</p>
<p>
	आतां हें ऐसें काय करितां । विचारावयाची कोणास सत्ता । साई योग्यायोग्य जाणता । देता घेता समर्थ ॥१९०॥</p>
<p>
	असो आतां ही कथा आटपतां । विसावा देऊं श्रोतयां चित्ता । जेणें मनन आणि निदिध्यासता । कथा परिसतां घडावी ॥१९१॥</p>
<p>
	केलें काय ऐकलें श्रवण । पचनीं न पडे मननावीण । वरी न घडतां निदिध्यासन । श्रवण निष्कारण होईल ॥१९२॥</p>
<p>
	तरी हेमाड साईंसी शरण । मस्तकीं धरी साईंचे चरण । सकळ साधनांचें हें साधन । पुढील निवेदन पुढारां ॥१९३॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । स्वप्नकथाकथनं नाम एकोनत्रिंशतितमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
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	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 14:27:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 14:52:07 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय २८]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-28-122042600047_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
साई नव्हे एकदेशी । साई सर्वभूतनिवासी । आब्रम्हाकीटक - मुंगीमाशी । व्यापक सर्वांशीं सर्वत्र ॥१॥
साई शब्दब्रम्ही ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 28" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650963401-3863.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra adhyaay 28" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	साई नव्हे एकदेशी । साई सर्वभूतनिवासी । आब्रम्हाकीटक - मुंगीमाशी । व्यापक सर्वांशीं सर्वत्र ॥१॥</p>
<p>
	साई शब्दब्रम्ही पूर्ण । दावी परब्रम्हींची खूण । ऐसा उभयभागीं प्रवीण । तेणेंच सद्नुरुपण तयातें ॥२॥</p>
<p>
	स्वयें मोठा ज्ञानी गहन । करूं नेणे शिष्यप्रबोधन । अथवा निजस्वरूपावस्थान । त्याचें सद्नुरुपण तयाला ॥३॥</p>
<p>
	पिता देई देहासी जनन । जननापाठीं लागे मरण । गुरु निर्दाळी जनन - मरण । तें कनवाळुपण आणीक ॥४॥</p>
<p>
	आतां पूर्वील अनुसंधान । कीजे स्वप्नाध्याय श्रवण । कैसें भक्तांचे स्वप्नीं जाऊन । बाबा दर्शन त्यां देत ॥५॥</p>
<p>
	कोणास म्हण्त त्रिशूल काढीं । कोणापाशीं मागत खिचडी । कोणास घेऊन हातीं छडी । पाठ ते फोडीत गुरुमिषें ॥६॥</p>
<p>
	कोणास स्वप्नीं जाऊन भेवंडी । सुरापानादि मोडीत खोडी । टाळूनि भक्तांचीं अनेक सांकडीं । लावीत गोडी निजपदीं ॥७॥</p>
<p>
	कैसी कोणासी पाठ फोडिली । वरवंटयानें छाती ठेंचिली । दशमाध्यायीं वार्ता हे कथिली । श्रोतां आकर्णिली आधींच ॥८॥</p>
<p>
	पुढील कथेची अपूर्वाई । धन्य परिसता धन्य जो गाई । दोघे समरसती ठायींचे ठायीं । सौख्य अनपायी लाधती ॥९॥</p>
<p>
	असत्कथानिंदादिश्रवण । या पापांचें होईल क्षालन । करूं संतकथानुवादन । परम पावन जें सदा ॥१०॥</p>
<p>
	आतां तेंच कथानिरूपण । श्रोतां सादर कीजे श्रवण । पदोपदीं येईल दिसून । कृपाळूपण साईंचें ॥११॥</p>
<p>
	राली  - बंधु ग्रीक व्यापारी । खरीदी सर्व हिंदुस्थानभरी । पेढया तयांच्या शहरोशहरीं । मुंबानगरींही एक ॥१२॥</p>
<p>
	तेथील अधिकार्‍यांचें पदरीं । सांप्रत लखमीचंदासी नोकरी । अति विश्वासू आज्ञाधारी । काम करीत मुनशीचें ॥१३॥</p>
<p>
	रेलवे - खात्यांत आरंभीं होते । व्यंकटेश मुद्रणागारीं मागुते । तेव्हांच साईंच्या समागमातें । लाधले कैसे तें परिसा ॥१४॥</p>
<p>
	“माझा माणूस देशावर । असो कां हजारों कोस दूर । आणीन जैसें चिडीचें पोर । बांधून दोर पायांस” ॥१५॥</p>
<p>
	ऐसें बाबा  कितीदां वदले । जनां लोकांहीं बहुतीं ऐकिलें । अनुभवाही तैसेंच आलें । कथितों त्या लीलेस बाबांच्या ॥१६॥</p>
<p>
	नेलीं ऐसीं पोरें कितीक । देशोदेशींचीं शिरडीस अनेक । त्यांतीलचि लखमीचंद एक । पोर हें भाविक बाबांचें ॥१७॥</p>
<p>
	जेव्हां बहुजन्मसंपादित । प्राक्तन कर्म उदया येत । तेव्हांच संतसमागम लाभत । मोहजनित तम नासे ॥१८॥</p>
<p>
	विवेकाग्नि होई प्रदीप्त । भाग्योदया वैराग्य पावत । संचित - कर्म क्षया जात । होत जीवितसाफल्य ॥१९॥</p>
<p>
	दिठीं भरतां साईनाथ । दुजिया न लाभे वाव तींत । तेही असोत नयननिमीलित । साईनाथ चौपासीं ॥२०॥</p>
<p>
	झाली लालाजींची भेटी । कथिल्या त्यांनीं ज्या स्वानुभवगोष्टी । प्रेमें सांठविल्या ह्रदयसंपुटीं । उत्कंठा पोटीं त्या सांगूं ॥२१॥</p>
<p>
	धरणें आलें तयास देख । तीही लीला अलौकिक । काना मना करून एक । श्रोते भाविक परिसोत ॥२२॥</p>
<p>
	सन एकोणीसशें दहा । नाताळामधील दिवस पहा । शिरडीप्रयाणयोग तेव्हां । लाधला हा लालाजीतें ॥२३॥</p>
<p>
	तेव्हांच प्रथम प्रत्यक्ष दर्शन । परी हा योग येण्याचें चिन्ह । एका दों महिन्यांचे आधींच जाण । आलें घडून तें ऐका ॥२४॥</p>
<p>
	सांताक्रूझगांवीं असतां । ध्यानीं मनीं कांहींही नसतां । स्वप्न पडलें तयास अवचिता । नवल द्दष्टान्ता देखिलें ॥२५॥</p>
<p>
	म्हातारा एक दाढीवाला । साधु भक्तवृंदीं वेढिला । ऐसा महात्मा उभा देखिला । तो अभिवंदिला सप्रेम ॥२६॥</p>
<p>
	पुढें दत्तात्रेय मंजूनाथ । बिजूर उपनांवाचे गृहस्थ । आले लखमीचंद तेथ । करीर्तनार्थ गणुदासांच्या ॥२७॥</p>
<p>
	दासगणूंची नित्य पद्धती । समोर बाबांची छबी मांडिती । ती देखतांच लखमीचंदाप्रती । आठवली मूर्ति स्वप्नींची ॥२८॥</p>
<p>
	तीच दाढी तेंच वय । तेच अवयव तेच पाय । लखमीचंदाचा लागला लय । कीं तोच हा होय महात्मा ॥२९॥</p>
<p>
	आधींच तें दासगणूंचें कीर्तन । त्यांत तुकारामाचें आख्यान । वरी त्या स्वप्नींच्या साधूचें दर्शन । लालाजी तल्लीन बहु झाले ॥३०॥</p>
<p>
	लखमीचंद मनाचे कोमळ । डोळीं आले प्रेमाश्रुजळ । लागून राहिली जीवास तळमळ । मूर्ति ही प्रेमळ देखेन कैं ॥३१॥</p>
<p>
	आधीं जी देखिली स्वप्नींतीं । प्रतिमा जियेची कीर्तनांतीं । तिकडेच लागली  अंतर्वृत्ति । आणीक चित्तीं येईना ॥३२॥</p>
<p>
	भेटेल काय  कोणी स्नेही । जो मज शिरडीची सोबत देई । कधीं मी प्रत्यक्ष या संतांपायीं । वाटलें डोई ठेवीन ही ॥३३॥</p>
<p>
	होईल या साधूंचें दर्शन कदा । भोगीन काय त्या प्रेमानंदा । ऐसी उत्सुकता लखमीचंदा । लागून सदा राहिली ॥३४॥</p>
<p>
	लाविली पाहिजे खर्चाची सोय । आतां पुढें करावें काय । दर्शन सत्वर कैसें होय । लागे उपाय शोधाया ॥३५॥</p>
<p>
	देव सदा भावाचा भुकेला । पहा कैसा चमत्कार घडला । तेच रात्रीं आठाचे समयाला । दरवाजा ठोठावला स्नेह्यानें  ॥३६॥</p>
<p>
	मग दार उघडून जों पाही । तों शंकरराव तयाचा स्नेही । पुसे लखमीचंदास पाहीं । येतां काई शिरडीस ॥३७॥</p>
<p>
	केडगांवीं जाण्याचा मानस । नारायणमहाराज - दर्शनास । होता, परी आलें मनास । आधीं शिरडीस जावें कीं ॥३८॥</p>
<p>
	करावे यत्प्रीत्यर्थ सायास । तेंच जैं चालून येई अप्रयास । पारावारा न आनंदास । मनास लखमीचंदाचे ॥३९॥</p>
<p>
	घेतली चुलतभावांपासुनी । रकम पंधरा रुपये उसनी । शंकररावांनींही तैसेंच करूनि । केली प्रयाणीं सिद्धता ॥४०॥</p>
<p>
	बिस्तरा बिछायत घेतली । निघावयाची तयारी केली । जाऊनि वेळीं तिकिटें मिळविलीं । गाडी साधिली उभयांनीं ॥४१॥</p>
<p>
	शंकरराव मोठे भजनी । गाडींत भजन केलें उभयांनीं । लक्षमीचंद चौकसपणीं । करी रस्त्यांनीं चौकशी ॥४२॥</p>
<p>
	शिरडीकडील कोणी जन । भेटतां करावें तयांस नमन । सांगा साईबाबांचें महिमान । अनुभव प्रमाणा आम्हांला ॥४३॥</p>
<p>
	साईबाबा मोठे संत । नगरबाजूस अति विख्यात । म्हणती तयांची कांहीं प्रचीत । आम्हांसि निश्चित वदावी ॥४४॥</p>
<p>
	डब्यांत चार मुसलमान । शिरडीनिकट जयांचें स्थान । परस्पर वार्तावर्तमान । करितां समाधान वाटलें ॥४५॥</p>
<p>
	साईबाबांची कांहीं माहिती । असल्यास निवेदा आम्हांप्रती । लखमीचंद अति भावार्थीं । तयांस पुसती प्रीतीनें ॥४६॥</p>
<p>
	साईबाबा महान संत । शिरडींत बहुत वर्षें नांदत । असे महान अवलिया महंत । प्रत्युत्तर देत ते तयां ॥४७॥</p>
<p>
	येणेंप्रमाणें बोलतां चालतां । आनंदानें मार्ग क्रमितां । दोघे कोपरगांवास येतां । आठवलें चित्ता शेटीच्या ॥४८॥</p>
<p>
	साईबाबांस पेरूंची प्रीती । कोपरगांवीं पेरू पिकती । म्हणती गोदेच्या कांठीं विकती । समर्पूं येतील बाबांस ॥४९॥</p>
<p>
	परी येतां गोदावरीकांठीं । देखावा पाहून हर्षले पोटीं । तांगा पोहोंचला पैलतटीं । विसरले गोठी पेरूंची ॥५०॥</p>
<p>
	तेथूनि शिरडी चार गांव । तांगा निघाला भरधांत । लखमीचंदास झाला आठव । जेथें न ठाव पेरूचा ॥५१॥</p>
<p>
	तों एक म्हातारी डोईवर पाटी । धांवतां देखिली गाडीच्या पाठीं । थांबविली गाडी तियेसाठीं । पेरूच भेटीस आले कीं ॥५२॥</p>
<p>
	लखमीचंद आनंदभरित । निवडूनि निवडूनि पेरू घेत । राहिले पाटींत ते म्हातारी म्हणत । अर्पा मजप्रीत्यर्थ बाबांना॥५३॥</p>
<p>
	पेरूंची स्मृति आणि विस्मृति । म्हातारीची गांठ अवचिती । तिची ती पाहूनि साईभक्ति । दोघेही चित्तीं विस्मित ॥५४॥</p>
<p>
	आरंभीं म्हातारा दिसला स्वप्नीं । तोचि पुढें आढळला कीर्तनीं। त्याचीच ही म्हातारी नसेल ना कोणी । लालाजी मनीं तरकले ॥५५॥</p>
<p>
	असो मग पुढें गाडी हांकिली । बोलतां बोलतां शिरडी गांठली । दुरूनि मशिदीचीं निशाणें देखिलीं । भावें वंदिलीं उभयतांनीं ॥५६॥</p>
<p>
	मग ते पूजासंभारेंसी । गेले तत्काळ मशिदीसी । घेऊनि साईदर्शनासी । आनंदचित्तेंसीं ते धाले ॥५७॥</p>
<p>
	आंगणाचे द्वारांतून । सभामंडपीं प्रवेशून । पाहोनि बाबांची मूर्ति दुरून । सद्नद मन जाहलें ॥५८॥</p>
<p>
	होतां इच्छित मूर्तींचें दर्शन  । लखमीचंद जाहला तल्लीन । विसरूनि गेला भूक्त तहान । स्वानंदजीवन लाधला ॥५९॥</p>
<p>
	हातीं घेऊनि निर्मळ जळ । प्रक्षाळिलें चरणकमळ । अर्ध्यपाद्यादि पूजा सकळ । केळीं श्रीफळ अर्पिलें ॥६०॥</p>
<p>
	धूप - दीप - तांबूल - दक्षिणा । केली मानस - प्रदक्षिणा । करोनि पुष्पहारसमर्पणा । बैसले चरणांसन्निध ॥६१॥</p>
<p>
	भक्त प्रेमळ लखमीचंद । तयासही गुरुकृपेचा आनंद । पावूनि साईचरणारविंद । रमला मिलिंद जैसा तो ॥६२॥</p>
<p>
	तेव्हां बाबा झाले वदते । “साले रास्तेमें भजन करते । और दूसरे आदमीकू पूछते । क्या दुसरेसे पूछना ॥६३॥</p>
<p>
	सब कुछ अपने आंखोंसे देखना । कायकू दुसरे आदमीकू पूछना । झूठा है क्या सच्चा सपना । करलो अपना बिचार आप ॥६४॥</p>
<p>
	मारवाडीसे लेकर उछिती । क्या जरूर दर्शनकी होती । हुई क्या अब मुराद पुरती” । आश्चर्य चित्तीं परिसतां ॥६५॥</p>
<p>
	आपण मार्गांत केली चौकशी । बाबांस येथें ती कळली कैशी । हेंचि आश्चर्य परम मानसीं । लखमीचंदांसी वाटलें ॥६६॥</p>
<p>
	घरीं आपणा पडलें स्वप्न । गाडींत आपण केलें भजन । कळलें कैसें बाबांस वर्तमान । काय अंतर्ज्ञान हें ॥६७॥</p>
<p>
	होती दर्शनाची उत्कंठा । होता खराच पैशांचा तोटा । उसने घेऊन केला पुरवला । तेंही पहा ठाऊक यां ॥६८॥</p>
<p>
	आश्चर्य परम लखमीचंदा । आश्चर्य सकल भक्तवृंदा । आश्चर्य सत्पदपंकजमिलिंदा । अतर्क्य विंदान बाबांचें ॥६९॥</p>
<p>
	काढोनि ऋण करणें सण । अथवा यात्रापर्यटण । नावडे बाबांस कर्जबाजारीपण । शिकवण ही मुख्य येथील ॥७०॥</p>
<p>
	असो तें, सकळ भक्तांसमवेत । हेही साठयांचे वाडयांत जात । दुपार भरतां जेवावया बैसत । आनंदभरित मानसें ॥७१॥</p>
<p>
	इतुक्यांत बाबांचा प्रसाद म्हणून । कोणा भक्तानें सांजा आणून । वाढिला थोडा पानांवरून । तृप्त तो सेवून जाहले ॥७२॥</p>
<p>
	दुसरे दिवशीं भोजनसमयीं । झाली लालाजीस सांज्याची सई । परी तो कांहीं नित्याचा नाहीं । उत्सुकता राहिली मनांत ॥७३॥</p>
<p>
	मग तिसरे दिवसाची नवाई । उरल्या वासनेची भरपाई । करूनि देती महाराज साई । कैसिया उपायीं अवलोका ॥७४॥</p>
<p>
	गंधाक्षतादिपुष्पांसमेत । घंटा नीरांजन पंचारत । घेऊनि जोग मशिदीं येत । पुसूं लागत बाबांसी ॥७५॥</p>
<p>
	‘काय आणावा नैवेद्य आज’ । आज्ञा करिती महाराज । “सांजा ताटभर घेऊनि ये मज । आरतीपूजन मग करीं” ॥७६॥</p>
<p>
	ठेवूनि तेथेंच पूजासंभारा । जोग तात्काळ गेले माघारा । परतले सवें घेऊनि शिरा । सर्वां पुरा अविलंबें ॥७७॥</p>
<p>
	पुढें झाली दुपारची आरती । आधींच आणिले नैवेद्य भक्तीं । ताटें य़ेऊं लागलीं वरती । बाबा तैं वदती निजभक्तां ॥७८॥</p>
<p>
	आहे आजिचा दिवस बरवा । वाटे सांज्याचा प्रसाद व्हावा । आणवा म्हणती सत्वर मागवा । सकळांनीं सेवावा यथेष्ट ॥७९॥</p>
<p>
	मग भक्तांनीं जाऊन आणिलीं । सांज्याचीं दोन बगोणीं भरलीं । लखमीचंदांसी भूकही लागली । पाठही भरली होती पैं ॥८०॥</p>
<p>
	पोटांत भूक पाठीस कणकण । तेणें लखमीचंद अस्वस्थमन । बाबांच्या मुखीं तैं येई जें वचन । श्रोतीं अवधान देइजे ॥८१॥</p>
<p>
	“भूख लगी है अच्छा हुवा । कमरमें दर्द चाहिये दवा । अब सांजेकी चली है हवा ।  करो सवार आरतीं” ॥८२॥</p>
<p>
	जें जें लखमींचंदांचे मनीं । तें तें परिस्फुट बाबांचे वचनीं । शब्दावीण प्रतिध्वनी । अंतर्ज्ञानी महाराज ॥८३॥</p>
<p>
	असो पूर्ण होतां आरती । सांजा मिळाला भोजनवक्तीं । पुरली लखमीचंदांची आसक्ती । आनंद चित्तीं जाहला ॥८४॥</p>
<p>
	तेथूनि बाबांवर जडलें प्रेम । उदबत्ती नारळ माळेचा नेम । लखमीचंदही लाधले क्षेम । पूजा उपक्रम चालला ॥८५॥</p>
<p>
	जडली एवढी साईंवर भक्ति । जाणारा लाधतां शिरडीप्रति । माळ दक्षिणा कापूर उदबती । तया हातीं पाठविती ॥८६॥</p>
<p>
	कोणीही जावो शिरडीप्रती । लखमीचंद्रांस लागतां माहिती । या तीन वस्तु दक्षिणासमवेती । बाबांस पाठविती नेमानें ॥८७॥</p>
<p>
	त्याच खेपेस चावडीचे निशीं । समारंभ तो पाहावयासी । जातां बाबांस उठली खांसी । कासावीसी जाहली ॥८८॥</p>
<p>
	लखमीचंद मनीं म्हणत । काय ही खांसी त्रास देत । वाटे लोकांची द्दष्टी लागत । खोकला उठत त्यापायीं ॥८९॥</p>
<p>
	ही तों  मनाची केवळ वृत्ति । उठली लखमीचंदांचे चित्तीं । येतां सकाळीं मशिदीप्रती । बाबाही अनुवदती नवल पहा ॥९०॥</p>
<p>
	येतां माधवराव तयांप्रती । आपण होऊन बाबा वदती । काल झाला मज खोकला अती । ही काय कृती द्दष्टीची  ॥९१॥</p>
<p>
	वाटे मज कोणाची तरी । द्दष्टचि लागली आहे खरी । तेणें हा खोकला परोपरी । करी बेजारी जीवाची ॥९२॥</p>
<p>
	आश्चर्य लखमीचंदांचे अंतरीं । ही तों अनुवृत्ति आपुलीच खरी । कैसें हें बाबांस कळलें तरी । सर्वां अंतरीं वसती कीं ॥९३॥</p>
<p>
	मग तो विनवी कर जोडूनी । बहु आनंदलों आपुले दर्शनीं । तरी ऐसीच कृपा करोनी । महाराजांनीं रक्षावें ॥९४॥</p>
<p>
	आतां मज या पायांवांचुनी । देवचि नाहीं आणिक जनीं । मन हें रमो आपुले भजनीं । आपुलेच चरणीं सर्वदा ॥९५॥</p>
<p>
	म्हणे चरणीं ठेवितों माथा । निरोप मागतों साई - समर्था । आज्ञा असावी आम्हां आतां । असेंचि अनाथां सांभाळा ॥९६॥</p>
<p>
	असावी नित्य कृपाद्दष्टि । जेणें न होऊं संसारीं कष्टी । लाधो तव नामसंकीर्तनपुष्टी । सुखसंतुष्टी सर्वथा ॥९७॥</p>
<p>
	घेऊनि उदी साशीर्वाद । पावोनि स्नेह्यांसहित आनंद । मार्गीं गात साईगुणानुवाद । लखमीचंद परतला ॥९८॥</p>
<p>
	ऐसीच आणीक दुसरी चिडी । बांधूनि बाबांनीं आणिली शिरडीं । येतां प्रत्यक्ष दर्शनाची घडी । नवलपरवडी  परिसा ती ॥९९॥</p>
<p>
	चिडी ती एक प्रेमळ बाई । तिचिया कथेची परम नवलाई । बर्‍हाणपुरीं द्दष्टान्त होई । महाराज साई पाही ती ॥१००॥</p>
<p>
	कधींही नव्हतें प्रत्यक्ष दर्शन । तरी त्या बाईस जाहलें स्वप्न । बाबा तियेच्या द्वारीं येऊन । खिचडी - भोजा मागती ॥१०१॥</p>
<p>
	बाई तत्काळ होऊन जागी । पाही तों नाहीं कोणीही जागीं । दष्टान्त कथिला लागवेगीं । समस्तांलागीं तियेनें ॥१०२॥</p>
<p>
	पति तियेचा तेच शहरीं । तेथील टपालखात्याचा अधिकारी । पुढें अकोल्यास बदलल्यावरी । केली तयारी शिरडीची ॥१०३॥</p>
<p>
	दंपत्य होतें मोठें भाविक । जाहलें साईदर्शनकामुक । वाटलें द्दष्टान्ताचें कौतुक । माया अलौकिक साईंची ॥१०४॥</p>
<p>
	पुढें सोईचा पाहूनि दिन निघालीं दोघें शिरडी लक्षून । मार्गांत गोमती तीर्थ वंदून । शिरडीलागून पातलीं ॥१०५॥</p>
<p>
	प्रेमें घेऊनि बाबांचें दर्शन । करूनियां भावें पूजन । नित्य बाबांचे चरण सेवून । सुखसंपन्न जाहली ॥१०६॥</p>
<p>
	ऐसें तें दंपत्य आनंदमनें । राहिलें शिरडींत दोन महिने । बाबाही तुष्टले खिचडी - भोजनें । भावभक्तीनें तयांच्या ॥१०७॥</p>
<p>
	खिचडीनैवेद्य - समर्पणार्थ । दंपत्य आलें शिरडीप्रत । चतुर्दशदिन होतां ही गत । खिचडी अनिवेदित तैशीच ॥१०८॥</p>
<p>
	कृतसंकल्प दीर्घसूत्रता । नावडूनि ती बाईचे चित्ता । पंधरावे दिवशीं माध्यान्ह भरतां । खिचडीसमवेत पातली ॥१०९॥</p>
<p>
	होते तेव्हां पडदे सोडिले । घेऊइ समवेत भक्त आपुले । बाबा आधींच भोजनीं बैसले । ऐसें समजलें बाईस ॥११०॥</p>
<p>
	ऐसें भोजन चालते समयीं । पडद्याचे आंत कोणी न जाई । परी त्या बाईस जाहली घाई । खालीं न राही ती उगली ॥१११॥</p>
<p>
	केवळ खिचडी - निवेदनोह्लासा । अकोल्याहून शिरडीचे प्रवासा । अंगिकारी जी तियेचा धिंवसा । राहील कैसा अपूर्व ॥११२॥</p>
<p>
	कोणाचेंही कांहीं न मानितां । पडदा स्वहस्तें सारून वरता । करूनि निजप्रवेश निजसत्ता । कामनापूर्तता साधिली ॥११३॥</p>
<p>
	तेव्हां बाबांनीं नवल केलें । खिचडीलागीं इतुके भुकेले । कीं तीच आधीं मागूं सरले । ताटचि धरिलें दों हातीं ॥११४॥</p>
<p>
	खिचडी पाहूनि जाहला उल्हास । उचलूनियां घांसावर घांस । बाबांनीं सूदिले निजमुखास । कौतुक समस्तांस वाटलें ॥११५॥</p>
<p>
	पाहूनि बाबांची ती आतुरता । विस्मय दाटला सर्वांचे चित्ता । खिचडीची कथा परिसतां । वाटली अलौकिकता साईंची ॥११६॥</p>
<p>
	आतां येथून पुढील कथा । ऐकतां प्रेम दाटेल चित्ता । एक गुजराती ब्राम्हाण सेवेकरितां । आला अवचितां शिरडीस ॥११७॥</p>
<p>
	रावबहादूर साठयांचे पदरीं । आरंभीं केली जयानें चाकरी । तया शुद्ध सेवाभ्यंतरीं । लाधली पायरी बाबांची ॥११८॥</p>
<p>
	तीही कथा बहुत गोड । जयासी भक्तिप्रेमाची आवड । कैसें श्रीहरी पुरवी कोड । मनाची होड तें परिसा ॥११९॥</p>
<p>
	मेघा तयाचें नामाभिधान । साईंसवें ऋणानुबंधन । तेणें तो पावला शिरडी स्थान । कथानु - संधानतत्पर व्हा ॥१२०॥</p>
<p>
	साठे खेडाजिल्ह्याचे प्रांत । तेथें हा मेघा भेटला अवचित । ठेविला तयास तैनातींत । शिवालयीं नित्य पूजसे ॥१२१॥</p>
<p>
	पुढें हे साठे शिरडीस आले । तेंच तयांचें भाग्य उदेलें । तेथें महाराज साई जोडले । चित्त जडलें तच्चरणीं ॥१२२॥</p>
<p>
	त्रायेकर्‍यांचा पाहूनि रगडा । झाला तयांचे मनाचा धडा । असावा येथें आपुला वाडा । सोय बिर्‍हाडा लागेला ॥१२३॥</p>
<p>
	मग पुढारी ग्रामस्थ मिळविले । तया जागेचें संपादन केलें । जेथें बाबा आरंभीं प्रकटले । वाडयाचें ठरविलें तें स्थल ॥१२४॥</p>
<p>
	या पवित्र जागेचें महिमान । चतुर्थाध्यायींच पूर्ववर्णन । द्विरुक्तीचें नाहीं प्रयोजन । चालवूं निरूपण पुढारा ॥१२५॥</p>
<p>
	असो मेघाचें संचित मोठें । लाधले रावबहादुर साठे । तेव्हांच तो  लागला परमार्थवाटे । नेटेंपाटें तयांच्या ॥१२६॥</p>
<p>
	परिस्थितीस होऊनि वश । पावला होता कर्मभ्रंश । तयास देऊनि गायत्र्युपदेश । करविला प्रवेश सन्मार्गीं ॥१२७॥</p>
<p>
	मेघा साठयांचे सेवेस लागला । परस्परांशीं आदर वाढला । गुरुच मेघा भावी साठयांला । लोभही जडला तयांचा ॥१२८॥</p>
<p>
	असो एकदां सहज बोलतां । निजगुरूचें माहात्म्य वानितां । प्रेम दाटलें साठयांचे चित्ता । मेघास सादरता पूसती ॥१२९॥</p>
<p>
	बाबांस घालावें गंगोदकस्नान । इच्छा ही माझी मनापासून । तदर्थ तुज शिरडीलागून । पाठवितों जाण मुख्यत्वें ॥१३०॥</p>
<p>
	शिवाय तुझी अनन्य सेवा । पाहूनि वाटे माझिया जीवा । सद्नुरूचा तुज संगम घडावा । पायीं जडावा तव भाव ॥१३१॥</p>
<p>
	सार्थक होईल तव देहाचें । परम कल्याण या जन्माचें । जा जा काया  - मनें - वाचें । लागें सद्नुरूचे पायांस ॥१३२॥</p>
<p>
	मेघा पुसे तयांची जात । वस्तुत: साठयांसही ती अज्ञात । म्हणती कोणी अविंधही वदत । बैसती मशिदींत म्हणवूनि ॥१३३॥</p>
<p>
	अविंध हा शब्द कानीं पडतां । जाहली मेघामनीं दुश्चित्तता । नाहीं नीच यवनापरता ॥ काय गुरुत तयाची ॥१३४॥</p>
<p>
	नाहीं म्हणतां साठे क्षोभती । होय म्हणतां पावेल दुर्गती । करावें काय चालेना मती । चिंतावर्तीं तो पडला ॥१३५॥</p>
<p>
	इकडे आड तिकडे विहीर । दोलायमान मनीं अस्थिर । परी साठयांचा आग्रह फार । केला निर्धार दर्शनाचा ॥१३६॥</p>
<p>
	पुढें मेघा शिरडीस आला । मशिदीचे अंगणीं पातला । पायरी जों चढूं लागला । बाबांनीं लीला आरंभिली ॥१३७॥</p>
<p>
	उग्र स्वरूप धारण केलें । पाषाण हातीं घेऊन वदले । खबरदार पायरीवर पाऊल ठेविलें । यवनें वसविलें हें स्थान ॥१३८॥</p>
<p>
	तूं तो ब्राम्हाण उंच वर्ण । मी तों नीचाचा नीच यवन । होईल विटाळ तुजलागून । जाईं परतोन माधारा ॥१३९॥</p>
<p>
	तें कातावलेपणाचें रूप । दुजें प्रळयरुद्राचें स्वरूप । पहाणारांस होत थरकांप । चळी कांपत तंव मेघा ॥१४०॥</p>
<p>
	परी हा राग केवळ वरवर । अंतरी दयेचा वाहे पूर । मेघा थक्क विस्मयनिर्भर । कैसें मदंतर कळलें यां ॥१४१॥</p>
<p>
	कोठें खेडा जिल्हा दूर । कोठें लांब अहमदनगर । माझें विकल्पाकृष्ट अंतर । आविष्करण हें त्याचें ॥१४२॥</p>
<p>
	बाबा जों जों मारूं धांवत । तों तों मेघाचें धैर्य खचत । पाऊल एकेक मागेंच पडत । जावया न धजत पुढार ॥१४३॥</p>
<p>
	तैसाच कांहीं दिवस राहिला । बाबांचा रागरंग पाहिला । शक्य ती सेवा करीत गेली । परी न पटला द्दढ विश्वास ॥१४४॥</p>
<p>
	पुढें मग तो घरासी गेला । ज्वरार्त झाला अंथरुणीं खिळिला । तेथें बाबांचा ध्यास लागला । परतोनि आला शिरडीस ॥१४५॥</p>
<p>
	तो जो आला तोच रमला । साईपायीं भाव जडला साईंचा अनन्य भक्त जाहला । साईच त्याजला एक देव ॥१४६॥</p>
<p>
	मेघा आधींच शंकरभक्त । होतां साईपदीं अनुरक्त । शंकरचि भावी साईनाथ । तोच उमानाथ तयाचा ॥१४७॥</p>
<p>
	करी मेघा अहर्निश । साईशंकर - नामघोष । बुद्धिही तदाकार अशेष । चित्त किल्मिषविरहित ॥१४८॥</p>
<p>
	झाला साईंचा अनन्य भक्त । साईंस प्रत्यक्ष शंकर भावित । शंकर शंकर मुखें गर्जत । अन्य दैवत मानीना ॥१४९॥</p>
<p>
	साईच त्याचें देवतार्चन । साईच त्याचा गिरिजारमण । येच द्दष्टीचा ठाय घालून । नित्य प्रसन्नमन मेघा ॥१५०॥</p>
<p>
	शंकरास बेलाची आवड । शिरडींत नाहीं बेलाचें झाडा । मेघा तदर्थ कोस दीडकोस । जाऊनि निज चाड पुरवीतसे ॥१५१॥</p>
<p>
	दीड कोसाचा काय पाड । बेलालागीं लंघिता पहाड । परी पूजेचें पुरविता कोड । फेडिता होड मनाची ॥१५२॥</p>
<p>
	लांबलांबून बेल आणावा । पूजासंभार पूर्ण मिळवावा । ग्रामदेवांचा अनुक्रम घ्यावा । सर्वांस वहावा यथाविधी ॥१५३॥</p>
<p>
	मग त्याच पावलीं जावें मशिदीं । प्रेमें वंदावी बाबांची गादी । करूनियां पादसंवाहनादि । पादतीर्थ आधीं सेवी तो ॥१५४॥</p>
<p>
	मेघाचिया आणिक कथा । आनंद होईल श्रवण करितां । ग्रामदेवांविषयीं आदरता । दिसेल व्यापकता साईंची ॥१५५॥</p>
<p>
	मेघा शिरडीस असेपर्यंत । दुपारची आरती करी तो नित । परी आधीं ग्रामदेव समस्त । पुजूनी मशिदींत जात असे ॥१५६॥</p>
<p>
	ऐसा तयाचा नित्यक्रम । एके दिसीं चुकला हा अनुक्रम । खंडोबाच्या पूजेचा अतिक्रम । घडला परिश्रम करितांही ॥१५७॥</p>
<p>
	पूजा कराया केला यत्न । द्वार न उघडे करितां प्रयत्न । म्हणून ती पूजा तैसीच वगळून । आला तो घेऊन आरती ॥१५८॥</p>
<p>
	तेव्हां बाबा वदती तयाला । पूजेंत त्वां आजला खंड पाडिला । पूजा पावल्या सर्व देवांला । एक राहिला पूजेविण ॥१५९॥</p>
<p>
	जा ती करूनि ये मग येथें । मेघा वदे दार बंद होतें । उघडूं जातां उघडेना तें । वगळणें पूजेतें भाग आलें ॥१६०॥</p>
<p>
	बाबा वदती जा तूं पाहें । दार आतां उघडें आहे । मेघा तात्काळ जाय लवलाहें । अनुभव लाहे बोलाचा ॥१६१॥</p>
<p>
	खंडेरायाची पूजा केली । मेघाचीही मळमळ गेली । पुढें बाबांनीं करूं दिधली । पूजा आपुली मेघाला ॥१६२॥</p>
<p>
	मग गंधपुष्पादि - अष्टोपचार । पूजा समर्पी अति सादर । यथाशक्ति दक्षिणा हार । फलभारही अर्पितसे ॥१६३॥</p>
<p>
	एकदां मरसंक्रांति - दिनीं । गोदावरीचें आणूनि पाणी । बाबांस अभ्यंग चंदन चर्चुनी । घालावें स्नान मनीं आलें ॥१६४॥</p>
<p>
	आज्ञेलागीं पिच्छा पुरवितां । इच्छेस येईल तें कर जा म्हणतां । मेघा घागर घेऊनि तत्त्वतां । पाण्याकरितां निघाला ॥१६५॥</p>
<p>
	आला न उदयाचलीं जो तरणी । मेघा निघे रिक्तकलशपाणी । निरातपत्र अनवाणी । आणूं पाणी गोमतीसी ॥१६६॥</p>
<p>
	जातां येतां आठ कोस । लागेल मार्ग क्रमावयास । पडतील कष्ट आणि सायास । स्वप्नींही तयास येईना ॥१६७॥</p>
<p>
	ही तों मेघास नाहीं चिंता । निघाला तो अनुज्ञा मिळतां । असतां निश्चयाची द्दढता । कार्योह्लासता सवेंच ॥१६८॥</p>
<p>
	गंगोदकें साईंस स्नान । घालावें ऐसें होतां मन । कैंचे सायास कैंचा शीण । एक प्रमाण द्दढ श्रद्धा ॥१६९॥</p>
<p>
	असो ऐसें तें पाणी आणिलें । ताम्र - गंगालयीं रिचविलें । स्नानार्थ उठावें आग्रह चालले । परी न मानिलें बाबांनीं ॥१७०॥</p>
<p>
	माध्यान्हींची आरती झाली । मंडळी घरोघर निघोनि गेली । झाली स्नानाची तयारी सकळी । दुपार भरली मेघा वदे ॥१७१॥</p>
<p>
	पाहूनि मेघा अत्याग्रही । मग तो साई लीलाविग्रही । कर मेघाचा निजकरांहीं । धरूनि पाहीं संबोधी ॥१७२॥</p>
<p>
	नको रे मज गंगास्नान । ऐसा कैसा तूं नादान । किमर्थ मज फकीराकारण । गंगाजीवन मज काय ॥१७३॥</p>
<p>
	परी मेघा तें कांहीं न ऐके । शंकरासम जो बाबांस लेखे । गंगास्नानें शंकर हरिखे । हें एकचि ठाउकें तयातें ॥१७४॥</p>
<p>
	म्हणे बाबा आजिचा दिन । मकरसंक्रांतीचा सण । गंगोदकें शंकर स्नपन । करितां सुप्रसन्न तो होई ॥१७५॥</p>
<p>
	मग पाहूनि तयाचें प्रेम । आणि तयाचा अढळ नेम । म्हणती पुरवीं तुझाचि काम । शुद्धांतर्याम मेघाचें ॥१७६॥</p>
<p>
	ऐसें म्हणूनि मग ते उठले । स्नानार्थ मांडिल्या पाटावर बसले । मस्तक मेघापुढें ओढवलें । म्हणती इवलेंसें जळ घालीं ॥१७७॥</p>
<p>
	सकळ गात्रीं शिर प्रधान । करीं तयावरी लव जळसिंचन । तें पूर्ण स्नान केलियासमान । हें तरी मान रे इतुकें ॥१७८॥</p>
<p>
	बरें म्हणूनि कलश उचलिला । शिरीं ओततां प्रेमा जो दाटला । ‘हर गंगे’ म्हणूनि तो रिचविला । सबंध ओतिला अंगावर ॥१७९॥</p>
<p>
	मेघास अत्यंत आनंद झाला । माझा शंकर सचैल न्हाणिला । घडा रिता जैं खालीं ठेविला । पाहूं लागला नवल तो ॥१८०॥</p>
<p>
	सर्वांगीं जरी ओतलें उदक । शिरचि तेवढें ओलें एक । इतर अवयव सुके ठाक । वस्त्रींही टांकन जलाचा ॥१८१॥</p>
<p>
	मेघा जाहला गलिताभिमान । निकटवर्ती विस्मयापन्न । ऐसे भक्तांचे लाड आपण । पुरवीत संपूर्ण श्रीसाई ॥१८२॥</p>
<p>
	तुझ्या मनीं घालावें स्नान । जा घाल तुझ्या इच्छेसमान । त्यांतही माझ्या अंतरींची खूण । सहज जाण लाधसील ॥१८३॥</p>
<p>
	हेंच साईभक्तीचें वर्म। व्हावा मात्र सुदैवें समागम । मग तया कांहीं न दुर्गम । सर्वचि सुगम क्रमेंक्रमें ॥१८४॥</p>
<p>
	बसतां उठतां वार्ता करितां । सकाळा दुपारा फेरिया फिरतां । भक्त श्रद्धा स्थैर्य धरितां । ईप्सितार्था संपादी ॥१८५॥</p>
<p>
	परी ऐसी कांहीं खूण । प्रत्यक्ष व्यवहारीं पटवून । क्रमानुसार गोडी लावून । परमार्थाकलन तो करवी ॥१८६॥</p>
<p>
	ऐसीच मेघाची आणीक कथा । सुखावतील श्रोते परिसतां । भक्तप्रेम साईंचें पाहतां । आनंद चित्ता होईल ॥१८७॥</p>
<p>
	बाबांची एक मोठी छबी । होती नानांनीं जी दिधली नवी । तीही मेघा वाडयांत ठेवी । पूजेस लावी भक्तीनें ॥१८८॥</p>
<p>
	मशिदींत प्रत्यक्ष मूर्ती । वाडयांत प्रतिमा पूर्ण प्रतिकृती । दोनी स्थळीं पूजा आरती । अहोरात्रीं चालली ॥१८९॥</p>
<p>
	ऐसी सेवा होतां होतां । सहज बारा मास लोटतां । मेघा पहांटे जागृत असतां । देखिलें द्दष्टान्ता तयानें ॥१९०॥</p>
<p>
	असतां मेघा शेजेप्रती । जरी निमीलित नेत्रपातीं । अंतरीं असतां पूर्ण जागृति । पाहे स्पष्टाकृति बाबांची ॥१९१॥</p>
<p>
	बाबाही जाणूनि तयाची जागृती । अक्षता टाकूनि बिछान्यावरती । ‘मेघा त्रिशूल काढीं रे’ म्हणती । गुप्त होती तेथेंच ॥१९२॥</p>
<p>
	हे बाबांचे शब्द परिसतां । डोळे उघडले अति उल्हासता । पाहूनि बाबांची अंतर्धानता । बहुविस्मयता मेघास ॥१९३॥</p>
<p>
	मेघा तंव पाही चोहोंकडे । तांदूळ शेजेवर जिकडे तिकडे । वाडयाचीं पूर्ववत बंद कवाडें । पडलें तें कोडें तयास ॥१९४॥</p>
<p>
	मशिदीस जाऊनि तत्काळीं । बाबांचें दर्शन घेतेवेळीं । मेघानें त्रिसूळकथा कथिली । आज्ञा गागितली त्रिशूळाची ॥१९५॥</p>
<p>
	द्दष्टान्त साद्यंत मेघानें कथिला । बाबा वदती “द्दष्टान्त कसला । शब्द नाहीं का माझा परिसिला । काढ म्हणितला त्रिशूळ तो ॥१९६॥</p>
<p>
	द्दष्टान्त म्हणूनि माझे बोल । जातां काय कराया तोल । बोल माझे अर्थ सखोल । नाहीं फोल अक्षरही” ॥१९७॥</p>
<p>
	मेघा म्हणे आपण जागविलें । ऐसेंच आरंभीं मजही वाटलें । परी दार नव्हतें एकही खुलें । म्हणून मानिलें तें तैसें ॥१९८॥</p>
<p>
	तयास बाबांचें ऐका उत्तर । ‘माझिया प्रवेशा नलगे दार । नाहीं मज आकार ना विस्तार । वसें निरंतर सर्वत्र ॥१९९॥</p>
<p>
	टाकूनियां मजवरी भार । मीनला जो मज साचार । तयाचे सर्व शरीरव्यापार । मी सूत्रधार चालवीं” ॥२००॥</p>
<p>
	असो पुढें नवल विंदान । त्रिशूलाचें प्रयोजन । श्रोतां परिसिजे सावधान । येईल अनुसंधान प्रत्यया ॥२०१॥</p>
<p>
	येरीकडे मेघा जो परतला । त्रिशूळ काढावया आरंभ केला । वाडियांत छबीनिकट भिंतीला । त्रिशूळ रेखाटिला रक्तवर्ण ॥२०२॥</p>
<p>
	दुसरेच दिवशीं मशिदींत । आला पुण्याहूनि रामदास भक्त । प्रेमें बाबांस नमस्कारीत । लिंग अर्पीत शंकराचें ॥२०३॥</p>
<p>
	इतक्यांत मेघाही तेथें आला । बाबांसी साष्टांग प्रणाम केला । बाबा म्हणती “हा शंकर आला । सांभाळीं याजला तूं आतां” ॥२०४॥</p>
<p>
	ऐसें होतां लिंग प्राप्त । त्रिशूळ - द्दष्टान्तापाठीं अवचित । मेघा तटस्थ लिंगचि देखत । प्रेमें सद्नदित जाहला ॥२०५॥</p>
<p>
	आणीक पाहाया लिंगाचा अनुभव । काकासाहेब दीक्षितांचा अपूर्व । श्रोतां सादर परिसिजे सर्व । जडेल भरंवसा साईपदीं ॥२०६॥</p>
<p>
	येरीकडे जो लिंग घेऊनी । निघे मेघा मशिदींतुनी । दीक्षित - वाडयांत स्नान सारुनी । नामस्मरणीं निमग्न ॥२०७॥</p>
<p>
	धूतवस्त्रें अंग पुसून । शिळेवरी उभें राहून । टुवाल डोईवर घेऊन । करीत स्मरण साईंचें ॥२०८॥</p>
<p>
	नित्यनेमा अनुसरून । शिरोभाग आच्छादून । करीत असतां नामस्मरण । लिंगदर्शन जाहलें ॥२०९॥</p>
<p>
	चाललें असतां नामस्मरण । आजचि कां व्हावें लिंगदर्शन । ऐसें जों दीक्षित विस्मयापन्न । मेघा सुप्रसन्न सन्मुख ॥२१०॥</p>
<p>
	म्हणे मेघा ‘पहा काका । लिंग बाबांनीं दिधलें विलोका’ । काका पावले सविस्मय हरिखा । लिंगविशेखा देखुनी ॥२११॥</p>
<p>
	रूपरेखा आकार लक्षणीं । आलें ध्यानीं जें पूर्वक्षणीं । तेंच तें लिंग पाहूनि तत्क्षणीं । दीक्षित मनीं सुखावले ॥२१२॥</p>
<p>
	असो पुढें मेघाचे हातून । त्रिशूळलेखन होऊनि पूर्ण । छबीसंनिध लिंग स्थापन । साईंनीं करवून घेतलें ॥२१३॥</p>
<p>
	मेघास आवडे शंकरपूजन । करून शंकरलिंगप्रदान । केलें तद्भक्तीचें द्दढीकरण । नवल विंदान साईंचें ॥२१४॥</p>
<p>
	ऐसी काय एक कथा । सांगेन ऐशा अपरिमिता । परी होईल ग्रंथविस्तरता । म्हणूनि श्रोतां क्षमा कीजे ॥२१५॥</p>
<p>
	तथापि तुम्ही श्रवणोत्सुक । म्हणोन कथीन आणिक एक । पुढील अध्यायीं साईंचें कौतुक । याहून अलौकिक दिसेल ॥२१६॥</p>
<p>
	होऊन हेमाड साईंसीं शरण । करवी साईचरित्र श्रवण । होईल तेणें भवभयहरण । दुरितनिवारण सकळांचें ॥२१७॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । द्दष्टान्तकथनं नाम अष्टाविंशतितमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 14:25:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 14:51:30 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय २७]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-27-122042600046_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
द्दढ धरिल्या श्रीसद्नुरुचरण । घडे ब्रम्हादित्रैमूर्तिनमन । साक्षात्परब्रम्हाभिवंदन । स्वानंदघन सुप्रकट ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 27" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650963287-9912.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra chapter 27" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	द्दढ धरिल्या श्रीसद्नुरुचरण । घडे ब्रम्हादित्रैमूर्तिनमन । साक्षात्परब्रम्हाभिवंदन । स्वानंदघन सुप्रकट ॥१॥</p>
<p>
	मारितां एका सागरीं बुडी । साधती सकल तीर्थपरवडी । बैसतां गुरुपदीं देऊनि दडी । आतुडती बुडीं सकल देव ॥२॥</p>
<p>
	जय जयाजी साई सद्नुरू । जय जयाजी सायुज्यकल्पतरू । जय जयाजी निजबोधसागरू । कथेसी आदरू उपजवीं ॥३॥</p>
<p>
	मेघोदकालागीं चातक । तैसे तव कथामृता भाविक । सेवोत तुझे भक्त सकळिक । पावोत सुख सदैव ॥४॥</p>
<p>
	परिसतां तव कथा निर्मळ । स्वेद अंगीं फुटो निखळ । नेत्रीं दाटो प्रेमजळ । प्राण पांगुळला राहो ॥५॥</p>
<p>
	मना येवो गहिंवर । रोमांच उठोत वरचेवर । रुदन स्फुंदन वारंवार । घडो सपरिवार श्रोतयां ॥६॥</p>
<p>
	तुटूनि जावोत परस्परविरोध । सानथोर भेदाभेद । हाच गुरुकृपावबोध । करावा शोध अंतरीं ॥७॥</p>
<p>
	येई न हा द्दष्टीं दावितां । सर्वेंद्रियां याची अगोचरता । सद्नुरुवीण याचा दाता । न मिळे धुंडितां त्रिभुवनीं ॥८॥</p>
<p>
	कामादि षड्‌विकारोपशम । भक्तिभाव नि:सीम प्रेम । नुपजतां गुरुपदीं निष्ठा परम । होई न उद्नम अष्टभावां ॥९॥</p>
<p>
	भक्ताचें जें निजसुख । तेणेंचि गुरूसि परम हरिख । भक्त जों जों परमार्थोन्मुख । तों तों कौतुक गुरूतें ॥१०॥</p>
<p>
	देह गेह पुत्र जाया । मी माझें  हा व्या वायां । ही तों सर्व क्षणिक माया । जैसी छाया दुपारची ॥११॥</p>
<p>
	बाधूं नये मायेची गुंती । ऐसें जरी असेल चित्तीं । अनन्यभावें साईंप्रती । शरणागती संपादा ॥१२॥</p>
<p>
	लावावया मायेचा अंत । वेदशास्त्रीं टेकिले हात । पाहील जो भूतीं भगवंत । तोचि तो निश्चित तरेल ॥१३॥</p>
<p>
	सोडूनियां निजामशाई । धन्य तो पाटील चांदभाई । सवें घेऊनि फकीर साई । आरंभीं येई नेवासिया ॥१४॥</p>
<p>
	तेथें वर्ष सहा मास । फकीराचा होई निवास । तेथेंच कानड गावींच्या कमास । सहवासास ठेवियलें ॥१५॥</p>
<p>
	असो पुढें प्रसिद्ध टाकळी । घेऊन तेथील दगडू तांबोळी । कमा - बाबांसमवेत ही मंडळी । तेथून आली शिर्डीस ॥१६॥</p>
<p>
	जागोजागीं अपरिमित । पवित्र स्थळें तीर्थें बहुत । परी साईंच्या भक्तांप्रत । शिरडीच अत्यंत पवित्र ॥१७॥</p>
<p>
	जरी न दैवें येता हा योग । कैंचा मग हा महाभाग । आम्हां दीनां हा संयोग । महद्भाग्य हें आमुचें ॥१८॥</p>
<p>
	जे जे भक्त शरणागत । साधावया तत्कार्यार्थ । साई तयांस दावी यथार्थ । सन्मार्ग हितार्थ तयांच्या ॥१९॥</p>
<p>
	तरी श्रोतां एकाग्रमन । होऊनि करा सच्चरितावर्तन । तें हें परम गुरुकृपासाधन । चरित्र पावन साईंचें ॥२०॥</p>
<p>
	गताध्यायीं निरूपण । एकास निजगुरुपदीं स्थापन । अक्कलकोट स्वामींची खूण । एकास देऊन जागविलें ॥२१॥</p>
<p>
	एकाचा चुकविला आत्मघात । युक्ति योजूनि अकल्पित । जीवदान दिधलें क्षणांत । ओढवला देहान्त टाळुनी ॥२२॥</p>
<p>
	आतां या अध्यायीं कथन । कधीं साई कैसे प्रसन्न । होऊन करीत अनुग्रहदान । सुखसंपन्न भक्तांस ॥२३॥</p>
<p>
	दीक्षाप्रकार तो अद्भत । कैसा कवणालागीं होत । विनोदपूर्ण हांसत खेळत । श्रोते परिसोत सावचित्त ॥२४॥</p>
<p>
	उपदेशाच्या अनेक रीती । मागां वर्णिल्या येच ग्रंथीं । जैसी ज्याची ग्राहकस्थिती । मार्ग उपदेशिती तैसाच ॥२५॥</p>
<p>
	वैद्य जाणे रोगाचें निदान । तयास ठावा मात्रेचा गुण । रोग्यास नाहीं त्याची जाण । आधीं आण गूळ म्हणे ॥२६॥</p>
<p>
	गूळ गोड परी अपकारी । रोगी तदर्थचि हट्ट घरी । घेई न वाटी औषधाची करीं । गूळ करावरी न ठेवितां ॥२७॥</p>
<p>
	चाले न रुग्णावरी सक्ती । वैद्य तेव्हां युक्ति योजिती । आधीं गूळ मग औषध देती । परी साधिती निजकार्य ॥२८॥</p>
<p>
	मात्र अनुपान तेवढें बदलती । जेणें गुळाचे दोष हरपती । योजिलीं औषधें कार्यक्षम होती । तेच कीं रीती बाबांची ॥२९॥</p>
<p>
	हाच नव्हे सर्वत्र नियम । अधिकार आणि मनोधर्म । जैसी सेवा भक्त - प्रेम । तैसाच उपक्रम अनुग्रहा ॥३०॥</p>
<p>
	नवल बाबांची अद्भुत कृती । जेव्हां कोणा प्रसन्न होती । तया मग ते अनुग्रह देती । कवण्या स्थितीं तें परिसा ॥३१॥</p>
<p>
	आलें एकदां तयांचे चित्ता । ध्यानीं मनीं कोणाच्या नसतां । सहज थट्टा विनोद करितां । भक्तकृतार्थता साधीत ॥३२॥</p>
<p>
	इच्छा उद्भवतां ग्रंथवाचनीं । सहज येई भक्तांच्या मनीं । ग्रंथ बाबांच्या हातीं देऊनि । प्रसाद म्हणूनि तो घ्यावा ॥३३॥</p>
<p>
	पुढें मग त्या ग्रंथाचें वाचन । केलिया होईल श्रेयसंपादन । श्रोत्यावक्त्यांचें परमकल्याण । प्रसादपूर्ण श्रवण तें ॥३४॥</p>
<p>
	कोणी दशावतार चित्रें । कोणी दशावतारांचीं स्तोत्रें । कोणी पंचरत्नी गीतेसम पवित्रें । पुस्तकें चरित्रें अर्पीत ॥३५॥</p>
<p>
	दासगणूही संतलीलामृत । भक्तलीलामृतही अर्पीत । कोणी विवेकसिंधु ग्रंथ । बाबा ते देत शामातें ॥३६॥</p>
<p>
	पुस्तकें शामा हीं तुजला  व्हावीं । म्हणती घरीं बांधून ठेवीं । शामानें आज्ञा शिरीं वंदावी । पुस्तकें रक्षावीं दप्तरीं ॥३७॥</p>
<p>
	आणूनि ऐसें भक्त मनीं । ग्रंथ आणीत दुकानांतुनी । कीं बाबांचे हातीं देउनी । प्रसाद म्हणुनी मागावे ॥३८॥</p>
<p>
	स्वभाव बाबांचा जरी उदार । हेंही कराया लागे धीर । नेती माधवरावांस बरोबर । करिती समोर तयांसी ॥३९॥</p>
<p>
	तयांकरवीं बाबांचे हातीं । समय पाहूनि ग्रंथ देती । बाबांस जैसी ग्रंथांची महती । तैसीच भक्तस्थिति ठावी ॥४०॥</p>
<p>
	भक्तांनीं द्यावे ग्रंथ करीं । बाबांनीं चाळावे वरचेवरी । भक्तांनीं घ्यावया ते  माघारी । हस्त पुढारीं धरावे ॥४१॥</p>
<p>
	परी न बाबा तयांतें देती । ते तों देती माधवरावांप्रती । म्हणत शामा ठेव या प्रती । असूंदे संप्रती तुजपाशीं ॥४२॥</p>
<p>
	शामानें पुसावें स्पष्टोक्तीं । हे जे आतुरते हात पसरती । त्यांच्या त्यांस देऊं का प्रती । तरी ते वदती तूं ठेव ॥४३॥</p>
<p>
	एकदां भक्त काका महाजनी । आवड जयांस भागवतवाचनीं । सवें ग्रंथाची प्रत घेउनी । शिरडीलागुनी पातले ॥४४॥</p>
<p>
	माधवराव भेटूं आले । वाचूं म्हणून पुस्तक  उचललें । हातीं घेऊनि मशिदीं गेले । सहज पुसियेलें बाबांनीं ॥४५॥</p>
<p>
	शामा हें हातीं  पुस्तक कसलें । शामानें तें निवेदन केलें । बाबांनीं तें हातीं घेतलें । परत केलें पाहून ॥४६॥</p>
<p>
	हेंच पुस्तक हीच प्रत । हेंच नाथांचें भागवत । होतें श्रीकरप्रसादप्राप्त । महाजनींप्रत पूर्वींच ॥४७॥</p>
<p>
	ग्रंथ नव्हे तो मालकीचा । आहे काका महाजनींचा । वाचूं तात्पुरता जाहली इच्छा । स्पष्ट वाचा कळविलें ॥४८॥</p>
<p>
	तरीही बाबा वदती तयांला । ज्याअर्थीं म्यां हा तुज दिधला । ठेव तूं आपुले संग्रहाला । येईल कामाला दप्तरीं ॥४९॥</p>
<p>
	असो पुढें कांहीं कालें । पुनश्च काका शिरडीस आले । सवें आणिक भागवत आणिलें । हस्तीं ओपिलें साईंच्या ॥५०॥</p>
<p>
	प्रसाद म्हणून माघारा दिधलें । ‘नीट जीव लाव’ आज्ञापिलें । कीं तें जिवाभावाला आपुलें । येईल आश्वासिलें काकांस ॥५१॥</p>
<p>
	‘हेंच कामीं येईल आपुले । नको देऊं हें कोणास वहिलें’ । ऐसें मोठया कळकळीनें कथिलें । सप्रेम वंदिलें काकांनीं ॥५२॥</p>
<p>
	बाबा स्वयें अवाप्तकाम । पदार्थमात्रीं पूर्ण निष्काम । भागवत जयांचा आचरता धर्म । संग्रहश्रम किमर्थ ॥५३॥</p>
<p>
	कोण जाणे बाबांचें मन । परी हें ग्रंथांचें संमेलन । व्यवहारद्दष्टया अति पावन । श्रवणसाधन निजभक्तां ॥५४॥</p>
<p>
	शिरडी आतां स्थान पवित्र । देशोदेशींचे बाबांचे छात्र । होतील वेळोवेळीं एकत्र । ज्ञानसत्र मांडतील ॥५५॥</p>
<p>
	तेव्हां हे ग्रंथ येतील कामा । दप्तरांतून दावील शामा । स्वयें आपण जाऊं निजधामा । ग्रंथ प्रतिमा होतील ॥५६॥</p>
<p>
	ऐसे हे ग्रंथ परम पावन । असो शिरडी वा अन्य स्थान । वाचितां भक्तास व्हावी आठवण । संग्रहकारण असेल हें ॥५७॥</p>
<p>
	असो रामायण वा भागवत । परमार्थाचा कोणताही ग्रंथ । वाचितां रामकृष्णादिकांचें चरित । साईच दिसत मागें पुढें ॥५८॥</p>
<p>
	वाटे या ग्रंथांच्या निभूति । साईच नटला ते ते स्थिति । श्रोते वक्ते नित्य देखती । समोर मूर्ति साईंची ॥५९॥</p>
<p>
	ग्रंथ करिती गुरूस अर्पण । किंवा ब्राम्हाणा करिती दान । त्यांतही आहे दात्याचें कल्याण । शास्त्रप्रमाण ये अर्थीं ॥६०॥</p>
<p>
	हें काय स्वल्प प्रयोजन । कीं जें शामास बाबांचें नियोगजन । त्वां हें ग्रंथ गृहीं नेऊन । दप्तरीं संरक्षण करावें ॥६१॥</p>
<p>
	जैसा शामा भक्त नि:सीम । तैसेंच तयावर बाबांचें प्रेम । तयास लावावा कांहीं नियम । उदेला काम साईमनीं ॥६२॥</p>
<p>
	तंव तो पहा काय करिती । जरी शामाची इच्छा नव्हती । तरी तयावरी अनुग्रह करिती । कवण्या स्थितीं तें परिसा ॥६३॥</p>
<p>
	एके दिवशीं मशिदीसी । बुवा एक रामदासी । होता नित्यनेम तयासी । रामायणासी वाचावें ॥६४॥</p>
<p>
	प्रात:काळीं मुखमार्जन । स्नानसंध्या भस्मचर्चन । करोनि भगवें वस्त्र परिधान । अनुष्ठान मांडावें ॥६५॥</p>
<p>
	विष्णुसहस्रनामावर्तन । मागून अध्यात्मरामायण । पारायणावरी पारायण । श्रद्धापरिपूर्ण चालावें ॥६६॥</p>
<p>
	ऐसा कितीएक काळ लोटतां । माधवरावांची वेळ येतां । आलें साईसमर्थांचे चित्ता । काय ती वार्ता परिसावी ॥६७॥</p>
<p>
	फळली माधवरावांची सेवा । लावावा कांहीं नियम जीवा । भक्तिमार्गाचा प्रसाद व्हावा । लाहो विसांवा संसारीं ॥६८॥</p>
<p>
	ऐसें बाबांचे आलें मनीं । रामदासास जवळ बोलावुनी । म्हणती “पोटांत आली कळ उठुनी । आंतडीं तुटूनि पडत कीं ॥६९॥</p>
<p>
	जा. ही राही न पोटदुखी । आण कीं सत्वर सोनामुखी । मारिल्याविण थोडीसी फकी । जाई न रुखरुखी पोटाची” ॥७०॥</p>
<p>
	रामदास बिचारा  भावार्थी । खूण घालूनि ठेविली पोथी । गेला धांवत बाजाराप्रती । आज्ञावर्ती बाबांचा ॥७१॥</p>
<p>
	रामदास खालीं उतरले । इकडे बाबांनीं काय केलें । तात्काळ आसनावरूनि उठले । जवळ गेले पोथीच्या ॥७२॥</p>
<p>
	तेथें इतर पोथ्यांत होती । विष्णुसहस्रनामाची पोथी । उचलून बाबांनीं घेतली हातीं । आले मागुती स्वस्थाना ॥७३॥</p>
<p>
	म्हणती  “शामा ही पोथी कनी । पाहे पहा बहुगुणी । म्हणून देतों तुजलागुनी । ती त्वां वाचूनि पहावी ॥७४॥</p>
<p>
	एकदां मज उपजली नड । काळीज करूं लगलें धडधड । झाली जीवाची चडफड । दिसे न धडगत माझी मज ॥७५॥</p>
<p>
	ऐसिया त्या प्रसंगाला । काय सांगूं शामा मी तुजला । या पोथीचा जो उपयोग झाला । हा जीव तरला तिचेनी ॥७६॥</p>
<p>
	क्षणैक उरीं विसावा दिला । तात्काळ हा जीव गार झाला । अल्लाच वाटे पोटीं उतरला । जीव हा जगला तिचेनी ॥७७॥</p>
<p>
	म्हणोनि शामा ही तुजला नेईं । ओजें ओजें वाचीत जाईं । रोज एकादें अक्षर घेईं । आनंददायी ही मोठी” ॥७८॥</p>
<p>
	शामा म्हणे ही मजला नलगे । रामदास मज भरेल रागें । तो म्हणेल मींच त्याचे मागें । कर्म वावुगें हें केलें ॥७९॥</p>
<p>
	आधींच तो जातीचा पिसाट । माथेफिरू तापट खाष्ट । किमर्थ व्हावी ही कळ फुकट । नको कटकट ही मातें ॥८०॥</p>
<p>
	शिवाय पोथीची लिपी संस्कृत । माझी वाणी रांगडी कुश्चित । जोडाक्षरही न जिव्हेस उलटत । उच्चार स्पष्ट होई न मज ॥८१॥</p>
<p>
	पाहूनि बाबांचें कृत्य सकळ । बाबा लाविती वाटलें कळ । बाबांस शामाची केवढी कळकळ । शामास अटकळ नाहीं ती ॥८२॥</p>
<p>
	“माझा शामा असेल खुळा । परी मजला तयाचा लळा । लोभ लावी जीवा आगळा । तयाचा कळवळा मज मोठा ॥८३॥</p>
<p>
	ही विष्णुसहस्रनाममाळा । बांधीन स्वहस्तें तयाचे गळां । करीन तया भवदु:खावेगळा । लावीन चाळा वाणीला ॥८४॥</p>
<p>
	नाम पापाचे पर्वत फोडी । नाम देहाचें बंधन तोडी । नाम दुर्वासनेच्या कोडी । समूळ दवडी लोटुनी ॥८५॥</p>
<p>
	नाम काळाची मान मोडी । चुकवी जन्ममरणओढी । ऐसिया सहस्रनामाची जोडी । शाम्यास गोडी लागावी ॥८६॥</p>
<p>
	नाम प्रयत्नें घेतां चोखात । अप्रयत्नेंही नाहीं ओखट  । मुखासि आलें जरी अवचट । प्रभाव प्रकट करील ॥८७॥</p>
<p>
	नामापरीस सोपें आन । अंत:शुद्धीस नाहीं साधन । नाम जिव्हेचें भूषण । नाम पोषण परमार्था ॥८८॥</p>
<p>
	नाम घ्यावया नलगे स्नान । नामासि नाहीं विधिविधान । नामें सकळपापनिर्दळण । नाम पावन सर्वदा ॥८९॥</p>
<p>
	अखंड माझेंही नाम घेतां । बेडा पार होईल तत्त्वतां । नलगे कांहीं इतर साधनता । मोक्ष हाता चढेल ॥९०॥</p>
<p>
	जया माझे नामाची घोकणी । झालीच तयाचे पापाची धुणी । तो मज गुनियाहूनि गुणी । जया गुणगुणी मन्नामीं” ॥९१॥</p>
<p>
	हेंच बाबांचें मनोगत । तदनुसार मग ते वर्तत । शामा जरी नको म्हणत । बाबा तें सारीत खिशांत ॥९२॥</p>
<p>
	वाडवडिलांची पुण्याई सबळ । तेणेंच साईकृपेचें फळ । ऐसें हें सहस्रनाम निर्मळ । प्रपंच - तळमळ वारील ॥९३॥</p>
<p>
	इतर कर्मां लागे विधि । नाम घ्यावें कधींही निरवधी । तया न अनध्याय प्रदोष बाधी । उपासना साधी नाहीं दुजी ॥९४॥</p>
<p>
	नाथांनींही येच रीती । एका आपुल्या शेजारियावरती । हेंच सहस्रनाम मारोनि माथीं । परमार्थपंथीं सुदिलें ॥९५॥</p>
<p>
	नाथांघरीं नित्य पुराण । शेजारी जातीचा ब्राम्हाण । होता स्नानसंध्याविहीन । दुराचरणनिमग्न ॥९६॥</p>
<p>
	कधीं करीना पुराणश्रवण । वाडयांत पाऊल ठेवीना दुर्जन । नाथ होऊनियां सकरुण । केलें पाचारण तयास ॥९७॥</p>
<p>
	उंचवर्णीं असोनि जन्म । वायां जातो हें जाणोनि वर्म । नाथांस उपजली कृपा परम । कैसा ह उपरम पावेल ॥९८॥</p>
<p>
	म्हणोन तयानें नको म्हणतां । सहस्रनामाची दिधली संथा । एकेक श्लोक पढवितां पढवितां । निजोद्धारता लाधला ॥९९॥</p>
<p>
	या सहस्र नामाचा पाठ । चित्तशुद्धीचा मार्ग धोपट । परंपरागत हा परिपाठ । तेणेंच ही आटाट बाबांना ॥१००॥</p>
<p>
	तों आले रामदास जलद । घेऊनि सोनामुखी अगद । अण्णा उभेच कळीचे नारद । वृत्तांत साद्यंत कळविला ॥१०१॥</p>
<p>
	आधींच रामदास आतताई । वरी नारदाची शिष्टाई । मग त्या प्रसंगाची अपूर्वाई । कोण गाईल यथार्थ ॥१०२॥</p>
<p>
	आधींच रामदास विकल्पमूर्ति । माधवरावांचा संशय चित्तीं । म्हाणे बळकावया माझी पोथी । बाबांनी मध्यस्थी घाताळें ॥१०३॥</p>
<p>
	सोनामुखीची वार्ता विसरला । माधवरावांवरी घसरला । वृत्तिप्रकोप अनावर झाला । उदंड वरसला वाग्डंबर ॥१०४॥</p>
<p>
	पोटदुखीचें हें ढोंग सगळें । तुवांच बाबांस उद्युक्त केलें । माझ्या पोथीवर तुझे डोळे । हें न चाले मजपुढें ॥१०५॥</p>
<p>
	नांवाचा मी रामदास निधडा । पोथी न देतां गुणाधडा । पहा हें मस्तक फोडीन तुजपुढां । घालीन सडा रक्ताचा ॥१०६॥</p>
<p>
	तुझा माझे पोथीवर डोळा । स्वयेंच रचूनियां कवटाळा । घालिसी सकळ बाबांचे गळां । नामानिराळा राहून ॥१०७॥</p>
<p>
	माधवराव बहु समजाविती । रामदासा नाहीं शांती । तंव माधवराव सौम्यवृत्तीं । काय वदती तें परिसा ॥१०८॥</p>
<p>
	मी कपटी हा माझे माथां । मारूं नको रे प्रवाद वृथा । काय तुझ्या त्या पोथीची कथा । नाहीं दुर्मिळता तियेला ॥१०९॥</p>
<p>
	तुझ्याच पोथीला काय सोनें । किंवा हिरकणी जडली नेणें । बाबांचाही विश्वास जेणें । धरिसी न जिणें धिक् तुझें ॥११०॥</p>
<p>
	पाहूनि तयाचा अट्टाहास । बाबा मधुर बोलती तयास । “काय बिघडलें रे रामदास । व्यर्थ सायास कां वहासी ॥१११॥</p>
<p>
	अरे शामा आपलाच पोरगा । तूं कां शिरा ताणिसी उगा । किमर्थ इतका कष्टसी वाउगा । तमाशा जगा दाविशी ॥११२॥</p>
<p>
	ऐसा कैसा तूं कलहतत्पर । कां न बोलावें मधुरोत्तर । अरे ह्या पोथ्या पढतांही निरंतर । अजूनि अंतर अशुद्ध ॥११३॥</p>
<p>
	प्रत्यहीं अध्यात्मरामायण पढशी । सहस्रनामाचें आवर्तन करिशी । तरी ही उच्छृंखलवृत्ति न त्यजिसी । आणि म्हणविशी रामदास ॥११४॥</p>
<p>
	ऐसा कैसा तूं रामदास । तुवां सर्वार्थीं असावें उदास । परी तुटेना पोथीचा सोस । काय या कर्मास सांगावें ॥११५॥</p>
<p>
	रामदासीं नसावी ममता । सान थोरीं असावी समता । त्या तुझी या पोरासीं विषमता । झोंबसी हाता पोथीस्तव ॥११६॥</p>
<p>
	जा बैस जाऊन स्थानावरी । पोथ्या मिळतील पैशा पासरी । माणूस मिळेना आकल्पवरी । विचार अंतरीं राखावा ॥११७॥</p>
<p>
	तुझ्या पोथीची काय महती । शाम्याला त्यांत कैंची गती । उचलली ती म्यांच  आपमतीं । दिधली तयाप्रति मींच ती ॥११८॥</p>
<p>
	तुला ती तों मुखोद्नत । शाम्यास द्यावी आलें मनांत । वाचील ठेवील आवर्तनांत । कल्याण अत्यंत होईल” ॥११९॥</p>
<p>
	काय त्या वाणीची रसाळता ॥ मधुरता आणि कनवाळुता । तैसीच स्वानंदजळ - शीतळता । अति अपूर्वता तियेची ॥१२०॥</p>
<p>
	रामदास उमगला चित्ता । म्हणे माधवरावांस फणफणतां । घेईन बदला पंचरत्नी गीता । हें तुज आतां सांगतों ॥१२१॥</p>
<p>
	रामदास इतुका निवळला । माधवरावांस आनंद झाला । एकच काय मी दहा तुजला । गीता बदला देईन ॥१२२॥</p>
<p>
	असो पुढें तो तंटा निवाला । गीताग्रंथ जामीन रहिला । देव गीतेचा ज्यातें न कळला । गीता कशाला तयास ॥१२३॥</p>
<p>
	साईंसन्मुख अध्यात्मरामायण । पाठावर पाठ करी जो जाण । त्या रामदासें साईंसी तोंड देऊन । करावें भांडण कां ऐसें ॥१२४॥</p>
<p>
	हें तरी म्यां कैसें वदावें । दोष कोणास कैसे द्यावे । झाले ते प्रकार जरी न व्हावे । महत्त ठसावें कैसेनी ॥१२५॥</p>
<p>
	इतुका झगडा लाविला ज्यानें । बाबांचेंही घालविलें दुखणें । कल्याण आहे माझें जेणें । अलौकिक देणें साईंचें ॥१२६॥</p>
<p>
	जरी न होता हा सायास । बसता न माधवरावांचा विश्वास । खरेंच चढतें न अक्षर जिव्हेस । पाठचि तयांस होतें ना ॥१२७॥</p>
<p>
	ऐसा हा साईनाथ प्रेमळ । खेळिया परमार्थाचा दुर्मिळ । दाबील केव्हां कैसी कळ । करणी अकळ तयाची ॥१२८॥</p>
<p>
	पुढें शामाची निष्ठा जडली । दीक्षित - नरक्यांहीं संथा दिधली । अक्षर ओळख करून घेतली । पोथी चढली जिव्हेवर ॥१२९॥</p>
<p>
	असो हा माधवरावांचा वाद । साई शुद्धबोधानुवाद । परमानंदपूर्ण हा विनोद । निर्विवाद सुखदायी ॥१३०॥</p>
<p>
	तैसेंच ब्रम्हाविद्या  अभ्यास्तिती । तयांची बाबांस मोठी प्रीती प्रसंगोपात्त अभिव्यक्ति । दाविती कैसी अवलोका ॥१३१॥</p>
<p>
	एकदां जोगांची  आली बंगी । शिरडी पोस्टांत टपालमार्गीं । स्वीकारावया तया जागीं । लागवेगीं निघाले ॥१३२॥</p>
<p>
	पुस्तक पाहती तों तें भाष्य । लोकमान्यांचें गीतारहस्य । बगलेस मारून मशिदीस । दर्शनास पातले ॥१३३॥</p>
<p>
	नमस्कारार्थ खालवितां डोई । बंगीही पडली बाबांचे पायीं । “बापूसाब ही कशाची काई” । बाबा ते ठायीं पूसती ॥१३४॥</p>
<p>
	बंगी मग समक्ष फोडली । कसली काय ती वार्ता कळविली । ग्रंथासह बाबांचे हातीं दिधली । अवलोकिली बाबांनी ॥१३५॥</p>
<p>
	ग्रंथ काढोनि हातीं घेतला । क्षणार्धांत चाळून पाहिला । खिशांतून एक रुपया काढिला । वरती ठेविला कौतुकें ॥१३६॥</p>
<p>
	रुपयासह मग तो ग्रंथ । घातला कीं जोगांचे पदरं । म्हणाले हा वाचा साद्यंत । कल्याणप्रद होईल ॥१३७॥</p>
<p>
	अशा बाबांच्या अनुग्रहकथा । वर्णितां येतील । असंख्याता । ग्रंथ पावेल अति विस्तृतता । म्हणोन संक्षिप्तता । आदरीं ॥१३८॥</p>
<p>
	एकदां शिरडींत ऐसें झालें । दादासाहेब खापर्डे आले । सहपरिवार तेथें राहिले । प्रेमें रंगले बाबांच्या ॥१३९॥</p>
<p>
	खापर्डे नव्हेत सामान्य गृहस्थ । आति विद्वान मोठें  प्रस्थ । साईंसन्निध जोडूनि हस्त । पायीं मस्तक खालवीत ॥१४०॥</p>
<p>
	आंग्लविद्यापारंगत । धारासभेंत कीर्तिमंत । वक्तृत्वें  सर्वांस हालवीत  । मूग ते गिळत साईंपुढें ॥१४१॥</p>
<p>
	भक्त बाबांचे असंक्यात । परी त्यापाशीं मूकव्रत । खापर्डे - नूलकर - बुट्टींव्यतिरिक्त । धरितां न भक्त आढळला ॥१४२॥</p>
<p>
	इतर सर्व बाबांशीं बोलत । कांहीं तोंडासी तोंडही देत । नाहीं भीडभाड मुर्वत । मूकव्रत तें यां तिघां ॥१४३॥</p>
<p>
	बोलण्याचीच काय कथा । बाबांसन्मुख तुकविती माथा । अवर्णनीय तयांची लीनता । श्रवणशालीनताही तैसी ॥१४४॥</p>
<p>
	विद्यारण्यांची पंचदशी । समजून घ्यावी जयांपाशीं । ते दादासाहेब मूकवृत्तीसी । धरीत मशिदीसी येतांच ॥१४५॥</p>
<p>
	शब्दब्रम्हाचें कितीही तेज । शुद्धब्रम्हापुढें निस्तेज । साई परब्रम्हामूर्ती सतेज । विद्वत्ते लाज लावी ती ॥१४६॥</p>
<p>
	चार महिने तयांचा वास । कुटुंब राहिलें सात मास । दिवसेंदिवस उभयतांस । अति उल्हास वाटला ॥१४७॥</p>
<p>
	कुटुंब मोठें निष्ठावंत । साईपदीं प्रेम अत्यंत । साईंस नित्य नैवेद्य आणीत । मशिदींत स्वहस्ते ॥१४८॥</p>
<p>
	होई जो न नैवेद्यगरण । बाईस तोंवर उपौष्न महाराजांनीं केलिया सेवन । माणून जेवण बाईचें ॥१४९॥</p>
<p>
	असो एकदां आली वेळा । बाबा परम भक्तवत्सल बाईची श्रद्धा पहहु अचळ । मार्ग सोञ्ज्वळ दावीत ॥१५०॥</p>
<p>
	अनेकांच्या अनेक परी । बाबांची तों अगदींच न्यारी । हासतां खेळतां अनुग्रह वितरी । जो द्दढ अंतरीं ठसावे ॥१५१॥</p>
<p>
	एकदां सांजा - शिरापुरी । भात वरान्न आणि खिरी । सांडगे पापड कोशिंबिरी । बाईनें ताटभरी आणिलें ॥१५२॥</p>
<p>
	ऐसें तें ताट येतांक्षणीं । बाबा अति उत्कंठित मनीं । कफनीच्या अस्तन्या वरी सारुनी । आसनावरूनी ऊठले ॥१५३॥</p>
<p>
	जाऊनि बैसले भोजनस्थानीं । घेतलें ताट सन्मुख ओढुनी । वरील आच्छादन बाजूस सारुनी । अन्नसेवनीं उद्युक्त ॥१५४॥</p>
<p>
	नैवेद्य येती इतरही बहुत । याहून सरस अपरिमित । कित्येक वेळ ते पडून राहत । यावरीच हेत कां इतुका ॥१५५॥</p>
<p>
	ही तों प्रपंचाची वार्ता । शिवावी कां संतांचे चित्ता । माधवरावजी साईसमर्था । म्हणती ही विषमता कां बरें ॥१५६॥</p>
<p>
	अवघ्यांचीं ताटें ठेवूनि देतां । कोणाचीं चांदीचींही दूर भिरकावितां । मात्र या बाईचें येतांच उठतां । खाऊं लागतां नवल हें ॥१५७॥</p>
<p>
	हिचेंच अन्न कां इतुकें गोड । देवा हें आम्हांस मोठें गूढ । काय तरी हें तुझें गारुड । आवडनिवड तुम्हां कां ॥१५८॥</p>
<p>
	बाबा म्हणती सांगूं काई । काय या अन्नाची अपूर्वाई । पूर्वीं ही एक वाण्याची गाई । दुधाळ लई लठ्ठ असे ॥१५९॥</p>
<p>
	मग ती कुठें नाहींशी झाली । माळियाकडे जन्मास आली । तीच पुढें क्षत्रियाकडे गेली । पत्नी झाली वाणियाची ॥१६०॥</p>
<p>
	पुढें ही उपजली ब्राम्हाणापोटीं । बहुता काळानें पडली द्दष्टी । प्रेमाचे दोन घांस पोटीं । सुखसंतुष्टी जाऊं दे ॥१६१॥</p>
<p>
	ऐसें म्हणूनि यथेष्ट जेवले । मुख आणि हात धुतले । सहज तृप्तीचे ढेकर दिधले । येऊन बैसले गादीवर ॥१६२॥</p>
<p>
	बाईनें मग करूनि नमन । आरंभिलें साईचरणसंवाहन । बाबांनीं ती संधी साधून । हितगुज सांगून राहिले ॥१६३॥</p>
<p>
	बाई जयांनीं चरण चूरी । दाबीत ते कर बाबा स्वकरीं । पाहूनि देव - भक्तांची चाकरी । करी मस्करी तंव शामा ॥१६४॥</p>
<p>
	ठीक चाललें आहे कीं देवा । काय मौजेचा हा देखावा । पाहूनि या परस्परांच्या भावा । वाटे नवलावा अत्यंत ॥१६५॥</p>
<p>
	पाहोनि तिचा सेवाकाम । प्रसन्न बाबांचें अंतर्याम । हळूच म्हणती ‘राजाराम । राजाराम’ वद वाचे ॥१६६॥</p>
<p>
	ऐसें म्हणत राहीं नित । सफल होईल आई जीवित । शांत होईल तुझें चित्त । हित अपरिमित पावसील ॥१६७॥</p>
<p>
	काय त्या वचनाची मात । ह्रदयांतरीं जाऊन खोंचत । वचनयोगेंच शक्तिपात । क्षणार्धांत करीत ॥१६८॥</p>
<p>
	ऐसा कृपाळू श्रीसमर्थ । प्रणतपाळ साईनाथ । पुरवी नित्य भक्तमनोरथ । साधी निजहित तयांचें ॥१६९॥</p>
<p>
	अत्यंत हित अति प्रीती । अत्यंत लीन श्रोतयांप्रती । कथितों मी तें धरा चित्तीं । करितों विनंती सलगीची ॥१७०॥</p>
<p>
	लंपट गुळाचिये गोडी । सांडी न मुंगी तुटतां मुंडी । तैसी द्या साईचरणीं दडी । कृपापरवडी रक्षील तो ॥१७१॥</p>
<p>
	गुरु - भक्त हे नाहीं वेगळे । दोघेही एकांग आगळे । प्रयत्नें वेगळे करितां बळें । अभिमान गळे कर्त्याचा ॥१७२॥</p>
<p>
	एकावांचून एक ठेला । कच्चा गुरु तो कच्चाही चेला । परी जो पक्क्या गुरूचा केला । द्वैतीं अबोला तयासी ॥१७३॥</p>
<p>
	गुरु राही एक्या गावीं । शिष्य तयाचा इतर गांवीं । ऐसें जयाचें मन भावी । ते मानभावी उभयही ॥१७४॥</p>
<p>
	मुळींच जरी नाहींत दोन । वेगळीक मग ती कुठून । एक न राहे एकावीण । इतुके अनन्य ते दोघे ॥१७५॥</p>
<p>
	गुरुभक्तांत नाहीं अंतर । ऐसें वास्तव्य निरंतर । गुरुपदावरी भक्तशिर । हाही उपचार स्थूलाचा ॥१७६॥</p>
<p>
	भक्त अद्वैतभजनपर । गुरुही अद्वैतभक्तपर । ऐसे न मीनतां परस्पर । केवळ तो व्यवहार नांवाचा ॥१७७॥</p>
<p>
	कैसें लाधेल अन्नाच्छादन । क्षणमात्रही न करा चिंतन । हें तों सर्व प्रारब्धाधीन । प्रयत्नावीण आपाद्य ॥१७८॥</p>
<p>
	करूं जाल प्रयत्नें संपादन । तरी तो होईल व्यर्थ शीण । प्रयत्नें व्हा परमार्थसंपन्न । चिंतन रात्रंदिन हें करा ॥१७९॥</p>
<p>
	‘उत्तिष्ठत’ आणि ‘जाग्रत’ । गाढ निद्रेंत पडतां कां घोरत । श्रुतिमाय तारस्वरें गर्जत । प्रेमें जागवीत भक्तांस ॥१८०॥</p>
<p>
	सर्वानर्थबीजभूत । अविद्यानिद्रेंत जे जे लोळत । तयांनीं वेळीं होऊनि जागृत । गुरुज्ञानामृत सेवावें ॥१८१॥</p>
<p>
	तदर्थ होऊनि अति विनीत । व्हा गुरुचरणीं शरणागत । तो एक जाणे विइताविहित । आम्ही तों नेणत लेंकुरें ॥१८२॥</p>
<p>
	साहंकार किंचिज्ज्ञ जीव । निरहंकार सर्वज्ञ शिव । दोघांठायीं अभेदभाव । व्हावया उपाव गुरु एक ॥१८३॥</p>
<p>
	अविद्योपाधि आत्मा ‘जीव’ । मायोपाधि आत्मा ‘शिव’ । जाणे घालवूं हा भेदभाव । समर्थ गुरुराव एकला ॥१८४॥</p>
<p>
	मन संकल्पविकल्पाधीन । करा साईपायीं समर्पण । मग तेथून पावे जें स्फुरण । त्याचें अहंपण त्याजवळ ॥१८५॥</p>
<p>
	तैसीच सकल क्रियाशक्ती । तीही समर्पा साईप्रती । मग तो आज्ञापी जैसिया रीतीं । तैसिये स्थितीं वर्तावें ॥१८६॥</p>
<p>
	जाणा सकल साईंची सत्ता । भार घालोनि तयांवरता । कार्य करितां निरभिमानता । सिद्धि ये हाता अविकळ ॥१८७॥</p>
<p>
	परी म्हणाल मी हें करीन । धराल अत्यल्पही अभिमान । फळ येईल तात्काळ दिसोन । विलंब क्षणही न लागेल ॥१८८॥</p>
<p>
	मायामोह - निशीस । या कुशीचे त्या कुशीस । हेमाड असतां देतां आळस । हरिगुरुकृपेस लाधला ॥१८९॥</p>
<p>
	तेंही केवळ अद्दष्टवशें । निवाअभ्यास वा सायासें । त्यांनींच केवळ निजोद्देशें । गौरविलें ऐसें वाटतें ॥१९०॥</p>
<p>
	करावया भक्तोद्धार । करोनि निजचरित्र - निर्धार । बळेंच त्याचा धरोनि कर । ग्रंथ सविस्तर लिहविला ॥१९१॥</p>
<p>
	अखंडानुसंधान - सूत्र । अनन्यप्रेमपुष्पीं विचित्र । गुंफोनियां हार मनोहर । अर्पूं सादर साईंस ॥१९२॥</p>
<p>
	मिळवूं स्वराज्यसिंहासन । होऊं स्वपदीं विराजमान । भोगूं स्वानंद निरभिमान । सुखायमान निजांतरीं ॥१९३॥</p>
<p>
	ऐसें अगाध साईचरित्र ।  पुढील कथा याहून विचित्र । दत्तावधान व्हा क्षणमात्र । श्रवण पवित्र करावया ॥१९४॥</p>
<p>
	पुढें येईल अध्यायत्रयी । बाबा बैसूनि ठायींचें ठायीं । द्दष्टांताची अपूर्वाई । पहा नवलाई दावितील ॥१९५॥</p>
<p>
	त्यांतील आरंभींचा अध्याय । लाला लखमीचंदाचा विषय । प्रेमसूत्रें बांधून पाय । दाविला निजठाय तयास ॥१९६॥</p>
<p>
	बर्‍हाणपुरस्थ बाई एक ।  तिचिया खिचडीलागीं कामुक । होऊनि केलें दर्शनोत्सुक । दाविलें कौतुक प्रेमाचें ॥१९७॥</p>
<p>
	पुढें मेघाचिया स्वप्नांत । त्रिशूळ काढाया झाला द्दष्टान्त । तयापाठीं अकस्मात । लिंग हो प्राप्त शंकराचें ॥१९८॥</p>
<p>
	ऐसऐसिया अनेक कथा । तेथून पुढें येतील आतां । भक्तिपूर्वक ऐकतां श्रोतां । श्रवणसार्थकता होईल ॥१९९॥</p>
<p>
	सैंधव सिंधुनिमज्जन । तैसा हेमाड साईंस शरण । सोहंभावाचें अभिन्नपण । त्या अनन्यपणें करी ॥२००॥</p>
<p>
	वरी करी प्रेमें विनवण । लागो अहर्निश साईंचे ध्यान । त्यावीण ध्यानीं न रिघो आन । मन सावधान असावें ॥२०१॥</p>
<p>
	होवो मागील परिहार । पुढील निर्दळून जावा पार । अवशेष जें मध्यंतर । राहो निरंतर गुरुपायीं ॥२०२॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । दीक्षानुग्रहदानं नाम सप्तविंशतितमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 14:23:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 14:51:15 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय २६]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-26-122042600045_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
भूतभौतिक विषयजात । हें अखिल विश्व निजांतर्गत । दर्पणीं नगरीसें प्रतिबिंबित । मायाविजृंभित मायिक ॥१॥
वस्तुगत्या ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 26" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650963182-6645.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra adhyaay 26" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	भूतभौतिक विषयजात । हें अखिल विश्व निजांतर्गत । दर्पणीं नगरीसें प्रतिबिंबित । मायाविजृंभित मायिक ॥१॥</p>
<p>
	वस्तुगत्या अनुद्भत । आत्मस्वरूपीं अनुस्यूत । तें हें विश्व स्वरूपीं स्थित । दिसे उद्भूत चराचर” ॥२॥</p>
<p>
	जें जें कांहीं आरिसां दिसे । तें तें वास्तव तेथें नसे । जैसें वासनामय निद्रेंत आभासे । परी तें नासे प्रबोधीं ॥३॥</p>
<p>
	जागृदवस्था प्राप्तकाळें । स्वप्नोपलब्ध प्रपंच वितळे । अद्वयानंदप्रकाश विवळे । महावाक्यमेळें सद्नुरूच्या ॥४॥</p>
<p>
	विश्वाचें जें सत्ता - स्फुरण । तयाचें अन्यनिरपेक्ष अधिष्ठान । तो गुर्वात्मा ईश्वर जैं प्रसन्न । तयींच साक्षात्करण हें ॥५॥</p>
<p>
	स्वप्रकाश सदात्मक । तें हें आत्मस्वरूप देख । तेथें हें विश्व भूतभौतिक । मायाकौतुक हा खेळ ॥६॥</p>
<p>
	आब्रम्हास्तंबपर्यत । भूतभौतिक हें सर्व कल्पित । ऐसें हें विस्तारलें जगत । मायाविजृंभित केवळ ॥७॥</p>
<p>
	सर्प - माला - दंड - धारा । स्वंरूपाज्ञानें मानिती दोरा । तैसाचि हा सकळ जगत्पसारा । स्वरूपीं थारा नाहीं या ॥८॥</p>
<p>
	हें द्दश्यजात मायामय ।  तत्त्वज्ञानें यासी लय । गुरुवाक्य - प्रबोधसमय । प्राप्त हो त्या काळीं ॥९॥</p>
<p>
	तृतीय पुरुष एकवचनी । “गृणाति” रूपार्थ धरितां मनीं । शिष्यास तत्त्वोपदेशदानीं । गुरु एक जनीं समर्थ ॥१०॥</p>
<p>
	म्हणवूनि प्रार्थूं कीं बाबांप्रत । करावी बुद्धि अंतरासक्त । नित्यानित्यविवेकयुक्त । वैराग्यरत मज करीं ॥११॥</p>
<p>
	मी तों सदा अविवेकी मूढ । आहें अविद्याव्यवधाननिगूढ । बुद्धि सर्वदा कुतर्कारूढ । तेणेंचि हें गूढ पडलें मज ॥१२॥</p>
<p>
	गुरुवेदान्तवचनीं भरंवसा । ठेवीन मी अढळ ऐसा । करीं मन जैसा आरसा । निजबोधठसा प्रकटेल ॥१३॥</p>
<p>
	वरी सद्नुरो साईसमर्था । करवीं या ज्ञानाची अन्वर्थता । विनाअनुभव वाचाविग्लापनता । काय परमार्था साधील ॥१४॥</p>
<p>
	म्ह्णोनि बाबा आपुल्या प्रभावें । हें ज्ञान अंगें अनुभवावें । सहज सायुज्य पद पावावें । दान हें द्यावें कृपेनें ॥१५॥</p>
<p>
	तदर्थ देवा सद्नुरुसाई । देहाहंता वाहतों पायीं । आतां येथून तुझें तूं पाहीं । मीपण नाहींच मजमाजीं ॥१६॥</p>
<p>
	घेईं माझा देहाभिमान । नलगे सुखदु:खाची जाण । इच्छेनुसार निजसूत्रा चालन । देऊनि मन्मन आवरीं ॥१७॥</p>
<p>
	अथवा माझें जें मीपण । तेंचि स्वयें तूं होऊनि आपण । घेईं सुखदु:खाचें भोक्तेपण । नको विवंचन मज त्याचें ॥१८॥</p>
<p>
	जय जयाजी पूर्णकामा । जडो तुझियाठायीं प्रेमा । मन हें चंचल मंगलधामा । पावो उपरमा तव पायीं ॥१९॥</p>
<p>
	तुजवांचूनि दुज कोण । सांगेल आम्हांस हितवचन । करील आमुचें दु:खनिरसन । समाधान मनाचें ॥२०॥</p>
<p>
	दैव शिरडीचें, म्हणूनि झालें । बाबा तेथें आगमन आपुलें । पुढें तेथेंच वास्तव्य केलें । क्षेत्रत्व आणिलें त्या स्थाना ॥२१॥</p>
<p>
	धन्य शिरडीचें सुकृत । कीं हा साई कृपावंत । करी या स्थळा भाग्यवंत । अलंकृत निजवास्तव्यें ॥२२॥</p>
<p>
	तूंचि माझा चेतवित । तूंचि माझी वाचा चालिता । तैं मी कोण तव गुण गाता । कर्ता - करविता तूं  एक ॥२३॥</p>
<p>
	तुझा नित्य समागम । हाचि आम्हां आगम - निगम । तुझें नित्य चरित्रश्रवण । हेंचि पारायण आमुतें ॥२४॥</p>
<p>
	अनिमेष तुझें नामावर्तन । हेंचि आम्हां कथाकीर्तन । हेंचि आमुचें नित्यानुसंधान । हेंचि समाधान आम्हांतें ॥२५॥</p>
<p>
	नलगे आम्हां ऐसें सुख । जेणें होऊं भजनविन्मुख । याहूनि अध:पतन तें अधिक । परमार्थबाधक काय असे ॥२६॥</p>
<p>
	आनंदाश्रू उष्ण जीवन । करूं तेणें चरणक्षालन । शुद्धप्रेम चंदनचर्चन । करवूं परिधान अच्छ्र्द्धा ॥२७॥</p>
<p>
	हें  अंतरंग पूजाविधान । बाम्होपचार पूजेहून । येणें तुज सुप्रसन्न ॥ सुखसंपन्न करूं कीं ॥२८॥</p>
<p>
	सात्विक अष्टभाव - कमल । अष्टदल अतीव निर्मल । मन करूनि एकाग्र अविकल । वाहू, निजफल संपादूं ॥२९॥</p>
<p>
	लावूं भावार्थ - बुका भाळा । बांधूं द्दढभक्तीची मेखळा । वाहूं पादांगुष्ठीं गळा । भोगूं सोहला अलोलिक ॥३०॥</p>
<p>
	प्रीतिरत्नालंकार्मंडण । करूं सर्वस्व निंबलोण । करूं पंचप्राण चामरांदोलन । तापनिवारण तन्मय छत्रें ॥३१॥</p>
<p>
	समर्पूं ऐसी स्वानंदपूजा । अष्टांग गंध - अर्गजा । ऐसे आम्ही आमुच्या काजा । साईराजा पूजूं तुज ॥३२॥</p>
<p>
	अभीतिप्सितार्थसिद्धयर्थ । स्मरूं नित्य “साईसमर्थ” । याच मंत्रें साधूं परमार्थ । होऊं कृतार्थ निजनिष्ठा ॥३३॥</p>
<p>
	पूर्वील अध्यायीं कथन । साईसमर्थ दयाघन । साधावयास निजभक्तकल्याण । कैसें शिक्षण देत ते ॥३४॥</p>
<p>
	आतां ये अध्यायीं निरूपण । भक्तां स्वगुरुपदीं स्थापन । कवणेपरी करीत जाण । कथाविंदान तें परिसा ॥३५॥</p>
<p>
	गताध्यायांतीं निदर्शित । भक्तपंतकथामृत । श्रोतां परिसिजे दत्तचित्त । तत्त्व निश्चित व्हावया ॥३६॥</p>
<p>
	कैसे कैसे अनुभव दाविले । कैसें नेत्रीं निष्ठांजन सूदिलें । कैसें स्वगुरुपदीं अढळ केलें । मन निवालें कैसेनी ॥३७॥</p>
<p>
	एकदां एक बहुत श्रमें । भक्त एक पंत नामें । गेले शिरडीस मित्रसमागमें । दर्शनकामें साईंच्या ॥३८॥</p>
<p>
	ते पूर्वील अनुगृहीत । होते निजगुरुपदीं स्थित । शिरडीस जावें किंनिमित्त । झाले शंकित मानसीं ॥३९॥</p>
<p>
	तथापि जयाचा जैसा योग । तैसा अकल्पित घडतो भोग । आला साईदर्शनाचा ओघ । जाहला अमोघ सुखदायी ॥४०॥</p>
<p>
	आपण कल्पावी एक योजना । ईश्वराच्या आणीकचि मना । अद्दष्टापुढें कांहीं चालेना । तें स्वस्थ मना परिसिजे ॥४१॥</p>
<p>
	ठेवूनियां शिरडीचें प्रस्थान । कित्येक जन निजस्थानाहून । निघाले अग्निरथीं बैसून । सकळ मिळून आनंदें ॥४२॥</p>
<p>
	गाडींत जैं हे चढळे अवचित । तेथेंच होते स्थित हे पंत । शिरडीस जाण्याचा तयांचा बेत । झाला अवगत पंतांस ॥४३॥</p>
<p>
	मंडळींत कांहीं पंतांचे स्नेही । त्यांतचि कांहीं विहिणी व्याही । पंतांचे मनांत जाणें नसतांही । बळेंच आग्रहीं सांपडले ॥४४॥</p>
<p>
	आरंभीं पंतांचा विचार । जाणें होतें जेथवर । तिकीटही तयांचें तेथवर । पुढें तो विचार बदलला ॥४५॥</p>
<p>
	स्नेही व्याही म्हणती चला । जाऊं समवेत कीं शिरडीला । मनीं नसतांही आग्रहाला । होकार दिधला पंतांनीं ॥४६॥</p>
<p>
	पंत उतरले विरारास । मंडळी गेली मुंबईस । उसने घेऊनि खर्चवयास । पंतही मुंबईस मग गेले ॥४७॥</p>
<p>
	मोडवेना मित्रांचें मन । मिळविलें निजगुर्वनुमोदन । आले मग ते शिरडीलागून । सकल मिळून आनंदें ॥४८॥</p>
<p>
	गेले सर्व मशिदीस । सकाळीं अकरांचे समयास । दाटी भक्तांची पूजनास । पाहूनि उल्हास वाटला ॥४९॥</p>
<p>
	पाहूनि बाबांचें ध्यान । जाहले सकळ आनंदसंपन्न । इतुक्यांत पंतांस झीट येऊन । बेशुद्ध होऊन ते पडले ॥५०॥</p>
<p>
	पातली जीवास विकलता । पावले सबळ निचेष्टता । सांगातियां उद्भवली चिंता । अति व्यग्रता मानसीं ॥५१॥</p>
<p>
	मंडळीची मदत मोठी । साईबाबांची कृपाद्दष्टी । करितां मस्तकीं उदकवृष्टी । गेली निचेष्टितता समूळ ॥५२॥</p>
<p>
	होऊनियां सावधान । उठूनि बैसले खडबडोन । वाटलें जणूं झोंपेंतून । आतांच उठून बैसले ॥५३॥</p>
<p>
	बाबा पूर्ण अंतर्ज्ञानी । तयांची गुरुपुत्रता जाणुनी । तयांस अभयता आश्वासुनी । निजगुरुभजनीं स्थापिती ॥५४॥</p>
<p>
	येवो म्हणती प्रसंग कांहीं । “अपना तकिया छोडना नहीं । सदासर्वदा निश्चळ राहीं । अनन्य पाहीं एकत्वीं” ॥५५॥</p>
<p>
	पंतांना ती पटली खूण । निजगुरूचें जाहलें स्मरण । साईबाबांचें कनवाळूपण । राहिलें स्मरण जन्माचें ॥५६॥</p>
<p>
	तैसेच एक मुंबापुरस्थ । हरिश्चंद्र नामें गृहस्थ । पुत्र अपस्मारव्यथाग्रस्त । तेणें अति त्रस्त जाहले ॥५७॥</p>
<p>
	देशी विदेशी वैद्य झाले । कांही एक उपाय न चले । पाहूनि सर्वांचे प्रयत्न हरले । राहतां राहिले साधुसंत ॥५८॥</p>
<p>
	सन एकोणीसशें दहा सालीं । दासगणूंचीं कीर्तनें झालीं । श्रीसाईनाथांची कीर्ति पसरली । यात्रा वाढली शिरडीची ॥५९॥</p>
<p>
	कुग्राम परी भाग्यें थोर । शिरडी झाली पंढरपूर । महिमा वाढला अपरंपार । यात्रा अपार लोटली ॥६०॥</p>
<p>
	रोग घालविती केवळ दर्शनें । अथवा केवळ हस्तस्पर्शनें । अथवा शुद्ध कृपावलोकनें । आले अनेकां अनुभव ॥६१॥</p>
<p>
	होतां अनन्यशरणागत । कृतकल्याण पावत भक्त । जाणूनि सकळांचें मनोगत । पुरवीत मनोरथ सर्वांचे ॥६२॥</p>
<p>
	उदीधारणें पिशाचें पळती । आशीर्वचनें पीडा टळती । कृपानिरीक्षणें बाधा चुकती । लोक येती धांवोनि ॥६३॥</p>
<p>
	ऐसें माहात्म्य कथाकीर्तनीं । दासगणूंच्या ग्रंथांतुनी । ऐकोनियां कर्णोपकर्णीं । उत्कंठा दर्शनीं उदेली ॥६४॥</p>
<p>
	सवें घेऊनि मुलेंबाळें । नानाविध उपायनें फळें । आले शिरडी ग्रामास पितळे । पूर्वार्जितबळें दर्शना ॥६५॥</p>
<p>
	मुलास पायांवरी घातलें । स्वयें बाबांस  लोटांगणीं आले । तों तेथ एक विपरीत वर्तलें । पितळे गडबडले अत्यंत ॥६६॥</p>
<p>
	द्दष्टाद्दष्ट साईंची होतां । मुलगा पावला बेशुद्धावस्था । डोळे फिरविले पडला अवचिता । मातापिता गडबडले ॥६७॥</p>
<p>
	पडिला विसंज्ञ भूमीसी । तोंडासी आली उदंड खरसी । चिंता ओढवली मातापित्यांसी । काय दैवासी करावें ॥६८॥</p>
<p>
	निघूनि गेला वाटे श्वास । तोंडावाटे चालला फेंस । फुटला घाम सर्वांगास । सरली आस जीविताची ॥६९॥</p>
<p>
	ऐसे झटके अनेक वेळां । पूर्वीं येऊनि गेले मुलाला । परीन इतुका विलंब झाला । प्रसंगाला एकाही ॥७०॥</p>
<p>
	हा ‘न भूतो न भविष्यति’ । यानें आणिली प्राणांतिक गति । मातेच्या डोळां अश्रू न खलती । पाहूनि स्थिति बाळाची ॥७१॥</p>
<p>
	आलों किमर्थ झालें काय । उपाय तो झाला अपाय । ऐसे घातुक व्हावे हे पाय । व्यर्थ व्यवसाय झाला कीं ॥७२॥</p>
<p>
	घरांत रिघावें चोराभेणें । तों घरचि अंगावरी कोसळणें । तैसेंचि कीं हें आमुचें येणें । झालें म्हणे ती बाई ॥७३॥</p>
<p>
	व्याघ्र भक्षील म्हणूनि गाई । जीवभेणें पळूनि जाई । तिजला मार्गांत भेटे कसाई । तैसेंच पाहीं जाहलें ॥७४॥</p>
<p>
	उन्हांत तापला पांथस्थ । वृक्षच्छायेस जों विसावत । तों वृक्षचि उन्मळूनि पडत । झाली ते गत तयांसी ॥७५॥</p>
<p>
	भाव ठेवूनि देवावरी । पूजेस जातां देउळाभीतरीं । देऊळचि कोसळे अंगावरी । तैसीच परी हे झाली ॥७६॥</p>
<p>
	बाबा मग तयां आश्वासिती । “धीर धरावा थोडा चित्तीं । मुलास उचलूनि न्या निगुती । निजावगती तो लाधेल ॥७७॥</p>
<p>
	मुलास घेऊनि जा बिर्‍हाडीं । आणीक एक भरतां घडी । सजीव होईल तयाची कुडी । उगीच तांतडी करूं नका” ॥७८॥</p>
<p>
	असो पुढें तैसें केलें । बोल बाबांचे खरे झाले । पितळे  सह्कुटुंब आनंदले । कुतर्क गेले विरोन ॥७९॥</p>
<p>
	वाडियांत नेतां तो कुमर । तात्काळ आला शुद्धीवर । मातपितयांचा फिटला घोर । आनंद थोर जाहला ॥८०॥</p>
<p>
	मग पितळे स्रियेसहित । बाबांचिया दर्शना येत । करीत साष्टांग प्रणिपात । अति विनीत होउनी ॥८१॥</p>
<p>
	उठला पाहूनि  आपुला सुत । साभार मानसीं आनंदित । बसले बाबांचे चरण चुरीत । बाबा सस्मित पूसती ॥८२॥</p>
<p>
	“कां त्या संकल्पविकल्पलहरी । शांत झाल्या कां आतां तरी । ठेवील निष्ठा धरील सबूरी । तयासी श्रीहरी रक्षील” ॥८३॥</p>
<p>
	पितळे मूळचेच श्रीमंत । घरंदाज लौकिकवंत । मेवामिठाई लुटवीत । बाबास अर्पित फळ पान ॥८४॥</p>
<p>
	कुटुंब तयांचें फार सात्त्विक । प्रेमळ श्रद्धाळू भाविक । बाबांकडेस लावूनि टक । खांबानिकट बैसतसे ॥८५॥</p>
<p>
	पहातां पहातां डोळे भरावे । ऐसें तिनें नित्य करावें । पाहूनि तत्प्रेमाचे नवलावे । अत्यंत भुलावें बाबांनीं ॥८६॥</p>
<p>
	जैसे देव तैसेच संत । भक्तपराधीन ते अत्यंत । अनन्यत्वें तयां जे भजत । कृपावंत तयांवरी ॥८७॥</p>
<p>
	असो ही मंडळी जावया निघाली । मशिदीस दर्शनार्थ आली । बाबांची अनुज्ञा उदी घेतली । तयारी केली निघावया ॥८८॥</p>
<p>
	इतुक्यांत बाबा काढिती तीन । रुपये आपुले शिशांतून । पितळ्यांस निकट बोलावून । बोलती वचन तें परिसा ॥८९॥</p>
<p>
	“बापू तुजला पूर्वीं दोन । दिधलेती म्यां त्यांत हे तीन । ठेवूनि यांचें करीं पूजन । कृतकल्याण होसील” ॥९०॥</p>
<p>
	पितळे रुपये घेती करीं । प्रसाद जाणोनि आनंदें स्वीकारी । लोटांगणीं येत पायांवरी । म्हणती कृपा करीं महाराजा ॥९१॥</p>
<p>
	मनीं उदेली विचारलहरी । माझी तों ही प्रथम फेरी । बाबा हें वदती काय तरी । हें मज निर्धारीं कळेना ॥९२॥</p>
<p>
	बाबांस पूर्वीं नाहीं देखिलें । पूर्वीं दोन कैसे दिधले । अर्थावबोध कांहींच न कळे । विस्मित पितळे मनीं झाले ॥९३॥</p>
<p>
	कैसी व्हावी परिस्फुटता । वाढली मनाची जिज्ञासुता । बाबा न लागूं देत पत्ता । राहिली मुग्धता तैसीच ॥९४॥</p>
<p>
	संत सहज उद्नारले जरी । तरी ते वाणी होणार खरी । जाणीव ही पितळ्यांचे अंतरीं । म्हणूनि विचारीं ते पडले ॥९५॥</p>
<p>
	परी पुढें हे मुंबापुरीं । गेले जेव्हां आपुले घरीं । होती घरांत एक म्हातारी । जिज्ञासा पुरी ती करी ॥९६॥</p>
<p>
	म्हातारी पितळ्यांची माता । सहज शिरडीचा वृत्तांत पुसतां । निघाली तीन रुपयांची वार्ता । संबंध कथा जुळेना ॥९७॥</p>
<p>
	विचार करितां स्मरण झालें । मग म्हातारी पितळ्यांस बोले । आतां मज यथार्थ आठवेलें । बाबा बोलले सत्य तें ॥९८॥</p>
<p>
	आतां त्वां तुझ्या मुलास नेलें । शिरडीस साईंचें दर्शन करविलें । तैसेंच पूर्वीं तुज पित्यानें वहिलें । होतें नेलें अक्कलकोटीं ॥९९॥</p>
<p>
	तेथील महाराजही सिद्ध । परोपकारी महाप्रसिद्ध । अंतर्ज्ञानी योगी प्रबुद्ध । पिताही शुद्ध आचारणीं ॥१००॥</p>
<p>
	घेवोनि तव पित्याची पूजा । प्रसन्न झाला योगीराजा । दोन रुपये प्रसादकाजा । दिधले पूजा कराया ॥१०१॥</p>
<p>
	हेही पूर्वील रुपये दोन । स्वमींनीं बाळा तुजलागोन । दिधले होते प्रसाद म्हणून । पूजनार्चन करावया ॥१०२॥</p>
<p>
	तुमचें देवदेवतार्चन । त्यांत हे होते रुपये दोन । करीत असत नेमें पूजन । अति निष्ठेनें वडील तुझे ॥१०३॥</p>
<p>
	तयांची निष्ठा मी एक जाणें । वागत गेले निष्ठेप्रमाणें । तयांच्या पश्चात पूजाउपकरणें । जाहलीं खेळणीं मुलांची ॥१०४॥</p>
<p>
	निष्ठा उडाली देवांवरची । लाज वाटूं लागली पूजेची । पूजेसी योजना झाली मुलांची । दाद रुपयांची कोण घेई ॥१०५॥</p>
<p>
	ऐसीं कित्येक वर्षें लोटलीं । रुपयांची त्या बेदाद झाली । आठवणही साफ बुजाली । जोडी हरवली रुपयांची ॥१०६॥</p>
<p>
	असो तुमचें भाग्य मोठें । साईमिषें महाराजचि भेटे । पुसावया विस्मरणांचीं पुटें । तैसींच संकटें निरसाया ॥१०७॥</p>
<p>
	तरी आतां येथूनि पुढें । सोडूनि द्यावे तर्क कुडे । पहा आपल्या पूर्वजांकडे । नको वांकडे व्यवहार ॥१०८॥</p>
<p>
	करीत जा रुपयांचें पूजन । संतप्रसाद माना भूषण । समर्थसाईंनीं ही पटविली खूण । पुनरुज्जीवन भक्तीचें ॥१०९॥</p>
<p>
	ऐकतां ही मातेची कथा । परमानंद पितळ्यांचे चित्ता । ठसली साईंची व्यापकता । आणि सार्थकता दर्शनाची ॥११०॥</p>
<p>
	मातेचें तें शब्दामृत । नष्ट भावना करी जागृत । देई पश्चात्ताप - प्रायश्चित्त । भावी हित दर्शवी ॥१११॥</p>
<p>
	असो होणार होऊनि गेलें । पुढें कार्यार्था संतीं जागविलें । मानूनि तयांचे उपकार भले । सावध राहिले निजकार्या ॥११२॥</p>
<p>
	ऐसीच एक आणिक प्रचीती । कथितों परियेसा स्वस्थ चित्तीं । भक्तांच्या उच्छृंखल मनोवृत्ती । बाबा आवरिती कैशा तें ॥११३॥</p>
<p>
	गोपाळ नारायण आंबडेकर । नामें एक भक्तप्रवर । आहे बाबांचा पुणेंकर । परिसा सादर तत्कथा ॥११४॥</p>
<p>
	आंग्लभौम - सरकारपदरीं । अबकारी-खात्यांत होती नोकरी । दहा वर्षें भरतां पुरीं । बैसले घरीं सोडूनि ॥११५॥</p>
<p>
	दैव फिरलें झालें पारखें । सर्व दिवस नाहींत सारखे । आले ग्रहदशेचे गरके । कोण फरके न भोगितां ॥११६॥</p>
<p>
	आरंभीं ठाणें जिल्ह्यांत नोकर । पुढें नशीबीं आलें जव्हार । होते जेथें अम्मलदार । तेथेंच बेकार जाहले ॥११७॥</p>
<p>
	नोकरी आळवावरचें पाणी । पुनश्च पडावें कैसें ठिकाणीं । प्रयत्नांची शिकस्त त्यांनीं । पाहिली करूनि त्या वेळीं ॥११८॥</p>
<p>
	परी न आलें तयांही यश । निश्चय ठरला रहावें स्ववश । आपत्तीचा झाला कळस । जाहले हताश सर्वांपरी ॥११९॥</p>
<p>
	वर्षानुवर्ष खालीं खालीं । सांपत्तिक स्थिति खालावली । आपत्तीवर आपत्ती आली । दु:सह झाली गृहस्थिति ॥१२०॥</p>
<p>
	ऐसीं गेलीं वर्षें सात । सालोसात शिरडीस जात । बाबांपुढें गार्‍हाणें गात । लोटांगणीं येत दिनरात्र ॥१२१॥</p>
<p>
	 एकोणीसशॆं सोळा सालांत । वैतागूनि गेले अत्यंत । वाटलें करावा प्राणघात । शिरडी क्षेत्रांत जाऊनि ॥१२२॥</p>
<p>
	कुटुंबसमवेत या समयास । राहिले शिरडीस दोन मास । काय वर्तलें एके निशीस । तया वार्तेस परियेसा ॥१२३॥</p>
<p>
	दीक्षितांचे वाडयासमोर । एका बैलाचे गाडीवर । बसले असतां आंबडेकर । चालले विचारतरंग ॥१२४॥</p>
<p>
	कंटाळले ते जीवितास । वृत्ति झाली अत्यंत उदास । पुरे आतां हा नको त्रास । सोडिली आस जीविताची ॥१२५॥</p>
<p>
	करूनियां ऐसा विचार । होऊनियां जिवावरी उदार । विहिरींत उडी घालावया तत्पर । आंबडेकर जाहले ॥१२६॥</p>
<p>
	दुसरें कोणी नाहीं जवळा । साधूनियां ऐसी निवांत वेळा । पुरवीन आपुले मनाचा सोहळा । दु:खावेगळा होईन ॥१२७॥</p>
<p>
	आत्महत्येचें पाप दुर्धर । तरी हा द्दढ केला विचार । परी बाबा साई सूत्रधार । तेणें हा अविचार टाळिला ॥१२८॥</p>
<p>
	तेथेंचि चार पावलांवर । एका खाणावळवाल्याचें घर । तयासही बाबांचा आधार । तोही परिचारक बाबांचा ॥१२९॥</p>
<p>
	सगुण येऊनि उंबर्‍यावरती । पुसे आंबडेकरांस ते वक्तीं । ही अक्कलकोट महाराजांची पोथी । वाचिली होती का कधीं ॥१३०॥</p>
<p>
	पाहूं पाहूं काय ती पोथी । म्हणूनि आंबडेकर हातीं घेती । सहज पानें चाळूनि पाहती । वाचूं लागती मध्येंच ॥१३१॥</p>
<p>
	कर्मधर्मसंयोग कैसा । विषयही वाचावया आला तैसा । अंतर्वृत्तींत वाचण्यासरिसा । उमटला ठसा तात्काळ ॥१३२॥</p>
<p>
	सहजासहजीं आली  जी कथा । निवेदितों मी श्रोतियां समस्तां । तात्पर्यार्थें अति संक्षेपता । ग्रंथविस्तरताभयार्थ ॥१३३॥</p>
<p>
	अक्कलकोटीं संतवरिष्ठ । असतां महाराज अंतर्निष्ठ । भक्त एक बहु व्याधिष्ट । दु:सह कष्ट पावला ॥१३४॥</p>
<p>
	सेवा केली बहुत दिन । व्याधिविहीन होईन म्हणून । होईनात ते कष्ट सहन । अति उद्विग्न जाहला ॥१३५॥</p>
<p>
	करूनि आत्महत्येचा निर्धार । पाहूनियां रात्रीचा प्रहर । जाऊनि एका विहिरीवर । केला शरीरपात तेणें ॥१३६॥</p>
<p>
	इतुक्यांत महाराज तेथें आले । स्वहस्तूं तयास बाहेर काढिलें । ‘भोक्तृत्व सारें पाहिजे भोगिलें’ । उपदेशिलें तयास ॥१३७॥</p>
<p>
	आपुल्या पूर्वकर्माजोग । व्याधि कुष्ठ क्लेश वा रोग । जाहल्यावीण पूर्ण भोग । हत्यायोग काय करी ॥१३८॥</p>
<p>
	हा भोग राहतां अपुरा । जन्म घ्यावा लागे दुसरा । म्हणूनि तैसेच साहें कष्ट जरा । आत्महत्यारा होऊं नको ॥१३९॥</p>
<p>
	वाचूनि ही समयोचित कथा । थक्क जाहले आंबडेकर चित्ता । जागींच वरमले अवचिता । बाबांची व्यापकता पाहूनि ॥१४०॥</p>
<p>
	आंबडेकर मनीं तरकले । पूर्व अद्दष्ट पाहिजे भोगिलें । हेंच योग्य प्रसंगीं सुचविलें । साहस योजिलें न भलें तें ॥१४१॥</p>
<p>
	जैसी वाचा अशरीरिणी । तैसीच या द्दष्टांताची करणी । हेत जडला साईंचे चरणीं । अघटित घटणी साईंची ॥१४२॥</p>
<p>
	सगुणमुखें साईंचा इशारा । ह अकल्पित पुस्तकद्वारा । यावया विलंब लागता जरा । होता मातेरा जन्माचा ॥१४३॥</p>
<p>
	मुकलों असतों निजजीविता । करितों दुर्धर कुटुंबघाता । स्त्रियेवरी ओढवितों अनर्था । स्वार्था परमार्था नागवतों ॥१४४॥</p>
<p>
	पोथीचें करूनियां निमित्त । बाबांनीं केलें सगुणास प्रवृत्त । आत्मघातापासाव चित्त । परावृत्त केलें कीं ॥१४५॥</p>
<p>
	प्रकार ऐसा जरी न घडता । बिचारा व्यर्थ जिवास मुकाता । परी जेथें साईंसम तारिता । काय तो मारिता मारील ॥१४६॥</p>
<p>
	अक्कलकोटस्वामींची भक्ती । या भक्ताचे वडिलांस होती । तीच पुढें चालवा ही प्रचीती । आणूनि देती त्या बाबा ॥१४७॥</p>
<p>
	असो पुढें बरवें झालें । हेही दिवस निघून गेले । ज्योतिर्विद्येंत परिश्रम केले । फळही आलें उदयाला ॥१४८॥</p>
<p>
	साईकृपाप्रसाद पावले । पुढें आले दिवस चांगले । ज्योतिर्विद्येंत प्रावीण्य संपादिलें । दैन्य निरसलें पूर्वील ॥१४९॥</p>
<p>
	वाढलें गुरुपदीं प्रेम । जाहलें सुख कुशल क्षेम । लाधलें गृहसौख्य आराम । आनंद परम पावले ॥१५०॥</p>
<p>
	ऐसे अगणित चमत्कार । एकाहूनि एक थोर । कथितां होईल ग्रंथविस्तर । तदर्थ सार कथियेलें ॥१५१॥</p>
<p>
	हेमाड साईपदीं शरण । पुढील अध्यायीं गोड कथन । विष्णुसहस्रनामदान । शामयालागून दीधलें ॥१५२॥</p>
<p>
	नको नको म्हणतां शामा । बाबांस अनिवार तयांचा प्रेमा । बळेंच देतील सहस्रनामा । सुंदर माहात्म्या वर्णून ॥१५३॥</p>
<p>
	आतां सादर परिसा ती कथा । अनुग्रहाचा समय येतां । शिष्याची इच्छा मुळींही नसतां । बाबा तो देतां दिसतील ॥१५४॥</p>
<p>
	अनुग्रहाची अलौकिक परी । कैसी असते सद्नुरुघरीं । दिसूनि येईल अध्यायांपरीं । श्रोतां आदरीं परिसिजे ॥१५५॥</p>
<p>
	कल्याणाचें जें कल्याण । तो हा साई गुणनिधान । सभाग्य पुण्यश्रवणकीर्तन । चरित्र पावन जयाचें ॥१५६॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । अपस्मारात्महत्यानिवारणं तथा निजगुरुपदस्थिरीकरणं नाम षड्‌विंशतितमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 14:21:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 14:50:33 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय २५]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-25-122042600043_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
साईमहाराज कृपासागर । साक्षात्‌ ईश्वरी अवतार । पूर्णब्रम्हा महान्‌ योगेश्वर । साष्टांग नमस्कार तयांसी ॥१॥
जयजयाजी ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 25" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650961968-9339.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra adhyaay 25" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	साईमहाराज कृपासागर । साक्षात्‌ ईश्वरी अवतार । पूर्णब्रम्हा महान्‌ योगेश्वर । साष्टांग नमस्कार तयांसी ॥१॥</p>
<p>
	जयजयाजी संतललामा । मंगलधामा आत्मारामा । साईसमर्था भक्तविश्रामा । पूर्णकामा तुज नमो ॥२॥</p>
<p>
	पूर्वाध्यायीं निरूपण । थट्टाविनोदपरिशीलन । परी हा साई भक्तभावन । भक्तरंजन नित्य करी ॥३॥</p>
<p>
	साई परम दयामूर्ति । एक पाहिजे अनन्य भक्ति । भक्त श्रद्धाळू आणि भावार्थी । इच्छितार्थीं ना न्यून ॥४॥</p>
<p>
	‘सद्नुरु तोचि माझी मूर्ति’ । कृष्ण बोले उद्धवाप्रती । ऐसा सद्नुरु भजावा प्रीतीं । अनन्य भक्ति या नांव ॥५॥</p>
<p>
	अंतरीं उदेला मनोरथ । ल्याहावें श्रीसाईचरित । लीलाश्रवणार्ह अत्यद्भुत । लिहवूनि निश्चित मज केलें ॥६॥</p>
<p>
	नसतां अधिकार - ज्ञानव्युत्पत्ति । मज पामरा स्फुरविली स्फूर्ति । ग्रंथ लिहविला माझिये हातीं । द्यावया जागृति निजभक्तां ॥७॥</p>
<p>
	‘दप्तर ठेवीं’ ऐसी अनुज्ञा । जेव्हां जाहली मजसम अज्ञा । तेव्हांच माझी अल्प प्रज्ञा । धैर्यविज्ञानसंपन्न ॥८॥</p>
<p>
	तेव्हांच मज आला धीर । कीं हा साई गुणगंभीर । ठेवूनि घेणार आपुलें दप्तर । निजभक्तोद्धाराकारणें ॥९॥</p>
<p>
	नातरी हा वाग्विलास । होतें काय मज हें साहस । संतचरण - प्रसाद पायस । चरितसुधारस हा ऐसा ॥१०॥</p>
<p>
	ही श्रीसाईचरितरूपा । भक्तार्थ साईकथामृतप्रपा । यथेच्छ सेवा साईकृपा । भवदवतापा निवारा ॥११॥</p>
<p>
	चरित नव्हे हा सोमकांत । साईकथा चंद्रामृत स्रवत । भक्त चकोर तृषाकुलित । होवोत तृप्त मनसोक्त ॥१२॥</p>
<p>
	आतां प्रेमळ श्रोतेजन । संकोचरहित एकाग्र मन । परिसोत या कलिमलदहन । कथा पावन साईंच्या ॥१३॥</p>
<p>
	जड्ली एकदां अनन्य निष्ठा । कीं त्या भक्ताच्या सकळ अनिष्टा । वारूनि अर्पितो तया अभीष्टा । तयाचे कष्टा निवारी ॥१४॥</p>
<p>
	ये अर्थींची एक वार्ता । दावी ल साईंची भक्तवत्सलता  । श्रोतीं परिसतां ती सादरता । आनंद चित्ता होईल ॥१५॥</p>
<p>
	तरी लावूनियां जीव । कथा ऐका हे अभिनव । पटेल मनास अनुभव । कैसी दयार्णव गुरुमाय ॥१६॥</p>
<p>
	कथा जरी ही बहु तोकडी । अर्थावबोधें अति चोखडी । अवधान दीजे एक घडी । सरतील सांकडीं बाजूला ॥१७॥</p>
<p>
	सहमदनगरचे सुखवस्त । कासार एक धनवंत । दामूअण्णा  नामें भक्त । पदीं जे अनुरक्त साईंच्या ॥१८॥</p>
<p>
	तया परम भक्ताची कथा । आनंद होइल श्रवण करितां । भक्तरक्षणतत्परता । दिसेल प्रत्यक्षता साईंची ॥१९॥</p>
<p>
	रामनवमी - वार्षिकोत्सवीं । मोठीं दोन निशाणें नवीं । निघती मिरवीत शिर्डी गांवीं । आहेत ठावीं तत्रस्थां ॥२०॥</p>
<p>
	त्यांतील एक निमोणकरांचें । दुसरें या दामूअण्णांचें । नेम हे त्यांचे कैक वर्षांचे । भक्तिप्रेमाचे अव्याहत ॥२१॥</p>
<p>
	दोन स्त्रिया दामूअण्णांस । पुत्रसंतति नव्हती त्यांस । लाधूनि साईंच्या आशीर्वादास । पुत्ररत्नास पावले ॥२२॥</p>
<p>
	केला निशाणाचा नवस । रामनवमीच्या उत्सवास । आरंभ झाला मिरवणुकीस । निशाण वर्षास तेथून ॥२३॥</p>
<p>
	कोंडया सुताराच्या घरीं । होते मिरवणुकीची तयारी । तेथूनि मग वाद्यांचे गजरीं । निशाण मिरवीत नेतात ॥२४॥</p>
<p>
	मशिदीचिया दोनी टोंकां । बांधिती तैं दीर्घ पताका । समारंभेंसी महोत्सव निका । करिती विलोका प्रतिवर्षीं ॥२५॥</p>
<p>
	तैसेंच तेथें जे फकीर येती । तयांस यथेष्ट जेवॄं घालिती । रामनवमी ऐसिये रीती । प्रतिपाळिती हे शेट ॥२६॥</p>
<p>
	त्या या दामूअण्णांची कथा । श्रवणार्थियां निवेदितों आतां । श्रवण करितां सावधानता । साईसमर्थता प्रकटेल ॥२७॥</p>
<p>
	मुंबानगरीचा तयांची स्नेही । मुंबईहूनि पत्र लिही । दो लाख निव्वल नफा होई । ऐसी किफाईत करूं कीं ॥२८॥</p>
<p>
	तुम्हां आम्हां भागी देख । कमावूं प्रत्येकीं लाख लाक । उत्तर धाडा करा चलाख । धंदाही चोख निर्भय कीं ॥२९॥</p>
<p>
	खरेदूं कापूस ये वक्तीं । भाव चढेल हातोहातीं । सौदा न साधिती वेळेवरती । मग ते पस्तावती मागाहून ॥३०॥</p>
<p>
	दवडूं न द्यावी ऐसी वेळ । उडाली अण्णांचे मनाची खळबळ । भरंवसा त्या स्नेह्यावरी सबळ । विचार निश्चळ सुचेना ॥३१॥</p>
<p>
	धंदा करावा वा न करावा । विचार पडला अण्णांचे जीवा । काय होईल कैसें देवा । गोवा पडला मनाला ॥३२॥</p>
<p>
	दामूअण्णाही गुरुपुत्र । बाबांस लिहिते झाले पत्र । आम्हां न बुद्धि स्वतंत्र । आपणचि छत्र आमहांतें ॥३३॥</p>
<p>
	व्यापार हा तों सकृद्दर्शनीं । करावा ऐसें येतें मनीं । परी होईल लाभ कीं हानी । कृपा करोनि सांगा जी ॥३४॥</p>
<p>
	पत्र लिहिलें माधवरावा । कीं हें बाबांस वाचूनि दावा । आज्ञा होईल तैसें कळवा । उद्यम बरवा वाटतो ॥३५॥</p>
<p>
	दुसरे दिवशीं तिसरे प्रहरीं । पत्र पडलें माधवरावकरीं । तेणें नेऊनि मशिदीभीतरीं । चरणांवरी घातलें ॥३६॥</p>
<p>
	“काय शामा काय घाई । कागुद कसला लावितो पायीं” । बाबा तो नगरचा दामूशेट कांहीं । विचारं पाही आपणांतें ॥३७॥</p>
<p>
	“कां बरें तो काय लिहितो । काय कसले बेत करतो । वाटे आभाळा हात लावितो । देव देतो तें नको ॥३८॥</p>
<p>
	वाच वाच पत्र त्याचें” । शामा म्हणे जें वदतां वाचे । तेच अर्थाचें पत्र साचें । दामूअण्णांचें अक्षरश: ॥३९॥</p>
<p>
	देवा, आपण बसतां निश्चळ । उडवितां भक्तांची खळबळ । मग होतां मनाची तळमळ । पायाजवळ आणितां ॥४०॥</p>
<p>
	कोणास स्वयें ओढून आणितां । कोणालागीं पत्रें लिहवितां । अंत:स्थ आशय आधींच सांगतां । मग वाचवितां किमर्थ ॥४१॥</p>
<p>
	“अरे शामा वाच वाच । माझे काय मानितो साच । मी तंव आपुला आहें असाच । बोलें उगाच माने तें” ॥४२॥</p>
<p>
	मग माधवराव पत्र वाचिती । बाबा लक्ष लावूनि ऐकती । कळकळूनि मग बाबा वदती । “चळली मती शेटीची ॥४३॥</p>
<p>
	सांग कीं तयास प्रत्युत्तरीं । काय उणें तुज असतां घरीं । पुरे आपुली अर्धी भाकरी । लाखाचे भरी पडूं नको” ॥४४॥</p>
<p>
	प्रत्युत्तराची क्षणक्षणा । वाटचि पाहत दामूअण्णा । उत्तर येतांचि तत्क्षणा । दामूअण्णा वाचिती ॥४५॥</p>
<p>
	ऐकूनि त्या प्रत्युत्तराला । दामूशेटीचा विरस झाला । मनोरथाचा दुर्गचि ढांसळला । वृक्ष उन्मळला आशेचा ॥४६॥</p>
<p>
	आतां एक लाख कमावूं । अर्धा लाख व्याजीं लावूं । तात्काळ लाखे सावकार होऊं । आनंदें राहूं नगरांत ॥४७॥</p>
<p>
	मनोराज्य होतें जें केलें । जागचे जागींच तें विरघळलें । दामूअण्णा अत्यंत हिरमुसले । हें काय केलें बाबांनीं ॥४८॥</p>
<p>
	पत्र लिहिलें येथेंच फसलें । आपुलें आपण अनहित केलें । देखत देखत वाडिलेलें । ताट लाथाडिलें आपणचि ॥४९॥</p>
<p>
	असो त्या पत्रांत दामू आण्णांतें । ऐसेंही ध्वनित केलें होतें । कानाडोळ्यांचें अंतर असतें । यावें कीं येथें समक्ष ॥५०॥</p>
<p>
	ऐसें माधवरावांचें सूचित । समक्ष जावें वाटलें उचित । न जाणों असेल त्यांतही हित । कदाचित अनुमत देतील ॥५१॥</p>
<p>
	ऐसा विचार करूनि मनीं । अण्णा आले शिर्डीलागूनी । बैसले बाबांचे सन्निधानीं । लोटांगणीं येऊन ॥५२॥</p>
<p>
	हळू हळू पाय दाबिती । विचारावया नाहीं धृती । अंतर्यामीं उठली वृत्ती । बाबांची पाती ठेवावी ॥५३॥</p>
<p>
	मनांत म्हणती साईनाथा । कराल जरी या व्यापारा साह्यता । नफ्याचा कांहीं भागमी अर्पिता । पायावरता होईन ॥५४॥</p>
<p>
	मस्तकीं धरिले साईचरण । दामूअण्णा बैसले क्षण । संकल्प - विकल्प मनाचें लक्षण । व्यापार आंतून चालले ॥५५॥</p>
<p>
	भक्तीं करावे मनोरथ । ते न जाणती खरा स्वार्थ । गुरु एक जाणे शिष्याचें हित । भावी - भूत - वर्तमान ॥५६॥</p>
<p>
	निजमनींचें मनोगत । कोणी कितीही ठेवो गुप्त । साई समर्थ सर्वगत । अंतर्वृत्त जाणे तो ॥५७॥</p>
<p>
	जेव्हां कोणी मनींचें ह्रद्नत । साईचरणीं प्रेमें निवेदित । पूर्ण विश्वासें अनुज्ञा प्रार्थित । दावित सत्पथ साई त्यां ॥५८॥</p>
<p>
	हें तों तयांचें निजव्रत । जाणती हें भक्त समस्त । जो जो अनन्य शरणागत । आपदा वारीत तयांच्या ॥५९॥</p>
<p>
	गुरुचि सत्य माता - पिताअ । अनेका जन्मींचा पाता - त्राता । तोचि हरिहर आणि विधाता । कर्ता - करविता तो एक ॥६०॥</p>
<p>
	बाळ मागतां गोडधडू । माता पाजी बोळकडू । बाळ तडफडू वा रडू । प्रेमनिवाडू हा ऐसा ॥६१॥</p>
<p>
	बोळाचा तो कडूपणा । योग्य काळें चढणार गुणा । बाळ काय जाणे त्या लक्षणा । मातेच्या खुणा मातेस ॥६२॥</p>
<p>
	अण्णा जरी ठेविती पाती । बाबा काय तेणें भुलती । लाभेंवीण तयांची प्रीती । निजभक्तहितीं तत्पर ॥६३॥</p>
<p>
	धन - कनक जयां माती । किंपदार्थ तयांतें पाती । केवळ दीनजनोद्धरणार्थी । जगीं अवतरती हे संत ॥६४॥</p>
<p>
	यमनियमशमदमसंपन्न । मायामात्सर्यदोषविहीन । केवळ परानुग्रह - प्रयोजन । जयाचें जीवन तो ‘संत’ ॥६५॥</p>
<p>
	दामूअण्णांची ही पाती । मनींचे मनींचे मनीं गुप्त होती । बाबा प्रकट उत्तर देती । सादरवृत्तीं परिसावें ॥६६॥</p>
<p>
	जीवमात्राचें मनोगत । बाबांस सकळ अवगत । वर्तमान - भविष्य - भूत । जैसा करतलग - आमलक ॥६७॥</p>
<p>
	निजभक्ताची भावी स्थिती । समस्त ठावी बाबांप्रती । कैसे वेळेवर सावध करिती । ती स्पष्टोक्ती परिसावी ॥६८॥</p>
<p>
	“आपण नाहीं रे बापू किसमें” । बाबा देती सूचना प्रेमें । व्यापार बरवा साईस न गमे । अण्णा शरमे मनांत ॥६९॥</p>
<p>
	ऐकूनि हें बाबांचें वचन । दामूअण्णांस पटली खूण । दिधला मनाचा संकल्प सोडून । बैसले अधोवदन उगा ॥७०॥</p>
<p>
	पुनश्च मनीं उठला विचार । करूं काय दुसरा व्यापार  । तांदूळ गहूं भुसार । परिसा प्रत्युत्तर बाबांचें ॥७१॥</p>
<p>
	पांच शेर तूं घेसील । सातशेर ओपिसील । परिसूनि हे बाबांचे बोल । अंतरीं खजील अण्णा तैं ॥७२॥</p>
<p>
	ऐसें कोठें कांहींही न घडे । जें साईंच्या द्दष्टीस न पडे । खालीं वरती जिकडे तिकडे । सर्वत्र उघडें तयांस ॥७३॥</p>
<p>
	येरीकडे त्यांचा स्नेही । विचारगहनीं पडला पाहीं । काय करावें सुचेना कांहीं । उत्तरही नाहीं अण्णांचें ॥७४॥</p>
<p>
	तों ते शेट पत्र लिहीत । वृत्तांत घडलेला कळवीत । वाचूनि स्नेही विस्मित होत । म्हणती कर्मगत विचित्र ॥७५॥</p>
<p>
	काय सौदा चालूनि आला । स्वयेंच कां ना विचार केला । किमर्थ फकीराचे नादीं लागला । व्यर्थ मुकला लाभाला ॥७६॥</p>
<p>
	‘देव देतो कर्म नेतें । होणार्‍यासारखी बुद्धि होते’ । ऐसा चोखा धंदा जेथें । फकीर तेथें कां व्हावा ॥७७॥</p>
<p>
	व्यवहारावर देऊनि पाणी । दारोदार वेडयावाणी । पोट भरिती तुकडे मागुनी । ते काय सांगूनि सांगती ॥७८॥</p>
<p>
	असो नाहीं तयाचे दैवीं । तेणेंच ऐसी त्या बुद्धि व्हावी । दुसरी कोणी पाती पहावी । ‘यदभावि न तद्‌भावि’ तें ॥७९॥</p>
<p>
	झालें, अण्णा स्वस्थ बैसले । होतें जयांचें कर्म ओढवलें । तेच त्या स्नेह्याचे पातीदार झाले । आलें तपेलें गळ्य़ांत ॥८०॥</p>
<p>
	करावया गेले सट्टा । परी तयांचा  दिवस उलटा । ठोकर लागली झाला तोटा । कैसा सोटा फकीराचा ॥८१॥</p>
<p>
	काय माझा दामूअण्णा । नशीबाचा, मोठा शहाणा । खरा त्याचा साईदाणा । भक्तकरुणा केवढी ॥८२॥</p>
<p>
	स्नेही म्हणूनि माझे फंदीं । पडतां नागवता स्वच्छंदीं । तरला बिचारा फकीराचे नादीं । काय द्दढबुद्धि तयाची ॥८३॥</p>
<p>
	थट्टा त्याचे वेडेपणाची । घमंड माझे शहाणपणाची । व्यर्थ व्यर्थ जहाली साची । अनुभव हाचि लाधलों ॥८४॥</p>
<p>
	उगीच त्या फकीराची निंदा । न करितां लागतों त्याचे नादा । मजलाही तो वेळेवर जागा । करिता न दगा होता हा ॥८५॥</p>
<p>
	आतां आणीक एक वार्ता । सांगूनि आवरूं अण्णाच्या ग्रंथा । आनंद होईल श्रोतियां चित्ता । वाटेल आश्चर्यता बाबांची ॥८६॥</p>
<p>
	पहा एकदां ऐसें वर्तलें । गोव्याहूनि पार्सल आलें । आंबे नामांकित कोणी धाडिले । मामलेदार राळे या नांवें ॥८७॥</p>
<p>
	माधवरावांच्या नांवावर । बाबांच्या पायीं व्हावें सादर । म्हणूनि कोपरगांवीं स्वीकार । होऊनि शिरडीवर तें आलें ॥८८॥</p>
<p>
	मशिदींत बाबांसमोर । उघडतां आंबे निघाले सुंदर । होते एकंदर तीनशेंवर । फळें तीं मधुर घमघमित ॥८९॥</p>
<p>
	बाबांनीं तीं अवघीं पाहिलीं । माधवरावांपाशीं दिधलीं । तयांनीं चार कोळंब्यांत टाकिलीं । उरलीं तीं नेलीं बरोबर ॥९०॥</p>
<p>
	फळें पडतां कोळंब्यांत । बाबा मुखें काय उद्नारत । “फळें तीं दामुअण्णाप्रीत्यर्थ । असूं दे तेथ पडलेलीं” ॥९१॥</p>
<p>
	यावर जातां दोन तास । आले पूजा करावयास । दामूअण्णा मशिदीस । पुष्पसंभारास घेऊनी ॥९२॥</p>
<p>
	तयां न पूर्ववृत्त तें कळलें । बाबा मोठयानें बोलूं लागले । आंबे दाम्याचे न ते आपुले । खावया टपले लोक जरी ॥९३॥</p>
<p>
	ज्याचे आंबे त्यानेंच घ्यावे । किमर्थ आपणां कोणाचे व्हावे । ज्याचे असतील त्यानेंचि खावे । मरूनि जावें खावोनी” ॥९४॥</p>
<p>
	प्रसादचि हा ऐसिया भावें । अण्णा स्वीकारिती स्वभावें । विपरीतार्थालागीं न भ्यावें । पूर्ण हें ठावें अण्णास ॥९५॥</p>
<p>
	पूजा सारोनि अण्णा गेले । पुनश्च येऊनि पुसूं लागले । मोठीस कीं धाकटीस हीं फळें । अर्पूं न कळे कोणास ॥९६॥</p>
<p>
	बाबा वदती धाकटीला । दे आठ मुलें होतील तिजला । चार मुलगे चार मुलींला । ही आमलीला प्रसवेल ॥९७॥</p>
<p>
	पोटीं नाहीं पुत्रसंतान । म्हणूनि करावे बहु प्रयत्न । साधुसंतांचें करावें भजन । कृपाशीर्वचन मिळवावें ॥९८॥</p>
<p>
	यदर्थ साधुसंतांचा नाद । मिळवावया ग्रहप्रसाद । ज्योतिर्विद्येचा लागला छंद । जाहले ज्योतिर्विद स्वयमेव ॥९९॥</p>
<p>
	नशिबीं नाहीं संतान । हेंचि ज्योतिर्विद्येचें निदान । अण्णा होते पूर्ण जाणून । निराश होऊन बसलेले ॥१००॥</p>
<p>
	तथापि हें आश्वासन । साईसंतमुखींचें वचन । पुनश्च आशा झाली उत्पन्न । समर्थ प्रसन्न होतांचि ॥१०१॥</p>
<p>
	असो पुढें कालांतरें । सफल झालीं बाबांचीं अक्षरें । संतप्रसादाम्रांकुरें । संतति - फलभरें प्रसवलीं ॥१०२॥</p>
<p>
	जैसे बोलले तैसेंच घडलें । आपुलें ज्योतिष निष्फल झालें । साईंचे बोल अमोघ ठरले । जाहलीं मुलें वचनोक्त ॥१०३॥</p>
<p>
	असो ही तों बाबांची वैखरी । बाबा असतां देहधारी । परी पुढेंही देहत्यागानंतरी । स्वयें निर्धारी निजमहिमा ॥१०४॥</p>
<p>
	“झालों जरी गतप्राण । वाक्य माझें माना प्रमाण । माझीं हाडें तुर्वतीमधून । देतील आश्वासन तुम्हांस ॥१०५॥</p>
<p>
	मी काय पण माझी तुर्वत । राहील तुम्हांसवें बोलत । जो तीस अनन्य शरणागत । राहील डोलत तयासवें ॥१०६॥</p>
<p>
	डोळ्याआड होईन ही चिंता । करूं नका तुम्ही मजकरितां । माझीं हाडें ऐकाल बोलतां । हितगुज करितां तुम्हांसवें ॥१०७॥</p>
<p>
	मात्र माझें करा स्मरण । विश्वासयुक्त अंत:करण । ठेवा करा निष्कामभजन । कृतकल्याण पावाल” ॥१०८॥</p>
<p>
	हे भक्तकामकल्पतरो । समर्थ साई श्रीसद्नुरो । हेमाड तुझिया चरणा न अंतरो । भाकी परोपरी हे करुणा ॥१०९॥</p>
<p>
	धांव पाव गा गुरुवरा । भक्तजनकरुणाकरा । उसंत नाहीं या संसारा । येरझारा पुरे आतां ॥११०॥</p>
<p>
	आम्हां स्वभावप्रवृत्तिपरां । बाम्हाविषयालोचनतत्परां । विषयभोगांपासाव आवरा । वृत्तीसी करा अंतर्मुख ॥१११॥</p>
<p>
	लाटेसरसे सैरा वाहत । चाललों आम्ही भवसागरांत । देऊनियां प्रसंगीं हात । भवनिर्मुक्त करा कीं ॥११२॥</p>
<p>
	इंद्रियें वाहती सैरावैरा । प्रवृत्त होती दुराचारा । बांधा उच्छृंखल नदीस बंधारा । फिरवा माघारा इंद्रियगण ॥११३॥</p>
<p>
	इंद्रियें न जों अंतर्मुख । आत्मा न कदा होई सन्मुख । त्यावीण कैंचें आत्यंतिक सुख । जन्म निरर्थक होईल ॥११४॥</p>
<p>
	कलत्र - पुत्र - मित्रपंक्ति । कोणीही कामा येती न अंतीं । तूंचि एक अखेरचा साथी । सुख - निर्मुक्तिदायक तूं ॥११५॥</p>
<p>
	उकलूनि कर्माकर्मांचें जाळें । करीं एकवेळ दु:खावेगळें । उद्धरीं हे दीनदुबळे । कृपाबळें महाराजा ॥११६॥</p>
<p>
	वादाबादी इतर अवकळा । कृपाबळें समूळ निर्दळा । रसनेस लागो नामाचा चाळा । सुनिर्मळा साईराया ॥११७॥</p>
<p>
	ऐसें देईं प्रेम मना । घालवीं संकल्पविकल्यांना । विसरवीं देहगेहभाना । माझा मीपणाही दवडीं ॥११८॥</p>
<p>
	घडो तुझें नामस्मरण । व्हावी न इतर आठवण । यावें मनासी निश्चलपण । चंचलपण नातळो ॥११९॥</p>
<p>
	त्वां आम्हां धरितां पोटाशीं । मावळेल अज्ञानतमनिशी । सुखें नांदूं तुझिया प्रकाशीं । उणें आम्हांसी कायसें ॥१२०॥</p>
<p>
	तुवां हें जें आम्हांप्रत । पाजिलें  निजचरितामृत । थापटोनि जें केलें जागृत । हें काय सुकृत सामान्य ॥१२१॥</p>
<p>
	पुढील अध्याय याहूनि गोड । पुरेल श्रवणार्थियांचें कोड । वाढेल साईचरणीं आवड । श्रद्धाही सुद्दढ केलें ॥१२३॥</p>
<p>
	तैसेच एक दुसरे गृहस्थ । श्रीमंत परी विपद्‌ग्रस्त । आले पुत्रकलत्रसहित । दर्शनार्थ साईंच्या ॥१२४॥</p>
<p>
	कैसा तयांचा पुरविला हेत । कैसा पुत्र अपस्मारव्यथित । केला दर्शनें व्याधिनिर्मुक्त । पूर्वदष्टांत स्मरवुनी ॥१२५॥</p>
<p>
	म्हणोनि हेमाड साईंस शरण । करी श्रोतयां आदरें विनवण । होऊनि साईकथाप्रवण । करा जी श्रवणसार्थक्य ॥१२६॥</p>
<p>
	सस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । भक्ताभीष्टसंपादनं नाम पंचतुर्विंशतितमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 14:01:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 14:49:43 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय २४]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-24-122042600038_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
गताध्यायांतीं दिधलें वचन । साईनाथगुरु करुणाघन । थट्टामस्करीतही देती शिकवण । कैशी ती कथन करितों मी ॥१॥]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 24" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650960072-6049.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra chapter 24" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	गताध्यायांतीं दिधलें वचन । साईनाथगुरु करुणाघन । थट्टामस्करीतही देती शिकवण । कैशी ती कथन करितों मी ॥१॥</p>
<p>
	कथन करितों हा अहंकार । असावें गुरुपदीं निरहंकार । तेणेंचि कथेसी पाझर । फुटतो सादर सेवावा ॥२॥</p>
<p>
	नित्य निर्मल निष्कल्मष । साधु सज्जन महापुरुष । स्वच्छ निरभ्र जैसें आकाश । शुद्ध निर्दोष तैसे ते ॥३॥</p>
<p>
	महाराज साईंचें भजन । स्वार्थ आणि परमर्थसाधन । स्वस्वरूपीं अनुसंधान । समाधान अंतरीं ॥४॥</p>
<p>
	जया मनीं स्वहित साधणें । कथेसी आदर धरावा तेणें । सहज परमानंद भोगणें । सार्थक साधणें जीवाचें ॥५॥</p>
<p>
	श्रवणें लाभेल निजविश्रांति । निरसेल भवभयाची भ्रांति । होईल परमानंदप्राप्ति । श्रोतियां सद्नति रोकडी ॥६॥</p>
<p>
	अंतरसाक्ष साईसमर्थ । पूर्ण जाणे भक्तभावार्थ । संपादूनि निजकर्तव्यार्थ । बचननिर्मुक्त होईल ॥७॥</p>
<p>
	बुद्धिप्रेरक साईसमर्थ । तेच वदविती निजवचनार्थ । कथीन यथामति तद्भावार्थ । स्वार्थपरमार्थसाधक ॥८॥</p>
<p>
	नव्हे अंध, ना रातांधळे । डोळे असोन जन आंधळे । केवळ या देहबुद्धीचिया बळें । निजहित न कळे तयांतें ॥९॥</p>
<p>
	देह तरी हा आहे ऐसा । नाहीं क्षणाचाही भरंवसा । पसरितों मी पदरपसा । क्षणैक रसा चाखाया ॥१०॥</p>
<p>
	थट्टाविनोदीं सकळां प्रीति । बाबांची तों अलौकिक रीति । थट्टेंतूनही सारचि ठसविती । हितकारक ती सकळांना ॥११॥</p>
<p>
	जन थट्टेच्या नादीं न भरती । परी बाबांच्या थट्टेसी लांचावती  । कधीं कीं आपुले वांटयास ये ती । वाटचि पाहती आवडीनें ॥१२॥</p>
<p>
	थट्टा कोणास बहुधा नावडे । परी ही थट्टा परम आवडे । वरी अभिनयाची जोड जंव जोडे । कार्यचि रोकडें तैं साधे ॥१३॥</p>
<p>
	सहज अभिनव अप्रयास । सस्मितवदन नयनविलास । इंहीं जंव थट्टेंत भरे रस । तियेची सुरसता अवर्ण्य ॥१४॥</p>
<p>
	आतां कथितों एक अनुभव । कथा अल्पबोध अभिनव । थट्टेपोटीं परमार्थेद्भव । शब्दगौरव परिसा तें ॥१५॥</p>
<p>
	आठवडयाचा प्रतिरविवार । शिरडीस भरतो मोठा बाजार । पाल देऊनि उघडयावर । उदीम व्यापार चालतो ॥१६॥</p>
<p>
	तेथेंच मग रस्त्यावर । भाजीपाल्याचे पडती ढिगार । तेली तांबोळी यांचे संभार । चव्हाटयावर बैसती ॥१७॥</p>
<p>
	ऐशा त्या एका रविवारीं । बाबांचेपाशीं दोन प्रहरीं । करितां पादसंवाहन करीं । नवलपरी वर्तली ॥१८॥</p>
<p>
	तो दोनप्रहरचा दरबार । नित्यचि भरे बहु चिकार । त्यांत बाजार आणि रविवार । लोक अनिवार लोटले ॥१९॥</p>
<p>
	उजू बाबांचे सन्मुख बैसून । वांकवूनियां खालीं मान । करीत होतों मी पादसंवाहन । नामस्मरणसमवेत ॥२०॥</p>
<p>
	माधवरावजी वामभागीं । वामनराव दक्षिणांगीं । श्रीमंत बुट्टी तये जागीं । सेवेलागीं बसलेले ॥२१॥</p>
<p>
	काकाही होते तेथेंच बैसले । तितक्यांत माधवराव हंसले । कां अण्णासाहेब हे तेथें कसले । दाणे हे डसले दिसताती ॥२२॥</p>
<p>
	ऐसें म्हणूनि कोटाची अस्तनी । बोटानें स्पर्शतां माधवरावांनीं । कोटाचिया वळियांमधूनि । दाणे वरूनि आढळले ॥२३॥</p>
<p>
	तें काय म्हणून पाहूं जातां । डावें कोपर लांब करितां । फुटाणे दिसले खालीं गडगडतां । मंडळी टिपतां देखिली ॥२४॥</p>
<p>
	टिपून टिपून गोळा केले । पांच पंचवीस फुटाणे भरले । तेथेंच थट्टेस कारण उद्भवलें । ऐसें घडलें कैसेंनी ॥२५॥</p>
<p>
	तर्कावरी चालले तर्क । जो तो विचारांत झाला गर्क । फुटाण्यांचा कोटाशीं संपर्क । विस्मय समस्तां जाहला ॥२६॥</p>
<p>
	खाकी कोटाच्या वळ्या त्या किती । त्यांत हे दाणे कैसे सामावती । आलेच कोठूनि कैशा स्थितीं । न कळे निश्चितीं कवणा हें ॥२७॥</p>
<p>
	करीत असतां पादसंवाहन । लावूनि नामीं अनुसंधाव । मध्येंच हें फुटाण्यांचें आख्यान । कैसेनि उत्पन्न जाहलें ॥२८॥</p>
<p>
	इतुका काळ सेवेंत जातां । कधींच कां ना पडले हे तत्त्वतां । हा वेळ राहिले हीच आश्चर्यता । सकळांच्या चित्ता वाटली ॥२९॥</p>
<p>
	कोठून फुटाणे तेथें आले । वळियांवरी कैसे स्थिरावले । जे ते आश्चर्य करून राहिले  । मग बाबा वदले तें परिसा ॥३०॥</p>
<p>
	शिक्षणाच्या विलक्षण पद्धती । अनेकांच्या अनेक असती । बाबा जयांची जैसी गति । शिक्षण देती त्यां तैसें ॥३१॥</p>
<p>
	पद्धती विचित्र महाराजांची । सरणी स्मरणीय बहु मजेची । अन्यत्र तैसी देखिल्या - ऐकिल्याची । नाहीं प्रचीति मजप्रती ॥३२॥</p>
<p>
	म्हणती “याला वाईट खोडी । एकेकटें खाण्याची गोडी । आज बाजाराची साधूनि घडी । फुटाणे रगडीत हा आला ॥३३॥</p>
<p>
	एकेकटें खाणें बरें नव्हे । ठावी मल अत्याची सर्व । हेच फुटाणे याचे पुरावे । उगा नवलावे कशास” ॥३४॥</p>
<p>
	मग मी म्हणे कोणा न देतां । ठावें न खाणें माझिया चित्ता । तेथें या खोडीची कैंची वार्ता । अंगीं चिकटतां चिकटेना ॥३५॥</p>
<p>
	बाबा मी आज अहा वेळभर । पाहिला नाहीं शिरडीचा बाजार । गेलोंच तरी फुटाणें घेणार । मग खाणार हें पुढेंच ॥३६॥</p>
<p>
	असेल त्यासही असो गोडी । माझी तों नाहीं ऐसी खोडी । दुजिया न देतां आधीं थोडी । वस्तु मी तोंडीं घालींना ॥३७॥</p>
<p>
	मग बाबांची पहा युक्ति । कैसी जडविती निजपदीं भक्ति । ऐकोन ही माझी स्पष्टोक्ति । काय वदती लक्ष द्या ॥३८॥</p>
<p>
	“सन्निध असेल तयास देसी । नसल्यास तूं तरी काय करिसी । मी तरी काय करावें त्यासी । आठवतोसी काय मज ॥३९॥</p>
<p>
	मी नाहीं का तुझ्याजवळ । देतोस काय मजला कवळ” । ऐसें फुटाण्याचें हें मिष केवळ । तत्त्व निश्चळ ठसविलें ॥४०॥</p>
<p>
	देवता - प्राण - अग्नि - वंचन । वैश्वदेवांतीं अतिथिवर्जन । करूनि करिती जे पिंडपोषण । महद्दूषण त्या अन्ना ॥४१॥</p>
<p>
	वाटेल हें लहान तत्त्व । व्यवहारीं लावितां अति महत्त्व । रसास्वादन तों उपलक्षणत्व । पंचविषयत्व या पोटीं ॥४२॥</p>
<p>
	विषयीं जयासी हव्यास । परमार्थ न धरी तयाची आस । तयांवरी जो घालील कास । तयाचा दास परमार्थ ॥४३॥</p>
<p>
	“यदा पंचावतिष्ठंते” । या मंत्रें जें श्रुति वदते । तेंच बाबा या थट्टेच्या निमित्तें । द्दढ करिते जाहले ॥४४॥</p>
<p>
	शब्दस्पर्शरूपगंध । या चतुष्टयाचाही हाच संबंध । किती बोधप्रद हा प्रबंध । कथानुबंध बाबांचा ॥४५॥</p>
<p>
	मनबुद्धयादि इंद्रियगण । करुं आदरितां विषयसेवन । करावें आधीं माझें स्मरण । तैं मज समर्पण अंशांशें ॥४६॥</p>
<p>
	इंद्रियें विषयांवीण राहती । हें तों न घडे कल्पांतीं । ते विषय जरी गुरुपदीं अर्पिती । सहजीं आसक्ति राहील ॥४७॥</p>
<p>
	काम तरी मद्विषयींच कामावें । कोप आल्या मजवरीच कोपावें । अभिमान दुराग्रह समर्वावे । भक्तीं वहावे मत्पदीं ॥४८॥</p>
<p>
	काम क्रोध अभिमान । वृत्ति जंव उठती कडकडून । मी एक लक्ष्य लक्षून । मजवरी निक्षून सोडाव्या ॥४९॥</p>
<p>
	क्रमें क्रमें येणेंपरी । वृत्तिनिकृंतन करील हरी । मग या विखारत्रयाच्या लहरी । तो परिहरील गोविंद ॥५०॥</p>
<p>
	किंबहुना हें विकारजात । मत्स्वरूपींच लय पावत । किंवा मद्रूपचि तें स्वयें होत । विश्रामत मत्पदीं ॥५१॥</p>
<p>
	ऐसें होतां अभ्यसन । वृत्ति स्वयेंच होती क्षीण । कालांतरें  समूलनिर्मूलन । वृत्तिशून्य मन होई ॥५२॥</p>
<p>
	गुरु असे निरंतर सन्निधी । ऐसी वाढतां द्दढ बुद्धी । तयास या ऐसिया विधी । विषय न बाधी कदाही ॥५३॥</p>
<p>
	जेथ हा सद्भाव ठसला । तेथेंचि भवबंध उकलला । विषयोविषयीं गुरु प्रकटला । विषयचि नटला गुरुरूपें ॥५४॥</p>
<p>
	यत्किंचित विषयसेवनीं । बाबा आहेत संनिधानीं । सेव्यासेव्यता विचार मनीं । सकृद्दर्शनीं उठेल ॥५५॥</p>
<p>
	असेव्य विषय सहजचि सुटे । व्यसनी भक्ताचें व्यसन तुटे । असेव्यार्थीं मनही विटे । वळवितां नेहटें हें वळण ॥५६॥</p>
<p>
	विषयनियमनीं होई सादर । वेद त्या नियमाचा आकर । विषय सेवी मग नियमानुसार । स्वेच्छाचार वर्तेना ॥५७॥</p>
<p>
	ऐसी संवयी लागतां मना । क्षीण होती विषयकल्पना । आवडी उपजे गुरुभजना । शुद्धज्ञाना अंकुर ये ॥५८॥</p>
<p>
	शुद्ध ज्ञान लागतां वाढी । देहबुद्धीची तुटे बेडी । ते बुद्धी दे अहंब्रम्हीं बुडी । सुखनिरवडी मग लाहे ॥५९॥</p>
<p>
	जरी हा देह क्षणभंगुर देख । तरी हा परमपुरुषार्थसाधक । जो प्रत्यक्ष मोक्षाहून अधिक । कीं भक्तियोगप्रदायक हा ॥६०॥</p>
<p>
	चारी पुरुषार्थांच्यावरी । या पंचम पुरुषार्थाची पायरी । कांहीं न पावे या योगाची सरी । अलौकिक परी भक्तीची ॥६१॥</p>
<p>
	गुरुसेवेनें जो होई कृतार्थ । तया आकळे हें वर्म यथार्थ । भक्तिज्ञानवैराग्य - स्वार्थ । तोचि परमार्थ पावेल ॥६२॥</p>
<p>
	गुरु आणि देव यांत । भेद पाही जयाचें चित्त । तेणें अखिल भागवतांत । नाहींच भगवंत देखिला ॥६३॥</p>
<p>
	वाचिलें अखिल रामायण । ठावी न रामाची सीता कोण । सांडूनियां द्वैतदर्शन । गुरु - देव अभिन्न जाणावे ॥६४॥</p>
<p>
	घडतां गुरुसेवा निर्मळ । होईल विषयवासना निर्मूळ । चित्त होईल शुद्ध सोज्ज्वळ । स्वरूप उज्ज्वळ प्रकटेल ॥६५॥</p>
<p>
	असो इच्छाशक्ति होतां प्रबळ । फुटाणें बाबांचे हातचा मळ । याहून विलक्षण करितां खेळ । त्यां काळवेळ लागेना ॥६६॥</p>
<p>
	केवळ पोटाचिया ओढी । ऐंद्रजाली लौकिकी गारोडी । फिरवून भारली हाडाची कांडी । पदार्थ काढी माने तो ॥६७॥</p>
<p>
	साईनाथ अलौकिक गारोडी । काय तयांच्या खेळाची प्रौढी । इच्छा होतां न भरतां चिपडी । फुटाणे काढील अगणित ॥६८॥</p>
<p>
	परी या कथेचें सार काय । तेथेंच आपण घालूं ठाय । पांचा पोटीं कोणताही विषय । बाबांशिवाय सेवूं नये ॥६९॥</p>
<p>
	मनास देतां ही शिकवण । वेळोवेळीं होईल आठवण । देतां घेतां साईचरण । अनुसंधान राहील ॥७०॥</p>
<p>
	हे सुद्धब्रम्हा सगुणमूर्ति । नयनासमोर राहील निश्चितीं । उपजेल भक्ति ० मुक्ति - विरक्ति । परमप्राप्ती लाधेल ॥७१॥</p>
<p>
	नयनीं देखताम सुंदर ध्यान । हरेल संसार भूक - तहान । हरपेल ऐहिक सुखाचें भान । मन समाधान पावेल ॥७२॥</p>
<p>
	ओंवी नाठवे आठवूं जातां । परी ती आठवे जात्यावर बसतां । तैसी ही चणकलीला कथितां । सुदामकथा आठवली ॥७३॥</p>
<p>
	एकदां राम कृष्ण सुदामा । सेवीत असतां गुर्वाश्रमा । लांकडें आणावयाचे कामा । कृष्णा - बलरामां पाठविलें ॥७४॥</p>
<p>
	गुरुपत्नीचिया नियोगें । कृष्ण - बलराम अरण्यमार्गें । निघाले मात्र तों तयांच्या मागें । सुदामा संगें पाठविला ॥७५॥</p>
<p>
	तयापाशीं दिधले चणे । क्षुधा लागतां फिरतां अरण्यें । तिघांहीं हे भक्षण करणें । गुरुपत्नीनें आज्ञापिलें ॥७६॥</p>
<p>
	पुढें रानांत कृष्ण भेटतां । ‘दादा तहान लागली’ म्हणतां । फुटाण्यांची वार्ता न करितां । परिसा वदता झाला तें ॥७७॥</p>
<p>
	अनशेपोटीं पाणी न प्यावें । म्हणे सुदामा क्षणैक विसावें । परी न वदे हे चणे खावे । कृष्ण विसावे मांडीवर ॥७८॥</p>
<p>
	पाहून लागला कृष्णाचा डोळा । सुदामा चणे खाऊं लागला । दादा कायहो खातां हा कसला । आवाज वदला कृष्ण तदा ॥७९॥</p>
<p>
	काय रे खाया आहे तेथें । थंडीनें द्विजपंक्ती थुडथुडते । विष्णुसहस्रनामही मुखातें । स्पष्टोच्चारि तां येईना ॥८०॥</p>
<p>
	ऐकून हें सुदाम्याचें उत्तर । सर्वसाक्षी खातोंस ऐसें वदतां । खाऊं काय माती तो म्हणतां । वाणी तथास्तुता प्रकटली ॥८२॥</p>
<p>
	अरे हें स्वप्नचि बरें दादा । आपण मजवीण खाल का कदा । खातां काय हा प्रश्नही तदा । स्वप्नाच्या नादांत पुसियेला ॥८३॥</p>
<p>
	पूर्वाश्रमीं सुदामजीला । असती ठावी कृष्णलीला । तरी हा नसता प्रमाद घडला । नसता भोगिला परिणाम ॥८४॥</p>
<p>
	तो तरी काय साधारण । अठरा विश्वें दारिद्य घन  । तरी एकेकटे खाती जे जन । त्यांनीं हें स्मरण ठेवावें ॥८५॥</p>
<p>
	कृष्ण परमात्मा जयाचा सखा । ऐसा हा भक्त सुदाम्यासारिखा । नीतीस यत्किंचित होतां पारखा । पावला धोका संसारीं ॥८६॥</p>
<p>
	तोच स्वस्त्रीकष्टार्जित । प्रेमें मूठभर पोहे अर्पित । कृष्ण होऊनि प्रसन्नचित्त । ऐश्वर्यतृप्त करी तया ॥८७॥</p>
<p>
	असो आतां आणिक एक । वार्ता कथितों बोधप्रदायक । आधीं आनंद - विनोदसुख । बोधप्रमुख जी अंतीं ॥८८॥</p>
<p>
	कोणास आवडे परमार्थबोध । कोणास तर्कयुक्तिवाद । कोणास आवडे थट्टा विनोद । आनंदीआनंद सकळांतें ॥८९॥</p>
<p>
	हीही होती एक थट्टा । बाई बुवा पेटले हट्टा । साईदरबारीं माजला तंटा । तुटला न बट्टा लागतां ॥९०॥</p>
<p>
	हीही कथा परम सुरस । श्रोतयां आनंददायी बहुवस । भक्त भांडतां अरस परस । हास्यरस पिकेल ॥९१॥</p>
<p>
	भक्त दामोदर घनश्याम । बाबरे जयांचें उपनाम । अण्णा चिंचणीकर टोपण नाम । प्रेम नि:सीम बाबांचें ॥९२॥</p>
<p>
	स्वभाव मोठा खरमरीत । कोणाचीही न धरीत मुर्वत । उघड बोलणें विहिताविहित । हिताहित पाहती ना ॥९३॥</p>
<p>
	वृत्ति अण्णांची जितकी कडक । तितकीच सालस आणि सात्त्विक । माथें जैसी भरलेली बंदूक । लावितां रंजूक भडका घे ॥९४॥</p>
<p>
	सळक कामीं तडकाफडकी । उधारीची वार्ता न ठाउकी । न धरी कुणाची भीडभाड कीं । रोखठोकी व्यवहार ॥९५॥</p>
<p>
	वेळीं धरवेल विस्तव हातीं । अण्णा तयाहूनि प्रखर अति । परी ही निष्कपट स्वभावजाती । तेणेंच प्रीती बाबांची ॥९६॥</p>
<p>
	असेच एकदां दोनप्रहरीं । मशिदींत भर दरबारीं । वामहस्त कठडयावरी । बैसली स्वारी बाबांची ॥९७॥</p>
<p>
	बाबा बालब्रम्हाचारी । ऊर्ध्वरेते शुद्धाचारी । करूं देत सेवा चाकरी । नरनारी समस्तां ॥१००॥</p>
<p>
	अण्णा बाहेर ओणवे राहती । हळू हळू वामहस्त दाबिती । तों उजवे बाजूची परिस्थिति । स्वस्थ चित्तीं ऐकावी ॥१०१॥</p>
<p>
	तिकडे होती एक बाई । अनन्यभक्त बाबांचे पायीं । बाबा जीस म्हणत आई । मावशीबाई जनलोक ॥१०२॥</p>
<p>
	मावशीबाई म्हणत सर्व । वेणूबाई मूळ नांव । कौजलगी हें आडनांव । अनुपम भाव साईपदीं ॥१०३॥</p>
<p>
	अण्णांची उलटली पन्नाशी । तोंडांत नव्हती बत्तिशी । पोक्त वयस्करही ती मावशी । तंटा उभयांशीं उद्भवला ॥१०४॥</p>
<p>
	अण्णा सह्कुटुंब करीत सेवा । आई होती विगतघवा । दाबितां बाबांचें पोट कुसवा । नावरे नि:श्वास तियेस ॥१०५॥</p>
<p>
	श्रीसाईसेवेसी सबळ । मावशीबाई  मनाची निर्मळ । उभय हस्तीं घालूनि पीळ । मांडिली मळणी पोटाची ॥१०६॥</p>
<p>
	पाठीमागून निरणावेरी । धरूनि बाबांस दोहीं करीं । दाबदाबूनि घुसळण करी । जैसी डेरी ताकाची ॥१०७॥</p>
<p>
	साईनामीं लावूनि लय । मावशीबाई दाबी निर्भय । बाबाही न करीत हायहूय । वाटे निरामय जणूं तयां ॥१०८॥</p>
<p>
	दाबण्याची विलक्षण परी । पोटपाठ सपाट करी । प्रेमचि तें परी ते अवसरीं । दया अंतरीं उपजवी ॥१०९॥</p>
<p>
	साईंचें हें निष्कपट प्रेम । देऊनि घेती सेवा अनुत्तम । कीं तें निजस्मरण अविश्रम । घडो हो क्षेम भक्तांस ॥११०॥</p>
<p>
	आपुली तपश्चर्या ती किती  । जेणें लाधावी ही संतसंगती । परी साईच दीनवत्सल निश्चितीं । उपेक्षिती ना भक्तांतें ॥१११॥</p>
<p>
	कार्य त्या हेलकाव्यांची कुसरी । बाबा हालत खालींवरी । तीही हाले तैशिया परी । नवलपरी ही सेवेची ॥११२॥</p>
<p>
	अण्णा ओणवे परी स्थिर । बाई आपुल्या सेवेंत चूर । तेणें होई मुख खालवर । मग काय प्रकार वर्तला ॥११३॥</p>
<p>
	साईसेवेचिया सुखा । पिळितां पोट खातां झोका । संनिध अण्णांचिया मुखा । आलें अवलोका मुख तिचें ॥११४॥</p>
<p>
	पाहूनियां ऐसी संधी । मावशीबाई मोठी विनोदी । म्हणे कायहो अण्णा नादी । मुका आधीं मागे मज ॥११५॥</p>
<p>
	पिकल्या केसांची लाज नाहीं । घेतोस माझा मुका पाहीं । ऐसें वदतां मावशीबाई । अण्णा बाही सरसावी ॥११६॥</p>
<p>
	म्हणे मी इतुका थेरडा । मी काय मूर्ख अगदींच वेडा । तूंच तोंड लावुनी तोंडा । सजलीस भांडाया मजपासीं ॥११७॥</p>
<p>
	पाहूनियां मातली कळ । बाबांस तया देघांची कळकळ । कराया दोघांसी शीतळ । युक्ति प्रबळ योजिती ॥११८॥</p>
<p>
	प्रेमें म्हणती “अरे अण्णा । उगाच रे कां मांडिला दणाणा । अनुचित काय तेंच समजेना । मुका घेतांना आईचा” ॥११९॥</p>
<p>
	परिसोनि मनीं दोन्ही विरमलीं । विनोदवाणी ठायींच जिरली । सप्रेम हास्या उकळी फुटली । थट्टा ती रुचली अवघियां ॥१२०॥</p>
<p>
	पाहं जातां कथा थोडी । मार्मिक श्रोते घेतील गोडी । ठाय कैसा घालावा हे परवडी । कथेंत रोकडी दिसेल ॥१२१॥</p>
<p>
	मायलेंकांत जैसी प्रीति । प्रेमबुद्धि उभयतांत असती । तेथें ही कळ उद्भवली नसती । क्रोधवृत्ति उठतीच ना ॥१२२॥</p>
<p>
	चाबुकें हाणितां हांसें उसळे । फुलाच्या मारें रडें कोसळे । वृत्तीचे तरंग भावनाबळें । कोणास न कळे अनुभव हा ॥१२३॥</p>
<p>
	नवल बाबांची सहज युक्ति । बोल बोलती समयोचिती । जेणें श्रोते अंतरीं निवती । बोधही घेती तात्काळ ॥१२४॥</p>
<p>
	ऐसेंच एकदां पोट रगडतां । उपजली बाबांच्या परमभक्ता । कळकळ दया आणि चिन्ता । तिची अतिरेकता पाहुनी ॥१२५॥</p>
<p>
	म्हणती बाई दया करा । ही का अंग दाबण्याची तर्‍हा । अंतरीं थोडी कींव धरा । तुटतील शिरा बाबांच्या ॥१२६॥</p>
<p>
	कानीं पडतां इतुकीं अक्षरें । बाबा स्थानावरूनि सत्वरें । घेऊनि आपुला सटका निजकरें । भूमि प्रहारें ताडिली ॥१२७॥</p>
<p>
	चढली वृत्ति दुर्धर क्षोभा । समोर कोण राहील उभा । नेत्र खदिरांगार - प्रभा । फिरती सभोंवार जैं ॥१२८॥</p>
<p>
	अंधारीं मार्जाराचीं बुबुळें । तेवीं चमकती दिवसा डोळे । वाटे नयनींचिया ज्वाळे । आतांच जाळितील सृष्टी ॥१२९॥</p>
<p>
	सटक्याचें टोंक दों हातीं धरलें । पोटाचिया खळगींत खोचलें । दुजें खांबांत समोर रोविलें । घट्ट कवळिलें खांबाला ॥१३०॥</p>
<p>
	सटका लांब सव्वाहात । शिरला वाटे सबंध पोटांत । आतां स्फोट होऊनि प्राणांत । ओढवेल क्षणांत तैं वाटे ॥१३१॥</p>
<p>
	खांब अढळ तो काय हाले । बाबा जवळी जवळी भिडले । खांबास पोटाशीं घट्टा आवळिलें । पाणी पळविलें देखत्यांचें ॥१३२॥</p>
<p>
	आतां होईल पोटाचा स्फोट । जो तो तोंडांत घाली बोट । बाप हा काय प्रसंग दुर्गट । ओढवलें संकट दुर्धर ॥१३३॥</p>
<p>
	ऐसी लोक करिती चिंता । काय करावें या आकांता । एवढें संकट त्या मावशीकरितां । भक्ताधीनता हें ब्रीद ॥१३४॥</p>
<p>
	कधीं कोणीही सेवा करितां । मध्येंच दर्शवितां अनुचितता । किंवा सेवेकर्‍यास कोणी बोलतां । बाबांचे चित्ता खपेना ॥१३५॥</p>
<p>
	भक्ता प्रेमळा आलें जीवा । मावशीबाईस इशारा द्यावा । साईबाबांस आराम व्हावा । परिणाम यावा कां ऐसा ॥१३६॥</p>
<p>
	असो देवास आली करुणा । शान्तता उद्भवली साईंचे मना । सोडूनियां ते भयप्रद कल्पना । येऊनि आसना बैस॥</p>
<p>
	ती ॥१३७॥</p>
<p>
	भक्त प्रेमळ जरी निधडा । बाबांचा स्वभाव पाहूनि करडा । लाविला तेथूनि कानास खडा । घेतला धडा पुढारा ॥१३८॥</p>
<p>
	तेव्हांपासूनि निश्चय केला । जावें न कोणाच्याही वाटेला येईल जैसें ज्याचे मनाला । तैसें तयाला करूं द्यावें ॥१३९॥</p>
<p>
	समर्थ स्वयें  सामर्थ्यवंत । निग्रहानुग्रहज्ञानवंत । गुणावगुण सेवकजनांत । आपण किमर्थ पाहावे ॥१४०॥</p>
<p>
	एकाची सेवा साईंस सुखकर । दुजयाची ती असती प्रखर । हे तरी निजबुद्धीचे विकार । खरा प्रकार आकळेना ॥१४१॥</p>
<p>
	असो आतां हा थट्टाविनोद । घेणारा घेईल यांतील बोध । साईकथा - रसामोद । भक्त मकरंद सेवोत ॥१४२॥</p>
<p>
	हेमाड साईपदीं लीन । पुढील अध्याय याहूनि गहन । भक्त दामोदराची इच्छा पूर्ण । साई दयाघन करितील ॥१४३॥</p>
<p>
	तोडी मोठा चमत्कार । दामोदर संसारत्रस्त फार । तयास पाचारुनि आपुले समोर । घालविला घोर तयाचा ॥१४४॥</p>
<p>
	सस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । विनोदविलसितं नाम चतुर्विंशतितमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥२४॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 13:30:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 14:44:59 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय २३]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-23-122042600037_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra adhyaay 23" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650959943-6365.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra chapter 23" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	हा जीव वस्तुत: त्रिगुणातीत । परी होऊनि मायाविमोहित । सच्चिदानंदस्वरूप विसरत । देह मानीत आपणा ॥१॥</p>
<p>
	मग त्या देहाचिया अभिमानें । ‘मी कर्ता मी भोक्त’ माने । त्रस्त होई अनर्थपरंपरेनें । मार्ग नेणे सुटकेचा ॥२॥</p>
<p>
	गुरुपदीं सप्रेम भक्तियोग । हाच एक अनर्थोपशममार्ग । महानाटकी साई श्रीरंग । भक्तां रंगवी निजरंगीं ॥३॥</p>
<p>
	आम्ही तयांस मानूं अवतारी । कारण लक्षणें तींच कीं सारीं । परी ‘मी बंदा अल्लाचिया पदरीं’ । स्वयें येपरी वदत ते ॥४॥</p>
<p>
	जरी स्वयें अवतार । दावी पूर्ण लोकाचार । शुद्ध वर्णाश्रम आचार । योग्य प्रचार चालवी ॥५॥</p>
<p>
	कधीं कोणाची बरोबरी । करीन करवी कवण्याही परी । पाही जो विश्वंभर चराचरीं । तयासीं हारीच साजिरी ॥६॥</p>
<p>
	न कोणाची अवगणना । कोणासही तुच्छ लेखीना । भूतमात्रीं नारायणा । चैतन्यघना पाही तो ॥७॥</p>
<p>
	कधीं न म्हणवीत ‘अनल हक्क’ । मी एक परमेश्वराचा पाईक । गरीब मी ‘यादेहक्क’ । ‘अल्लामालीक’ जप नित्य ॥८॥</p>
<p>
	कोणा संताची काय जाती । कैसे वर्तती काय खाती । एणें न आकळे तयांची स्थिति  । ती तों यापरती सर्वदा ॥९॥</p>
<p>
	व्हावया जड जीवोद्धार । परोपकारी संतावतार । होती पहा सृष्टीवर । हीच सर्वेश्वरकृपा ॥१०॥</p>
<p>
	असेल जरी पुण्य गांठीं  । तरीच उदेजेल आवड पोटीं । ऐकावया संतांच्या गोष्टी । सुखसंतुष्टी पावावया ॥११॥</p>
<p>
	एकदां एक योगाभ्यासी । सवें घेऊनि चांदोरकरांसी । ठाकले येऊन मशिदीसी । दर्शनासी बाबांच्या ॥१२॥</p>
<p>
	पातंजलादि योगशास्त्र  । होतें अभ्यासिलें साग्र । अनुभव पाहूं जातां विचित्र  । साधे न क्षणमात्र समाधी ॥१३॥</p>
<p>
	महाराज साई योगीश्वर । होईल जरी कृपा मजवर । शंका माझ्या होतील दूर । समाधी निर्धार होईल ॥१४॥</p>
<p>
	ऐसा धरूनि पोटीं हेत । साईंचें जों दर्शन घेत । तों ते बैसले होते खात । पलांडूसमवेत भाकर ॥१५॥</p>
<p>
	धरिली पाहोनि सन्मुख मुखा । शिळी भाकर कांदा सुका । हे काय वारिती माझ्या शंका । प्रबळ आशंका उद्भवली ॥१६॥</p>
<p>
	विकल्प उठला त्यांचे मनीं । साईमहाराज अंतर्ज्ञानी । म्हणती “नाना, कांदा ज्यां पचनीं । पडे तयांनींच खावा तो ॥१७॥</p>
<p>
	पचविण्याचा जोम व्हावा । तयानें कांदा खुशाल खावा” । ऐकून चरकला योगी जीवा । शरण सद्भावा तो गेला ॥१८॥</p>
<p>
	असो पुढें ते योगाभ्यासी । बाबा येऊन बैसतां गादीसी । निर्विकल्प अंत:करणासीं । बाबांपासीं बैसले ॥१९॥</p>
<p>
	पुसते झाले सावधान । पावोनि शंक - समाधान । लाहोनि उदी आशीर्वचन । प्रसन्नमन परतले ॥२०॥</p>
<p>
	ऐशाच आणिक बहुत कथा । भक्तिभावार्थे श्रवण करितां । दु:खमोहादि अनर्थोपशमता । भक्त सत्वरता पावती ॥२१॥</p>
<p>
	असेना अल्प जलाशय । दुगधियुक्तही अतिशय । तेंच कीं सौख्य निरतिशय । मानी नि:संशय सूकर ॥२२॥</p>
<p>
	जीवाशुकाची एकचि परी । एक देहीं दुजा पंजरीं । मुकला शुक स्वातंत्र्या तरी । मानी ती बरी परंत्रता ॥२३॥</p>
<p>
	कूपमंडूकसम हा शुक । पंजरीं त्याचें सर्व सुख । जाणे न स्वातंत्र्याचें कौतुक । जीवही कामुक तैसाच ॥२४॥</p>
<p>
	काय मौजेचा माझा पिंजरा । सुवर्णदांडीच्या येरझारा ॥ उलट टांगलों तरी मी बरा । पाय न जराही सुटावा ॥२५॥</p>
<p>
	बाहेर मग या सुखा आंचवणें । नाहीं मग डाळिंबाचे दाणे । नाहीं या गोड मिरचीचें खाणें । स्वसुखा नागवणें स्वयेंच ॥२६॥</p>
<p>
	परी येतां शुकाची घटी । भेटे तयास अघटित घटी । मारी तयास प्रेमें थापटी । घाली द्दष्टींत अंजन ॥२७॥</p>
<p>
	त्या थापटीच्या शक्तिपातें । निसटला उघडिलीं नेत्रपातें । विहरूं लागला पक्षवातें । कोण मग त्यातें आवरी ॥२८॥</p>
<p>
	जग अफाट तया उघडलें । यथेच्छ डाळिंबी पेरूचे मळे । गगन स्वच्छंद विहारा मोकळें । स्वातंत्र्यसोहळे मग भोगी ॥२९॥</p>
<p>
	तैसीच या जीवाची स्थिति । ईश्वरानुग्रह गुरुप्राप्ति । उभयलाभें बंधनमुक्ति । स्वातंत्र्यमुक्ती अनुभवी ॥३०॥</p>
<p>
	आतां होऊनि अवधानशीळ । भाविक श्रोतां तुम्ही सकळ । शुद्ध प्रेमाची कथा रसाळ । परिसाल काय क्षणभर ॥३१॥</p>
<p>
	गताध्यायीं चमत्कार । देऊनि शामा बरोबर । चिथळीचिया दौर्‍यावर । बाबा मिरीकर पाठवीत ॥३२॥</p>
<p>
	साई जाणोनि अनागतज्ञान । लांबबावापासून विन्घ । केलें मिरीकरां सावधान । संकटसूचन वेळींच ॥३३॥</p>
<p>
	नाहीं केवळ सूचन केलें । निवारणार्थ उपायही योजिले । नको म्हणतां गळीं बांधले । संकटीं रक्षिलें मिरीकरां ॥३४॥</p>
<p>
	बाबा भक्तकल्याणतत्पर । बाळासाहेब मिरीकर । टाळूनि त्यांचें गंडांतर । अनुभव विचित्र दाविला ॥३५॥</p>
<p>
	त्याहूनि पहा शामाची स्थिति । सर्पदंश होऊनि अवचिती । जीव जगण्याची आशाही नव्हती । केली निर्मुक्ति बाबांनीं ॥३६॥</p>
<p>
	तीही एक बाबांची लीला । कथूं आधीं श्रोतयांला । विखार जरी होता डंखला । उपाय केला काय पहा ॥३७॥</p>
<p>
	साताचिया सुमाराला । हाताचिया करांगळीला । एकाएकीं साप डसला । भाग झाला विषदग्ध ॥३८॥</p>
<p>
	वेदना असह्य अत्यंत । होऊं पाहे प्राणान्त । माधवराव झाले भयभीत । चिंतायुक्त अंतरीं ॥३९॥</p>
<p>
	अंग त्यांचें लाल झालें । आप्त स्नेही सर्व मिळाले । बिरोबाकडे चला म्हणाले । संकटीं पडलें जीवित ॥४०॥</p>
<p>
	निमोणकरही पुढें आले । उदी घेऊन जावें म्हणाले । माधवराव मशिदीं धांवले । काय केलें बाबांनीं ॥४१॥</p>
<p>
	होतां बाबांची नजरनजर । पहा बाबांचा चमक्तार । शिव्या देऊं लागले अनिवार । नेदीत वर येऊं त्या ॥४२॥</p>
<p>
	“चढूं नको भटुरडया वर । चढशील तर खबरदार । चल नीघ जा खालीं उतर” केली दीर्घस्वर गर्जना ॥४३॥</p>
<p>
	अत्यद्भुत बाबा कोपले । आग अकल्पित पाखडिते झाले । माधावराव चकित झाले । किमर्थ ताडिलें कटु वचें ॥४४॥</p>
<p>
	पाहूनि हा ऐसा प्रकार । माधवराव घाबरले फार । कांहीं एक सुचेना विचार । बैसले हिरमुसले खालींच ॥४५॥</p>
<p>
	देवही जेव्हां रागास आले । माधवराव अंतरीं भ्याले । वाटले उपायचि सर्व हरले । जेव्हां अव्हेरिलें बाबांनीं ॥४६॥</p>
<p>
	कोण नाहीं घाबरणार । पाहून वृत्ति खवळली दुर्धर । ऐकून शिव्यागाळ्यांचा भडिमार । प्रसंग भयंकर वाटला ॥४७॥</p>
<p>
	मशीद माझें माहेरघर । मी साईंचें पोटचें पोर । ऐसें असतां आईच पोरावर । कोपली अनिवार कां आज ॥४८॥</p>
<p>
	सर्प डंखला हें गार्‍हाणें । मातेवाचून कोठें नेणें । परी तीच जैं लाथे हाणे । केविलवाणें मुख केलें ॥४९॥</p>
<p>
	बालक जैसें मातेपाशीं । माधवराव तैसे बाबांशीं । असतां नातें हें अहर्निशीं । आजचि कैसी हे स्थिति ॥५०॥</p>
<p>
	माताच जेव्हां लाथे हाणी । तेव्हां लेंकुरा राखावें कोणीं । जीविताशेवर सोडिलें पाणी । माधवरावांनीं ते समयीं ॥५१॥</p>
<p>
	कांहीं काळ गेल्यानंतर । बाबा होतां स्थिरस्थावर । माधवरवांनीं केला धीर । जाऊनि वर बैसले ॥५२॥</p>
<p>
	बाबा म्हणाले “न सोडीं धीर । कांहींही मनीं न करीं  जिकीर । बरें होईल सोडीं फिकीर । दयाळू फकीर सांभाळील ॥५३॥</p>
<p>
	घरीं जाऊन स्वस्थ बैस । घराबाहेर जाऊं नकोस । राहीं निर्भय निश्चिंत मानस । ठेवीं विश्वास मजवरी” ॥५४॥</p>
<p>
	मग ते माघारा घरास । पोहोंचण्याचाच अवकाश । बाबा पाठविते झाले तात्यांस । समाचारास निरोपासह ॥५५॥</p>
<p>
	“निजूं नका त्याला म्हणावें । घरचे घरीं फिरत रहावें । वाटेल तें खुशाल खावें । सांभाळावें हें इतुकें” ॥५६॥</p>
<p>
	काकासाहेब दीक्षितांस । बाबाही वदले ते निशीस । लहर येईल त्यास रात्रीस । निजावयास देऊं नका ॥५७॥</p>
<p>
	असो ऐसी सावधगिरी । ठेवितां बाधा पळाली दुरी । जळजळ थोडी राहिली खरी । अंगुलीभीतरीं विषाची ॥५८॥</p>
<p>
	पुढें तीही बरी झाली । कैसी भयंकर वेळ टळली । ऐसी कनवाळू साईमाउली । कृपा हेलावली भक्तार्थ ॥५९॥</p>
<p>
	“चढूं नको भटुरडया वर” । ऐसे बाबांचे शब्दप्रहार । ते काय माधवरावांवर । होते प्रेरिले बाबांनीं ॥६०॥</p>
<p>
	माधवरावांस अनुलक्षून । नव्हतें कीं तें शब्दसंधान । दंशकारक विखारालागून । अनुज्ञापन तें तीव्र ॥६१॥</p>
<p>
	“चढशील तर खबरदार” । साईमुखींची आज्ञा प्रखर । जागींच विषसंचार स्थिर । रोधिला प्रचार पुढील ॥६२॥</p>
<p>
	इतुकेंचा झालें नाहीं तर । “चल नीघ जा खालीं उतर” हाच साई पंचाक्षरी मंत्र । उतरवी विखार तात्काळ ॥६३॥</p>
<p>
	न लागती कांहीं साधनें दुसरीं । लौकिक मंत्री वा पंचाक्षरी । ऐसा साई भक्तकैवारी । संकटें वारी परोपरी ॥६४॥</p>
<p>
	नाहीं मंत्रावर्तन केलें । नाहीं तांदूळ पाणी भारलें । नाहीं पाण्याचे शिटकाव मारिले । तरीही उतरलें विष कैसें ॥६५॥</p>
<p>
	काय नव्हे हा चमत्कार । केवळ संतमुखोद्नार । माधवरावांस पडला उतार । कृपेस पार नाहीं या ॥६६॥</p>
<p>
	आतां गणाध्यायीं सूचित । कथा सुरस आणि अद्भुत । श्रोतां होऊनि दत्तचित्त । ऐकणें साद्यंत ती आतां ॥६७॥</p>
<p>
	कथा वर्णिली पूर्वाध्यायीं । तियेहून हिची नवलाई । कैसी माव करीत ती साई । श्रोतियां जाईल अनुवादिली ॥६८॥</p>
<p>
	परिसतां हीं कथानकें सुरसें । वठतील गुरुवचनाचे ठसे । कर्माकर्म विकर्म निरसे । श्रद्धा बैसे गुरुपायीं ॥६९॥</p>
<p>
	सोप्यांतला सोपा उपाय । ह्रदयीं स्मरावे साईंचे पाय । हाचि एक तरणोपाय । माया जाय निरसोनि ॥७०॥</p>
<p>
	संसारभय बहु उदंड । मायासमुद्भूत हें बंड । कथाश्रवणें होईल दुखंड । जोडेल अखंड आनंद ॥७१॥</p>
<p>
	एकदां शिरडींत महामारी । येतां ग्रामस्थ भयभीत अंतरीं । दवंडी पिटिली एकविचारीं । रहदारी सारी बंद केली ॥७२॥</p>
<p>
	महामारीचा मोठा दरारा । ग्रामस्थांनीं घेतला भेदरा । परस्थांचा घेती न वारा । व्यवसाय सारा ठेला कीं ॥७३॥</p>
<p>
	मरी जोंबरी चाले गांवांत । कोणी न करावा बकर्‍याचा घात । गाडी न येऊं द्यावी शिवेंत । नेमें समस्त वर्तावें ॥७४॥</p>
<p>
	ग्रामस्थांचा हा देवभोळेपणा । बबांच्या मुळीं नावडे मना । तयांच्या मतें याकुकल्पना । अडाणीपणा लोकांचा ॥७५॥</p>
<p>
	त्यांनीं तिकडे करावें नियमन । बाबांनीं वरी घालावें विरजण । कैसें कैसें तें करावें श्रवण । सादर मन होउनी ॥७६॥</p>
<p>
	ग्रामपंचांचा हा निर्धार । ग्रामस्थ पाळिती साचार । दंड देणें हाच परिहार । नियम लवभार भंगे जों ॥७७॥</p>
<p>
	बाबांस नाहीं दंडाचें भय । ते सदा सर्वदा निर्भय । लावोनियां  हरिचरणीं लय । सदैव दुर्जय कळिकाळा ॥७८॥</p>
<p>
	एकदां एक परगांवचें गाडें । भरलीं जयांत जळाऊ लाकडें । वेशींत येतां पडे सांकडें । जनातें वांकडें लागलें ॥७९॥</p>
<p>
	लाकडांची तेथें दुर्मिळता । जाणीव ही ग्रामस्थांचे चित्ता । परी नियमोल्लंघन  अनुचितता । तेणें दुश्चित्तता सकळिकां ॥८०॥</p>
<p>
	गाडीवाल्यावरी ते फिरले । गाडी तयाची परतवूं लागले । हें वर्तमान बाबांस कळलें । येऊनि थडकळे ते स्थाना ॥८१॥</p>
<p>
	स्वयें राहिले गाडीपुढें । गाडीवाल्यासी धीर चढे । ग्रामस्थांचा दुराग्रह मोडे । घातलें गाडें वेशींत ॥८२॥</p>
<p>
	तेथूनि तें मंडपद्वारीं । आणवूनि रिचविलें मंडपाभीतरीं । चकारशब्द मुखाबाहेरी ।  कोणीच्या परी निघेना ॥८३॥</p>
<p>
	ग्रीष्म शरद्‌ वा हेमंत । ऋतु असो वर्षा वा वसंत  । अष्टौप्रहर मशिदींत । धुनी तेवत बाबांची ॥८४॥</p>
<p>
	काय बाबांचा निर्धार विचित्र । अग्निहोत्र्याचें अग्निहोत्र । तैशी प्रज्वलित अहोरात्र । धुनी ती पवित्र बाबांची ॥८५॥</p>
<p>
	केवळ या धुनीप्रीत्यर्थ । मोळ्या फाटयाच्या विकत घेत । बाबा समोर मंडपांत । ढीग रिचवीत भिंतीशीं ॥८६॥</p>
<p>
	साधून बाजारचि वेळा । बाबांनीं करावीं लांकडें गोळा । तयावरीही शेजारियांचा डोळा । स्वार्थासी भोळा दुर्लभ ॥८७॥</p>
<p>
	बाबा नाहीं चुलीस फाटें । फाटयाविना चूल न पेटे । ऐसें कथिती जें खोटेंनाटें । फाटयांत वांटे तयांचेही ॥८८॥</p>
<p>
	स्वार्थी जन जात्याच द्वाड । सभामंडपा नाहीं कवाड । तेणें तयांसी फावे सवड । गरजू लबाड सारिखे ॥८९॥</p>
<p>
	बाबा अत्यंत परोपकारी । काय वर्णावी तयांची थोरी । दिसाया उग्र बाह्यात्कारीं । परी अंतरीं अति सौम्य ॥९०॥</p>
<p>
	अगाध तयांचें महिमान । वाणी होऊनि निरभिमान । करील तच्चरणाभिवंदन । तरीच अवगाहन करील ॥९१॥</p>
<p>
	व्यापूनियां स्थिर चर । उरीं उरला विश्वंभर । विचारूनि हें निरंतर । करीना वैर कुणासीं ॥९२॥</p>
<p>
	तोच भरलासे सर्व सृष्टीं । दाही दिशां पाठीं पोटीं । कोणाबरीही वक्र द्दष्टी । करितां तो कष्टी होतसे ॥९३॥</p>
<p>
	अंगीं जरी वैराग्य पूर्ण । स्वयें लोकसंग्रहार्थ आपण । करी प्रापंचिकाचें आचरण । द्यावया शिकवण आश्रितां ॥९४॥</p>
<p>
	काय या महाम्याची लीनता । ऐकतां वाटेल आश्चर्य चित्ता । दिसून येईल भक्तप्रेमळता । अवतारसार्थकता तयांची ॥९५॥</p>
<p>
	अतुल दिणवत्सलता पोटीं । सानपणाची आवड मोठी । प्रत्यंतरास कोटयनुकोटी । येतील गोष्टी सांगावया ॥९६॥</p>
<p>
	कधीं ना उपास वा तापास । हठयोगाचाही सायास । कधीं न रसासक्तीची आस । अल्पाहारास सेवीतसे ॥९७॥</p>
<p>
	जाऊनियां नियमित घरीं । मागे ओली कोरडी भाकरी । हीच भिक्षा नित्य मधुकरी । कोड न करी जिव्हेचें ॥९८॥</p>
<p>
	पुरवी न रसनेचे लाड । मिष्टान्नाची धरी  होड । प्राप्ताप्राप्त धडगोड । त्यांतचि गोड मानी तो ॥९९॥</p>
<p>
	ऐसेपरी प्राणधारण । करून करी शरीररक्षण । कीं तें ज्ञान मोक्षसाधन । निरभिमान सर्वदा ॥१००॥</p>
<p>
	निजशांति जयाचें भूषण । कासया त्या माळामंडण । नलगे चंदनविभूतिचर्चन । ब्रम्हा पूर्ण श्रीसाई ॥१०१॥</p>
<p>
	बोधदायक अति पावन । भक्तिप्राधान्य हें आख्यान । श्रवण करिती जे सावधान । विरेल भवभान तयांचें ॥१०२॥</p>
<p>
	जंब जंव भावार्थी श्रोता जोडे । तंव तंव साईंचें भांडार उघडे । कुतर्का क्लिष्टा न हें आलोडे । भोक्ते भाबडे सप्रेम ॥१०३॥</p>
<p>
	आतां पुढील कथानुसंधान । श्रोतां परिसिल्या एकाग्रमन । आणील प्रेमाचें स्फुरण । आनंदजीवन नयनांतें ॥१०४॥</p>
<p>
	काय बाबांची चातुर्यरीति । काय तयांची युक्ति प्रयुक्ती । हें वर्म जाणिजे सद्भक्तीं । वक्तोवक्तीं अनुभव ॥१०५॥</p>
<p>
	हें साईचरित्र पीयूषपान । आदरें करा दत्तावधान । गुरुचरणीं लावूनि मन । कथानुसंधान लक्षावें ॥१०६॥</p>
<p>
	ही कथा अपूर्व रससोई । सेवितां श्रोतां न करणें घाई । पदार्थापदार्थाची अपूर्वाई । चाखावी नवलाई यथेष्ट ॥१०७॥</p>
<p>
	आतां पुरे गाडीची कथा । त्याहूनि विलक्षण बोकडाची वार्ता । आश्चर्य वाटेल श्रोतियां चित्ता । गुरुभक्तां आनंद ॥१०८॥</p>
<p>
	एकदां एक वर्तलें कौतुक । कोणींसा आणिला बोकड एक । आसन्नमरण दुर्बल देख । आले लोक पहावया ॥१०९॥</p>
<p>
	जया न कोणी मालक वाली । तया सांभाळी साई माउली । सडलीं पडलीं आणि कावलीं । तीं विसावलीं मशिदींत ॥११०॥</p>
<p>
	मग तेथेंच तयेवेळीं । बडेबाबा होते जवळी । बाबा म्हणती दे त्या बळी । निर्दाळीं एका प्रहारें ॥१११॥</p>
<p>
	बडेबाबांची काय महती । बसाया स्थान उजवे हातीं । बडेबाबांनीं ओढिल्यावरती । चिलीम सेविती मग बाबा ॥११२॥</p>
<p>
	ज्या बडेबाबांवांचून । हालत नसे बाबांचें पान । ज्यानें न करितां ग्रास सेवन । न चाले जेवण बाबांना ॥११३॥</p>
<p>
	एकदां दिपवाळीसारखा सण । ताटें पव्कान्नें वाढिलीं पूर्ण । पंगत होतां निजस्थानापन्न । गेले रुसोन बडेबाबा ॥११४॥</p>
<p>
	बडेबाबा नसतां पंक्तीं । साईबाबा अन्न न सेविती । आणि साईबाबाच जंव ग्रास न घेती । इतर जेविती कैसेनी ॥११५॥</p>
<p>
	तेणें सर्व खोळंबले  । बडेबाबांस शोधून आणिलें । मग जेव्हां पंक्तीस बैसविलें । अन्न सेविलें बाबांनीं ॥११६॥</p>
<p>
	आतां सोडून वर्तमान कथा । बडेबाबांची दिग्दर्शनवार्ता । परिसवावी वाटे श्रोतां । आडकथा ही न गणावी ॥११७॥</p>
<p>
	बडेबाबा बाबांचे अतिथी । सभामंडपीं जेवणवक्तीं । वाट पाहात खालीं बैसती । कान लाविती हांकेला ॥११८॥</p>
<p>
	दोन बाजूंस दोन पंक्ति । मध्यभागीं बाबा विराजती । बडे बाबांची जागा रिती । वामहस्तीं बाबांचे ॥११९॥</p>
<p>
	नैवेद्य सकळ ताटांत पडतां । तीं ताटें पंक्तींत मांडतां । जेवणार निजस्थानीं बैसतां । समय येतां भोजनाचा ॥१२०॥</p>
<p>
	बाबा मग परम आदरें । स्वयें पुकारितां तारस्वरें । ‘बडे मिया’ म्हणतां त्वरें । नमनपुर:सर वर येती ॥१२१॥</p>
<p>
	अन्नावरी जो निष्कारण रुसला । तयाचा तो आदर कसला । जेणें अन्नाचा अपमान केला । तयाचा सन्मान कां इतुका ॥१२२॥</p>
<p>
	तरी हेही लोकसंग्रहरीती । बाबा स्वयें आचरून दाविती । पंक्तीस घेतल्यावांचून अतिथी । अन्न सेविती अयुक्त तें ॥१२३॥</p>
<p>
	ही जी गृह्स्थ - क्रममर्यादा । बाबा न उल्लंघिती कदा । जेणें टळतील भक्तांच्या आपदा । आचरती सदा स्वयेंही ॥१२४॥</p>
<p>
	अतिथिपूजनें इष्टप्राप्ति । तेणें होय अनिष्टनिवृत्ति । तैसें न करितां प्रत्यवाय विश्चिती । म्हणोनि पूजिती शिष्ट तयां ॥१२५॥</p>
<p>
	अतिथि रहातां अशनविहीन । पशु - पुत्र - धन - धान्य - विनाशन । अतिथीस पड्तां उपोषण। आमंत्रण तें अनर्था ॥१२६॥</p>
<p>
	तयांस प्रत्यहीं साईसमर्थ । रुपये पन्नास दक्षिणा देत । तयांस बोळवीत पाउलें एकशत । बाबा जात स्वयें कीं ॥१२७॥</p>
<p>
	त्या बडेबाबांवर जेव्हां आली । त्या बोकडाची प्रथम पाळी । ‘कैसा बे काटना इसकू खाली’ । सबब निघाली मुखावाटे ॥१२८॥</p>
<p>
	माधवराव होते तेथें । बाबा आज्ञापिती तयांतें । शामा तूं तरी आण जा सुरीतें । कापूं बोकडातें जा आतां ॥१२९॥</p>
<p>
	माधवराव भक्त निधडे । राधाकृष्णाबाईकडे । जाऊनि आणिला सुरा तिकडे । ठेविती पुढें बाबांचे ॥१३०॥</p>
<p>
	जरी तो सुरा आणावयास । माधवरावांस पडले सायास । सुरीवजा पाहूनि तयास । येईना मनास बाबांच्या ॥१३१॥</p>
<p>
	इतुक्यांत ये वार्तेची कुणकूण । राधाकृष्णोच्या कानीं पडून । सुरा माघारा घेतला मागवून । दया उपजून अंतरीं ॥१३२॥</p>
<p>
	मग माधवराव झाले जाते । आणीक सुरा आणावयातें । ते तिकडेच वाडयांत जाहले बैसते । कीं न घडो हस्तें ती हत्या ॥१३३॥</p>
<p>
	मग काकांचें पहावया मानस । बाबा तंव आज्ञापिती तयांस । जा तूं सुरा आण कापावयास । निर्मुक्तसायास करीं त्या ॥१३४॥</p>
<p>
	कामा बावनकसी सुवर्ण । बाबांस जरी ठावें पूर्ण । तथापि तें ताविल्यावांचून । निवती न नयन जनांचे ॥१३५॥</p>
<p>
	तें चोख आहे कीं हिणकस । परीक्षा न करितां जन चौकस । घेती न लावितां सुलाख वा कानस । धरिती न विश्वास बोलाचा ॥१३६॥</p>
<p>
	लाधाया हिर्‍यास निजवैभव । सोसूं लागती घणाचे घाव । फुकाची न देवकळा गौरव । टाकीचे घाव न साहतां ॥१३७॥</p>
<p>
	काका जरी गळ्यांतील ताईत । इतरांस कैसी यावी प्रचीत । हिराही बांधोनि सूत । पारखी अग्नींत टाकिती ॥१३८॥</p>
<p>
	संतवचनीं धरितां विकल्प । अयशस्वी तयाचे संकल्प । नि:सत्त्व निष्फळ वाग्जल्प । परमार्थ अल्पही साधेना ॥१३९॥</p>
<p>
	वंद्य मानी जो गुरुवचनार्थ । सफल तयाचा स्वार्थ परमार्थ । देखे जो दोष कुटिलता तेथ । अध:पात पावे तो ॥१४०॥</p>
<p>
	गुरुसेवेसी जो तत्पर ॥ गुर्वाज्ञेचाच ज्या आदर । इष्टानिष्टतेचा सर्व विचार । गुरुशिरावर तो ठेवी ॥१४१॥</p>
<p>
	गुर्वाज्ञेचा तो किंकर । स्वतंत्र नाहीं तया विचर । नित्य गुरुवचनपालनपर । सारासार देखेना ॥१४२॥</p>
<p>
	चित्त साईनामस्मरणीं । द्दष्टि साईसमर्थचरणीं । वृत्ति साईध्यानधारणीं । देह कारणीं साईंच्या ॥१४३॥</p>
<p>
	आज्ञापन आज्ञापालन । उभयांत जातां एक क्षण । तोही विलंब न होई सहन । हें विलक्षण विंदान ॥१४४॥</p>
<p>
	दीक्षित विशुद्धसत्त्वधीरु । निश्चयाचे महामेरू । बोकड जीवें केवीं मारूं । विचारू ज्यां शिवेना ॥१४५॥</p>
<p>
	निरपराध बोकड मरेल । आत्मा तयाचा तळतळेल । स्वच्छ निजयशही मळेल । आतळेल पाप महा ॥१४६॥</p>
<p>
	हा विचार नाहींच तेथें । आज्ञाभंग - पाप जेथें । आज्ञापरिपालन अवलंबितें । तयापरतें पुण्य ना ॥१४७॥</p>
<p>
	गुर्वाज्ञा जया प्रमाण । तया विलक्षण  चढे स्फुरण । सहज कोमल अंत:करण । घेऊं प्राण उद्युक्त ॥१४८॥</p>
<p>
	मग ते साठयांचे वाडयांत गेले । आज्ञेप्रमाणें शस्त्र आणिलें । बोकड मारावया सिद्ध झाले । नाहीं कचरले तिळमात्र ॥१४९॥</p>
<p>
	गुर्वाज्ञेचें परिपालन । तेंच वीरश्रीचें स्फुरण । केलें शस्त्राचें आलंबन । अंत:करण द्दढ केलें ॥१५०॥</p>
<p>
	जन्म निर्मळ ब्राम्हाणवंशा । जन्मादारभ्य व्रत अहिंसा । तयावरी हा प्रसंग ऐसा । हात कैसा वाहील ॥१५१॥</p>
<p>
	गुर्वाज्ञापालनीं निधडा । केला मनाचा एकदां धडा । परी छाती उडे धडधडा । घाम भडभडा सूटला ॥१५२॥</p>
<p>
	कायावाचामनें । शब्दप्रहारही जो नेणे । तेणें शस्त्रप्रहार करणें । दुर्घट घटणें तें हेंच ॥१५३॥</p>
<p>
	गुरुवचना अवमानिती । नाहीं तयांस दुसरी गती । पूर्वपुण्यकर्मा उपहती । जाहली निश्चिती तयांच्या ॥१५४॥</p>
<p>
	गुर्वनुज्ञा - परिपाळण । हेंचि भूषणांमाजी भूषण । हीच सच्छिष्याची खूण । आज्ञोल्लंघन महत्पाप ॥१५५॥</p>
<p>
	गुर्वाज्ञेचें एक क्षण । जाऊं न देतां करावें पालन । विचारी चांचरी तो करंटा जाण । विषाणहीन नरपशु ॥१५६॥</p>
<p>
	तेथें न पाहणें मुहूर्त । शुभाशुभ वा तृर्तातूर्त । तात्काळ आज्ञा मानी तो धूर्त । दीर्घसूत्री दुर्भागी ॥१५७॥</p>
<p>
	मग कास घालुनी एके हातीं । दुजिजानें शस्त्र सांवरिती । अस्तन्या सारीत येती । अजा होती ते स्थानीं ॥१५८॥</p>
<p>
	आश्चर्य करिती ग्रामस्थ लोक । हें काय कृत्य अलौकिक । काकांचे मनाची ती कोंवळीक । मावळली कीं कैसेनी ॥१५९॥</p>
<p>
	मुसलमान मांसाहारी । तया चडफडत्या अजावरी । फकीरबाबा शस्त्र न धरी । तेथें तयारी काकांची ॥१६०॥</p>
<p>
	वज्राहूनही कोठर । कुसुमाहूनिही कोमलतर । म्हणती असती जे लोकोत्तर । तयांचें अंतर तें खरें ॥१६१॥</p>
<p>
	मग घट्ट धरोनि सुरा हातें । उंच करोनियां निजकरातें । म्हणती मारूंच का बाबा यातें । एकदां मातें वदा कीं ॥१६२॥</p>
<p>
	आर्तत्राणार्थ शस्त्रधारण । तेणेंच निरपराध अजहनन । परी गुरुसेवेसी विकिला प्राण । म्हणोन अनमान जीवाला ॥१६३॥</p>
<p>
	मारूं जातां घाई घाई । कृपा उपजली तयां ह्रदयीं । सुरा चांचरे मागें जाई । हस्त न होई पुढारा ॥१६४॥</p>
<p>
	‘हूं मार आतां काय बघसी’ । परिसूनि अखेरची आज्ञा ऐसी । प्रहार करावया आवेशीं । अर्धवर्तुळेंसीं ते वळले ॥१६५॥</p>
<p>
	सुर्‍यासहित कर उचलिला । बोकडाचा काळ आला । परी देवचि तयाचा राखणवाला । तात्काळ पावला तयाला ॥१६६॥</p>
<p>
	आतां हा खास करील घाय  । ऐसें पाहोनि साई माय । अंत पाहूं जातां अपाय । म्हणे “रे जाय राहूं दे ॥१६७॥</p>
<p>
	हां हां काका होय परता । काय रे तुझी हे निष्ठुरता । ब्राम्हाण होऊनि हिंसा करितां । विचार चित्ता नाहीं का” ॥१६८॥</p>
<p>
	ऐसें परिसतां टाकिला सुरा । आश्चर्य वाटलें लहानथोरां । जीवदान लाधला बकरा । गुरुभक्ति शिखरा चढविली ॥१६९॥</p>
<p>
	मग काका सुरा टाकोन । काय वदती द्या अवधान । “बाबा आपुलें अमृतवचन । धर्मशासन तें आम्हां ॥१७०॥</p>
<p>
	आम्ही नेणूं दुजा धर्म । आम्हां नाहीं लाज शरम । गुरुवचनपालन हेंच वर्म । हाचि अगम आम्हांतें ॥१७१॥</p>
<p>
	गुर्वाज्ञापरिपालन । हेंचि शिष्याचें सिष्यपण । हेंचि आम्हां निजभूषण । अवज्ञा दूषण सर्वार्थीं ॥१७२॥</p>
<p>
	होऊं सुखी अथवा कष्टी । परिणामावर नाहीं द्दष्टी । घडेल असेल जैसें अद्दष्टीं । परमेष्ठीला काळजी ॥१७३॥</p>
<p>
	आम्हां तों एकचि ठावें । आपुलें नाम नित्य आठवावें । स्वरूप नयनीं सांठवावें । आज्ञांकित व्हावें अहर्निशीं ॥१७४॥</p>
<p>
	हिंसा अहिंसा आम्ही नेणूं । आम्हांसी तारक सद्नुरुचरणू । आज्ञा किमर्थ हें मनीं नाणूं । प्रतिपालनु कर्तव्य ॥१७५॥</p>
<p>
	गुर्वाज्ञा जेथ स्पष्ट । युक्तायुक्त वा इष्टानिष्ट । हें विचारी तो शिष्य नष्ट । सेवाभ्रष्ट मी समजें ॥१७६॥</p>
<p>
	गुर्वाज्ञेचें उल्लंघन । तेंच जीवाचें अध:पतन । गुर्वाज्ञा - परिपालन । मुख्य धर्माचरण हें ॥१७७॥</p>
<p>
	चित्त गुरुपदीं सावधान । राहोत कीं जावोत प्राण । आम्हां गुरूचीच आज्ञा प्रमाण । परिणाम निर्वाण तो जाणे ॥१७८॥</p>
<p>
	आम्ही नेणों अर्थानर्थ । आम्ही नेणों स्वार्थपरार्थ । जाणूं एक गुरुकार्यार्थ । तोचि परमार्थ आमुतें ॥१७९॥</p>
<p>
	गुरुवचनाचियापुढें । विधिनिषेध व्यर्थ बापुडे । लक्ष गुरुनिओगकर्तव्याकडे । शिष्याचें सांकडें गुरुमाथां ॥१८०॥</p>
<p>
	आम्ही आपुल्या आज्ञेचे दास । योग्यायोग्य नाणूं मनास । वेळीं वेंचूं जीवितास । परी गुरुवचनास प्रतिपाळूं” ॥१८१॥</p>
<p>
	स्वभावें जें दयाभूत । तेंच मन होय पाषाणवत । म्लेंच्छही न जें करूं धजत । ब्राम्हाण सजत करावया ॥१८२॥</p>
<p>
	वाटेल हें श्रोतियां अवघड । परी हें सद्नुरुघरचें गारुड । व्हा एकदां गुरुवचनारूढ । तात्काळ गूढ उकलेल ॥१८३॥</p>
<p>
	एकदां त्यांची धरल्या कास । पायीं ठेविल्या पूर्ण विश्वास । मगशिष्याची चिंता तयांस । नलगे सायास कराया ॥१८४॥</p>
<p>
	सर्वथैव वाहून घ्या पायास । भय नाहीं मग तयास । केवळ तोच तयाचा आत्मविश्वास । परतीरास लाववी ॥१८५॥</p>
<p>
	त्रिप्रकार शिष्य असती । उत्तम मध्यम अधम वृत्ति । प्रकार प्रत्येकीं अति संकलितीं । अभिव्यक्तीस आणितों ॥१८६॥</p>
<p>
	न सांगतां अभीष्ट जाणणें । जाणतांच सेवा करूं लगणें । प्रत्यक्ष आज्ञेलागीं न खोळंबणें । जाणें ‘उत्तमशिष्य । तो ॥१८७॥</p>
<p>
	गुरुनें आज्ञापितां मानणें । अक्षरें अक्षर प्रतिपाळणें । कार्यांतरीं न विलंबणें । जाणें ‘मध्यमशिष्य । तो ॥१८८॥</p>
<p>
	गुरूनें आज्ञा करीत राहणें । करूं करूं म्हणतचि जाणें । प्रतिपदीं प्रमाद करणें । जाणा ‘अधमशिष्य’ तो ॥१८९॥</p>
<p>
	परम वैराग्य नाहीं अंतरीं । नित्यानित्यविवेक न करी । कैंची गुरुकृपा तयावरी । जन्मजरी घालविला ॥१९०॥</p>
<p>
	तरी जो गुरुपदीं निंरतर । इच्छा तयाची पुरवी ईश्वर । निश्चळ निष्काम करी सत्वर । तो परात्पर सोइरा ॥१९१॥</p>
<p>
	असावें निर्मळ श्रद्धाबळ । वरी प्रज्ञेचें बळ प्रबळ । सबूरीची जोड अढळ । परमार्थ सबळ तयाचा ॥१९२॥</p>
<p>
	येथें नलगे प्राणनिरोध । अपानोदान यांचा शोध । हठयोग समाधि वा उद्बोध । साधन दुर्बोध तें आम्हां ॥१९३॥</p>
<p>
	असतां शिष्याची भूमिका तयार । सद्नुरुसिद्धीसी नाहीं उशीर । ते तों सदैव अनुग्रहतत्पर । एकाचि पायावर उभे ॥१९४॥</p>
<p>
	सगुण-साक्षात्कार-प्रतीति । भक्तमात्र तेच अनुभविती । भाविकांना उपजे भक्ति । पाखंडयुक्ति इतरांना ॥१९५॥</p>
<p>
	पुढें मग बाबा काकांस वदती । घे हें टमरेल पाण्याचें हातीं । आतां मी ‘हलाल’ करितों निश्चिती । देतों सद्नती तयातें ॥१९६॥</p>
<p>
	आधींच तो बोकड मरणोन्मुख । तेथेंच आहे तक्या नजीक । फकीरबाबांस विचार एक । समयसूचक आठवला ॥१९७॥</p>
<p>
	घेतला बाबांचा विचार । बोकड मारावा तक्यावर । येणें मिषें करवितांच स्थलांतर । बोकड देहांतर लाधला ॥१९८॥</p>
<p>
	बोकडाचा मृत्यु अटळ । जाणून चुकले होते सकळ । परी पाहूनि योग्य वेळ । केला हा खेळ बाबांनीं ॥१९९॥</p>
<p>
	सद्नुरूसी शरण गेले । सद्नुरुरूपचि ते जहाले । सैंधव सिंधुस्नानार्थ रिघालें । तें काय निघालें बाहेरी ॥२००॥</p>
<p>
	जीव हा या जगाचा भोक्ता । ईश्वर जगद्भोगप्रदाता । परी सद्नुरु एक मोक्षदाता । निजात्मैक्यता - निधान ॥२०१॥</p>
<p>
	कृपा उपजलिया पोटीं । सद्नुरु देतील दिव्य द्दष्टी । तेणें मग ही सकल सृष्टी । मावेल दिठीं एकदांचि ॥२०२॥</p>
<p>
	हेमाड साईपायीं शरण । तेथें वाही देहाभिमान । मनीं म्हणे सावधान । बाबा निरभिमान मज ठेवा ॥२०३॥</p>
<p>
	आतां पुढील अध्यायद्वयीं । थट्टाविनोदाची रससोई । करीत कैसे महाराज साई । ती नवलाई परियेसा ॥२०४॥</p>
<p>
	दिसाया विनोद करमणूक । परी ती अत्यंत बोधदायक । अभ्यासील जो भक्त भाविक । परमसुख पावेल ॥२०५॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । गुरुभक्तलीलादर्शनं नाम त्रयोविंशतितमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 13:27:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 14:44:10 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय २२]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-22-122042600036_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीणगेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: । श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
जय सन्द्रुरो आनंदघना । ज्ञानस्वरूपा परमपावना । जय जयाजी भवभय - निकंदना । कलिमलदहना परिपूर्णा ॥१॥
तूं आनंदसागर ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 22" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650959222-1394.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra marathi adhyay 22" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीणगेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: । श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	जय सन्द्रुरो आनंदघना । ज्ञानस्वरूपा परमपावना । जय जयाजी भवभय - निकंदना । कलिमलदहना परिपूर्णा ॥१॥</p>
<p>
	तूं आनंदसागर तुजवरी । उठती नाना वृत्तिलहरी । त्याही तूंच तूंच आवरीं । कृपा करीं निजभक्तां ॥२॥</p>
<p>
	अल्पांधारींचा जो साप । तोच प्रकाशी दोर आपाप । अल्पांधार प्रकाशस्वरूप । दोहींचा बाप तूं एक ॥३॥</p>
<p>
	सर्पाकार वृत्तीचा जनिता । तिजलाच दोराचा आकार देता । तूंच भीतीतें उत्पन्नकर्ता । अंतीं निवारिताही तूंच ॥४॥</p>
<p>
	आधीं जेव्हां पूर्णांधार । नाहीं सर्प नाहीं सर्प नाहीं दोर । वृत्ति उठाया नाहीं थार । तोही निराकार तूं होसी ॥५॥</p>
<p>
	पुढें निरकाराचा आकार । तोही अल्प प्रकाशाचा अवसर । तेणें आभासूं लागला विखार । आभासा कारणही तूंच ॥६॥</p>
<p>
	ऐसा द्दश्याद्दश्य भाव । हा तव वृत्त्यानंदप्रभाव । भावाभावरहित स्वभाव । नलगे ठाव कवणाही ॥७॥</p>
<p>
	श्रुति मौनावल्या ऐशियास्तव । अशेष मुखांहीं करितांही स्तव । शेषही नेणे स्वरूप वास्तव । तें मी कवण जाणावया ॥८॥</p>
<p>
	बाबा तव स्वरूपदर्शना - वांचून कांहीं रुचेना मना । वाटे आणावें तेंच ध्याना । ठेवावें लोचनांसमोर ॥९॥</p>
<p>
	केवळ शुद्धज्ञानमूर्ति । व्हावया आत्यंतिक सौख्यपूर्ति । नाहीं तुझिया पायांपरती । आणिक गति आम्हांतें ॥१०॥</p>
<p>
	काय ती तव नित्याची बैठक । दर्शना येती भक्त अनेक । ठेवूनियां पाय़ीं मस्तक । प्रेमें निजसुख लुटीत ॥११॥</p>
<p>
	तोही तुझा पाय कैसा । शाखा - चंद्रन्याय जैसा । पादांगुष्ठ कवळी तैसा । दर्शनजिज्ञासा पूरवी ॥१२॥</p>
<p>
	कृष्णपक्षाची पंचदशी । अमावास्या अंधारी निशी । उलटतां चंद्रदर्शनाची असोसी । होते सकळांसी साहजिक ॥१३॥</p>
<p>
	सरतां वद्य पक्षाची निशा । चंद्रदर्शनीं उपजे आशा । जो तो अवलोकी पश्चिम दिशा । द्दष्टि आकाशा लावुनी ॥१४॥</p>
<p>
	ती निजभक्तांची असोसी । पुरविसी निज पायांपासीं । वामजानूवरी दक्षिण पायासी । ठेवूनि बैससी जे समयीं ॥१५॥</p>
<p>
	वामकर तर्जनी मध्यमांगुळी । शाखा बेचकें अंगुष्ठ जो कवळी । त्या दक्षिणपादांगुष्ठाजवळी । नखचंद्र झळाळी बीजेचा ॥१६॥</p>
<p>
	दर्शनाची जिज्ञासा थोर । एरव्हीं नभीं दिसेना कोर । ज्ञाता मग या बेचक्यासमोर । आणोनि नजर लावीं म्हणे ॥१७॥</p>
<p>
	पहा आतां या बेचक्यामधून । समोर होईल चंद्रदर्शन । कोर जरी ती होती लहान । जाहली तेथून द्दग्गोचर ॥१८॥</p>
<p>
	धन्य अंगुष्ठमहिमान । वेणीमाधव स्वयें होऊन । गंगा यमुना प्रकटवून । दासगणूतें तुष्टविलें ॥१९॥</p>
<p>
	प्रयागतीर्थीं करावें स्नान । म्हणून मागतां आज्ञापन । “हा मदंगुष्ठ प्रयाग जाण । करीं अवगाहन तेथेंच” ॥२०॥</p>
<p>
	ऐसें बाबा म्हणतां डोई । दासगणूनें ठेवितां पायीं । गंगा यमुना उभयतोयीं । प्रकटल्या पाहीं ते ठायीं ॥२१॥</p>
<p>
	ऐसिया त्या प्रसंगावर । दासगणूचें पद तें सुंदर । ‘अगाध शक्ती अघटित लीलापर’ । श्रवणतत्पर जरी श्रोते ॥२२॥</p>
<p>
	साईसच्चरित - चतुर्थाध्यायीं । दासगणू निजवाणीं तें गाई । पुनश्च श्रोतां वाचितां ते ठायीं । पुन्हांही नवाई प्रकटेल ॥२३॥</p>
<p>
	म्हणवूनि शाखा - चंद्रन्याय । अंगुष्ठीं तर्जनी - मध्यमा उभय । ठेवूनि दावी साईमाय । सोपा उपाय निजभक्तां ॥२४॥</p>
<p>
	म्हणे होऊनि निरभिमान । सर्वांभूतीं खालवा मान । करा एक अंगुष्ठध्यान । सोपें साधन भक्तीचें ॥२५॥</p>
<p>
	आतां पूर्वील कथानुसंधान । जाहलें भक्तानुग्रह - कथन । पुढील अपूर्व चरित्रश्रवण । अवधानपूर्ण परिसिजे ॥२६॥</p>
<p>
	शिरडी जाहलें पुण्यक्षेत्र । बाबांचेनि तें अति पवित्र । यात्रा वाहे अहोरात्र । येती सत्पात्र पुण्यार्थी ॥२७॥</p>
<p>
	दाही दिशांसी जयांची साक्ष । पटून राहिली प्रत्यक्ष वा परोक्ष । साईवेषें हा कल्पवृक्ष । अवतरला प्रत्यक्ष शिरडींत ॥२८॥</p>
<p>
	अकिंचन वा संपत्तिमान । देखे समस्तां समसमान । दावून कांहीं अतर्क्य विंदान । भक्तकल्याण साधी जो ॥२९॥</p>
<p>
	काय ती नि:सीम प्रेमळता । नैसर्गिक ज्ञानसंपन्नता । तैसीच आत्यंतिक सर्वात्मभावता । धन्य अनुभविता भाग्याचा ॥३०॥</p>
<p>
	कधीं द्दढ मौनधारण । हेंच जयांचें ब्रम्हाव्याख्यान । कधीं चैतन्य - आनंदघन । भक्तगणपरिवेष्टित ॥३१॥</p>
<p>
	कधीं गूढार्धध्वनित बोलणें । कधीं थट्टेनें विनोद करणें । कधीं संदिग्धता सोडून देणें । कातावणें चालावें ॥३२॥</p>
<p>
	कधीं भावार्थ कधीं विवेक । कधीं उघडें निश्चयात्मक । असे अनेकीं अनेक । उपदेश देख करीत ते ॥३३॥</p>
<p>
	ऐसें हें साईसमर्थाचरित । मनोबुद्धिवाचातीत । अकळ करणी अकल्पित । अनिर्ज्ञात अवचित ॥३४॥</p>
<p>
	धणी न पुरे मुख अवलोकितां । धणी न पुरे संभाषण करितां । धणी न पुरे वार्ता परिसतां । आनंद चित्त न समाये ॥३५॥</p>
<p>
	मोजूं येतील पर्जन्यधारा । बांधूं येईल मोटे वारा । परी या साईंच्या चमत्कारा । कवण मापारा मोजील ॥३६॥</p>
<p>
	असो आतां पुढील कथा । साईंची भक्तसंरक्षणीं चिंता । तैशीच दुर्शरप्रसंग - निवारकता । स्वस्थचित्ता परिसावी ॥३७॥</p>
<p>
	कैसें भक्तांचें गंडांतर । जाणून देती वेळीं धीर । टाळूनि करीत निजपदीं स्थिर । कल्याणतत्पर सर्वदा ॥३८॥</p>
<p>
	ये अर्थींची आख्यायिका । रिझवील तुम्हां श्रवोत्सुकां । वाढवील साईसमागम - सुखा । श्रद्धा भाविकां उपजवील ॥३९॥</p>
<p>
	असोत हीन दीन बापुडीं । वाढेल साईकथेची आवडी । जपतां साईनाम हरघडी । लावील परथडी साई त्यां ॥४०॥</p>
<p>
	काकासाहेब मिरीकर । निवास शहर अहमनगर । प्रसन्नपणें जयां सरकार । पाववी सरदार पदवीतें ॥४१॥</p>
<p>
	चिरंजीवही कर्तव्यतत्पर । कोपरगांवचे माललेदार । असतां चिथळीचे दौर्‍यावर । आले शिरडीवर दर्शना ॥४२॥</p>
<p>
	मशिदींत जाऊन बैसतां । बाबांचे चरणीं मस्तक ठेवितां । क्षेमकुशल पुसतां सवरतां । कथावार्ता चालल्या ॥४३॥</p>
<p>
	होती तेथें बरीच मंडळी । माधवरावही होते जवळी । कथामृताची ते नवाळी । अवधानशीळीं सेविजे ॥४४॥</p>
<p>
	कैसी भावी संकटसूचना । सोपाय तन्निवारणयोजना । करून कैसें रक्षित भक्तजनां । अघटितघटना बाबांची ॥४५॥</p>
<p>
	बाबा मिरीकरांस ते ठाय़ीं । पुसती प्रश्न पहा नवलाई । “अहो ती आपुली द्वारकामाई । आहे का ठावी तुम्हातें” ॥४६॥</p>
<p>
	बाळासाईबांस हा कांहीं । मुळींच उलगडा झाला नाहीं । तंव बाबा वदती “आतां पाहीं । द्वारकामाई ती हीचे ॥४७॥</p>
<p>
	हीच आपुली द्वारकामाता । मशिदीचे या अंकीं बैसतां । लेंकुरां देई ती निर्भयता । चिंतेची वार्ता गुरेचि ॥४८॥</p>
<p>
	मोठी कृपाळू ही मशीदमाई । भोळ्या भाविकांची ही आई । कोणी कसाही पडो अपायीं । करील ही ठायींच रक्षण ॥४९॥</p>
<p>
	एकदां हिचे जो अंकीं बैसला । बेडा तयाचा पार पडला । साउलींत हिचे जो पहुडला । तो आरूढला सुखासनीं ॥५०॥</p>
<p>
	हीच द्वारका द्वारावती” । वाबा मग तयांस देती विभूति । अभय हस्त शिरीं ठेविती । जावया निघती मिरीकर ॥५१॥</p>
<p>
	आणीक वाटलें बाबांचे जीवा । मिरीकरांतें प्रश्न पुसावा । ठावा का तुज लांब बावा । आणीक नवलावा तयाचा ॥५२॥</p>
<p>
	मग मूठ वळूनि डावा हात । कोपरापाशीं उजवे हातांत । धरूनि फिरवीत मुखें वदत । ऐसा भयंकर असतो तो ॥५३॥</p>
<p>
	परी तो काय करितो आपुलें । आपण द्वारकामाईचीं पिल्लें । कोणा न उमगे तिचें केलें । कौतुक उगलें पहावें ॥५४॥</p>
<p>
	द्वारकामाई असतां तारिती । लांब बावा काय मारिती । तारित्यापुढें मारित्याची गती । ती काय किती समजावी” ॥५५॥</p>
<p>
	याच प्रसंगीं हा खुलासा । बाबांनीं कां करावा ऐसा । मिरीकरांशीं संबंध कैसा । लागली जिज्ञासा सकळिकां ॥५६॥</p>
<p>
	बाबांस पुसाया नाहीं धीर । तैसेंच चरणीं ठेवूनि शिर । चिथळीस जावया झाला उशीर । म्हणून मिरीकर उतरले ॥५७॥</p>
<p>
	होते माधवराव बरोबरी । दोघे जों पोहोंचले मंडपद्वारीं । माधवरावांस बाबा माघारी । “येईं क्षणभरी” म्हणाले ॥५८॥</p>
<p>
	म्हणती ‘शामा तूंही तयारी । करीं जाईं त्याचे बरोबरी । मारून ये चिथळीची फेरी । मौज भारी होईल” ॥५९॥</p>
<p>
	तात्काल शामा खालीं उतरला । मिरीकरांसन्निध आला । म्हणे आपुले टांग्यांत मजला । येणें चिथळीला आहे कीं ॥६०॥</p>
<p>
	घरीं जाऊन करितों तयारी । हा आलोंच जाणा सत्वरी । बाबा म्हणती तुम्हांबरोबरी । चिथळीवरी जावें म्यां ॥६१॥</p>
<p>
	तयांस वदती मिरीकर । चिथळीपर्यंत इतकें दूर । तुम्ही येऊन काय करणार । व्यर्थ हा जोजार तुम्हांला ॥६२॥</p>
<p>
	माधवराव मागें परतले । जें झालें तें बबांस कथिलें । बाबा म्हणती “बरें झालें । काय कीं हरवलें आपुलें ॥६३॥</p>
<p>
	मंत्र तीर्थ द्विज देव । दैवज्ञ वैद्य कीं गुरुराव । यांच्या ठायीं जैसा भाव । तैसाच उद्भव फलाचा ॥६४॥</p>
<p>
	आपण चिंतावें नित्य हित । उपदेशावा अर्थ विहित । असेल जैसें जयाचे कर्मांत । तैसेंच निश्चित घडेल” ॥६५॥</p>
<p>
	इतक्यांत मिरीकर शंकले । पाहिजेत बाबांचे शब्द मानिले । माधवरावांस हळुच खुणविलें । चला म्हणाले चिथळीला ॥६६॥</p>
<p>
	मग ते म्हणती थांबा येतों । पुन्हां बाबांची अनुज्ञा घेतों । हो म्हणतां तेक्षणींच परततों । आतांच येतों माघारा ॥६७॥</p>
<p>
	निघालों होतों तुम्हीं परतविलें । बाबा म्हणाले बरें झालें । काय आपुलें त्यांत हरवलें । स्वस्थ बसविलें मजलागीं ॥६८॥</p>
<p>
	आतां पुनश्च विचार घेतों । हो म्हणतांच सत्वर येतों । म्हणतील ऐसें करितों । दास मी तों आज्ञेचा ॥६९॥</p>
<p>
	मग ते जाती बाबांप्रती । म्हणती मिरीकर बोलाविती । चिथळीस मजला सवें नेती । आज्ञा मागती आपुली ॥७०॥</p>
<p>
	मग ते हांसून म्हणती साई । “बरें तो नेतो तर तूं जाईं । नांव हिचें मशीदमाई । ब्रीदास काई घालवील ॥७१॥</p>
<p>
	आई ती आई बहु मायाळू । लेंकरालागीं अति कनवाळू । परी लेंकरेंच निघतां टवाळू । कैसा सांभाळू करी ती” ॥७२॥</p>
<p>
	मग वंदोनि साईपायां । निघाले माधवराव जाया । मिरीकर होते जया ठाया । तांग्यांत बैसाया पातले ॥७३॥</p>
<p>
	उभयतां ते चिथळीस गेले । तपासांतीं हुजूरवाले । येणार परी नाहीं आले । मग ते बैसले निवांत ॥७४॥</p>
<p>
	मारुतीचे देवालयीं । उतरण्याची होती सोयी । उभयतांहीं मग ते ठायीं । प्रयाण लवलाहीं केलें कीं ॥७५॥</p>
<p>
	एक प्रहर झाली निशी । टाकूनि संत्रजी बिछाना उशी । बत्तीचिया उजेडापाशीं । वार्ता पुसीत बैर्सेले ॥७६॥</p>
<p>
	वृत्तपत्र होतें तेथ । उघडून मिरीकर वाचूं लागत । नवलविशेषीं लोधलें चित्त । तों नवल विचित्र वर्तलें ॥७७॥</p>
<p>
	सर्प एक त्या काळवेळे । कैसा कोठूनि आला नकळे । बैसला करूनियां वेटोळें । चुकवूनि डोळे सकळांचे ॥७८॥</p>
<p>
	मिरीकरांचे कंबरेवर । होता उपरण्याचा पदर । तया मृदुल आसनावर । शांत निर्घोर बैसला ॥७९॥</p>
<p>
	प्रवेश करितां ओजें ओजें । सुर सुर स्रुर सुर कागद वाजे । परी न कोणा तया आवाजें । घेणें साजे सर्पशंका ॥८०॥</p>
<p>
	इतुका भयंकर जरी प्रसंग । मिरीकर खबरपत्रांत दंग । परी पट्टेवाल्यांचें अंतरंग । कल्पनातरंगीं वाहविलें ॥८१॥</p>
<p>
	येतो कोठूनि तो आवाज । असावा कशाचा काय काज । म्हणोनि उचलितां बत्ती जूज । लंबूमहाराज देखिले ॥८२॥</p>
<p>
	देखतांच तो घाबरला । साप रे साप हळूच ओरडला । मिरीकरांचा धीरचि सुटला । कंप सुटला सकळांगा ॥८३॥</p>
<p>
	शामरावही चकित झाले । म्हणती बाबा हें काय केलें । नसतें विन्घ कोठूनि धाडिलें । आतां निरसिलें पाहिजे ॥८४॥</p>
<p>
	मग पाहूनि ते अवस्था । जयाच जें जें लागलें हाता । तें तें घेऊनि धांवले तत्त्वतां । वाजूं न देतां पदातें ॥८५॥</p>
<p>
	तों तो सर्प कंबरेखालता । देखिला हळू हळू सरकतां । सर्प कैंचा ती मूर्त अनर्थता । उतरताहे वाटली ॥८६॥</p>
<p>
	पहातां पहातां तें ग्रहण सुटलें । बडगे आधींच होते उचलले । धडाधड ते सर्पावर पडले । जाहले तुकडे तयाचे ॥८७॥</p>
<p>
	एणेंपरी अरिष्ट टळलें । पाहूनि मिरीकर अति गहिंवरले । साईसमर्थाचियावरलें । प्रेम तरतरलें अतितर ॥८८॥</p>
<p>
	दु:खाचे शहारे मावळले । प्रेम डोळां वाहूं लागलें । केवढें हेम अरिष्ट टळलें । कैसें बाबांना ॥८९॥</p>
<p>
	कैसें हें गंडांतर चुकलें । बाबांनीं वेळीं कैसें सुचविलें । नको म्हणतां टांग्यांत बैसविलें । शामास दिधलें साह्यार्थ ॥९०॥</p>
<p>
	किती तरी दया पोटीं । काय ती त्यांची अंतर्द्दष्टि । जाणूनि पुढील वेळ ओखटी । वार्ता गोमटी कथियेली ॥९१॥</p>
<p>
	दर्शनाचें माहात्म्य दाविलें । मिशिदीचें महत्त्व ठसविलें । निजप्रेम निदर्शना आणिलें । सहज लीलेकरून ॥९२॥</p>
<p>
	एकदां एक मोठे ज्योतिषी । नाना डेंगळे नाम जयांसी । होते श्रीमंत बुट्टींपासी । म्हणाले तयांसी तें परिसा ॥९३॥</p>
<p>
	आजिचा दिवस अशुभ फार । आहे आपणां गंडांतर । अंतरीं असों द्यावा धीर । असावें फार सावध ॥९४॥</p>
<p>
	डेंगळ्यांनीं ऐसें कथितां । बापूसाहेब अस्वस्थ । चित्ता । राहून राहून करिती चिंता । दिवस जातां जाईना ॥९५॥</p>
<p>
	पुढें मग नित्याचे वेळीं । मशिदीस निघाली मंडळीं । बापूसाहेब नानादि सकळी । जाऊनि बैसली बाबांकडे ॥९६॥</p>
<p>
	तात्काळ बाबा बुट्टींस पुसती । “काय हे नाना काय वदती । ते काय तुज माराया बघती । नलगे ती भीती आपणा ॥९७॥</p>
<p>
	कैसा मारतोस पाहूं मार । खुशाल त्यांना देईं उत्तर” । असो ऐसें झालियानंतर । पहा चमत्कार पुढील ॥९८॥</p>
<p>
	सायंकाळीं बहिर्दिशेस । बापूसाहेब शौचविधीस । गेले असतां शौचकूपास । आला ते समयास सर्प एक ॥९९॥</p>
<p>
	पाहूनियां तें विन्घ भयंकर । बापूसाहेब आले बाहेर । लहानू तयांचा करी जों विचार । दगडानें ठार करूं या ॥१००॥</p>
<p>
	लहानू दगड उचलूं जाई । बापूसाहेब करिती मनाई । म्हणती जा काठी घेऊन येईं । बरी न घाई ये कामीं ॥१०१॥</p>
<p>
	गडी जों गेला काठीकरितां । सर्प भिंतीवर चढूं लागतां । झोंक जाऊन पडला अवचिता । गेला सरपता भोकांतुनी ॥१०२॥</p>
<p>
	तेथून मग तो गेला पळून । उरलें न मारावयाचें कारण । जाहलें बाबांच्या शब्दांचें स्मरण । संकटनिवारण उभयत्र ॥१०३॥</p>
<p>
	असो हा साईसमागम सोहळा । भाग्यें पाहिला जयानें डोळां । तयासी तो स्मरणावेगला । कदाकाळा करवेना ॥१०४॥</p>
<p>
	ऐसऐशीं प्रत्यंतरें । दावून आकर्षिलीं भक्तांतरें । वर्णूं जातां कागद न पुरे । वर्णन न सरे कदापि ॥१०५॥</p>
<p>
	ऐसेंच एक कथांतर । रात्र पडतां दोन प्रहर । प्रत्यक्ष घडलें चावडीवर । बाबांचे समोर तें परिसा ॥१०६॥</p>
<p>
	कोराळे तालुका कोपरगांव । वतनवाडीचा मूळ गांव । अमीर शक्कर जया नांव । जयाचा भाव साईपदीं ॥१०७॥</p>
<p>
	जात खाटिक धंदा दलाल । वांद्यांत जयाचा बोलबाल । दुखण्यानें गांजला प्रबळ । अति विकळ जाहला ॥१०८॥</p>
<p>
	पडतां संकट आठवे देव । सोडिली धंद्याची उठाठेव । निरवून सारी देवघेव । ठोकिली धांव शिरडीस ॥१०९॥</p>
<p>
	कुंती पांच पांडवांची आई । अज्ञात आणि वनवासापायीं । कष्टली जरी अनंत अपायीं । प्रार्थी अपायचि देवातें ॥११०॥</p>
<p>
	म्हणे देवा परमेश्वरा । सौख्य द्या जी मागत्या इतरा । मज द्या निरंतर दु:खपरंपरा । पाडी न विसरा तव नामीं ॥१११॥</p>
<p>
	तेंच की एवा माझें मागणें । देणें तरी मज हेंच देणें  । होईल मग तव नाम तेणें । अखंड लेणें मम कंठा ॥११२॥</p>
<p>
	श्रोता वक्ता अहर्निशीं । हेंच कीं मागूं साईंपाशीं । विसर न व्हावा तव नामाशीं । पायापाशीं ठेविजे ॥११३॥</p>
<p>
	असो अमीरें केलें नमन । विधियुक्त बाबांचें हस्तचुंबन । व्याधीचेंही सविस्तर निवेदन । दु:खविमोचन प्रार्थिलें ॥११४॥</p>
<p>
	जडला जो होता वातविकार । पुसिला तयाचा प्रतिकार । बाबा मग देती प्रत्युत्तर । व्हावें सुस्थिर चावडींत ॥११५॥</p>
<p>
	मशिदींतून नेमानें रातीं । वाबा जया चावडीप्रती । एक दिवसा आद जाती । अमीरा वसती ते स्थानीं ॥११६॥</p>
<p>
	अमीर गांजले संधिवातें । कुठेंही गांवांत सुखानें राहाते । कोराळ्यासही जाऊन पडते । अधिक मानवतें तयांना ॥११७॥</p>
<p>
	चावडी ती मलिकंबरी । जीर्ण झालेली खालींवरी । जेथें सरडपाली विंचू विखारीं । स्वेच्छाचारीं नांदावें ॥११८॥</p>
<p>
	त्यांतचि वसती रोगी कुष्टी । कुत्रीं तेथेंच खाती उष्टीं । अमीर झाला मोठा कष्टी । चालती न गोष्टी बाबांपुढें ॥११९॥</p>
<p>
	मागील भागांत भरला कचरा । ढोपर ढोपर छिद्रें सतरा । हाल खाईना तयाचे कुत्रा । ती एक यात्राच जन्माची ॥१२०॥</p>
<p>
	वरुन पाऊस खालून ओल । जागा उंच नीच सखोल । वार्‍याथंडीचा एकचि कल्लोळ । मनासी घोळ अमीराचे ॥१२१॥</p>
<p>
	सांधे धरले शरीराचे । स्थळ तें वार्‍यापाउसाचें । ओल तों तेथें ऐशापरीचें । औषध बाबांचें वचन कीं ॥१२२॥</p>
<p>
	तयास वाबांचे ठाम बोल । वारा पाऊस वा असो ओल । जागा उंच नीच वा सखोल । तयाचें तोल करूं नये ॥१२३॥</p>
<p>
	जरी तें स्थान विकल्पास्पद । साईसमागम महाप्रसाद । तयांचें वचन हेंचि अगद । मानूनि सुखद राहिला ॥१२४॥</p>
<p>
	चावडी चढतां तेथें समोर । बिस्तरा लावून मध्यावर । नऊ महिने त्या चावडीवर । अमीर शक्कार राहिला ॥१२५॥</p>
<p>
	अंगीं खिळला संधिवात । अनुपान बाह्यत: सर्व विपरीत । परी अंतरीं विश्वास निश्चित । तेणें यथास्थित जाहलें ॥१२६॥</p>
<p>
	नऊ महिने तेथेंच वास । नेमिला होता अमीरास । मनाई होती दर्शनास । मशिदीसही यावया ॥१२७॥</p>
<p>
	परी ती चावडी ऐसें स्थान । दिधलें होतें तयास नेमून । कीं बाबांचें आपाप दर्शन । प्रयासावीण घडतसे ॥१२८॥</p>
<p>
	तेंही रोज सांज सकाळा । शिवाय एकांतर दोनी वेळां । तेथें तया चावडीचा सोहळा । मिळे डोळाभर पहावया ॥१२९॥</p>
<p>
	रोज सकाळीं भिक्षेस जातां । चावडीवरूनच बाबांचा रस्ता । सहज दर्शन जातां येतां । स्थान न सोडितां अमीरास ॥१३०॥</p>
<p>
	तैसेच रोज अस्तमानीं । चावडीसमोर बाबा य़ेऊनी । तर्जनी मस्तक डोलवुनी । दिग्वंदनीं सन्निष्ठ ॥१३१॥</p>
<p>
	तेथून मग माघारा जात । समाधिगृहाचे कोनापर्यंत । तेथून माघारा मशिदींत । भक्तसमवेत ते जात ॥१३२॥</p>
<p>
	चावडी एका दिसा आड । नांवाला एक पडदा आड । दोघांमाजीं फळ्यांचें कवाड । दोघांडी आवड गोष्टींची ॥१३३॥</p>
<p>
	तेथेंच पूजा तेथेंच आरती । होऊन भक्तजन घरोघर जाती । तेथून पुढें स्वस्थ चित्तीं । मग ते बोलती परस्पर ॥१३४॥</p>
<p>
	बाह्यात्कारें बंदिवास । आंतून साईंसीं द्दढ सहवास । भाग्यावीण हा लाभ इतरांस । भोगावयास दुर्मिळ ॥१३५॥</p>
<p>
	तरीही अमीर कंटाळला । एकेच स्थानीं रहावयाला । बंदिवासचि तो तया गमला । म्हणे गांवाला जावें कोठें ॥१३६॥</p>
<p>
	स्वातंत्र्याची हौस मना । त्या काय आवडे परतंत्रपणा । पुरे आतां हा बंदिखाना । उठली कल्पना अमीरा ॥१३७॥</p>
<p>
	निघाला बाबांच्या अनुज्ञेवीण । त्यागूनि आपुलें नियमित स्थान । गेला कोपरगांवालागून । राहिला जाऊन धर्मशाळे ॥१३८॥</p>
<p>
	तेथें पहा चमत्कार । मराया टेकला एक फकीर । तृषेनें व्याकुळ होऊन फार । पाजा घोटभर पाणी म्हणे ॥१३९॥</p>
<p>
	अमीरास आली दया । गेला पाणी ज्पाजावया । पाणी पीतांक्षणीं ते ठाया । पडली काया निचेष्टित ॥१४०॥</p>
<p>
	झालें तयाचें देहावसान । जवळपास नाहीं कोण । त्यांतही रात्रीचा समय पाहून । गडबडलें मन अमीराचें ॥१४१॥</p>
<p>
	प्रात:काळीं भरेल ज्युरी । त्या आकस्मिक मरणावरी । होईल सुरू धराधरी । तपास सरकार ॥१४२॥</p>
<p>
	घडलेली वार्ता जरी खरी । सकृद्दर्शनीं कोण निर्धारी । निकाल साक्षी - पुराव्यावरी । ऐसी पी परी न्यायाची ॥१४३॥</p>
<p>
	मींच यातें पाणी पाजितां । फकीर अवचित मुकला जीविता । ऐसी सत्य वार्ता मी वदतां । लागेनहाता आयताच ॥१४४॥</p>
<p>
	माझा संबंध येईल आधीं । घरितील मजलाचि यासंबंधीं । पुढें ठरतां मरणाची आदी । मी निरपराधी ठरेन ॥१४५॥</p>
<p>
	परी तें ठरेपर्य़ंतचा काल । जाईल दु:सह होतील हाल । तैसाच आल्या वाटेनें पळ । काढावा तात्काळ हें ठरलें ॥१४६॥</p>
<p>
	म्हणोन अमीर रातोरात । निघाला तेथून कोणी न देखत । पुढें जातां मागें पाहत । अस्वस्थचित्त मार्गांत ॥१४७॥</p>
<p>
	चावडी कैसी येते हातीं । मनास तोंवर ना निश्चिंती । ऐसा अमीर शंकितवृत्ती । शिरडीप्रती चालला ॥१४८॥</p>
<p>
	म्हणे बाबा हें काय केलें । काय कीं हें पाप ओढवलें । माझेंच कर्म मजला फळलें । तें मज कळलें संपूर्ण ॥१४९॥</p>
<p>
	सुखालागीं सोडिली चावडी । म्हणून माझी  तोडिली खोडी । असो आतां या दु:खांतूनि काढीं । नेऊनि शिरडींत घालीं गा ॥१५०॥</p>
<p>
	केली तयारी । हातोहात । अमीर निघाला रातोरात । टाकून तेथें तैसेंच प्रेत । धर्मशाळेंत त्या रात्रीं ॥१५१॥</p>
<p>
	‘बाबा बाबा’ मुखें वदत । क्षमा करा करुणा भाकीत । पातला जेव्हां चावडीप्रत । जाहला स्वस्थ चित्तांत ॥१५२॥</p>
<p>
	एवंच हा तरी एक धडा । तेथून कानास लाविला खडा । अमीर वर्तूं लागला पुढां । सोडून कुडा कुमार्ग ॥१५३॥</p>
<p>
	असो विश्वासें गुण आला । वातापासून मुक्त झाला । पुढें कैसा प्रसंग पातला । प्रकार घडला तो ऐका ॥१५४॥</p>
<p>
	चावडीस अवघे तीन खण । आग्नेयी कोण बाबांचें ठिकाण । चहूं बाजूंनीं फळ्यांचें वेष्टण । करिती शयन तैं बाबा ॥१५५॥</p>
<p>
	अवघी रात्र बत्त्या तेवती । सदैव उजेडांत निजती । फकीर फुकरे बाहेर बैसती । बाह्य प्रदेशीं अंधार ॥१५६॥</p>
<p>
	अमीर जणूं त्यांतचि एक । आजूबाजूस इतर लोक । तेही लवंडती तेथचि देख । ऐसे कैक ते असती ॥१५७॥</p>
<p>
	तेथेंच बाबांचे पश्चाद्भागीं । सरसामान कोठीचे जागीं । भक्त अबदुल परम विरागी । सेवेस निजांगीं तत्पर ॥१५८॥</p>
<p>
	ऐसें असतां मध्यरात्रीसी । बाबा आक्रंदत अबदुल्लासी । म्हणती माझिया बिछान्याचे कुशी । पहा रे विवशी आदळली ॥१५९॥</p>
<p>
	हांकेपाठीं हांक देती । अबदुल पातला बत्ती हातीं । बाबा आक्रंदें तयास म्हणती । आतां होती ना ती येथें ॥१६०॥</p>
<p>
	अबदुल म्हणे सारें पाहिलें । येथें न कांहींच द्दष्टीस पडलें । बाबा म्हणती उघडून डोळे । नीट सगळें देखें रे ॥१६१॥</p>
<p>
	पाही अबदुल फिर फिरून । बाबा सटक्यानें ताडिती जमीन । बहिर्निद्रिस्त सकळ जन । जागृत होऊन अवलोकिती ॥१६२॥</p>
<p>
	जागा झाला अमीर शक्कर । म्हणे हा आज काय कहर । हे अपरात्रीं सटक्याचे प्रहार । होतात वरचेवर कां बरें ॥१६३॥</p>
<p>
	पाहूनि ही बाबांची लीला । अमीर तात्काळ मनीं तरकला । विखार कोठें तरी प्रवेशला । कळोनि आला बाबांस ॥१६४॥</p>
<p>
	तयास बाबांचा फार अनुभव । ठावा तयास बाबांचा स्वभाव । आणि तयांच्या बोलण्याची माव । त्यानें हें सर्व जाणलें ॥१६५॥</p>
<p>
	अरिष्ट जेव्हां भक्तांचे उशाशीं । म्हणतील बाबा तें आपुले कुशीसी । भाषा ही अवगत अमीरासी । तेणें हें मनाशीं ताडिलें ॥१६६॥</p>
<p>
	इतुक्यांत त्याच्याच उशाकडे । कांहीं विळविळतां द्दष्टी पडे । ‘अबदुल बत्ती रे बत्ती इकडे’ । म्हणून ओरडे अमीर ॥१६७॥</p>
<p>
	बत्ती आणितांच बाहेर । पसरलें दिसलें वेटोळें थोर । प्रकाशें तो दिपला विखार । मान खालींवर करीतसे ॥१६८॥</p>
<p>
	तेथेंच केली तयाची शांती । बाबांचे महदुपकार मानिती । म्हणती काय ही विलक्षण पद्धती । देती जागृती कैसी कीं ॥१६९॥</p>
<p>
	कैंची विवशी कैंची बत्ती । काळवेळेची द्यावी जागृती । निजभक्तांची संकटनिर्मुक्ति । हेच युक्ति ते होती ॥१७०॥</p>
<p>
	ऐशा सर्पांच्या अगणित कथा । येतील बाबांच्या चरित्रीं वर्णितां । होईल ग्रंथाची अति विस्तरता । म्हणून संक्षेपता आदरिली ॥१७१॥</p>
<p>
	‘सर्प विंचू नारायण’ । साधु तुकारामांचें वचन । ‘परी ते सर्व वंदावे दुरून’ । हेंही वचन तयांचें ॥१७२॥</p>
<p>
	तेच म्हणती तयां ‘अधर्म’ । तयां ‘पैजारीचें काम’ । तयांसंधंधें वर्तनक्रम । कळेना ठाम निर्बंध ॥१७३॥</p>
<p>
	जयाचा जैसा स्वभावधर्म । तदनुसार तयाचें कर्म । जैसा ईश्वरी नेमानेम । हेंचि कीं वर्म तेथील ॥१७४॥</p>
<p>
	या शंकेचें समाधान । बाबांपाशीं एकच जाण । जीवमात्र समसमान । अहिंसा प्रमाण सर्वार्थीं ॥१७५॥</p>
<p>
	विंचू काय सर्प काय । ईश्वरचि सर्वांचा ठाय । तयाची इच्छा नसतां अपाय । करवेल काय त्यांचेनी ॥१७६॥</p>
<p>
	हें विश्व अवघें ईश्वराधीन । स्वतंत्र येथें कांहींचही न । हें बाबांचें अनुभवज्ञान । आम्हां दुरभिमान सोडीना ॥१७७॥</p>
<p>
	तळ्यांत पडला विंचू तळमळी । खालीं जातां पाण्याचे तळीं । एक आनंदें वाजवी टाळी । म्हणे तूं छळिसी ऐसाच ॥१७८॥</p>
<p>
	एक ऐकूनियां ती टाळी । धांवत आला तळ्याचे पाळीं । पाहूनि विंचू खातां गटंगळी । करुणाबहाळीं कळवळे ॥१७९॥</p>
<p>
	मग तो जाऊनि तयाजवळी । हळूचचिमटींत विंचू कवटाळी । तेणें जातिस्वभावें उसळी । मारूनि अंगुळी डंखिली ॥१८०॥</p>
<p>
	येथें काय आमुचें ज्ञान । आम्ही सर्वथैव पराधीन । बुद्धिदाता नारायण । घडवीत आपण तें खरें ॥१८१॥</p>
<p>
	अनेकांचे अनेक अनुभव । मीही कथितों निजानुभव । साईवचन विश्वासगौरव । केवळ वैभव निष्ठेचें ॥१८२॥</p>
<p>
	जैसे काकासाहेब दीक्षित । दिवसा वाचीत नाथभागवत । तैसेच ते प्रतिरात्रीं नित । रामायण - भावार्थ वाचीत ॥१८३॥</p>
<p>
	टळेल देवावरचें फूल । टळेल एकवेळ अंघोळ । टळेल इतर नेम सकळ । वाचनवेळ ती ॥१८४॥</p>
<p>
	हे दोन्ही ग्रंथ नाथांचे । सारसर्वस्व परमार्थाचें । समर्थसाईंच्या अनुग्रहाचें । द्योतक साचें दीक्षितां ॥१८५॥</p>
<p>
	या अद्वितीय गोड ग्रंथीं । आत्मज्ञान वैराग्य नीति । यांची अखंड त्रिगुण ज्योति । दिव्यदीप्ति प्रकाशे ॥१८६॥</p>
<p>
	यांतील बोधामृताचा प्याला । जया सभाग्याचे ओंठास लागला । तयाचा त्रिताप एकसरा शमला । मोक्ष लागला पायातें ॥१८७॥</p>
<p>
	साईकृपें दीक्षितांला ओंठास लागला । तयाचा त्रिपाप एकसरा शमला । मोक्ष लागला पायातें ॥१८७॥</p>
<p>
	साईकृपें दीक्षितांला । श्रवणासी श्रोता व्हावा झाला । योग भागवतश्रवणाचा आला । उपकार झाला मज तेणें ॥१८८॥</p>
<p>
	जाऊं लगलों दिवसरात्र । त्या कथा पवित्र । भाग्यें उघडलें श्रवणसत्र । पावन श्रोत्र तेणेनी ॥१८९॥</p>
<p>
	असो ऐसी एक रात्र । कथा चालतां परम पवित्र । आडकथा जी घडली विचित्र । श्रोतां तें चरित्र ऐकिजे ॥१९०॥</p>
<p>
	काय करूं एक वानितां । मध्येंच दुसरें स्फुरे चित्ता । जाणोनि तयाची श्रवणार्हता । किमर्थ उपेक्षिता होऊं मी ॥१९१॥</p>
<p>
	चालली सुरस रामायणी कथा । पटली मातेची खूण हनुमंता । तरी कसूं जाई स्वामीची समर्थता । अंती अनर्थता भोगिली ॥१९२॥</p>
<p>
	लागतां रामबाणपिच्छाचा वारा । हनुमंत अंबरीं फिरे गरगरा । प्राण कासावीस घाबरा । पिता ते अवसरा पावला ॥१९३॥</p>
<p>
	ऐकोनि तयाचें हितवचन ।  हनुमंत्र रामासी आला शरण  । होत असतां या भागाचें श्रवण । घडलें विलक्षण तें ऐका ॥१९४॥</p>
<p>
	चित्त कथाश्रवणीं संलग्न । श्रवणानंदीं सकळ मग्न । तों एक वृश्चिक मूर्तविन्घ । कैसें कीं उत्पन्न जाहलें ॥१९५॥</p>
<p>
	नकळे तया ही काय आवडी । नकळत माझिया स्कंधीं उडी । मारिली देऊनि बैसला दही । रससुखाडी चाखीत ॥१९६॥</p>
<p>
	येथेंही बाबांची साक्ष । माझें नव्हतें तिकडे लक्ष । परी जो हरिकथेसी दक्ष । तया संरक्षक हरि स्वयें ॥१९७॥</p>
<p>
	सहज गेली माझी नजर । पाहूं जातां विंचू भयंकर । माझिया दक्षिण स्कंधावर । उपरण्यावर सुस्थिर ॥१९८॥</p>
<p>
	नाहीं चलन ना वलन । स्वस्थचित्त दत्तावधान । श्रोता जणूं श्रवणपरायण । स्वस्थ निजासन निराजित ॥१९९॥</p>
<p>
	उगीच देहस्वभावानुसाअर । नांगीस चाळविता लवभार । तरी बैसाया देता न थार । दु:ख अनिवार वितरिता ॥२००॥</p>
<p>
	रामकथेचा होता रंग । श्रोते वक्ते पोथींत दंग । सकळांचा करिता रसभंग । ऐसा हा कुसंग दुर्धर ॥२०१॥</p>
<p>
	रामकथेचा हाचि महिमा । विन्घांचा तेथें न चले गरिमा । तियें पावावें लागे उपरमा ॥ निजधर्मा विसरूनि ॥२०२॥</p>
<p>
	रामकृपेनें लाधलों बुद्धि । हळूच दूर टाकावी उपाधी । विसंबूं नये तो चंचलधी । परमावधी होई तों ॥२०३॥</p>
<p>
	होतें  जें उपरणें पांघुरलें । हळूच दोंबाजू सांवरिलें । आंत विंचूस द्दढ गुंडिलें । निऊनि पसरिलें बागेंत ॥२०४॥</p>
<p>
	विंचू  जात्याच भयंकर । वेळीं जाईलही जातीवर । भय खरें परी बाबांची आज्ञाही सधर । मारावया कर धजेना ॥२०५॥</p>
<p>
	येथें श्रोतियां सहजी शंका । विंचू घातकी वध्य नव्हे का । डंखितां देईल कां तो सुखा । मारूं नये कां न कळे कीं ॥२०६॥</p>
<p>
	सर्प विंचू विषारई प्राणी । नुपेक्षी तयां कदा कोणी  । बाना काय तयालागोनि । द्यावें सोडूनि म्हणतील ॥२०७॥</p>
<p>
	श्रोतियांची शंका खरी । माझीही होती तीच परी । परी पूर्वील ऐसिया प्रसंगाभीतरीं । परिसा वैखरी बाबांची ॥२०८॥</p>
<p>
	प्रश्न होता याहून बिकट । शिरडींत काकांचे वाडिया प्रकट । एकदां माडीवर खिडकीनिकट । विखार बिकट  आढळला ॥२०९॥</p>
<p>
	चौकटीतळीं छिद्रद्वारें । भीतरीं प्रवेश केला विखारें  । दिपला दीपज्योतिनिकरें । वेटोळें करूनि बैसला ॥२१०॥</p>
<p>
	दीपप्रकाशें जरी दिपला । मनुष्याच्या चाहुले बुजाला । गजबज झाली तैसा चमकला । क्षणैक उगला राहिला ॥२११॥</p>
<p>
	मागें न जाई पुढें न येई । खालींवर करी डोई । मग एकचि उडाली घाई । कैशा उपायीं मारावा ॥२१२॥</p>
<p>
	कोणी बडगा कोणी काठी । घेऊनि आले उठाउठीं । जागा सांकड तयासाठीं । बहुत कष्टी जाहले ॥२१३॥</p>
<p>
	सहज मारिता एक सरपती । आणि उतरता भिंतीतळवटीं । प्रथम गांठिता माझीच वळकटी  । महत्संकटीं टाकिता ॥२१४॥</p>
<p>
	लागला वर्मी तरी तो घाव । चुकतां डंख धरितां अपाव । बत्ती आणूनि लक्षिती ठाव । तंव त्या वाव सांपडला ॥२१५॥</p>
<p>
	त्याची आली नव्हती वेळ । आम्हां सकळांचें दैवही सबळ । होती जरी ती काळ वेळ । केला प्रतिपाळ बाबांनीं ॥२१६॥</p>
<p>
	आल्या मार्गें करूनि त्वरा । निघून गेला तो झरझरा । स्वयें निर्भय निर्भय इतरां । सुख परस्परां वाटलें ॥२१७॥</p>
<p>
	मग मुक्ताराम उठला । म्हणे विचार बरा सुटला । नसता त्या छिद्रद्वारें निसटला । होता मुकला प्राणाला ॥२१८॥</p>
<p>
	मुक्तारामाची दयार्द्र द्दष्टी । पाहोनि झालों मी मनीं कष्टी । काय कामाची दया दुष्टीं । चालेल सृष्टी कैसेनी ॥२१९॥</p>
<p>
	मुक्तारामा ये कदाकाळीं । आम्हीं बसूं तैं सांज - सकाळीं । माझी तों वळकटी खिडकीजवळी । मज ते बोली नावडली ॥२२०॥</p>
<p>
	 </p><p>
	 </p>
<p>
	पूर्वपक्ष त्यानें केला । उत्तरपक्ष म्यां उचलिला । एकचि वाद मातून राहिला । निर्णय ठेला तैसाच ॥२२१॥</p>
<p>
	एक म्हणे सर्प मारावा । क्षण एकही न उपेक्षावा । दुजा म्हणे निरपराघ जीवा । कां दुष्टावा करावा ॥२२२॥</p>
<p>
	एक मुक्तारामाचा धिक्कार । एक माझा पुरस्कार । वाद बळावला परस्पर । अंतपार येईना ॥२२३॥</p>
<p>
	गेले मुक्ताराम खालीं । म्यां आपुली जागा बदलली । छिद्रास एक गुडदी बसविली । वळकटी पसरली निजावया ॥२२४॥</p>
<p>
	डोळे लागले पेंगावया । मंडळी गेली निजावया । मीही देऊं लागलों जांभया । वाद आपसया थांबला ॥२२५॥</p>
<p>
	रात्र सरली उजाडलें । शौच मुखमार्जन आटोपलें । बाबा लेंडीवरून परतले । लोक जमले मशीदीं ॥२२६॥</p>
<p>
	नित्याप्रमाणें प्रात:काळीं । आलों मशिदीस नित्याचे वेळीं । मुक्तारामादि सर्व मंडळी । आली बसली स्वस्थानीं ॥२२७॥</p>
<p>
	कोणी हातावर तमाखू चुरिती । कोणी बाबांची चिलीम भरिती । कोणी तैं हातपाय दाबिती । सेवा ये रीतीं चालली ॥२२८॥</p>
<p>
	बाबा जाणती सकळांच्या वृत्ती । मग ते हळून प्रश्न पुसती । वादावादी ती काय होती । ती गतरातीं वाडयांत ॥२२९॥</p>
<p>
	मग मी जें जें जैसें घडलें । तैसें बाबांस कथिलें । मारावें वा न मारावें पुसिलें । सर्पास वहिलें ये स्थितीं ॥२३०॥</p>
<p>
	बाबांची तों एकचि परी । सर्प विंचू झाले तरी । ईश्वर नांदे सर्वांभीतरीं । प्रेमचि धरी सर्वार्थीं ॥२३१॥</p>
<p>
	ईश्वर जगाचा सूत्रधारी । तयाच्या आज्ञेंत वर्तती सारीं । हो कां विखार विंचू तरी । आज्ञेबाहेरी वर्तेना ॥२३२॥</p>
<p>
	म्हणवूनि प्राणि मात्रांवरी । प्रेम आणि दयाच करीं । सोडीं साह्स धरीं सबूरी । रक्षिता श्रीहरी सकळांतें ॥२३३॥</p>
<p>
	येणेंपरी कितीशा कथा । साईबाबांच्या येतील सांगतां । म्हणवून यांतील सारचि तत्त्वतां । निवडूनि श्रोतां घ्यावें कीं ॥२३४॥</p>
<p>
	पुढील अध्याय याहून गोड । भक्तिश्रद्धेची ती जोड । भक्त दीक्षित प्रसंग अवघड । निघतील बोकड मारावया ॥२३५॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । अपमृत्युनिवारणं नाम द्वाविशोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 13:16:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 14:42:19 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय २१]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-21-122042600034_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीणगेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: । श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
गताध्यायांतीं कथानुसंधान । ठाकूरादिकां महापुरुषदर्शन । कैसें झालें तें करावें श्रवण । एकाग्र मन करोनि ॥१॥
काया ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 21" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/26/full/1650959022-7335.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra chapter 21" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीणगेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: । श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	गताध्यायांतीं कथानुसंधान । ठाकूरादिकां महापुरुषदर्शन । कैसें झालें तें करावें श्रवण । एकाग्र मन करोनि ॥१॥</p>
<p>
	काया तया वक्त्याच्या बोलें । श्रवणीं जें पडतां श्रोता न डोले । अंगींचा रोमांचही न हाले । व्यर्थ गेले ते बोल ॥२॥</p>
<p>
	जया श्रवणीं न श्रोते रिझले । बाष्पगद्नद कंठ न दाटले । नयनीं प्रेमानंदाश्रु न वाहिले । व्यर्थ गेलें तें कथन ॥३॥</p>
<p>
	वाणी बाबांची मनोहारिणी । उपदेशाची अलौकिक सरणी । जयांची प्रतिपदीं अभिनव करणी । मस्तक चरणीं तयांचे ॥४॥</p>
<p>
	न येतां दैव उदयासी । गांठी न पडे साधुसंतांशीं । तो जवळ असतां उशापाशीं । पापराशींस दिसेना ॥५॥</p>
<p>
	या प्रेमयाच्या सिद्धतेसी । नलगे जावें देशीं विदेशीं । मीच माझिया अनुभवासी । श्रोतियांसी कथितों कीं ॥६॥</p>
<p>
	पीर मौलाना नामें प्रसिद्धा । होते वांद्रें शहरीं सिद्धा । हिंदू पारशी परधर्मी प्रबुद्ध । घेती शुद्ध दर्शन तें ॥७॥</p>
<p>
	मी ए शहरचा न्यायाधीश । मुजावर तयांचा नाम इनूस । पाठ पुरविली रात्रंदिवस । यावया दर्शनास तयानें ॥८॥</p>
<p>
	हजारों लोक तेथें यावे । किमर्थ आपण तेथें जावें । भीदेभाडेच्या भरीं भरावें । आंचवावें निज लौकिका ॥९॥</p>
<p>
	ऐसें कांहीं मनीं भावावें । दर्शनास कधींही न जावें । आपणचि आपल्या छायेस भ्यावें । दुर्दैव यावें आडवें ॥१०॥</p>
<p>
	ऐसीं कित्येक वर्षें गेलीं । तेथूनि पुढें बदली झाली । पुढें जेव्हां ती वेळ आली । शिरडी जोडिली अखंड ॥११॥</p>
<p>
	तात्पर्य हा संतसमागम । अभाग्यास ना तेथें रिगम । होतां ईश्वरी कृपा हा सुगम । अन्यथा दुर्गम हा योग ॥१२॥</p>
<p>
	येविषयींची गोड कथा । श्रोतां सादर परिसिजे आतां । या संतांच्या अनादि संस्था । गुह्य व्यवस्था कैशा त्या ॥१३॥</p>
<p>
	यथाकाल - वर्तमान । जया जें जें आवडे स्थान । अवतार घेती कार्याकारण । परी ते अभिन्न परस्पर ॥१४॥</p>
<p>
	देशा - काल - वस्तु भिन्न । परी एकाची जी ऊणखूण । दुजा संत जाणे संपूर्ण । अंतरीं एकपण सकळिकां ॥१५॥</p>
<p>
	जैसीं सार्वभौम राजाचीं ठाणीं । वसविलीं असती ठिकठिकाणीं । तेथ तेथ अधिकारी नेमुनी । अबादानी संपादिती ॥१६॥</p>
<p>
	तैसाच हा स्वानंदसम्राटा । जागोजागीं होऊनि प्रकट । चालवी हा निजराज्यशकट । सूत्रे अप्रकट हालवी ॥१७॥</p>
<p>
	एकदां एक आंग्लविद्याविभूषित । बी. ए. या उपपदानें युक्त । जे हळू हळू मागे क्रमत । झाले नामांकित अधिकारी ॥१८॥</p>
<p>
	मिळाली पुढें मामलत । वाडतां वाढतां झाले प्रांत । तयांसी साईबाबांचा सांगात । सुदैवें प्राप्त जाहला ॥१९॥</p>
<p>
	दिसाया ही मामलत बरी । डोंगरी जैसी दुरुनि साजरी । निकट जातां वेढिली काजरीं । मानें परी ती मोठीच ॥२०॥</p>
<p>
	गेले ते पूर्वील गोड दिवस । जैं होती या अधिकाराची हौस । प्रजाही मानी अधिकारियास । परस्परांस आनंद ॥२१॥</p>
<p>
	पुसूं नये आतांचे हाल । सुखाची नोकरी गेला तो काळ । आतां जबाबदारीचा सुकाळ । ओला दुकाळ पैशाचा ॥२२॥</p>
<p>
	पूर्वील मामलतीचा मान । तैसेंच पूर्वील प्रांतासमान । वैभव आतां ये ना दिसून । नोकरी कसून करतांही ॥२३॥</p>
<p>
	असो तेंही अधिकारसंपादन । अलोट पैका वेंचल्यावांचून । न करितां सतत अभ्यासशीण । इतर कोण करूं शके ॥२४॥</p>
<p>
	आधीं होऊं लागे बी. ए. । मग तो नगदी कारकून होये । महिना पगार तीस रुपये । मार्गें ऐसिये ती गति ॥२५॥</p>
<p>
	यथाकाळ घांटावर जावें । जमीनपाणी काम शिकावें । मोजणीदारांमध्यें रहावें । पास व्हावें परीक्षे ॥२६॥</p>
<p>
	पुढें जेव्हां एकादी असामी । स्वयें जाईल वैकुंठधामीं । करील आपुली जागा रिकामी । पडेल कामीं ती याच्या ॥२७॥</p>
<p>
	आतां असो हें चर्‍हाट । कशास पाहिजे नुसती वटवत । ऐशा एकास साईंची भेट । झाली ती गोष्ट परिसावी ॥२८॥</p>
<p>
	बेळगांवानिकट देख । ग्राम आहे वडगांव नामक । आलें मोजणीदारांचें पथक  । मुक्काम एक तैं केला ॥२९॥</p>
<p>
	गांवीं होते एक सत्पुरुष । गेले तयांचे दर्शनास । चरणांवरी ठेविलें शीस । प्रसाद - आशीष पावले ॥३०॥</p>
<p>
	त्या सत्पुरुषांचे हातांत । होता निश्चळदासकृत । ‘विचारसागर’ नामक ग्रंथ । जो ते वाचीत तैं होते ॥३१॥</p>
<p>
	पुढें कांहीं वेळ जातां । येतों म्हणूनि निघूं लागतां । ते साधू जें वदले उल्हासता । तया गृहस्था तें परिसा ॥३२॥</p>
<p>
	बरें आतां आपण यावें । या ग्रंथाचें अवलोकन करावें । तेणें तुमचे मनोरथ पुरावे । असावें हें लक्षांत ॥३३॥</p>
<p>
	तुम्ही पुढें निजकार्येद्देशें । जा्तां जातां उत्तर दिशे । मार्गांत महाभाग्यवशें । महापुरुषासीं दर्शन ॥३४॥</p>
<p>
	पुढील मार्ग ते दावितील । मनासी निश्चलता ते देतील । तेच मग उपदेशितील । ठसवितील निजबोध ॥३५॥</p>
<p>
	तेथील मग तें कार्य सरलें । जुन्नरास तेथूनि बदलले । नाणेंघाट चढणें आलें । ओढवलें तें संकट ॥३६॥</p>
<p>
	मार्ग तेथील अति बिकट । रेडयावरूनि चढती घाट । रेडा हाच तदर्थ शकट । आणिला निकट आरूढाया ॥३७॥</p>
<p>
	होतील पुढें मोठे अधिकारी । मिळतील घोडे गाडया मोटारी । आज तों घ्या रेडयाची हाजिरी । वेळ साजिरी करा कीं ॥३८॥</p>
<p>
	घाट चढणें अशक्य पायीं । रेडियावीण नाहीं सोई । ऐसी ती नाणेंघाटाची नवलाई । अपूर्वाई वाहनाची ॥३९॥</p>
<p>
	मग तयांनीं केला विचार । पालणिला रेडा केला तयार । तयावरी चढविलें खोगीर । कष्टें स्वार जाहले ॥४०॥</p>
<p>
	स्वार खरे पण होती चढण । रेडियासारिखें अपूर्व वाहन । झोंके हिसके खातां जाण । भरली कणकण पाठींत ॥४१॥</p>
<p>
	असो पुढें हा प्रवास सरला । जुन्नराचा कार्यक्रम पुरला । मग बदलीचा हुकूम झाला । मुक्काम हालला तेथूनि ॥४२॥</p>
<p>
	कल्याणास झाली बदली । चांदोरकरांची गांठ पडली । साईनाथांची कीर्ति ऐकिली । बुद्धि उदेली दर्शनाची ॥४३॥</p>
<p>
	दुसरे दिवशीं आली बारी । झाली चांदोरकरांची तयारी । म्हणती चला हो बरोबरी । करूं वारी शिरडीची ॥४४॥</p>
<p>
	घेऊं बाबांचें दर्शन । करूं उभयतां तयांसी नमन । राहूं तेथें एक दो दिन । येऊं परतोन कल्याणा ॥४५॥</p>
<p>
	परी तेच दिनीं ठाणें शहरांत । दिवाणीचे अदालतींत । मुकदमा - सुनावणी निर्णीत । त्यागिली सोबत तदर्थ ॥४६॥</p>
<p>
	नानासाहेब आग्रह करीत । चला हो आहेत बाबा समर्थ । पुरवितील तुमचा दर्शनार्थ  । किंपदार्थ्तो मुकदमा ॥४७॥</p>
<p>
	परी हें कैंचें तयांस पटे । तारीख चुकवितां भय वाटे । चुकतील केवीं हेलपट्टे । भालपट्टीं लिहिलेले ॥४८॥</p>
<p>
	नानासाहेब चांदोरकरें । कथिलीं पूर्वील प्रत्यंतरें । दर्शनकाम धरितां अंतरें । विन्घ तें सरे बाजुला ॥४९॥</p>
<p>
	परी येईना विश्वास जीवा । करितील काय निजस्वभावा । म्हणती आधीं घोर चुकवावा । निकाल लावावा दाव्याचा ॥५०॥</p>
<p>
	असो मग ते ठाण्यास गेले । चांदोरकर शिरडीस निघाले । दर्शन घेऊनि परत फिरले । नवल वर्तलें इकडे पैं ॥५१॥</p>
<p>
	वेळीं जरी हे हजर राहिले । दाव्याचें काम पुढें नेमिलें । चांदोरकरही हातचे गेले । खजील अंतरीं ॥५२॥</p>
<p>
	विश्वास ठेवितों बरें होतें । चांदोरकर सवें नेते । दर्शनाचें कार्य उरकतें । स्वस्थचित्तें शिरडींत ॥५३॥</p>
<p>
	दाव्यापरी दावा राहिला । साधुसमागमही अंतरला । उठाउठी निश्चय केला । जावयाला शिरडीस ॥५४॥</p>
<p>
	न जाणों मी शिरडीस जातां । समयीं नानांची भेट होतां । स्वयें निरवितील साईनाथा । आनंद चित्ता होईल ॥५५॥</p>
<p>
	शिरडीस नाहीं कोणी परिचित । तेथ मी सर्वथैव अपरिचित । नाना भेटतां होईल उचित । जरी व्कचित योग तो ॥५६॥</p>
<p>
	ऐसे विचार करीत करीत । बैसले ते अग्निरथांत । दुसरे दिवशीं पावले शिरडींत । नाना तैं अर्थात्‌ नाहींत ॥५७॥</p>
<p>
	हे जे दिनीं यावया निघाले । नाना ते दिनीं जावया गेले । तेणें हे बहु हताश झाले । अति हिरमुसले मनांत ॥५८॥</p>
<p>
	असो मग तयांस तेथें भेटले । तयांचे दुसरे स्नेही भले । तयांनीं साईंचें दर्शन करविलें । हेतु पुरविले मनाचे ॥५९॥</p>
<p>
	दर्शनें पायीं जडलें चित्त । घातला साष्टांग दंडवत । शरीर झालें पुलकांकित । नयनीं स्रवत प्रेमाश्रु ॥६०॥</p>
<p>
	मग ते होतां क्षणैक स्थित । काय तयांसी बाबा वदत । त्रिकालज्ञ मुख करोनि सम्सित । सावचित्त तें परिसा ॥६१॥</p>
<p>
	“कानडी आप्पाचें तें सांगणें । जैसें रेडिया संगें घाट चढणें । ऐसें न येथील सोपें चालणें । अंग झिजविणें अनिवार्य” ॥६२॥</p>
<p>
	कर्णीं पडतां खुणेचीं अक्षरें । अंतरंग अधिकचि गहिंवरे । पूर्वील सत्पुरुषवचन खरें । प्रत्यंतरें ठरलें कीं ॥६३॥</p>
<p>
	मग जोडूनियां उभय हस्तां । साईपदीं ठेविला माथा । म्हणती कृपा करा साईनाथा । मज अनाथा पदरीं घ्या ॥६४॥</p>
<p>
	आपणचि माझे महापुरुष । निश्चळदासग्रंथोपदेश । आज मज कळला अशेष । निर्विशेष सुखबोध ॥६५॥</p>
<p>
	कुठें वडगांव कुठें शिरडी । काय ही सत्पुरुष - महापुरुषजोडी । किती ती स्वल्पाक्षरभाषा उघडी । उपदेश - निरवडी कैसी हे ॥६६॥</p>
<p>
	एक म्हणती ग्रंथ वाचा । पुढें संगम महापुरुषाचा । मग ते पुढील कर्तव्याचा । उपदेश साचा करतील ॥६७॥</p>
<p>
	देवयोगें तेही भेटले । तेच ते हे खुणांहीं पटविलें । परी तें एकाचें वाचिलें । दुजिया आचरिलें पाहिजे ॥६८॥</p>
<p>
	तयांसी म्हणती साईनाथ । “अप्पांनीं सांगितलें तें यथार्थ । परी जेव्हां तें येईल कृतींत । पूर्ण मनोरथ तैं होती” ॥६९॥</p>
<p>
	निश्चलदास - विचारसागर । वडगांवीं भक्तार्थ झाला उच्चार । काळें ग्रंथपाराणानंतर । शिरडींत आचार कथियेला ॥७०॥</p>
<p>
	ग्रंथ करावा आधीं श्रवण । त्याचेंच मग करावें मनन । होतां पारायणावर्तन । निदिध्यासन होतसे ॥७१॥</p>
<p>
	वाचिलें तें नाहीं संपलें । पाहिजे तें कृतींत उतरलें । या उपडया घडयावर तोय ओतलें । तैसें जाहलें तें सकळ ॥७२॥</p>
<p>
	व्यर्थ व्यर्थ ग्रंथवाचन । हातीं न ये जों अनुभवज्ञान । ब्रम्हासंपन्न गुरुकृपेवीण । पुस्तकी ज्ञान निष्फळ ॥७३॥</p>
<p>
	ये अर्थींची अल्प कथा । दावील भक्तीची यथार्थता । पुरुषार्थाची अत्यावश्यकता । श्रोतां निजस्वार्था परिसिजे ॥७४॥</p>
<p>
	एकदां एक पुण्यपट्टणकर । नामें अनंतराव पाटणकर । साईदर्शनीं उपजला आदर । आले सत्वर शिर्डीस ॥७५॥</p>
<p>
	वेदान्त श्रवण जाहला सकळ । सटीक उपनिषदें वाचिलीं समूळ । परी तन्मानस अक्षयीं चंचळ । राहीना तळमळ तयांची ॥७६॥</p>
<p>
	घेतां साईसमर्थांचें दर्शन । निवाले पाटणकरांचे नयन । करुनि पायांचें अभिवंदन । यथोक्त पूजन संपादिलें ॥७७॥</p>
<p>
	मग होऊनि बद्धांजुळी । बैसूनि सन्मुख बाबांचे जवळी । अनंतराव प्रेमसमेळीं । करुणाबहाळीं पुसत कीं ॥७८॥</p>
<p>
	केलें विविध ग्रंथावलोकन । वेदवेदांग - उपनिषदध्ययन ॥ केलें सच्छास्त्र - पुराणश्रवण । परी हें निर्विण्ण मन कैसें ॥७९॥</p>
<p>
	वाचिलें तें व्यर्थ गेलें । ऐसेंच आतां वाटूं लागलें । अक्षरहीन भावार्थी भले । वाटती चांगले मजहून ॥८०॥</p>
<p>
	वायां गेलें ग्रंथावलोकन । वायां शास्त्रपरिसीलन । व्यर्थ हें सकळ पुस्तकी ज्ञान । अस्वस्थ मन हें जोंवरी ॥८१॥</p>
<p>
	काय ती फोल शास्त्रव्युत्पत्ती । किमर्थ महा - वाक्यानुवृत्ती । जेणें न लाधे चित्तास शांति । ब्रम्हासंवित्ति काशाची ॥८२॥</p>
<p>
	कर्णोपकर्णीं परिसिली वार्ता । साईदर्शनें निवारे चिंता । विनोद गोष्टी वार्ता करितां । सहज सत्पथा लाविती ते ॥८३॥</p>
<p>
	म्हणवून महाराज तपोराशी । पातलों आपुल्या पायांपासीं । येईल स्थैर्य माझिया मनासी । आशीर्वचनासी द्या ऐशा ॥८४॥</p>
<p>
	तंव महाराज झाले कथिते । एका विनोदपर आख्यायिकेतें । जेणें अनंतराव समाधानातें । पावले साफल्यते ज्ञानाच्या ॥८५॥</p>
<p>
	ती अल्पाक्षर परमसार । कथा कथितों व्हा श्रवणतत्पर । विनोद परी तो बोधपर । कोण अनादर करील ॥८६॥</p>
<p>
	बाबा देत प्रत्युत्तर । “एकदां एक आला सौदागर । तेव्हां एक घोडें समोर । घाली लेंडर नवांचें ॥८७॥</p>
<p>
	सौदागर निजकार्यतत्पर । लेंडिया पडतां पसरिला पदर । बांधून घेतां घट्ट्त्या समग्र । चित्तैकाग्र्य लाधला” ॥८८॥</p>
<p>
	हें काय वदले साईसमर्थ । काय असावा कीं मथितार्थ । लेंडिया संग्रही सौदागर किमर्थ । कांहींही अर्थ कळेना ॥८९॥</p>
<p>
	ऐसा विचार करीत करीत । अनंतराव माघारा येत । कथिलें संभाषण इत्थंभूत । केळकरांप्रत तयानें ॥९०॥</p>
<p>
	म्हणती सौदागर तो कोण । लेंडियांचें काय प्रयोजन । नवांचेंच काय कारण । सांगा उलगडून हें मजला ॥९१॥</p>
<p>
	दादा हें काय आहे कोडें । मी अल्पबुद्धी मज तें नुलगडे । होईल बाबांचे ह्रदय उघडें । ऐसें रोकडें मज कथा ॥९२॥</p>
<p>
	दादा वदती मजही न कळे । ऐसेंच बाबांचें भाषण सगळें । परी तयांच्याच स्फूर्तीच्या बळें । कथितों आकळे जें मज ॥९३॥</p>
<p>
	कृपा ईश्वरी तें हें घोडें । हें तों नवविधा भक्तीचें कोडें । विनाभक्ति न परमेश्वर जोडे । ज्ञाना न आतुडे एकल्या ॥९४॥</p>
<p>
	श्रवण - कीर्तन - विष्णुस्मरण । चरणसेवन-अर्चन - वंदन । दास्य - सख्य - आत्मनिवेदन । भक्ति हे जाण नवविधा ॥९५॥</p>
<p>
	पूर्ण भाव ठेवूनि अंतरीं । यांतून एकही घडाली जरी । भावाचा भुकेला श्रीहरी । प्रकटेल घरींच भक्ताच्या ॥९६॥</p>
<p>
	जपतपव्रत योगसाधन । वेदोपनिषद - परिशीलन । उदंड अध्यात्मज्ञान - निरूपण । भक्तिविहीन तें फोल ॥९७॥</p>
<p>
	नको वेदशास्त्रव्युत्पत्ती । नको ज्ञानी हे दिगंतकीर्ति । नको शुष्कभजनप्रीती । प्रेमळ भक्ति पाहिजे ॥९८॥</p>
<p>
	स्वयें आपणा सौदागर समजा । सौद्याच्या या भावार्था उमजा । फडकतां श्रवणादि भक्तीची ध्वजा । ज्ञानराजा उल्हासे ॥९९॥</p>
<p>
	घोडयानें घातल्या लेंडया नऊ । सौदागर आतुरते धांवत घेऊं । तैसाच नवविधा भक्तिभावु । धरितां विसांवु मनातें ॥१००॥</p>
<p>
	तेणेंच मनास येईल स्थैर्य । सर्वांठायीं सद्भाव गांभीर्य । त्यावीण चांचल्य हें अनिवार्य । कथिती गुरुवर्य सप्रेम ॥१०१॥</p>
<p>
	दुसरे दिवशीं अनंतराय । वंदूं जातां साईंचे पाय । “पदरीं बांधिल्यास लेंडया काय” पृच्छा ही होय तयांस ॥१०२॥</p>
<p>
	अनंतराव तेव्हां प्रार्थिती । कृपा असावी दीनावरती । सहज मग त्या बांधिल्या जाती । काय ती महती तयांची ॥१०३॥</p>
<p>
	तंव बाबा आशीर्वाद देती । ‘कल्याण होईल’ आश्वासिती । अनंतराव आनंदले चित्तीं । सुखसंवित्ति लाधले ॥१०४॥</p>
<p>
	आतां आणीक अल्पकथा । श्रोतां परिसिजे सादरचित्ता । कळेल बाबांची अंतर्ज्ञानिता । सन्मार्गप्रवर्तकता तैसीच ॥१०५॥</p>
<p>
	एकदां एक वकील आले । येतांक्षणींच मशिदी गेले । साईनाथांचें दर्शन घेतलें । पाय वंदिले तयांचे ॥१०६॥</p>
<p>
	सवेंच मग देऊणा । बैसले बाजूस वकील तत्क्षणा । तेथें चालल्या साई - संभांषणा । आदर श्रवणा उपजला ॥१०७॥</p>
<p>
	बाबा तंव तिकडे मुख फिरविती । वकीलांस अनुलक्षून वदती । बोल ते वर्मीं जाऊन खोंचती । वकील पावती अनुताप ॥१०८॥</p>
<p>
	“लोक तरी हो लबाड किती । पायां पडती दक्षिणाही अर्पिती । आणीक आंतून शिव्याही देती । काय चमत्कृती सांगावी” ॥१०९॥</p>
<p>
	ऐकून हें वकील स्वस्थ राहिले । कीं ते निजांतरीं पूर्ण उमजले । उद्नार अन्वर्थ हें तयां पटलें । तात्पर्य ठसलें मनासी ॥११०॥</p>
<p>
	पुढें जेव्हां ते वाडयांत गेले । दीक्षितांलागीं कथिते झाले । कीं जें बाबा लावूनि बोलले । सार्थचि वहिलें तें सर्व ॥१११॥</p>
<p>
	येतांच मजवर झाडिला ताशेरा । तो मज केवळ दिधला इशारा । कुणाची थट्टानिंदादि प्रकारा । देईं न थारा अंतरीं ॥११२॥</p>
<p>
	शरीरप्रकृति होऊनि अस्वस्थ । मुन्सफ आमुचे जाहले त्रस्त । राहिले रजेवर येथें स्वस्थ । आपुली प्रकृती सुधरावया ॥११३॥</p>
<p>
	वकीलांच्या खोलींत असतां । मुन्सफांसंबंधें निघाल्या वार्ता । अर्थोअर्थीं संबंध नसतां । ऊहापोहता चालली ॥११४॥</p>
<p>
	औषधावीण या शरीरापदा । टळतील का लागतां साईंच्या नादा । पावले जे मुन्सफीचे पदा । तयां हा धंदा साजे कां ॥११५॥</p>
<p>
	ऐसी तयांची निंदा चालतां । चालली साईंची उपहासता । मीही तयांतचि होतों अंशता । तिची अनुचितता दर्शविली ॥११६॥</p>
<p>
	ताशेरा नव्हे हा अनुग्रह । व्यर्थ कुणाचा ऊहापोह । उपहास - निंदादि कुत्सित संग्रह । असत्परिग्रह वर्जावा ॥११७॥</p>
<p>
	आणीक एक हें प्रत्यंतर । असतां शंभर कोसाचें अंतर । साई जाणें सर्वाभ्यंतर । खरे अंतर्ज्ञानी ते ॥११८॥</p>
<p>
	आणिक एक झाला निवाड । असोत मध्यें पर्वत पहाड । कांहीं न साईंच्या द्दष्टीआड । गुप्तही उघड त्यां सर्व ॥११९॥</p>
<p>
	असो पुढें तेव्हांपासुनी । केला निश्चय वकीलांनीं । अत:पर निंदा - दुरुक्तिवचनीं । खडा कानीं लाविला ॥१२०॥</p>
<p>
	आपण कांहींही कुठेंही करितां । येई न साईंची द्दष्टी चुकवितां । येविषयीं जाहली निश्चितता । असत्कार्यार्थता विराली ॥१२१॥</p>
<p>
	उदेली सत्कार्य - जागरूकता । मागें पुढें साईसन्निधता । समर्थ कोण तया वंचिता । निर्धार चित्ता हा ठासला ॥१२२॥</p>
<p>
	पाहूं जातां या कथेसी । संबंध जरी त्या वकीलासी । तरी ती सर्वार्थी आणि सर्वांसीं । बोधक सर्वांसी सारिखी ॥१२३॥</p>
<p>
	वकील वक्ते श्रोते समग्र । आणिक साईंचे भक्त इतर । तयांचाही ऐसाच निर्धार । व्हावा मी साचार प्रार्थितों ॥१२४॥</p>
<p>
	साईकृपामेघ वर्षतां । होईल आपणां सर्वांची तृप्तता । ये अर्थीं कांहीं नाहीं नवलता । सकळां तृषार्तां निववील ॥१२५॥</p>
<p>
	अगाध साईनाथांचा महिमा । अगाध तयांच्या कथा परमा । अगाध साईचरित्राची सीमा । मूर्त परब्रम्हावतार ॥१२६॥</p>
<p>
	आतां पुढील अध्यायीं कथा । परिसावी सादर श्रद्धाळू श्रोतां । पुरवील तुमच्या मनोरथा । देईल चित्ता स्थैर्यता ॥१२७॥</p>
<p>
	भक्तांची भावी संकटावस्था । ठाऊक आधींच साईसमर्था । थट्टामस्करी विनोद वार्ता । हंसतां खेळतां टाळिती ॥१२८॥</p>
<p>
	भक्तहेमाड साईंस शरण । जाहलें हें कथानक संपूर्ण । पुढील कथेचें अनुसंधान । संकटनिवारण भक्तांचें ॥१२९॥</p>
<p>
	कैसे साई कृपासागर । भक्तांचीं भावी संकटें दुर्धर । आधीं जाणूनि करिती परिहार । इशारा वेळेवर देउनी ॥१३०॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । अनुग्रहकरणंनाम एकविंशोऽध्याय: संपूर्ण" ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 Apr 2022 13:12:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 14:40:35 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय २०]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-20-122042300061_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीणगेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: । श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
ॐ नमो जी गुरु मानससरा । प्रसादवाक्यमुक्ताकरा । अनन्यभक्त - मराळनिकरा । चरणीं थारा तुजपाशीं ॥१॥
सदाश्रया महा उदारा ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 20" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/23/full/1650710123-537.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra adhyay 20" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीणगेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: । श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	ॐ नमो जी गुरु मानससरा । प्रसादवाक्यमुक्ताकरा । अनन्यभक्त - मराळनिकरा । चरणीं थारा तुजपाशीं ॥१॥</p>
<p>
	सदाश्रया महा उदारा । घालूनि प्रसाद मुक्तचारा । देऊनि निजविश्रांति आसरा । येरझारा चुकविसी ॥२॥</p>
<p>
	काय तो साई सिद्धाश्रम । दर्शनें निवे संसारश्रम । निकटवर्ती भवभ्रम । दवडी अविश्रम सहवासें ॥३॥</p>
<p>
	साई मूळ निराकार । भक्तकाजालागीं साकार । करोनि मायानटीचा स्वीकार । खेळला साचार नट जैसा ॥४॥</p>
<p>
	ऐसिया साईस आणूं ध्यानीं । क्षणभर जाऊं शिरडीस्थानीं । दोनप्रहरच्या आरतीमागुनी । लक्ष लावूनि पाहूंया ॥५॥</p>
<p>
	माध्यान्हीं आरतीपाठीं । येऊनि मशिदीच्या कांठीं । महाराज अति कृपाद्दष्टीं । उदी वांटीत भक्ताम्स ॥६॥</p>
<p>
	भक्तही प्रेमळ उठाउठी । घालीत समचरणीं मिठी । उभ्यानें मुख न्याहाळितां द्दष्टी । भोगीत वृष्टि उदीची ॥७॥</p>
<p>
	बाबाही भरभरोनि मुष्टी । घालीत भक्तांच्या करसंपुटीं । अंगुष्ठें लावीत तयांच्या ललाटीं । प्रेम पोटीं अनिवार ॥८॥</p>
<p>
	“जा भाऊ जा जेवावयास । जा अण्णा जा तूं खा सुग्रास । जा अवघे जा निजस्थानास” । प्रत्येकास वदत ते ॥९॥</p>
<p>
	आतां जरी तें पाहूं न मिळे । परी ते सर्व गतसोहळे । शिरडीस त्या त्या स्थानीं त्या त्या वेळे । द्दढ ध्यानबळें दिसतात ॥१०॥</p>
<p>
	असो ऐसें करूनि ध्यान । अंगुष्ठापासूनि मुखावलोकन । प्रेमें घालूनि लोटांगण । कथानुसंधान चालवूं ॥११॥</p>
<p>
	गताध्यायाचिया अंतीं । कथिलें हेतें श्रोतयांप्रती । कीं बाबांहीं मोलकरिणीहातीं । अर्थ श्रुतीचा उकलविला ॥१२॥</p>
<p>
	ईशावास्य - भावार्थबोधिनी । आरंभिली होती गणुदासांनीं । आशंका उपजतांच सद्नुरुचरणीं । घातली नेऊनि शिर्डीस ॥१३॥</p>
<p>
	बाबा तैं वदले जें वचन । तुझ्या या शंकेचें निवारण । करील काकांच्या घरची मोलकरीण । जाशील परतोन ते समयीं ॥१४॥</p>
<p>
	तेंच कीं सांप्रत कथानुसंधान । आतां येथूनि चालवूं आपण । श्रोतीं होइजे दत्तावधान । होईल श्रवण अविकळ ॥१५॥</p>
<p>
	संस्कृत भाषानभिज्ञार्थ । ईशावास्योपनिषदर्थ । ओंवींद्वारा पदपदार्थ । संकलितार्थ विवरावा ॥१६॥</p>
<p>
	ऐसी आस्था धरोनि मनीं । ईशावास्य - भावार्थबोधिनी । प्राकृत भाषा सुगम साधनीं । गणुदासांनीं आरंभिली ॥१७॥</p>
<p>
	गूढार्थप्रचुर हें उपनिषद । भाषांतर झालें पदप्रपद । विना अंतर्गत रहस्यबोध । होई न आनंद मनातें ॥१८॥</p>
<p>
	चहूं वेदांचें जें सार । तेंच उपनिषदांचें भांडार । हरिगुरुकृपा नसलियावर । अति दुस्तर गांठावया ॥१९॥</p>
<p>
	म्हणेल कोणी मी सज्ञान । आपुल्या मतें करोनि यत्न । करीन उपनिषदांचें आकलन । प्रतिपादन यथार्थ ॥२०॥</p>
<p>
	तरी तें कल्पांतींही न घडे । हें तों गुरुकृपा नसतां सांकडें । गुप्तप्रमेय हातीं न चढे । मार्गीं अवघडे पदोपदीं ॥२१॥</p>
<p>
	तेंच जो गुरुपदीं जडे । तया नाहीं अणुमात्र सांकडें । तयाचिया द्दष्टीपुढें । आपेंआप उघडे गूधर्थ ॥२२॥</p>
<p>
	आत्मज्ञानाचें हें शास्त्र । जन्ममरणोच्छेदक शस्त्र । जे निरभिमान नि:संगमात्र । तेच सत्पात्र विवेचना ॥२३॥</p>
<p>
	ऐसियांची कांस धरितां । क्षणांत उपजे अर्थबोधकता । बुद्धीची जाई प्रतिबद्धकता । होय विशदता गूढार्थीं ॥२४॥</p>
<p>
	ईशावास्य प्राकृतीं आणीतां । दासगणूंची हेच अवस्था । परी साईनाथें कृपा करितां । तद्दुर्गमता विराली ॥२५॥</p>
<p>
	गीर्वाणभाषेचें अल्पज्ञान । तत्रापि आचार्य विद्यारण्य । वंदूनि साईबाबांचे चरण  ओंवीलेखन आदरिलें ॥२६॥</p>
<p>
	गणुदास - वाणी दुग्धधारा । प्रसाद साईंचा तयांत शर्करा । तेथील माधुर्यपरंपरा । क्षणैक आदरा जी श्रोते ॥२७॥</p>
<p>
	असो हें बोधिनी - दिग्दर्शन । ह्रद्नतार्था करा मूलावलोकन  । या मत्कथेचें अनुसंधान । आहे कीं आन अवधारा ॥२८॥</p>
<p>
	निजभक्त करितां ग्रंथावलोकन । आढळे जधीं दुर्बोध वचन । महाराज करिती समाधान । वोलल्यावीण कैसें पां ॥२९॥</p>
<p>
	हाच या कथेचा हेत । श्रोतयां व्हावा तात्पर्यैं विदित । इतुकेंचि माझें मनोगत । दत्तचित्त परिसा जी ॥३०॥</p>
<p>
	ओंवीबद्ध टीका केली । विद्वज्जनांसी मान्य झाली । गणुदासांची मनीषा फिटली । आशंका राहिली पैं एक ॥३१॥</p>
<p>
	मांडिली ती पंडितांसमोर । ऊहापोह केला थोर । परी होईना समाधानपर । शंका निर्धार कोणाही ॥३२॥</p>
<p>
	इतुक्यांत शिरडीस कांहीं कारणें । दासगणूंचें घडलें जाणें । आशंकेचें निवारण होणें । सहजपणें झालें कीं ॥३३॥</p>
<p>
	घेऊं गेले साईंचें दर्शन  । मस्तकीं धरिले श्रींचे चरण । करूनियां साष्टांग वंदन । सुखसंपन्न जाहले ॥३४॥</p>
<p>
	संतकृपेचें अवलोकन । संतमुखींचें मधुरवचन । संतांचें तें सुहास्य वदन । कृतकल्याण भक्तगण ॥३५॥</p>
<p>
	केवळ संतांचें दर्शन । करी सकल दोषांचें क्षालन । जयांसी त्यांचें नित्य सन्निधान । काय तें पुण्य वर्णावें ॥३६॥</p>
<p>
	कां गणू कोठूनि आगमन । पुसती बाबा वर्तमान । कुशल आहे ना समाधान । चित्त प्रसन्न सर्वदा ॥३७॥</p>
<p>
	गणुदास देती प्रत्युत्तर । असतां आपुलें कृपाछत्र । किमर्थ व्हावें म्यां खिन्नांतर । आनंदनिर्भर असें मी ॥३८॥</p>
<p>
	आपणही हें सर्व जाणतां । लोकोपचारार्थ प्रश्न करितां । मीही जाणूनि आहें चित्ता । कुशलवृत्ता का पुसतां ॥३९॥</p>
<p>
	स्वयें मजकरवीं आरंभ करवितां । पुढें तो रंगारूपास येतां । मध्येंच ऐसी मेख मारितां । कोणाही उकलितां उकलेना ॥४०॥</p>
<p>
	ऐसें परस्पर चाललें भाषण । करीत गणुदास पादसंवाहन । ईशावास्य - भावार्थबोधन । संबोधें प्रश्न पूसिला ॥४१॥</p>
<p>
	ईशावास्य - भावार्थबोधिनी । लिहूं जातां अडखळे लेखणी । शंका कुशंका राहती मनीं । बाबा त्या उकलूनि सांगाव्या ॥४२॥</p>
<p>
	साद्यंत घडला जो जो प्रकार । केला बाबांच्या पायीं सादर । आशंका ही दुर्निवार । मांडिली समोर बाबांच्या ॥४३॥</p>
<p>
	गणुदास विनवी साईनाथा । माझे ग्रंथपरिश्रम वृथा । ही या ईशावास्याची कथा । आपण सर्वथा जाणतां ॥४४॥</p>
<p>
	आशंका दूर झाल्याविना । ग्रंथाचा या उकल पडेना । महाराज देती आशीर्वचना । प्रसन्नमना असें तूं ॥४५॥</p>
<p>
	“काय रे यांत आहे कठिण । जातां आलिया स्थळीं परतोन । त्या काकांची मोलकरीण । शंका निवारण करील कीं” ॥४६॥</p>
<p>
	काका ते भाऊसाहेब दीक्षित । बाबांचे एक प्रेमळ भक्त । कायावाचामनें सतत । गुरुसेवानिरत सर्वदा ॥४७॥</p>
<p>
	प्रख्यात मुंबापुरी नगरी । तेथूनि अल्प अंतरावरी । पारलें नाम ग्रामाभीतरीं । राहती हरिभाऊ हे ॥४८॥</p>
<p>
	खरें नांव तयांचें हरी । आईबापें ठेविलें घरीं । जन म्हणती भाऊसाहेब जरी । बाबांचें परी तिसरेंच ॥४९॥</p>
<p>
	महाजनीस बडे काका । निमोणकरां म्हातारे काका । भाऊसाहेबांस लंगडे काका । बंब्या काकाही म्हणती ते ॥५०॥</p>
<p>
	आईबापें ठेविती एक । राशीचें तें असतें आणिक । टोपण नांवेंही मारिती हांक । रीती ही अनेकपरीची ॥५१॥</p>
<p>
	महाराज ठेवितां नामें निराळीं । तींच मग चालती वेळोवेळीं । जाणों तीच मग बिरुदावळी । प्रेमसमेळीं धरिजेती ॥५२॥</p>
<p>
	कधीं भिक्षु कधीं काका । बाबांनीं पाडिला हाचि शिक्का । त्याच नामें शिरडींत लोकां । प्रसिद्ध काका जाहले ॥५३॥</p>
<p>
	आश्चर्य वाटलें गणुदासा । आश्चर्य सकळांचे मानसा । काय काकांची मोलकरीण ऐसा । उलगडा कैसा करणार ॥५४॥</p>
<p>
	मोलकरीण ती मोलकरीण । काय तिचें असावें शिक्षण । ती काय ऐसी विचक्षण । वाटे विलक्षण हें सारें ॥५५॥</p>
<p>
	कोठें श्रुतीची अर्थव्युत्पत्ति । कोठें मोलकरणीची मति । महाराज ही तों थट्टा करिती । जन वदती एणेंपरी ॥५६॥</p>
<p>
	महाराज केवळ विनोद करिती । ऐसेंच वाटलें सर्वां चित्तीं । परी बाबांच्या विनोदोक्ति । सत्यचि गमती गणुदासा ॥५७॥</p>
<p>
	परिसूनि त्या साईंच्या बोला । साई बोलले अवलीला । सकृद्दर्शनीं वाटलें जनाला । दासगणूला तें सत्य ॥५८॥</p>
<p>
	साई बोलले अवलीला । परी बोलामाजील लीला । सदा सर्वदा पहावयाला । आतुर झाला जनलोक ॥५९॥</p>
<p>
	असो वा नसो विनोद वाणी । कदा न ती होणें निष्कारणी । बाबांच्या एकेका अक्षरागणीं । असती खाणी अर्थाच्या ॥६०॥</p>
<p>
	बाबा जें जें वाचे वदत । बोल नव्हत तें ब्रम्हालिखित । एकही अक्षर न होई व्यर्थ । साधील कार्यार्थ वेळेवर ॥६१॥</p>
<p>
	ही द्दढ भावना दासगणूची । असो कैसीही ती इतरांची । निष्ठा जेथें जैसी जयाची । फळ तयासी तैसेंच ॥६२॥</p>
<p>
	जैसी भावना तैसें फळ । जैसा विश्वास तैसें बळ । अंत:करण जैसें प्रेमळ । बोधही निर्मळ तैसाच ॥६३॥</p>
<p>
	ज्ञानियांचा शिरोमणी । मिथ्या नव्हे तयाची वाणी । निजमक्ताची पुरवावी मागणी । ब्रीद हें चरणीं बांधिलें ॥६४॥</p>
<p>
	गुरुवचन नव्हे अन्यथा । मन लावूनि परिसा ही कथा । हरेल सकळ भवव्यथा । साधनपंथा लागाल ॥६५॥</p>
<p>
	परतले गणुदास पारले ग्रामीं । काकासाहेब दीक्षितधामीं । उत्कंठा काकांची मोलकरीण कामीं । पडते कैसी मी पाहीन ॥६६॥</p>
<p>
	दुसरे दिवशीम प्रथम प्रहरीं । गणुदास असतां शेजेवरी । साखरझोंपेच्या आनंदाभीतरीं । तैं नवलपरी वर्तली ॥६७॥</p>
<p>
	कोणी एक कुणब्याची पोरी । गात होती मंजुळ स्वरीं । खोंचली ती सुंदर लकेरी । जिव्हारीं गणुदासांच्या ॥६८॥</p>
<p>
	दीर्घ आलापयुक्ता तें गान । जयांत मंजुळ पदबंधन । परिसोनि तल्लीन झालें मन । लक्ष देऊन ऐकती ॥६९॥</p>
<p>
	खडबडूनि जागे झाले । गीतार्थबोधनीं लक्ष वेधलें । सावचित्तचि ऐकत राहिले । प्रसन्न झाले अभ्यंतरीं ॥७०॥</p>
<p>
	म्हणती ही आहे कोणाची पोर । गातसे गंभीर आणि सुस्वर । ईशावास्याचें तें कोडें थोर । उकलिलें पार की इनें ॥७१॥</p>
<p>
	असो हीच ती मोलकरीण । पाहूं तरी आहे कोण । जिच्या असंस्कृत वाणीमधून । श्रुत्यर्थखूण पटविली ॥७२॥</p>
<p>
	बाहेर जाऊनि जों पाहती । खरेंच कुणब्याची पोर होती । ती काकांच्या मोरीवरती । घाशीत होती बासनें ॥७३॥</p>
<p>
	शोधांतीं कळली नवलपरी । होता तेव्हां दीक्षितांचे घरीं । नाम्या गडी तयांचे चाकरी । बहीण ही पोरी तयाची ॥७४॥</p>
<p>
	हीच ती काकांची मोलकरीण । गीतें या झालें शंकानिवारण । रेडयामुखीं वेदगायन । संतीं काय न केलें जी ॥७५॥</p>
<p>
	ऐसें तें पोरीचें गायन । झालें दासगणूंचें समाधान । बाबांच्या थट्टेचेंही महिमान । आलें कीं कळून सकळांतें ॥७६॥</p>
<p>
	कोणी म्हणती गणुदास । बैसले होते देवपूजेस । काकांचे येथें देवघरास । तदा या गीतास परिसिलें ॥७७॥</p>
<p>
	असो तें जैसें असेल तैसें । तात्पर्यार्थ एकचि असे । महाराज निजभक्तां शिकविती कैसें । अनेक मिसें अवलोका ॥७८॥</p>
<p>
	“ठाईच बैसोनि मजला पुसा । उगीच कां रानोमाळ गिंवसा । पुरवितों मी तुमचा धिंवसा । एवढा भरंवसा राखावा ॥७९॥</p>
<p>
	असें मी भरलें सर्वांठायीं । मजवीण रिता ठाव नाहीं । कुठेंही कसाही प्रकटें पाहीं । भावापायीं भक्तांच्या” ॥८०॥</p>
<p>
	असो ती आठा वरसांची पोर । कांसेस एक फाटकें फटकूर । परी नारिंगी साडीचा  बडिवार । गाई ती सुस्वर गीतांत ॥८१॥</p>
<p>
	“काय त्या साडीचा भरजर । काय त्या साडीचा कांठ सुंदर । काय मौजेचा तिचा पदर” । यांतचि ती चूर गातांना ॥८२॥</p>
<p>
	खायाला मिळेना पोटभर । चिंधी न वेढाया बोटभर । परी कोणाच्या नारिंगी साडीवर । हर्षनिर्भर ती दिसली ॥८३॥</p>
<p>
	पाहूनि तियेचा दैन्य स्थिति । आणि मनाची रंगेल वृत्ति । कींव उपजली गणुदासांप्रती । काय निवेदिती मोरेश्वरा ॥८४॥</p>
<p>
	पहा हो हिचें अंग उघडें । द्या कीं तिला एकादें लुगडें । रुजू होईल ईश्वराकडे । पुण्यही घडेल तुम्हांतें ॥८५॥</p>
<p>
	आधींच मोरेश्वर कृपामूर्ति । वरी दासगणूंची विनंती । सुंदर साडी खरेदी करिती । आनंदें अर्पिती पोरीतें ॥८६॥</p>
<p>
	नित्य खाणारी जी कदन्न । तिला लाधावें पंचपव्कान्न । तेवीं ती मुलगी सुप्रसन्न । जाहली पाहून ती साडी ॥८७॥</p>
<p>
	दुसरे दिवशीं ती ल्याली साडी । फेर धरी ती खेळे फुगडी । दिसली इतर पोरींवर कडी । मोठी आवडी साडीची ॥८८॥</p>
<p>
	तीच पुढें दुसरे दिवशीं । साडी ठेवुनी पडदणीसी । गुंडाळी पूर्वील फटकुरासी । परी हिरमुसी दिसेना ॥८९॥</p>
<p>
	नाहीं ल्याली, केली जोगवण । तथापि तिचें पूर्वील दैन्य । गणुदासा भासे झालें विच्छिन्न । भावनेच्या भिन्नत्वें ॥९०॥</p>
<p>
	नवी साडी ठेविली सदनीं । जरी आली फाटकें नेसुनी । तरी दिसेना खिन्न मनीं । नव्हती कीं उणीव साडीची ॥९१॥</p>
<p>
	असमर्थपणें फाटकें लेणें । समर्थपणेंही तैसेंच करणें । या नांव दैन्य संपन्नपणें मिरवणें । भावनेगुणें सुखदु:ख ॥९२॥</p>
<p>
	हेंच तें गणुदासांचें कोडें । एणेपरी जेव्हां उलगडे । ईशावास्याचें केणें सांपडे । ठायींच पडे अर्थबोध ॥९३॥</p>
<p>
	ईशेंच आच्छादिला जेथें सारा । हा अवघा ब्रम्हांडाचा पसारा । तेथें तयावीण उघडा थारा । कोण विचारा मानी या ॥९४॥</p>
<p>
	तेंही पूर्ण हेंही पूर्ण । पूर्णापासाव उद्भवलें पूर्ण । पूर्वांतूनि काढितां पूर्ण । राहील पूर्णचि अवशेष ॥९५॥</p>
<p>
	पोरीचें दैन्य ईश्वरी अंश । फटकून साडी हेही तदंश । दाता देय दान हेंही अशेष । एकचि ईश भरलेला ॥९६॥</p>
<p>
	‘मी माझें’ हें पार दवडावें । निरभिमानत्वें सदा वर्तावें । त्यागपूर्वक भोग भोगावे । अभिलाषावें नच कांहीं ॥९७॥</p>
<p>
	ऐसी बाबांची अमोघ वाणी । प्रचीति मिळविली अनेकांनीं । आप्राणान्त शिरडी न सोडूनी । जनीं विजनीं प्रकटत ॥९८॥</p>
<p>
	कोणास मच्छिंदरगडावर । कोणास कोठेंही असो शहर ।  कोल्हापूर सोलापुर रामेश्वर । इच्छामात्र प्रकटत ॥९९॥</p>
<p>
	कोणास आपुल्या बाम्हावेषीं । कोणास जागृतीं वा स्वप्नविशेषीं । दर्शन देत अहर्निशीं । पुरवीत असोशी भक्तांची ॥१००॥</p>
<p>
	ऐसे अनुभव एक ना दोन । किती म्हणोनि करावे वर्णन । शिरडींत जरी वसतिस्थान । अलक्ष्य प्रस्थान कोठेंही ॥१०१॥</p>
<p>
	पहा ही पोर कोणाची कोण । य:कश्चित्‌ गरीब मोलकरीण । नारिंगी साडीवरी तिचें तें गायन । निघालें मुखांतून साहजिक ॥१०२॥</p>
<p>
	शंका म्हणूनि बाबांस पुसावी । या मोलकरिणीनें ती निरसावी । तीही काकांच्या इथें असावी । रचना ही मायावी नाहीं का ॥१०३॥</p>
<p>
	आधीं ही तेथें मोलकरीण । असावी हें कैसें बाबांस ज्ञान । तीही भविष्यकाळीं हें गाऊन । श्रुत्यर्थबोधन व्हावें कसें ॥१०४॥</p>
<p>
	परी तें झालें खास । वाटलें आश्चर्य गणुदासांस । आशंकेचा झाला निरास । ईशावास्य आकळलें ॥१०५॥</p>
<p>
	श्रोतियां मनीं येईल शंका । खटाटोप हा तरी कां इतुका ॥ स्वयेंच स्वमुखें बाबांनींच कां । फेडिली न आशंका तेथेंच ॥१०६॥</p>
<p>
	हें काय जागींच नसतें करवलें । परी तें नसतें महिमान कळलें । ईशें त्या पोरीसही आच्छादिलें । प्रकट हें केलें बाबांनीं ॥१०७॥</p>
<p>
	आत्मयाथात्म्य - निरूपण । हेंच सर्वोपनिषदांचें पर्यवसान । हेंच मोक्षधर्म - निष्कर्षण । गीतार्थ - प्रवचन तें हेंच ॥१०८॥</p>
<p>
	प्राणी भिन्न आत्मा अभिन्न । आत्मा कर्तृत्वभोक्तृत्वहीन । तो न अशुद्ध पापपुण्याधीन । कर्माचरण त्या नाहीं ॥१०९॥</p>
<p>
	मी जातीनें उच्च ब्राम्हाण । इतर मजहूनि नीचवर्ण । वसे ऐसें जोंवरी भेदज्ञान । कर्माचरण आवश्यक ॥११०॥</p>
<p>
	मी अशरीर सर्व्त्र एक । मजहूनि कोणी नाहीं आणिक । मीच कीं सकलांचा व्यापक । स्वरूपोन्मुख हें ज्ञान ॥१११॥</p>
<p>
	पूर्णब्रम्हास्वरूपच्युत । ऐसा हा जीवात्मा पूर्ववत । कधींतरी स्वस्वरूपाप्रत । पावावा निश्चित हें ध्येय ॥११२॥</p>
<p>
	श्रुति - स्मृति आणि वेदान्त । या सर्वांचा हाचि सिद्धान्त । हेंचि अंतिम साध्य निश्चित । च्युतासी अच्युतपदप्राप्ति ॥११३॥</p>
<p>
	‘सम: सर्वेषु भूतेषु’ । जोंवरी अप्राप्त हा स्थितिविशेषु । तोंवरी न भूतात्मा ह्रषीकेशु । ज्ञान प्रकाशूं समर्थ ॥११४॥</p>
<p>
	विहितकर्में चित्त शुद्ध । होतां होईल अभेदबोध । शोकमोहादि संसृतीविरुद्ध । प्रकटेल सिद्ध ज्ञान तें ॥११५॥</p>
<p>
	अखिल त्रैलोक्य सचराचर । आच्छादी जो ईश परमेश्वर । निष्क्रिय निष्कल जो परात्पर । तो अशरीर सदात्मक ॥११६॥</p>
<p>
	नामरूपात्मक हें विश्व । सबाह्य आच्छादी हा ईश । तो मीच मी भरलों अशेष । निर्विशेषरूपत्वें ॥११७॥</p>
<p>
	अस्तु वस्तुत: जें निराकार । मायागुणें भासे साकार । कामुकापाठीं हा संसार । तोचि असार निष्कामा ॥११८॥</p>
<p>
	हें यत्किंचित्‌ भूतभौतिक । जगत्‌ चेतनाचेतनात्मक । ईश्वरचि हा अद्वितीय एक । निर्धार नि:शंक करावा ॥११९॥</p>
<p>
	जगद्वुद्धीचा हा विवेक । जरी मनासी पटेना देख । तरी हें धनहिरण्यादिक । यांचा अभिलाख न करावा ॥१२०॥</p>
<p>
	हेंही जरी न घडे तरी । जाणावें आपण कर्माधिकारी । आमरणान्त शतसंवत्सरीं । कर्मचि करीत रहावें ॥१२१॥</p>
<p>
	तेंही स्ववर्णाश्रमोचित । यथोक्तानुष्ठानसहित । अग्निहोत्रादि नित्यविहित । चित्त अकलंकित होईतों ॥१२२॥</p>
<p>
	हा एक चित्तशुद्धीचा मार्ग । दुजा सर्वसंगपरित्याग । हें न आक्रमितां ज्ञानयोग । कर्मभोगचि केवळ ॥१२३॥</p>
<p>
	ही ब्रम्हाविद्या हें उपनिषद । सर्वां न देती अधिकारविद । वृत्ति न जोंवरी झाली अभेद । उपनिषद्बोध शाब्दिक ॥१२४॥</p>
<p>
	तरी तोही व्हावा लागे । जिज्ञासु आधीं तोच मागे । म्हणोनि बाबंहीं पाठविलें मागें । मोलकरीण सांगेल म्हणोनि ॥१२५॥</p>
<p>
	स्वयेंच बाबा हा बोध देते । तरी हें पुढील कार्य न घडतें । ‘एकमेवाद्वितीय’ नसतें । ज्ञान हें कळतें बाबांचें ॥१२६॥</p>
<p>
	मजवांचूनि आणीक कोण । आहे ती काकांची मोलकरीण । मीच ती ही दिधली खूण । ईशावास्य जाणविलें ॥१२७॥</p>
<p>
	परमेश्वरानुग्रहलेश । आचार्यानुग्रह विशेष । नसतां आत्मज्ञानीं प्रवेश । सिद्धोपदेशचि आवश्य्क ॥१२८॥</p>
<p>
	आत्मप्रतिपादक जें जें शास्त्र । श्रवणीं आणावें तें तेंच मात्र । प्रतिपाद्य जें तें मीच सर्वत्र । मजवीण अन्यत्र कांहींच न ॥१२९॥</p>
<p>
	होतां आत्मतत्त्वाचें विवरण । तोच मी आत्मा नव्हे आन । हें जयासी अभेदानुसंधान । आत्माही प्रसन्न तयासीच ॥१३०॥</p>
<p>
	असो आत्मनिरूपण होतां । ऐसेंच आत्मानुसंधान राखितां । ऐसीच निश्चल धरितां आत्मता । परमात्मा हाता येईल ॥१३१॥</p>
<p>
	पुढील अध्यायकथानुसंधान । विनायक ठाकूरादि कथा कथन । श्रोते करोत सादर श्रवण । परमार्थप्रवण होतील ॥१३२॥</p>
<p>
	ताही कथा ऐशाच गोड । ऐकतां पुरेल श्रोतियांचें कोड । महापुरुषदर्शनाची होड । पुरेल चाड भक्तांची ॥१३३॥</p>
<p>
	जैसा उगवतां दिनमणि । अंधार जाय निरसोनी । तेवीं या कथापीय़ूषपानीं । माया हरपोनी जातसे ॥१३४॥</p>
<p>
	अतर्क्य साईंचें विंदान । त्यावीण कोण करील कथन । मी तों एक निमित्त करून । तेचि तें वदवून घेतील ॥१३५॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । ईशावास्यभावार्थबोधनं नाम विंशोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 23 Apr 2022 16:04:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 Apr 2022 14:43:06 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय १९]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-19-122042300060_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
सूक्ष्माहूनि सूक्ष्म अत्यंत । महताहूनही अत्यंत मह्त । ऐसें आब्रम्हास्तंबपर्यंत । वस्तुजात हा साई ॥१॥
ऐसिया ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 19" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/23/full/1650709966-6246.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra adhyay 19" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	सूक्ष्माहूनि सूक्ष्म अत्यंत । महताहूनही अत्यंत मह्त । ऐसें आब्रम्हास्तंबपर्यंत । वस्तुजात हा साई ॥१॥</p>
<p>
	ऐसिया सद्वस्तूसी पाहीं । रंगरूपादि आकार कांहीं । देऊनि पाहों चर्मचक्षूंहीं । इच्छा ही उदेली अंतरीं ॥२॥</p>
<p>
	सूर्यास काडवातीची आरती । भक्तिभावें सौर करिती । किंवा गुळाचा करुनि गणपती । गूळ् निवेदिती गाणपत्य ॥३॥</p>
<p>
	अथवा महार्णवाच्या मधुनी । ओंजळीनें घेऊनि पाणी । अर्ध्यार्पण तयालागुनी । सकृद्दर्शनीं अनुचित ॥४॥</p>
<p>
	सूर्यार्णव महाप्रभाव । परी ते पाहती भक्तभाव । उचितनुचिता कैंच ठाव । भक्तगौरव त्यां काज ॥५॥</p>
<p>
	‘समानशीलव्यसनेषु सख्यम्‌’ । आहे जरी हा सामान्य नियम । तत्रापि हा देहात्मसंगम । अपवाद परम अनिवार्य ॥६॥</p>
<p>
	स्वभावें हे परस्पर भिन्न । परी दोघांचा स्नेह विलक्षण । एका न गमे दुजियावीण । वेगळे न क्षण राहती ॥७॥</p>
<p>
	तरी हा देह आहे नश्वर । आत्मा निर्विकार अक्षर । दोघांचें प्रेम अपरंपार । तेणेंच संसारपरिभ्रम ॥८॥</p>
<p>
	आत्मा तेंच शक्ती महत्‌ । तियेहूनि सूक्ष्म अव्याकृत । तेंच आकाशा प्रकृति अव्यक्त । मायाही वदत तियेसचि ॥९॥</p>
<p>
	या सर्वांहूनि पुरुष सूक्ष्म । तेथेंच इंद्रियादिकांसी उपरम । तीच अंतिम गति परम । शुद्धब्रम्हा तें हेंच ॥१०॥</p>
<p>
	ऐसा आत्मा हा संसारी । भासे मायाकर्मानुसारी । असूनि स्वयें निर्विकारी । स्फटिकापरी निर्लेप ॥११॥</p>
<p>
	स्फटिक लाल काळा पिवळा । जैसा रंग तैसी कळा । परी तो सर्वां रंगां निराळा । विकारां वेगळा निर्मळ ॥१२॥</p>
<p>
	माळावरील जैसें मृगजळ । शुक्तिकाधिष्ठित रौप्य झळाल । पाहतां दोरीचें वेंटाळ । नसता व्याळ आभासे ॥१३॥</p>
<p>
	दोरीवरी सर्पारोपण । वस्तुगत्या अप्रमाण । तैसेंच ‘मी देह’ हा अभिमान । मिथ्या बंधन मुक्तासी ॥१४॥</p>
<p>
	देहेंद्रिय मन:प्राण । आत्मा यांहूनही विलक्षण । स्वयंज्योति शुद्ध चैतन्य । विकारविहीन निराकृती ॥१५॥</p>
<p>
	देह बुद्धि मन प्राण । या सर्वांचा जंव अभिमान । तंव तें कर्तृत्व भोक्तृत्व प्रमाण । सुखदु:खभान अनिवार्य ॥१६॥</p>
<p>
	वटाकणिका सूक्ष्म किती । गर्भीं सांठवी वटवृक्षशक्ति । अगणित कणिका वृक्षांपोटीं । वृक्षकोटी तयांत ॥१७॥</p>
<p>
	ऐसे कणिकेगणित वृक्ष । आप्रलयान्त देतील साक्ष । ऐसेंच विश्व प्रत्यक्ष । अवलोका लक्ष देऊनि ॥१८॥</p>
<p>
	शाश्वतता निर्भयता मुक्तता । स्वतंत्रता परमात्मप्राप्तता । हीच जीवाची साफल्यता । इतिकर्तव्यता जन्माची ॥१९॥</p>
<p>
	मोक्ष नाहीं ज्ञानाविना । विना विरक्त न पवे ज्ञाना । संसार जों वाटेना अनित्य मना । स्फुरेना कल्पना विरक्तीची ॥२०॥</p>
<p>
	त्या अनित्यत्वाच्या वाटे । विश्वाभासें द्दष्टी फाटे । तेणें पांथस्थ मध्यें चाकाटे ॥ जावें कोठें आकळेना ॥२१॥</p>
<p>
	ऐसा हा विश्वाभास । चिन्मात्रीं मिथ्या मायाविलास । प्रपंचजात स्वप्नविन्यास । तदर्थ प्रयास कां व्यर्थ ॥२२॥</p>
<p>
	स्वप्नांतूनि जागृतींत । येतांच स्वप्न होय अस्तंगत । म्हणूनि जो निजस्वरूपीं स्थित । तया प्रपंचार्थ स्मरेना ॥२३॥</p>
<p>
	विना आत्मैक्यत्व विज्ञान । विना आत्मयाथात्म्य - प्रकाशन । तुटावया शोकमोहादि बंधन । जागृति आन असेना ॥२४॥</p>
<p>
	जरी सर्वांहूनि श्रेष्ठ ज्ञान । बाबा उपदेशीत रात्रंदिन । तरीही भक्तिमार्गाचें अवलंबन । सर्वसाधारण निवेदीत ॥२५॥</p>
<p>
	वदत ज्ञानमार्गाचें महिमान । मार्ग तो रामफळासमान । भक्तिमार्ग  सीताफळ - सेवन । स्वल्प साधन रसमधुर ॥२६॥</p>
<p>
	भक्ति ही सोज्ज्वळ सीताफळ । ज्ञान हेंपरिपव्क रामफळ । एकाहूनि एक रसाळ । मधुर परिमळ तैसाच ॥२७॥</p>
<p>
	रामफळ गर्भींचा गीर । फळ काढूनि पिकवितां उगीर । वृक्षींच पिके तों धरी जो धीर । तयासीच मधुर लागे तो ॥२८॥</p>
<p>
	रामफळाची गोडी सरस । देठेंसीं परिपव्क होई जों तरूस । उगीर लागे पडतां भुईस । अति मिठास वर पिकतां ॥२९॥</p>
<p>
	वरचेवर जो पिकवूं जाणे । तेणेंच त्याचा आस्वाद घेणें । सीताफळ हे सायास नेणे । अल्पगुणें बहुमोल ॥३०॥</p>
<p>
	रामफळासी पतनभय । ज्ञानियाही नाहीं निर्भय । झाला पाहिजे सिद्धिविजय । लव हयगय कामा न ये ॥३१॥</p>
<p>
	म्हणुनि साइ दयाघन । बहुधा निज शिष्यांलागून । भक्ति आणि नामस्मरण । याचेंच विवरण करीत ॥३२॥</p>
<p>
	ज्ञानाहूनही श्रेष्ठ ध्यान । अर्जुनालागीं कथी भगवान । तुटावया भक्तभवबंधन । साईही साधन हें वदे ॥३३॥</p>
<p>
	असो येविषय़ींची कथा । पूर्वाध्यायीं वर्णितां वर्णितां । अपूर्ण राहिली ती मी आतां । कथितों श्रोतां परिसिजे ॥३४॥</p>
<p>
	वयोवृद्ध शक्तिक्षीण । म्हातारी एक मांडी निर्वाण । मंत्र मागावया साईंपासून । प्रायोपवेशन आरंभी ॥३५॥</p>
<p>
	पाहोनियां तियेची स्थिती । माधवरावांस पडली भीति । करुं गेले बांबांशीं मध्यस्थी । कथानुसंगती पूर्वील ॥३६॥</p>
<p>
	साईसंकल्प - विद्योती । उजळली ही चारित्रज्योती । मार्गदर्शक होवो तद्दीप्ति । मार्ग भावार्थी उमगोत ॥३७॥</p>
<p>
	बाबांचिया आज्ञेनुसार । माधवरावांनीं मजबरोबर । आरंभिली कथा सुंदर । तीच पुढारां चालवूं ॥३८॥</p>
<p>
	म्हणती पाहूनि म्हातारीचा निग्रह । बाबांनीं तीस दिधला अनुग्रह । फिरविला तियेचे मनाचा ग्रह । कथासंग्रह अभिनव ॥३९॥</p>
<p>
	पुढें बाबांनीं प्रेमळपणें । हांक मारिली तिजकारणें । “आई तूं कां गे घेतलें धरणें । कां तुज मरणें आठवलें” ॥४०॥</p>
<p>
	कोणीही असो प्रौढ बाई । तिजला हांक मारीत ‘आई’ । पुरुषांस ‘काक’ ‘बापू’ ‘भाई’ । गोड नवलाई हांकेची ॥४१॥</p>
<p>
	अंतरंग जैसें प्रेमळ । बोलही तैसेच मंजुळ । रंजल्यागांजल्यांचे कनवाळ । दीनदयाळ श्रीसाई ॥४२॥</p>
<p>
	असो तिजला हांक मारिली । आपुले सन्मुख बैसविली । निजगुरुत्वाची गुप्त किल्ली । प्रेमें दिधली निजहातें ॥४३॥</p>
<p>
	कराया भवसंतापसमन । भक्तचकोर - तृषापनयन । वर्षले जे बाबा चिद्धन । स्वानंदजीवन तें सेवा ॥४४॥</p>
<p>
	म्हणती “आई, खरेंच सांगें । हाल जीवाचे करिसी कां गे । फकीर मी केवळ तुकडे मागें । पाहीं अनुरागें मजकडे ॥४५॥</p>
<p>
	खरेंच मी लेक तूं आई । आतां मजकडे लक्ष देईं । सांगतों तुज एक नवलाई । परम सुखदाई होईल ॥४६॥</p>
<p>
	होता पहा माझा गुरु । मोठा अवलिया कृपासागरू । थकलों तयाची सेवा करकरूं । कानमंतरू देईना ॥४७॥</p>
<p>
	माझ्याही मनीं प्रबळ आस । कधीं न सोडावी तयाची कांस । तया मुखेंच घ्यावें मंत्रास । दीर्घ सायास करूनि ॥४८॥</p>
<p>
	आरंभीं तयानें मज मुंडिलें । पैसे मज दोनचि याचिले । ते मीं तात्काळ देऊनि टाकिले । बहु मीं प्रार्थिलें मंत्राक्षर ॥४९॥</p>
<p>
	माझा गुरु पूर्वकाम । दोन पैशांचें काय काम । कैसें म्हणावें त्या निष्काम । शिष्यांसी दाम मागे जो ॥५०॥</p>
<p>
	ऐसी न शंका येवो मना । व्यावहारिक पैशाची न त्या कामना । ही तों नाहीं तयाची कल्पना । कर्तव्य कांचना काय त्या ॥५१॥</p>
<p>
	निष्ठा आणि सबूरी दो न । हेच ते पैसे, नव्हते आन । म्यां ते तेव्हांच टाकिले देऊन । तेणें मज प्रसन्न गुरुमाय ॥५२॥</p>
<p>
	धैर्य तीच गे बाई सबूरी । सांडूं नको तिजल दूरी । पडतां केव्हांही जडभारी । हीच परपारीं नेईल ॥५३॥</p>
<p>
	पुरुषांचें पौरुष ती ही सबूरी । पाप ताप दैन्यता निवारी । युक्तिप्रयुक्तीं आपत्ति वारी । बाजूस सारी भय भीती ॥५४॥</p>
<p>
	सबूरीवरी यशाचा वांटा । विपत्ती पळवी बारा वाटा । येथ अविचाराचा कांटा । नाहीं ठावुका कोणाही ॥५५॥</p>
<p>
	सबूरी सद्नुणांची खाणी । सद्विचाररायाची हे राणी । निष्ठा आणि ही सख्या बहिणी । जीव प्राण दोघींसी ॥५६॥</p>
<p>
	सबूरीवीण मनुष्यप्राणी । स्थिति तयाची दैन्यवाणी । पंडित असो कां मोठा सद्नुणी । व्यर्थ जिणें हिजवीण ॥५७॥</p>
<p>
	गुरु जरी महा प्रबळ । अपेक्षी शिष्यप्रज्ञाच केवळ । गुरुपदीं निष्ठा सबळ । धैर्यबळ सबूरी ॥५८॥</p>
<p>
	जैसा दगड आणि मणी । उजळती दोन्ही घासितां सहाणीं । परी दगड राहे दगडपणीं । माणी तो मणी तेजाळ ॥५९॥</p>
<p>
	एकचि संस्कार दोघां उजळणी । दगडा चढेल काय मण्याचें पाणी । घडेल मण्याची सतेज हिरकणी । दगड निजगुणीं तुळतुळीत ॥६०॥</p>
<p>
	बारा वर्षें पायीं वसवटा । केला गुरुनें लहानाचा मोठा । अन्नवस्त्रासी नव्हता तोटा । प्रेम पोटांत अनिवार ॥६१॥</p>
<p>
	भक्तिप्रेमाचा केवळ पुतळा । जयास शिष्याचा खरा जिव्हाळा । माझ्या गुरूसम गुरु विरळा । सुखसोहळा न वर्णवे ॥६२॥</p>
<p>
	काय त्या प्रेमाचें करावें वर्णन । मुख पाहतां ध्यानस्थ नयन । आम्ही उभयतां आनंदघन । अन्यावलोकन नेणें मी ॥६३॥</p>
<p>
	प्रेमें गुर्मुखावलोकन । करावें म्यां रात्रंदिन । नाहीं मज भूक ना तहान । गुरूवीण मन अस्वस्थ ॥६४॥</p>
<p>
	तयावीण नाहीं ध्यान । तयावीण न लक्ष्य आन । तोच एक नित्य अनुसंधान । नवलविंदान गुरूचें ॥६५॥</p>
<p>
	हीच माझ्या गुरूची अपेक्षा । कांहीं न इच्छी तो यापेक्षां । केली न माझी केव्हांही उपेक्षा । संकटीं रक्षा सदैव ॥६६॥</p>
<p>
	कधीं मज वास पायांपाशीं । कधीं समुद्र - परपारासी । परी न अंतरलों संगमसुखासी । कृपाद्दष्टीसीं सांभाळी ॥६७॥</p>
<p>
	कासवी जैसी आपुले पोरां । घालिते निजद्दष्टीचा चारा । तैसीच माझे गुरूची तर्‍हा । द्दष्टीनें लेंकरा सांभाळी ॥६८॥</p>
<p>
	आई या मशिदींत बैसून । सांगतों तें तूं मानीं प्रमाण । गुरूनें न फुंकले माझेच कान । तुझे मी कैसेन फुंकरूं ॥६९॥</p>
<p>
	कासवीची प्रेमद्दष्टी । तेणेंच पोरांसी सुखसंतुष्टी । आई उगीच किमर्थ कष्टी । उपदेशगोष्टी नेणें मी ॥७०॥</p>
<p>
	कासवी नदीचे एके तटीं । पोरें पैल वाळवंटीं । पालन पोषण द्दष्टाद्दष्टी । व्यर्थ खटपटी मंत्राच्या ॥७१॥</p>
<p>
	तरी तूं जा अन्न खाईं । नको हा घालूं जीव अपायीं । एक मजकडे लक्ष देईं । परमार्थ येईल हातास ॥७२॥</p>
<p>
	तूं मजकडे अनन्य पाहीं । पाहीन तुजकडे तैसाच मीही । माझ्या गुरूनें अन्य कांहीं । शिकविलें नाहींच मजलागीं ॥७३॥</p>
<p>
	नलगे साधनसंपन्नता । नलगे षट्शास्त्रचातुर्यता । एक विश्वास असावा पुरता । कर्ता हर्ता गुरू ऐसा ॥७४॥</p>
<p>
	म्हणूनिज गुरुची थोर महती । गुरु हरिहरब्रम्हामूर्ति । जो कोण जाणे तयाची गति । तो एक त्रिजगतीं धन्य गा” ॥७५॥</p>
<p>
	येणेंपरी ती म्हातारी बोधितां । ठ्सली तियेचे मना ती कथा । ठेऊनि महाराजांचे पायीं माथा । व्रतनिवृत्तता आदरिली ॥७६॥</p>
<p>
	ऐकूनि ही समूळ कथा । जाणूनि तिची समर्पकता । सानंद विस्मय माझिया चित्ता । कथासार्थकता अवलोकितां ॥७७॥</p>
<p>
	पाहोनि बाबांची ही लीला । परमानंदें कंठ दाटला । प्रेमोद्रेकें गहिंकर आला । अंतरीं ठ्सला सद्बोध ॥७८॥</p>
<p>
	पाहोनि सगद्नद कंठ झाला । माधवराव वदले मजला । कां हो अण्णासाहेब गहिंवरलां । स्वस्थ बैसलां हें काय ॥७९॥</p>
<p>
	ऐशा बाबांच्या अगणित कथा । किती म्हणूनि सांगूं आतां । ऐसें माधवराव बोलत असतां । घंटा वाजतां ऐकिली ॥८०॥</p>
<p>
	रोज दुपारा जेवणा आधीं । भक्त जाऊनियां बैसती मशिदीं । करितां गंधाक्षत -अर्ध्यपाद्यादी । पूजा सविधी बाबांची ॥८१॥</p>
<p>
	तदनंतर ती पंचारती । बापूससाहेब जोग करिती । भक्तिप्रेमें ओंवाळिती । आरत्या म्हणती भक्तजन ॥८२॥</p>
<p>
	त्या आरतीची निदर्शक भली । घंटा घणघण वाजूं लागली । आम्हीं मशिदीची वाट धरिली । मनीषा फिटली मनाची ॥८३॥</p>
<p>
	माध्यान्हसमयींची ही आरती । नरनारी मिळूनियां करिती । स्त्रिया मशिदींत वरती । पुरुष खालती मंडपीं ॥८४॥</p>
<p>
	मंगल - वाद्यांचिया गजरीं । तासाचिया झणत्कारीं । आरत्या म्हणती उच्चस्वरीं हर्षनिर्भरीं तेधवां ॥८५॥</p>
<p>
	पातलों आम्ही मंडपद्वारीं । आरती चालली घनगजरीं । पुरुष मंडळीं वेष्टिली पायरी । रीघ ना वरी जावया ॥८६॥</p>
<p>
	माझ्या मनीं असावें खालीं । जोंवरी आरती नाहीं संपली । संपतांच मग बाबांजवळी । जावें मंडळीसमवेत ॥८७॥</p>
<p>
	म्हणोनि मीं जो मनीं आणीलें । माधवराव पायरी चढले । कराग्रीं धरूनि मजही ओढिलें । जवळी नेलें बाबांचे ॥८८॥</p>
<p>
	बाबा निजस्थानीं स्थित । स्वस्थमनें चिलीम पीत । समोर जोग पंचारती ओंवाळीत । घंटा वाजवीत वामकरें ॥८९॥</p>
<p>
	ऐशा त्या आरतीचे रंगीं । माधवराव बाबांचे दक्षिणभागीं । स्वयें बैसती मजही बैसविती । सन्मुख स्थिती बाबांचे ॥९०॥</p>
<p>
	मग शांतमूर्ति संतमणी । बाबा बोलती मंजुळ वाणी । दक्षिणा काय दिधली आणीं । शामरावांनीं मजप्रती ॥९१॥</p>
<p>
	बाब हे शामराव येथेंच असती । दक्षिणेऐवजीं नमस्कार देती । हेच पंधरा रुपये म्हणती । बाबांप्रती अर्पावे ॥९२॥</p>
<p>
	बरें असो केल्या का वार्ता । कांहीं वोललां का उभयतां । काय गोष्टी केल्या आतां । सांग समस्ता मजप्रती ॥९३॥</p>
<p>
	असो नमस्काराची कथा । केल्यास काय तयासी वार्ता । काय कैशा त्या समग्रता । परिसवीं आतां मजप्रती ॥९४॥</p>
<p>
	गोष्ट सांगावी ही उत्कंठा । आरतीचा तो गजर मोठा । परमानंद माईना पोटा । प्रवाहे ओठांतूनि तो ॥९५॥</p>
<p>
	बाबा जो तक्यास ओठंगले । गोष्ट ऐकावया पुढें झाले । मींही पुढें वदन केलें । करूं आरंभिलें कथन तें ॥९६॥</p>
<p>
	बाबा तेथें झाल्या ज्या वार्ता । सर्वचि वाटल्या गोड चित्ता । त्यातचि एक ती म्हातारीची कथा । अति नवलता तियेची ॥९७॥</p>
<p>
	शामरावें ती गोष्ट कथितां । दिसोनि आली आपुली अकळता । जणूं त्या कथेच्या मिषें मजवरता । केलात निश्चितता अनुग्रह ॥९८॥</p>
<p>
	तंव बाबा अति उत्सुकता । म्हणती सांग मज ती समग्र कथा । काय पाहूं कैसी नवलता । अनुग्रहता ती कैसी ॥९९॥</p>
<p>
	गोष्ट होती ताजी ऐकिली । शिवाय मनांत फारचि ठसलेली । बाबांस अस्खलित निवेदन केली । प्रसन्न दिसली चित्तवृत्ती ॥१००॥</p>
<p>
	ऐसें कथिलें सकल वृत्त । बाबाही ऐकत देऊनि चित्त । सवेंचि मग मातें वदत । जीवीं धरीत जावें हें ॥१०१॥</p>
<p>
	आणीक पुसती अति उल्हासता । ‘किती ही गोड ऐकिली कथा । बाणली का ते तव चित्ता । खरीच सार्थकता मानली का’ ॥१०२॥</p>
<p>
	बाबा या कथाश्रवणांतीं । लाधलों मी निजविश्रांती । फिटली माझे मनाची आर्ती । मार्ग निश्चितीं मज कळला ॥१०३॥</p>
<p>
	मग बाबा वदती तयावरी । “कळाच आमुची आहे न्यारी । ही एकच गोष्ट जीवीं धरीं । फार उपकारी होईल ॥१०४॥</p>
<p>
	आत्मयाचें सम्यग्विज्ञान । सम्यग्विज्ञानाकारण ध्यान । तें ध्यानचि आत्मानुष्ठान । तेणेंच समाधान वृत्तीचें ॥१०५॥</p>
<p>
	होऊनि सर्वेषणाविनिर्मुक्त । ध्याना आणावा सर्वभूतस्थ । ध्यान होईल व्यवस्थित । प्राप्तव्य प्राप्त होईल ॥१०६॥</p>
<p>
	केवल जें मूर्त ज्ञान । चैतन्य अथवा आनंदघन । तेंचि माझें स्वरूप जाण । तें नित्य ध्यान करीं गा ॥१०७॥</p>
<p>
	जरी न आतुडे ऐसें ध्यान । करीं सगुणरूपानुसंधान । मनीं नखशिखान्त मी सगुण । रात्रंदिन आणावा ॥१०८॥</p>
<p>
	ऐसें करितां माझें ध्यान । वृत्ति होईल एकतान । ध्याता - ध्यान - ध्येयाचें  भान । नष्ट होऊन जाईल ॥१०९॥</p>
<p>
	एवं ही त्रिपुटी विलया जातां । ध्याता पावे चैतन्यघनता । ही कीं ध्यानाची इतिकर्तव्यत । ब्रम्हासमरसता पावसी ॥११०॥</p>
<p>
	कासवी नदीचे ऐल कांठीं । तिचीं पिल्लें पैल तटीं । ना दूध ना ऊब केवळ द्दष्टी । देई पुष्टी बाळकां ॥१११॥</p>
<p>
	पिलियां सदा आईचें ध्यान । नलगे कांहींच करणें आन । नलगे दुग्ध ना चारा ना अन्न । मातानिरीक्षण पोषण त्यां ॥११२॥</p>
<p>
	हें जें निरीक्षण कूर्मद्दष्टि । ही तों प्रत्यक्ष अमृतवृष्टि । पिलियां लाधे स्वानंदपुष्टि । ऐक्यसृष्टि गुरुशिष्यां” ॥११३॥</p>
<p>
	होतां हा साईमुखें उच्चार । थांबला आरतीचा गर । “श्रीसच्चिदानंद सद्नुरुजयजयकार” । केला पुकार सकळांनीं ॥११४॥</p>
<p>
	सरला नीरांजनोपचार । सरली आरती सविस्तर । जोग म अर्पितां खडीसाखर । बाबा करपंजर पसरिती ॥११५॥</p>
<p>
	तयांत नित्यक्रमानुसार । खडीसाखर ती ओंजळभर । घालिती जोग प्रेमपुर:सर । नमस्कारपूर्वक ॥११६॥</p>
<p>
	ती सबंध शर्करा माझे हातीं । बाबा रिचविती आणि वदती । या साखरेवाणी होईल स्थिती । ठेवितां चित्तीं ही गोष्ट ॥११७॥</p>
<p>
	जैसी खडीसाखर ही गोड । तैसेंच पुरेल मनींचें कोड । होईल तुझें कल्याण चोखड । पुरेल होड अंतरींची ॥११८॥</p>
<p>
	मग मी बाबांस अभिवंदोन । मागितलें हेंचि कृपादान । हेंचि पुरे मज आशीर्वचन । सांभाळून घ्या मज ॥११९॥</p>
<p>
	बाबा वदती “कथा श्रवण । करा मनन आणि निदिध्यासन । होईल स्मरण आणि ध्यान । आनंदघन प्रकटेल ॥१२०॥</p>
<p>
	एणेंपरी जें परिसिलें कानीं । तें जरी तूं धरिसील मनीं । उघडेल निजकल्याणाची खनी । होईल धुणी पापाची ॥१२१॥</p>
<p>
	वार्‍याचा चालतां सोसाटा । समुद्रावरी उसळती लाटा । असंख्य बुद्बुद फेणाचा सांठा । आदळती कांठा येऊनि ॥१२२॥</p>
<p>
	लाटा बुडबुडे फेण भंणरे । एका पाण्याचे प्रकार सारे । हे सकळ द्दग्भ्रमाचे पसारे । शांत वारे होती तों ॥१२३॥</p>
<p>
	हे काय प्रकार म्हणावे झाले । किंवा म्हणावे कां नाश पावले । जाणोनि मायेचें सर्व केलें । झालें गेलें सरिसेंच ॥१२४॥</p>
<p>
	तैसीच सृष्टीची घडामोड । विवेकियां न तयाचें कोड । ते नाशिवंतीं न धरिती होड । साधिती जोड नित्याची ॥१२५॥</p>
<p>
	महत्त्वें ज्ञानापरीस ध्यान । तदर्थ लागे । यथार्थ ज्ञान । होतां न वस्तूचें साद्यंत आकलन । यथार्थ ध्यान आतुडेना ॥१२६॥</p>
<p>
	सम्यग्विज्ञान मूळ ध्यान । या नांव प्रत्यगात्मानुष्ठान । परी जो विक्रियारहित जाण । आणवे ध्याना कैसेनी ॥१२७॥</p>
<p>
	प्रत्यगात्मा तोचि ईश्वरू । आणि जो ईश्वरू तोचि गुरू । तिहींत भेद नाहीं अणुमात्रु । नागवे करूं जाई तो ॥१२८॥</p>
<p>
	होतां निदिध्यास परिपव्कता । ध्यान ध्याता विरोनि जातां । निवात दीपवत्‌ चित्ता । शांतता ते ‘समाधि’ ॥१२९॥</p>
<p>
	होऊनि सर्व्षणाविनिर्मुक्त । जाणूनि आहे तो सर्वभूतस्थ । होतां अद्वितीयत्वें अभय प्राप्त । मग तो येत ध्यानातें ॥१३०॥</p>
<p>
	मग अविद्याकृत कर्मबंध । तुटती तटातट तयाचे संबंध । सुटती विधिनिपेध - निर्बंध । भोगी आनंद मुक्तीचा ॥१३१॥</p>
<p>
	आधीं आत्मा आहे कीं नाहीं । अद्वैत कीं निराळा ठायीं ठायीं । कर्ता कीं अकर्ता पाहीं । साही शास्त्रें धुंडावीं ॥१३२॥</p>
<p>
	आत्मैकविज्ञान हेंचि । पराकाष्ठा असे ज्ञानाची । मोक्ष आणि परमानंदाची । उत्पत्ति साची तेथूनी ॥१३३॥</p>
<p>
	अंधास हत्तीचे वर्णनाकरितां । आणिला बृहस्पतीसमान वक्ता । वक्तृत्वें स्वरूप येईना चित्ता । वाचातीता न वर्णवे ॥१३४॥</p>
<p>
	वत्क्याचें वक्त्र श्रोत्यांचे श्रोत्र । आणितील काय गेलेले नेत्र । हस्तिस्वरूपावलोकनपात्र । केवळ नेत्रचि सत्यत्वें ॥१३५॥</p>
<p>
	नेत्र नसतां कैसा हस्ती । येईल अंधाचिये प्रतीतीं । तैसेच दिव्य नेत्र जैं गुरु देती । ज्ञानसंवित्ति तेधवां ॥१३६॥</p>
<p>
	साईस्वरूप यथार्थ ज्ञान । स्वयें जो परिपूर्ण विज्ञानघन । हेंच तयाचें ध्यान अनुष्ठान । हेंच दर्शन तयाचें ॥१३७॥</p>
<p>
	अविद्या - काम - कर्मबंध्न । यांचें व्हावया अशेष मोचन । नाहीं नाहीं अन्य साधन । गांठ ही बांधून ठेवा कीं ॥१३८॥</p>
<p>
	साई नाहीं तुमचा वा आमुचा । तो तों सर्वभूतस्थ साचा । सूर्य जैसा सकल जगाचा । हा सकळांचा तैसाच” ॥१३९॥</p>
<p>
	आतां परिसा तयांचे बोल । सर्वसाधारण आणि अनमोल । स्मरणीं ठेवितां वेळोवेळ । स्वार्थ सफळ सर्वदा ॥१४०॥</p>
<p>
	“नसल्या लागाबांधा कांहीं । कोणीही कोठेंही जातचि नाहीं । नरास काय पशुपक्ष्यांही । न करीं कुणाही हडहड ॥१४१॥</p>
<p>
	आल्यागेल्याचा आदर करीं । तृषितां जल भुकेल्या भाकरी । उघडयास वस्त्र बसाया ओसरी । देतां श्रीहरि तुष्टेल ॥१४२॥</p>
<p>
	कुणाला व्हावा असेल पैसा । तुझिया चित्तीं द्यावा कैसा । देऊं नको, परी वसवसा । श्वानाऐसा वर्तूं नको ॥१४३॥</p>
<p>
	कोणीही बोल बोलो शंभर । स्वयें नेदीं कटु उत्तर । धरितां सहिष्णुता निरंतर । सुख अपार लाधेल ॥१४४॥</p>
<p>
	दुनिया झालिया इकडची तिकडे । आपण व्हावें न मागें पुढें । ठायींच निश्चल राहूनि रोकडें । कौतुक तेवढें पहावें ॥१४५॥</p>
<p>
	तुम्हांआम्हांमधील भिंत । पाडूनि टाका पहा समस्त । मग जाण्यायेण्यास मार्ग प्रशस्त । अति निर्धास्त होईल ॥१४६॥</p>
<p>
	मीतूंपणाची भेदवृत्ति । हेच ते गुरुशिष्यांतर्गत भिंती । ते न पाडितां निश्चितीं । अभेदस्थिति दुर्गम ॥१४७॥</p>
<p>
	‘अल्ला - मालिक अल्ला - मालिक’ । वाली न त्यावीण कोणी आणिक । करणी तयाची अलोकिक । अमोलिक अकळ ती ॥१४८॥</p>
<p>
	तों जें करील तेंच होईल । मार्ग तयाचा तोच दावील । क्षण न लागतां वेळ येईल । मुराद पुरेल मनींची ॥१४९॥</p>
<p>
	ऋणानुबंधाचिया गांठी । भाग्यें आम्हां तुम्हां भेटी । धरूं परस्पर प्रेम पोटीं । सुखसंतुष्टी अनुभवूं ॥१५०॥</p>
<p>
	कोण येथें अमर आहे । कृतार्थ तो जो परमार्थ लाहे । नातरी श्वासेच्छ्वास वाहे । तोंवरी राहे जीवमात्र” ॥१५१॥</p>
<p>
	कानीं पडतां हें कृपावचन । सुखावलें माझें आतुर मन । तृषार्त मी लाधलों जीवन । आनंदसंपन्न जाहलों ॥१५२॥</p>
<p>
	असेल गांठीं प्रज्ञा अतुळ । तैसीच श्रद्धा मोठी अढळ । परी जोडाया साईसम गुरुबळ । दैवचि सबळ आवश्यक ॥१५३॥</p>
<p>
	पाहूं जातां यांतील सार । भगवंत बोलिले हाचि निर्धार । ‘ये यथा मां’ हेचि उद्नार । अखिल भार कर्मावरी ॥१५४॥</p>
<p>
	यथाकर्म यथाश्रुत । जैसा अभ्यास तैसें हित । हेंचि या अध्यायांतील इंगित । हेंच बोधामृत येथींचें ॥१५५॥</p>
<p>
	“अनन्याश्चिंतयंतो माम्‌” । हेंच भगवद्नीतावर्म । ऐशा नित्ययुक्तांचा योगक्षेम । चालवी प्रकाम गोविंद ॥१५६॥</p>
<p>
	“अनन्याश्चिंतयंतो माम्‌” । हेंच भगवद्नीतावर्म । ऐशा नित्ययुक्तांच योगक्षेम । चालवी प्रकाम गोविंद ॥१५६॥</p>
<p>
	हा गोड उपदेस ऐकून । उभें राही स्मृतीचें वचन । “देवान्भावयतानेन” । मग ते तुजलगून कळवळती ॥१५७॥</p>
<p>
	तुम्ही जोर काढूं लागा । दुधाची काळजी सर्वस्वी त्यागा । वाटी घेऊनि उभाच मी मागां । पृष्ठभागां आहें कीं ॥१५८॥</p>
<p>
	म्हणाल जोर म्यां काढावे । दुधाचे प्याले तुम्हीं रिचवावे । हें तों आपणा नाहीं ठावें । दक्ष असावें कार्यार्थीं ॥१५९॥</p>
<p>
	हे बाबांची प्रतिज्ञावाणी । प्रमाण मानूनि वर्ततील जे कोणी । इहपरत्र सुखची खाणी । गांठिली तयांनीं जाणावें ॥१६०॥</p>
<p>
	आतां आणीक विनवितों श्रोतां । क्षणैक सुस्थिर करावें चित्ता । परिसा एक स्वानुभवकथा । निश्चयपोषकता साईंची ॥१६१॥</p>
<p>
	 करितां सद्वटीचें नियमन । महाराज देती कैसें उत्तेजन । परिसा ओंठ हालविल्याबांचून । अनुग्रहदान साईंचें ॥१६२॥</p>
<p>
	भक्तें अनन्य शरण व्हावें । कौतुक भक्तीचें अवलोकावें । मग साईंच्या कळेचे नवलावे । अनुभवावे नित्य नवे ॥१६३॥</p>
<p>
	असो प्रात:काळींचे प्रहरीं । सुषुप्तींतूनि येतां जागरीं । सद्वृत्तीची उठतां लहरी । तीच निर्धारीं वाढवावी ॥१६४॥</p>
<p>
	त्याच वृत्तीचा परिपोष । होतां होईल अति संतोष । बुद्धीही पावेल विकास । होईल मनास प्रसन्नता ॥१६५॥</p>
<p>
	ही एक आहे संतउक्ती । वाटलें तियेची घेऊं प्रचीती । अनुभवें घडळी मनास शांती । नवल चित्तीं वाटलें ॥१६६॥</p>
<p>
	शिरडीसारखें पवित्र स्थान । गुरुवारासम मंगल दिन । रामनामाचें अखंड आवर्तन । करावें मन जाहलें ॥१६७॥</p>
<p>
	बुधवारीं रात्रीं शय्येवरी । देह निद्रावश होई तोंवरी । मन रामस्मरणाभीतरीं । घालून अंतरीं राखिलें ॥१६८॥</p>
<p>
	प्रात:काळीं जाग येतां । रामनाम स्मरलें चित्ता । मग ते ऐसी वृत्ति उठतां । जिव्हेची सार्थकता जाहली ॥१६९॥</p>
<p>
	निश्चयें केली मनाची धारणा । सारोनियां शौचमुखमार्जना । निघालों साई - प्रातर्दर्शना । प्राप्त सुमना घेऊनि ॥१७०॥</p>
<p>
	सोडूनि दीक्षितांचें घर । पडतां बुट्टींच्या वाडयाबाहेर । पद एक मधुर औरंगाबादकर । म्हणतां सुंदर ऐकिलें ॥७१॥</p>
<p>
	पदाची त्या समयोचितता । ओवीरूपें कथूं जातां । जाईल मूळाची स्वारस्यता । होईल विरसता श्रोतियां ॥१७२॥</p>
<p>
	म्हणवूनि तें पदचि समूळ । अक्षरें अक्षर गातों मी सकळ । तेणेंच आनंदित होतील प्रेमळ । उपदेश निर्मळ मूळपदीं ॥१७३॥<br />
	<br />
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-20-122042300061_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय २०</a></strong></p>
</p>
<br /><p>
	॥ पद ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	“गुरुकृपांजन पायो मेरे भाई । रामबिना कछु मानत नाहीं ॥ध्रु०॥</p>
<p>
	अंदर रामा बाहर राम । सपनेमें देखत सीतारामा ॥१॥</p>
<p>
	जागत रामा सोवत रामा । जहां देखे वहां पूरनकामा ॥२॥</p>
<p>
	एका जनार्दनीं अनुभव नीका । जहां देखे वहां राम सरीखा ॥३॥गुरु०॥”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आधींच मनानें केलें निश्चित । नियमावें रामनामीं चित्त । निश्चया जों प्रारंभ होत । पद हें देत द्दढता तया ॥१७४॥</p>
<p>
	तेणें नमासी झाले बोधन । या मन्निश्चयांकुरालागून । साई समर्थ करुणाघन । पदांबुसेचन करिती कां ॥१७५॥</p>
<p>
	घेऊनियां हातीं तंबुरी । साईंसन्मुख अंगणाभीतरीं । औरंगाबादकर उंच स्वरीं । म्हणतां ही लकेरी परिसिली ॥१७६॥</p>
<p>
	औरंगाबादकर बाबांचा भक्त । मजसम बाबांचे पायीं अनुरक्त । असतां अनेक पदें मुखोद्नत । हेंच कां स्फुरत ते वेळीं ॥१७७॥</p>
<p>
	माझें मनोगत कोणा न ठावें । हेंच पद कां तैं गाइलें जावें । जैंसें बाबांनीं सूत्र हालवावें । स्फुरण व्हावें तैसेंच ॥१७८॥</p>
<p>
	आम्ही सकळ केवळ बाहुलीं । सूत्रधार साई माउली । स्वयें न बोलतां उपासना भली । हातीं दिधली अचूक ॥१७९॥</p>
<p>
	अंतरींची माझी वृत्ति । प्रतिबिंबली जणूं बाबांचे चित्तीं । एणें मार्गें प्रत्यक्ष प्रतीति । वाटे निश्चितीं दाखविली ॥१८०॥</p>
<p>
	केवढी या नामाची महती । वर्णिलीसे संतमहंतीं । काय म्यां पामरें ती वानावी किती । स्वरूपप्राप्ति येणेनी ॥१८१॥</p>
<p>
	ही दो अक्षरें उलटीं स्मरला । तो कोळी वाटपाडयाही उद्धरला । वाल्याचा वाल्मीक होऊनि गेला । वाक्सिद्धी पावला नवलाची ॥१८२॥</p>
<p>
	मरा मरा’ उलटें म्हणतां । राम प्रकटला जिव्हेवरता । जन्माआधींच अवतारचरिता । जाहला लिहिता रामाचे ॥१८३॥</p>
<p>
	रामनामें पतितपावन । रामनामें लाभ गहन । रामनामें अभेद भजन । ब्रम्हासंपन्न या नामें ॥१८४॥</p>
<p>
	रामनामाच्या आवर्तनें । उठेल जन्ममरणांचें धरणें । एका रामनामाचिया स्मरणें । कोटिगुणें हे लाभ ॥१८५॥</p>
<p>
	जेथें रामनामाचें गर्जन । फिरे तेथें विष्णूचें सुदर्शन । करी कोटी विन्घांचें निर्दळण । दीनसंरक्षण नाम हें ॥१८६॥</p>
<p>
	साईंस उपदेशा न स्थळ । नलगे समय काळवेळ । बसतां उठतां चालतां निखळ । सहजचि सकळ उपदेश ॥१८७॥</p>
<p>
	येविषयींची गोड कथा । सादर श्रवण कीजे श्रोतां । प्रत्यया येईल साईंची सदयता । तैसीच व्यापकता तयांची ॥१८८॥</p>
<p>
	एकदां एक भक्त श्रेष्ठा । कोणाची कोणी बोलतां गोष्ट । स्वयें होऊनि कुतर्काकृष्ट । निंदासन्निष्ट जाहले ॥१८९॥</p>
<p>
	गुण राहिले एकीकडा । निंदा प्रवाहे मुखीं दुथडा । गोष्टीचा होवोनियां चुथडा । आला कीं उभडा पैशुन्या ॥१९०॥</p>
<p>
	असल्या कांहीं तरी कारण । असल्या कोणाचें गर्ह्य आचरण । करावें सन्मुख तयाचें प्रबोधन । कींव जाणून तयाची ॥१९१॥</p>
<p>
	निंदा कधींही करूं नये । हें तों प्रत्येक जाणे स्वयें । परी न वृत्ति जैं दाबिली जाये । ती ना समाये पोटांत ॥१९२॥</p>
<p>
	तेथूनि मग येईअ कंठीं । कंठांतूनि जिव्हेचे तटीं । तेथूनि हळू हळू ओठीं । सुखसंतुष्टीं प्रवाहे ॥१९३॥</p>
<p>
	नाहीं दुजा निंदकापरी । त्रिभुवनांतही कोणी उपकारी । निंदा जयाची तयाचें करी । परोपरी कल्याण ॥१९४॥</p>
<p>
	मळ काढिती कोणी रिठयानें । कोणी साबणादिकीं साधनें । कोणी शुद्ध निर्मळ जीवनें । निंदक जिव्हेनें काढिती ॥१९५॥</p>
<p>
	स्वीय मानसिक अधोगती । परोपकारार्थ जे साहती । अवर्णनीय ती महदुपकृती । निंदक निश्चिती अतिवंद्य ॥१९६॥</p>
<p>
	पावलोपावलीं सावध करिती । निंदामिषें दोष कळविती । भावी परांचे अनर्थ टाळविती । उपकार हे किती वानूं मी ॥१९७॥</p>
<p>
	बहुतांपरी साधुसंतीं । वर्णिलीसे जयांची महती । तया निंदकवृन्दाप्रती । करितों मी प्रणति साष्टांग ॥१९८॥</p>
<p>
	आली श्रोतिया अत्यंत चिळसी । निंदकही निघाले बहिर्दिशीं । मंडळी चालली मशिदीसी । दर्शनासी बांबांच्या ॥१९९॥</p>
<p>
	बबा पूर्ण अंतर्ज्ञानी । देती वेळींच भक्तांस शिकवणी । पुढें कैसा प्रकार तयांनीं । आणिला घडवुनी तें परिसा ॥२००॥</p>
<p>
	मंडळीसह जातां लेंडियेसी । बाबा पुसती तया भक्ताविसीं । मंडळी म्हणे ओढियापासीं । बहिर्दिशेसी गेलेती ॥२०१॥</p>
<p>
	कार्यक्रम आटोपल्यावरी । लेंडीवरूनि परतली स्वारी । ओढियावरूनि भक्तही माघारीं । फिरले घरीं जावया ॥२०२॥</p>
<p>
	भेटी होतां परस्परां । घडला जो वृत्तांत तये अवसरां । विनवीं श्रोतयां जोडूनि करा । तो अवधारा सादर ॥२०३॥</p>
<p>
	तेथेंच एका कुंपणाशेजारीं । यथेष्ट विष्ठामिष्टान्नावरी । एक ग्रामसूकरी मिटक्या मारी । बाबा निजकरीं दाविती त्यां ॥२०४॥</p>
<p>
	‘पहा त्या जिभेला काय गोडी । जनालोकांची विष्ठा चिवडी । बंधु - स्वजनावर चडफडी । यथेष्ट फेडी निज हौस ॥२०५॥</p>
<p>
	बहुत सुकृताचिये जोडी । आला नरजन्म ऐसा जो दवडी । तया आत्मन्घा ही शिरडी । सुखपरवडी काय दे’ ॥२०६॥</p>
<p>
	ऐसें बोलत बाबा गेले । भक्त अंतरीं बहुत खोंचले । प्रातर्वृत्त सर्व आठवलें । बोल ते टोंचले बहु वर्मीं ॥२०७॥</p>
<p>
	असो बाबा तों परोपरी । भक्तां बोधिती प्रसंगानुसारीं । यांतील सार सांठविल्या अंतरीं । कायहो दूरी परमार्थ ॥२०८॥</p>
<p>
	‘असेल जरी माझा हरी । तरी मज देईल खाटल्यावरीं’ । म्हणीची या सत्यता खरी । परी ती अन्नआच्छादनीं ॥२०९॥</p>
<p>
	परी ती जो परमार्था लावील । परमार्थ सर्वस्वीं नागवील । ‘जैसें जो करील तैसें भरील’ । अमोल हे बोल बाबांचे ॥२१०॥</p>
<p>
	आणीकही बाबांचे बोल । परिसतां देतील स्वानंदा डोल । भावभक्तीची असलिया ओल । मुळें सखोल जातील ॥२११॥</p>
<p>
	“जलस्थलकाष्ठप्रदेशीं । जनीं वनीं देशीं विदेशीं । संचलीं मी तेजीं आकाशीं । एकदेशी मी नव्हें ॥२१२॥</p>
<p>
	औट हात देह परिमित । हेच मव्द्याप्ति जे मानित । त्यांस करावया निर्भ्रांत । मूर्तिमंत मी झालों ॥२१३॥</p>
<p>
	निष्कामत्वें अनन्यभजन । करिती जे माझें रात्रंदिन । ते प्रत्यक्ष माझें मीपण । दुजेपणविरहित ॥२१४॥</p>
<p>
	गूळ राहील गोडीवेगळा । सागर लाटांपासाव निराळा । तेजा सोडोनि राहील डोळा । मजवीण भोळा भक्त तैं ॥२१५॥</p>
<p>
	चुकावा जन्ममरणावर्त । ऐसें जयाचे मनीं निश्चित । प्रयत्नें रहावें धर्मवंत । स्वस्थचित्त सर्वदा ॥२१६॥</p>
<p>
	त्यागावे तेणें बोल वर्मीं । कोणासी छेदूं नये मर्मीं । सदा निरत शुद्ध कर्मीं । चित्त स्वधर्मीं ठेवावें ॥२१७॥</p>
<p>
	माझिये ठायीं मन बुद्धि । समर्पा स्मरा मज निरवधि । देहाचें कांहींही होवो कधीं । भय त्रिशुद्धि त्या नाहीं ॥२१८॥</p>
<p>
	जो पाहे मजकडे अनन्य । वर्णी परिसे मत्कथा धन्य । न धरी भावना मदन्त । चित्त चैतन्य लाधेल” ॥२१९॥</p>
<p>
	माझें नांव घ्या मज शरण या । हें तों सांगत गेले अवघियां । परी मी कोण हें जाणणिया । श्रवण मनन आज्ञापिलें ॥२२०॥</p>
<p>
	एकास भगवन्नाम - स्मरण । एकास भगवल्लीला - श्रवण । एकास भगवत्पाद - पूजन । आनान नियमन आनाना ॥२२१॥</p>
<p>
	कोणा अध्यात्म - रामायण । कोणास ज्ञानेश्वरी - पुरश्चरण । कोणास हरिवरदापारायण । गुरुचरित्रावलोकन कोणातें ॥२२२॥</p>
<p>
	कोणा बैसविती पायांजवळी ।  क्णास खंडोबाचे देउळीं । कोणाच्या विष्णुसहस्रनामावळी । बांधिती गळीं कळकळीनें ॥२२३॥</p>
<p>
	कोणास उपदेशिती रामविजय  । कोणासी ध्यान नाममाहात्म्य । कोणासी छांदोग्य गीतारहस्य । विश्वसें स्वारस्य अनुभविजे ॥२२४॥</p>
<p>
	कोणास कांहीं कोणास कांहीं । दीक्षाप्रकारा सीमाच नाहीं । कोणा प्रत्यक्ष कोणा द्दष्टान्तांहीं । उपदेश - नवलाई अपूर्व ॥२२५॥</p>
<p>
	भक्त अठरा पगड जाती । धांवधांवूनि दर्शना येती । जयांस मद्यावर अति प्रीति । स्वप्नींही जाती  तयांचे ॥२२६॥</p>
<p>
	वक्ष:स्थळावरी बैसती । हातींपायीं छाती दडपिती । स्पर्शाचा कानास खडा लावविती । भाक घेती तंव जाती ॥२२७॥</p>
<p>
	लग्नगृहीं भिंतीवरती । ज्योतिषी जैसे हरिहर काढिती । ‘गुरुर्ब्रम्हादि’ मंत्र लिहिती । कोण्या भक्तार्थीं स्वप्नांत ॥२२८॥</p>
<p>
	कोणी चोरूनि लावितां आसनें । करूं आदरितां हठयोग - साधनें । बाबांस कळे तें अंतर्ज्ञानें । अचूक बाणें खोंचिती ॥२२९॥</p>
<p>
	कोणा अपरिचिता हातीं धरून  । निरोप देती पाठवून । स्वस्थ न बसवे का भाकर खाऊन । सबूरी धरून रहावें ॥२३०॥</p>
<p>
	कोणास प्रत्यक्ष निक्षूनि सांगती । आमुची तों मोठी कडवी जाती । सांगून पाहूं एका दो वक्तीं । शेवटची गती बहु कठिण ॥२३१॥</p>
<p>
	सांगूं एकदां सागूं दोनदां । न करी जो गुमान आमुचे शब्दा । त्या मग पोटचे पोरास सुद्धां । चिरूनि द्विधा फेकूं कीं ॥२३२॥</p>
<p>
	महानुभाव ते महामति । काय मी पामर वानूं चमत्कृति । कोणा दे ज्ञानप्राप्ति विरक्ति । सद्भाव - भक्ति कवणा दे ॥२३३॥</p>
<p>
	कोणास कांहीं व्यवहारीं प्रशस्त । वर्तनाची लावीत शिस्त । चुटका एक उदाहरणार्थ । श्रोतृवृन्दार्थ मी कथितों ॥२३४॥</p>
<p>
	एकदां बाबा भरदुपारीं । काय आलें नकळे अंतरी । राधाकृष्णीच्या घराशेजारीं । आली स्वारी अवचिता ॥२३५॥</p>
<p>
	समवेत होते कांहीं जन । म्हणती आणा आणा रे निसण । तों निसण । तों एकानें तात्काळ जाऊन । शिडी तैं आणून ठेविली ॥२३६॥</p>
<p>
	बाबा ती लावविती घरावरी । स्वयें चढती छपरावरी । कोणा न ठावें काय अंतरीं । योजना तरी हे काय ॥२३७॥</p>
<p>
	वामन गोंदकराचे घरा । शिडी लावविली ते अवसरा । चढले शिडीवरूनि छपरा । स्वयें झरझरा श्रीसाई ॥२३८॥</p>
<p>
	तेथून राधाकृष्णीचें छपर । शेजारींच घरासीं घर । तेंही वळंघूनि गेले सत्वर । काय हा चमत्कार कळेना ॥२३९॥</p>
<p>
	राधाकृष्णाबाईंस मात्र । तेच संधीस मोठा प्रखर । आला होता शीतज्वर । अत्यंत अस्थिर त्या होत्या ॥२४०॥</p>
<p>
	दोघें दोबाजूं धरूं लागत । तेव्हांच बाबा चालूं शकत । स्वयें एवढे असतां अशक्त । कोठूनि सामर्थ्य आलें हें ॥२४१॥</p>
<p>
	लगेच दुसरे बाजूची वळचण । वळंघोनियां तेथील उतरण । तेथेंही लाववोनि तीच निसण । आले उतरून खालती ॥२४२॥</p>
<p>
	पाय लागतां धरेसी । दोन रुपये निसणवाल्यासी । दिधले बाबांनीं अति दक्षतेसीं । अविलंबितेसीं तात्काळ ॥२४३॥</p>
<p>
	लाविली दों ठायीं शिडी । हीच काय ती श्रमाची प्रौढी । यदर्थ बाबा भरपाई एवढी । करिती फेडी तयाची ॥२४४॥</p>
<p>
	जनास सहजीं जिज्ञासा । निसणवाल्यास इतुका पैसा । बाबा देती तरी हा कैसा । म्हणती हें पुसा तयांस ॥२४५॥</p>
<p>
	केला एकानें तेधवां धीर । बाबा देती प्रत्युत्तर । कोणाच्याही श्रमाचा भार । फुकट लवभार घेऊं नये ॥२४६॥</p>
<p>
	कोणाहीपासूनि घ्यावें काम । परी जाणावे तयाचे श्रम । लावावा जीवास ऐसा नियम । फुलट परिश्रम घेऊं नये ॥२४७॥</p>
<p>
	कोणीं जाणावें खरें इंगित । बाबा हें कां ऐसें करीत । हें तों तयांचें तयां अवगत । संतान्तर्गत अति गूढ ॥२४८॥</p>
<p>
	परिसतां मुखींचे उद्नार । तेच सर्वस्वी आम्हां आधार । ठेवितां तैसा वर्तन - निर्धार । चालेल व्यवहार सुरळीत ॥२४९॥</p>
<p>
	असो पुढील अध्यायाची गोडी । याहूनि आहे अति चोखडी । एका मोलकरिणीची पोर भाबडी । कोडें उलगडी श्रुतीचें ॥२५०॥</p>
<p>
	गणुदास प्रासादिक हरिदास । उपकार करावया प्राकृत जनांस । ईशावास्य - भाषांतरास । करावया कांस घातली ॥२५१॥</p>
<p>
	साईकृपें ग्रंथ लिहिला । परी कांहीं गूढार्थ राहिला । तेणें मनास संशय पडला । कैसा फेडिला बाबांनीं ॥२५२॥</p>
<p>
	बाबा वदत शिरडींत बसून  । पारल्यास जैं जासील परतोन । काकांच्या घरची मोलकरीण । शंका समाधान करील ॥२५३॥</p>
<p>
	ईशावास्य पद्मपरिसरीं । रुंजी घालील वाग्देवी भमरी । ते आमोद सेविती कळाकुसरी । श्रोतीं चतुरीं भोगिजे ॥२५४॥</p>
<p>
	असो पुढील अध्यायीं हें कथन । कर्ता करविता साई दयाघन । श्रोतां यथावकाश श्रवण । करावें कल्याण होईल ॥२५५॥</p>
<p>
	पंत हेमाड साईंस शरण । तैसाच भूतीं भगवंतीं लीन । श्रोतां देणें अवधानदान । साईनिवेदन गोड हें ॥२५६॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाड्पंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । मदनुग्रहो नाम एकोनविंशोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥</p>
<p>
	 </p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 23 Apr 2022 16:01:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 23 Apr 2022 16:13:33 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय १८]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-18-122042300059_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
जय सद्नुरो परम नित्या । जय सद्नुरो ब्रम्हासत्या । अनुभवें दाविसी जगन्मिथ्या । मायानियंत्या जय जया ॥१॥]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 18" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/23/full/1650709779-6004.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra Marathi chapter 18" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	जय सद्नुरो परम नित्या । जय सद्नुरो ब्रम्हासत्या । अनुभवें दाविसी जगन्मिथ्या । मायानियंत्या जय जया ॥१॥</p>
<p>
	जय जयाजी अनाद्यनंता । जय जयाजी द्वंद्वातीता । जय जयाजी विकाररहिता । निजरूप बोधिता तूं एक ॥२॥</p>
<p>
	सागरीं रिघाली करूं आंघोळी । परतेल काय सैंधवाची पुतळी । हें तों न घडे कदाकाळीं । तुजजवळीही तैसेंच ॥३॥</p>
<p>
	वेदश्रुति हीं जयाविशीं । विवाद करिती अहर्निसीं । तें अलक्ष्य तूं बोटानें दाविशी । अप्रयासें भक्तांसी ॥४॥</p>
<p>
	आलाच दैवाचा योग जर का । पडला पुरे का तुझा गर्का । मग हा आपुला वा हा परका । नाहीं या कुतर्का स्थान तैं ॥५॥</p>
<p>
	गताध्यायीं कथा पावन । ब्रम्हागुंडाळ्याचें आविष्करण । ब्रम्हार्थियाचें लोभावरण । प्रतिबंधकारण वर्णिलें ॥६॥</p>
<p>
	आतां अंदनुग्रहकथा । श्रव्ण कीजे आदरें श्रोतां । अनुभवा येईल तुमचिया चित्ता । मार्गदर्शकता बाबांची ॥७॥</p>
<p>
	हीही आहे गोड वार्ता । ती मी कथितों यथार्थता । श्रोतां आपुलालिया स्वार्था । स्वस्थचित्ता परिसावी ॥८॥</p>
<p>
	असतां श्रवणार्थीं सादर । वक्त्यास उल्हास आणि आदर । ह्रदया फुटे प्रेमपाझर । आनंदनिर्भर उभयतां ॥९॥</p>
<p>
	न करितां बुद्धिभेद तिळभर । जैसा यचाचा अधिकार । तैसाच तयास मार्ग साचार । उपदेशपुर:सर दाविती ॥१०॥</p>
<p>
	ऐसें कितीएकांचे मतें । गुरूनें जें कथिलें त्यातें । कथितां नये तें इतरांतें । विफल होते गुरुवाणी ॥११॥</p>
<p>
	हें तों केवळ काल्पनिक । नसतें स्तोम  निरर्थक । प्रत्यक्ष काय स्वप्नोक्तही देख । कथिती सद्वोधक सकळांतें ॥१२॥</p>
<p>
	मानाल जरी हें अप्रमाण । बुधकौशिक ऋषि प्रमाण । रामरक्षा दीक्षेचें स्वप्न । केलें कथन सर्वत्रां ॥१३॥</p>
<p>
	गुरु वर्षाकाळींचे घन । आवडीं वर्षती स्वानंदजीवन । तें काय ठेवावें कोंबून । यथेच्छ सेवून सेववावें ॥१४॥</p>
<p>
	लेंकाराची धरूनि हनुवटी । माय तयाच्या आरोग्यासाठीं । मायाळुपणें पाजी गुटी । तीच हातवटी बाबांची ॥१५॥</p>
<p>
	मार्ग तयांचा नव्हता गुप्त । कोण्या रीतीं कैसा अवचित । निजभक्तांचा हेतु पुरवित । सावचित्त तें ऐका ॥१६॥</p>
<p>
	धन्य धन्य सद्नरुसंगती । कोणा वर्णवे तियेची महती । आठवितां एकेक तयांच्या उक्ती । निजस्फूर्ति उचंबळे ॥१७॥</p>
<p>
	प्रेमें करितां ईश्वरार्चन । गुरुसेवा गुरुपूजन । होईल गुरुगम्य संपादन । इतर साधन तें फोल ॥१८॥</p>
<p>
	विक्षेप आणि आवरण । तेणें हा भवमार्ग संकीर्ण । गुरुवाक्य दीपकिरण । निर्विन्घ मार्गदर्शक ॥१९॥</p>
<p>
	गुरु प्रत्यक्ष ईश्वर । ब्रम्हा विष्णु महेश्वर । गुरूचि वस्तुत: परमेश्वर । ब्रम्हा परात्पर गुरुराय ॥२०॥</p>
<p>
	गुरु जननी गुरु पिता । गुरु त्राता देव कोपतां । गुरु कोपतां कोणी न त्राता । सदा सर्वदा जाणावें ॥२१॥</p>
<p>
	गुरु दर्शक प्रवृत्तीचा । तीर्थव्रत निवृत्तीचा । धर्माधर्म विरक्तीचा । वेदश्रुतीचा प्रवक्ता ॥२२॥</p>
<p>
	उघडूनि बुद्धीचे डोळे । संत दाविती निजरूप - सोहळे । पुरविती भक्तीचे डोहळे । अति कोवळे कारुणिक ॥२३॥</p>
<p>
	तेणें विषयवासना मावळे । निद्रेंतही ज्ञानचि चावळे । विवेक वैराग्य फळ जावळें । कृपाबळें हातीं ये ॥२४॥</p>
<p>
	जाहलिया सत्समागम । संतसेवा संतप्रेम । स्वयें भक्तकामकल्पद्रुम  । सर्व श्रम निवारी ॥२५॥</p>
<p>
	सदा असावें सत्परायण । कराव्या संतकथा श्रवण । वंदावे संतांचे चरण । पापक्षालन होईल ॥२६॥</p>
<p>
	लॉर्ड रे जैं इलाखाधिपती । क्राफर्डशाही घातली पालथी । तत्कालीन एक प्रसिद्धकीर्ति । लगले भक्तीस बाबांच्या ॥२७॥</p>
<p>
	हा संसार - तापत्रय खोटा । व्यापारधंद्यांत आला तोटा । मनास कंटाळा वीट मोठा । घेतला लोटा निघाले ॥२८॥</p>
<p>
	चित्त झालें अति अस्थिर । वाटे प्रवासा जावें दूर । सेवावा एकान्त सुखकर । ऐसा विचार द्दढ केला ॥२९॥</p>
<p>
	जीव जैं पडे अतिसंकटीं । देव आठवे तदा कष्टीं । मग तो भक्त करी हाकाटी । लागे पाठी देवाच्या ॥३०॥</p>
<p>
	परी न लागतां दुष्कर्मा ओहटी । देवाचें नांव येईना ओठीं । मग सप्रमता पाहूनि जगजेठी । संतभेटी करवितो ॥३१॥</p>
<p>
	तैसेंच त्या भक्ताचें जाहलें । पाहूनि संसारा अति कावले । स्नेही तयाचे वदते झाले । हितवचन वहिलें तें ऐका ॥३२॥</p>
<p>
	कां हो आपण शिरडीस जाना । समर्थ साईनाथांचे दर्शना । करा कीं तयांसी प्रार्थना । दयाघना त्या संता ॥३३॥</p>
<p>
	क्षणैक संतसंगती लाधते । चंचल मन निश्चल होतें । तात्काळ हरिचरणीं जडतें । मग अवघड तें परताया ॥३४॥</p>
<p>
	देशोदेशींचे लोक जाती । साईपदरजीं लोळती । महाराजांच्या आज्ञेंत वर्तती । अभीष्ट पावती सेवेनें ॥३५॥</p>
<p>
	ऐसी तयांची प्रसिद्धि कीर्ति । आबालवृद्ध सर्व जाणती । तयांसी येतां काकुळती । दु:खनिवृत्ति लाधाल ॥३६॥</p>
<p>
	शिरडी सांप्रत पवित्र स्थान । यात्रा वाहे रात्रंदिन । तुम्हीही पहा अनुभव घेऊन । संतदर्शन हितकारी ॥३७॥</p>
<p>
	अवर्षणें उद्विग्न अकिंचन । अवचित वर्षे विपुल घन । होतां भुकेनें व्याकुळ प्राण । पंचपव्कान्न वाढिलें ॥३८॥</p>
<p>
	तैसी स्नेह्यानें कथिली वार्ता । मानवली ती तया भक्ता । अनुभव घ्यावा आलें चित्ता । धरिला रस्ता शिरडीचा ॥३९॥</p>
<p>
	आले गांवीं घेतलें दर्शन । पायीं घातलें लोटांगण । तात्काल निवाले नयन । समाधान जाहलें ॥४०॥</p>
<p>
	जंए पूर्णब्रम्हा सनातन । स्वयंज्योति निरंजन । पाहूनि ऐसें साईंचें ध्यान । सुप्रसन्न मन जाहलें ॥४१॥</p>
<p>
	वाटलें पूर्वार्जित सभाग्यता । तेणोंचि हे पाय आले हाता । चित्तास लाधली शांतता । निश्चिंतता दर्शनें ॥४२॥</p>
<p>
	उपनाम जयांचें साठे । अंतरीं निश्चयाचे मोठे । गुरुचरित्र - पारायण नेटें । नेमनिष्ठें आरंभिलें ॥४३॥</p>
<p>
	सप्ताह पूर्ण होतां निशीं । बाब देती द्दष्टांत त्यांसी । निजकरीं घेऊनि त्या पोथीसी । अर्थ साठयांसी समजावीत ॥४४॥</p>
<p>
	स्वयें स्तित निजसनीं । समोर साठयांस बैसवुनी । गुरुचरित्राची पोथी घेउनी । निरूपणीं तत्पर ॥४५॥</p>
<p>
	बाब ग्रंथावर्तन करिती । पुराणिकसे कथा निरूपिती । साठे श्रोतेपणें स्वस्थचित्तीं । सादर ऐकती गुरुकथा ॥४६॥</p>
<p>
	हें काय ऐसें उफराटें । विचारांत पडले साठे । वाटलें तयांस आश्चर्य मोठें । कंठ दाटे प्रेमानें ॥४७॥</p>
<p>
	अज्ञानतम्उशीसी । ठेवूनियां मानेपाशीं । घोरत पडले जे वासनाकुशीसी । त्यां जागविसि दयाळा ॥४८॥</p>
<p>
	पहा ऐसियाहि समयासी । थापटोनियां आपणासी । गुरुचरित्र - पीयूषासी । पाजिलेंसी कृपाळा ॥४९॥</p>
<p>
	असो ऐसा द्दष्टान्त घडतां । साठे जागृत झाले तत्त्वतां । कळविती काकासाहेब दीक्षितां । साद्यंत वार्ता घडली ती ॥५०॥</p>
<p>
	म्हणती न कळे याचा अर्थ । जाणती एक बाबा समर्थ । काय कीं न कळे त्यांचे मनांत । काका साद्यंत पुसा कीं ॥५१॥</p>
<p>
	पुनश्च पोठ सुरु करावा । कीं झाला तितुकाचि पुरा समजावा । मनोदय बाबांचा पुसाया । तेणेंच विसांवा ये मना ॥५२॥</p>
<p>
	मग काका बाबांप्रती । समय पाहूनि स्वप्न निवेदिती । देवा आपण या द्दष्टान्तीं । काय साठयांप्रती जाणविलें ॥५३॥</p>
<p>
	सप्ताह ऐसाचि सुरू ठेवावा । किंवा येथूनि पुरा करावा । द्दष्टान्तार्थ स्वयें विवरावा । मार्ग दावावा तयांतें ॥५४॥</p>
<p>
	इतुकीच पायीं माझी विनंती । साठे मोठे भक्त भावार्थीं । कृपा व्हावी तयांवरती । पुरवावी आर्ती तयांची ॥५५॥</p>
<p>
	मग बाबा आज्ञापिती । “होऊ द्या आणिक एक आवृत्ती । वाचितां ही गुरूची पोथी । भक्त होती निर्मळ ॥५६॥</p>
<p>
	या पोथीचें पारायण । करितां होईल कल्याण । परमेश्वर होईल प्रसन्न । भवबंधन सुटेल” ॥५७॥</p>
<p>
	तें जंव बाबांनीं केलें कथन । करीत होतों मी पादसंवाहन । झालों अंतरीं विस्मयापन्न । वृत्ति स्फुरण पावली ॥५८॥</p>
<p>
	बाबा तरी हें ऐसें कैसें । साठयांस फळ तों अल्पायासें  । माझीं गेलीं वर्षानुवर्षें । सातचि दिवसें फळ त्यांसी ॥५९॥</p>
<p>
	एकचि पाठ गुरुचरित्राचा । केला साठयांनीं सातां दिसांचा । चाळीस वर्षांचा पाठ जयाचा । विचार तयाचा नाहींच कां ॥६०॥</p>
<p>
	एकासी फळ तों सात दिवसें । एकाचीं निष्फळ सात वर्षें । वाट पाहें मी चातक प्रकर्षें । दयाघन हा वर्षेल कैं ॥६१॥</p>
<p>
	येईल कैं ऐसा दिवस । प्रसन्न होईल ह संतावतंस । फेडील माझिया मनींची हौस । देईल उपदेश मज काय ॥६२॥</p>
<p>
	भक्तवत्सल श्रीगुरु साई । पहा तयांची काय नवलाई । मनीं वृत्ति उठली ते समयीं । तात्काळ त्यांहीं जाणिली ॥६३॥</p>
<p>
	ऐशाच अविद्येच्याही पोटीं । बर्‍या वाईट कोटयनुकोटी । वासना उठती उठाउठी । तितुक्यांची द्दष्टी तयांना ॥६४॥</p>
<p>
	‘मन चिंती तें  वैरी न चिंती’ । हें तों सर्वांसी ठावें निश्चितीं । इतर कोणी जरी तें नेणती । महाराज ओळखती तात्काळ ॥६५॥</p>
<p>
	परी ती माय अतिकृपाळ । पोटांत घाली निंद्य सकळ । अनिंद्या पाहूनि प्राप्तकाळ । तितुक्यास चालन देई ती ॥६६॥</p>
<p>
	तंव तें मनोगत जाणुनी । बाबा वदती मजलागुनी । ऊठ त्या शाम्याकडे जाउनी । रुपये घेउनी पंधरा ये ॥६७॥</p>
<p>
	बैसें तयापासीं क्षणभर । गोष्टी बोला परस्पर । दक्षिणा देईल ती घेऊनि सत्वर । येईं माघारा परतोन ॥६८॥</p>
<p>
	कृपा उपजली साईनाथा । दक्षिणेच्या करूनि निमित्ता । म्हणती माग जा आतांचे आतां । रुपये मजकरितां शामाकडे ॥६९॥</p>
<p>
	झालियावरी ऐसी आज्ञा । बैसावया पुढें कोणाची प्राज्ञा । बैसतां ती होईल अवज्ञा । घेऊनि अनुज्ञा ऊठलों ॥७०॥</p>
<p>
	मग मीं तात्काळ गमन केलें । शामरावही बाहेर आले । होतें नुकतेंच स्नान केलें । नेसत ठेले धोतर ॥७१॥</p>
<p>
	नुकतेंच झालें होतें स्नान । धूतवस्त्र परिधान करून । होते घालीत धोतराची चूण । मुखें गुणगुण नामाची ॥७२॥</p>
<p>
	म्हणती काय मध्येंच कोठें । मशिदींतूनि आलांत वाटे । चर्येवरी कां चंचलता उमटे । ऐसे एकटे कां आज ॥७३॥</p>
<p>
	या बैसा मी आतांच न्हालों । हा पहा धोतर चुणीत आलों । जातों देवावर पाणी घालों । समजा परतलों ऐसाचि ॥७४॥</p>
<p>
	आपण करितां तांबूल भक्षण । तों मी सारितों पूजाविधान । करूं मग वार्ता सावधान । समाधानपूर्वक ॥७५॥</p>
<p>
	माधवराव घरांत जाती । मग तेथेंच खिडकीवरती । होती नाथभागवताची पोथी । सहज हातीं घेतली ॥७६॥</p>
<p>
	यद्दच्छेनें ग्रंथ उघडला । अकल्पित जेथें आरंभ केला । प्रात:काळीं जो अपूर्ण टाकिला । वाचावया आला तोच भाग ॥७७॥</p>
<p>
	अति आश्चर्य मना वाटलें । प्रात:काळीं वाचन जें हेळसिलें । बाबांनीं तें संपूर्ण करविलें । वरी लाविलें नियमन ॥७८॥</p>
<p>
	नियमन म्हणजे नियमें वाचन । न होतां संपूर्ण निश्चिंत परिशीलन । अपुरें टाकूनि नियमितोपान  । स्थानापासून चळूं नये ॥७९॥</p>
<p>
	आतां थोडीसी उपकथा । ओघास आली न ये टाकितां । श्रोतां परिसावी सादरतां । या नाथभागवतासंबंधें ॥८०॥</p>
<p>
	तें हें नाथभागवत । गुरुभक्तिरसे परिप्लुत । साईकृपापात्रभूत । नित्य दीक्षित वाचिती ॥८१॥</p>
<p>
	जगदुद्धाराचिया कारणें । ब्रम्हायाठायीं जें नारायणें । पेरिलें तें मग नारद - क्षेत्रीं त्यानें । बीज आणिलें कणसासी ॥८२॥</p>
<p>
	जया क्षेत्राची दशलक्षणी । केली संवगणी बादरायणीं । शुकें परीक्षितीच्या खळ्यांत मळणी । केली निवडणी कणसांची ॥८३॥</p>
<p>
	स्वामी श्रीधरें मारलें हडप । स्वामी जनार्दनें केलें माप । रसभरित पव्कान्नें उमाप । नाथप्रताप भोजन ॥८४॥</p>
<p>
	स्कंध एकादश त्यांतील जाण । भक्तिप्रेमसुखाची खाण । तें हें बत्तीसखणी वृंदावन । नित्य वाचन दीक्षितां ॥८५॥</p>
<p>
	दिवसा तयाचें करिती निरूपण । रात्रौ वाचिती भावार्थरामायण । हाही ग्रंथ गुर्वाज्ञा म्हणून  । जाहला प्रमाण दीक्षितां ॥८६॥</p>
<p>
	भक्तिसुखामृताचें सार । ज्ञानेश्वरीचा द्वितीयावतार । तो हा नाथांचा मूर्त उपकार । महाराष्ट्रावर उदंड ॥८७॥</p>
<p>
	करोनियां प्रात:स्नान । नित्यनेम साईपूजन । अन्य देव देवतार्चन । नैवेद्य नीरांजन उरकतां ॥८८॥</p>
<p>
	मग श्रोतासमवेत सविस्तर । पय:प्रसाद अल्पाहार । सारोनि नित्यक्रमानुसार । पोथी सादर वाचिती ॥८९॥</p>
<p>
	जया गोडिये सहस्र पाराय्णें । भगवत्परायण तुकारामानें ।  केलीं भंडार्‍यावर एकान्तपणें । ते गोडी कवणें वर्णावी ॥९०॥</p>
<p>
	हा महाप्रसादिक दिव्य ग्रंथ । दीक्षित शिष्य निष्ठावंत । म्हणोनि जीवांच्या उद्धरार्थ । साईसमर्थ आज्ञापिती ॥९१॥</p>
<p>
	जाणें नलगे वनाप्रती । भगवंत प्रकटे उद्धवगीतीं । श्रद्धायुक्त जे पारायण करिती । भगवत्प्राप्ति रोकडी ॥९२॥</p>
<p>
	भारतीं संवाद कृष्णार्जुनांचा । त्याहूनि सरस हा कृष्णोद्धवांचा । तो या भागवतीं उपदेश साचा । प्रेमळ वाचा नाथांची ॥९३॥</p>
<p>
	असो ऐसा हा प्रासादिक ग्रंथ । ज्ञानदेव भावार्थदीपिका - समवेत । समर्थ कृपाळू साईनाथ । बाचवीत नित्य शिरडींत ॥९४॥</p>
<p>
	सखाराम हरी जोग । तयांस हा बाबांचा नियोग । साठयांचे वाडियांत हा योग । भक्तां उपयोग हा मोठा ॥९५॥</p>
<p>
	प्रत्यहीं या ग्रंथाचें श्रवण । बाबा कित्येक भक्तांलागून । श्रवण करविती कळबळून । भक्तकल्याणवांछेनें ॥९६॥</p>
<p>
	अगाध बाबांची अनुग्रहकुसरी । भक्तां उपदेशिती परोपरी । भक्त जबळीं वा देशांतरी । बाबा अंतरीं सन्निधचि ॥९७॥</p>
<p>
	आपण जरी मशिदीं बसती । कोणाही कांहीं कार्य नेमिती । तयासी देऊनियां निजशक्ती । करवूनि घेती तें कार्य ॥९८॥</p>
<p>
	बापूसाहेब जोगांप्रत । वाडयांत पोथी वाचाया सांगत । ते ती वाचीत नित्य नेमस्त । श्रोतेही येत ऐकाया ॥९९॥</p>
<p>
	जोगही दुपारी भोजनांतीं । नित्य जाऊनि बाबांप्रती । चरण वंदूनि घेऊनि विभूति । आज्ञापन घेती पोथीचें ॥१००॥</p>
<p>
	कधीं वाचीच ज्ञानेश्वरी । कधीं ते नाथभागवतावरी । पारायण मांडीत आनंदनिर्भरीं । व्याख्यान करीत अर्थाचें ॥१०१॥</p>
<p>
	ऐसी अनुज्ञा झालियापाठीं । भक्त जे येती बाबांचे भेटी । कितीएकां पोथी ऐकावयासाठीं । उठाउठी पाठवीत ॥१०२॥</p>
<p>
	कधीं सांगत संक्षिप्त गोष्टी । श्रोती जों सांठवी निजकर्णसंपुटीं । तोंच बाबा म्हणती जा उठीं । त्या पोथीसाठीं वड्यांत ॥१०३॥</p>
<p>
	श्रोता भावार्थी पोथीस जातां । निघावी पोथींतही ऐसीच कथा । कीं जी पूर्वील कथेची द्दढता । अर्थावबोधकता पूर्ण करी ॥१०४॥</p>
<p>
	ज्ञानेश्वरांची ज्ञानेश्वरी । अथवा एकनाथांची वैखरी । बाबांच्या कथेचाच अनुवाद करी । श्रोतयां नवलपरी ही मोठी ॥१०५॥</p>
<p>
	एकाद्या पोथीचा विवक्षित भाग । वाचावा ऐसा नसतांही नियोग । पूर्वनिवेदित गोष्टीचा सुयोग । पोथीत जोग वाचीत ॥१०६॥</p>
<p>
	भगवद्नीता भागवत । मुख्यत: हेच दोन ग्रंथ । भगवतधर्माचें सारभूत । जोग हे नित्य वाचीत ॥१०७॥</p>
<p>
	गीता ज्ञानेश्वरी टीका । जया नांव ‘भावार्थदीपिका’ । भागवत एकादशस्कंध निका । परमार्थभूमिका नाथांची ॥१०८॥</p>
<p>
	असो या नित्यक्रमानुसर । भागवतवाचनाचा प्रचार । मींही तें वाचीं निरंतर । पडलें अंतर ते दिनीं ॥१०९॥</p>
<p>
	कथा एक अर्धी वाचिली । मंडळी मशिदीं जावया निघाली । वाचतां वाचतां पोथी ठेविली । धांव मारिली मी तेथें ॥११०॥</p>
<p>
	इच्छा ऐकाव्या बाबांच्या गोष्टी । बाबांच्यापरी आणीक पोटीं । भागवत सोडूनि इतर कष्टीं । नाहींच तुष्टी तयांना ॥१११॥</p>
<p>
	येच अर्थीं नेटेंपाटें । राहिलें भागवत वाचविलें वाटे । ऐसें हें बाबांचें कौतुक मोठें । प्रेम लोटे आठवितां ॥११२॥</p>
<p>
	असो भागवती कथा संपली । उपकथाही येथें सरली । माधवरावांची पूजा आटपली । स्वारी आली बाहेर ॥११३॥</p>
<p>
	अहो बाबांचा निरोप आहे । तोच मी घेऊनि आलों पाहें । ‘शामापासून पंधरा रुपये । दक्षिणा ये घेऊनि’ ॥११४॥</p>
<p>
	बैसलों होतों सेवा करीत । अकस्मात तुमचें स्मरण होत । “ऊठ शामाकडे जा म्हणत । दक्षिणेसीं परत ये” ॥११५॥</p>
<p>
	“बैस म्हणाले तयांचे घरीं । विळभर तयांसवें वार्ता करीं । बोलून चालून परस्परीं । मग माघारीं तूं येईं” ॥११६॥</p>
<p>
	माधवराव जंव हें परिसत । झाले अत्यंत आश्चर्यचकित । रुपयांऐवजीं नमस्कार सांगत । दक्षिणा म्हणत ही आमुची ॥११७॥</p>
<p>
	बरें असों एक झालें । पंधरा नमस्कार पदरीं बांधले । परी वार्ता करावयास या कीं वहिलें । म्हणूनि म्हटलें तयांस ॥११८॥</p>
<p>
	काय गोष्टी सांगतां सांगा । फेडा कीं माझ्या श्रवणपांगा । बाबांची निर्मळ यशगंगा । दुरितभंगा करू कां ॥११९॥</p>
<p>
	मग माधवराव म्हणती बैसा । या देवाचा खेळचि ऐसा । तुम्हीही सर्व जाणतसां । क्षणैक विसांवा घ्या बसा ॥१२०॥</p>
<p>
	हें घ्या पान हा घ्या काथ । चुना सुपारी आहे डब्यांत । हा मी आलों एका क्षणांत । टोपी डोक्यांत घालूनि ॥१२१॥</p>
<p>
	अगाध साईबाबांच्या लीला । किती म्हणूनि मी सांगूं तुम्हांला । आपण काय थोडया देखिल्या । शिरडीस आल्यापसोनि ॥१२२॥</p>
<p>
	मी तों केवळ खेडवळ । आपण शहरवासी सकळ । काय वानाव्या आपणाजवळ । लीला अकळ तयांच्या ॥१२३॥</p>
<p>
	येतों म्हनूनि घरांत गेले । देवास फूल पान वाहिलें । तात्काळ टोपी घालूनि आले । बोलत बैसले मजसवें ॥१२४॥</p>
<p>
	कायद देवाची अतर्क्य लीला । कोण जाणेल याची कळा । अंत नाहीं याच्या खेळा । खेळूनि खेळानिराळा ॥१२५॥</p>
<p>
	काय तुम्ही विद्येचे भोक्ते । एकाहूनि एक ज्ञाते । आम्हां गांवढळां काय कळतें । चरित्र अकळ तें बाबांचें ॥१२६॥</p>
<p>
	ते काय गोष्टीवार्ता न सांगती । आम्हांपाशीं किमर्थ पाठविती । त्यांची करणी तेच जाणती । मानवी वृत्ती नाहीं ती ॥१२७॥</p>
<p>
	आलेंच आतां ओघावरी । गोष्टही मज आठवली बरी । करूं वार्ता कांहींतरी । वेळ साजरी करूं कीं ॥१२८॥</p>
<p>
	प्रत्यक्ष आमुचे द्दष्टीसमोर । कथितों येथें घडलेला प्रकार । जया मनीं जैसा निर्धार । तैसा ते पार पाडिती ॥१२९॥</p>
<p>
	कधीं कधीं बाबाही किती । मनुष्याचा अंत पाहती । भक्ति प्रेम कसास लाविती । तेव्हांच देती उपदेश ॥१३०॥</p>
<p>
	“उपदेश” हा शब्द कानीं पडतां । स्मरली साठयांची गुरुचरित्रकथा । सकृद्दर्शनीं जणूं विद्युल्लता । चमकली चित्ती माझिया ॥१३१॥</p>
<p>
	नसेल का ही शामाची योजना । मशिदींतील मम चंचल मना । स्थैर्य आणावयालागीं कल्पना । अघटित घटना बाबांची ॥१३२॥</p>
<p>
	असो ही जी उठली वृत्ति । तैसीच दाबूनि ठेविली चित्तीं । कथाश्रवणीं दुणावली आर्ती । तियेची पूर्ती संपाटूं ॥१३३॥</p>
<p>
	मग बाबांच्या गोष्टी वार्ता । थोडया थोडया सुरू होतां । आनंद वाटूं लागला चित्ता । भक्तवत्सलता पाहूनि ॥१३४॥</p>
<p>
	पुढें आणीक कथा सांगती । म्हणती एक देशामुखीण होती । तियेच्या पहा आलें चित्तीं । संतसंगती करावी ॥१३५॥</p>
<p>
	ऐकूनि साईबाबांची कीर्ति । संगमनेरचे लोकांसंगतीं । आली बाई शिरडीप्रती । दर्शनप्रीतीं बाबांच्या ॥१३६॥</p>
<p>
	खाशाबा देशमुखाची ही आई । नाम इयेचें राधाबाई । निष्ठा धरूइ साईंचे पायीं । दर्शन घेई साईंचें ॥१३७॥</p>
<p>
	दर्शन घडलें यथासाङ्ग । गेला मार्गींचा शीणभाग । जडला श्रीचरणीं अनुराग । कार्यभग आठवला ॥१३८॥</p>
<p>
	होती तियेच्या मनीं आर्त । गुरु करावे साईसमर्थ । करितील उपदेश यथार्थ । जेणें परमार्थ साधेल ॥१३९॥</p>
<p>
	बाई वयानें म्हातारी । निष्ठा अत्यंत बाबांवरी । मिळावा उपदेश कांहींतरी । निर्धार अंतरीं हा केला ॥१४०॥</p>
<p>
	बाबा जोंवरी मजला स्वतंत्र । देती न एकादा कानमंत्र । करिती न मज कृपापात्र । तोंवरी अन्यत्र जाणें ना ॥१४१॥</p>
<p>
	व्हावा साईमुखींचाच मंत्र । घेतां इतरत्र तो अपवित्र । श्रीसाई संताग्रणी पवित्र । अनुग्रहपात्र मज करो ॥१४२॥</p>
<p>
	करूनि ऐसा अंत:करणें । द्दढनिश्चय त्या बाईनें । वर्ज्य करूनि खाणें पिणें । घेऊनि धरणें बैसली ॥१४३॥</p>
<p>
	आधींच वयानें म्हातारी । पोटांत अन्न नाहीं तिळभरी । पाणीही पिईना घोटभरी । श्रद्धा भारी उपदेशीं ॥१४४॥</p>
<p>
	तीन दिवस अहर्निशीं । म्हातारी राहिली उपवाशी । बाबा उपदेस देतील जे दिशीं । प्रायोपवेशी तोंवरी ॥१४५॥</p>
<p>
	मंत्रोपदेश घेतल्याविणें । किमर्थ शिरडीचें जाणें जेणें । उतरल्या स्थळीं घेतलें । निर्वाण तिणें मांडिलें ॥१४६॥</p>
<p>
	अन्न पान केलें वर्जन । ऐसें तप तें तीन दिन । करितां कष्टली देशमुखीण । उदासीन बहु झाली ॥१४७॥</p>
<p>
	माधवरावांस विचार पडला । प्रकार हा तंव नाहीं भला । काय करावें या भवितव्याला । म्हातारी मरणाला भिईना ॥१४८॥</p>
<p>
	मग ते जाऊनि मशिदीसी । बैसते झाले बाबांपाशीं । नित्याचिया कुशलवृत्तासी । आदरेंशीं ते पुसत ॥१४९॥</p>
<p>
	“शामा आज काय विचार । ठीक आहेना समाचार । तो नारायण तेली चळला फार । गांजी अनिवार मजलागीं” ॥१५०॥</p>
<p>
	पाहोनि म्हातारीचा विचार । शामा आधींच कष्टी फार । कैसें करावें तरी साचार । पुसे निर्धार बाबांसी ॥१५१॥</p>
<p>
	हें काय गौडबंगाल देवा  । खेळ आपुला इतरां न ठावा । त्वां माणसें एकेक आणावीं गांवा । आम्हां पुसावा विचार ॥१५२॥</p>
<p>
	ती देशमुखीण वयतीत । अन्नपाण्याविरहित । राहिली तीन दिवस उपोषित । तुजवरी हेत धरुनि ॥१५३॥</p>
<p>
	म्हातारी ती परम हट्टी । तुझिया पायीं निष्ठा कट्टी । तूं तों तीस न पाहसी द्दष्टीं । करितोस कष्टी कां तीस ॥१५४॥</p>
<p>
	आधींच तें शुष्क काष्ट । दुराग्रही महा खाष्ट । अन्नवीण वाटतें स्पष्ट । प्राणचि नष्ट होतील ॥१५५॥</p>
<p>
	म्हणतील म्हातारी गेली दर्शना । उपदेशाची धरूनि बासना । साईबाबांसी नाहीं करूणा । केलें मरणाधीन तिला ॥१५६॥</p>
<p>
	बाबा घडों न द्या ऐसा प्रवाद । सांगोनि तिचा तिला हितवाद । कराना कां तिजवरी प्रसाद । हा अप्रमाद निरसा कीं ॥१५७॥</p>
<p>
	अंगांत नाहीं उरलें त्राण । कासावीस होतील प्राण । म्हातारी ती पावेल मरण । तुम्हांसी अपशरण येईल ॥१५८॥</p>
<p>
	म्हातारीचें दुर्धर व्रत । आम्हांसी पडली चिंता बहुत । दुर्दैवें म्हातारी जालिया मृत । गोष्ट अनुचित घडेल ॥१५९॥</p>
<p>
	म्हातारीनें मांडिला त्रागा । न करितां तिजवरी कृपानुरागा । दिसे न धडगत तिची मला गा । स्वमुखें सांगा तीस कांहीं ॥१६०॥</p>
<p>
	झाली सीमा अध्यायाची । पुढील श्रवणेच्छा श्रोतयांची । पुढील अध्यायीं पुरेल साची । प्रेमरसाची ती जोड ॥१६१॥</p>
<p>
	पुढें बाबांनीं प्रेमळपणें । उपदेश जो केला त्या म्हातारीकारणें । तयाचिया सादर श्रवणें । उठेल धरणें अविद्येचें ॥१६२॥</p>
<p>
	हेमाड साईपायीं शरण । श्रोतयां घाली लोटांगण । अल्पायासें भवतरण । कराया श्रवण तत्पर व्हा ॥१६३॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । मदनुग्रहो नाम अष्टादशोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 ॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 23 Apr 2022 15:58:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 23 Apr 2022 16:12:57 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय १७]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-17-122042300058_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
गताध्यायीं अभिवचन । कीं ये अध्यायीं होईल निरूपण । श्रेय आणि प्रेयलक्षण । सादरें श्रवण तें परस्पर । श्रेय - प्रेय ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 17" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/23/full/1650709645-3504.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra marathi adhyay 17" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	गताध्यायीं अभिवचन । कीं ये अध्यायीं होईल निरूपण । श्रेय आणि प्रेयलक्षण । सादरें श्रवण तें परस्पर । श्रेय - प्रेय तयापरी ॥२॥</p>
<p>
	प्रेयार्थ जयाचें मन धांवे । स्वार्थापासाव तो भ्रंश पावे । श्रेय तें विवेकरूप आहे । अविवेकरूप प्रेय कीं ॥३॥</p>
<p>
	श्रेयाचा विषय केवळ विद्या । प्रेयाचा तो निखळ अविद्या । प्रेय कधीं ना भुलवी सुज्ञां । श्रेय अज्ञां नावडे ॥४॥</p>
<p>
	जोंवरी कनक - कामिनीहोड । इंद्रियांसी विषयांची आवड । विवेक - वैराग्या नाहीं जोड । प्रेयचि गोड तोंवरी ॥५॥</p>
<p>
	नीरक्षीराची मिसळ । तेवीं प्रेयश्रेयांची भेसळ । जेवीं दुग्ध तेवढें निवळ । सेविती मराळ मानसीं ॥६॥</p>
<p>
	तेवींच जे धीर बुद्धिमंत । विवेकी आणि भाग्यवंत । श्रेयासी केवळ लोलंगत । प्रेयासी विन्मुख सर्वदा ॥७॥</p>
<p>
	तेच पहा मंदबुद्धी  । शरीर - पशु - पुत्र - धन - मानादि । योगक्षेमाच्या लागोनि नादीं । प्रेय साधिती एकलें ॥८॥</p>
<p>
	श्रेय काय प्रेय काय । ज्ञात झालें जरी उभय । तैसाचि ग्रहणव्यवसाय । जरी स्वायत्त पुरुषासी ॥९॥</p>
<p>
	तरीही प्राप्त होतां उभय । निवड करणें अवघड विषय । करूनि मंदबुद्धीवरी जय । आलिंगी प्रेय तयासी ॥१०॥</p>
<p>
	सारूं प्रेय आदरूं श्रेय । पुरुषार्थ तो हाचि होय । असतां पयमिश्रित तोय । पयचि घेई हंस जैसा ॥११॥</p>
<p>
	श्रेय आणि प्रेय हीं दोन । जरी हीं पुरुषाचे स्वाधीन । असमर्थ कराया हें विवेचन । विवेकहीन मंदमति ॥१२॥</p>
<p>
	श्रेय तें आहे कशांत । आरंभीं जानिलें पाहिजे निश्चित । मग येतां प्रतिबंध मार्गांत । प्रतिकार साद्यंत करूं ये ॥१३॥</p>
<p>
	येथेंच पुरुषार्थ द्दष्टीपुढां । येवोनि ठाके दत्त निधडा । म्हणोनि श्रेयार्थचि करा झगडा । करोनि धडा बुद्धीचा ॥१४॥</p>
<p>
	अतर्क्य संसारचक्राचे फेर । अखंड - भ्रमती अष्टौप्रहर । आध्यात्मिकादि त्रिताप प्रखर । दुर्निवार नर साहे ॥१५॥</p>
<p>
	तेणें आत्यंतिक दु:खकहर । सहन करितां होई जर्जर । शोधी मग तन्निवर्तनपर ।  सोपीं सुखकर साधनें ॥१६॥</p>
<p>
	दु:सह हें भवचक्र परिवर्तन । होईल कैसें याचें स्तंभन । तदर्थ असेल काय साधन । हें अन्वेषण आदरी ॥१७॥</p>
<p>
	थोर भाग्यें हे बुद्धि उपजतां । तेथूनि निपजे पुरुषार्थता । मग तो सदुपायसाधकता । निजस्वार्था वरील ॥१८॥</p>
<p>
	अनादि अविद्या अथवा माया । शुक्तिरजत मृग्जलवत्‌ वायां । अध्यासरूप महदंतराया । विलया नेलें पाहिजे ॥१९॥</p>
<p>
	स्वप्नांत सोन्याच्या गारा वर्षती । प्रयत्नें सांठवण केल्या अमिती । वाटे वेळीं कामास येती । हारवून जाती जागृतीं ॥२०॥</p>
<p>
	द्दष्टाद्दष्ट - भोगवासना । आशा तृष्णा वा कामना । सदैव प्रतिबंधक जाणा । समूळ खाणा या आधीं ॥२१॥</p>
<p>
	अशक्य दिसाया सूर्यकरें । बुद्धि जेथूनि माघारी फिरे । जेथ वेदश्रुतीचें पाऊल न शिरे । तें निजकरें गुरु दावी ॥२२॥</p>
<p>
	काम - क्रोध उभयवृत्ति । करूं न देती ज्ञानप्राप्ति । श्रवण - मनन - समाधिविच्छित्ति । हातोहातीं त्या करिती ॥२३॥</p>
<p>
	दीपाकर्पूरा होतां लगटी । सभवे काय लोटालोटी । उभयत्र भेटी होण्याची खोटी । दीपत्वें उठे कर्पूर ॥२४॥</p>
<p>
	श्रुतिस्मृतींला अविधित । दुष्कर्मीं लोळे जो अविरत । ज्ञानी असूनि काय हित । विहिताविहित जो नेणे ॥२५॥</p>
<p>
	तैसाच जो नित्य अशांत । अंत:करण असमाहित । इंद्रियलौल्यें विक्षिप्तचित्त । ज्ञानें निर्वृत होईना ॥२६॥</p>
<p>
	ज्याचे चित्तास समाधान । जो गुरुपुत्र आचारवान । ज्याचें निश्चल आत्मानुसंधान । ज्ञानसंपन्न तो एक ॥२७॥</p>
<p>
	हो संसार वा मोक्षगामी । जाणें जरी निजधामीं । होई शरीररथस्वामी । केवळ वाग्मी काय करी ॥२८॥</p>
<p>
	येथें वाचेसी नाहीं थार । अभ्यास एक सर्वसार । रथस्थानीं योजी शरीर । स्वयें स्थिर बैसे गा ॥२९॥</p>
<p>
	या निजशरीराच्या रथीं । निजबुद्धीस करीं सारथी । स्वयें स्वामी बैस रथी । स्वस्थचित्त ऐस तूं ॥३०॥</p>
<p>
	दुर्गमरूप रसमार्गराजी । कंठावया मग सारथी योजी । आवरी मन:प्रग्रहांमाजी । दशेंद्रियवाजी उच्छृंखळ ॥३१॥</p>
<p>
	घोडे जरी सैरा धांवती । लगाम राखील स्थानावरती । तो निरवून सारतिया हातिं । स्वस्थचित्तीं बैसें तूं ॥३२॥</p>
<p>
	सारथी कुशल आणि निपुण । तरीच घोडे चालती कसून । तोच मन:प्रग्रहपराधीन । होतां बलहीन होतसे ॥३३॥</p>
<p>
	विवेकबुद्धीचें सारथ्य जेथ । जो समनस्क समाहितचित्त । तयासीच परमपद प्राप्त । इतर मार्गांत थकतात ॥३४॥</p>
<p>
	जयाचें सदा अयुक्त मन । तया न कदा समाधान । तया न तत्पदाभिगमन । संसारपरिवर्तन चुकेना ॥३५॥</p>
<p>
	ऐसें तें पद परम मोठें । वास्तव्य तरी तयाचें कोठें । मनींची आशंका फिटे । प्रकट जैं तें आपैसें ॥३६॥</p>
<p>
	येथें न चले तर्कवाद । अनुवाद प्रवाद वा संवाद । ईशकृपेनेंच लागेल दाद ॥ इतर वाद ते व्यर्थ ॥३७॥</p>
<p>
	न चले येथ तर्काची चतुराई । तर्कज्ञमति कुंठित होई । भोळा भावचि सिद्धीस जाई । हेच नवलाई येथील ॥३८॥</p>
<p>
	सम्यग्ज्ञानासि जे कारण । ते गति आन ते बुद्धीही आन । तो आगमज्ञही वेगळाच जाण । उत्तम ज्ञानदानी जो ॥३९॥</p>
<p>
	काया अमोलिक चालिली वायां । धनकाम ही दुपारची छाया । जाणोनि हरीची दुर्घट माया । लागें पायां संतांच्या ॥४०॥</p>
<p>
	संत भवसागरीचें तारूं । तूं हो तेथील एक उतारू । तयांवीण पैलपारू । कोण उतरूं समर्थ ॥४१॥</p>
<p>
	विवेक - वैराग्य यांची जोड । बांधील तयांची जो सांगड । तो हो कां जडमूढ दगड । अवघड ना त्या भवसिंधु ॥४२॥</p>
<p>
	षङ्गुणैश्वर्य भगवंताचें । ‘वैराग्य’ हें प्रथमैश्वर्य साचें । असतील जे महद्भाग्याचे । विना इतरांचे वांटया  न ये ॥४३॥</p>
<p>
	विहितकर्म केलियावीण । होईना चित्तशुद्धि निर्माण । चित्तशुद्धि न होतां जाण । ज्ञानसंपादन घडेना ॥४४॥</p>
<p>
	तस्मात्‌ कर्मचि एक जाण । ज्ञानप्राप्तीचें मूळ कारण । नित्यनैमित्तिक कर्मानुष्ठान । तेणेंच क्षाळण मळाचेम ॥४५॥</p>
<p>
	एवं शुद्ध झालेल्या चित्तीं । विवेक - वैराग्यां उत्पत्ति । शमदमादि साधनसंपत्ति । विदेहमुक्ति ये हातीं ॥४६॥</p>
<p>
	फलकाम - संकल्पत्यागें । चित्तैकाग्रतेच्या योगें । अनन्यत्वें जो गुरूसी शरण रिघे । पदरीं घे त्या सद्नुरू ॥४७॥</p>
<p>
	जो बहि:प्रवृत्तिशून्य़ । भाविक भक्त अनन्य ।  ज्ञानलाभें होई प्रज्ञ । उपाय अन्य चालेना ॥४८॥</p>
<p>
	तेंही ज्ञान लाभल्यावरी । अधर्ममार्गें आचरण करी । अत्र ना अमुत्र खालीं ना वरी । त्रिशंकूपरी लोळकंबे ॥४९॥</p>
<p>
	जीवाची जे अज्ञानवृत्ति । तीच खरी संसारप्रवृत्ति । झालिया आत्मज्ञानप्राप्ति । तेच निवृत्ति संसारा ॥५०॥</p>
<p>
	आत्मज्ञ सदा अहंभावरहित । धर्माधर्म - शुभाशुभविरहित । तयांस तें संसारांतर्गत  । हिताहित काय पां ॥५१॥</p>
<p>
	विराली देहाहंकारवृत्ति । तात्काळ तेथेंच संचली निवृत्ति । तीच जीवाची परमात्मस्थिति । खूण निश्चितीं बांधावी ॥५२॥</p>
<p>
	प्रवृत्तिठायीं शत्रु मित्र । निवृत्तीचें तों हें विचित्र । मीच मी पाहतां सर्वत्र । शत्रुत्व - मित्रत्व तैं कैंचें ॥५३॥</p>
<p>
	ऐसिया महासुखापुढें । देह - महद्दु:ख तें बापुडें । तैं कोण ऐहिक सुखा रडे । महत्सुख आतुडे जैं ॥५४॥</p>
<p>
	ऐहिक दु:खाचे डोंगर । कोसळोत मग तयावर । परी तो न हाले लवभर । गिरिवर केवळ धीराचा ॥५५॥</p>
<p>
	भगवंत ज्यावरी प्रसन्न होतो । त्यालाच मग तो वैराग्य देतो । त्याशीं विवेकाची सांगड बांधितो । पार उतरवितो भवसागर ॥५६॥</p>
<p>
	आदर्शीं उमटल्या मुखापरी । स्पष्टात्मदर्शनीं हेतु जो धरी । तया येथें भू कीं ब्रम्हालोक वरी । जागा तिसरी नाहींच ॥५७॥</p>
<p>
	यागीं होतां देवतातृप्ति । पितृलोकाची होईल प्राप्ति । लाधेल कर्मफलोपभुक्ति । आत्मसंवित्ति लाधेना ॥५८॥</p>
<p>
	गंधर्व - महर्जनस्तप :--- सत्य । तेथील आत्मदर्शन अति अविविक्त । यालागीं जे आत्मदर्शनासक्त । भूलोक यथोक्त वांच्छिती ॥५९॥</p>
<p>
	येथें होते चित्तशुद्धि । आदर्शापरी निर्मल बुद्धि । शुद्ध आत्मस्वरूप त्रिशुद्धि । प्रतिबिंबित होतसे ॥६०॥</p>
<p>
	दुजें स्थान जें ब्रम्हालोक । तेथेंही होतो आत्मावलोक । परी सायास लागती अनेक । कष्टकारक अतितर तो ॥६१॥</p>
<p>
	सर्पावाणी माया वेटाळी । अक्षी आंतून आंतडीं पिळी । बाहेरही सर्वांग कवटाळी । समर्थ टाळी कोण तिये ॥६२॥</p>
<p>
	“तुम्ही बसल्या बसल्या पहातां । खिशांत पन्नासपट रुपये असतां । काढा पाहू बाहेर आतां । ब्रम्हा तों खिशांत तुमचेच” ॥६३॥</p>
<p>
	काढा म्हणतां हात घालिती । गृहस्थ पुडकें खिशांतून काढिती । दहादहांच्या पंचविंशती । नोटा मोजिती पुडक्यांत ॥६४॥</p>
<p>
	गृहस्थ विरघळले मनींचे मनीं । केवढे महाराज अंतर्ज्ञानी । मस्तक ठेविती तयांचे चरणीं । आशीर्वचनीं उत्कंठा ॥६५॥</p>
<p>
	मग बाबा म्हणती ते वेळे । “गुंडाळ आपुलें ब्रम्हागुंडाळें । लोभाचें जाहल्यावीण वाटोळीं । ब्रह्मा न मिळे तुजलागीं ॥६६॥</p>
<p>
	पुत्रपश्चादि - वित्तार्जन । आसक्त यांतचि जयाचें मन । तयास कैंचें ब्रम्हाज्ञान । द्रव्यव्यवधान न सुटतां ॥६७॥</p>
<p>
	महाकठिण वित्तमोह । तृष्णावर्त दु:खगाह । मद मत्सर मकर दु:सह । एक नि:स्पृह तरेल ॥६८॥</p>
<p>
	लोभाशीं ब्रम्हाचें अखंड वैर । तेथें ध्याना नाहीं अवसर । कैंची मुक्ति विरक्ती साचार । आचारभ्रष्ट लोभिष्ट ॥६९॥</p>
<p>
	लोभा ठायीं नसे शांति । ना समाधान ना निश्चिंती । एक लोभ वसतां चित्तीं । जाती मातींत साधनें ॥७०॥</p>
<p>
	श्रुतिस्मृतीस अविहित । ऐसें निषिद्ध जें दुश्चरित । त्यांतचि सदैव जो आसक्त । असमाहितचित्त तो ॥७१॥</p>
<p>
	तया नांव ‘विक्षिप्तचित्त’ । सदैव दुष्कर्मीं व्यावृत्त । अखंड विषयकर्दमीं लोळत । हिताहित देखेना ॥७२॥</p>
<p>
	हो का ब्रम्हाविज्ञानसंपन्न । नाहीं जो फलेच्छेसी निर्विण्ण । तोंवरी वाव तें ब्रम्हाविज्ञान । आत्मसंपन्न नाहीं तो ॥७३॥</p>
<p>
	कोण कांहीं मागूं येतां । अधिकार पाहती संत प्रथमता । जैसी जयाची योग्यायोग्यता । तैसेंच त्यातें देती ते ॥७४॥</p>
<p>
	जया मनीं रात्रंदिन । देहाभिमान विषयचिंतन । तया गुरूपदेशाचा शीण । व्यर्थ नागवण उभयार्थां ॥७५॥</p>
<p>
	चित्तशुद्धि जाहल्यावीण । परमार्थीं रिघूं पाहे जो आपण । ज्ञानगर्वाची ती मिरवण । केवळ शीण तो खरा ॥७६॥</p>
<p>
	यास्तव रुचेल तेंच बोलावें । पचेल तितुकेंचि अन्न खावें । नातरी व्यर्थ अजीर्ण व्हावें । हें तों ठावें सकळिकां ॥७७॥</p>
<p>
	माझा भांडार भरपूर आहे । देईन जो जो जें जें चाहे । परी ग्राहकाची शक्ति पाहें । देतों मी साहे तेंच कीं ॥७८॥</p>
<p>
	ऐकाल जरी हें लक्ष देऊन । पावाल तुम्ही कृतकल्याण । या पवित्र मशिदींत बैसून । असत्य भाषण न करीं मी” ॥७९॥</p>
<p>
	ही संतवाक्यसुधासरिता । भावार्थें येथें बुडी देतां । अंतर्बाह्य लाधे शुद्धता । क्षाळण होतां मळाचें ॥८०॥</p>
<p>
	ऐसा साईनाथांचा महिमा । वर्णूं जातां न पुरे सीमा । उपमूं कैसें त्या निरुपमा । शुद्धप्रेमाआधीन तो ॥८१॥</p>
<p>
	माउली ती सकळांची । विश्रांति आर्तश्रांतांची । कल्पवल्ली आश्रितांची । दीनादुबळ्यांची जी छाया ॥८२॥</p>
<p>
	संसारावरी पाणी देऊन । गिरिकपाटीं मौन धरून । एकांतवास स्वीकारून । निजकल्याणैकदक्ष जो ॥८३॥</p>
<p>
	ऐसे संत असती बहुत । केवळ जे साधिती निजस्वार्थ । अथवा केवळ निजपरमार्थ । काय कीं अर्थ इतरांतें ॥८४॥</p>
<p>
	तेवीं न साईबाबा महंत । नसतां आप्तेष्ट गणगोत । घरदार वा जायासुत । प्रपंचांत राहती ॥८५॥</p>
<p>
	करतलभिक्षा पांच घरा । तरुतलवास अष्टौ प्रहारा । मांडूनि थिता प्रपंच - पसारा । व्यवहार सारा शिकविती ॥८६॥</p>
<p>
	साधूनि निज ब्रम्हास्थिति । जनतेच्या कल्याणा झिजती । ऐसे संत महामति । विरळा जगतीं असतील ॥८७॥</p>
<p>
	धन्य तो देश धन्य तें कुळ । धन्य तीं आईबापें निर्मळ । धन्य त्याचा कुसवा सोज्ज्वळ । प्रसवला निर्मळ हें रत्न ॥८८॥</p>
<p>
	अनायासें परिस लाधला । पाषाण समजुनी बहुती झुगारिला । शिरडींत या परम भागवताला । कोणीं न ओळखिला बहुकाळ ॥८९॥</p>
<p>
	जैसें उकिरडां रत्न पडावें । पोरांबाळां सांपडावें । त्यांनीं वाटेल तेथें उडवावें । खुशाल तुडवावें दगडसें ॥९०॥</p>
<p>
	असो यापरी तो ब्रम्हाचा भोक्ता । आशीर्वचनीं पावे तृप्तता । तीच गत तुम्हां आम्हां समस्तां । बिकट रस्ता सोडावा ॥९१।</p>
<p>
	जोंवरी बाह्या विषयांचें सेवन । शब्दश्रवण स्पर्शसंवेदन । आमोदाघ्राणन । बाह्यांगदर्शन । तंव न विरोधन विषयार्थां ॥९२॥</p>
<p>
	झालियावीण इंद्रियनिरोधन । स्वभावप्रवृत्तपरावर्तन । प्रत्यग्रूपाचें अवलोकन । वा तद्बोधन अशक्य ॥९३॥</p>
<p>
	आधीं व्हावें सर्वैषणाविहीन । मग सद्नुरूसीं अनन्यशरण । ऐसा जो द्दढश्रद्धासंपन्न । आत्मविज्ञाना पात्र तो ॥९४॥</p>
<p>
	श्रोत्रादि पंचज्ञानेंद्रियें । त्यागिजेतील जैं स्वस्वविषयें । मन संकल्प विकल्प स्वयें । त्यागील निश्चयें जे काळीं ॥९५॥</p>
<p>
	एवं प्रतिनिवृत्त जैं अंतर । बुद्धिही सांडील निश्चयव्यापार । तेच ते परमगति साचार । निर्विकार ब्रम्हा तें ॥९६॥</p>
<p>
	बुद्धि होईल निश्चयशून्य । चित्तही जैं पावेल चैतन्य । तैंच तोच एक न तदन्य । आत्म्यातें धन्य जाणील ॥९७॥</p>
<p>
	होतं विषयांपासून विन्मुख । होतील इंद्रियें आत्मोन्मुख । तेव्हांच प्रकटेल निजसुख । इतर सर्व असुख तें ॥९८॥</p>
<p>
	जोए विषयविकार - प्रच्छन्न । अतिसूक्ष्म दुर्दर्श आत्मज्ञान । परमानंदप्राप्तीचें साधन । अतिगहन आकळाया ॥९९॥</p>
<p>
	हिरण्यागर्भपदापर्यंत । इहामुत्रविषय़ीं विरक्त । तोच एक ब्रम्हापदाभिषिक्त । तो एक मुक्त जाणावा ॥१००॥</p>
<p>
	चित्तास विषयापासून । हळू हळू माघौतें फिरवून । आत्मरूपीं स्थिर करून । आत्मज्ञान जोडावें ॥१०१॥</p>
<p>
	इहामुत्रफळभॊगविराग । हर्षशोकादि द्वंद्वत्याग । बुद्धिमंतासीच हा भोग । अध्यात्मयोग तो हाचि ॥१०२॥</p>
<p>
	अधिदैवाध्यात्माधिभौतिकीं । निखिल वडवानल ज्वालादिकीं । संतप्त संसारार्णवोदकीं । कोण कीं सुखी असेल ॥१०३॥</p>
<p>
	तेणें व्हावया निजसमुद्धरण । व्हावें साईप्रसादसंपन्न । करावें तच्चांरेत्रावलोकन । श्रवण मनन सादरें ॥१०४॥</p>
<p>
	हें श्रीसाईनाथचरित्र । श्रोतीं सपुत्र - मित्र - कलत्र । परिसतां साधेल इहपरत्र । लीला विचित्र बाबांची ॥१०५॥</p>
<p>
	सभाग्य श्रद्धाळू श्रोते । तेचि या कथांचे परिसते । परिसतां अति हळुवारचित्तें । शांतते येते शांतता ॥१०६॥</p>
<p>
	या कथानि:स्यंदनिर्झरें । कर्माकर्मलवण विरे । श्रवणद्वारें नयनीं शिरे । रूप साजिरें साईंचें ॥१०७॥</p>
<p>
	चरित्रश्रवणें पातकां र्‍हास । चरित्रश्रवणें । काळावरी कास । चरित्रश्रवणें परमोल्हास । श्रोते निरायास पावती ॥१०८॥</p>
<p>
	श्रवणें शुद्ध अंत:करण । श्रवणें चुकेल जन्ममरण । श्रवणें श्रोतयां ब्रम्हापण । केवळ ब्रम्हार्पणकर्मानें ॥१०९॥</p>
<p>
	ऐसा हा साईसेवाकाम । सेवकां सदा करी निष्काम । निजभक्तां श्रीसाईराम । देईल आराम सर्वदा ॥११०॥</p>
<p>
	भागश: या ग्रंथाचें वाचन । अथवा श्रवण आणि परिशीलन  । मनन आणि निदिध्यासन । करा अनुदिन श्रोते हो ॥१११॥</p>
<p>
	‘आनंदो ब्रम्होति व्यजानात्‌’ । हे तरी तैत्तिरीय श्रुति विख्यात । तेंच ते बाबा अनुवादत । श्रुतिनिर्णीत भक्तांतें ॥११२॥</p>
<p>
	‘फिकीर न करावी यत्किंचित । सदा असावें आनंदभरित । चिंता न करावी आमणान्त’ । उपदेश नित्य बाबांचा ॥११३॥</p>
<p>
	असो ब्रम्हात्त्त्व - निर्धारण । हें या अध्यायाचें धोरण । कीं ही नौका भवतारण । जाईल शरण साईंस त्या ॥११४॥</p>
<p>
	हितवचन वारंवार । सांगावें करावा परोपकार । बाबा तयाचा करूनि अनुकार । तदनुसार प्रवर्तती ॥११५॥</p>
<p>
	हें सयुक्तिक कीं अयुक्तिक । हे मतभेद केवळ वैयक्तिक । जेणें सामान्य जनतेसी तोख । तोच कीं रोख ये ग्रंथीं ॥११६॥</p>
<p>
	हेंचि आहे येथें प्रयोजन । बाबा जाणीत कार्यकारण । जैसें तयाचें मनोप्सित जाण । होष्यमाणही तैसेंच ॥११७॥</p>
<p>
	गुरुमुखींच्या कथा ऐकाव्या । अतर्क्य लीला अनूभवाव्या । स्मरतील त्या संग्रहीं ठेवाव्या । परिसवाव्या इतरांतें ॥११८॥</p>
<p>
	साईंचें हे चरित्र बरें । श्रवण करितां अत्यादरें । श्रोतियावक्त्यांचें दैन्य हरे । दुर्दिन ओसरे अवघ्यांचें ॥११९॥</p>
<p>
	पाहोनि बाबांची अलौकिक लीला । कोण अभागी चकित न झाला । केवळ दर्शनमात्रेंचि निवाला । लीन झाला पदकमलीं ॥१२०॥</p>
<p>
	विशद चरितें या साईंचीं । प्रशास्त चित्तें ऐकावयाचीं । संधी येतां ऐसी सुखाची । कोणी फुकाची दवडील ॥१२१॥</p>
<p>
	पुत्र - मित्र - कलत्रावर्त । कामक्रोधाइद्राहयुक्त । नानारोग तिमिंगिलोज्जृंभित । उद्वेलित आशाकल्लोळीं ॥१२२॥</p>
<p>
	वेळीं उद्वेगाचा झटका । येवोनि जातो घटकोघटका । द्वंद्व माजूनि उडतो खटका । परी न तटका तोडवे ॥१२३॥</p>
<p>
	स्वयेंच जीवास करावा बोध । कीं तूंच आहेस ब्रम्हा शुद्ध । झालासि देहसंगें बद्ध । नलिकापिनद्ध शुक जैसा ॥१२४॥</p>
<p>
	भुललासि केवळ मोहमाये । तेणें विसरलासि निजसोये । तुझा तूंच सावध होयें । स्वरूपा ये झडकरी ॥१२५॥</p>
<p>
	भ्रमामुळें वाढला भ्रमा । देहाभिमानादि संभ्रम । मृगजलसम हें ‘मी मम’ । जाणूनि निर्मम होईं कां ॥१२६॥</p>
<p>
	या मी - तूंपणाचे प्रपंचीं । गुंतावें कां नीट विवंचीं । सोड आवळले पाय पंची । उड्डाणें उंची विहर कीं ॥१२७॥</p>
<p>
	मुक्त तेथें बद्धता  असे । बद्धतेपाशीं मुक्तता वसे । परत होऊनियां उभयदशे । शुद्ध स्ववशें राहीं बा ॥१२८॥</p>
<p>
	हें तो साक्षेपतेचें ज्ञान । सुख वा दु:ख सर्वाज्ञान । दवडोनि संपादीं विज्ञान । ब्रम्हाज्ञान पाशींच ॥१२९॥</p>
<p>
	देहीं जोंवर मी - तूंपणा । तों न तूं निजहिताचा देखणा । तो टाक, पाहीं आपआपणा । कृपणपणा भिरकावीं ॥१३०॥</p>
<p>
	कुबेरासम धनवंत । भिक्षावृत्ति जरी विचरत । तरी तें केवळ नष्टचरित । विपरीतपण अज्ञानानें ॥१३१॥</p>
<p>
	करावें नित्य सच्छास्त्रश्रवण । विश्वसें पाळावें सद्नुरुवचन । राहूनि सदा सावधान । अनुसंधान राखावें ॥१३२॥</p>
<p>
	पाहोनि जन ते आचारपद्धति । निजोद्धार मार्ग चोखाळती । असंख्य जीव उद्धरती । सहज गति त्यांचेनी ॥१३३॥</p>
<p>
	कदा येईल ऐसी घटका । घडेल भवपाशांतुनी सुटका । जया अहर्निश हा मनास चटका । अवचट तटका तो सोडी ॥१३४॥</p>
<p>
	साधवेल तो एकान्त साधून । संसार नि:सार ही गांठ बांधून । अध्ययन आणि आत्मचिंतन । यांत चिरंतन असावें ॥१३५॥</p>
<p>
	भक्तिश्रद्धान्वित मनें । शिष्यें पूर्ण विनयसंपन्नें । शरण साष्टांग गेलियाविणें । ज्ञानकेणें गुरु न दे ॥१३६॥</p>
<p>
	सर्वस्वीं गुरुशुश्रूषा करावी । बंधमोक्षवृत्तीइ विवरावी । विद्याविद्यादि प्रश्नीं धरावी । गुरुरावीं सफलता ॥१३७॥</p>
<p>
	आत्मा कोण परात्मा कोण । कोणा न सांगावें गुरूवीण । गुरूही न येतां शरण पूर्ण । देती न कणही ज्ञानाचा ॥१३८॥</p>
<p>
	गुरूविना इतरें देतां ज्ञाना । संसारनिवर्तक तें होईना । मोक्षफलप्रद लवही असेना । मना ठसेना कदापि ॥१३९॥</p>
<p>
	तस्मात्‌. गुरूविना ज्ञान नोहे । विदित सकल विद्वानां हें । ब्रम्हात्मैक्यविषयीं सोये । समर्थ पाय गुरुचे ॥१४०॥</p>
<p>
	तेथें न करितां अनमान । सांडोनि ताठा अभिमान । होवोनि अखंड दंडायमान । खालवा मान गुरुपदीं ॥१४१॥</p>
<p>
	दासानुदास मी तुमचा । भरंवसा एक तव पदांचा । धरोनि पावलों म्हणा वाचा । धडा जीवाचा द्दढ करा ॥१४२॥</p>
<p>
	मग पहा चमत्कार तयाचा । तो गुरुदयार्णव हेलावे साचा । निजशेजीं तरंगाच्या । झेली वरच्यावरी तो ॥१४३॥</p>
<p>
	शिरीं ठेवी अभयहस्त । इडा पिडा करोनि उध्वस्त । जाळोनि पातकाच्या राशी समस्त । उदी मस्तकीं फांसी तो ॥१४४॥</p>
<p>
	एवं ब्रम्हार्थिया ब्रम्हानिरू पण । हें तों केवळ निमित्त जाण । जीवशिवैक्यतेची खूण । भक्तां संपूर्ण कथियेली ॥१४५॥</p>
<p>
	आतां महाराजांची एवढी । अतुल प्रज्ञा विद्या गाढी । असतां थट्टेची काय प्रौढी । काय आवडी निनोदीं ॥१४६॥</p>
<p>
	सहज शंका घेईल मन । परी पाहतां विचारून । एकचि आहे समाधान । सावधान परिसिंजे ॥१४७॥</p>
<p>
	मुलांबाळांसवें बोलतां । तयांच्या बोबडया बोलांत रमतां । प्रौढत्वाच्या कथा वार्ता । कधींही होतात काय कीं ॥१४८॥</p>
<p>
	नसतें प्रेम का तयांवरी । तें काय वर्णूं शकेल वैखरी । परी बोधप्रदान कुसरी । विनोद मस्करी ही एक ॥१४९॥</p>
<p>
	काय आहे रोग पोटीं । हे काय आहे बाळास द्दष्टी । मातेस पाजावी लागे गुटी । जरी तें हट्टी पिईना ॥१५०॥</p>
<p>
	कधीं अंजारून गोंजारून । कधीं नेत्र पिंजारून । कधीं चतुर्दशरत्नप्रयोजन । कधीं आलिंगन सप्रेम ॥१५१॥</p>
<p>
	तींच होऊं लागतां प्रौढ । करावें वाटे तयांचें कोड । परी बुद्धि तीव्र वा बोजड । तैसाच निवाड ज्ञानाचा ॥१५२॥</p>
<p>
	तीव्र बुद्धीचें तीव्र ग्रहण । उपदेश ठरतां नलगे क्षण । तेंच जडबुद्धीचें विलक्षण । बहुत रक्षण सायास ॥१५३॥</p>
<p>
	समर्थ साई ज्ञाननिधी । जया भक्ताची जैसी बुद्धी । आधीं निर्धारून पात्रशुद्धि । ज्ञानसमृद्धि वितरत ॥१५४॥</p>
<p>
	तयांस पूर्ण अंतर्ज्ञान । तयांस आधींच सर्वांची जाण । जयास जैसें योग्य साधन । तयाचें नियमन तैसेंच ॥१५५॥</p>
<p>
	जैसा जयाचा अधिकार । तयाचा आधींच करूनि विचार । योग्यायोग्यतेनुसार । भक्तांचा भार बाबांना ॥१५६॥</p>
<p>
	तैसेच आम्ही दिसाया थोर । परी त्या सिद्ध साईसमोर । खरेच आम्ही पोरांहूनि पोर । विनोदीं आतुर सर्वदा ॥१५७॥</p>
<p>
	विनोदाचे बाबा आगर । जे जे ठायीं जयासी आदर । तें तें यथेष्ट पुरवूनि समग्र । राखीत अव्यग्र भक्तांस ॥१५८॥</p>
<p>
	सुबुद्ध वा बुद्धिमंद । वाचितां प्रगटेल परमानंद । परिसतां वाढेल श्रवणछंद । मननें स्वानंद - संतुष्टी ॥१५९॥</p>
<p>
	आवर्तनीं परमार्थबोध । निदिध्यासनीं महदाल्हाद । सौख्य उपजेल अखंड निर्बाध । ऐसी अगाध ही लीला ॥१६०॥</p>
<p>
	भाग्यें जेणें अनुभव येथिला । यत्किंचितही असेल भोगिला । कायावाचामनें तो खिळिला । अतर्क्य लीला साईंची ॥१६१॥</p>
<p>
	हेमाड साईपायीं शरण । विनोदमार्गें ज्ञानप्रदान । भक्तकल्याण एक प्रयोजन । निमित्त जाण ब्रम्हार्थियां ॥१६२॥</p>
<p>
	पुढील अध्याय याहूनि गोड । श्रवणार्थियांचें पुरेल कोड । माझिया जीवींची गुप्त होड । फोड फोडोनि पुरविली ॥१६३॥</p>
<p>
	मी जाईन माधवापाशीं । बाबांचा निरोप देईन त्यांशी । पावेन कैसा अनुग्रहाशी । साद्यंतेंशीं परिसा जी ॥१६४॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । ब्रम्हाज्ञानकथनं नाम सप्तदशोऽध्याय: संपूर्ण ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 23 Apr 2022 15:56:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 23 Apr 2022 16:11:46 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय १६]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-16-122042300057_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम; ॥
राजाधिराज चक्रवर्ती । शांतिसिंहासनस्थ मूर्ति । नमूं स्वानंदसाम्राज्यपति । अनन्यगतीं गुरुराज ॥१॥
अभेदभक्ति ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 16" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/23/full/1650709540-4217.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra marathi adhyay 16" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम; ॥</p>
<p>
	राजाधिराज चक्रवर्ती । शांतिसिंहासनस्थ मूर्ति । नमूं स्वानंदसाम्राज्यपति । अनन्यगतीं गुरुराज ॥१॥</p>
<p>
	अभेदभक्ति सहजस्थिति । उभयभागीं चवर्‍या वारिती । स्वानुभूति सद्य:प्रतीति । जया वीजिती अत्यादरें ॥२॥</p>
<p>
	छत्रधारी स्वात्मस्थिति । वेत्रधारी शांतिसंवित्ति । षडरि मायामोहवृत्ति । जेथें न तगती क्षणभरी ॥३॥</p>
<p>
	काय या सभेचा थाट । चार सहा अठरा भाटे । चिन्मयचांदवा लखलखाट । पसरला घनदाट स्वानंद ॥४॥</p>
<p>
	विरक्ति भक्ति शुद्ध ज्ञान । श्रवण मनन निदिध्यासन । निजानुसंधान साक्षात्करण । अष्टप्रधान सेवारत ॥५॥</p>
<p>
	शान्ति - दान्ति दिव्यमणि । चमकती जयाच्या कंठभूषणीं । वेदान्तसागरसु धातरंगिणी । मधुर वाणी जयाची ॥६॥</p>
<p>
	झळके जयाची सतेज धार । कराया त्या ज्ञानखङगाचा प्रहार । पाहोनि ज्याचा उद्यत कर । कांपे थरथर भववृक्ष ॥७॥</p>
<p>
	जय निरंजना अव्यया । गुणातीता योगिराया । परोपकारार्थ धरिलीस काया । उद्धराया दीन जनां ॥८॥</p>
<p>
	गताध्यायीं निरूपण । भक्तभावार्थ करोनि पूर्ण । पुरवोनि तयानें केलेला पण । पटविली खूण मनाची ॥९॥</p>
<p>
	सद्नुरु सदा अवाप्तकाम । शिष्य काय पुरवी तत्काम । शिष्यांचाच सेवाकाम । पुरवूनि निष्काम तो करी ॥१०॥</p>
<p>
	भावें अर्पितां फूल पान । अति प्रेमें करील सेवन । तेंच अर्पितां साभिमान । फिरवील मान जागींच ॥११॥</p>
<p>
	सच्चित्सुखाचे जे सागर । तयां बाह्योपचारीं काय आदर । परी ते करितां भावार्थें सादर । सौख्य निर्भर सेविती ॥१२॥</p>
<p>
	नेणतपणाचें पांघरूण । घेऊनि अज्ञान देती ज्ञान । न करितां मर्यादा - अतिक्रमण । गोड शिकवण ते देती ॥१३॥</p>
<p>
	तयांची सेवा करितां भावें । सेवक ब्रम्हासायुज्य पावे । इतर सर्व साधनीं ठकावें । लीन व्हावें गुरुसेवे ॥१४॥</p>
<p>
	त्या सेवेची लघु कुचराई । किंवा तेथ लव चतुराई । करितां साधक पडेल अपायां । विश्वास पायीं पाहिजे ॥१५॥</p>
<p>
	शिष्यें काय कीजे स्वयें । सद्नुरूसीच लावणें सोये । शिष्यास न ठावे निज अपाय । नकळत उपाय गुरु करी ॥१६॥</p>
<p>
	गुरुपरीस आणीक वदान्य । त्रिभुवनीं पाहतां नाहीं अन्य । शरण्याचा परमशरण्य । शरण अनन्य होऊं त्या ॥१७॥</p>
<p>
	उपमूं जातां चिंतामणीसीं । चिंतामणी दे चिंतितार्थासी । गुरू देईल अचिंत्य वस्तूसी । परमाश्चर्थेंसीं निजभक्ता ॥१८॥</p>
<p>
	तुळूं जातां कल्पतरूसी । तों तो पुरवी कल्पितार्थासी । देईल निर्विकल्पस्थितीसी । अकल्पितेसी गुरुराय ॥१९॥</p>
<p>
	कामधेनु कामिलें पुरवी । गुरुधेनूची तीहून थोरवी । अचिंत्यदानीं ऐसी ही पदवी । कोण मिरवी तिजवीण ॥२०॥</p>
<p>
	आतां श्रोतयां हेचि विज्ञप्ति । सांगेन म्हणितलें गताध्यायांतीं । ब्रह्मार्थिया ब्रम्हाज्ञानप्राप्ति । कथासंगति अवधारा ॥२१॥</p>
<p>
	ब्रम्हाज्ञानाचा आलिया भोक्ता । बाबा कैसी करिती तृप्तता । कैसे उपदेशिती निजभक्तां । त्या परमार्था परिसा जी ॥२२॥</p>
<p>
	संत नित्याचे निष्काम । सकळ परिपूर्ण अवाप्तकाम । परी भक्त अत्यंत सकाम । अतृप्तकाम सर्वदा ॥२३॥</p>
<p>
	कोणी मागे पुत्रसंतति । कोणी अखंड राज्यसंपत्ति । कोणी मागे भावभक्ति । भवनिर्मुक्ति एकादा ॥२४॥</p>
<p>
	ऐसाचि एक भक्त भावार्थी । परी निमग्न धनसंचयार्थीं । ऐकूनि बाबांची उदंड कीर्ति । दर्शनार्ति उदेली ॥२५॥</p>
<p>
	घरीं उदंड संतति संपत्ति । दासदासी अपरिमिति । दर्शन घ्यावें आलें चित्तीं । उदार मूर्ति बाबांची ॥२६॥</p>
<p>
	बबा मोठे ब्रम्हाज्ञानी । साधुसंतमुकुटमणि । मस्तक ठेवूं त्यांचे चरणीं । अगाध करणी जयांची ॥२७॥</p>
<p>
	नाहीं आपुल्यास दुजी वाण । आपण मागूं ब्रम्हाज्ञान । सहजीं जाहल्या हें साधन । मग मी धन्य होईन ॥२८॥</p>
<p>
	मग तया तन्मित्र म्हणे । सोपें नाहीं ब्रम्हा जाणणें । तें तुजसम लोभियाभेणें । प्रकट होणें दुर्घत ॥२९॥</p>
<p>
	द्रव्यदारासुतांपरती । ठावी न जया सुखोत्पत्ति । तयासी ब्रम्हा ही केवळ भ्रांती । कैंची विश्रांती देईल ॥३०॥</p>
<p>
	क्षीण होतां इद्रियशक्ति । जगांत कोणी मान न देती । तैं रिकामटेकडे उगाच बैसती । सूत कांतिती ब्रम्हाचें ॥३१॥</p>
<p>
	तैसी ही तुझी ब्रम्हाजिज्ञासा । चिकट हातींचा न सुटतां पैसा । कोणी न हा तुझा धिंवसा । पुरवील ऐसा मिळेल ॥३२॥</p>
<p>
	असो ऐसी आस्था मनीं । ब्रम्हार्थी निघाला शिरडीलागोनी । परतभाडयाचा टांगा करोनी । साईचरणीं पातला ॥३३॥</p>
<p>
	घेतलें साईंचें दर्शन । केलें तयां पायीं नमन । साई मग वदती मधुर वचन । श्रोतां श्रवण तें कीजे ॥३४॥</p>
<p>
	हा साइ कथाकल्पतरु । अवधानपय:पानें सधरू । जंव जंव वाढे श्रोतयां आदरु । प्रसवेल फलभारू तंव तंव ॥३५॥</p>
<p>
	रसभावें सर्वांगीं भरेल । सुगंधपुष्पीं तो फुलेल । मधुरफलभारीं तो लवेल । इच्छा पुरेल भोक्त्यांची ॥३६॥</p>
<p>
	म्हणे तो ‘बाबा ब्रम्हा दाखवा । हेंच आलों धरूनि जीवा । जन म्हणती शिरडीकर बाबा । ब्रम्हा दाविती अविलंबें ॥३७॥</p>
<p>
	म्हणोनि इतका दूर आलों । मार्ग कंठितां फार श्रमलों । तरी तें ब्रम्हा जरी लाधलों । कृतकृत्य झालों म्हणेन’ ॥३८॥</p>
<p>
	बाबा वदती “न करीं चिंता । ब्रम्हा दावीन रोकडें आतां । येथें न उधारीची वार्ता । तुजसम पुसताचि दुर्लभ ॥३९॥</p>
<p>
	मागती बहुत धनसंपदा । निवारा म्हणती रोग आपदा । मागती लौकिक मान राज्यपदा । सौख्य सदा मागती ॥४०॥</p>
<p>
	केवळ ऐहिक सुखालागुनी । जन शिरडीस येती धांवुनी । लागती मज फकीराचे भजनीं । ब्रम्हा कोणीही न मागती ॥४१॥</p>
<p>
	तैशियांचा मज सुकाळ । तुजसारिख्यांचाच दुकाळ । ब्रम्हाजिज्ञसूंचा मी भुकाळ । पर्वकाळ हा मजला ॥४२॥</p>
<p>
	जया ब्रम्हावस्तुभेणें । रविशशींचेम नियत चालणें । नियमें उगवणें नियमें मावळणें । प्रकाश चांदणें नेमस्त ॥४३॥</p>
<p>
	ग्रीष्म - वसंतादि - ऋतुकाळ । इंद्रादि  देव लोकपाळ । नेमें करिती जो प्रजा - प्रतिपाळ । त्या सर्वां मूळ हें ब्रम्हा ॥४४॥</p>
<p>
	म्हणून शरीरविस्रंसनाआधीं । सुधी ब्रम्हापुरुशार्थ साधी । त्यावीण पुनरावर्तन निरवधी । लागेल अबाधित पाठीसी ॥४५॥</p>
<p>
	तें हें ब्रम्हा जाणल्यावीण । होईल जरी शरीरपतन । पिच्छा पुरवील संसारबंधन । पुनर्जनन चुकेना ॥४६॥</p>
<p>
	ब्रम्हाचि काय मी तुज सगळें । दावितों पहा ब्रम्हागुंडाळें । जें तुज नखशिखांत वेंटाळे । तें मी आगळें उकलितों” ॥४७॥</p>
<p>
	काय ती सुधामधुर वाणी । केवलाद्वैतसुखाची खाणी । संशयदोलारूढ जे प्राणी । तदुद्धरणीं समर्थ ॥४८॥</p>
<p>
	आतातरमणीय सुखप्रलोभनीं । गुंतले जे दिवसरजनी । तयांसही बाबांची वचनसरणी । विहिताचरणीं प्रस्थापी ॥४९॥</p>
<p>
	चिंतामणि प्रसन्न होतां । लौकिकसौख्य चढेल हाता । लाधेल स्वर्गसंपत्तिमत्ता । महेंद्र होतां प्रसन्न ॥५०॥</p>
<p>
	याहूनि गुरूची अलौकिकता । गुरूसमान नाहीं दाता । दुर्लभ ब्रम्हा दावितील भक्ता । सुप्रसन्नता । पावलिया ॥५१॥</p>
<p>
	तया गोड कथेच्या श्रवणें । होईल संसारदु:खा विसरणें । ब्रम्हार्थियांसी कैसें शिकविणें । तेंही जाणणें बाबांही ॥५२॥</p>
<p>
	असो मग त्यातें बैसविलें । क्षणैक अन्य व्यवसायीं त्या गुंतविलें । जणूं त्या प्रश्नाचें भानचि हरपलें । ऐसें दाविलें तयाला ॥५३॥</p>
<p>
	मग बाबांनीं काय केलें । मुलास एका निकड भारी । हातउसने क्षणभरी । दे झडकरी म्हण त्याला ॥५५॥</p>
<p>
	मुलगा गेला नंदूचे घरा । कुलूप होतें तयाचे द्वारा । येऊनि तात्काळ माघारा । समाचारा निवेदिलें ॥५६॥</p>
<p>
	बाबा म्हणती जा परतोनी । असेल घरीं बाळा वाणी । तोच निरोप त्यातें देऊनि । रुपये घेऊनि येईं जा ॥५७॥</p>
<p>
	व्यर्थ गेली हीही फेरी । बाळाही तेव्हां नव्हता घरीं । मुलगा घडली जे जे परी । सादर करी बाबांसी ॥५८॥</p>
<p>
	आणखी एका दोघां ठाय़ीं । बाबा धाडिती तया लवलाहीं । थकला हेलपाटियापायीं । कपर्दिक कांहीं लाधेना ॥५९॥</p>
<p>
	नंदू अथवा बाळा वाणी । एकही ते वेळीं घरीं न कोणी । बाबांस ही जाण पूर्णपणीं । अंतर्ज्ञानी महाराज ॥६०॥</p>
<p>
	चालतें बोलतें ब्रम्हा साई । पांच रूपयांस अडेल काई । परी त्या ब्रम्हार्थियापायीं । हे नवलाई मांडिली ॥६१॥</p>
<p>
	पाहुणा येतां घरा । तयाचिया पाहुणचारा । केलें जें मिष्टान्न वा शिरा । भोगही इतरां लाधे तो ॥६२॥</p>
<p>
	तैसा हा ब्रम्हाभोक्ता । करूनियां पुढारा निमित्ता । महाराज उपदेशिती भक्तां । कल्याणार्था सकळांच्या ॥६३॥</p>
<p>
	पन्नासाधिक दोनशतें । रुपये नोटांचें पुडकें होतें । त्या ब्राम्हार्थियाचे खिशांत तेथें । तें साईनाथें जाणिलें ॥६४॥</p>
<p>
	हें काय त्या ब्रम्हार्थिया नकळे । नव्हते काय तयास डोळे । खिशांत असतां नोटांचें भेंडोळें । विकल्पघोळें नाडला ॥६५॥</p>
<p>
	साईंस पांच रुपडया उधार । आणि त्याही एक घटकाभर । त्याही द्यावया नाहीं धीर । ब्रह्मासाक्षात्कार मागूं ये ॥६६॥</p>
<p>
	साईमहाराज सत्यवचनी । रकमही लहान हातउसनी । देऊनि पहावें येतांच मनीं । विकल्प येऊनि आदळे ॥६७॥</p>
<p>
	पांच रुपयांची कथा ती काय । परी ते द्यावया जीव न होय । एवढी जया लाववे न सोय । लोभ स्वयमेव तो जन्मे ॥६८॥</p>
<p>
	इतर कोणी भाळा भोळा । जयाला बाबांचा खरा जिव्हाळा । उसनवारीचा तो सोहळा । उघडया डोळां बघता ना ॥६९॥</p>
<p>
	ब्रम्हार्था जो इतुका तान्हेला । त्याला हा प्रश्न नसेल कां उकलला । ऐसें न यत्किंचित्‌ वाटे मजला । परी तो ग्रासिला धनामोहें ॥७०॥</p>
<p>
	स्वस्थ बैसावें तेंही नाहीं । सुटली परत जाण्याची घाई । तो म्हणे अहो बाबासाई । ब्रम्हा ठायीं पाडा कीं ॥७१॥</p>
<p>
	बाबा म्हणती “बैसल्या ठायीं । ब्रम्हा दावावें येच उपायीं । केले येथवर उपाय पाहीं । कळले नाहींच कां तुम्हां ? ॥७२॥</p>
<p>
	ब्रम्हालागीं पंचप्राण । पंचपंचेंद्रियज्ञान । अहंकार बुद्धि मन । लागती समर्पण करावया ॥७३॥</p>
<p>
	ब्रम्हाज्ञानाचा मार्ग बिकट । सुलभ न सर्वां सरसकट । उदयकाल होतां तें प्रकट । लाभे अवचट सभाग्य ॥७४॥</p>
<p>
	हिरण्यगर्भपदापर्थंत । सर्वौत्कर्षीं जो विरक्त । तोचि ब्रम्हाविद्येसी अधिकृत । अनासक्त इतरत्र ॥७५॥</p>
<p>
	अंगीं विरक्ति न लवलेश । ऐशियासी ब्रम्हातत्त्वोपदेश । कोणींही जरी केला अशेष । काय त्या यश येईला ॥७६॥</p>
<p>
	अबाधित ब्रम्हाबोधन । उत्तमाधिकारिया ग्रहण । परी मध्यमाधिकारी जन । परंपरे - आधीन सर्वदा ॥७७॥</p>
<p>
	एक अविहंगममार्गसेवन । दुजिया परंपरासोपान । परी या अनधिकारियालागून । वावगा शीण ब्रम्हाचा ॥७८॥</p>
<p>
	एका आत्मविवेकावांचून । नाहीं निरतिशय प्राप्तिसाधन । हें जरी सत्य वेदान्तवचन । तें काय आधीन सर्वांच्या ॥७९॥</p>
<p>
	अभ्यास आणि श्रम रोकडे । करूं लागती हाडांचीं कांडें । तईं तें गुरुकृपाउजियेडें । हातीं चढे हळू हळू ॥८०॥</p>
<p>
	मी एक ईश्वर मी नियंता । हिरण्यगर्भा जैं चढे अहंता । स्वरूपीं पडे विस्मरणता । प्रादुर्भूतता विश्वाची ॥८१॥</p>
<p>
	‘ब्रम्हाहमस्मीति’ होतां ज्ञान । ज्ञाता होय स्वरूपीं लीन । तैंच विश्वाभासविसर्जन । श्रुति गर्जन करिते कीं ॥८२॥</p>
<p>
	होतां स्वप्रबोधोत्पत्ति । ब्रम्हाकारांत:करणवृत्ति । ब्रम्हाग्नींत विश्वाची आहुती । होते विभूति सृष्टीची ॥८३॥</p>
<p>
	जीवांचीही हेच स्थिति । होते जेव्हां भ्रमनिवृत्ति । रज्जू किरण आणि शुक्ति । आभास मुकती तत्काळ ॥८४॥</p>
<p>
	शुक्यज्ञान तेंच रतनभान । रजतज्ञान तेंचि शुक्तिज्ञान । भ्रमनिवृत्तिकालीं रौप्यावसान । शुक्तिकाविज्ञान निर्भेळ ॥८५॥</p>
<p>
	अन्योन्य - मोहाचं हे लक्षण । ज्ञानदीपाचें करा उजळण । अज्ञानमला करा क्षालन । निर्दाळण तैं प्रतिभासा ॥८६॥</p>
<p>
	जन्म - मृत्यूंचा नसता बंध । असता किमर्थ मोक्षनिर्बंध । वेदान्ता आम्हां काय संबंध । मग हा प्रबंध कायसा ॥८७॥</p>
<p>
	आहें मी बद्ध व्हावें निर्मुक्त । ऐसा जो द्दढनिश्चयासक्त । तोच येथील अधिकारी फक्त । न युक्त अत्यज्ञ वा तज्ज्ञ ॥८८॥</p>
<p>
	बद्धचि नाहीं कैंची मुक्ति । हे तों आहे वस्तुस्थिति । बद्धमुक्तता गुणसंगातीं । आहे प्रतीति अवघियां ॥८९॥</p>
<p>
	द्वितीयाचा अभाव जेथें । बांधी सोडी कवण कवणातें । कोणीही न बद्ध वा मुक्त तेथें । द्वैत - अद्वैतें गेलिया ॥९०॥</p>
<p>
	दिन रजनी हे प्रकार । उत्पादी काय दिनकर । हा तों द्दघ्दोषव्यवहार । दिवाकर अलिप्त ॥९१॥</p>
<p>
	मी एक कर्ता मी एक भोक्ता । हा अभिमान धरूनि चित्ता । स्वर्गनरक सुखासुख अनुभवितां । वासनासक्तता वाढते ॥९२॥</p>
<p>
	आत्मा नित्य पुराण शाश्वत । जन्मनाशादि - विकारवर्जित । ॐ काराक्षरप्रतीकवंत । अनाद्यनंत संतत जो ॥९३॥</p>
<p>
	जयाची शरीरमात्रात्मद्दष्टी । स्वयें निराळा निराळी सृष्टी । तयास आत्मज्ञानाची कष्टीं । परामृष्टि लाधेना ॥९४॥</p>
<p>
	वाण्यादि - सर्वेंद्रियांचा लय । करा मनीं व्हा कृतनिश्चय । त्या मनाचा करा क्षय । घ्यावा ठाय बुद्धीचा ॥९५॥</p>
<p>
	प्रकाशस्वरूप जे ज्ञानबुद्धि । मनासी तेथें लावा समाधि । मनासह सर्वेंद्रियसमृद्धि । एका स्वाधीन बुद्धीच्या ॥९६॥</p>
<p>
	घटासी आद्यकारण माती । इंद्रियां बुद्धि तैशाच रीती । ते तयांची नित्य स्थिति । ऐसी हे व्याप्ति बुद्धीची ॥९७॥</p>
<p>
	बुद्धि निजव्यापकपणें । व्यापी मनादि सकल करणें । बुद्धीस महत्तत्त्वीं निरविणें । महत्‌ समर्पणें अत्मत्वीं ॥९८॥</p>
<p>
	ऐसाच करितां समाहार । होय आत्मस्वरूपनिर्धार । मग रजत - मृगजल - सर्पाकार । द्दग्विकार केवळ ते ॥९९॥</p>
<p>
	तो हा अशेष - विशेषरहित । जन्मापक्षयविवर्जित । यद्दर्शनेंवीण नाहीं स्वहित । साधु सतत बोलती ॥१००॥</p>
<p>
	कार्यमात्रा आहे कारण । आत्मा स्वयंभू निषकारण । ‘पुराऽपि नव’ हा पुराण । बुद्धिहीन स्वभावें ॥१०१॥</p>
<p>
	आकाशवत्‌ अविच्छिन्न । जन्मविनाश - विलक्षण । ‘ॐ प्रणव’ जयाचें आलंबन । निरलंबन निष्कल जो ॥१०२॥</p>
<p>
	परब्रम्हा तें ज्ञातव्य । अपर ब्रम्हा तें प्राप्तव्य । ॐ तत्प्रतीक ध्यातव्य । उपासितव्य सर्वदा ॥१०३॥</p>
<p>
	सर्व वेदांचें जें सार । प्रणवस्वरूप तोच ॐ कार । तयाचा सार्थ जो निर्धार । तोच विचार महावाक्याचा ॥१०४॥</p>
<p>
	वेद स्वयें जे प्रतिपादिती । जें अतिप्रयत्नें जन संपादिती । यदर्थ ब्रम्हाचर्य आचरिती । ॐ पद म्हणती तयासी ॥१०५॥</p>
<p>
	असो तया पदाचा आक्रम । करूं जातां जरी दुर्गम । तरी तें अभ्यासियां सुगम । होतां परम गुरुकृपा ॥१०६॥</p>
<p>
	इंद्रियांमाजील जीं स्थूल परम । तेथूनि धरितां अनुकम । आदरितां सूक्ष्म तारतम्यक्रम । साधे अविश्रम साधका ॥१०७॥</p>
<p>
	तें हें ॐ शब्दवाच्य अक्षर । सकळ तपाचें जें सार । उच्चारमात्रें स्फुरे अर्थसार । साक्षात्कार आवर्तनें ॥१०८॥</p>
<p>
	अविपरिलुप्त चैतन्य । वृद्धिक्षयविकारशून्य । ऐसा आत्मा जाणील तो धन्य । भक्त अनन्य सद्नुरूचा ॥१०९॥</p>
<p>
	अध्यात्म - अधिभूत -अधिदैव । त्रिविध तापीं तापलें जे सदैव । ते कैंचे भोगितो हें सुदैव । वैभव हें एक संतांचें ॥११०॥</p>
<p>
	अविद्येपोटीं उपजे संसृति । त्यापासोन व्हावया निवृत्ति । साधन जें ब्रम्हात्मैकत्ववृत्ति । तयाची प्राप्ति ये ठायीं ॥१११॥</p>
<p>
	विषयकल्पनाशून्य स्थिति । ‘अहं ब्रम्हास्मीति’ वृत्ति ।या महावाक्याचिया आवृत्ति । बुद्धिप्रवृत्ति होईल जैं ॥११२॥</p>
<p>
	गुरुवचनशास्त्रप्रतीति । अंतर्बाह्य करणवृत्ति । मनासह उपरमा पावती । आत्मसंवित्ति लाभे तैं ॥११३॥</p>
<p>
	तैंच सम्यग्दर्शनप्राप्ति । विशयार्थादि जड निवृत्ति । तुटे अविद्यादि ह्रदयग्रंथि । होय अव्यक्तीं प्रविष्ट ॥११४॥</p>
<p>
	कवडशांतील अतिसूक्ष्म कण । तयाहूनही सूक्ष्म प्रमाण । तया अणूहूनही अणीयान । आत्मानुमान - निर्धार ॥११५॥</p>
<p>
	मोठयांत मोठें ब्रम्हांड जाण । त्याहूनही आत्मा महिमान । परी हे सर्व सापेक्ष प्रमाण । आत्मा प्रमाणातीत तो ॥११६॥</p>
<p>
	सूक्ष्मत्वें ‘अणोरणीयान’ । महत्त्वें महत्परिमाणवान । एवं नामरूपादि केवळ उपाधी जाण । आत्मा परिपूर्ण निरुपाधिक ॥११७॥</p>
<p>
	आत्म्यास ना जन्म ना मरण । नाहीं तयासी मूलकारण । अज - नित्य - शाश्वत - पुराण । सहज निर्धारण दुर्गम ॥११८॥</p>
<p>
	‘ॐ कार’ प्रतीक जें ब्रम्हा । तेंच त्याचें स्वरूप परम । आगमनिगमांसही दुर्गम । तें काय सुगम सर्वत्रां ॥११९॥</p>
<p>
	जया निर्धारितां वेद थकले । तपस्वी वनवासी झाले । उपनिषदीं हात टेंकिले । कोणा न झालें निदान ॥१२०॥</p>
<p>
	पावावया आत्मस्वरूपाचिया ठावा । अभेददर्शी आचार्यचि व्हावा । तदितरांचा कोण केवा । रिघावा न तेथें तार्किका ॥१२१॥</p>
<p>
	केवळ तार्किका न तेथें थारा । भ्रमावर्तीं फिरेल गरगरां । आगम - आचार्यावीण इतरां । स्थिरावेना तत्त्वबुद्धी ॥१२२॥</p>
<p>
	स्वबुद्धिकल्पनेचे अनंत तारे । न चुकविती लखचौर्‍यांशीं फेरे । आगम - आचार्येंदु एकचि पुरे । मग तम नुरे लवलेश ॥१२३॥</p>
<p>
	इतरां न सधे जें बहु सायासें । तेंच साधील तो अल्पायासें । जो द्दढ धरी त्या सद्नुरूचे कासे । तया प्रकाशे सद्विद्या ॥१२४॥</p>
<p>
	सकार्य अविद्या जेथ सरे । सच्चिदानंदस्वरूप स्थिरे । स्वस्वरूप - स्थिति अवतरे । मोक्ष दुसरें नाम त्या ॥१२५॥</p>
<p>
	हेंच जीवाचें अत्यंत अभीष्ट । यदर्थ करिती बहुत कष्ट । जें निरंतर ब्रम्हायोगनिष्ठ । अंतर्निष्ठ सर्वदा ॥१२६॥</p>
<p>
	स्वरूपीं होतां चंचळ । उठे विषयांई खळबळ । झालिया स्वरूपीं निश्चळ । येई विकळता विषयांतें ॥१२७॥</p>
<p>
	स्वरूपीं जो विमुख । विषय तया सदा सन्मुख । तोच होतां स्वरूपोन्मुख । विषय मुख फिरविती ॥१२८॥</p>
<p>
	मोक्षमात्राचीच इच्छा करी । अन्यार्थीं निरिच्छ अभ्यंतरीं । इहपरत्रार्थ तृष्णालेश न धरी । तोच अधिकारी मोक्षाचा ॥१२९॥</p>
<p>
	यांतील जो एका लक्षणें उणा । मुकुक्षू नव्हे तो स्पष्ट जाणा । तो केवळ मुकुक्षूचा बहाणा । जैसा काणा देखणा ॥१३०॥</p>
<p>
	अहंकार गळाल्यावीण । न होतां लोभाचें निर्मूलन । न होतां मन निर्वासन । ब्रम्हाज्ञान ठसेना ॥१३१॥</p>
<p>
	देहात्मबुद्धि हेच भ्रांति । बंधासी कारण आसक्ति । सोडा विषयकल्पना - स्फूर्ति । ब्रम्हाप्राप्ति हातीं ये ॥१३२॥</p>
<p>
	निर्विशेष परब्रम्हा । साक्षात्कार ये कठिण कर्म । सविशेष निरूपण हेंचि वर्म । हाचि धर्म धीमंदां ॥१३३॥</p>
<p>
	आत्मा गूढ सर्वांभूतीं । हें तत्त्व जाणती वेदांती । तरी यावी सर्वत्र अनुभूती । ऐसी प्रतीति कैसेनी ॥१३४॥</p>
<p>
	आधीं लागे चित्तशुद्धि । वरी सूक्ष्म कुशाग्रबुद्धि । तेव्हांच प्रकटे हा त्रिशुद्धि । कृपासमृद्धि स्वयमेव ॥१३५॥</p>
<p>
	आत्मा नित्य अविकृत । आत्मविद तो शोकरहित । तोच धैर्यवंत धीमंत । भवनिर्मुक्त तो सदा ॥१३६॥</p>
<p>
	येथ न चले प्रवचनयुक्ति । किंवा ग्रंथार्थधारणाशक्ति । अथवा वेदश्रुति - व्युत्पत्ती । कांहीं उपपत्ति लागेना ॥१३७॥</p>
<p>
	आत्मा नित्य अविकृत । शरीर अनित्य अनवस्थित । हें जाणोनि साधे जो स्वहित । विहिताविहित - दक्ष तो ॥१३८॥</p>
<p>
	आत्मज्ञानी सदा निर्भय । एकींएक अद्वितीय । दुजेपणाचा पुसिला ठाय । शोकात्यय द्दढ फळे ॥१३९॥</p>
<p>
	आत्मा जरी दुर्विज्ञेय । नातुडे प्रवचनश्रवणें ठाय । केवळ मेधा करील काय । तरीही सुविज्ञेय उपायें ॥१४०॥</p>
<p>
	जो स्वयें सर्वत्र निष्काम ॥ आत्मज्ञानैकमात्रकाम । ऐसा जो आत्मया प्रार्थी प्रकाम । तयासचि परम लाभ हा ॥१४१॥</p>
<p>
	श्रवणादिकाळीं ‘तोच मी आहें’ । ऐसिया अभेदद्दष्टीं जो पाहे । हेंच अनुसंधान जयाचें राहे । आत्मा अनुग्रहें वरी त्या ॥१४२॥</p>
<p>
	सदा दुश्चरितासक्त । अशान्त आणि असमाहित । नाहीं जयाचें एकाग्र चित्त । तया हा अप्राप्त ज्ञानिया ॥१४३॥</p>
<p>
	श्रुतिस्मृति - प्रतिपादित । करी जो विहित, त्यागी अविहित । जयाचें नित्य समाहित चित्त । आत्मा अंकित तयाचा ॥१४४॥</p>
<p>
	दुश्चरितापासाव जो विरत । आचार्यगुरुपदीं जो विनत । फलाची इच्छा जयाची निवृत्त । तयासीच प्राप्त हा आत्मा ॥१४५॥</p>
<p>
	न होतां विषयां निष्काम । न होतां केवळ आत्मकाम । न होतां सकळवृत्तिविराम । आत्माराम दुर्गम ॥१४६॥</p>
<p>
	पाहूनि जिज्ञासुच्या तपा । स्वयें आत्म्यास उपजेल कृपा । तैंच प्रकटी निजस्वरूपा । गुरुवीण सोपा नव्हेच ॥१४७॥</p>
<p>
	तरी स्वरू पप्राप्त्यर्थ साधकें । करावीं श्रवणमननादिकें । अभेदभावानुसंधान निकें । तरीच सुखें आत्मलाभ ॥१४८॥</p>
<p>
	प्रपंच हा अज्ञानमय सारा । अज्ञानमूलक तयाचा पसारा । ज्ञानावीण मोक्षास थारा । नाहीं जरा हें समजा ॥१४९॥</p>
<p>
	अनुमान आणि युक्तिप्रभव । हा तो शास्त्राचा अनुभव । प्रपंचनाशींच ज्ञानोद्भव । असंभव अन्यथा ॥१५०॥</p>
<p>
	महात्मा हो कां पापात्मा । जीवात्मा तोच परमात्मा । हें जाणूनि वर्तेल तो महात्मा । अभेदात्मा तो एक ॥१५१॥</p>
<p>
	ब्रम्हात्मैकत्व विज्ञान । हेंच ज्ञानाचें पर्यवसान । झालिया एकदां आत्मज्ञान । समस्त अज्ञान मावळे ॥१५२॥</p>
<p>
	आत्मज्ञान होतां पुरें । अवगंतव्य मग कांहीं नुरे । करतलगत वस्तुजात सारें । साक्षात्कारें तयासी ॥१५३॥</p>
<p>
	आत्मविज्ञानाचें फळ । संसारनिवृत्ति अविकळ । परमानंदप्राप्ति तात्काळ । तया सुकाळ मोक्षाचा ॥१५४॥</p>
<p>
	आत्मा सूक्ष्माहून सूक्ष्मतर । महताहूनि महत्तर । हा तों सर्वव्यापकताप्रकार । बुद्धिगोचर करावया ॥१५५॥</p>
<p>
	तो स्वयें सूक्ष्म ना महत्‌ । तरतमभाव तेथें कल्पित । तो तों आब्रम्हास्तंबपर्यंत । परिपूरित चराचरीं ॥१५६॥</p>
<p>
	तें हें अनिर्वचनीय सत्‌ । बुद्धींत व्हावया संकलित । वाचेनें करिती मर्यादित । अमर्यादित जें स्वयें ॥१५७॥</p>
<p>
	केवळ बुद्धिवैभवाचे योगें । खरें वर्म हातीं न लागे । साधु सद्नुरु संतसंगें । सेवानुरागें तत्प्राप्ती ॥१५८॥</p>
<p>
	ब्रम्हानिरूपण काय थोडें । पोथ्या पुस्तकीं भरलें रोकडें । परी सद्नुरुकृपा जों न घडे । हातीं न चढे कल्पांतीं ॥१५९॥</p>
<p>
	नित्य नैमित्तिक कर्माभावीं । शुद्धसंस्कारयुक्त जों मन नाहीं । तोंवरी ब्रम्हानुभव पाहीं । मुळींच कांहीं नागवे ॥१६०॥</p>
<p>
	ब्रम्हा केवळ नित्य । तद्वयतिरिक्त सर्व अनित्य । द्दश्यजाता नाहीं सातत्य । सत्य त्रिवाचा ॥१६१॥</p>
<p>
	ब्रम्हाचा वक्ताही दुर्मिळ । तैसाच दुर्लभ श्रोताही निर्मळ । वरी प्रेमळ आणि अनुभवशील । सद्नुरु विरळ लाधाया ॥१६२॥</p>
<p>
	ब्रम्हा काय वाटेवर पडलें । गिरिकंदरीं जे जे दडले । यमनियमीं जे अडकले । गढले ध्यानधारणीं ॥१६३॥</p>
<p>
	त्यांनाही न होतां गुरुकृपा । येईना जें ब्रम्हा रूपा । तें तुजसम या लोभस्वरूपा । आतळे बापा कैसेनि ॥१६४॥</p>
<p>
	जयास उदंड द्रव्यासक्ति । तयास ब्रम्हाज्ञानप्राप्ती । न घडे कधींही कल्पांतीं । गांठ निश्चिती बांधावी ॥१६५॥</p>
<p>
	करितां परमार्थश्रवण । करी विषयांचें चिंतन । आणि प्रपंचाचें निदिध्यासन । मग साक्षात्करणही तैसेंच ॥१६६॥</p>
<p>
	मल-विक्षेप आणि आवरण । ऐसें त्रिदोषी अंत:करण । निष्काम कर्में मल-निर्मूलन । विक्षेप - क्षालन उपासना ॥१६७॥</p>
<p>
	स्वकर्म आणि उपासना करितां । परिपव्कता येते कर्त्याचे चित्ता । मल - विक्षेप निर्मूळ होतां । आवरण - शेषता राहते ॥१६८॥</p>
<p>
	तें हें सर्वानर्थबीज आवरण । नासूनि जातें प्रकटतां ज्ञान । होतां रवि प्रकाशमान । जेवीं निरसन तिमिराचें ॥१६९॥</p>
<p>
	सत्यज्ञानानंतादि लक्षणीं । वर्णिलें जे वेदांतविचक्षणीं । तें ब्रम्हा ज्याचा तोच जनीं । होतां ज्ञानी विलसतें ॥१७०॥</p>
<p>
	थोडा अंधार थोडें चांदणें । एकला पांथस्थ रानीं चालणें । बिचकला स्थाणू तस्करभेणें । लपला तेणें तेथेंच ॥१७१॥</p>
<p>
	एकला मी जवळी पैसा । तो त्र टपला वाटपाडया जैसा । आतां करावा विचार कैसा । न ये भरंबसा जीवाचा ॥१७२॥</p>
<p>
	तोंच दुरूनि दीप येतां । प्रकटतां स्थाणूची यथात्मता । विरली तयाची भीतिग्रस्तता । कळली ती आभासता चोराची ॥१७३॥”</p>
<p>
	असो आतां या प्राप्तासी । निवेदिले व्यत्यय श्रोतयांसी । पुढील अध्यायीं श्रेयार्थियासी । श्रेय प्रकाशील निजरूप ॥१७४॥</p>
<p>
	हेमाड साईपदीं लोळे । वाचेस येईल तैसें बरळे । साईकृपा जें जें चावळे । परिसोत भोळे भाविक तें ॥१७५॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । ब्रम्हाज्ञानकथनं नाम षोडशोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 23 Apr 2022 15:53:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 23 Apr 2022 16:11:07 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय १५]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-15-122042300056_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम; ॥
फळलीं जयांचीं पुण्यें अगाधें । तयांसीच साईदर्शन लाधे । त्रिविधताप तयां न बाहे । साधन साधे परमार्था ॥१॥
कृपा करा ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 15" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/23/full/1650709308-6687.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra chapter 15" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम; ॥</p>
<p>
	फळलीं जयांचीं पुण्यें अगाधें । तयांसीच साईदर्शन लाधे । त्रिविधताप तयां न बाहे । साधन साधे परमार्था ॥१॥</p>
<p>
	कृपा करा जी श्रोतेजन । क्षणैक करोनि निजगुरूचिंतन । कथेसी करा सादर मन । द्या अवधान मजकडे ॥२॥</p>
<p>
	आहांत तुम्ही ठावे आम्हां । व्यर्थ परिश्रम कां हे तुम्हां । ऐसें न म्हणा करा क्षमा । उपमा तुम्हां सागराची ॥३॥</p>
<p>
	भरला जरी अपरंपार । तरी न सरिते परववी सागर । घन वर्षतां सहस्त्राधार । तयासही थार देई तो ॥४॥</p>
<p>
	तैसे तुम्ही श्रोते सज्जन । तुम्हांमाजीं करावें मज्जन । इच्छा धरिली न करा तर्जन । दीनवर्जन बरवें ना ॥५॥</p>
<p>
	येवो गंगेचें जल निर्मळ । अथवा गांवींचा लेंडओहोळ । सागरापोटीं दोहींसी स्थळ । संगमीं खळबळविरहित ॥६॥</p>
<p>
	म्हणोनि तुम्हां श्रोतियां चित्ता । संतकथाश्रवणीं जे आस्था । तेचि स्वयें पावेल साफल्यता । कृपेनें पाहतां मजकडे ॥७॥</p>
<p>
	सबूरी आणि श्रद्धायुक । सादर सेवितां हें कथामृत । आतुडेल भक्ति प्रेमयुत । श्रोते कृतकृत्य होतील ॥८॥</p>
<p>
	भक्तां सहज परमप्राप्ति । श्रोतयां भक्ति आणि मुक्ति । भावार्थियां सौख्यशांति । निजविश्रांति सकळिकां ॥९॥</p>
<p>
	गुरुमुखींच्या गोड कथा । ऐकतां निरसेल भवभयव्यथा । होईल आनंद श्रोतियांच्या चित्ता । स्वयें निजात्मता प्रकटेल ॥१०॥</p>
<p>
	ये अध्यायीं निरूपण । प्रेमळ भक्तांचें साईंस प्रार्थन । दर्शन देऊनि साई प्रसन्न । होती कैसेनि त्यां परिसा ॥११॥</p>
<p>
	नुकतीच पाजूनि गेली बाहेरी । मागुतेनि आली जरी मार्जारी । तरी फिरफिरोनि पोरें तिजवरी । धांवती प्रेमभरीं लुंचावया ॥१२॥</p>
<p>
	मग ते कंटाळुनी गुरगुरे । क्षणैक जरी दबती पोरें । आई निवांत बैसली पुरे । घालोनि भंवरे लुंचती ॥१३॥</p>
<p>
	लुंचतां ढोसतां प्रेमभरें । आईलागीं पान्हा पाझरे । मग तीच पूर्वील गुरगुरणें विसरे । प्रीतीनें पसरे क्षितीवरी ॥१४॥</p>
<p>
	प्रेमोदयीं हरपे कंटाळा । चौपायीं कवटाळी द्दढ निजबाळां । वरचेवरी चाटी अवलीळा । काय तो सोहळा अलोलिक ॥१५॥</p>
<p>
	पोरांच्या तीक्ष्ण नखप्रहारें । जों जों मातेची ओंटी विदारे । तों तों अधिक प्रेमाचे झरे । दुग्ध ओझरे बहुधारा ॥१६॥</p>
<p>
	जैसी त्या बाळांची अनन्य भक्ति । मातेसी करी दुग्धोत्पत्ति । तैसीच तुमची साईपदासक्ति । द्रववील चित्तीं साईंतें ॥१७॥</p>
<p>
	एकदां हरिभक्तिपरायण । गुणदासांचें सुश्राव्य कीर्तन । कौपीनेश्वर - सन्निधान । ठाणियाचे जन करविती ॥१८॥</p>
<p>
	पडलिया शिष्टांचा आग्रह । गणुदास करिती कथानुग्रह । एका कवडीचाही परिग्रह । किंवा दुराग्रह तेथें ना ॥१९॥</p>
<p>
	कीर्तना नलगे देणें कवडी । तनु उघडी डोईं न पगडी । कांसेसी साधीच पंचेजोडी  । अनिवार उडी श्रोत्यांची ॥२०॥</p>
<p>
	या पोषाखाची ही कथा । मौज वाटेल श्रवण करितां । अवधारा ती स्वस्थचित्ता । पहा आश्चर्यता बाबांची ॥२१॥</p>
<p>
	एकदां गणुदासांची कथा । शिरडी ग्रामीं होणें असतां । अंगरखा उपरणें फेटा माथां । पोषाखसमन्विता निघाले ॥२२॥</p>
<p>
	शिष्टाचारानुसारता । आनंदें बाबांस वंदूं जातां । ‘वाहवा नवरदेव कीं सजलासि आतां’ बाबा वदतां देखिले ॥२३॥</p>
<p>
	‘जातोसि कोठें ऐसा सजूनी’ बाबा पुसती तयांलागुनी । कीर्तन कराया जातों म्हणुनी । दासगणूंनीं कथियेलें ॥२४॥</p>
<p>
	पुढें बाबा वदती तयांस । ‘अंगरखा उपरणें फेटा कशास । किमर्थ केलास इतुका प्रयास । नलगती आपुल्यास तीं कांहीं ॥२५॥</p>
<p>
	काढ कीं तीं मजसमोर । कशास अंगावर यांचा भार’ । तंव तीं तयांच्या अनुज्ञेनुसार । तेथेंच चरणावर ठेविलीं ॥२६॥</p>
<p>
	तैपासूनि उघडे सोज्ज्वळ । हातीं चिपळी गळां माळ । कीर्तनसमयीं सर्वकाळ । गणुदास हा वेळपर्यंत ॥२७॥</p>
<p>
	तर्‍हा ही जरी जनविरुद्ध । तरी ती अत्यंत पायाशुद्ध । कीं जो प्रबुद्धांचा प्रबुद्ध । नारद - प्रसिद्ध हा मार्ग ॥२८॥</p>
<p>
	ही नारदीय मूल गाडी । येथूनचि हरिदासांची मांदी । बाह्य रंगाची न ज्यां उपाधी । अंत:शुद्धि ध्येय ज्यां ॥२९॥</p>
<p>
	अधोभागचि वस्त्राच्छादित । चिपळ्या वीणा वाजवीत । मुखीं हरिनाम गर्जत । ध्यान विश्रुत नारदाचें ॥३०॥</p>
<p>
	साईसमर्थांचे कृपेनें । स्वयें रचूनि संतांचीं आख्यानें । मोलावीण करिती कीर्तनें । ख्याती तेणें पावले ॥३१॥</p>
<p>
	उल्हास साईभक्तीचा । दासगणूनें विस्तारिला साचा । वाढविला साईप्रेमरसाला । स्वानंदाचा सागर ॥३२॥</p>
<p>
	भक्तशिरोमणि चांदोरकर । तयांचेही अत्यंत उपकार  । साईचरणभक्ति - विस्तार ।  कारण साचार हें मूळ ॥३३॥</p>
<p>
	दासगणूंचें इकडे येणें । एका चांदोरकरांच्या कारणें । जागोजाग तयांचीं कीर्तनें । साईंचीं भजनें चाललीं ॥३४॥</p>
<p>
	पुणें नगर सोलाप्रप्रांतीं । पूर्वींच महाराजांची ख्याती । परी या कोंकणच्या लोकांप्रती । लाविली भक्ति या दोघीं ॥३५॥</p>
<p>
	मुंबई प्रांतीं जी साईभक्ति । तियेचें मूळ या दोन व्यक्ति । साईमहाराज कृपामूर्ति । तयांचे हातीं प्रकटले ॥३६॥</p>
<p>
	श्रीकौपीनेश्वरमंदिरीं । साईकृपेच्या कीर्तनगजरीं । हरिनामाच्या जयजयकारीं । उठली लहरी चोळकरां ॥३७॥</p>
<p>
	हरिकीर्तना बहुत येती । श्रवणा - श्रवणाच्या अनेक रीती । कोणा आवडे बुवांची व्युत्पत्ति । हावभाव - स्थिति कवणा ॥३८॥</p>
<p>
	कोणा आवड गाण्यापुरती । वाहवा बुवा काय हो गाती । काय ते विठ्ठलनामीं रंगती । कथेंत नाचती प्रेमानें ॥३९॥</p>
<p>
	कोणास पूर्वरंगीं भक्ति । कोणाची कथाभागीं आसक्ति । कोणास हरिदासी नकला रुचती । आख्यानीं प्रीति कोणास ॥४०॥</p>
<p>
	बुया प्राकृत कीं व्युत्पन्न । कीं पदपदार्थ - बव्हर्थसंपन्न । कीं केवळ उत्तरंगप्रवीण । कथाश्रवण येपरी ॥४१॥</p>
<p>
	ऐसे श्रोते बहुत असती । परी श्रवणें जोडे श्रद्धा भक्ति । ईश्वर वा संतचरणीं प्रीति । ही श्रोतृस्थिती दुर्मिळ ॥४२॥</p>
<p>
	श्रवण केलें भाराभर । परी अविद्येचे थंरावर थर । तें काय श्रवणाचें प्रत्यंतर । व्यर्थ भाराभर श्रवण तें ॥४३॥</p>
<p>
	न घडे जेणेनि मळक्षाळण । त्यातें काय म्हणावें साबण । न करी जें अविद्यानिरसन । तें काय श्रवण म्हणावें ॥४४॥</p>
<p>
	आधींच चोळकर श्रद्धाळू । आला साई प्रेमाचा उमाळू । मनांत म्हणती बाबा कृपाळू । करा सांभाळू दीनाचा ॥४५॥</p>
<p>
	बिचारा गरीब उमेदवार । पोसूं असमर्थ कुटुंबभार । सरकार - पदरीं मिळावा शेर । बाबांसी भार घातला ॥४६॥</p>
<p>
	नवस करिती कामुक जन । होईल जरी अभीष्टसंपादन । तरी घालूं इच्छाभोजन । करूं ब्राम्हाणसंतर्पण ॥४७॥</p>
<p>
	श्रीमंतांचें नवस - वचन । म्हणती घालूं सह्स्रभोजन । अथवा करूं शतगोदान । मनकामना तृप्त होतां ॥४८॥</p>
<p>
	चोळकर आधींच निर्धन । नवस करावया झालें मन । आठवूनि श्रीसाईंचे चरण । दीनवदन तो बोले ॥४९॥</p>
<p>
	वाबा गरीबीचा संसार । नोकरीवरी सारी मदार । कायमचा व्हावया पगार । परीक्षा पसार हों लागे ॥५०॥</p>
<p>
	परिश्रमांतीं केली तयारी । पास होण्यावर भिस्त सारी । नातरी गांठीची भाकरी । उमेदवारी जाईल ॥५१॥</p>
<p>
	झालों कृपेनें पास जर । होईन आपुले पायीं सादर । वांटीन नांवानें खडीसाखर हाचि निर्धार पैं माझा ॥५२॥</p>
<p>
	एणेंपरी नवस केला । मनाजोगा आनंद झाला । नवस फेडाया  विलंब लागला । त्याग केला साखरेचा ॥५३॥</p>
<p>
	वाटेंत गांठीस कांहीं व्हावें । रिक्तहस्तें कैसें जावें । आजचें उद्यांवर लोटावें । दिवस कंठावे लागले ॥५४॥</p>
<p>
	ओलांडवेल नाणेघांट । सह्याद्रीचा कडाही अफाट । परी प्रापंचिका हा उंबरेघांट । बहु दुर्घट ओलांडूं ॥५५॥</p>
<p>
	नवस न फेडितां शिरडीचा । असेव्य पदार्थ साखरेचा । चहाही बिनसाखरेचा । चोळकरांचा चालला ॥५६॥</p>
<p>
	जातां ऐसे कांहीं दिवस । आली वेळ गेले शिरडीस । फेडिला तैं केलेला नवस । आनंद मनास जाहला ॥५७॥</p>
<p>
	होतांचि साईंचें दर्शन । चोळकर घालती लोटांगण । वंदोनियां बाबांचे चरण । आल्हादपरिपूर्ण ते झाले ॥५८॥</p>
<p>
	मन करूनियां निर्मळ । वांटिती साखर अर्पिती श्रीफळ । म्हणती आजि मनोरथ सकळ । झाले सफळ कीं माझे ॥५९॥</p>
<p>
	आनंदले साईसर्शनें । सुख जाहलें संभाषणें । होते चोळकर जोगांचेचि पाहुणे । आलें जाणें जोगांकडे ॥६०॥</p>
<p>
	जोग उठले पाहुणे निघाले । बाबा जोगांस वदते झाले । “पाजीं यांस चहाचे प्याले । भले भरले साखरेचे” ॥६१॥</p>
<p>
	खुणेचीं अक्षरें पडतां कानीं । चोळकर चमत्कारले मनीं । आनंदाश्रु आले नयनीं । माथा चरणीं ठेविला ॥६२॥</p>
<p>
	कौतुक वाटलें जोगांना । त्याहूनि द्विगुण चोळकरांना । कारण ठावें तयांचें त्यांना । पटल्या खुणा मनाच्या ॥६३॥</p>
<p>
	चहा नाहीं बाबांस ठावा । येक्षणींच कां आठवावा । चोळकरांचा विश्वास पटावा । ठसा उमटावा भक्तीचा ॥६४॥</p>
<p>
	इतक्यांत पुरता दिला इशारा । कीं “पावली वाचादत्त शर्करा । तुझ्या त्यागाचा नेमही पुरा । चोळकरा झालासे ॥६५॥</p>
<p>
	नवस - वेळेचें तुझें चित्त । दीर्घसूत्रतेचें प्रायश्चित्त । हें जरी तुझें ठेवणें गुप्त । तें मज समस्त कळलें गा ॥६६॥</p>
<p>
	तुम्ही कोणी कुठेंही असा । भावें मजपुढें पसरितां पसा । मी तुमचिया भावासरिसा । रात्रंदिसा उभाच ॥६७॥</p>
<p>
	माझा देह जरी इकडे । तुम्ही सातांसमुद्रांपलीकडे । तुम्ही कांहींही करा तिकडे ।  जाणीव मज तात्काळ ॥६८॥</p>
<p>
	कुठेंही जा दुनियेवर । मी तों तुम्हांबरोबर । तुम्हां ह्रदयींच माझें घर । अंतर्यामीं तुमचे मी ॥६९॥</p>
<p>
	ऐसा तुम्हां ह्रदयस्थ जो मी । तयासी नमा नित्य तुम्ही । भूतमात्राच्याही अंतर्यामीं । तोच तो मी वर्ततों ॥७०॥</p>
<p>
	यास्तव तुम्हांस जो जो भेटे । घरीं अथवा वाटे । ते ते ठायीं मीच रहाटें । मीच तिष्ठे त्यामाजीं ॥७१॥</p>
<p>
	कीड मुंगी जलचर खेचर । प्राणिमात्र श्वान शूकर । अवघ्या ठायीं मीच निरंतर । भरलों साचार सर्वत्र ॥७२॥</p>
<p>
	मजशीं धरूं नका अंतर । तुम्ही आम्ही निरंतर ॥ ऐसें मज जो जाणील नर । भाग्य थोर तयाचें” ॥७३॥</p>
<p>
	दिसाया हे वार्ता तोकडी । परी गुणानें बहु चोखडी । किती त्या चोळकरा गोडी । दिधली जोडी भक्तीची ॥७४॥</p>
<p>
	होतें जें जें तया अंतरीं । तें तें बाबांनीं एणेपरी । दाविलें तयासी प्रत्यंतरीं । काय भक्तीस डोल दाविती ॥७६॥</p>
<p>
	चातक - तृष्णेच्या परिहारा । मेघ सदयता वर्षे धारा । परिणामीं निवे अखिल धरा । तेच तर्‍हा हे झाली ॥७७॥</p>
<p>
	चोळकर बिचार कोठील कोण । निमित्तास दासगणूंचें कीर्तन । नवस करावया झालें मन । बाबाही प्रसन्न जाहले ॥७८॥</p>
<p>
	तेणेंच हा चमत्कार । कळलें संतांचें अंतर । उपदेशार्थ बाबा तत्पर । ऐसे अवसर आणीत ॥७९॥</p>
<p>
	चोळकरांचें केवळ निमित्त । सकळ भक्तांचें साधावया हित । अकळ बाबांची कळा नित । विलोकीतचि रहावें ॥८०॥</p>
<p>
	ऐसीच आणीक कला वर्णून । मग हा अध्याय करूं पूर्ण । कैसा एकें केला प्रश्न । कैसें तन्निरसन बाबांनीं ॥८१॥</p>
<p>
	एकदां बाबा मशिदींत । असतां आपुले आसनीं स्थित । भक्त एक सन्मुख बैसत । ऐके चुकचुकत पाल एक ॥८२॥</p>
<p>
	पल्लीपतन पल्लीवचन । पुढील भविष्यार्थाचें सूचन । सहज बाबांसी करी प्रश्र । जिज्ञासासंपन्न होउनी ॥८३॥</p>
<p>
	बाबा ही पाठीसी भिंतीवरी । किमर्थ हो पाल चुकचुक करी । काय असावें तियेचे अंतरीं । अशुभकारी नाहीं ना ॥८४॥</p>
<p>
	तयास बाबा झाले वदते । पालीस आलें आनंदभरतें । कीं औरंगाबादेहूनि येते । बहीण येथें भेटावया ॥८५॥</p>
<p>
	आधीं पाल तो जीव काय । तिला कैंचा बाप माय । कैंची बहीण कैंचा भाय । संसार - व्यवसाय काय तिये ॥८६॥</p>
<p>
	म्हणोनि बाबा हें कांहींतरी । बोलिले विनोदें प्रत्युत्तरीं । ऐसें मानूनियां अंतरीं । स्वस्थ क्षणभरी बैसला ॥८७॥</p>
<p>
	इतुक्यांत औरंगाबादेहून । गृहस्थ एक घोडयावरून । आला घ्यावया बाबांचें दर्शन । बाबा तैं स्नान करीत ॥८८॥</p>
<p>
	तयास जाणें होतें पुढें । चंदीवाचून चालेना घोडें । हरभरे विकत घ्यावया थोडे । बाजाराकडे निघाला ॥८९॥</p>
<p>
	पालीचा प्रश्न विचारणारा । साश्चर्य पाहे नव सौदागरा । इतुक्यांत त्यानें खाकेचा तोबरा । झटकला कचरा झाडावया ॥९०॥</p>
<p>
	उपडा आपटतांच क्षितीवर । पाल एक पडली बाहेर । घाबर्‍या घाबर्‍या धांवली सरसर । नजरेसमोर सकळांच्या ॥९१॥</p>
<p>
	प्रश्नपुसत्या बाबा वदती । आतां लक्ष ठेवीं तिजवरती । पालीची त्या बहीण हीच ती । पहा चमत्कृती तियेची ॥९२॥</p>
<p>
	ती जी तेथूनि निघाली तडक । ताई करीत होतीच चुकचुक । धरूनियां त्या आवाजावर रोख । चमकत ठुमकत  चालली ॥९३॥</p>
<p>
	बहिणी - बहिणींची ती गांठ । बहुतां दिसीं झाली भेट । चुंबिती मुख आलिंगिती दाट । प्रेमाचा थाट अनुपम ॥९४॥</p>
<p>
	एकमेकींस घालीत गिरक्या । आनंदानें मारीत भिरक्या । गेल्या उभ्या आडव्या तिरक्या । स्वच्छंद फिरक्या मारीत ॥९५॥</p>
<p>
	कोठें तें औरंगाबाद शहर । कोठें शिरडी काय हा प्रकार । कैसा यावा अवचित हा स्वार । पालही बरोबर तयाच्या ॥९६॥</p>
<p>
	असेल पाल औरंगाबादीं । असेल शिरलेली तोबर्‍यामधीं । परी त्या प्रश्नोत्तरासंबंधीं । कैसी ही संधी पातली ॥९७॥</p>
<p>
	पाल काय चुकचुकावी । प्रश्नस्फूर्ति ती काय व्हावी । अर्थोपपत्ति काय कथावी । प्रचीति यावी तात्काळ ॥९८॥</p>
<p>
	ऐसा हा योग अप्रतिम । विनोदावर सार्वत्रिक प्रेम । संत साधनयोजूनि अनुपम । भक्तक्षेम वाढविती ॥९९॥</p>
<p>
	पहा हा येथें जिज्ञासु नसता । अथवा कोणीही न प्रश्न पुसता । कैसा साईंचा महिमा समजता । कोणास कळता हा अर्थ ॥१००॥</p>
<p>
	अनेक वेळीं शब्द करितां । अनेक पाली ठाव्या समस्तां । कोण पुसे त्या शब्दांच्या अर्थां । अथवा वार्ता तयांची ॥१०१॥</p>
<p>
	सारांश हा जगाचा खेळ । सूत्रें गुप्त आणि अकळ । कोणास व्हावी तरी ही अटकळ । आश्चर्य सकळ करितात ॥१०२॥</p>
<p>
	उलट या पाली ठाव्या समस्तां । कोण पुसे त्या शब्दांच्या अर्थां । अथवा वार्ता तयांची ॥१०१॥</p>
<p>
	सारांश हा जगाचा खेळ । सूत्रें गुप्त आणि अकळ । कोणास व्हावी तरी ही अटकळ । आश्चर्य सकळ करितात ॥१०२॥</p>
<p>
	उलट या पाली शब्द करितां । दर्शविती कीं अनर्थसुचकता । ‘कृष्ण कृष्ण’ वाचे म्हणतां । टळते अनर्थता जन वदती ॥१०३॥</p>
<p>
	असेना कां कैसीही व्युत्पत्ति । परंतु ही काय चमत्कृति । भक्त जडवावया निजपदाप्रति । उत्तम ही युक्ति बाबांची ॥१०४॥</p>
<p>
	वाचील जो हा अध्याय आदरीं । अथवा नेमानें आवर्तन करी । तयाचें संकट गुरुराय निवारी । खूण अंतरीं द्दढ बांधा ॥१०५॥</p>
<p>
	अनन्यभावें चरणीं माथा । जो जो वाही तयासी तत्त्वतां । त्राता पाता अभयदाता । कर्ता हर्ता तो एक ॥१०६॥</p>
<p>
	अंतर मानूं नका येथ । ऐसाच आहे हा साईनाथ । निजानुभवाचा गुह्य भावार्थ । भक्तकल्याणार्थ मी कथितों ॥१०७॥</p>
<p>
	जगीं संपूर्ण मीचि एक । दुजें न मजविण कांहीं आणीक । नाहीं केवळ हाचि लोक । अखिल त्रैलोक्य मीचि मी ॥१०८॥</p>
<p>
	ऐसें अद्वितीयत्व जेथें स्फुरे । तेथें भयाची वार्ताचि नुरे । निरभिमानें निरहंकारें । चिन्मात्र सारें भरलें ज्या ॥१०९॥</p>
<p>
	हेमाडपंत साईंसी शरण । सोडूं नेणे क्षण एक चरण । कीं त्यांत आहे संसारतरण । गोड निरूपण अवधारा ॥११०॥</p>
<p>
	पुढील अध्यायीं प्रसंग सुंदर । निर्माण करितील साई गुरुवर । ब्रम्हाज्ञान कैसें वाटेवर । चिटकीवारी जन मागे ॥१११॥</p>
<p>
	कोणी एक लोभी जन । पुसेल साईंसी ब्रम्हाज्ञान । तें तयाचेच खिशांतून । देतील काढून महाराज ॥११२॥</p>
<p>
	श्रोतीं परिसतां हें कथानक । दिसूनि येईल बाबांचें कौतुक ।  लोभ सुटल्यावांचूनि निष्टंक । ब्रम्हा नि:शंक अप्राप्य ॥११३॥</p>
<p>
	कोण तयाचा अधिकारी । त्याचा कोणीही विचार न करी । कोणा तें प्राप्त कैशियापरी । तेंही विवरतील महाराज ॥११४॥</p>
<p>
	मी तों तयांचा दासानुदास । पदर पसरितों करितों आस । कीं हा साईप्रेमविलास । अति उल्हासें परिसा जी ॥११५॥</p>
<p>
	चित्तही होईल प्रसन्न । लाधेल चैतन्य समाधान । म्हण्वून श्रोतां द्यावें अवधान । संतमहिमान कळेल ॥११६॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । चोळकरशर्कराख्यानं नाम पंचदशोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 23 Apr 2022 15:50:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 23 Apr 2022 16:10:35 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय १४]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-14-122042300055_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम; ॥
जय साईनाथा संतवरा । जय जय दयाळा गुणगंभीरा । जय निर्विकारा परात्परा । जय जय अपारा निरवद्या ॥१॥
ठेवूनि अलक्ष्यीं ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 14" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/23/full/1650709164-5527.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra chapter 14" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम; ॥</p>
<p>
	जय साईनाथा संतवरा । जय जय दयाळा गुणगंभीरा । जय निर्विकारा परात्परा । जय जय अपारा निरवद्या ॥१॥</p>
<p>
	ठेवूनि अलक्ष्यीं द्दष्टीं । निजभक्तार्थ दया पोटीं । नानामिषें भक्तांसी भेटी । देऊनि संकटीं तारिसी ॥२॥</p>
<p>
	करावया दीनोद्धार । हाही एक लीलावतार । भक्तदुर्वासना दुर्धर । दुष्ट निशाचर वधावया ॥३॥</p>
<p>
	सद्भावें दर्शना जे जे आले । ते ते स्वानंदरस प्याले । अंतरीं आनंदनिर्भर धाले । डोलूं लागले प्रेमसुखें ॥४॥</p>
<p>
	एवंगुण साईसमर्थ । हीन हीन मी अतिविनीत । तयांचिया चरणाप्रत । साष्टांग प्रणिपात दीनाचा ॥५॥</p>
<p>
	आतां पूर्वकथानुसंधान । कृष्ण श्वान भक्षितां दध्योदन । जाहलें हिमज्वराचें निरसन । कथा निवेदन जाहली ॥६॥</p>
<p>
	दुर्धर वाखा आणि मोड्सी । अंगुली - तर्जन - तरणमात्रेंसीं । भर्जित भुईमूग सेवावयासी । देऊनि नाहींशीं जाहलीं ॥७॥</p>
<p>
	तैसाच एकाचा पोटशूळ । एकाचा कर्णरोग समूळ । एका क्षयरोग महाप्रबळ । कैसा निर्दळला दर्शनें ॥८॥</p>
<p>
	कैसे श्रीसाईकृपेंकरून । भीमानी जाहले सुखसंपन्न । साईंलागीं कृतज्ञा पूर्ण । चरणीं शरण अखंड ॥९॥</p>
<p>
	तैसाचि अभिनव हाही प्रकार । हाही अपूर्व चमत्कार । श्रोतियां श्रवणार्थीं बहु आदर । जाणोनि सादर करीतसें ॥१०॥</p>
<p>
	श्रोतीं नसतां सावधान । कैसें येईल वक्त्यासी स्फुरण । कैसें गुणा चढेल कथन । कैसें तें रसपूर्ण होईल ॥११॥</p>
<p>
	वक्ता काय करील कथन । सर्वथैव तो श्रोतयां आधीन । श्रोतेच तयाचे अवलंबन । रसवर्धन तेणेनी ॥१२॥</p>
<p>
	अधींचि हें संतचरित्र । स्वभावेंचि गोड बाह्याभ्यंतर । गोड संतांचे आहार विहार । सहजोद्नारही गोड ॥१३॥</p>
<p>
	चरित्र नव्हे हें स्वानंदजीवन । साईमहाराज दयाघन । प्रेमें भक्तांलागून । वर्षले साधन निजस्मरणा ॥१४॥</p>
<p>
	गोष्टी सांगत प्रवृत्तीच्या । मार्गास लावीत निवृत्तीच्या । ऐशा प्रपंचपरमार्थाच्या ।सत्पुरुषांच्या या कथा ॥१५॥</p>
<p>
	हेतु तरी हेच असावे । कीं संसारीं सुखें वर्तावें । परी नित्य सावध राहावें । सार्थक करावें देहाचें ॥१६॥</p>
<p>
	अनंत पुण्याईच्या बळें । अवचटें जीवा नरदेह मिळे । त्यांतही परमार्थ जयां आकळे । भाग्यें आगळे ते एक ॥१७॥</p>
<p>
	तेथेंही जो करीना सार्थक । जन्मला भूभार तो निरर्थक । पशूहूनि काय अधिक । जगण्याचें सुख तयाला ॥१८॥</p>
<p>
	आहार निद्रा भय मैथुन । यांहूनि कांहीं न जाणे जो आन । तो नर केवळ पशूसमान । पुच्छ - विषाणविरहित ॥१९॥</p>
<p>
	काय या नरजन्माची महती । एणेंचि साधेल भगवद्भक्ती । पायीं लागतील चारी मुक्ति । निजात्मप्राप्ति एणेंचि ॥२०॥</p>
<p>
	मेघमंडळीं विद्युल्लेखा । संसार हा चंचल तिजसारिखा । एथें कालाहिग्रस्त लोकां । सुखाची घटिका दुर्मिळ ॥२१॥</p>
<p>
	माता पिता भगिनी भ्राता । दारा पुत्र सुता चुलता । नदीप्रवाहीं काष्ठें वाहतां । एकत्र मिळतात तैसे  हे ॥२२॥</p>
<p>
	दिसलीं क्षण एक एकवट । लाटेसरसी फाटाफूट । होऊनि पडे जैं ताटातूट । जुळेना तो घआट पुनश्च ॥२३॥</p>
<p>
	साधिलें न आत्महित जनीं । व्यर्थ शिणविली तयानें जननी । लागल्यावीण संतांचे चरणीं । होईल हानी जन्माची ॥२४॥</p>
<p>
	प्राणी जेव्हां जन्मास आला । तेव्हांचि मृत्युपंथा लागला । मग आज उद्यां कीं परवांला । विश्वासला नर फसला तो ॥२५॥</p>
<p>
	ठेवावें या मरणाचें स्मरण । देह केवळ काळाचें वैरण । ऐसें ह्या प्रपंचाचें लक्षण । सावधान असावें ॥२६॥</p>
<p>
	व्यवहारीं पाऊल ठेवितां चौकस । परमार्थ पावेल अप्रयास । म्हणूनि प्रपंचीं नसावा आळस । पुरुषार्थीं उदास असूं नये ॥२७॥</p>
<p>
	प्रेमें साईकथा परिसती । तयांसी होईल नि:श्रेयसप्राप्ती । साईचरणीं वाढेल भक्ति । सुखसंवित्ति लाधेल ॥२८॥</p>
<p>
	जयांसी साईंचें प्रेम पूर्ण । तयांसी हें कथांचें सांठवण । देईल पदोपदीं आठवण । साईचरणपंकजांची ॥२९॥</p>
<p>
	नि:शब्दाचें शब्दें कथन । अतींद्रियाचें इंद्रियें सेवन । कितीही करा हें कथामृतपान । पूर्ण समाधान दुर्लभ ॥३०॥</p>
<p>
	अतर्क्य संतांचें विंदान । अनिर्वचनीय तन्महिमान । तयाचें वाचे पूर्ण कथन । कराया कोण समर्थ ॥३१॥</p>
<p>
	नित्य पडतां या कथा श्रवणीं । साई दिसेल नित्य नयनीं । मनीं ध्यानीं दिवसारजनीं । स्मरणीं चिंतनीं राहील ॥३२॥</p>
<p>
	दिसूं लागेल जागृतिस्वप्नीं । आसनीं शयनीं आणि भोजनीं । सवेंहीं येईल गमनागमनीं । जनीं वनीं निरंतर ॥३३॥</p>
<p>
	ऐसा येतां निदिध्यासनीं । मन पावेल स्थिति उन्मनी । ऐसें होऊं लागतां अनुदिनीं । चित्त चैतन्यीं समरसेल ॥३४॥</p>
<p>
	आतां पुढील कथेची संगती । असे जी कथिली पूर्वाध्यायांतीं । करूं तिचा उपक्रम संप्रती । सादर श्रोतीं होईजें ॥३५॥</p>
<p>
	भावभक्तीची शिरापुरी । कितीही खा सदा अपुरी । जरी आकंठ सेविली तरी । तृप्ति न परिपूर्ण कधींही ॥३६॥</p>
<p>
	असो आतां ही दुसरी कथा । श्रोतां आपण सादर परिसतां । संतदर्शन सार्थकता । होईल द्दढता मनाची ॥३७॥</p>
<p>
	बाबा न बाह्यत: कांहींच करीत । स्थान सोडूनि कोठें न जात । परी बैसल्या स्थळीं सर्व जाणत । अनुभव देत सकळां जनां ॥३८॥</p>
<p>
	जे सत्तत्त्वही निजपिंडीं । तेंचि कीं अखिल ब्रम्हांडीं । कायेची करोनि कुरवंडी । अखंडित अवलोका ॥३९॥</p>
<p>
	त्या सत्तत्त्वासी जो शरण । सर्वांसाठीं तया एकत्व जाण । नानात्वाचें किलिया धारण । जन्ममरण - परंपरा ॥४०॥</p>
<p>
	नानात्व स्थापणारी बुद्धि । अविद्याच जाणावी त्रिशुद्धी । गुर्वागमें चित्तशुद्धि  । स्वरूपस्थिति तेणेनी ॥४१॥</p>
<p>
	अविद्येपासाव निवृत्ति । तीच एकत्वाची प्राप्ति । अणुमात्र असतां भेद चित्तीं । अनन्य स्थिति ती कैंची ॥४२॥</p>
<p>
	ब्रम्हादि - स्थावरान्त । जें जें उपाधिसमन्वित । अविवेकियां अब्रम्हावत्‌ । ओतप्रोत ब्रम्हा तें ॥४३॥</p>
<p>
	तें सकल विज्ञानगनस्वभाव । संसारधर्मा जेथ अभाव । नामरूपांचा पुसिला ठाव । निरवयव ब्रम्हा तें ॥४४॥</p>
<p>
	उपाधिस्वभावभेदें । अविद्यामोहादि प्रमादें । नानात्वीं हें चित्त लोधे । एकत्वबोधें स्वस्थ हो ॥४५॥</p>
<p>
	मी वेगळा जन वेगळे । ऐसें न जया कांहीं निराळें । अखंडैकरसपूर्ण जें भरलें । दुजें न उरलें तयातें ॥४६॥</p>
<p>
	नामरूप कार्य करणें । या सर्व उपाधि समजणें । नानात्व सर्वथैव त्यजणें । ब्रम्हा होणें तें हेंच ॥४७॥</p>
<p>
	मीच एक अवघा पाहीं । मजवीण रिता ठाव नाहीं । व्यापूनि अशेष दिशा दाही । नाहींच कांहीं मदन्य ॥४८॥</p>
<p>
	हेचि भावना द्दढ धरावी । माया भूल दूरी सारावी । मजवीण नाहीं वस्तु परावी । आवरावी निजद्दष्टि ॥४९॥</p>
<p>
	श्रोतयां सहज येई संशय । तरी हा भेद कैसा होय । जीव ज्ञाता, ब्रम्हा ज्ञेय । कोण उपाय हा जाया ॥५०॥</p>
<p>
	भेदबुद्धि रतिप्रमाण । अनन्यत्वा पाडी खाण । तात्काळ उत्पादी नानापण । जन्म - मरणकारणा ॥५१॥</p>
<p>
	अविद्या - तिमिरद्दष्टि । लोपतां लोपे सकळ सृष्टि । सस्वरूपैक भरेल दिठी । नानात्व उठाउठी पळेल ॥५२॥</p>
<p>
	शुद्धोदकीं शुद्धोदक । घालितां होतें निखिळ एक । पूर्वापर समरसे देख । ओळख नुरे भेदाची ॥५३॥</p>
<p>
	काष्ठाकार भिन्न भिन्न । परी तीं अग्निस्वरूपें अभिन्न । तो तो अविच्छिन्न आकारहीन । स्वयें विलीन निजरूपीं ।५४॥</p>
<p>
	ऐसेंच आत्मैक्य - विज्ञान । नलगे अन्य प्रतिपादन । आत्मा सर्वांभूतीं परिपूर्ण । रूपविहीन सर्वथा ॥५५॥</p>
<p>
	विपरी अध्यारोप निमित्त । तेणें भ्रमित सर्वदा चित्त । जन्ममरणादि दु:खें अनुभवित । प्राणी दुश्चित्त सर्वदा ॥५६॥</p>
<p>
	त्यागूनि नामरूपादि उपाधी । विशुद्ध विज्ञानरूप साधी । ऐशिया सिद्धासी माया ब बाधी । निजानंदीं रत सदा ॥५७॥</p>
<p>
	ऐसिया स्थितीचें उदाहरण । मूर्तिमंत श्रीसाईंचे चरण । भाग्यें लाभलें जयां दर्शन । धन्य धन्य जन ऐसे ॥५८॥</p>
<p>
	चंद्र उदकीं दिसे स्थित । परी तो जैसा उदकातीत । संत तैसेचि भक्तपरिवेष्टित । वस्तुत: अलिप्त तयांसी ॥५९॥</p>
<p>
	दिसे जरी परिवारिला भक्तीं । परी न कोठेंही आसक्ती । स्वस्वरूपीं चित्तवृत्ति । द्दश्यनिवृत्ति सर्वदा ॥६०॥</p>
<p>
	ऐसे हे महा साधुसंत । जयांच्या बोलांत वर्ते भगवंत । कांहीं न अप्राप्य तयां विश्वांत । कांहीं न अज्ञात तयांतें ॥६१॥</p>
<p>
	उपदेश देती आणि घेती । ऐसे गुरु - शिष्य असंख्य जगतीं । परी उपदेशासवें अनुभूति । देती हातीं ते विरळा ॥६२॥</p>
<p>
	पुरे आतां हें पूर्ववर्णन । करूं मुख्य कथावतरण । तदर्थीं श्रोते सोत्कंठ पूर्ण । श्रवणसंपन्न होवोत ॥६३॥</p>
<p>
	मोंगलाई नांदेड शहरीं । पारशी एक प्रख्यात व्यापारी । धार्मिक लोकप्रिय भारी । नाम निर्धारीं रतनजी ॥६४॥</p>
<p>
	धनसंपदेचे पसारे । गाडया घोडे शेतें शिवारें । वाडियांचीं मुक्तद्वारें । विन्मुख माघारें नच कोणी ॥६५॥</p>
<p>
	ऐसे बाह्यत: आनंदसागरीं । डुंबत असतां अहोरात्रीं । अंतरीं दुर्धर चिंतामगरी । सदैव घेरी शेटीतें ॥६६॥</p>
<p>
	हें तों ईश्वरी सूत्रचि पाहीं । निर्भिळ सौख्य नाहीं कुणाही । कोणास कांहीं कोणास कांहीं । हुरहुर राही पाठीसी ॥६७॥</p>
<p>
	कोणी म्हणेल मीच मोठा । सर्वैश्वर्यें मीच लाठा । चालूं लागेल उफराटा । नसता ताठा भरेल ॥६८॥</p>
<p>
	निर्व्यंगत्वा लागेल द्दष्ट । लव - व्यंगत्वाचें गालबोट । परमेष्ठी स्वकरेंच फांसी यथेष्ट । ऐसं हें स्पष्ट वाटतें ॥६९॥</p>
<p>
	रतनजी धनकनकसंपन्न । आलिया गेलिया घाली अन्न । दीनांचें विच्छिन्न करी दैन्य । सुप्रसन्न सर्वदा ॥७०॥</p>
<p>
	एवं शेट्जी सुखांत होते । घेतलें जरी हें जगाचिया चितें । परी वित्ताचें सौख्य विफल तें । पुत्रहीनातें सर्वथा ॥७१॥</p>
<p>
	कन्या - संपत्तीचा पसारा । एकामागूनि एक बारा । कोठूनि लाभेल सुखाचा वारा । मनासी थारा कैंचा त्या ॥७२॥</p>
<p>
	प्रेमावीण हरिकीर्तन । तालस्वरावीण गायन । यज्ञोपवीतावीण ब्राम्हाण । शोभा कवण तयाची ॥७३॥</p>
<p>
	आहे सकलकलाप्रवीण । नाहीं सारासार ज्ञान । भूतदयाहीन आचारसंपन्न । शोभा कवण तयाची ॥७४॥</p>
<p>
	भाळीं टिळे गोपीचंदन । गळां तुळशीमाळा भूषण । जिव्हा करी संतविडंवन । शोभा कवण तयाची ॥७५॥</p>
<p>
	अनुतापावीण तीथाटन । गळसरीवीण अलंकरण । पुत्रावीण गृहस्थददन । शोभा कवण तयाची ॥७६॥</p>
<p>
	एक तरी सुपुत्र - संतान ।  देईल काय नारायण । हेंच तया अनुदिन चिंतन । निश्चिंत मन होईना ॥७७॥</p>
<p>
	तेणें शेटजी सदा खिन्न । गोड न लागे अन्नपान । मनीं रात्रंदिन उद्विग्न । चिंतामग्न सर्वदा ॥७८॥</p>
<p>
	देवा माझा एवढा कलंक । धुऊनि कीजे मज निष्कलंक । देईं वंशा आधार एक । लज्जा राख प्रभुराया ॥७९॥</p>
<p>
	दासगणूंवर मोठी भक्ति । जीवंचें हार्द तयां निवेदिती । ते म्हणती जा शिरडीप्रती । मनेप्सित पावसी ॥८०॥</p>
<p>
	घेईं बाबांचें दर्शन । चरण तयांचें वंदून । करीं साद्यंत गुह्य निवेदन । आशीर्वचन देतील ॥८१॥</p>
<p>
	जा होईल तुझें कल्याण । अतर्क्य बबांचें विंदान । जाईं तयांसी अनन्य शरण । कृतकल्याण होशील ॥८२॥</p>
<p>
	मनास मानवला विचार । रतनजींचा झाला निर्धार । कांहीं दिन लोटलियावर । पातले शिरडीवर रतनजी ॥८३॥</p>
<p>
	गेले दर्शना मशिदीसी । घातलें लोटांगण साईपदासी । पाहोनि महाराज पुण्यराशी । प्रेम तयांसी लोटलें ॥८४॥</p>
<p>
	करंड फुलांचा सोडिला । सुमन हार काढूनि घेतला । प्रेमें बाबांच्या गळां घातला । फलभार समर्पिला चरणांतें ॥८५॥</p>
<p>
	होऊनियां अति विनीत । रतनजी अत्यादरयुक्त । बाबांपाशीं जाऊनि बैसत । प्रार्थना करीत ती परिसा ॥८६॥</p>
<p>
	जन पडतां महत्संकटीं । येती आपुल्या पायानिकटी । बाबा रक्षिती उठाउठी । म्यां हे गोष्टी ऐकिली ॥८७॥</p>
<p>
	म्हणोनि इथवर आलों भेटी । धरोनि मोठी उत्कंठा पोटीं । सादर करितों चरणसंपुटीं । परता न लोटीं महाराजा ॥८८॥</p>
<p>
	मग म्हणती बाबा तयांसी । येतां येतां आज येसी । दे काय मज दक्षिणा देसी । मग तूं होसी कृतार्थ ॥८९॥</p>
<p>
	येतां कोणीही दर्शनासी । लागतां चरण वंदावयासी । असो हिंदु यवन वा पारसी । दक्षिणा त्यापासीं मागत ॥९०॥</p>
<p>
	ती तरी काय थोडी थोडकी । रुपये एक दोन वा पंचकडी । मागत शत सहस्र लक्ष कोडी । स्वेच्छा परवडी दक्षिणा ॥९१॥</p>
<p>
	दिधली तरी आणीक आणा । संपली म्हणतां उसनी घ्याना । जेव्हां कोठें उसनीही मिळेना । तेव्हां मग याचना थांबवीत ॥९२॥</p>
<p>
	आणीक तयां भकां म्हणत । “फिकीर न करीं जा यत्किंचित । देईन तुजला रुपये मी मस्त । बैसें तूं निश्चिंत मजपाशीं ॥९३॥</p>
<p>
	दुनियेमें किसीका कोई है । और किसीका कोई है । अपना तो यहां कोई नहीं है । अपना अल्लाही अल्ला है ॥९४॥</p>
<p>
	करी जो मज जीव प्राण । ऐसियाचीच मज वाण । तो देतां मज एक गुण । देतोंमी शतगुण तयासी” ॥९५॥</p>
<p>
	असेना मोठा लक्षाधीश । तयासही दक्षिणा मागावयास । निर्धना घरीं जावयास । करीत आज्ञेस महाराज ॥९६॥</p>
<p>
	मोठा धनाढय अथवा रंक । गरीब दुर्बळ अथवा खंक । एक उणा वा एक अधिक । नाहीं ठाऊक साईंस ॥९७॥</p>
<p>
	वंदूनियां आज्ञा शिरीं । निरभिमान होऊनि अंतरीं । बाबांलागीं याचना करी । जाऊनि घरीं गरीबांच्या ॥९८॥</p>
<p>
	तरी या पोटीं हाच सारांश । दक्षिणेचें करूनि  मिष । बाबा शिकवीत निजभक्तांस । वरावयास सलीनता ॥९९॥</p>
<p>
	उपजेल कोणासही ऐशी शंका । साधूस तों पाहिजे धन कां । यदर्थीं विचार करितां निका । फिटेल आशंका मनाची ॥१००॥</p>
<p>
	साई जरी पूर्णकाम । दक्षिणेचें काय काम । कैसा असेल तो निष्काम । भक्तांसीं दाम मागे जो ॥१०१॥</p>
<p>
	जयासी गारा आणि हिरा । ताम्र - नाणें वा स्वर्णमोहरा । एकाचि परिमाणाचा विकारा । तो कां निजकरा पसरितो ॥१०२॥</p>
<p>
	उदरपूर्त्यर्थ मागती भिक्षा । वैराग्याची वरिली दीक्षा । तया विरक्ता निरपेक्षा । काय अपेक्षा दक्षिणेची ॥१०३॥</p>
<p>
	अष्टसिद्धि जोडिल्या करीं ।  जयाचे सदा तिष्ठती द्वारीं । नवनिधि जयाचे आज्ञाधारी । तया कां लाचारी द्रव्यार्थ ॥१०४॥</p>
<p>
	ऐहिकावरी मारूनि लाथ । आमुष्मिका न ढुंकून पहात । ऐसे जे सम्यग्दर्शी विरक्त । धन किमर्थ तयांना ॥१०५॥</p>
<p>
	जे संत साधु सज्जन । जे उत्तमश्लोकपरायण । भक्तकल्याणार्थ जयांचें जीवन । तयांसी धन कां व्हावें ॥१०६॥</p>
<p>
	साधूसी किमर्थ व्हावी दक्षिणा । तयांनीं असावें निरिच्छ मना । फकीर होऊनि लोभ सुटेना । नित्य आराधना पैशाची ॥१०७॥</p>
<p>
	प्रथमदर्शना घेती दक्षिणा । पुनर्दर्शना मागगी दक्षिणा । निरोप घेतां आणा दक्षिणा । क्षणोक्षणीं हें काय ॥१०८॥</p>
<p>
	आधीं पानीय उतरापोशन । पुढें हस्तमुख - प्रक्षालन । करोद्वर्तन तांबूलदान । तयामागून दक्षिणा ॥१०९॥</p>
<p>
	परी बाबांचा क्रम विलक्षण । करुं जातांचि चंदनविलेपन । किंवा अक्षताद्यलंकरण । दक्षिणाप्रदान कांक्षिती ॥११०॥</p>
<p>
	आरंभितांच पूर्वाराधना । बाबा आधींच मागती दक्षिणा । ॐ तत्सह्ब्रम्हार्पणा । तत्क्षणाच करणें ये ॥१११॥</p>
<p>
	तरी या शंकेचें निरसन । कराया नलगे महाप्रयत्न । होतां क्षणैक दत्तावधान । समाधान लाधाल ॥११२॥</p>
<p>
	धनाचा जो करणें संचय । धर्म घडावा हाचि आशय । परी क्षुल्ल्लक काम आणि विषय । यांतचि अतिशय वेंचे तें ॥११३॥</p>
<p>
	धनापासाव धर्म घडे । धर्मापासाव ज्ञान जोडे । स्वार्थ तरी तो परमार्थीं चढे । मना आतुडे समाधान ॥११४॥</p>
<p>
	आरंभीं बहुतकालपर्यंत । बाबा कांहींही नव्हते घेत । जळक्या काडयांचा संग्रह करीत । तोच कीं भरीत खिशांत ॥११५॥</p>
<p>
	असो भक्त वा अभक्त । कोणाहीपाशीं कांहीं न मागत । दिड्की दुगाणी ठेविल्या तेथ । तमाखू आणीत वा तेल ॥११६॥</p>
<p>
	तमाखूचें फार प्रेम । ओढीत विडी अथवा चिलीम । त्या चिलीमीची सेवाही नि:सीम । बहुधा निर्धूम्र नसे ती ॥११७॥</p>
<p>
	पुढें आलें कोणाचे मना । रिक्तहस्तें दक्षिणेविना । जावें कैसें संतदर्शना । तदर्थ दक्षिणा ते घेत ॥११८॥</p>
<p>
	दिडकी दिधल्या घालीत खिसां । ठेवितां कोणी ढबू पैसा । परत करीत जैशाचा तैसा । क्रम हा ऐसा बहुकाळ ॥११९॥</p>
<p>
	परी पुढें कांहीं कालें । साईबाबांचें माहात्म्य वाढलें । भक्तांचे थवे येऊं लागले । पूजन चाललें विधिपूर्वक ॥१२०॥</p>
<p>
	नाहीं पूजेची साङ्गता जाण । सुवर्ण - पुष्प - दक्षिणेवीण । हें तों नित्यपूजेचें विधान । पूजकां प्रमाण ठाउकें ॥१२१॥</p>
<p>
	राज्याभिषेकसिंचना । अथवा संपादितां पदपूजना । पूजक आणिती उपायना । तैसीच दक्षिणा गुरुपूजे ॥१२२॥</p>
<p>
	‘उच्चरिदिवि दक्षिणावंत । हिरण्यदा अमृतवंत । हेमदाता शुद्धिमंत’ । मंत्रवर्णांत हें बचन ॥१२३॥</p>
<p>
	सौमंगल्य गंधदानें । आयुश्यवर्धन अक्षतेनें । श्री ऐश्वर्य पुष्प - तांबूलार्पणें । दक्षिणेनें बहुधनता ॥१२४॥</p>
<p>
	गंधाक्षतपुष्प - तांबूल । पूजाद्रव्यांत जैसें मूल । तैसीच दक्षिणा सुवर्णफूल । बहुधन फल वितरिते ॥१२५॥</p>
<p>
	दक्षिणा लागे देवतापूजनीं । तैसीच तत्सांगतासिद्धयर्थ जनीं । व्रतोद्यापन वायनदानीं । हिरण्य लागे अर्पाया ॥१२६॥</p>
<p>
	जगाची ही घदामोड । पैशावरीच सारी मोड । अब्रूनुकसानीची ही फेड । फेडितात ही पैशानें ॥१२७॥</p>
<p>
	“हिरण्यगर्भ - गर्भस्थ” । इत्यादि मंत्र उच्चारीत । देवपूजेसही दक्षिणा संमत । संतपूजनींच कां नको ॥१२८॥</p>
<p>
	संतदर्शना जातां । आपापुल्या ज्ञानानुसारता । येतें कोणाच्या काय चित्ता । एकवासक्यता दुर्मिळ ॥१२९॥</p>
<p>
	भजनभावार्थ कोणा मनीं । कोणी संतपरीक्षेलागुनी । कोणी म्हणे मनींचें सांगुनी । देईल जनीं तो संत ॥१३०॥</p>
<p>
	कोणी प्रार्थिती दीर्घायुता । हस्ति - हिरण्य - संपत्ति - मत्ता । कोणी पुत्रपौत्रवत्ता । अखंडित सत्ता मागती ॥१३१॥</p>
<p>
	नवल बाबांची अगाध शैली । जावोत कोणी कराया कुटाळी । दुर्बुद्धीची होऊनि होळी । चरणकमळीं विनटत ॥१३२॥</p>
<p>
	हेंही भाग्य नसलिया संचितीं । अनुताप तरी पावत चित्तीं । होऊनि निरभिमान निश्चिती । द्दढ प्रचीती पावत ॥१३३॥</p>
<p>
	हे तों सर्व प्राकृत भक्त । सर्वथैव प्रपंचासक्त । दक्षिणादानें शुद्धचित्त । व्हावेत हें मनोगत बाबांचें ॥१३४॥</p>
<p>
	“यज्ञेन दानेन तपसा” ही श्रुति । आत्मज्ञानोत्सुकाहीप्रती । दक्षिणाप्रदान साधन युक्ती । स्पष्ट वचनोक्ति सांगते ॥१३५॥</p>
<p>
	भक्त स्वार्थी वा परमार्थी । दोघांसी व्हावी इष्टप्राप्ति । तरी दक्षिणा निजगुरूप्रती । निजहितार्थीं द्यावी कीं ॥१३६॥</p>
<p>
	प्रजापतीही देवां दैत्यां । मानवांसकट तीन अपत्यां । ब्रम्हाचर्यवास संपतां । उपदेश मागतां हेंचि वदे ॥१३७॥</p>
<p>
	‘द’ हा एकाक्षर उपदेश केला । काय एणें बोध झाला । तोही विचारूनि द्दढ केला । अभिनव लीला गुरुशिष्य ॥१३८॥</p>
<p>
	‘दान्त व्हावें’ देव समजले । ‘दया करा’ असुर समजले । ‘दान’ द्यावें मानव समजले । प्रजापति ‘भेलें भलें’ म्हणे ॥१३९॥</p>
<p>
	देवा नव्हेत कोणी अन्य । मानवचि परी स्वभावें भिन्न । अदान्त उत्तमगुणसंपन्न । देव हें अभिधान तयांचें ॥१४०॥</p>
<p>
	मानवांमाजीच आहेत असुर । जे हिंसापर दुष्ट क्रूर । मानवां गांजी लोभ दुर्धर । एवं त्रिप्रकार मानव ॥१४१॥</p>
<p>
	तरी लोभप्रधान नर । लोभगर्तेंतूनि काढावया वर । भक्तहितेच्छा ओढवी कर । कृपासागर साईनाथ ॥१४२॥</p>
<p>
	तैत्तिरीयोपनैषदनुवाक । एकादशीं श्रुतिही देख । दानप्रकार आज्ञापी अनेक । त्यांतील प्रत्येक परिसावा ॥१४३॥</p>
<p>
	देणें नित्य श्रद्धेनें द्यावें । विनाश्रद्धा दिधलें न पावे । राजाज्ञे शास्त्राज्ञे भ्यावें । लज्जेनें द्यावें कांहीतरी ॥१४४॥</p>
<p>
	विवाहादि लोकाचार । तेथेंहीं देणें लागे अहेर । देऊनि राखावा मित्राचार । लोकव्यवहार - शिक्षा ही ॥१४५॥</p>
<p>
	बाबाही दकारें भक्तांप्रत । भक्तहितार्थ तेंचि मागत । करा दया दान व्हा दान्त । सौख्य अत्यंत लाधाल ॥१४६॥</p>
<p>
	अदान्तत्वादि दोषत्रय । करावया हा त्रिदोषक्षय । हा एकाक्षर स्वल्प उपाय  । शिष्यार्थ गुरुराय योजिती ॥१४७॥</p>
<p>
	काम क्रोध आणि लोभ । आत्मोन्नतीलागीं अशुभ । तयांचा जय अति दुर्लभ । यदर्थ सुलभ उपाय हा ॥१४८॥</p>
<p>
	जैसी ही श्रुती तैसीच स्मृती । तियेचीही ऐसीच अनुमती । तियेचें अवतरण श्रोतयांप्रती । द्दढ प्रतीत्यर्थ देतसें ॥१४९॥</p>
<p>
	त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: । काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌ ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	श्रीमद्भगवद्नीता, अ. १६, श्लो, २१<br />
	<p>
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</p>
<br /><p>
	काम क्रोध लोभ जाण । हीं नरकाचीं द्वारें तीन । यांचे पायीं आत्मविनाशन । यदर्थ निक्षून त्यागावें ॥१५०॥</p>
<p>
	परम दयाळू साई समर्थ । साधावया भक्तहितार्थ । तयांलागीं दक्षिणा मागत । शिक्षणही देत त्यागाचें ॥१५१॥</p>
<p>
	दक्षिणेची काय किंत । साधावया गुरुवचनार्थ । प्राणही द्यावया नाहीं जो उद्यत । तयाचा परमार्थ कायसा ॥१५२॥</p>
<p>
	खरेंच भक्तकल्याणावीण । बाबांस काय दक्षिणेचें कारण । स्वयें तयांचें नव्हतें जीवन । अवलंबून दक्षिणेवरी ॥१५३॥</p>
<p>
	पोटासाठीं भिक्षा मागत । दक्षिणेपोटीं नव्हता स्वार्थ । दक्षिणादानें शुद्धचित्त । व्हावेत निजभक्त हा हेत ॥१५४॥</p>
<p>
	उपरिनिर्दिष्ट वेदवचन । तदनुसार दक्षिणाप्रदान । आधीं घडवूनि आणिल्यावांचून । न घडे पूजन संपूर्ण ॥१५५॥</p>
<p>
	पुरे आतां हा दक्षिणा - ग्रंथ । विशद झाला तन्मथितार्थ । नाहीं अभिलाष ना स्वार्थ । भक्तस्वहितार्थ दक्षिणा ॥१५६॥</p>
<p>
	म्हणूनि आतां कथाभाग । पुढें निवेदूं यथासांग । ऐका रतनजी - दक्षिणाप्रसंग । कौतुक चांग साईंचें ॥१५७॥</p>
<p>
	श्रोतीं पूर्ण कृपापूर्वक । परिसिजे हें अद्भुत कथानक । साईस्वरूप कैसें व्यापक । कैसें अलोलिक देखिजे ॥१५८॥</p>
<p>
	शेटीपाशीं दक्षिणा मागतां । साई कथिती पूर्ववृत्तांता । परी तो नाठवे शेटीचे चित्ता । वाटली विस्मयता तयांसी ॥१५९॥</p>
<p>
	तीन रुपये चौदा आणे । त्वां मज दिधले ते मी जाणें । बाकी जे आणिले मजकारणें । ते मज दक्षिणे देईं गा ॥१६०॥</p>
<p>
	हेंचि बाबांचें प्रथमदर्शन । ऐकूनि बाबांचें हें वचन । रतनजी शेट विस्मयापन्न । करूं स्मरण लागती ॥१६१॥</p>
<p>
	शिरडीस पूर्वीं आलों नाहीं । कोणासवें न पाठविलें कांहीं । ऐसें असतां आश्चर्य पाहीं । महाराज साई वदती हे ॥१६२॥</p>
<p>
	नाहींच ऐसें कधीं घडलें । रतनजी मनीं बहु अवघडले । दक्षिणा दिधली पायां पडले । तयां नुलगडलें तें कोडें ॥१६३॥</p>
<p>
	तें तितुकेंचि राहूनि गेलें । प्रयोजन येण्याचें निवेदन केलें । पुनश्च पायीं लोटांगण घातलें । जोडूनि बैसले निजहस्त ॥१६४॥</p>
<p>
	शेटजी मनीं बहु धाले । म्हणती बाबा बरें केलें । पूर्वभाग्य उदया आलें । दर्शन झालें पायाचें ॥१६५॥</p>
<p>
	मी दुर्दैवी अल्पज्ञ । नेणें पूजा अर्चा यज्ञ । विधिवशें हें त्रिकालज्ञ । प्राज्ञदर्शन घडलें कीं ॥१६६॥</p>
<p>
	आपण जाणतां माझी चिंता । करा दूर ती कृपावंता । लोटूं नका या अनन्यभक्ता । पायांपरता दयाळा ॥१६७॥</p>
<p>
	दया उपजली साईनाथा । म्हणती चिंता न करीं वृथा । तव नष्टचर्ये येथूनि आतां । पाया उतरता लागला ॥१६८॥</p>
<p>
	प्रसाद उदीचा हातीं दिला । कृपेचाकर शिरीं ठेविला । ‘मनाची मुराद पुरवील अल्ला’ । आशीर्वाद दिधला शेटीस ॥१६९॥</p>
<p>
	मग आज्ञापन घेतलें । रतनजी परतोनि नांदेडा आले । जें जें जैसें घडलें । सविस्तर कथिलें गणुदासा ॥१७०॥</p>
<p>
	यथायोग्य झालें दर्शन । आनंदनिर्भर झालें मन । प्रसादपूर्वक आश्वासन । आशीर्वचन पावलों ॥१७१॥</p>
<p>
	यथास्थित सर्व झालें । परी एक नाहीं मज समजलें । महाराज हें काय वदले । कांहींही नुमजलें मजलागीं ॥१७२॥</p>
<p>
	“तीन रुपये चौदा आणे । त्वां मज दिले मी जाणें” । बाबांचें हें काय बोलणें । सांगा स्पष्टपणें मज सारें ॥१७३॥</p>
<p>
	कुठले रुपये कुठले आणे । कुठूनि पूर्वीं घडलें देणें । यांतील इंगित कांहींत नेणें । प्रथमचि जाणें शिर्डीचें ॥१७४॥</p>
<p>
	मज तों कांहीं उकल न पडे । भासे मज हें गूढ रोकडें । दुर्बोध केवळ हें मज कोडें । आपणा उलगडे तरी कां ॥१७५॥</p>
<p>
	हा तरी एक चमत्कार । दासगणू करिती विचर । काय असावें यांतील सार । मनाचा निर्धार होईना ॥१७६॥</p>
<p>
	आठवे पूर्ण विचारांतीं । एक अवलियाची मूर्ति । मौलीसाहेब जयां वदती । आठवली चित्तीं बुवांच्या ॥१७७॥</p>
<p>
	जातीचे हे मुसलमान । कार्यक्रम संतांसमान । धंदा हमालीचा करून । प्राक्तनाधीन वर्तती ॥१७८॥</p>
<p>
	यांचें चरित्र सविस्तर देतां । विषयांतर होईल ग्रंथा । मौलीसाहेब - चरित्रकथा । ठावी समस्तां नांदेडीं ॥१७९॥</p>
<p>
	शिरडीस जाणें जाणें ठरल्यावरी । मौलीसाहेब यांची फेरी । सहज शेटजींचे घरीं । स्वेच्छाचारीं जाहली ॥१८०॥</p>
<p>
	तयां उभयतां परस्पर । प्रेम होतें अपरंपार । फलपान - सुमनहार । यथोपचार अर्पिले ॥१८१॥</p>
<p>
	शेटजीस होऊनि प्रेरणा । दिधला मौलींस छोटा खाना । तेथील खर्चाची कल्पना । स्मरली तत्क्षणा गणुदासा ॥१८२॥</p>
<p>
	खर्चाची यादी आणविली । पईन सर्वःई धरली । तयाची मग एकंदर केली । बेरीज झाली बरोबर ॥१८३॥</p>
<p>
	तीन रुपये चौदाचे आणे । तंतोतंत अधिक ना उणें । तयाची पावती बाबांनीं देणें । आश्चर्य बहुगुणें सर्वत्रां ॥१८४॥</p>
<p>
	साई महाराज ज्ञानराशी । जाणे बैसोनियां मशिदीसी । भूत - भविष्यवर्तमानासी । कवण्याही देशीं घडो तें ॥१८५॥</p>
<p>
	भूतमात्रीं एकात्मता । असलियावीण साईसमर्था । येईल कां हा प्रकार अनुभवितां । अथवा सांगतां दुजियांतें ॥१८६॥</p>
<p>
	शिरडीपासूनि नांदेड दूर । दोहींमध्यें महदंतर । अनोळखी हे संत परस्पर । साईस ही तार यावी कसी ॥१८७॥</p>
<p>
	साईमहाराज तो मी एक । मौलीबुवा कोणी आणिक । भेदबुद्धीचा हा विवेक । नाहीं अनेकत्व उभयांत ॥१८८॥</p>
<p>
	मौलीबुवांच तोचि आत्मा । असे सर्वांचा सर्वांतरात्मा । परी या एकात्मतेच्या धर्मा । धन्य त्या वर्मा जाणे तो ॥१८९॥</p>
<p>
	बाह्या देहें जरी वियुक्त । अंतरीं दोघे नित्ययुक्त । ‘ते दोघे’ ही वाणी अयुक्त । कधींही विभक्त नव्हत ते ॥१९०॥</p>
<p>
	त्या दोघांचें एकज्ञान । एकप्राण एक अनुसंधान । दोघेही एक चैतन्यघन । समसमान वृत्तीनें ॥१९१॥</p>
<p>
	शिरडी - नांदेडीं महदंतर । त्या दोघांचें एक अंतर । एक प्राण एक शरीर । तेणें ही तार परस्परां ॥१९२॥</p>
<p>
	काय नवल हें साधुसंत । तारायंत्रें तारारहित । कुठें कांहींही घडो सृष्टींत । साद्यंत अवगत तयांतें ॥१९३॥</p>
<p>
	पुढें योग्य काळ लोटला । रातनजीस देव पावला । स्त्रियेसी त्याच्या गर्भ राहिला । वृक्ष पालवला आशेचा ॥१९४॥</p>
<p>
	सुवेळीं कुटुंब बाळंत झालें । आशीर्वचन सत्य झालें । पुत्ररत्न पोटीं आलें । आनंदले रतनजी ॥१९५॥</p>
<p>
	पडतां बहुसाल अवर्षण । व्हावें अवचटा पर्जन्यवर्षण । तैसे हे शेटजी निवाले पूर्ण । पुत्रसंतानप्राप्तीनें ॥१९६॥</p>
<p>
	पुढें तो वंशवेल जो फुलला । यथाक्रम विस्तारत गेला । कन्या - पुत्रीं सुखें डवरला । सौख्य लाधला रतनजी ॥१९७॥</p>
<p>
	पुढेंही जात साईदर्शना । पावूनि तयांच्या आशीर्वचना । पूर्ण जाहल्या मनकामना । तुष्टले मना रतनजी ॥१९८॥</p>
<p>
	वसंतीं जरी आम्र सुफलित । सर्वचि फळें पव्क न होत । बारा मुलांत चार हयात । सुखें नांदत सांप्रत ॥१९९॥</p>
<p>
	यद्दच्छेनें जें जें घडावें । त्यांतचि ज्याचें चित्त सुखावे । ऐसे रतनजी गोड स्वभावें । खेद न पावले तिळभर ॥२००॥</p>
<p>
	आतां पुढील कथेचें सार । साईनें भरलें स्थिरचर । कोणीं कुठेंही बैसूनि स्थिर । घ्यावा साचार अनुभव ॥२०१॥</p>
<p>
	ठाणें शहरचा एक गरीब लाचार । उपनांव जयाचें चोळकर । कैसे तयाच्या भावार्थावर । जाहले गुरुवर प्रसन्न ॥२०२॥</p>
<p>
	पूर्वीं कधीं न पाहिलें देखिलें । तया साईंस कैसें नवसिलें । कैसे तयांचे मनोरथ पुरले । अनुभव दिधले कैसे त्यां ॥२०३॥</p>
<p>
	कायसें भजन प्रेमावीण । वाचणें पोथी अर्थावीण । देव कैंचा भावावीण । अवघा शीण तो सारा ॥२०४॥</p>
<p>
	कुंकुमतिलकावीण भाळ । अनुभवावीण ज्ञान फोल । नाहीं हे पुस्तकी विद्येचे बोल । अनुभवें तोल करावें ॥२०५॥</p>
<p>
	किमर्थ हा प्रबंध साईलीला । अनुबंध याचा ठावा न मजला । मजकरवीं जो साईंनीं लिहविला । ठावें तयांसीच प्रयोजा ॥२०६॥</p>
<p>
	शिवाय ग्रंथास लागे अधिकारी । मी तों साईंची करितों चाकरी । तयांची ही दफ्तरदारी । आज्ञाधारी तयांचा ॥२०७॥</p>
<p>
	श्रोते चातक तृषाकीर्ण । साई समर्थ स्वानंदघन । वर्षे अगाध कथाजीवन । तृषा शमन करावया ॥२०८॥</p>
<p>
	जिया सत्तेनें हे वाणी । जयांचें हें चरित्र वर्णी । तयांचिया पदरजकणीं । घेऊअ लोळणी हे काया ॥२०९॥</p>
<p>
	तोच या वाचेचा प्रवर्तविता । तोच निजकथेचा कथयिता । त्याचेच पायीं होवो स्थिरता । चंचल चित्ता माझिया ॥२१०॥</p>
<p>
	जैसें हें कायिक आणि वाचिक । तैसेंच भजन हें मानसिक । घडो मज अक्षय सुखदायक । दीन मी पाईक साईंचा ॥२११॥</p>
<p>
	चरित्रवदता आणि वदविता । जरी साईच नटला तत्त्वता । तरी काय भिन्न तच्छ्रोता । तोही न परता साईविण ॥२१२॥</p>
<p>
	दिसाया दिसे चरित्र केवळ । परी हा सकळ साईंचा खेळ । स्वयेंच होऊनि खेळिया प्रेमळ खेळ हा प्रबळ मांडिला ॥२१३॥</p>
<p>
	अगाध साईबाबाचरित्र । भक्तांसी अनुभव दावूनि विचित्र । करूनि मजला निमित्तमात्र । तुष्टवीत निजछात्र - समुदाय ॥२१४॥</p>
<p>
	चरित्र नव्हे हा सुखाचा ठेवा । निज परमामृताचा मेवा । भाग्यें आगळा तेणेंचि सेवावा । भक्तिभावाकरोनी ॥२१५॥</p>
<p>
	नवल गुरुकृपेचा महिमा । स्मरण रहावें भक्तां आम्हां । म्हणवूनियां ग्रंथपरिश्रमा । भक्तविश्रामार्थ सेविलें ॥२१६॥</p>
<p>
	आवडीं हें चरित्र गातां । उल्लसेल श्रवणसंपन्नता । कथानुवृत्त्यनुवादें भक्ता । भक्तिप्रेमळता वाढेल ॥२१७॥</p>
<p>
	श्रवण करितां रात्रंदिन । तुटेल मायामोहबंधन । निरसेल त्रिपुटीचें भान । सुखसंपन्न श्रोतेजन ॥२१८॥</p>
<p>
	धरूनि श्रीसाईचरण । हेमाड अनन्यभावें शरण । विसंबूं न पवे एकही क्षण । पायींच लोटांगण अखंड ॥२१९॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । रतनजी - साईसमागमो नाम चतुर्दशोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 23 Apr 2022 15:48:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 23 Apr 2022 16:09:26 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय १३]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-13-122042300054_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथाय नम; ॥
आकारें सूत्रमय अति लाहन । अर्थगांभीर्यें अति गहन । व्यापकत्वें बहु विस्तीर्ण । संकीर्ण तरी तितुकेच ॥१॥
ऐसे ते ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 13" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/23/full/1650708913-5962.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra Marathi adhyay 13" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथाय नम; ॥</p>
<p>
	आकारें सूत्रमय अति लाहन । अर्थगांभीर्यें अति गहन । व्यापकत्वें बहु विस्तीर्ण । संकीर्ण तरी तितुकेच ॥१॥</p>
<p>
	ऐसे ते बाबांचे बोल । अर्थें तत्त्वें अति सखोल । कल्पांतींही नव्हती फोल । समतोल आणि अनमोल ॥२॥</p>
<p>
	पूर्वापरानुसंधान रहावें । यथाप्राप्तानुवर्ती व्हावें । नित्य तृप्त सदा असावें । नसावें सचिंत कदापि ॥३॥</p>
<p>
	“अरे जरी मी झालों फकीर । घर ना दार बेफिकीर । बैसलों एका ठायीं स्थिर । सारी किरकिर त्यागुनी ॥४॥</p>
<p>
	तरी ती माया अनिवार । मलाही गांजी वरचेवर । मी विसरें परी तिजला न विसर । मज ती निरंतर कवटाळी ॥५॥</p>
<p>
	आदिमायाच ते हरीची । त्रेधा उडविते ब्रम्हादिकांची । तेथ मज दुबळ्या फकीराची । वार्ता कैंची तिजपुढें ॥६॥</p>
<p>
	हरीच होईल जेव्हां प्रसन्न । तेव्हाम्च होईल ते विच्छिन्न । विना अविच्छिन्न हरिमजन । मायानिरसन नोहे पां” ॥७॥</p>
<p>
	ऐसी ही मायेची महती । भक्तांलागीं बाबा कथिती । सेवेंचि व्हावया तन्निवृत्ति । भजनस्थिति वानिती ॥८॥</p>
<p>
	संत माझी सचेतन मूर्तीं । कृष्ण स्वयें म्हणे भागवतीं । कोणा न ठावी ही स्पष्टोक्ति । उद्धवाप्रती हरीची ॥९॥</p>
<p>
	म्हणोनि भक्तकल्याणार्थ । दयाघन साईसमर्थ । वदते झाले जें सत्य सार्थ । परिसा अतिविनीत होऊनी ॥१०॥</p>
<p>
	“पाप जयांचें विलया गेलें । ऐसे जें पुण्यात्मे वहिले । तेचि माझे भजनीं लागले । खूण लाधले ते माझी ॥११॥</p>
<p>
	‘साई साई’ नित्य म्हणाल । सात समुद्र करीन न्याहाल । या बोला विश्वास ठेवाल । पावाल कल्याण निश्चयें ॥१२॥</p>
<p>
	नलगे मज पूजासंभार । षोडश वा अष्टोपचार । जेथें भाव अपरंपार । मजला थार ते ठायीं” ॥१३॥</p>
<p>
	ऐसे बाबा वेळोवेळां । बोलूनि गेले भक्तजिव्हाळा । आतां आठूनि त्या प्रेमळ बोला । करूं विरंगुळा मनासी ॥१४॥</p>
<p>
	ऐसा हा दयाळू साईसखा । शरणागतांचा पाठिराखा । भक्तकैवार घेऊनि निका । नवल विलोका केलें तें ॥१५॥</p>
<p>
	दवडूनि चित्ताची अनेकाग्रता । करोनि तयाची एकाग्रता । परिसावी ही नूतन कथा साग्रता । कृतकार्यता होईल ॥१६॥</p>
<p>
	साईमुखींची अमृतवृष्टि । तीच जेथें पुष्टि तुष्टि । कोण कंटाळे शिरडीचे कष्टीं । निजहितद्दष्टि ठेविल्या ॥१७॥</p>
<p>
	गताध्यायीं अनुसंधान । दिधलें एका अग्निहोत्र्यालागून । ब्रम्हीभूत - निजगुरुदर्शन । आनंदसंपन्न त्या केलें ॥१८॥</p>
<p>
	आतां हा अध्याय त्याहूनि गोड । भक्त एक क्षयी रोड । दिधली तया आरोग्याची जोड । मोडूनि खोड स्वप्नांत ॥१९॥</p>
<p>
	तरी एका भाविकजन । होऊनियां दत्तावधान । साईनाथचरित्र गहन । कल्मषदहनकारक जें ॥२०॥</p>
<p>
	पुण्यपावन हें चरित्र । जल जैसें गंगेचें पवित्र । धन्य श्रवणकर्त्यांचे श्रोत्र । इहपरत्रसाधक तें ॥२१॥</p>
<p>
	पाहूं अमृतांची उपमा देऊन । परी अमृत काय गोड याहून । अमृत करील प्राणरक्षण । जन्मनिवारण चरित्र हें ॥२२॥</p>
<p>
	जीव म्हणती सत्ताधीश । करील जें जें जेईल इच्छेस । ऐसें जयाचे वाटे मनास । कथानकास या परिसावें ॥२३॥</p>
<p>
	जीव जरी खरा स्वतंत्र । सुखालागीं कष्टतां अहोरात्र । पदरीं पडतें दु:ख मात्र । हें तों चरित्र सत्तेचें ॥२४॥</p>
<p>
	दु:खें टाळावयालागीं । असतां सावधान जागोजागीं । तीं त्या धुंडीत लागवेगीं । त्याचीच मागी घेतात ॥२५॥</p>
<p>
	वारूं जातां गळां पडती । झाडूनि टाकितां अधिक लिपडती । वाउगी जीवाची धडपड ती । अहोराती तो शीण ॥२६॥</p>
<p>
	जीव जरी खरा स्ववश । तरी तो असता पूर्ण सुखवश । दु:खाचा एक लवलेश । रेसभरही नातळता ॥२७॥</p>
<p>
	पापा न आचरितां कधीं । पुण्याचीच करिता समृद्धि । सुखाचीच संपादितां वृद्धि । स्वतंत्र बुद्धि म्हणवोनि ॥२८॥</p>
<p>
	परी जीव नाहीं स्वतंत्र । पाठीं लागलें कर्मतंत्र । तयाचा खेळचि विचित्र । हातीं कळसूत्र कर्माचें ॥२९॥</p>
<p>
	पुण्याकडे लक्ष जाय । पापाकडे ओढिती पाय । सत्कर्माचा शोधितां ठाय । कुकर्मीं काय आतुडे ॥३०॥</p>
<p>
	पुणें जिल्ह्यांतील जुन्नरामाजीं । नारायणगांवचा पाटील भीमाजी । तयाची कथा आतां परिसा जी । रसराजीच अमृताची ॥३१॥</p>
<p>
	भीमाजी घरचा सुखसंपन्न । आल्यागेल्या घाली अन्न । कधीं न ज्याचें मन खिन्न । प्रसन्नवदन सर्वदा ॥३२॥</p>
<p>
	अद्दष्टाचे विलक्षण संजोग । न कळतां होती लाभ - वियोग । चालूनि येती कर्मभोग । नसते रोग उद्भवती ॥३३॥</p>
<p>
	इसवी सन एकोणीसशें नव भीमाजीस पीडी दुर्दैव । होय कफक्षय रोगोद्भव । प्रादुर्भाव ज्वराचा ॥३४॥</p>
<p>
	य़ेऊं लागला असह्य खोकला । ज्वरही फार वाढूं लागला । दिवसेंदिवस बळावत गेला । निराश झाला भीमाजी ॥३५॥</p>
<p>
	तोंडास फेंस सर्वदा येणें । मचूळ आणि रक्ताचे गुळणे । पोटांत अक्षयी कळमळणें । जीव तगमगणें राहीना ॥३६॥</p>
<p>
	शेजे खिळिला दुखणाईत । गळालीं गात्रें चालला वाळत । उपायांची झाली शिकस्त । झाला तो त्रस्त अत्यंत ॥३७॥</p>
<p>
	अन्नपान कांहीं न रुचे । पेजपथ्य कांहीं न पचे । तेणें अस्वस्थ कांहीं न सुचे । हाल जिवाचे असह्य ॥३८॥</p>
<p>
	देवदेवस्की झाली सारी । हात टेकिले वैद्य - डॉक्टरीं । पाणी सोडिलें जीविताशेवरी । पडला विचारीं भीमाजी ॥३९॥</p>
<p>
	पाटील झाले उद्विग्न चित्तीं । दिसती थोडे दिसांचे सोबती । उत्तरोत्तर फारचि थकती । दिवसगती लागले ॥४०॥</p>
<p>
	आराधिली कुलदेवता । तीही देईना आरोग्यता । जोशी पंचाक्षरी समस्तां । थकले पुसपुसतां पाटील ॥४१॥</p>
<p>
	कोणी म्हणती अंगरोग  । काय तरी हा दैवयोग । वाटे ओढावला पुरा भोग । निरुपयोग मनुष्ययत्ना ॥४२॥</p>
<p>
	डॉक्टर झाले हकीम झाले । उपचार करितां टेकीस आले । कोणाचें कांहींच न चाले ॥ प्रयत्न हरले सकळांचे ॥४३॥</p>
<p>
	पाटील अत्यंत कदरले । म्हणती देवा म्यां काय केलें । कांहींच कां उपयोगा न आलें । पाप असलें कैंचे हें ॥४४॥</p>
<p>
	देव तरी कैसा विलक्षन । सौख्य - भोगत्या एकही क्षण । आपुलें होऊं नेदी स्मरण । नवल विंदान तयाचें ॥४५॥</p>
<p>
	मग तयाच्याचि जैं येई मना । संकटपरंपरा धोडितो नाना । करवूनि घेई आपुल्या स्मरणा । ‘नारायणा धांव’ म्हणवी ॥४६॥</p>
<p>
	असो कळवळ्याचा धांवा ऐकिला । देव तात्काळ गहिंवरला । बुद्धि उपजली भीमाजीला । पत्र नानाला वाटला ॥४८॥</p>
<p>
	तोचि त्यांचा शुभशकुन । तेंचि रोगाचें निरसन । पुढें सविस्तर पत्र लिहून । नानांस त्यांनीं पाठविलें ॥४९॥</p>
<p>
	नानासाहेबांचें स्मरण । तेंच साईनाथांचें । स्फुरण । उद्भवलें रोगनिवारणकारण । अतर्क्य विंदन संतांचें ॥५०॥</p>
<p>
	हो कां कालचक्राची रचना । तेथही दिसते ईश्वरी योजना । यास्तव कोणी अन्यथा कल्पना । करूनि वल्गना न करावी ॥५१॥</p>
<p>
	बरी वाईट क्रिया सारी । ईश्वर तेथींचा सूत्रधारी । तोचि तारी तोचि मारी । कार्यकारी तो एक ॥५२॥</p>
<p>
	पाटील लिहिती चांदोरकरांस । औषधें खातां आला त्रास । कदरलों मी या जीवितास । जग उदास वाटतें ॥५३॥</p>
<p>
	डॉक्टरांनीं आशा सोडिली । व्याधी दु:साध्य ऐसी ठरविली । हकीमवैद्यांची बुद्धी थकली । उमेद खचली माझीही ॥५४॥</p>
<p>
	तरी आतां एक विनंति । आहे आपुले चरणांप्रती । व्हावी मज आपुली भेट निश्चिती । ही एक चित्तीं असोसी ॥५५॥</p>
<p>
	चांदोरकरांनीं पत्र वाचिलें । त्यांचेंही मन खिन्न झालें । भीमाजी पाटील बहु भले । नाना द्रवले अंतरीं ॥५६॥</p>
<p>
	उत्तरीं कळविती एकचि उपाय । साईबाबांचे धरावे पाय । हाचि केवळ तरणोपाय । बाप माय तो एक ॥५७॥</p>
<p>
	तीच कनावळू सर्वांची आई । हांकेसरसी धांवत येई । कळवळूनि कडिये घेई । जाणे सोई लेंकरांची ॥५८॥</p>
<p>
	क्षयरोगाची कथा काय । महारोग दर्शनें जाय । शंका न धरीं तिळप्राय । घट्ट पाय धरीं जा ॥५९॥</p>
<p>
	जो जें मागे त्या तें देई । हें ब्रीद जयानें बांधिलें पायीं । म्हणोनि म्हणतों करीं गा घाई । दर्शन घेईं साईंचें ॥६०॥</p>
<p>
	भयांमाजीं मोठें भय । मरणापरिस दुजें काय । घट्ट धरीं जा साईंचे पाय । करील निर्भय तो एक ॥६१॥</p>
<p>
	दु:सह्य पाटलाची व्यथा । पातली प्राणांतिक अवस्था । कधीं भेटेन साईनाथा । कधीं कार्यार्था साधेन ॥६२॥</p>
<p>
	ऐसा पाटील झाला बावरा । म्हणे सरसामान आवरा । उदयीक सत्वर तयारी करा । वाट धरा शिरडीची ॥६३॥</p>
<p>
	येणेंप्रमाणें द्दढनिश्चयेंसीं । निरोप पुसूनि सकळिकांसी । महाराजांचे दर्शनासी । निघाले शिरडीसी पाटील ॥६४॥</p>
<p>
	घेतले आप्तजन बरोबरी । भीमाजी निघाले झडकरी । उत्कंठा फाराचि अंतरीं । शिरडी सत्वरी कैं देखें ॥६५॥</p>
<p>
	मशिदीच्या चौकाशेजारीं । गाडी आली पुढले द्वारीं । चौघांहीं वाहूनियां करीं । भीमाजी वरी आणिले ॥६६॥</p>
<p>
	नानासाहेभ समवेत होते । माधवरावही आले तेथें । ज्या माधवरावांचिया हातें । सुगम पद तें सर्वत्रां ॥६७॥</p>
<p>
	पाटील पाहोनि बाबा वदती । “शामा हे चोर आणूनि किती । घालशी माझे अंगावरती । काय हें कृति बरी का” ॥६८॥</p>
<p>
	साईपदीं ठेविला माथा । भीमाजी म्हणे साईनाथा । कृपा करीं मज अनाथा । दीनानाथा सांभाळीं ॥६९॥</p>
<p>
	देखूनियां पाटलाची व्यथा । दया उपजली साईनाथा । तेसरसी शमली दु:खावस्था । पाटील चित्ता विश्वासला ॥७०॥</p>
<p>
	पाहूनि भीमाजी अस्वस्थ । कृपासागर साई समर्थ । हेलावला अपरिमित । बोले सस्मितमुख तेव्हां ॥७१॥</p>
<p>
	“बैस आतां सोडीं खंत । खंत न करिती विचारवंत । झाला तुझिया भोक्तृत्वा अंत । पाय शिरडींत टाकितां ॥७२॥</p>
<p>
	आकंठ संकटार्णवीं बुडाला । हो कां महद्दु:खगर्तेंत गढला । जो या मशीदमाईची पायरी चढला । सुखा आरूढला तो जाणा ॥७३॥</p>
<p>
	फकीर येथींचा मोठा दयाळु । करील व्यथेचें निर्मूळु । प्रेमें करील प्रतिपाळु । तो कनवाळु सकळांचा ॥७४॥</p>
<p>
	यालागीं तूं स्वस्थ पाहीं । भीमाबाईच्या सदनीं राहीं । आराम तो एका - दो दिसांही । जा कीं होईल तुजप्रति” ॥७५॥</p>
<p>
	जैसा एकादा आयुष्यहीन । पावे सुदैवें अमृतसिंचन । लाधे तात्काळ पुनरुज्जीवन । तैसें समाधान पाटिला ॥७६॥</p>
<p>
	ऐकूनि साईमुखींचें वचन । मरणोन्मुखा अमृतपान । किंवा तृषार्ता लाधावें जीवन । तैसें समाधान पाटिला ॥७७॥</p>
<p>
	प्रति पांच मिनिटांस । रक्ताच्या गुळण्या येत मुखास । बाबा सन्मुख एक तास । बैसतां निरास पावल्या ॥७८॥</p>
<p>
	केलें न व्यथेचें परीक्षण । पुसिलें न तदुद्भाकारण । केवळ कृपानिरीक्षण । रोगोन्मूलन तात्काळ ॥७९॥</p>
<p>
	कृपानिरीक्षण होतां पुरे । वाळल्या काष्ठा येती कोंभरे । वसंतावीण फुलती तुरे । तें फळीं डवरे रमणीय ॥८०॥</p>
<p>
	रोग काय आरोग्य काय । पुण्यपापाचा होतां क्षय । ज्याचें त्यानें भोगिल्याशिवाय । अन्य उपाय चालेना ॥८१॥</p>
<p>
	केवळ भोगेंच तयासी क्षय । जन्मजन्मांतरीं हाचि निश्चय । गोगिल्यावीण अन्य उपाय । निवृत्तिदायक नाहींच ॥८२॥</p>
<p>
	तथापि भाग्यें संतदर्शन । हें एक व्याधीचें उपशमन । व्याधिग्रस्त मग व्याधींचें सहन । दु:खेंवीण सहज करी ॥८३॥</p>
<p>
	व्याधी दावी भोग दारुण । संत ठेवी द्दष्टि सकरुण । तेणें भोक्तृत्व दु:खावीण । संत निवारण करितात ॥८४॥</p>
<p>
	केवळ बांबांचा शब्द प्रमाण । तेंचि औषध रामबाण । एकदां कृष्ण श्वान भक्षितां दध्योदन । जाहलें निवारण हिमज्वराचें ॥८५॥</p>
<p>
	कथेंत वाटतील आडकथा । परी या संकलित श्रवण करितां । दिसूनि येईल समर्पकता । स्मरणदाताही साईच ॥८६॥</p>
<p>
	“माझी कथा मीच करीन” । साईच गेले आहेत बोलून । त्यांनींच या कथांची आठवण । दिधली मजलागून ये समयीं ॥८७॥</p>
<p>
	बाळा गणपत नामें एक । जातीचा शिंपी मोठा भाविका । येऊनि मशिदींत बाबांसन्मुख । अति दीनमुख विनवीत ॥८८॥</p>
<p>
	काय ऐसें म्यां केलें पाप । कां हा सोडीना मज हिंवताप । बाबा झाले उपाय अमूप । हलेना तत्राप अंगींचा ॥८९॥</p>
<p>
	तरी आतां मी करूं काय । जाहलीं सर्व औषधें कषाय । आपण तरी सांगा उपाय । कैसेनि जाय हा ताप ॥९०॥</p>
<p>
	तंव दया उपजली अंतरीं । बाबा वदत प्रत्युत्तरीं । उपाय त्या हिमज्वरावरी । ती नवलपरी परिसावी ॥९१॥</p>
<p>
	“दहींभाताचें कांहीं कवळ । लक्ष्मीआईच्या देवळाजवळ । काळ्या कुत्र्यास खाऊं घाल । बरा होशील तात्काळ” ॥९२॥</p>
<p>
	बाळा भीतभीतचि गेला । घरीं जाऊनि पाहूं लागला । झांकूनि ठेविला भात आढळला । दहींही लाधला शेजारीं ॥९३॥</p>
<p>
	बाळा मनीं विचार करी । दहींभात मिळाला तरी । काळाच कुत्रा वेळेवरी । देउळाशेजारीं असेल का ॥९४॥</p>
<p>
	परी ही बाळाची उगीच चिंता । निर्दिष्ट स्थळीं जाऊनि पोहोंचतां । कृष्ण श्वान एक पुच्छ हलवितां । समोर येतां देखिलें ॥९५॥</p>
<p>
	पाहूनि ऐसा हा योग जुळला । बाळास मोठा आनंद जाहला । दहींभात खाऊं घातला । वृत्तांत कळविला बाबांस ॥९६॥</p>
<p>
	सारांश हा जो प्रकार घडला । कोणी कांहींही म्हणो तयाला ॥ तेव्हांपासूनि हिमज्वर गेला । आराम जाहला बाळास ॥९७॥</p>
<p>
	ऐसेच बापूसाहेब बुट्टी । थंडी जाहली होती पोटीं । जुलाब होत पाउठोपाउठीं । उलटीवर उलटी एकसरा ॥९८॥</p>
<p>
	सर्वौषधांनीं कपाट भरलें । परी एकही न लागू पडलें । बापूसाहेब मनीं घाबरलें । बहुत पडले विचारीं ॥९९॥</p>
<p>
	जुलाब उलटया होऊन होऊन । बापूसाहेब जाहले क्षीण । नित्यनेम बाबांचें दर्शन । घावया त्राण नुरलें त्यां ॥१००॥</p>
<p>
	गोष्ट गेली बाबांचे कानीं । आणवूनि बैसविलें सन्मुख त्यांनीं । म्हणाले खबरदार आतांपासुनी । मलविसर्जनीं जातां नये ॥१०१॥</p>
<p>
	वांतीही राहिली पाहिजे ठिकाणीं । तयांसन्मुख हालवूनि तर्जनी । पुनश्च पूर्ववत तयां अनुलक्षुनी । म्हटलें बाबांनीं तैसेंच ॥१०२॥</p>
<p>
	तात्पर्य काय त्या शब्दांचा दरारा । दोन्ही व्याधींनीं घेतला भेदरा । केला पहा तात्काळ पोबारा । जाहला आराम बुट्टींस ॥१०३॥</p>
<p>
	एकदां गांवीं वाख्याचा उद्भव । असतां जाहला तयांस उपद्रव । वांती रेच यांचा समुद्भव । कळमळला जीव तृषाकुल ॥१०४॥</p>
<p>
	पाशींच होते डॉक्टर पिल्ले । तयांनीं उपाय सर्व वेंचले । शेवटीं जेव्हां कांहींच न चले । मग ते गेले बाबांकडे ॥१०५॥</p>
<p>
	होतें जैसें जैसें घडलें । साईचरणीं सर्व निवेदिलें । कॉफी द्यावी कीं पाणी चांगलें । विचरिती पिल्ले बाबांस ॥१०६॥</p>
<p>
	तंव बाबा वदती तयांला । “खा दूध. बदाम, घाला । अक्रोडपिस्त्यांसह तयांला । प्यावयाला द्या तरण” ॥१०७॥</p>
<p>
	तेणें तयाची राहील तहान । होईल सत्वर व्याधिहरण” । सारांश ऐसें हें पाजितां तरण । उपद्रवनिरसन जाहलें ॥१०८॥</p>
<p>
	“खा अक्रोड पिस्ते बदाम” । येणें पटकीसपडावा आराम । शब्दचि बाबांचा विश्वासधाम । शंकेचें काम ना तेथें ॥१०९॥</p>
<p>
	आळंदीचे एक स्वामी । साईसमर्थ - दर्शनकामी । आले एकदां शिरडीग्रामीं । पातले आश्रमीं साईंच्या ॥११०॥</p>
<p>
	होतां तयांस कर्णरोग । तेणें अस्वास्थ्य निद्राभंग । करवितांही शस्त्रप्रयोग । कांहीं न उपयोग तिळमात्र ॥१११॥</p>
<p>
	ठ्णका लागे अनावर । चाले न कांहीं प्रतीकार । निघावयाचा केला विचार । गेले आशीर्वाद मागावया ॥११२॥</p>
<p>
	अभिवंदूनि साईपदां । पावूनियां उदीप्रसादा । स्वामी मागत आशीर्वादा । कृपा सर्वदा असावी ॥११३॥</p>
<p>
	माधवराव देशपांडयांनीं । कानाप्रीत्यर्थ केली विनवणी । “अल्ला अच्छा करेगा” म्हणुनी । महाराजांनीं आश्वासिलें ॥११४॥</p>
<p>
	ऐसा आशीर्वाद लाधुनी । स्वामी परतले पुण्यपट्टणीं । पत्र आले आठां दिसांनीं । ठणका तत्क्षणींच राहिला ॥११५॥</p>
<p>
	सूज मात्र कायम होती । शस्त्रप्रयोग करावा म्हणती । पुन्हां तो प्रयोग करावा ये अर्थीं । आलों मुंबईप्रती मागुता ॥११६॥</p>
<p>
	गेलों पुढील डॉक्टरांकडे । नकले बाबांना पडलें सांकडें । डॉक्टर पाही जों कानाकडे । सूज कोणीकडे लक्षेना ॥११७॥</p>
<p>
	शस्त्रप्रयोग - आवश्यकता । डॉक्टर म्हणे नलगे आतां । स्वामींची हरली दुर्धर चिंता । विस्मय समस्तां वाटला ॥११८॥</p>
<p>
	ऐशीच आणीक एक कथा । ओघास आली जी प्रसंगवशता । ती सांगूनि श्रोतयां आतां । अध्याय आतोपता घेऊं हा ॥११९॥</p>
<p>
	सभामंडपाची फरसी । बांधूं आरंभिली जे दिवसीं । त्यासाघीं आठ दिन महाजनींसी । जाहली मोडसी दुर्धर ॥१२०॥</p>
<p>
	जुलाब होऊं लागले फार । मनींचे मनीं बाबांवर भार । करीनात औषध वा उपचार । अत्यंत बेजार जाहले ॥१२१॥</p>
<p>
	साई पूर्ण अंतर्ज्ञानी । जाण होते महाजनी । म्हणवूनि हें अस्वास्थ्य तयांलागुनी । केलें न त्यांनीं निवेदन ॥१२२॥</p>
<p>
	येईल जेव्हां तयांचे मनीं । करितील निवारण आपण होऊनी । ऐसें पूर्ण विश्वासुनी । व्याधी सोसूनि राहिले ॥१२३॥</p>
<p>
	भोग भोगूं आपण सकळ । परी न पूजेसी पडावा खळ । हीच एक इच्छा प्रबळ । सर्वकाळ काकांस ॥१२४॥</p>
<p>
	जुलाब कितीदां आणि केव्हां । प्रमाणातीत झाले जेव्हां । चुकूं नये आरतिसेवा । म्हणूनि तेव्हां काय करिती ॥१२५॥</p>
<p>
	तांब्या एक पाण्यानें भरला । अंधारांतही लागेल हाताला । ऐसे जागीं मशिदीला । एका बाजूला ठेवीत ॥१२६॥</p>
<p>
	स्वयें बैसत बाबापाशीं । चरणसंवाहन करावयासी । हजर नित्य आरतीसी । नित्यनेमेंसीं चालवीत ॥१२७॥</p>
<p>
	आली जरी पोटांत कळ । तांब्या होताच हाताजवळ । पाहूनि जवळ एकांतस्थळ । होऊनि निर्मळ परतत ॥१२८॥</p>
<p>
	असो फरसी करावयासी । आज्ञा मागतां बाबांपासीं । दिधली पहा ति तात्याबासी । वदत तयांसी काय पहा ॥१२९॥</p>
<p>
	“जातों आम्ही लेंडीवर । लेंडीवरून परत्ल्यावर । करा आरंभ बरोबर । या फरशीचे कार्यास” ॥१३०॥</p>
<p>
	पुढें बाबा परत आले । आसनावरी जाऊनि बैसले । पादसंवाहन सुरू केलें । येऊनि वेळेवर काकांनीं ॥१३१॥</p>
<p>
	कोपरगांवाहून तांगे थडकले । मुंबईकडील भक्त पातले । पूजासंभारसहित चढले । येऊनि अभिवंदिलें बाबांस ॥१३२॥</p>
<p>
	इतर मंडळीसमवेत । अंधेरीचे पाटीलही येत । घेऊनि पूजा - पुष्पाक्षत । वाट पाहत बैसले ॥१३३॥</p>
<p>
	इतक्यांत खालीं पटांगणांत । रथ जेथें ठेवीत असत । कुदळ मारूनि बरोबर तेथ । फरशीची सुरवात जाहली ॥१३४॥</p>
<p>
	ऐकिला तो आवाज मात्र । बाबांनीं ओरड केली विचित्र । धरिला तात्काळ नृसिंहावतार । नेत्रटवकार भयंकर ॥१३५॥</p>
<p>
	कोण मारतो कुदळीचा फटका । करितों तयाला कंबरेंत लटका । बोलत उठलेच घेऊनि सटका । भीतीचा धडका समस्तां ॥१३६॥</p>
<p>
	कुदळ टाकूनि मजूर पळाला । जो तो उठूनि धांवत सुटला । काकांचाही जीव दचकला । तों हातचि धरिला बाबांनीं ॥१३७॥</p>
<p>
	म्हणती जातोस कुठें बैस खालीं । इतक्यांत तात्या लक्ष्मी आलीं । तयांसही शिव्यांची लाखोली । मनसोक्त वाहिली बाबांनीं ॥१३८॥</p>
<p>
	अंगणाबाहेर जी मंडळी । तयांसही शिवीगाळ केली । इतक्यांत भाजल्या भुईमुगांची थैली । ओढूनि घेतली पडलेली ॥१३९॥</p>
<p>
	बाबा असतां त्वेषावेशीं । पळाले जे भीतीनें चौपाशीं । एकाद्याची ती मशिदीसी । पिशवी असेल कीं पडलेली ॥१४०॥</p>
<p>
	दाणे असतील पक्का शेर । मूठमूठ काढूनि बाहेर । चोळूनियां हातावर । मारूनि फुंकर साफ करीत ॥१४१॥</p>
<p>
	मग ते स्वच्छ झालेले दाणे । महाजनींकडून खावविणें । एकीकडेस शिव्याही देणें । एकीकडे चोळणें सुरूच ॥१४२॥</p>
<p>
	खाऊनि घे म्हणत म्हणत । स्वच्छ दाणे हातावर ठेवीत । कांहीं आपणही तोंडांत टाकीत । पिशवी संपवीत ये रीती ॥१४३॥</p>
<p>
	दाणे संपतां म्हणती आण । पाणी लागली मज तहान । काका आणिती झारी भरून । स्वयें तें पिऊन पी म्हणती ॥१४४॥</p>
<p>
	काका पितां तयांस वदती । झाली जा तुझी बंद बृहती । मेले कुठें ते बामण म्हणती । जा तयांप्रती घेऊनि ये ॥१४५॥</p>
<p>
	असो पुढें मंडळी आली । मशीद पूर्वींप्रमाणें भरली । फरशीस पुन: सुरवात झाली । मोडशी थांबली काकांची ॥१४६॥</p>
<p>
	जुलाबावर हें काय औषध । परी औषध तो संतांचा शब्द । देतील तो जो मानी प्रसाद । तया न अगद आणीक ॥१४७॥</p>
<p>
	हरदा शहरचे एक गृहस्थ । पोटशूळ - व्याधिग्रस्त । चवदा वर्षें जाहले त्रस्त । उपाय समस्त जाहले ॥१४८॥</p>
<p>
	नाम तयांचें दत्तोपंत । कर्णोपकर्णीं ऐकिली मात । शिरडींत साई महासंत । दर्शनें हरतात अपाय ॥१४९॥</p>
<p>
	परिसूनियां ऐसी कीर्ति । गमन केलें शिरडीप्रती । चरण साईंचे माथां वंदिती । करुणा भाकिती तयांतें ॥१०५॥</p>
<p>
	बाबा चौदा वर्षें भरलीं । पोटशूळें पिच्छा पुरविली । पुरे आतां परमावधि झाली । शक्ति न उरली भोगावया ॥१५१॥</p>
<p>
	केल अन कोणाचा घातपात । अवमानिलीं न मायतात । नाठवे पूर्वजन्मींची मात । जेणें हे होतात कष्ट मज ॥१५२॥</p>
<p>
	केवळ संतप्रेमावलोकन । संतप्रसाद - आशीर्वचन । येणेंच होय व्याधिनिरसन । नलगे आन कांहींही ॥१५३॥</p>
<p>
	तैसाच अनुभव दत्तोपंतां । बाबांचा कर पडतां माथां । विभूती - आशीर्वाद लाधतां । आराम चित्ता वाटला ॥१५४॥</p>
<p>
	मग महाराजांनीं तयांस । ठेवूनि घेतलें कांहीं दिवस । हळूहळू पोटशूळाचा त्रास । गेला विलयास समूळ ॥१५५॥</p>
<p>
	असो ऐसे हे महानुभाव । काय वानूं मी तयांचा प्रभाव । परोपकृति हा नित्य स्वभाव । जयां सद्भाव चराचरीं ॥१५६॥</p>
<p>
	गाऊं जातां हें शब्दस्तोत्र । एकाहूनि एक विचित्र । आतां पूर्वानुसंधानसूत्र । भीमाजीचरित्र चालवूं ॥१५७॥</p>
<p>
	असो बाबा उदी मागविती । भीमाजीस थोडी देती । थोडी तयाच्या कपाळाला फांसिती । शिरीं ठेविती निजहस्त ॥१५८॥</p>
<p>
	जावया बिर्‍हाडीं आज्ञा झाली । पाटील निघाले पायचालीं । गाडीपर्यंत आपुले पाउलीं । गेले हुशारी वाटली ॥१५९॥</p>
<p>
	तेथूनि निर्दिष्ट जागींच जात । स्थान जरी होतें होतें संकोचित । परी तें बाबांहीं केलें सूचित । हेंच कीं महत्त्व तयाचें ॥१६०॥</p>
<p>
	चोपण्यांनीं नवथर चोपिली । म्हणूनि जमीन होती ओली । तरी बाबांची आज्ञा मानिली । सोई लाविली तेथेंच ॥१६१॥</p>
<p>
	गावांत मिळती जागा सुकी । भीमाजीच्या बहुत ओळखी । परी स्थान जें आलें बाबांचे मुखीं । सोडूनि आणिकीं नव जाणें ॥१६२॥</p>
<p>
	तेथेंच दोन पाथरिले गोण । वरी पसरूनियं अंथरूण । करूनियां स्वस्थ मन । केलें शयन पाटलानें ॥१६३॥</p>
<p>
	तेच रात्रीं ऐसें वर्तलें । भीमाजीस स्वप्न पडलें । बाळपणीचें पंतोजी आले । मांरू लागले तयातें ॥१६४॥</p>
<p>
	हातीं एक वेताची काठी । मारमारोनि फोडिली पाठी । सवाई मुखोद्नत व्हावयासाठीं । केलें बहु कष्टी शिष्यातें ॥१६५॥</p>
<p>
	सवाई तरी होती कैंची । जिज्ञासा प्रबळ श्रोतयांची । म्हणूनि अक्षरें अक्षर तीचि । देतों समूळचि परिसिली जी ॥१६६॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	( सवाई )</p>
<p>
	 </p>
<p>
	“जीस गमे पद अन्य गृहीं जर ठेवियलें जणुं सर्पशिरीं । वाक्य जिचें अति दुर्लभ ज्यापरि दुर्मिळ तें धन लोभिकरीं । कांतसमागम तेंच गमे सुखपर्व नसे जरि वित्त घरीं । शांत मनें निजकांतमतें करि कृत्य ‘सती’ जनिं तीच खरी ॥”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	परी हें शासन कशासाठीं । हे तों कांहींच कळेना गोठी । पंतोजी टाकीना वेताटी । पेटला हट्टीं अनिवार ॥१६७॥</p>
<p>
	लगेच पडलें दुसरें स्वप्न । तें तों याहूनि विलक्षण । कोणी एक गृहस्थ येऊन । छाती दडपून बैसला ॥१६८॥</p>
<p>
	हातीं घेतला वरवंटा । वक्ष:स्थळाचा केला पाटा । प्राण कासावीस आले कंठा । जणुं बैकुंठा निघाले ॥१६९॥</p>
<p>
	स्वप्न सरलें लागला डोळा । तेणें मनास थोडा विरंगुळा । उदयाचला सूर्य आला । जागा झाला पाटील ॥१७०॥</p>
<p>
	हुशारी वाटे अपूर्व मना । समूळ मावळे रोगाची कल्पना । पाटा वरवंटा छडीच्या खुणा । आठव कोणा पहाण्याची ॥१७१॥</p>
<p>
	स्वप्नास जन आभास म्हणती । परी कधीं ये उलट प्रतीति । तेच मुहूर्तीं रोगोच्छित्ति । दु:खनिवृत्ति पाटिला ॥१७२॥</p>
<p>
	पाटील मनीं बहु धाला । कीं वाटे पुनर्जन्म झाला । मग तो हळू हळू निघाला । दर्शनाला बाबांचे ॥१७३॥</p>
<p>
	पाहोनि बाबांचे मुखचंद्रा । पाटिलाचे आनंदसमुद्रा । भरतें दाटलें आनंदमुद्रा । नयनां तंद्रा लागली ॥१७४॥</p>
<p>
	प्रेमाश्रूंचे वाहती लोट । पायांवरी ठेविलें ललाट । वेतशासन ह्रदयस्फोट । परिणाम स्पष्ट सुखकरी ॥१७५॥</p>
<p>
	या उपकारासी उतराई । होईन मी पामर काई । हें तों अशक्य म्हणवूनि पाईं । केवळ डोई ठेवितों ॥१७६॥</p>
<p>
	एणेंच माझी भरपाई । याहूनि अन्य उपाय नाहीं । अचिंत्य अतर्क्य हे नवलाई । बाबा साई आपुली ॥१७७॥</p>
<p>
	असो ऐसे ते पवाडे गात । पाटील महिना राहिले तेथ । पुढें नानांचे उपकार स्मरत । होऊनि कृतार्थ परतले ॥१७८॥</p>
<p>
	ऐसे ते भक्तिश्रद्धान्वित । पाटील आनंदनिर्भरचित्त । साईकृपा कृतज्ञतायुक्त । वरचेवर येत शिरडीस ॥१७९॥</p>
<p>
	दोन हात एक माथा । स्थैर्य श्रद्धा अनन्यता । नलगे दुजें साईनाथा । एक कृतज्ञता ते व्हावी ॥१८०॥</p>
<p>
	होतां कोणी विपद्‌ग्रस्त । सत्यनारायणा नवसित । तयाचें साङ्ग व्रत आचरत । संकटनिर्मुक्त होत्साता ॥१८१॥</p>
<p>
	तैसेंच पाटील सत्य - साईव्रत । तैंपासाव करूं लागत । प्रत्येक गुरुवारीं सदोदित । सुस्नात व्रतस्थ राहुनी ॥१८२॥</p>
<p>
	जन सत्यनारायणकथा । पाटील अर्वाचीन भक्तलीलामृता । दासगणूकृत साईचरिता । सप्रेमता वाचीत ॥१८३॥</p>
<p>
	त्या पंचेचाळीस ग्रंथाध्यायीं । गणूदास भक्तां अनेकां गाई । त्यांतील साईनाथ अध्यायत्रयी । सत्यसाईकथा ती ॥१८४॥</p>
<p>
	व्रतांमाजीं उत्तम व्रत । पाटील ही अध्यायत्रयी वाचीत । पावले सौख्य अपरिमित । स्वस्थचित्त जाहले ॥१८५॥</p>
<p>
	आप्तइष्टबंधूसमेत । पाटील मिळवूनि सोयरे गोत । करीत नेमें सत्य - साईव्रत । आनंदभरित मानसें ॥१८६॥</p>
<p>
	नैवेद्याची तीच सवाई । मंगलोत्सव तैसाचि पाही । तेथें नारायण येथें साई । न्यून नाहीं उभयार्थीं ॥१८७॥</p>
<p>
	पाटिलानें घातला पाठ । गांवांत पडला तोच परिपाठ । या सत्य - साईव्रताचे पाठ । लागोपाठ चालले ॥१८८॥</p>
<p>
	ऐसे हे संत कृपाळ । प्राप्त होतां उदयकाळ । दर्शनें हरिती भवजंजाळ । काळही मागें परतविती ॥१८९॥</p>
<p>
	आतां येथूनि पुढील कथा । वर्णील एकाची संततिचिंता । संतासंतांची एकात्मता । चमत्कारता प्रकटेल ॥१९०॥</p>
<p>
	नांदेड शहरींचा एक रहिवासी । मोठा श्रीमंत जातीचा पारसी । मिळवील बाबांचे आशीर्वादासी । पुत्र पोटासी येईल ॥१९१॥</p>
<p>
	मौलीसाहेब तेथील संत । तयांची खूण बाबा पटवीत । पारसी मग आनंदभरित । गेला परत निजग्रामा ॥१९२॥</p>
<p>
	अति प्रेमळ आहे कथा । श्रोतां परिसिजे स्वस्थचित्ता । कळोनि येईल साईची व्यापकता । तैसीच वत्सलता तयांची ॥१९३॥</p>
<p>
	पंत हेमाड साईंसी शरण । संतां श्रोतयां करितो नमन  । पुढील अध्यायीं हें निरूपण । सादर श्रवण कीजे जी ॥१९४॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । भीमाजीक्षयनिवारणं नाम त्रयोदशोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 23 Apr 2022 15:44:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 23 Apr 2022 16:08:15 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय १२]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter12-122042300053_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथाय नम; ॥
जय जय सद्गुरु साईनाथा । नमितों चरणीं ठेवूनि माथा । निर्विकार अखंडैकस्वरूपता । शरणागता कृपा करीं ॥१॥
सच्चिदानंदा ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 12" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/23/full/1650708771-7403.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra chapter 12" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथाय नम; ॥</p>
<p>
	जय जय सद्गुरु साईनाथा । नमितों चरणीं ठेवूनि माथा । निर्विकार अखंडैकस्वरूपता । शरणागता कृपा करीं ॥१॥</p>
<p>
	सच्चिदानंदा आनंदकंदा । भवदवार्ता - सौख्यनिष्पंदा । अद्वैतबोधें द्वैतछंदा । मंदाच्याही वारिसी ॥२॥</p>
<p>
	अवघ्या ठायीं पूर्ण भरलें । गगन जैसें हें विस्तारलें । तेंचि कीं तव स्वरूप रेखाटलें । अनुभवी भले दैवशाली ॥३॥</p>
<p>
	साधूंचें व्हावें संरक्षण । असाधूंचें समूळ निर्दळण । एतदर्थचि ईश्वरावतरण । संत हे विलक्षण यापरते ॥४॥</p>
<p>
	साधु असाधु संतां समान । एक मोठा एक ऊन । हें जाणेना जयांचें मन । समसमान उभयां जे ॥५॥</p>
<p>
	ईश्वराहूनि संत मोठे । असाधूंसी आधीं लाविती वाटे । मन जयांचें तिळतिळ तुटे । प्रेम दाटे दीनार्थ ॥६॥</p>
<p>
	भवसागराचे हे अगस्ति । अज्ञानतमाचे हे गभस्ति । परमात्म्याची एथेंच वस्ती । वस्तुत: हे तदभिन्न ॥७॥</p>
<p>
	ऐशांतील हा साई माझा । अवतरला भक्तकाजा । मूर्तिमंत ज्ञानराजा । कैवल्यतेजाधिष्ठित ॥८॥</p>
<p>
	जीवमात्रीं अत्यंत ममता । इतरत्र अत्यंत अनासक्तता । ठायीं सत्ता ठायीं विरक्तता । निर्वैर समता सर्वत्र ॥९॥</p>
<p>
	जया न शत्रु - मित्रभाव । सरिसे जया रंकराव । ऐसा जो साई महानुभाव । ऐका प्रभाव तयाचा ॥१०॥</p>
<p>
	संत आपुल्या पुण्यकोडी । वेंचिती भक्तप्रेमाच्या ओढीं । न पाहती आड पर्वत दरडी । घाडिती उडी भक्तार्थ ॥११॥</p>
<p>
	एक अज्ञानी म्हणूनि नेणती । परमार्थ काय काशाशीं खाती । स्त्री - पुत्र - धनकामीं लोलंगती । बिचारीं नेणती तीं सोडा ॥१२॥</p>
<p>
	ऐसीं नेणतीं बाळींभोळीं । देव तयांतें कृपा कुरवाळी । देवासी विमुख देवानिराळीं । अभिमान पोळी तयांतें ॥१३॥</p>
<p>
	अज्ञानियांची येईल कींव । संत एकादा लावील जीव । विश्वास प्रकटेल लाठीव । ज्ञानाची ताठीव निष्फळ ॥१४॥</p>
<p>
	पंडिमंमन्य मूढमती । शुष्काभिमानें उगीच फुगती । भक्तिपंथ अवहेलिती । नको संगती तयांची ॥१५॥</p>
<p>
	नको वर्णसंकर बंड । नको वर्णाभिमान थोतांड । न व्हा वर्णाश्रमधर्मलंड । पाखंडपंडित न व्हावें ॥१६॥</p>
<p>
	वेदवेदांगपारंगत । ज्ञानगर्वें मदोन्मत्त । भक्तिमार्गाचे आड येत । तयांची धडगत दिसेना ॥१७॥</p>
<p>
	अज्ञानी विश्वास - पडिपाडें । तरेल तो भवभय - सांकडें । परी या शास्त्रपंडितांचें कोडें । कदा नुलगडे कवणातें ॥१८॥</p>
<p>
	संतांपाय़ीं ठेवतां विश्वास । अज्ञानियां अज्ञाननिरास । ज्ञानाभिमानियां न विकल्प सायास । उपजेल तयांस सद्भाव ॥१९॥</p>
<p>
	असो एकदां सुदैव - परिपाटी । कैसी घडली विचित्र गोष्ट । होती एका कर्मठाचे ललाटीं । अलभ्य भेटी साईंची ॥२०॥</p>
<p>
	तयाचा संकल्प होता वेगळा । योगायोग होता निराळा । तेणेंचि शिरडीचा लाभ घडला । द्दष्टीस पडला निजगुरु ॥२१॥</p>
<p>
	तें अति सुरस कथानक । जें गुरुमाहात्म्यप्रकाशक । श्रवण करा जी आवश्यक । प्रेमनिदर्शक गुरुभक्तां ॥२२॥</p>
<p>
	नाशिक - क्षेत्रस्थ कर्मठ सोंवळे । अग्निहोत्री उपनास ‘मुळे’ । पूर्वपुण्याईच्या बळें । शिरडीस आले एकदां ॥२३॥</p>
<p>
	गांठीं नसतां हें बळ । शिरडीस कोणीही ठरेना पळ । कोणाचा कितीही निश्चय प्रबळ । न चले चळवळ बाबांपुढें ॥२४॥</p>
<p>
	कोणी म्हणेल मी जाईन । मन माने तों तेथें राहीन । नाहीं तयाच्या हें आधीन । पराधीन तो सर्वखी ॥२५॥</p>
<p>
	ऐसें मी मी म्हणतां । थकले कित्येक निश्चय करितां । साई एक स्वतंत्र देवात । गळे अहंता इतरांची ॥२६॥</p>
<p>
	आपुली पाळी आलियावीण । बाबांसी होईना आपुलें स्मरण । कानीं न येई तद्गुणवर्णन । दर्शन - स्फुरण कोठून ॥२७॥</p>
<p>
	जावें साईसमर्थ - दर्शना । असतां कित्येकांची कामना । योगचि आला नाहीं त्यांना । साई - निर्वाणापर्यंत ॥२८॥</p>
<p>
	पुढें जाऊं जाऊं म्हणतां । आड येऊनि दीर्घसूत्रता । राहिले कित्येक येतां येतां । बाबाही निधनता पावले ॥२९॥</p>
<p>
	आज उद्यां करीत राहिले । अखेर प्रत्यक्ष भेटीस अंतरले । ऐसे पश्चात्ताप पावले । अंतीं नागवले दर्शना ॥३०॥</p>
<p>
	ऐसियांची जी राहिली भूक । परिसतां कथा या आदरपूर्वक । पुरवील दुधाची तहान ताक । विश्वास एक ठेवितां ॥३१॥</p>
<p>
	बरें जें भाग्यें कोणी गेले । दर्शन - स्पर्शनें चित्तीं धाले । ते काय तेथें यथेच्छ राहिले । बाबांनीं ठेविलें पाहिजे ॥३२॥</p>
<p>
	आपुल्यापायीं कोणा न जाववे । राहूं म्हणतां कोणा न राहवे । आज्ञा होई तोंच वसावें । माघारा जावें जा म्हणतां ॥३३॥</p>
<p>
	एकदां काका महाजनी । शिरडीस गेले मुंबईहुनी । एक आठवडा शिरडीस राहुनी । परतावें मनीं तयांचे ॥३४॥</p>
<p>
	चावडी सुंदर शृंगारीत । बाबांसमोर पाळणा टांगीर । कृष्णजन्माचा उत्सव करीत । आनंदें नाचत भक्तजन ॥३५॥</p>
<p>
	गोकुळाष्टमीचाही सोहळा । आनंदानें पहावा डोळाम । साधूनि ऐसी मौजेची वेळा । काका शिर्डीला पातले ॥३६॥</p>
<p>
	आरंभींच बाबांच्या दर्शना । जातां बाबा पुसती तयांना । “परतणार केव्हां निजसदना” । विस्मित मना तैं काका ॥३७॥</p>
<p>
	भेटतांक्षणींच हा कां प्रश्न । काका जाहले विस्मयापन्न । राहूं शिरडींत आठ दिन । होतें कीं मन तयांचें ॥३८॥</p>
<p>
	बाबाचि जेव्हां स्वयें पुसती । उत्तर देणें काकांप्रती । तेंही वाटे बाबाचि सुचाविती । म्हणूनि देती योग्य तें ॥३९॥</p>
<p>
	“बाबा जेव्हां देतील आज्ञा । परतेन तेव्हां आपुले सदना’ । प्रत्युतर येतांचि काकांच्या वदना । ‘उदयीक जा ना’ म्हणाले ॥४०॥</p>
<p>
	आज्ञा केली शिरसा । प्रमाण । करूनि बाबांसी अभिवंदन । असतां अष्टमीसारखा सण । केलें प्रयाण तेच दिनीं ॥४१॥</p>
<p>
	पुढें जंव ते गांवीं येती । पेढीवरती जाऊनि पाहती । मालक मार्गप्रतीक्षाच करिती । काका परतती केव्हां ही ॥४२॥</p>
<p>
	मुनीस एकाएकीं आजारी । मालकास काकांची जरूरी । काकांनीं त्वरित यावें माघारीं । पत्र शिरडीवरी मोकलिलें ॥४३॥</p>
<p>
	काका तेथूनि निघाल्यावरी । टपालवाला तपास करी । मग तें पत्र पाठवी माघारी । मिळालें घरीं काकांस ॥४४॥</p>
<p>
	तेंचि पहा कीं याचे उलट । श्रवण करा ही अल्प गोष्त । भक्तांसी न कळे निजाभीष्ट । साई तें स्पष्ट जाणतसे ॥४५॥</p>
<p>
	एकदां नाशिदकचे प्रख्यात वकील । नामें भाऊसाहेब धुमाळ । बाबांचे एक भक्त प्रेमळ । आले केवळ दर्शना ॥४६॥</p>
<p>
	उभ्या उभ्या घ्यावें दर्शन । करूनियां पायीं नमन । घेऊनि उदी आशीर्वचन । जावें परतोन हें पोटीं ॥४७॥</p>
<p>
	परततां वाटेवर निफाडास । उतरणें होतें धुमाळांस । तेथें एका मुकदम्यास । जाणें तयांस आवश्यक ॥४८॥</p>
<p>
	हा जरी तयांचा बेत । बाबा जाणत उचितनुचित । परत जावया आज्ञा मागत । बाबा न देत ती त्यांना ॥४९॥</p>
<p>
	आठवडा एक ठेवूनि घेतलें । आज्ञा देण्याचें स्पष्ट नाकारिलें । सुनावणीचें कार्य लांबलें । तैसेचि गेले तीन वार ॥५०॥</p>
<p>
	आठवडयावरही कांहीं दिवस । ठेवूनि घेतलें धुमाळांस । इकडे मुकदम्याचे तारखेस । न्यायाधीशास अस्वस्थता ॥५१॥</p>
<p>
	जन्मांत कधींही नाहीं ठावा । ऐसा पोटशूळ दुर्धर उठावा । मुकदमा अपाप पुढें ढकलावा । काळ लागावा । काळ लागावा सार्थकीं ॥५२॥</p>
<p>
	असो धुमाळांस साईसहवास । पक्षकाराचा चिंतानिरास । घडून आलें अप्रयास । ठेवितां विश्वास साईंवर ॥५३॥</p>
<p>
	पुढें मग योग्य कालीं । धुमाळांतें आज्ञा दिधली । कार्यें सर्व यथास्थित झालीं । अघटित केलि साईंची ॥५४॥</p>
<p>
	मुकदमा चालला चार मास । जाहले चार न्यायाधीश । परी अखेरीस आलें यश । आरोपी निर्दोष सूटला ॥५५॥</p>
<p>
	एकदां एक भक्तप्रवर । नानासाहेब निमोणकर । कैसा तयांच्या पत्नीचा कैवार । घेतला तो प्रकार परिसावा ॥५६॥</p>
<p>
	निमोण गांवींचें वतनदार । न्यायाधीशाचा कारभार । सोंपवी जया सरकार । वजनदार हे मोठे ॥५७॥</p>
<p>
	माधवरावांचे पितृव्य ज्येष्ठ । वयोवृद्ध पूज्य श्रेष्ठा । जायाही मोठी एकनिष्ठ । साईच इष्ट दैवत ज्यां ॥५८॥</p>
<p>
	सोडूनियां वतनी गांव । शिरडींत दोघांहीं दिधला ठाव । साईचरणीं ठेवूनि भाव । सुखस्वभाव वर्तती ॥५९॥</p>
<p>
	उठूनियां ब्राम्हामुहूर्तीं । प्रात:स्नान पूजन सारिती । कराया नित्य कांकडआरती । चावडीप्रती तीं येत ॥६०॥</p>
<p>
	पुढें आपुलीं स्तोत्रें म्हणत । नाना बाबांपाशींच राहात । होई सूर्यास्त तोंपर्यंत । सेवेंत निरत बाबांच्या ॥६१॥</p>
<p>
	लेंडीवरी बाबांस नेत । मशिदींत आणूनि घालीत । पडेल ती ती सेवा करीत । प्रेमभरित मानसें ॥६२॥</p>
<p>
	बाईनेंही आपुल्यापरी । करवेल ती बाबांची चाकरी । करावी अतिप्रेमभरीं । दिवसभरी तेथेंच ॥६३॥</p>
<p>
	मात्र कराया स्नान पान । स्वयंपाक जेवणखाण । अथवा रात्रीं कराया शयन । निजस्थान सेवावें ॥६४॥</p>
<p>
	बाकी अवशेष सर्वकाळ । द्पार तिपार सांज सकाळ । घालवी हें दंपत्य प्रेमळ  राहूनि जवळ बाबांच्या ॥६५॥</p>
<p>
	असो या दोघांची सेवा वर्णितां । होईल बहू ग्रंथविस्तरता । म्हणूनि प्रस्तुत विषयापुरता । भाग मी आतां ऐकवितों ॥६६॥</p>
<p>
	बाईसी जाणें बेलापुरीं । मुलगा तेथें थोडा आजारी । केली पतीच्या विचारीं । तेथें तयारी जाण्याची ॥६७॥</p>
<p>
	पुढें नित्य क्रमानुसार । बाबांचाही घेतला विचार । पडतांचि बाबांचा होकार । घातला कानावर पतीच्या ॥६८॥</p>
<p>
	असो ऐसें निश्चितपणें । ठरलें बेलापुरचें जाणें । पुढें पडलें नानांचें म्हणणें । उद्याच परतणें माघारां ॥६९॥</p>
<p>
	नानांसी होतें कांहीं कारण । म्हणूनि म्हणती तिजलागून । जा परी ये परतोन । दुश्चितमन कुटुंब ॥७०॥</p>
<p>
	दुसरे दिवशीम पोळ्याची अंवस । तोही तेथेंचि काढावा दिवस । होती बाईच्या मनाची हौस ॥ येईना मनास नानांच्या ॥७१॥</p>
<p>
	शिवाय अमावास्येचा दिन । अनुक्त करया गमनागमन । बाईस पडलें कोडें गहन । कैसी सोडवण होईल ॥७२॥</p>
<p>
	बेलापुरास गेल्यावीण । वाटे न तिजला समाधान । दुखवितां न ये पतीचें मन । आज्ञोल्लंघन मग कैंचें ॥७३॥</p>
<p>
	असो मग केली तयारी । निघाली जावया बेलापुरीं । लेंडीस निघाली बाबांची स्वारी । नमस्कारी तयांतें ॥७४॥</p>
<p>
	कोणीही बाहेरगांवीं जातां । पावावया निर्विन्घता । देवापुढें खालवी माथा । तीच कीं प्रथा शिरडींत ॥७५॥</p>
<p>
	परी तेथींचा देव साई । जावयाची कितीही घाई । निघावयाचे समयीं डोई । तयांचे पायीं ठेवीत ॥७६॥</p>
<p>
	या तेथील क्रमानुसार । साठयांचिया वाडयासमोर । बाबा उभे असतां क्षणभर । बाईनें चरण वंदिले ॥७७॥</p>
<p>
	नानासाहेब निमोणकर । आदिकरूनि सान थोर । येऊनि तेथें दर्शनतप्तर । करिती नमस्कार बाबांना ॥७८॥</p>
<p>
	ऐसिया समस्त मंडळीदेखता । विशेषत: नानांचिया समक्षता । बाबा जें वदले बाईस तत्त्वतां । पहावी समयोचितता तयांची ॥७९॥</p>
<p>
	पायीं ठेवूनियां माथा । निघावयाची आज्ञा मागतां । “जा बरें लवकर जा आतां । स्वस्थ चित्ता असावें ॥८०॥</p>
<p>
	गेल्यासारखे चार दिवस । सुखी राहीं बेलापुरास । विचारूनियां सर्वत्रांस । माघारी शिर्डीस येईं तूं” ॥८१॥</p>
<p>
	असो बाबांचें वचन । बाईस अकल्पित शांतवन । निमोणकरांसी पटली खूण । सामाधान उभयतां ॥८२॥</p>
<p>
	सारांश आपण करावे बेत । आम्हां न जाणवे आदिअंत । हिताहित जाणती संत । कांहींन अविदित तयांतें ॥८३॥</p>
<p>
	भूत - भविष्य - वर्तमान । करतलामलकवत्‌ तयां ज्ञान । करितां तयांच्या आज्ञेंत वर्तन । सुखसंपन्न भक्त होती ॥८४॥</p>
<p>
	असो आतां पूर्वानुसंधान । चालवूं मुख्य कथानिरूपण । कैसी मुळ्यांवरी कृपा करून । दिधलें दर्शन गुरूचें ॥८५॥</p>
<p>
	श्रीमंत बापूसाहेब बुट्टी । हेतु घ्यावी तयांची भेटी । परतोनि जावें उठाउठी । मुळ्यांच्या पोटीं हें होतें ॥८६॥</p>
<p>
	असो हा जरी त्यांचा हेत । बाबांचा त्यांत अन्य संकेत । तो चमत्कार तें इंगित । सावचित्त परिसावें ॥८७॥</p>
<p>
	श्रीमंतांची भेट झाली । मंडळी मशिदीलागीं निघाली । मुळ्य़ांनाही इच्छा उदेली । निघाले मंडळीसमवेत ॥८८॥</p>
<p>
	मुळे षट्शास्त्रीं अध्ययन । ज्योतिर्विद्येंत अतिप्रवीण । सामुद्रिकांतही तैसेचि पूर्ण । रमले दर्शन होतांच ॥८९॥</p>
<p>
	पेढे बतासे बर्फी नारळ । नारिंगादि फळफळावळ । अमूप अर्पिती जन प्रांजळ । भक्त प्रेमळ बाबांस ॥९०॥</p>
<p>
	शिवाय तेथें येती माळिणी । जांब केळीं ऊंस घेऊनी । बाबा खरीदिती आलिया मनीं । पैसे देऊनी पदरचे ॥९१॥</p>
<p>
	पल्लवचा पैका खर्च करीत । आंब्याच्या पाटया खरेदीत । केळींही उमाप आणवीत । वांटीत मनसोक्त भक्तांना ॥९२॥</p>
<p>
	एकेक आंबा घेऊनि करीं । धरूनि दोन्ही तळहस्ताभ्यंतरीं । चोळूनि मऊ झालियावरी  भक्तांकरीं मग देत ॥९३॥</p>
<p>
	आंबा लावितां ओठीं । रस एकदांच उतरावा पोटीं । जैसी भरली रसाची वाटी । साल बाठी फेंकावी ॥९४॥</p>
<p>
	केळ्यांची तो अपूर्व शैली । भक्तांनीं घ्यावी गर्भनव्हाळी । बाबांनीं सेवाव्यात तयांच्या साली । काय त्या केली अद्भुत ॥९५॥</p>
<p>
	हीं सर्व फळें आपुले हातीं । बाबा तेथें अवघ्यांसी वांटिती । कोकालीं आलिया चित्तीं । स्वयें चाखिती एकादें ॥९६॥</p>
<p>
	या क्रमाचिया परिपाटीं । केवळ भक्तजनांचियासाठीं । खरीदूनि केळियांची पाटी । बाबा वांटीत होते तैं ॥९७॥</p>
<p>
	शास्त्रीबुवांस आश्चर्य गहन । जाहलें देखूनि बाबांचे चरण । ध्वज - वज्रांकुश - रेखा - निरीक्षण । करावें मन जाहलें ॥९८॥</p>
<p>
	भक्त काकासाहेब दीक्षित । होते तेव्हां निकटस्थित । उचलूनि चार रंभाफळें देत । बाबांचे हातांत तेधवां ॥९९॥</p>
<p>
	कोणीं बाबांस बहु विनविलें । बाबा हे क्षेत्रस्थ शास्त्री मुळे । पातले चरणीं पुण्यबळें । प्रसाद - फळें द्या कीं यां ॥१००॥</p>
<p>
	विनवा कोणी वा न विनवा । बाबांचे आलियावीण जीवा । कोणातें कांहीं न देती ते केव्हां । करिती तेव्हां काय ते ॥१०१॥</p>
<p>
	केळीं न, मुळे हात मागती । तदर्थ पुढें हात पसरिती । बाबा न तिकडे चित्त देती । प्रसाद वांटिती सकळिकां ॥१०२॥</p>
<p>
	मुळे बाबांस करिती विनंती । फळें नको हात द्या मागती । पाहूं येतेंसामुद्रिक वदती । बाबा न देती त्यां हात ॥१०३॥</p>
<p>
	तरीही मुळे पुढें सरकत । सामुद्रिकार्थ हात लांबवीत । बाबा न तिकडे ढुंकून पहात । जणूं नाहींत गांवींचे त्या ॥१०४॥</p>
<p>
	पसरिल्या मुळ्यांचे हातीं । बाबा तीं चार केळीं ठेविती । बसा म्हणती परी न देती । मुळ्यांचे हातीं निजहस्त ॥१०५॥</p>
<p>
	आजन्म ईश्वरार्थ झिजविला काय । तयसी सामुद्रिकीं कर्तव्य काय । अवाप्तसकळकाम साईराय । सद्भक्तां मायबाप जो ॥१०६॥</p>
<p>
	पाहूनि बाबांची नि:स्पृह स्थिति । सामुद्रिकार्थ उदासीनवृत्ति । शास्त्रीबुवा हस्त आवरिती । नाद टाकिती बाबांचा ॥१०७॥</p>
<p>
	कांहीं वेळ स्वस्थ बैसले । मंडळीसमवेत वाडयांत गेले । स्नान केलें सोवळें ल्याले । आरंभूं सरले अग्निहोत्र ॥१०८॥</p>
<p>
	इकडे नित्यक्रमानुसार । बाबा निघाले लेंडीवर । म्हणती गेरू घ्या रे बरोबर । भगवें अंबर परिधानूं ॥१०९॥</p>
<p>
	सर्वांस वाटला चमत्कार । गेरूचें बाबा काय करणार । जो तो करूं लागे विचार । गेरू स्मरला आज कां ॥११०॥</p>
<p>
	बाबांची ऐसीच संदिग्ध वाणी । काय अर्थ जाणावा कोणीं । परी आदरें सांठविल्या श्रवणीं । अर्थश्रेणी वोगरिती ॥१११॥</p>
<p>
	कीं ते संतांचे बोल । कधींही जे नसणार फोल । अर्थभरित सदा सखोल । करवेल मोल कवणातें ॥११२॥</p>
<p>
	आधीं विचार मग उच्चार । हा तों नित्याचा व्यवहार । उच्चारामागें आचार । संत साचार आदरिती ॥११३॥</p>
<p>
	या सर्वमान्य सिद्धांतानुसार । संतवचन कधीं न नि:सार । घ्यानीं धरूनि पडताळितां फार । पडे वेळेवर उकल त्या ॥११४॥</p>
<p>
	असो इकडे बाबा परतले । निशाणी शिंग वाजूं लागलें । बापूसाहेबवांचे सोवळेपणाला । प्रसंग वाटला अवघड तो ॥११६॥</p>
<p>
	वदती मग प्रत्युत्तरीं । घेऊं दर्शन तिसरे प्रहरीं । लागले जोग मग ते अवसरीं । करुं तयारी आरतीची ॥११७॥</p>
<p>
	इकडे बाबा परत येवोनी । बैसले बोलत जों निजासनीं । तों सर्वांच्या पूजा होऊनी । आरती स्थानीं थाटली ॥११८॥</p>
<p>
	इतुक्यांत बाबा म्हणती आणा । त्या नव्या बामणाकडून दक्षिणा । बापूसाहेब बुट्टीच तत्क्षणां । गेले दक्षिणा मागावया ॥११९॥</p>
<p>
	नुकतेच मुळे करूनि स्नान । सोवळें वस्त्र करूनि परिधान । बैसले होते घालूनि आसन । स्वस्थ मन करूनियां ॥१२०॥</p>
<p>
	निरोप परिसतां ते अवसरीं । विक्षेप दाटला मुळ्यांचे अंतरीं । दक्षिणा किमर्थ म्यां द्यावी तरी । मी अग्निहोत्री निर्मळ ॥१२१॥</p>
<p>
	असतील बाबा मोठे संत । परी मी काय तयांचा अंकित । मजपाशीं कां दक्षिणा मागत । जाहलें दुश्चित्त मन तेणें ॥१२२॥</p>
<p>
	साईंसारिखे दक्षिणा याचिती । कोटयधीश निरोप आणिती । मूळे जरी मनीं शंकती । दक्षिणा घेती समवेत ॥१२३॥</p>
<p>
	आणीक संशय तयांचे मनीं । आरब्धकर्म अपूर्ण टाकुनी । जावें केवीं मशिदीलागुनी । नाहीं म्हनूनही म्हणवेना ॥१२४॥</p>
<p>
	संशयात्म्यास नाहीं निश्चिती । सदा दोलायमान चित्तीं । तयां न ही ना ती गती । त्रिशंकु स्थिति तयांची ॥१२५॥</p>
<p>
	तथापि मग केला विचार । जावयाचा केला निर्धार । गेले सभामंडपाभीतर । राहिले दूर ते उभे ॥१२६॥</p>
<p>
	आपण सोवळे मशीद ओवळी । जावें कैसें बाबांजवळी । लांब राहूनि बद्धांजळी । पुष्पांजळी फेंकिती ॥१२७॥</p>
<p>
	इतुक्यांत ऐसा चमत्कार । झाला तयांचे द्दष्टीसमोर् । बाबा अद्दश्य गादीवर । घोलप गुरुवर दिसले तैं ॥१२८॥</p>
<p>
	इतरांस नित्याचे साईसमर्थ । मुळ्यांचे डोळां घोलपनाथ । ते जरी पूर्वींच ब्रम्हीभूत । आश्चर्यचकित बहु मुळे ॥१२९॥</p>
<p>
	गुरु जरी वस्तुत: समाधिस्थ  । तेही जैं द्दष्टिगोचर भासत । तेणें मुळे अति विस्मित । तैसेचि साशंकित मानसीं ॥१३०॥</p>
<p>
	स्वप्न म्हणावें नाहीं निजेला । जागृति तंब गुरु कैसा ठेला । संभ्रम केउता जीवीं उठला । बोल खुंटला क्षणभरी ॥१३१॥</p>
<p>
	आपुला आपण घेई चिमटा । म्हणे नव्हे हा प्रकार खोटा । किमर्थ मना हा संशय फुकटा । सर्वांसकटा मी येथें ॥१३२॥</p>
<p>
	मुळे मूळचे घोलपभक्त । बाबांविषयीं जरी शंकित । परी झाले पुढें अंकित । अकलंकित मानसें ॥१३३॥</p>
<p>
	स्वयें वर्णाग्रज ब्राम्हाण । वेदवेदांगशास्त्रसंपन्न । मशिदींत घोलपदर्शन । विस्मयापन्न जाहले ॥१३४॥</p>
<p>
	मग वरती गेले चढोन । निजगुरूचे चरण वंदून । उभे राहिले कर जोडून । वाचेसी मौन पडियेलें ॥१३५॥</p>
<p>
	भगवीं वस्त्रें भगवी छाटी । घोलपस्वामी देखोनि द्दष्टी । धांवोनि पायीं घातली मिठी । उठाउठीं मुळ्य़ांनीं ॥१३६॥</p>
<p>
	तुटला उच्चवर्णाभिमान । पडलें डोळियांमाजीं अंजन । भेटतां निजगुरु निरंजन । निधानसंपन्न ते झाले ॥१३७॥</p>
<p>
	हरपली विकल्पवृत्ति । जडली बाबांबरी प्रीति । अर्धोन्मीलित नेत्रपातीं । टक लाविती साईपदीं ॥१३८॥</p>
<p>
	अनंत जन्मींचें सुकृत फळलें । द्दष्टी पडलीं साईंचीं पाउलें । चरणतीर्थीं स्नान घडलें । दैव उघडलें वाटलें ॥१३९॥</p>
<p>
	आश्चर्य केलें सकळिकीं । हें काय घडलें एकाएकीं । जाऊनि फुलांची फेंकाफेंकी । पायीं डोकी ठेविती कां ॥१४०॥</p>
<p>
	इतर म्हणती बाबांची आरती । मुळे घोलप नामें गर्जती । उंचस्वरें त्यांचीच आरती गाती । रंगीं रंगती सप्रेम ॥१४१॥</p>
<p>
	सोवळ्याची सांडिली स्फीती । स्पर्शास्पर्शाची विराली स्फूर्ती । साष्टांग दंडायमान होती । डोळे मिटती आनंदें ॥१४२॥</p>
<p>
	उठल्यावरी डोळे उघडितां । घोलप - स्वामींसी अद्दश्यता । त्यांचे स्थानीं साई समर्था । दक्षिणा मागतां देखिलें ॥१४३॥</p>
<p>
	पाहोनि बाबांची आनंददमूर्ति । आणि तयांची ती अतर्क्यशक्ति । तटस्थ झाली चित्तवृत्ति । मुळे निजस्थिति विसरले ॥१४४॥</p>
<p>
	ऐसें हें महाराजांचें कौतुक । देखतां हरली तहान भूक । जाहलें निजगुरु - दर्शनसुख । परम हरिख मुळ्यांना ॥१४५॥</p>
<p>
	जाहलें मानसीं समाधान । घातलें बाबांसी लोटांगण । आनंदाश्रूंस भरतें येऊन । मस्तकीं चरण वंदिले ॥१४६॥</p>
<p>
	दक्षिणा काय होती ती दिधली । पुनश्च डोई चरणीं ठेविलीं । नयनीं प्रेमाचीं आसुवें आलीं । तनु झाली रोमांचित ॥१४७॥</p>
<p>
	सद्नादित कंठ झाला । अष्टभाव मनीं दाटला । म्हणती मनींचा संशय फिटला । वरी भेटला निजगुरु ॥१४८॥</p>
<p>
	पाहोनि बाबांची अलौकिक लीला । मुळ्यांसह सर्व जन गहिंवरला । गेरूचा अर्थ विशद झाला । अनुभव आला तेधवां ॥१४९॥</p>
<p>
	हेचि महाराज हेचि मुळे । आश्चर्य कैसें येचि वेळे । कोण जाणे महाराजांचे कळे । अगाध लीळे तयांचे ॥१५०॥</p>
<p>
	ऐसेचि एक मामलतदार । धरूनि साईदर्शनीं आदर । सवें घेऊनि मित्र डॉक्टर । निघाले शिरडीस यावया ॥१५१॥</p>
<p>
	डॉक्टर ज्ञातीनें ब्राम्हाण । रामोपासक आचारवान । स्नानसंध्या - विहिताचरण । नेमनिर्बंधनीं आवड ॥१५२॥</p>
<p>
	साईबाबा मुसलमान । आपुलें आराध्य जानकीजीवन । आधींच स्नेह्यासी ठेविलें सांगून । नाहीं मी नमन करणार ॥१५३॥</p>
<p>
	मुसलमानाच्या पायीं नमन । करावया हें घेईना मन । म्हणूनि शिरडीस करावया गमन । प्रथमपासून शंकित मी ॥१५४॥</p>
<p>
	“पायां पडा” हा कोणीही आग्रह । धरणार नाहीं ऐसा दुराग्रह । करूनि घेऊं नका हा ग्रह । करा हा निग्रह मनाचा ॥१५५॥</p>
<p>
	“करावा मातें नमस्कार” । बाबाही न कधीं वदणर । आश्वासितां हें मामलतदार । प्रकटला आदर गमनार्थीं ॥१५६॥</p>
<p>
	ऐसा द्दढनिश्चय करून । मानूनि आपुले मित्राचें वचन । विकल्प अवघा दूर सारून । निघाले दर्शन घ्यावया ॥१५७॥</p>
<p>
	परी आश्चर्य जैं शिरडीस आले । दर्शनार्थ मशिदींत गेले । आंरभीं त्यांनींच लोटांगण घातलें । विस्मित झाले बहु स्नेही ॥१५८॥</p>
<p>
	तंव ते पुसती तयांतें । कैसे विसरलां कृतनिश्चयातें । आम्हांआधींच लोटांगणातें । मुसलमानातें घातलें कैसें ॥१५९॥</p>
<p>
	मग ते डॉक्टर कथिती नवल । रामरूप म्यां देखिलें श्यामल । तें मीं तात्काळ वंदिलें निर्मल । सुंदर कोमल साजिरें ॥१६०॥</p>
<p>
	तेंचि पहा हें आसनस्थित । तेंचि हें सर्वांसवें बोलत । म्हणतां म्हणतां क्षणार्धांत । दिदूं लागत साईरूप ॥१६१॥</p>
<p>
	तेणें डॉक्टर विस्मयापन्न । म्हणावें तरी हें काय स्वप्न । म्हणे हे कैंचे मुसलमान । योगसंपन्न अवतारी ॥१६२॥</p>
<p>
	चोखामेळा जातीचा महार । रोहिदास हा तों चांभार । सजन कसाई हिंसा करणार । जातीचा विचार काय यांच्या ॥१६३॥</p>
<p>
	केवळ जगाचिया उपकारा । चुकवावया जन्ममरणांचा फेरा । त्यागूनि निर्गुणा  निराकारा । आले हे आकारा संत जगीं ॥१६४॥</p>
<p>
	हा तों प्रत्यक्ष कल्पद्रुम । क्षणांत साई क्षणांत राम । माझा दंडिला अहंभ्रम । दंडप्रणाम करवूनि ॥१६५॥</p>
<p>
	दुसरे दिवशीं घेतलें व्रत । कृपा न करितां साईनाथ । पाऊल न ठेवणें मशिदींत । बैसले उपोषित शिरडींत ॥१६६॥</p>
<p>
	ऐसे क्रमिले दिवस तीन । पुढें उगवतां चौथा दिन । काय घडलें वर्तमान । दत्तावधान परिसा तें ॥१६७॥</p>
<p>
	वास्तव्य ज्याचें खानदेशांत । ऐसा एक अकस्मात । स्नेही तयांचा पातला तेथ । दर्शनार्थ साईंच्या ॥१६८॥</p>
<p>
	नऊ वर्षांनीं जाहली भेटी । परमानंद माईना पोटीं । डॉक्टरही गेले उठाउठी । तयाचे पाठीं मशिदीस ॥१६९॥</p>
<p>
	जातांचि घातला नमस्कार । बाबा पुसती कां डॉक्टर । कोणी आला का बोलाविणार । आलासी कां उत्तर देईं मज ॥१७०॥</p>
<p>
	ऐकूनि ऐसा वर्मी प्रश्न । डॉक्टर गेले विरघळून । जाहलें कृतनिश्चयाचें स्मरण । अनुतापखिन्न अंतरीं ॥१७१॥</p>
<p>
	परी ते दिवशीं मध्यरात्रीं । कृपा जाहली तयांवरी । परमानंदस्थितीची  माधुरी । निद्रेमाझारी चाखिली ॥१७२॥</p>
<p>
	पुढें डॉक्टर स्वग्रामा परतती । तरी ती संपूर्णस्वानंदस्थिति । संपूर्ण पंधरा दिन अनुभविती । वाढली भक्ति साईपदीं ॥१७३॥</p>
<p>
	ऐसेचि साइंचे अनेक अनुभव । सांगूं येतील एकेल अभिनव । वाढेल बहुत ग्रंथगौरव । विस्तरभयास्तव आवरितों ॥१७४॥</p>
<p>
	आरंभींची मुळ्यांची कथा । परिसतां विस्मय श्रोतियां चित्ता । परी येथील तात्पर्यार्थता । तैसीच बोधकता आकळिजे ॥१७५॥</p>
<p>
	जो जो जयाचा गुरु असावा । त्याचेचि ठायीं द्दढ विश्वास बसावा । अन्यत्र कोठेंही तो नसावा । मनीं ठसावा गुह्यार्थ हा ॥१७६॥</p>
<p>
	याहूनि अन्य कांहीं हेतु । दिसेना या बाबांचे लीलेआंतु । कोणी कसाही विचारवंतु । असो परंतु अर्थ हाचि ॥१७७॥</p>
<p>
	कोणाची कीर्ति कितीही असो । आपुले गुरूची मुळींही नसो । परी स्वगुरु-ठायींच विश्वास वसो । हाचि उपदेशो येथिला ॥१७८॥</p>
<p>
	पोथी पुराण धुंडूं जातां । हाचि उपदेश भरला तत्त्वतां । परी ऐसी खूणगांठ न पटतां । निष्ठा वठतां वठेना ॥१७९॥</p>
<p>
	नसोनि आत्मनिश्चय वरिष्ठ । मिरविती आपण आत्मनिष्ठा । त्यांच्या जन्माचे अवघे कष्ट । दिसती स्पष्ट ठायीं ठायीं ॥१८०॥</p>
<p>
	‘इदं च नास्ति परं च ना’ । आजन्म सदैव विवंचना । स्थैर्य लाभेना क्षणैक मना । मुक्ताच्या वल्गना करिताती ॥१८१॥</p>
<p>
	असो पुढील अध्यायाची गोडी । याहूनि आढळेल चोखडी । केवळ साईदर्शनपरवडी । आनंदनिरवडी भोगवी ॥१८२॥</p>
<p>
	भक्त भीमाजी पाटील ऐसा । क्षयरोग तयाचा घालविला कैसा । भक्त चांदोरकरांचा भरंवसा । द्दष्टांतासरिसा पटविला ॥१८३॥</p>
<p>
	ऐसा केवळ दर्शनप्रताप । ऐहिकांचें लावी माप । आमुष्मिकही देई उमाप । दर्शनें निष्पाप करी जो ॥१८४॥</p>
<p>
	करी जैं योगियाचा द्दष्टिपात । नास्तिकांसही पापनिर्मुक्त । आस्तिकांची तैं काय मात । पापपरिच्युत सहजेंचि ॥१८५॥</p>
<p>
	तत्त्वीं जयाची बुद्धि स्थिर । झाला जया अपरोक्ष साक्षात्कार । जो होय तयाचे द्दष्टिगोचर । पाण दुस्तर तरला तो ॥१८६॥</p>
<p>
	ऐसी बाबांची कळा अकळ । बाबा तुम्हांलागीं प्रेमळ । म्हणोनि जाणते नेणते सकळ । होऊनि निर्मळ श्रवण करा ॥१८७॥</p>
<p>
	जेथें भक्तिप्रेमाचा जिव्हाळा । जेथें जीवासी बाबांचा लळा । तेथेंचि प्रकटे खरा कळवळा । श्रवणाचा सोहळा तेथेंच ॥१८८॥</p>
<p>
	हेमाड नमितो साईचरणां । वज्रपंजर जे अनन्यशरणां । पार नाहीं तयांचा कवणा । भवभयहरणा शक्त जे ॥१८९॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । श्रीसंतघोप - रामदर्शनं नाम द्वादशोऽध्या: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 23 Apr 2022 15:41:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 23 Apr 2022 16:07:42 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ११]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-11-in-marathi-122042300051_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: । श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो  नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
गतकथेचें अनुसंधान । बाबांचें अरुंद फळीवर शयन । अलक्ष्य आरोहण अवतरण । अकळ विंदान तयांचें ॥१॥
असो हिंदु वा यवन । ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 11" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/23/full/1650708641-0772.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra marath adhyay 11" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: । श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो  नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	गतकथेचें अनुसंधान । बाबांचें अरुंद फळीवर शयन । अलक्ष्य आरोहण अवतरण । अकळ विंदान तयांचें ॥१॥</p>
<p>
	असो हिंदु वा यवन । उभयतांसी समसमान । जाहलें आयुर्दाय - पर्यालोचन । तें हें देवार्चन शिरडीचें ॥२॥</p>
<p>
	आतां हा अध्याय अकरावा । गोड गुरुकथेचा सुहावा । वाटलें साईचरणीं वहावा । द्दढ भावा धरूनि ॥३॥</p>
<p>
	घडेल येणें सगुणध्यान । हें एकादशरुद्रावर्तन । पंचभूतांवर । सत्ता प्रमाण । बबांचें महिमान कळेल ॥४॥</p>
<p>
	कैसे इंद्र अग्नि वरुण । बाबांच्या वचनास देती मान । आतां करूं तयाचें दिग्दर्शन । श्रोतां अवधान देइंजे ॥५॥</p>
<p>
	पूर्ण विरक्तीची विरक्ति । ऐसी साईंची सगुण मूर्ति । अन्यभक्तां निजविश्रांति । आठवूं चित्तीं सप्रेम ॥६॥</p>
<p>
	गुरुवाक्यैक - विश्वासन । हेंचि बैसाया देऊं आसन । सर्वसंकल्पसंन्यासन । करूं पूजन या संकल्पें ॥७॥</p>
<p>
	प्रतिमा स्थंडिल अग्नि तेज । सूर्यमंडळ उदक द्विज । या सातांहीवरी गुरुराज । अनन्य पूजन करूं कीं ॥८॥</p>
<p>
	चरण धरितां अनन्यभावें । गुरुचि काय परब्रम्हा हेलावे । ऐसे गुरुपूजेचे नवलावे । अनुभवावे गुरुभक्तें ॥९॥</p>
<p>
	पूजक जेथवर साकारू । देहधारीच आवश्यक गुरु । निराकारास निराकारू । हा निर्धारू शास्त्राचा ॥१०॥</p>
<p>
	न करितां सगुणाचे ध्याना । भक्तिभाव कदा प्रकटेना । आणि सप्रेम जंव भक्ति घडेना । कळी उघडेना मनाची ॥११॥</p>
<p>
	तें उमलल्याविण कांहीं । केवळ कर्णिक्सेस गंध नाहीं । ना मकरंद ना भ्रमर पाहीं । तेथ राहील क्षणभरी ॥१२॥</p>
<p>
	सगुण तेंचि साकार । निर्गुण तें निराकार । भिन्न नाहीं परस्पर । साकार निराकार एकचि ॥१३॥</p>
<p>
	थिजलें तरी तें घृत्तचि संचलें । विघुरलें तेंही घृतचि म्हणितलें । सगुण निर्गुण एकचि भरलें । समरसलें विश्वरूपें ॥१४॥</p>
<p>
	डोळे भरूनि जें पाहूं येई । पदीं ज्याच्या ये ठेवितां डोई । जेथ ज्ञानाची लागे सोई । आवडी होई ते ठायीं ॥१५॥</p>
<p>
	जयाचिये संगती । प्रेमवार्ता करूं येती । जयासी पूजूं ये गंधाक्षतीं । म्हणूनि आकृति पाहिजे ॥१६॥</p>
<p>
	निर्गुणाहूनि सगुणाचें । आकलन बहु सुकर साचें । द्दढावल्या प्रेम सगुणाचें । निर्गुणाचें बोधन तें ॥१७॥</p>
<p>
	भक्तां निर्गुण ठायीं पडावें । बाबांनीं अनंत उपाय । योजावे । अधिकारानुरूप दूर बसवावें । दर्शन वर्जावें बहुकाळ ॥१८॥</p>
<p>
	एकास देशांतरा पाठवावें । एकास शिरडींत एकांतीं कोंडावें । एकास वाडयांत अडकवावें । नेम द्यावे पोथीचे ॥१९॥</p>
<p>
	वर्षानुवर्ष हा अभ्यास । होतां वाढेल निर्गुणध्यास । आसनीं शयनीं भोजनीं मनास । जडेल सहवास बाबांचा ॥२०॥</p>
<p>
	देह तरी हा नाशिवंत । कधीं तरी होणार अंत । म्हणूनि भक्तीं न करावी खंत । अनाद्यनंत लक्षावें ॥२१॥</p>
<p>
	हा बहुविध द्दश्य पसारा । सकल अव्यक्ताचा सारा । अव्यक्तांतूनि आला आकारा । जाणार माघारा अव्यक्तीं ॥२२॥</p>
<p>
	ही ‘आब्रम्हास्तंब’ सृष्टी । व्यष्टीं जैसी तैसी समष्टी । उपजली ज्या अव्यक्तापोटीं । तेथेंच शेवटीं समरसे ॥२३॥</p>
<p>
	म्हणवूनि कोणासही ना मरण । मग तें बाबांस तरी कोठून । नित्य शुद्धबुद्धनिरंजन । निर्मरण श्रीसाई ॥२४॥</p>
<p>
	कोणी म्हणोत भगवद्भक्त । कोणी म्हणोत महाभागवत । परी आम्हांसी ते साक्षात भगवंत । मूर्तिमंत वाटले ॥२५॥</p>
<p>
	गंगा समुद्रा भेटूं जाते । वाटेनें तापार्ता शीतल करिते । तीरींचे तरूंसी जीवन देते । तृषा हरिते सकळांची ॥२६॥</p>
<p>
	तैसीच संतांची अवतारस्थिति । प्रकट होती आणि जाती । परी तयांची आचरिती रीती । पावन करिती जगातें ॥२७॥</p>
<p>
	कमालीची क्षमाशीलता । नैसर्गिक विलक्षण अक्षोभ्यता । ऋजुता मुदुता सोशिकता । तैसीच संतुष्टता निरुपम ॥२८॥</p>
<p>
	दिसाया जरी देहधारी । तरी तो निर्गुण निर्विकारी । नि:संग निर्मुक्त निज अंतरीं । प्रपंचीं जरी विचरला ॥२९॥</p>
<p>
	कृष्ण स्वयें जो परमात्मा । तोही म्हणे संत मदात्मा । संत माझी सजीव प्रतिमा । संत - सप्रेमा तो मीच ॥३०॥</p>
<p>
	प्रतिमारूपही संतां न साजे । संत निश्चळ स्वरूप माझें । म्हणवूनि मद्भक्तांचें ओझें । तयांचें लाजें मी वाहें ॥३१॥</p>
<p>
	संतांसी जो अनन्यशरण । मीही वंदीं तयाचे चरण । ऐसें वदला उद्धवा आपण । संतमहिमान श्रीकृष्ण ॥३२॥</p>
<p>
	सगुणांतल जो सगुण । निर्गुणांतला जो निर्गुण । गुणवंतांतील जो अनुत्तम गुण । गुणियांचा गुणिया गुणिराजा ॥३३॥</p>
<p>
	पर्याप्तकाम जो कृतकृत्य । सदा यद्दच्छालाभतृप्त । जो अनवरत आत्मनिरत । सुखदु:खातीत जो ॥३४॥</p>
<p>
	आत्मानंदाचें जो वैभव । कोणा वर्णवेल तें गौरव । अनिर्वाच्य सर्वथैव । ब्रम्हा दैवत मूर्त जो ॥३५॥</p>
<p>
	कीं ही अनिर्वचनीय शक्ति । द्दश्यरूपें अवतरली क्षितीं । सच्चित्सुखानंदाची मूर्ति । ज्ञानसंवित्ति तीच ती ॥३६॥</p>
<p>
	ब्रम्हाकारांत:करणमूर्ति । झाली जयाची प्रपंचीं निवृत्ती । नित्य निष्प्रपंच ब्रम्हात्म्यैक्यस्थिति । आनंदमूर्ति केवळ ती ॥३७॥</p>
<p>
	‘आनंदो ब्रम्होति’ श्रुति । श्रोते नित्य श्रवण करिती । पुस्तकज्ञानी पोथींत वाचिती । भाविकां प्रतीती शिरडींत ॥३८॥</p>
<p>
	धर्माधर्मादि ज्याचें लक्षण । तो हा संसार अति विलक्षण । अनात्मज्ञांसी क्षणोक्षण । करणें रक्षण प्राप्त कीं ॥३९॥</p>
<p>
	परी हा न आत्मज्ञांचा विषय । तयांसी आत्मस्वरूपींच आश्रय । ते नित्यमुक्त आनंदमय । सदा चिन्मयरूप जे ॥४०॥</p>
<p>
	बाबाच सर्वांचें अधिष्ठान । तयांसी केउतें आसन । त्याहीवरी रौप्य सिंहासन । भक्तभावन परी बाबा ॥४१॥</p>
<p>
	बहुतां दिसांची जुनी बैठक । गोणत्याचा तुकडा एक । त्यावरी घालिती भक्त भाविक । गादी सुरेख बैसाया ॥४२॥</p>
<p>
	मागील टेकायाची भिंत । तेथें तक्या ठेविती भक्त । जैसें भक्तांचें मनोगत । बाबाही वागत तैसेच ॥४३॥</p>
<p>
	वास्तव्य दिसे शिरडींत । तरी ते होते सर्वगत । हा अनुभव निजभक्तांप्रत । साई नित्य दाखवीत ॥४४॥</p>
<p>
	स्वयें जरी निर्विकार । अंगिकारीत पूजा - उपचार । भक्तभावार्थानुसार । प्रकार सर्व स्वीकारीत ॥४५॥</p>
<p>
	कोणी करीत चामरांदोलन । कोणी तलावृन्त - परिवीजन । सनया चौघडे मंगल वादन । कोणी समर्पण पूजेचें ॥४६॥</p>
<p>
	कोणी हस्त - पादप्रक्षालन । कोणी अत्तर - गंधार्चन । कोणी त्रयोदशगुणी तांबूलदान । निवेदन महानैवेद्या ॥४७॥</p>
<p>
	कोणी दुबोटी आडवें गंध । शिवलिंगा तैसें चर्चिती सलंग । कोणी कस्तूरीमिश्रित सुगंध । तैसेंचि चंदन चर्चीत ॥४८॥</p>
<p>
	एकदां तात्यासाहेब नूलकरांचे । स्नेही डॉक्टर पंडित नांवाचे । घ्यावया दर्शन साईबाबांचें । आले एकदांच शिरडींत ॥४९॥</p>
<p>
	पाऊल ठेवितां शिरडींत । आरंभीं गेले मशिदींत । करूनि बाबांसी प्रणिपता । बैसले निवांत क्षणभरी ॥५०॥</p>
<p>
	बाबा मग वदती तयांतें । “जाईं दादाभटाच्या येथें । जा असे जा” म्हणूनि बोटें हातें ।  लाविती मार्गातें तयांस ॥५१॥</p>
<p>
	पंडित दादांकडे गेले । दादांनीं योग्य स्वागत केलें । मग दादा बाबांचे पूजेस निघाले । येतां का विचारिले तयांसी ॥५२॥</p>
<p>
	दादांसमवेत पंडित गेले । दादांनीं बाबांचें पूजन केलें । कोणीही न तोंवर लावाया धजलें । गंधाचे टिळे बाबांस ॥५३॥</p>
<p>
	कोणी कसाही येवो भक्ता । कपाळीं गंध लावूं न देत । मात्र म्हाळसापती गळ्यासी फांसीत । इतर ते लावीत पायांतें ॥५४॥</p>
<p>
	परी हें पंडित भोळे भाविक । दादांची तबकडी केली हस्तक । धरूनियां श्रीसाईंचें मस्त । रेखिला सुरेख त्रिपुंड्र ॥५५॥</p>
<p>
	पाहूनि हें तयांचें साहस । दादांचे मनीं धासधूस । चढतील बाबा परम कोपास । काय हें धाडस म्हणावें ॥५६॥</p>
<p>
	ऐसें अघडतें जरी घडलें । बाबा एकही न अक्षर वदले । किंबहुना वृत्तीनें प्रसन्न दिसले । मुळीं न कोपले तयांवर ॥५७॥</p>
<p>
	असो ती वेळ जाऊं दिली । दादांचे मनीं रुखरुख राहिली । मग तेचि दिनीं सायंकाळीं । बाबांसी विचारिली ती गोश्ट ॥५८॥</p>
<p>
	आम्ही गंधाचा उलासा टिळा । लावूं जातां आपुलिया निढळा । स्पर्श करूं द्या ना कपाळा । आणि हें सकाळा काय घडलें ॥५९॥</p>
<p>
	आमुच्या टिळ्याचा कंटाळा । पंडितांच्या त्रिपुंड्राचा जिव्हाळा । हा काय नवलाचा सोहळा । बसेना ताळा सुसंगत ॥६०॥</p>
<p>
	तंव सस्मितवदन प्रीतीं । साई दादांलागीं वदती । परिसावी ती मधुर उरक्ती । सादर चित्तीं सकळिकीं ॥६१॥</p>
<p>
	“दादा तयाचा गुरु बामण । हा जातीचा मुसलमान । तरी मी तोचि ऐसें मानून । केलें गुरुपूजन तयानें ॥६२॥</p>
<p>
	आपण मोठे पवित्र ब्राम्हाण । हा जातीचा अपवित्र यवन । कैसें करूं त्याचें पूजन । ऐसें न तन्मन शंकलें ॥६३॥</p>
<p>
	ऐसें मज त्यानें फसविलें । तेथें माझे उपाय हरले । नको म्हणणें जागींच राहिलें । आधीन केलें मज तेणें” ॥६४॥</p>
<p>
	ऐसें जरी उत्तर परिसिलें । वाटलें केवळ विनोदें भरलें । परी तयांतील इंगित कळलें । माघारा परतले जैं दादा ॥६५॥</p>
<p>
	ही बाबांची विसंगतता । दादांच्या फारचि लागली चित्ता । परी पंडितांसवें वार्ता करितां । कळली सुसंगतता तात्काळ ॥६६॥</p>
<p>
	धोपेश्वरींचे रघुनाथ सिद्धा । ‘काका पुराणिक’ नामें प्रसिद्ध । पंडित तयांचे पदीं सन्नद्ध । ऋणानुबंध  शिष्यत्वें ॥६७॥</p>
<p>
	त्यांनीं घातला काकांचा ठाव । तयांसी तैसाच आला अनुभव । जया मनीं जैसा भाव । भक्तिप्रभावही तैसाच ॥६८॥</p>
<p>
	असो हे सर्वोपचार करवूनि घेती । केवळ तयांच्या आलिया चित्तीं । ना तों पूजेचीं ताटें भिरकाविती । रूप प्रकटिती नरसिंह ॥६९॥</p>
<p>
	हें रूप कां जैं प्रकटिजेल । कोण धीराचा पाशीं ठाकेल । जो तो जीवाभेणें पळेल । वृत्ति खवळेल ती जेव्हां ॥७०॥</p>
<p>
	कधीं अवचित क्रोधवृत्ति । भक्तांवरी आग पाखडिती । कधीं मेणाहूनि मऊ भासती । पुतळा शांतिक्षमेचा ॥७१॥</p>
<p>
	कधीं काळाग्निरूप भासती । भक्तांसी खङ्गाचे धारेवरी धरिती । कधीं लोण्याहूनि मवाळ होती । आनंदवृत्ति विलसती ॥७२॥</p>
<p>
	जरी क्रोधें कांपले थरथरां । डोळे जरी फिरविले गरगरां । तरी पोटीं कारुण्याचा झरा । माता लेंकुरा तैसा हा ॥७३॥</p>
<p>
	क्षणांत वृत्तीवरी येतां । हांका मारूनि बाहती भक्तां । म्हणती “मी कोणावरीही रागावतां । ठावें न चित्ता माझिया ॥७४॥</p>
<p>
	माय हाणी लेंकुरा लाता । समुद्रा करी नदियां परता । तरीच मी होय तुम्हां अव्हेरिता । करीन अहिता तुमचिया ॥७५॥</p>
<p>
	मी माझिया भक्तांचा अंकिला । आहें पासींच उभा ठाकला । प्रेमाचा मी सदा भुकेला । हांक हांकेला देतसें” ॥७६॥</p>
<p>
	हा कथाभाग लिहितां लिहितां । ओघानें आठवली समर्पक कथा । उदाहरणार्थ कथितों श्रोतां । सादरचित्ता परिसिजे ॥७७॥</p>
<p>
	आला कल्याणवासी एक यवन । सिदीक फाळके नामाभिधान । मक्का - मदीन यात्रा करून । शिरडीलागून पातला ॥७८॥</p>
<p>
	उररला तो वृद्ध हाजी । उत्तराभिमुख चावडीमाजी । प्रथम नऊ मास इतराजी । बाबा न राजी तयातें ॥७९॥</p>
<p>
	आला नाहीं तयाचा होरा । व्यर्थ जाहल्या येरझारा । केल्या तयानें नाना तर्‍हा । नजरानजर होईना ॥८०॥</p>
<p>
	मशीद मुक्तद्वार अवघ्यांसी । कोणासही ना पडदपोशी । परी न आज्ञा त्या फळक्यासी । चढावयासी मशीदीं ॥८१॥</p>
<p>
	फाळके अंतरीं खिन्न झाले । काय तरी हें कर्म वहिलें । मशिदीस न लागती पाउलें । काय म्यां केलें पाप कीं ॥८२॥</p>
<p>
	कवण्या योगें प्रसन्न होती । आतां बाबा मजवर पुढती । हाच विचार दिवसरातीं । ह्रद्रोग चित्तीं फाळक्यांचे ॥८३॥</p>
<p>
	तितक्यांत कोणी कळविलें तयांस । होऊं नका ऐसे उदास । धरा माधवरावांची कास । पुरेल आस मनींची ॥८४॥</p>
<p>
	आधीं न घेतां नंदीचें दर्शन । शंकर होईल काय प्रसन्न । तयासी याच मार्गाचें अवलंबन । गमलें साधन तें बरवें ॥८५॥</p>
<p>
	सकृद्दर्शनीं ही अतिशयोक्ति । ऐसें वाटेल श्रोतयां चित्तीं । परी हा अनुभव दर्शनवक्तीं । भक्तांप्रती शिरडींत ॥८६॥</p>
<p>
	जया मनीं बाबांचे सवें । संथपणें संभाषण व्हावें । तयाचिया समवेत जावें । माधवरावें आरंभीं ॥८७॥</p>
<p>
	आले हे कोण कोठूनि किमर्थ । गोड शब्दें कळवावा कार्यार्थ । सूतोवाच होतांच समर्थ । होत मग उद्युक्त बोलाया ॥८८॥</p>
<p>
	ऐकोनियां तें हाजीनें सकळ । माधवरावांस घातली गळ । म्हणाले एकदां ही माझी तळमळ । घालवा, दुर्मिळ मिळवूनि द्या ॥८९॥</p>
<p>
	पडतां माधवरावांस भीड । केल मनाचा निश्चय द्दढ । असो वा नसो कार्य अवघड । पाहूं कीं दगड टाकुनी ॥९०॥</p>
<p>
	गेले मशिदीस केला धीर । गोष्ट काढिली अतिहळुवार । “बाबा तो म्हातारा कष्टी फार । कराना उपकार तयावरी ॥९१॥</p>
<p>
	हाजी तो करूनि मक्का - मदीना । शिरडीस आला आपुले दर्शना । तयाची कैसी येईना करुणा । येऊंच द्याना मशीदीं ॥९२॥</p>
<p>
	जन येती असंख्यात । जाऊनि मशिदींत दर्शन घेत । हातोहात चालले जात । हाच खिचपत पडला कां ॥९३॥</p>
<p>
	करा कीं एकदां कृपाद्दष्टी । होवो तयासी मशिदींत भेटी । जाईल मग तोही उठाउठी । पुसूनि गोष्टी मनींची ”॥९४॥</p>
<p>
	“शाम्या तुझ्या ओठांचा जार । अजून नाहीं वाळला तिळभर । नसतां अल्लाची खुदरत तयारवर । मी काय करणार तयासी ॥९५॥</p>
<p>
	नसतां अल्लमियाचा ऋणी । चढेल काय या मशिदीं कुणी । अघटित येथील फकीराची करणी । नाहीं मी धणी तयाचा ॥९६॥</p>
<p>
	असो बारवीपलीकडे थेट । आहे जी एक पाऊलवाट । चालूनि येसील काय तूं नीट । विचार जा स्पष्ट तयातें” ॥९७॥</p>
<p>
	हाजी वदे कितीही बिकट । असेना ती मी चालेन नीट । परी मज द्यावी प्रत्यक्ष भेट । चरणानिकट बैसूं द्या ॥९८॥</p>
<p>
	परिसूनि शामाकरवीं हें उत्तर । बाबा वदती आणीक विचार । “चार वेळांतीं चाळीस हजार । रुयपे तूं देणार काय मज” ॥९९॥</p>
<p>
	माधवराव हा निरोप सांगतां । हाजी म्हणाले हें काय पुसतां । देईन चाळीस लाखही मागतां । हजारांची कथा काय ॥१००॥</p>
<p>
	परिसोनि बाबा वदती त्या पूस । “आज बोकड कापावयाचा मानस । आहे आमुचा मशिदीस । तुज काय गोस पाहिजे ॥१०१॥</p>
<p>
	किंवा पाहिजे तुवर अस्थी । किंवा वृषणवासना चित्तीं । जा विचार त्या म्हातार्‍याप्रती । काय निश्चित वांछी तो” ॥१०२॥</p>
<p>
	माधवरावें समग्र कथिलें । हाजीप्रती बाबा जें वदले । हाजी निक्षून वदते झाले । “नलगे त्यांतलें एकही मज ॥१०३॥</p>
<p>
	द्यावें मज कांहीं असेल चित्ता । तरी मज आहे एकचि आस्था । कोळंब्यांतील तुकडा लाभतां । कृतकल्याणता पावेन” ॥१०४॥</p>
<p>
	हाजीचा हा निरोप घेऊन । माधवराव आले परतोन । करितांच बाबांस तो निवेदन । बाबा जे तत्क्षण खवळले ॥१०५॥</p>
<p>
	कोळंबा आणि पाण्याच्या घागरी । स्वयें उचलूनि मरकाविल्या द्वारीं । हात चावोनियां करकरी । आले शेजारीं हाजीच्या ॥१०६॥</p>
<p>
	धरूनि आपुली कफनी दों करीं । हाजीसन्मुख उचलूनि वरी । म्हणती “तूं काय समजलास अंतरीं । करिसी फुशारी मजपुढें ॥१०७॥</p>
<p>
	बुढ्ढेपणाचा तोरा दाविसी । ऐसेंचि काय तूं कुराण पढसी । मक्का केल्याचा ताठा वाहसी । परी न जाणसी तूं मातें” ॥१०८॥</p>
<p>
	ऐसें तयासी निर्भर्त्सिलें । अवाच्य शब्दप्रहार केले । हाजी बहु गांगरूनि गेले । बाबा परतले माघारा ॥१०९॥</p>
<p>
	मशिदीचे आंगणीं शिरतां । माळिणी देखिल्या आंबे विकितां । खरेदिल्या त्या पाटया समस्ता । पाठविल्या तत्त्वता हाजीस ॥११०॥</p>
<p>
	तैसेचि तात्काळ मागें परतले । पुन्हां त्या फाळक्यापाशीं गेले । रुपये पंचावन्न खिशांतूनि काढिले । हातावर मोजिले तयाचे ॥१११॥</p>
<p>
	तेथूनि पुढें मग प्रेम जडलें । हाजीस जेवावया निमंत्रिलें । दोघेही जणूं अवघें विसरले । हाजी समरसले निजरंगीं ॥११२॥</p>
<p>
	पुढें मग ते गेले आले । यथेच्छ बाबांचे प्रेमीं रंगले । नंतरही बाबांनीं वेळोवेळे । रुपये दिधले तयास ॥११३॥</p>
<p>
	असो एकदां साईसमर्था । मेघावरीही जयाची सत्ता । तया इंद्रासी पाहिलें प्रार्थितां । आश्चर्य चित्ता दाटलें ॥११४॥</p>
<p>
	अति भयंकर होता समय । नभ समग्र भरलें तमोमय । पशुपक्षियां उद्भवलें भय । झंजा वायु सूटला ॥११५॥</p>
<p>
	झाला सूर्यास्त सायंकाळ । उठली एकाएकीं वावटळ । सुटला वार्‍याचा सोसाटा प्रबळ । उडाली खळबळ दुर्धर ॥११६॥</p>
<p>
	त्यांतचि मेघांचा गडगडाट । विद्युल्लतांचा कडकडात । वार्‍याचा भयंकर सोसाट । वर्षाव घनदाट जोराचा ॥११७॥</p>
<p>
	मेघ वर्षल मुसळधारा । वाजूं लागल्या फटफट गारा । ग्रामस्थांसी सुटला भेदरा । गुरांढोरां आकांत ॥११८॥</p>
<p>
	मशिदीच्या वळचणीखालीं । भणंगभिकारी निवार्‍या आलीं । गुरेंढोरें वासरें एकत्र मिळालीं । भीड झाली मशीदीं ॥११९॥</p>
<p>
	पाणीच पाणी चौफेर झालें । गवत सारें वाहूनि गेलें । पीकही खळ्यांतील सर्व मिजलें । लोक गबजले मानसीं ॥१२०॥</p>
<p>
	अवघे ग्रामस्थ घाबरले । सभामंडपीं येऊनि भरले । कोणी मशिदीचे वळचणीस राहिले । गार्‍हाणें घातलें बाबांना ॥१२१॥</p>
<p>
	जोगाई जाखाई मरीआई । शनि शंकर अंबाबाई । मारुति खंडोबा म्हाळसाई । ठायीं ठायीं शिरडींत ॥१२२॥</p>
<p>
	परी अवघड प्रसंग येतां । कामीं पडेना एकही ग्रामस्था । तयांचा तो चालता बोलता धांवता । संकटीं पावता एक साई ॥१२३॥</p>
<p>
	नलगे तयासी बोकड कोंबडा । नलगे तयासी टका दोकडा । एका भावाचा भुकेला रोकडा । करी झाडा संकटांचा ॥१२४॥</p>
<p>
	पाहूनि ऐसे लोक भ्याले । महाराज फारचि हेलावले । गादी सोडुनी पुढें आले । उभे राहिले धारेवर ॥१२५॥</p>
<p>
	मेघनिनादें भरल्या नभा । कडाडती विजा चमकती प्रभा । त्यांतचि साईमहाराज उभा । आकंठ बोभाय उच्चस्वरें ॥१२६॥</p>
<p>
	निज जीवाहूनि निजभक्ता । देवास आवडती साधुसंत । देव तयांचे बोलांत वर्तत । अवतार घेत त्यालागीं ॥१२७॥</p>
<p>
	परिसोनि भक्तांचा धावा । देवासी लागे कैवार घ्यावा । वरचेवरी शब्द झेलावा । भक्त - भावा स्मरोनि ॥१२८॥</p>
<p>
	चालली आरोळीवर आरोळी । नाद दुमदुमला निराळीं । वाटे मशीद डळमळली । कांटाळी बैसली सकळांची ॥१२९॥</p>
<p>
	त्या गिरागजर तारस्वरें । दुमदुमलीं मशीद - मंदिरें । तंव मेघ निजगर्जना आवरे । वर्षाव थारे धारांचा ॥१३०॥</p>
<p>
	उदंड बाबांची आरोळी । अवघा सभामंडप डंडळी । जगबजली भक्तमंडळी । तटस्थ ठेली ठायींच ॥१३१॥</p>
<p>
	अतर्क्य बाबांचें विंदान । जाहलें वर्षावा आकर्षण । वायूही आवरला तत्क्षण । धुई विच्छिन्न जाहली ॥१३२॥</p>
<p>
	हळू हळू पाऊस उगवला । सोसाटाही मंदावला । नक्षत्रगण दिसूं लागला । तम निरसला ते काळीं ॥१३३॥</p>
<p>
	पाऊस पुढें पूर्ण उगवला । सोसाटयाचा पवनही विरमला । चंद्र गगनीं दिसूं लागला । आनंद झाला सकळांतें ॥१३४॥</p>
<p>
	वाटे इंद्रास दया आली । पाहिजे संतांची वाणी राखली । ढगें बारा टावा फांकलीं । शांत झाली वावटळ ॥१३५॥</p>
<p>
	पाऊस सर्वस्वी नरमला । वाराही मंद वाहूं लागला । गडगडाट जागींच जिराला । धीर आला पशुपक्ष्यां ॥१३६॥</p>
<p>
	सोडूनियां घरांच्या वळचणी । गुरें वासरें बाहेर पडुनी । वावरूं लागलीं निर्भय मनीं । पक्षीही गगनीं उडाले ॥१३७॥</p>
<p>
	पाहूनि पूर्वील भयंकर प्रकार । मानूनियां बाबांचे उपकार । जन सर्व गेले घरोघर । गुरेंही सुस्थिर फरकलीं ॥१३८॥</p>
<p>
	ऐसा हा साई दयेचा पुतळा । तयासी भक्तांचा अति जिव्हाळा । लेंकुरां जैसा आईचा कळवळा । किती मी प्रेमळा गाऊं त्या ॥१३९॥</p>
<p>
	अग्नीवरीही ऐसीच सत्ता । ये अर्थीची संक्षिप्त कथा । श्रोतां परिसिजे सादर चित्ता । कळेल अपूर्वता शक्तीची ॥१०४॥</p>
<p>
	एकदां माध्यान्हीची वेळ । धुनीनें पेट घेतला सबळ । कोण राहील तेथ जवळ । ज्वाळाकल्लोळ ऊठला ॥१४१॥</p>
<p>
	प्रचंड वाढला ज्वाळामाळी । तक्तपोशीला शिखा भिडली । वाटे होते मशिदीची होळी । राखरांगोळी क्षणांत ॥१४२॥</p>
<p>
	तरी बाबा मनीं स्वस्थ । सकळ लोक चिंताग्रस्त । तोंडांत बोटें घालीत समस्त । काय ही शिकस्त बाबांची ॥१४३॥</p>
<p>
	एक म्हणे आणा कीं पाणी । दुजा म्हणे घालावें कोणीं । घालितां माथां सटका हाणी । कोण त्या ठिकाणीं जाईल ॥१४४॥</p>
<p>
	मनीं जरी सर्व अधीर । विचारावया नाहीं धीर । बाबाच तंव होऊनि अस्थिर । सटक्यावर कर टाकियला ॥१४५॥</p>
<p>
	पाहोनि ज्वाळांचा भडका । हातीं घेऊनियां सटका । हाणिती फटक्यावरी फटका । म्हणती ‘हट का माघारा’ ॥१४६॥</p>
<p>
	धुनीपासाव एक हात । स्तंभावरी करिती आघात । ज्वाळांकडे पहात पहात । ‘सबूर सबूर’ वदत ते ॥१४७॥</p>
<p>
	फटक्या-फटक्यास खालीं खालीं । ज्वाला नरम पडूं लागली । भीति समूळ उडूनि गेली । शांत झाली तैं धुनी ॥१४८॥</p>
<p>
	तो हा साई संतवर । ईश्वराचा दुजा अवतार । डोई तयाच्या पायांवर । ठेवितां कृपाकर ठेवील ॥१४९॥</p>
<p>
	होऊनि श्रद्धा - भक्तियुक्त । करील जो या अध्यायाचें नित्य । पारायण होऊनि स्वस्थचित्त । आपदानिर्मुक्त होईल ॥१५०॥</p>
<p>
	फार अकाय करुं मी कथन । शुद्ध करोनियां अंत:करण । नेमनिष्ठ व्हा साईपरायण । ब्रम्हा सनातन पावाल ॥१५१॥</p>
<p>
	पुरेल अपूर्व इच्छित काम । व्हाल अंतीं पूर्ण निष्काम । पावाल दुर्लभ साजुज्यधाम । अखंड राम लाधाल ॥१५२॥</p>
<p>
	असो जया भक्तांच्या चित्तीं । भोगावी परमार्थसुखसंवित्ती । तेणें ये अध्यायानुवृत्तीं । आदरवृत्ति ठेवावी ॥१५३॥</p>
<p>
	शुद्ध होईल चित्तवृत्ति । कथासेवनीं परमार्थप्रवृत्ति । इष्टप्राप्ति अनिष्टनिवृत्ति । पहावी प्रचीति बाबांची ॥१५४॥</p>
<p>
	हेमाडपंत साईंस शरण । पुढील अध्याय अतिपावन । गुरुशिष्यांचें तें महिमान । घोलप - दर्शन गुरुपुत्रा ॥१५५॥</p>
<p>
	शिष्यास कैसाही प्रसंग येवो । तेणें न त्यजावा निज गुरुदेवो । साई तयाचा प्रत्यक्ष अनुभवो । दावी द्दढ भावो वाढवी ॥१५६॥</p>
<p>
	जे जे भक्त पायीं । प्रत्येका दर्शनाची  नवाई । कोणास कांहीं कोणास कांहीं । देऊनि ठायींच द्दढ केलें ॥१५७॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । श्रीसाईमहिमावर्णनंनाम एकादशोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 23 Apr 2022 15:39:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 23 Apr 2022 16:06:28 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय १०]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-10-122042200047_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: । श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो  नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
जो सर्वलोकहितीं रत । ब्रम्हास्वरू पीं नित्यस्थित । स्मरा तयातें अविरत । प्रेमभरित अंतरें ॥१॥
जयाच्या ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 10" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/22/full/1650620233-5538.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra chapter 10" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: । श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो  नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	जो सर्वलोकहितीं रत । ब्रम्हास्वरू पीं नित्यस्थित । स्मरा तयातें अविरत । प्रेमभरित अंतरें ॥१॥</p>
<p>
	जयाच्या स्मरणमात्रेंच । उकले जन्ममरणांचा पेंच । साधनांत साधन तें हेंच । नाहीं वेंच कपर्दिक ॥२॥</p>
<p>
	अल्प प्रयासें अनल्प फळा । अनायासें हाता ये सकळ । जोंवरी हा इंद्रियगण अविकला । तोंवरी पळपळ साधावें ॥३॥</p>
<p>
	इतर देव सारे मायिक । गुरूचि शाश्वत देव एक । चरणीं ठेवितां विश्वास देख । ‘रेखेवर मेख मारी’ तो ॥४॥</p>
<p>
	जेथें सद्नुरुसेवा चोखट । संसाराचें समूळ तळपट । न्यायमीमांसादि घटपट । नलगे खटपट कांहींही ॥५॥</p>
<p>
	अधिभूत आणि आध्यात्मिक । तिसरें दु:ख तें आधिदैविक । तरुनि जाती भक्त भाविक । होतां नाविक सद्नुरु ॥६॥</p>
<p>
	तरूं जातां लौकिक सागर । विश्वास लागे नावाडियावर । तो तरावया भवसागर । निजगुरूवर ठेवावा ॥७॥</p>
<p>
	पाहोनि भक्तांची भाव - भक्ति । करितो करतलगत संवित्ति । ‘आनंदलक्षण’ मोक्षप्राप्ति । देतो हातीं लीलेनें ॥८॥</p>
<p>
	यद्दर्शनें ह्रदयग्रंथी । तुटे हो सर्व विषयनिवृत्ति । संचित - क्रियमाण क्षया जाती । गाऊं चरितीं तयातें ॥९॥</p>
<p>
	अष्टमाध्यायीं जाहलें कथन । नरजन्माचें प्रयोजन । नवमीं भिक्षावृत्ताचें गहन । गुजवर्णन परिसिलें ॥१०॥</p>
<p>
	बायज्ञाबाईची भाजीभाकर । खुशालचंदांचा समाचार । म्हाळसापती तात्यांचा शयनप्रकार । श्रवणसुखकर वानिला ॥११॥</p>
<p>
	आतां श्रोते दत्तचित्त । ऐका पुढील बाबांचें चरित । कैसे ते राहात कोठें निजत । कैसे विचरत अलक्षय ॥१२॥</p>
<p>
	केवढा लौकिक आयुदीय । हिंदूयवनां उभयां माय । वाघाबकर्‍याच्या विश्वासा ठाय । प्रेमें नि:संशय विहरती ॥१३॥</p>
<p>
	झाली पोटापाण्याची कहाणी । आतां कैसी साईंची रहाणी । कोठें ते निजत कोण्या ठिकाणीं । सादर श्रवणीं श्रोते व्हा ॥१४॥</p>
<p>
	चौहाती लांब लांकडी फळी । रुदं एक वीतचि सगळी । झोपाळ्यापरी आढयास टांगली । चिंध्यांहीं बांधिली उभयाग्रीं ॥१५॥</p>
<p>
	ऐशा फळीवरी बाबा निजत । उशापायथ्या पणत्या जळत । केव्हां चढत केव्हां उतरत । अलक्ष्य गति तयांची ॥१६॥</p>
<p>
	मान वांकवूनि वरती बैसती । किंवा तिच्यावर निद्रिस्त असती । परी ते केव्हां चढती केव्हां उतरती । नकळे ते गति कवणाही ॥१७॥</p>
<p>
	ऐसी चिंध्यांनीं बांधिली फळी । वजन बाबांचें कैसें सांभाळी । महासिद्धि असतां जवळी । नांवाला फळी केवळ ती ॥१८॥</p>
<p>
	अतिसूक्ष्म कण डोळां खुपे । तेथें अणिमावंत सुखें लपे । माशी कीड मुंगी या रूपें । संचार सोपे बाबांचे ॥१९॥</p>
<p>
	अणिमा जयाचे घरची दासी । वेळ कां तयातें होतां माशी । वसेल जो अधांतरीं आकाशीं । मात त्या कायसी फळीची ॥२०॥</p>
<p>
	अणिमा - महिमा - लघिमा आदि । अष्टसिद्धि नवनिधी । बद्धांजली उभ्या जयाच्या संनिधी । फळी त्या नुसती निमित्ता ॥२१॥</p>
<p>
	कीड मुंगी सूकर श्वान । पशु पक्षी मनुष्य जाण । राजा रंक थोर सान । समसमान पाही जो ॥२२॥</p>
<p>
	दिसाया जरी शिरडीनिवासी । बाहेर लोक्संग्रहाचा सोस । अंतरीं जरी परम निराश । बाहेर पाश भक्तांचा ॥२४॥</p>
<p>
	अंतरीं अत्यंत निष्काम । बाह्यत: भक्तार्थ अति सकाम । अंतरीं निजशांतीचें धाम । बाह्यप्रकाम संतप्त ॥२५॥</p>
<p>
	अंतरीं परब्रम्हास्थिति । बाहेर दावी पैशाचवृत्ति । अंतरीं अद्वैतप्रीति । बाह्यत: गुंती विश्वाची ॥२६॥</p>
<p>
	कधीं पाही प्रेमभावें । कधीं पाषाण घेऊनि धांवे । कधीं शिव्या - शापांतें द्यावें । कधीं कवटाळावें स्वानंदें ॥२७॥</p>
<p>
	कधीं शांत दांत उपरत । तितिक्षू सदा समाहित । आत्मस्थित आणि आत्मरत । प्रसन्नचित्त भक्तांसी ॥२८॥</p>
<p>
	एकासनीं नित्य लीन । नाहीं जयासी गमनागमन । सटका जयाचें दंडनिधान । तूष्ण्यवस्थान निश्चिंत ॥२९॥</p>
<p>
	नाहीं कीर्ति - वित्तेषणा । भिक्षाचर्य प्राणरक्षणा । करूनि ऐशिया योगारोहणा । कालक्रमणा करी जो ॥३०॥</p>
<p>
	प्रत्यक्ष संन्यासवेष यति । सटका तोचि दंड हातीं । ‘अल्ला - मालीक’ वाक्यानुवृत्ति । भक्तप्रीति अखंड ॥३१॥</p>
<p>
	ऐशी साईंची सगुणमूर्ति । मनुष्यरूपें अभिव्यक्ति । पूर्वपुण्यार्जित ही संपत्ति । अवचित हातीं लाधली ॥३२॥</p>
<p>
	तयासी जे मनुष्य भाविती । मंदभाग्य ते मंदमति । विचित्र जयांची दैवगति । तयां हे प्राप्ती कैसेनी ॥३३॥</p>
<p>
	साई आत्मबोधाची खाण । साई आनंदविग्रहपूर्ण । धरा कास तयाची तूर्ण । भवार्णव संपूर्ण तराया ॥३४॥</p>
<p>
	खरेंच जें अपार अनंत । भरलें आब्रम्हास्तंबपर्यंत । ऐसें जें निरंतर अभिन्न अत्यंत । मूर्तिमंत तें बाबा ॥३५॥</p>
<p>
	कलियुगाचा कालप्रसार । चार लक्ष बत्तीस हजार । भरतां स्थूलमानें पांच हजार । झाला अवतार बाबांचा ॥३६॥</p>
<p>
	येथें श्रोते आशंका घेती । ठावी नसतां जन्मतिथि । काय आधारें केलें हें निश्चितीं । सादर चित्तीं परिसिजे ॥३७॥</p>
<p>
	आनिर्वाण कृतसंकल्पेंसी । होऊनि शिरडीक्षेत्रनिवासी । कंठिलें साठ संवत्सरांसी । क्षेत्रसंन्यासी वृत्तीनें ॥३८॥</p>
<p>
	सोळा वर्षांचिया वयास । आरंभीं बाबा प्रकटले शिरडीस । तीन वर्षें ते समयास । करूनि वास होते ते ॥३९॥</p>
<p>
	तेथूनि मग जे कोठें सटकले । दूर निजामशाहींत आढळले । ते मग वर्‍हाडासमवेत आले । शिरडींत राहिले अक्षयी ॥४०॥</p>
<p>
	वीस वर्षें होतीं वयास । तेथूनि अखंड शिरडी - सहवास । तेथेंच साठ वर्षें वास । सर्वत्रांस हें ठावें ॥४१॥</p>
<p>
	शके अठराशें चाळीस । आश्विन शुद्ध दशमीस । विजयादशमीचे सुमुहूर्तास । बाबा निजवास  पावले ॥४२॥</p>
<p>
	एंव ऐशींचा आयुर्दाय । स्थूलमानाचा हा निश्चय । कीं शके सतराशें साठ होय । जन्मनिर्णय बाबांचा ॥४३॥</p>
<p>
	काळाच्या माथां देणार पाय । ऐसिया महात्म्यांचा आयुर्दाय । करवेल कधीं निश्चित काय । अवघड हें कार्य साधाया ॥४४॥</p>
<p>
	महात्मे नित्य स्वस्थानीं स्थित । जन्म आणि मरणविरहित । दिनमणीस कैंचा उदयास्त । तो तंव अचल स्वस्थ सदा ॥४५॥</p>
<p>
	शके सोळाशें तीन सालीं । रामदासांची समाधी झाली । पुरीं दोनही न शतकें गेलीं । उदया आली ही मूर्ति ॥४६॥</p>
<p>
	भरतभूमि यवनाक्रांत । हिंदू नृप पादाक्रांत । भक्तिमार्ग झाला लुप्त । धर्मरहित जन झाले ॥४७॥</p>
<p>
	तैं रामदास झाले निर्माण । शिवरायातें हातीं धरून । केलें यवनांपासून राज्यरक्षण । गोब्राम्हाण - संरक्षण ॥४८॥</p>
<p>
	पुरीं दोनही न शतकें गेलीं । पूर्वील घडी पुनश्च बिघडली । हिंदु - अविंधीं दुही पडली । ती मग तोडिली बाबांनीं ॥४९॥</p>
<p>
	राम आणि रहीम एक । यत्किंचितही नाहीं फरक । मग भक्तींच धरावी कां अटक । वर्तावें तुटक किमर्थ ॥५०॥</p>
<p>
	काय तुम्ही लेंकरें मूढ । बांधा हिंदु - अविंधांची सांगड । व्हा द्दढ सुविचारारूढ । तरीच पैलथड पावाल ॥५१॥</p>
<p>
	वादावारी नाहीं बरी । नको कुणाची बरोबरी । व्हा नित्य निजहिताचे विचारी । रक्षील श्रीहरी तुम्हांला ॥५२॥</p>
<p>
	योग - याग - तप - ज्ञान । हें सर्व हरिप्राप्तीचें साधन । असूनि हें जो हरिविहीन । व्यर्थ जनन तयाचें ॥५३॥</p>
<p>
	कोणी कांहीं केलिया अपकार । आपण न करणें प्रतिकार । करवेल तरी करा उपकार । उपदेश सार हा त्यांचा ॥५४॥</p>
<p>
	स्वर्थास तैसाचि परमार्थास । उपदेश हा हितावह बहुवस । उच्च नीच स्त्रीशूद्रांस । धोपट सकळांस हा मार्ग ॥५५॥</p>
<p>
	स्वप्नींच्या राज्याचें वैभव । जागें झालिया जैसें वाव । तैसाचि संसार केवळ माव । भावना ही तयाची ॥५६॥</p>
<p>
	देहादि सुखदु:खमिथ्यत्व । हेंचि जयाचें प्रपंचतत्व । निजानुसंधानें स्वप्न - भ्रमत्व । दवडोनि मुक्तत्व साधिलें ॥५७॥</p>
<p>
	पाहोनि शिष्याची बद्धता । अति कळवळा जयाचे चित्ता । कैसी लाधेल देहातीतता । हेचि चिंता अहर्निश ॥५८॥</p>
<p>
	अहंब्रम्हाकारवृत्ति । अखंडानंदाची मूर्ति । निर्विकल्प चित्तस्थिति । येई निवृत्ति विसाविया ॥५९॥</p>
<p>
	घेऊनियां टाळ विणे । दारोदार भटकणें । आल्या गेल्या केविलवाणें । हात पसरणें ठावें ना ॥६०॥</p>
<p>
	बहुत ऐसे असती गुरु । शिष्य करिती धरधरूं । देती बळेंचि कानमंतरू । सिंतरूनि वित्तार्थ ॥६१॥</p>
<p>
	शिष्यास धर्माचें शिक्षण । स्वयें अधर्माचें आचरण । त्याचेनि कैसें भवतरण । जन्म - मरण चुकेल ॥६२॥</p>
<p>
	आपुल्या धार्मिकत्वाची ख्याति । व्हावी झेंडे फडकावे जगतीं । हें लवही न जयाचे चित्तीं । ऐसी ही मूर्ति साईंची ॥६३॥</p>
<p>
	देहाभिमाना न जेथें वसती । शिष्याठायीं अत्यंत प्रीति । सदैव जेथें हेचि प्रवृत्ति । ऐसी ही मूर्ति साईंची ॥६४॥</p>
<p>
	नियत आणि अनियत गुरु । असती गुरु दो प्रकारु । एकेकाचा कार्यनिर्धारु । स्पष्ट करूं श्रोतियां ॥६५॥</p>
<p>
	दैवी संपत्ति परिपव्क करणें । निर्मल होणें अंत:करणें । एवढेंच अनियत गुरूचें देणें । मार्गीं लावणें मोक्षाच्या ॥६६॥</p>
<p>
	नियत गुरूशीं होतां सख्य । द्वैत जाऊनि होय ऐक्य । ‘तत्त्वमसि’ महाबाक्य । तयाची साक्ष तो दावी ॥६७॥</p>
<p>
	चराचरीं भरले गुरु । भक्तार्थ होती साकारु । सरतां अवतारकार्यभारू । निजावतारु संपविती ॥६८॥</p>
<p>
	या द्वितीय कोटींटील साई । चरित्र तयांचें वर्णूं मी कायी । जैसी तो मज बुद्धि देई । तैसेंचि होई लेखन हें ॥६९॥</p>
<p>
	लौकिकी विद्यांचे अनेक गुरु । स्वरूपीं स्थापी तोचि सद्नुरू । समर्थ तोचि जो दावी भवपारू । महिमा अगोचरू तयाचा ॥७०॥</p>
<p>
	जो जो जाई कराया दर्शन । तयाचें भूत भविष्य वर्तमान । साई न पुसतां करिती निवेदन । ऊण - खूण संपूर्ण ॥७१॥</p>
<p>
	ब्रम्हाभावें भूतमात्र । अवलोकी जो सर्वत्र । देखे समसाम्यें अरि - मित्र । भेद तिळमात्र नेणे जो ॥७२॥</p>
<p>
	निरपेक्ष आणि समदशीं । अपकारियांही अमृत वर्षीं । समचित्त उत्कर्षापकर्षीं । विकल्प ना स्पर्शी जयातें ॥७३॥</p>
<p>
	वर्ततां या नश्वर देहीं । देहगेहीं जो गुंतला नाहीं । दिसाया देही अंतरीं विदेही । तो येचि देहीं निर्मुक्त ॥७४॥</p>
<p>
	धन्य शिरडीचे जन । साईच जयांचें देवतार्चन । करितां अशन भोजन शयन । अखंड चिंतन साईंचें ॥७५॥</p>
<p>
	धन्य धन्य तयांची प्रेमळता । खळ्यांत परसांत कामें करितां । दळितां कांडितां डेरे घुसळितां । महिमा गातात बाबांचा ॥७६॥</p>
<p>
	आसनीं भोजनीं शयनीं । बाबांच्या नांवाची अक्षय स्मरणी । एका बाबांविण दुजा कोणी । देव ज्यांनीं नाठविला ॥७७॥</p>
<p>
	काय त्या बायांचा प्रेमा तरी । काय तयांचे प्रेमाची माधुरी । निर्मळ प्रेमचि कवन करी । विद्वत्ता न करी कवनस ॥७८॥</p>
<p>
	साधी सरळ भाषा खरी । विद्या नाहीं तिळभरी । त्यांतूनि जें कवित्व चमक मारी । मान चतुरीं डोलविजे ॥७९॥</p>
<p>
	खर्‍या प्रेमाचें आविर्भवन । तया नांव खरें कवन । तें या बायांच्या वाणीमधून । श्रोतीं पाहून घ्यावें कीं ॥८०॥</p>
<p>
	असेल साईबाबांची इच्छा । पूर्ण संग्रह लाधेल यांचा । पुरेल श्रोतियांची श्रवणेच्छा । अध्याय कवनांचा होईल ॥८१॥</p>
<p>
	असो निराकार भक्तकृपें । शिरडींत प्रकटलें साईरूपें । देहाहंकार - विकारलोपें । भक्तिस्वरूपें ओळखिजे ॥८२॥</p>
<p>
	अथवा भक्तांचें पुण्य फळलें । तें प्राप्तकाल वसत मेळें । साईरूपें पूर्ण अंकुरलें । फळा आलें शिरडींत ॥८३॥</p>
<p>
	अनिर्वाच्या फुटली वाचा । अजन्म्यासी जन्म साचा । अमूर्ताच्या मूर्तीचा साचा । करुणरसाचा ओतीव ॥८४॥</p>
<p>
	यशवंत आणि श्रीमंत । वैराग्यशाली ज्ञानवंत । ऐश्वर्य औदार्यमंडित । षड्‌गुणान्वित मूर्ति हे ॥८५॥</p>
<p>
	विलक्षण बाबांचा निग्रह । स्वयें जरी अपरिग्रह । अमूर्त तरी धरिती विग्रह । भक्तानुग्रह - कारणें ॥८६॥</p>
<p>
	काया तयांचा कृपाभाव । घेती भक्तांचा जडवूनि भाव । नाहीं तरी तयांचा ठाव । कोण देव गिंवसिता ॥८७॥</p>
<p>
	वाग्देवता जें वदूं न धजे । श्रवणही जें परिसतां लाजे । ऐसे बोल भक्तकल्याणकाजें । साईमहाराजें वदावे ॥८८॥</p>
<p>
	जया शब्दांचा अनुवाद करणें । तयांहून बरें मुकेंच असणें । परी न बरवें कर्तव्या चुकणें । म्हणोनि वदणें प्राप्त झालें ॥८९॥</p>
<p>
	भक्तकणवा बाबांची वाणी । वदती झाली अति लीनपणीं । “दासानुदास मी तुमचा ॠणी । निघालों दर्शनीं तुमचिया ॥९०॥</p>
<p>
	ही एक तुमचीच कृपा मोठी । झाली  मज तुमचे पायांची भेटी । किडा मी तुमचे विष्ठेपोटीं । धन्य मी सृष्टीं तेणेनी” ॥९१॥</p>
<p>
	काय बबांची ही लीनता । नम्रपणाची ही हौस चित्ता । काय ही उच्च निरभिमानता । शालीनता ही तैशीच ॥९२॥</p>
<p>
	वरील हे बाबांचे उद्नार । खरे म्हनूनि केले कीं सादर । कोणास वाटेल हा अनादर । तरी मी पदर पसरितों ॥९३॥</p>
<p>
	विटाळ झाला असेल वाचे । पापही टाळावया श्रवणाचें । आवर्तन करूं साईनामाचें । दोष सकळांचे जातील ॥९४॥</p>
<p>
	जन्मोजन्मींच्या आमुच्या तपा । फळ ती केवळ साईकृपा । तृषार्तासी जैसी प्रपा । तैसी अपार सुखदाती  ॥९५॥</p>
<p>
	जिव्हाद्वारा रस चाखिती । ऐसे समस्तां जरी भासती । परी ते चाखिलें हें नेणती । रसस्फूर्ति न रसनेसी ॥९६॥</p>
<p>
	जयासी नाहीं विषयस्फूर्ति । कैसे तरी ते विषय सेवितो । विषय जयांच्या इंद्रियां न शिवती । ते काय गुंतती विषयांत ॥९७॥</p>
<p>
	नयनद्वारें अवलोकिती । पदार्थ जे जे येतील पुढीती । परी ते अवलोकिले नेणती । स्फूर्ति देखती तेथ ना ॥९८॥</p>
<p>
	जैसी हनुमंताची गर्भकास । गोचर एक मातेस कीं रामास । मग तयाचे ब्रम्हाचर्यास । तुलना कवणास करवेल ॥९९॥</p>
<p>
	येथें माते न लिंगावलोकन । इतरांचें तैं काय कथन । बाबांचें ब्रम्हाचर्यही परम कठीण । पूर्णपण तें अपूर्व ॥१००॥</p>
<p>
	कांसे कौपीन लंगोटी । लिंग अजागलस्तन - कोटी । केवळ मूत्रविसर्गपरिपाटी । अवयवां पोटीं अवयव ॥१०१॥</p>
<p>
	ऐसी - रज - तमादि गुणां । सवें इंद्रियें खिळिलीं ठाणा । जरी लौकिकी कर्तेपणा । संगा कोणा नातळती ॥१०३॥</p>
<p>
	नि:संग चिन्मात्र आत्माराम । काम क्रोधां विश्रामधाम । बाबा सदैव निष्काम । अवाप्तकाम पूर्णत्वें ॥१०४॥</p>
<p>
	ऐसी तयांची मुक्तस्थिती । विषयही जयांस ब्रम्हा होती । पुण्यपापाचिया परती । पूर्ण - निवृत्तिस्थान तें ॥१०५॥</p>
<p>
	नानावल्लीनें ऊठ म्हणतां । गादी सोडून झाला जो परता । जया ठायीं देहाभिमानता । अथवा विषमता स्वप्नीं ना ॥१०६॥</p>
<p>
	इहलोकीं न प्राप्तव्य कांहीं । साध्य परलोकींही उरलें नाहीं । ऐसा हा केवळ लोकानुग्रही । संत ये महीं अवतरला ॥१०७॥</p>
<p>
	ऐसे हे संत करुणाघन । अवतारा येण्याचें प्रयोजन । परानुग्रहावीण ना आन । कृपाळू पूर्ण परहितीं ॥१०८॥</p>
<p>
	ह्रदय यांचें जैसें लोणी । अतीव मृदु म्हणती कोणी । परी संत द्रवतील पर - तापणीं । निजतापेंच पाझरण लोणिया ॥१०९॥</p>
<p>
	कफनी ठिघळ्यांची जयाचें वसन । तरट जयाचें आसनास्तरण । वृत्तिशून्य जयाचें मन । रौप्यसिंहासन काय त्या ॥११०॥</p>
<p>
	पाहोनि भक्तभावाकडे । तयास जरी गमलें तें सांकडें । तरीं ते लोटितां पाठीकडे । लक्षही तिकडे देती ना ॥१११॥</p>
<p>
	बाबा शिरडीसरोवरींचें कमळ । भक्त सेविती परिमळ । अभागी भेकांचे वांटयास चिखल । सर्व काळ कालविती ॥११२॥</p>
<p>
	कोणा न सांगे आसन । प्राणापान वा इंद्रियदमन । मंत्र तंत्र वा यंत्र - भजन । फुंकणें कान तेंही ना ॥११३॥</p>
<p>
	लौकिकीं दिसती लोकाचारी । परी अंतरींची आणिकपरी । अत्यंत दक्ष व्यवहारीं । न ये कुसरी दुजयातें ॥११४॥</p>
<p>
	भक्तार्थ धरिती आकार । तदर्थचि तयांचे विकार । हे संतांचे लौकिकाचार । जाणा साचार सकळिक ॥११५॥</p>
<p>
	साई महाराज संतनिधान । केवळ शुद्ध परमानंद - स्थान । तया माझें साष्टांग वंदन । निरभिमान निर्लेप ॥११६॥</p>
<p>
	महत्पुण्यपावन तें स्थान । जेथें महाराज आले चालून । गांठीं पूर्ण संचित असल्यावीण । ऐसें निधान दुर्लभ ॥११७॥</p>
<p>
	‘शुद्ध बीजाचिया पोटीं । येती फळें रसाळ गोमटीं’ । या प्रसिद्ध उक्तीची कसवटी । घेतली शिरडींत लोकांनीं ॥११८॥</p>
<p>
	तो ना हिंदू ना यवन । तया ना आश्रम ना वर्ण । परी करी समूळ निकृंतन । नि:संतान भवाचें ॥११९॥</p>
<p>
	अनंत अपार जैसें गगन । तैसें वाबांचें चरित्र गहन । तयांचेम तें यथार्थ आकलन । तयांवीण कोण करी ॥१२०॥</p>
<p>
	चित्ताचें काम चिंतन । क्षण न उगलें चिंतनावीण । विषय दिल्या त्या विषयचिंतन । गुरुचिंतन त्या गुरु दिधल्या ॥१२१॥</p>
<p>
	तरी सर्वैद्रियांचे करुनि कान । ऐकिलेंत जें गुरुमहिमान । तें सहज स्मरण सहज भजन । सहज कीर्तन साईचें ॥१२२॥</p>
<p>
	पंचाग्निसाधन यज्ञयाग । मंत्र - तंत्र - अष्टांगयोग । द्विजांसीच हे शक्य प्रयोग । काय उपयोग इतरांना ॥१२३॥</p>
<p>
	तैशा नव्हेत संतकथा । सकलां लाविती त्या सत्पथा । भवभयाची हरिती व्यथा । निज परमार्था प्रकटिती ॥१२४॥</p>
<p>
	संतकथा श्रवण मनन । परिशीलन वा निदिध्यासन । द्विज शूद्र वा स्त्रीजन । येणे पावन होतात ॥१२५॥</p>
<p>
	प्रेमचि नाहीं जयाचे ठायीं । ऐसा मानव । होणेंचि नाहीं । कोणाचें कांहीं कोणाचें कांहीं । अधिष्ठान पाहीं आनान ॥१२६॥</p>
<p>
	कोणाचे प्रेमाची जागा संतती । कोणाची ती धनमानसंपत्ति । देह गेह लौकिक कीर्ति । विद्याप्राप्ति कोणाची ॥१२७॥</p>
<p>
	प्रेम जें विषयीं वाटतें । तें सर्व जै एकवटतें । हरिचरणमुशींत जें आटतें । तैं तें प्रकटतें भक्तिरूपें ॥१२८॥</p>
<p>
	म्हणवूनि गेह प्रपंचाला सोपा । चित्त साईचरणीं समर्पा । मग तयाची होईल कृपा । उपाय सोपा हा एक ॥१२९॥</p>
<p>
	ऐसियाही अल्प साधनीं । महल्लाभ हो घडतो जनीं । तरी या श्रेयसंपादनीं । औदासीन्य कैसें पां ॥१३०॥</p>
<p>
	सहजीं श्रोतियां अंतरीं । आशंकेची उठेल लहरी । महल्लाभ अल्पोपायीं तरी । नादरिती कां बहुजन ॥१३१॥</p>
<p>
	आहे यासी एकचि कारण । लालसाही नुपजे भगवत्कृपेवीण । तोच भगवंत जैं सुप्रसन्न । प्रकटे श्रवणलालसाअ ॥१३२॥</p>
<p>
	तरी साईस जाई शरण । कृपा करील नारायण । श्रवणलालसेचें होईल जनन । स्वल्पसाधन हातीं ये ॥१३३॥</p>
<p>
	गुरुकथेचि सत्संगति । धरा उगवा संसारगुंती । यांतचि तुमचें सार्थक निश्चितीं । विकल्प चित्तीं न धरावा ॥१३४॥</p>
<p>
	सोडूनियां लाख चतुराई । स्मरा निरंतर ‘साई साई’ । ‘बेडा पार’ होईल पाहीं । संदेह कांहीं न धरावा ॥१३५॥</p>
<p>
	हे नाहींत माझे बोल । असती साईमुखींचे सखोल । मानूं नका हो हे फोल । याचें तें तोल करूं नका ॥१३६॥</p>
<p>
	कुसंग तेथूनि सर्व खोटा । तो महादु:खांचा वसौटा । नकळतचि नेईल अव्हांटा । देईल फांटा सौख्याला ॥१३७॥</p>
<p>
	एका साईनाथावांचून । अथवा एका सद्नुरूवीण । कुसंगाचें परिमार्जन । करील आन कवण कीं ॥१३८॥</p>
<p>
	कळवळ्याचें गुरुमुखांतून । निघालें जें गुरुवचन । करा करा भक्त हो जतन । कुसंगनिरसन होईल ॥१३९॥</p>
<p>
	सृष्टिजात डोळां भरतें । सौंदर्यलोलुप मन तैं रमतें । तीच द्दष्टी जैं मागें परते । तैं तीच रते सत्संगीं ॥१४०॥</p>
<p>
	इतुकें सत्संगाचें महिमान । समूळ निर्दळी देहाभिमान । म्हणूनि सत्संगापरतें साधन । पाहतां आन असेना ॥१४१॥</p>
<p>
	धरावा नित्य सत्संग । इतर संग नित्य सव्यंग । सत्संग एकचि निर्व्यंग । अंग प्रत्यंग निर्मळ ॥१४२॥</p>
<p>
	सत्संग तोडी देहासक्ति । एवढी बलवत्तर तयाची शक्ति । एथ एकदां जडल्या भक्ति । संसारनिर्मुक्ति रोकडी ॥१४३॥</p>
<p>
	भाग्यें घडल्या सत्संग । सहज उपदेश यथासांग । तत्क्षणीं विरे कुसंग । रमतें नि:संग मन तेथें ॥१४४॥</p>
<p>
	व्हावया परमार्थीं रिघाव । विषयविरक्ति एक उपाव । न धरितां सत्संगाची हाव । स्वरूपठाव लागेना ॥१४५॥</p>
<p>
	सुखापाठीं येतें दु:ख । दु:खापाठींच येतें सुख । सुखासी जीव सदा सन्मुख । तोचि विन्मुख दु:खासी ॥१४६॥</p>
<p>
	व्हा सन्मुख वा विन्मुख । होणार होतें आवश्यक । या उभय भोगांचा मोचक । संगचि एक संतांचा ॥४७॥</p>
<p>
	सत्संगेम नासे देहाभिमान । सत्संगें तुटे जन्ममरण । सत्संगें भेटे चैतन्यघन । ग्रंथिविच्छेदन तात्काळ ॥१४८॥</p>
<p>
	पावावया उत्तम गति । पावन एक संतसंगति  । शरण जातां अनन्यगति । निज विश्रांती आंदणी ॥१४९॥</p>
<p>
	नाहीं नाम नाहीं नमन । नाहीं भाव नाहीं भजन । तया कराया निजपरायण । संत महाजन अवतार ॥१५०॥</p>
<p>
	गंगा भागीरथी गोदा । कृष्णा वेण्या कावेरी नर्मदा । याही वांच्छिती साधूंच्या पदा । येतील कदा स्नानार्थ ॥१५१॥</p>
<p>
	जगाचीं पातकें स्वयें क्षालिति । परी तयांची पापनिवृत्ति । विना संतपदप्राप्ति । होईना ती कदापि ॥१५२॥</p>
<p>
	जन्मांतरींचें भाग्य उदेलें । महाराज साईंचे चरण जोडले । जन्ममरण ठायींच ठेलें । भवभय हरलें समस्त ॥१५३॥</p>
<p>
	आतां संत श्रोतेजन । केल्या श्रवणाचें करूं मनन । विसांवा घेऊं आपण । पुढील निरूपण पुढाकार ॥१५४॥</p>
<p>
	हेमाड साईंस शरण । मी तों तयांच्या पायींची वहाण । करीत राहीन कथानिरूपण । होईन सुखसंपन्न तितुकेनी ॥१५५॥</p>
<p>
	काय तें मनोहर गोमटें ध्यान । मशिदीचे कडेवर राहून । करीत एकेकां उदीप्रदान । भक्तकल्याणहेतूनें ॥१५६॥</p>
<p>
	संसार मिथ्या जयाचें ज्ञान । ब्रम्हानंदीं अखंड लीन । मन सदैव उफललें सुमन । साष्टांग नमन तयातें ॥१५७॥</p>
<p>
	डोळां जैं घाली ज्ञानांजन । ठायींच पाडी निजनिधान । ऐसें जया साईचें महिमान । साष्टांग वंदन तयातें ॥१५८॥</p>
<p>
	पुढील अध्याय याहूनि बरा । अंतरीं शिरतां श्रवणद्वारा । करील पुनीत सच्चरिते । श्रीसाईसमर्थमहिमानं नाम दशमो‍ऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-11-in-marathi-122042300051_1.html" target="_blank">साईसच्चरित - अध्याय ११</a></strong></p>
</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 22 Apr 2022 15:06:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 23 Apr 2022 16:07:10 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ९]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-9-122042200046_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: । श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो  नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
आतां पूर्वकथानुसंधान । न होतां वाबांचें अनुज्ञान । भक्त निजठाया जातां परतोन । कैसे ते शीण पावत ॥१॥
तैसीच बाबांची ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 9" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/22/full/1650620087-4658.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra chapter 9" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: । श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो  नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	आतां पूर्वकथानुसंधान । न होतां वाबांचें अनुज्ञान । भक्त निजठाया जातां परतोन । कैसे ते शीण पावत ॥१॥</p>
<p>
	तैसीच बाबांची भैक्ष्यवृत्ति । आनिर्वाणान्त जी सेविली होती । ती पंचसूनादि पापनिवृत्ति । कल्याणार्थीं भक्तांच्या ॥२॥</p>
<p>
	तैसेंचि आब्रह्मस्थावरान्त । साईचि सर्वत्र अनुस्यूत । साईचि होऊनि कृपावंत । भूतीं भगवंत हें ठसवी ॥३॥</p>
<p>
	म्हणवूनि सकळ श्रोतेजन । प्रार्थितों मी श्रवणावधान । सादर परिसतां या कथा पावन ॥ कृतकल्याण पावाल ॥४॥</p>
<p>
	शिरडीच्या यात्रेचें हें एक लक्षण । बाबांची अनुज्ञा झाल्याविण । यात्रेकरू षरततां जाण । करी तो आमंत्रण विन्घांतें ॥५॥</p>
<p>
	तीच एकदां आज्ञा होतां । शिरडींत येईना क्षण एक वसतां वसतां चढलेंचि विन्घ माथां । अनुभव समसतां आहेच ॥६॥</p>
<p>
	आज्ञेबाहेर जे जे वागले । तयांचे वाटेंत हाल झाले । कितीएकांस चोरांनीं लुटिलें । स्मरण राहिलें जन्माचें ॥७॥</p>
<p>
	भाकर तुकडा खाऊनि जा म्हणतां । कोणी उपाशीच घाईनें निघतां । गाडी न मिळतां उपाशीं रखडतां । अनेक भक्तांहीं पाहिलें ॥८॥</p>
<p>
	एकदां पाटील तात्या कोते । कोपरगांवास चालले होते । आठवडयाचा बाजार तेथें । जाहले येते मशीदीं ॥९॥</p>
<p>
	तांगा ठेविला उभा करून । घेतलें बाबांचें दर्शन । चरण वंदिले येतों म्हणून । हें आज्ञापन - मिष केलें ॥१०॥</p>
<p>
	भक्त करोत टाळाटाळ । बावा जाणत वेळ अवेळ । पाहोनि तात्या उतावीळ । म्हणती अंमळ थांबावें ॥११॥</p>
<p>
	राहूं दे होईल बाजार । जाऊं नको गांवाबाहेर । परी पाहूनि तात्यांचा आग्रह फार । म्हणाले बरोबर शामा ने ॥१२॥</p>
<p>
	काय शाम्याचें आहे कारण । केलें तया आज्ञेचें अवगणन । बैसले तात्या तांग्यांत जाऊन । बाजारालागून चालले ॥१३॥</p>
<p>
	दोहों घोडयांत एक चपळ । रुपये तीनशेंचें पाठवळ । साऊळ विहीर येतां जवळ । अति उच्छृंखल चालले ॥१४॥</p>
<p>
	कधीं न खाणारा चाबूक फटका । बाजारा जाणारा न भरतां घटका । घोडा पडला कंबरेंत लटका । भरला टचका एकाएकीं ॥१५॥</p>
<p>
	कैंचा बाजार कैंचें काय । तात्यांस आठवली साईमाय । वेळीं ऐकतों टळता अपाय । नाहीं उपाय गत गोष्टी ॥१६॥</p>
<p>
	ऐसेंच आणिक एकदां घडलें । तात्या कोल्हार गांवा निघाले । तांगा जोडून पुसाया आले । वंदिलीं पाउलें बाबांचीं ॥१७॥</p>
<p>
	आतां जाऊन येतों म्हणाले । पूर्णानुमोदन नव्हतें मिळालें । तथापि तात्या तैसेच निघाले । परिसा वर्तलें काय पुढें ॥१८॥</p>
<p>
	तांगा आधींच तो भिरक्याचा । बेफाम भरर्धांव उधळला साचा । पाही न वाट खळगे खाचा । जिवावरचा प्रसंग ॥१९॥</p>
<p>
	असो तो साईकृपेनें टळला । तांगा बाभुळीवर आदळला । बरें झालें तेथेंच मोडला । दगा वटावला पुढील ॥२०॥</p>
<p>
	ऐसाचि एक मुंबापुरस्थ । आंग्लभौम थोर गृहस्थ । मनीं धनोनि कांहीं हेत । आला दर्शनार्थ साईंच्या ॥२१॥</p>
<p>
	होता चांदोरकरांचा वशिला । पत्र लाविलें माधवरावाला । तंबू एक मागून घेतला । निवास लाधला सुखाचा ॥२२॥</p>
<p>
	वाबांचिया इच्छेविरुद्ध । म्हणेल कोणी चढेन मशीद । परतेन दर्शन घेऊनि स्वच्छंद । अशक्य हें प्रसिद्ध सर्वत्र ॥२३॥</p>
<p>
	यत्न केला तीन वेळां । मशिदीसी चढावयाला । परी तो सर्व निर्फळ गेला । पाहुणा हिरमुसला मनांत ॥२४॥</p>
<p>
	इच्छा होती तयाचे मनीं । मशिदींत वरती जाऊनी । वंदावें बाबांस गुडघे टेकुनी । हस्त चुंबूनि बैसावें ॥२५॥</p>
<p>
	इच्छा तयाची ऐसी । बाबा न येऊं देत तयासी । मशिदींत बैसावयासी । आपुलेपाशीं तेधवां ॥२६॥</p>
<p>
	खालींच सभामंडपीं असावें । तेथेंचि पाहिजे तरी बैसावें । दर्शन घेणें तेथूनि घ्यावें । परी न यावें वर तेणें ॥२७॥</p>
<p>
	असो पुढें तो निघे जावया । अंगणीं आला निरोप घ्यावया । जाशील उदयीक म्हणती तया । घाई कासया ही इतुकी ॥२८॥</p>
<p>
	लोकांहीं बहुत कथिलें । नानापरी तया विनविलें । परवानगी न होतां जो गेले । बहु पस्तावले म्हणवूनि ॥२९॥</p>
<p>
	होणारापुढें कांहीं न चले । नाहीं तयाच्या मना तें पटलें । परवानगीविरहित निघाले । हाल जाहले मार्गांत ॥३०॥</p>
<p>
	गाडी आरंभीं नीट चालली । पुढें घोडयांनीं वाट सोडीली । साऊळ विहीर मात्र ओलांडिली । तों पुढें आली बायसिकल ॥३१॥</p>
<p>
	गृहस्थ होता मागें बैसला । पुढें तांगा एकाकीं चमकला । तोल जाऊनि तैसाच कलथला । मागें उलंडला मार्गांत ॥३२॥</p>
<p>
	महत्प्रयत्नें तांगा थांबविला । गृहस्थ घसरत घसरत गेला । मग उचलूनि तांग्यांत बैसविला । तांगा हांकिला पुढारा ॥३३॥</p>
<p>
	शिरडी राहिली एकीकडे । मुंबई राहिली दुसरीकडे । कोपरगांवीं आस्पीटल जिकडे । तांगा मग तिकडे घेतला ॥३४॥</p>
<p>
	असो कांहीं दिवस तेथ । गृहस्थ  पश्चात्तापव्यथित । होते अवज्ञा - प्रायश्चित्त । भोक्तृत्व भोगीत पडले ते ॥३५॥</p>
<p>
	ऐसे असंख्य अनुभव आले । लोक सहजीं शंकूं लागले । बाबांची आज्ञा पाळूं सरले । करूं न धजले अव्हेर ॥३६॥</p>
<p>
	कोण्या गाडीचें चक्र निसटलें । कोणाचें तें घोडें थकलें । गाडया चुलले उपाशी राहिले । चुरमुरे फांकिले कितीएकीं ॥३७॥</p>
<p>
	तीच आज्ञा जयांनीं वंदिली । अवेळींही गाडी साधिली । मुशाफरीही सुखाची झाली । आठव राहिली जन्माची ॥३८॥</p>
<p>
	वर्षानुवर्षें भैक्ष्यवृत्ति । रुचावी कां बाबांप्रती । ऐसें आलिया कोणाचे चित्तीं । शंकानिवृत्ती अवधारा ॥३९॥</p>
<p>
	पाहूं जातां बाबांचें आचरित । भिक्षाचि मागणें तयांतें उचित । आनंद देई साधी निजहित । साधी गृहस्थकर्तव्य ॥४०॥</p>
<p>
	काय - वाचा - चित्त - वित्त । साईपदीं जो समर्पीत । ऐसा जो साईंचा अनन्यभक्त । आवडे अत्यंत साईस ॥४१॥</p>
<p>
	जें जें अन्न पाके आश्रमीं । स्वामी तयाचा गृहस्थाश्रमीं । यती आणि ब्रम्हाचर्याश्रमी । यांसी होमी प्रथमता ॥४२॥</p>
<p>
	न देतां आधीं तयां अवदान । स्वयें गृहस्थ जैं करी सेवन । आचरूं लागे चांद्रायण । शास्त्रनिर्बधन त्रिशुद्धी ॥४३॥</p>
<p>
	यती ब्रम्हाचारी यांप्रती । निषेधिलीसे पाकनिष्पत्ति । ते करूं जातां चांद्रायण माथीं । आदळे निश्चितीं तयांच्या ॥४४॥</p>
<p>
	म्हणवूनि तयांची उदरपूर्ति । शास्त्रें निरविली गृहस्थांवरती । यती कधींही न उद्यम करिती । कराया भरती पोटाची ॥४५॥</p>
<p>
	बाबा नव्हेत गृहस्थ । किंवा नव्हेत वानप्रस्थ । केवळ ब्रम्हाचारी बाळ संन्यस्त । भिक्षाचि प्रशस्त प्रशस्त तयांसी ॥४६॥</p>
<p>
	अखिल विश्व माझें घर । मीच वासुदेव विश्वंभर । मीच परब्रम्हा अक्षर । हा द्दढबोध निर्धार जयाचा ॥४७॥</p>
<p>
	भिक्षान्नाचा पूर्ण अधिकार । तया विश्वकुटुंबियासचि साचार । इतरांचे विडंबनप्रकार । चव्हाटयावर पहावे ॥४८॥</p>
<p>
	आधीं त्यजावी पुत्रेषणा । मग वित्तेषणा लोकेषणा । जो एषणात्रय - निर्मुक्त जाणा । तेणेंचि भिक्षाशना इच्छावें ॥४९॥</p>
<p>
	नातरी ‘भिक्षापात्र अवलंबणें । जळो जिणें लाजिरवाणें’ । महाराज तुकोबाचें गाणें । अर्थाविणें हें नि:सार ॥५०॥</p>
<p>
	साई समर्थ महान्‌ सिद्ध । लहान थोरां हें तों प्रसिद्ध । परी आम्हीचि सदा आशाबद्ध । असन्नद्ध सत्पदीं ॥५१॥</p>
<p>
	पंचमहायज्ञावीण । गृहस्थास जें निंद्य जेवण । तें शिरडींत रोज पवित्र भोजन । स्वयें करवून घे साई ॥५२॥</p>
<p>
	प्रत्यहीं पांच घरें जाई । अतिथियज्ञाचें स्मरण देई । भग्यवान हा लाभ घेई । आपुलें गेहीं बैसून ॥५३॥</p>
<p>
	सारूनियां जे पंचमहायज्ञ । अवशिष्टान्न करिती सेवन । अज्ञात ‘पंचसूना’ पापगहन । तयांचें निर्दहन तेणेनि ॥५४॥</p>
<p>
	कंडणी चुल्ली पेषणी । उदकुंभी आणि मार्जनी । हीं पंचसूना या नांवांनीं । आहेत जनीं प्रसिद्ध ॥५५॥</p>
<p>
	उखळीं धान्यदाणा घालूनी । वरी मुसळाचे घाव हाणुनी । तूस कोंडा टाकिती काढुनी । होते न जाणुनी जीवहिंसा ॥५६॥</p>
<p>
	पडेना तें धान्य पचनीं । प्रयोग इतुका जाहल्यावांचुनी । म्हणोनि हें पंचसूनाग्रणी । पाप ‘कंडणी’ या नांव ॥५७॥</p>
<p>
	चुलीस सर्पण लांकडें लाविलीं । तेणें पाकनिष्पत्ति झाली । तेथेंही नकळत जीवहत्या घडली । त्या नांव ‘चुल्ली’ पाप दुजें ॥५८॥</p>
<p>
	घेऊनि जातें वा जातणी । पिष्ट करितां धान्याचें कोणी । न कळत असंख्य जीवांची हानी । होते त्या ‘पेषणी’ हें नांव ॥५९॥</p>
<p>
	वापी कूप तडागामधुनी । कुंभ घेऊनि आणिती पाणी । किंवा नरनारी धुतां धुणीं । असंख्या प्राणी मरतात ॥६०॥</p>
<p>
	साधावया कुंभस्वच्छते । घांसितां वा उटितां हातें । अनिच्छा जी हत्या घडते । पाप चौथें ‘उदकुंभी’ ॥६१॥</p>
<p>
	तैसेंचि शीतोष्ण उदकें स्नान । करूं जातां सडा - संमार्जन । जीवहत्या घडे जी दारुण । ‘मार्जनी’ जण त्या नांव ॥६२॥</p>
<p>
	या पंच पापनिर्मुक्तीस । पंचमहायज्ञ गृहस्थास । होतां पंचसूनानिरास । चित्तशुद्धीस लाधे तो ॥६३॥</p>
<p>
	चित्तशुद्धीचें हेंचि बळ । शुद्धज्ञान उपजे सोज्ज्वळ । ज्ञानानंतर मोक्ष अढळ । पावती सफळ भाग्याचे ॥६४॥</p>
<p>
	असो हें साईंचें भैक्ष्यव्रत । लिहितां लिहितां वाढला ग्रंथ । परिसा एक कथा अन्वर्थ । अध्याय समाप्त करूं मग ॥६५॥</p>
<p>
	प्रेम असावें मात्र चित्ता । कोणाही सवें कांहींही धाडितां । जाहली जरी तया विस्मरणता । बाबा न विसरतां मागत ॥६६॥</p>
<p>
	असो भाजी भाकर पेढा । भक्तिभाव असावा गाढा । भेटतां ऐसा भक्त निधडा । साईस उभडा प्रेमाचा ॥६७॥</p>
<p>
	ती एक प्रेमळ भक्ताची कथा । ऐकतां आनंद होईल चित्ता । कोणीही स्वीकृतकार्यीं चुकतां । बाबाचि रस्ता लाविती ॥६८॥</p>
<p>
	ऐशी ही गोड शिक्षणपद्धति । योग्यवेळीं देती जागृति । धन्य भाग्याचे जे हे अनुभविती । आनंदस्थिति अवर्ण्य ॥६९॥</p>
<p>
	भक्तश्रेष्ठ रामचंद्र नाम । वडील जयांचे आत्माराम । तर्खड जयांसी उपनास । विश्रामधाम साई जयां ॥७०॥</p>
<p>
	परी जेणें नित्य संबोधन । तेबाबासाहेब तर्खड जाण । तेणेंचि ही पोथी चालवूं आपण । नाहीं कारण यापरतें ॥७१॥</p>
<p>
	साईप्रेमें उचंबळून । तर्खड जैं जात ओथंबून । करूं लागती अनुभवकथन । काय तें श्रवण सुखकर ॥७२॥</p>
<p>
	काय तयांचें भक्तिविभव । पदोपदीं साईंचे अनुभव । एकामागूनि एक अभिनव । सरसाविर्गाव जैं कथिती ॥७३॥</p>
<p>
	बाबासाहेब अतुल प्रेमी । साईंची आलेख्य प्रतिमा धामीं । भव्य चंदनी देव्हारा नामी । पूजनकामी त्रिकाळ ॥७४॥</p>
<p>
	तर्खड मोठे पुण्यवान । पुत्रही पोटीं भक्तिमान । साईस नैवेद्य समर्पिल्यावीण । करीना अन्नग्रहण तो ॥७५॥</p>
<p>
	करूनियां प्रात:स्नान । कायावाचामनेंकरून । करी नित्य छवीचें पूजन । नैवेद्य समर्पण भक्तीनें ॥७६॥</p>
<p>
	हा तयाचा नित्य क्रम । असतां चालला अविश्रम । जाहला सफल परिश्रम । अनुभव अनुत्तम लाधला ॥७७॥</p>
<p>
	माताही साईंची परम भक्त । शिरडीस जाऊं झाली उत्सुक । मुलानें मार्गांत तिच्या समवेत । असावें हा हेत वडिलांचा ॥७८॥</p>
<p>
	इच्छा तियेसी शिरडीस जावें । समर्थ श्रींचें दर्शन घ्यावें । तेथेंचि कांहीं दिवस क्रमावे । चरण सेवावे प्रत्यक्ष ॥७९॥</p>
<p>
	ऐसा जरी वडिलांचा हेत । जाणें नव्हतें मुलाचे मनांत । कोणी मागें पूजा घरांत । करील नियमित ही चिंता ॥८०॥</p>
<p>
	वडील प्रार्थनासमाजिष्ट । तयांस मूर्तिपूजेचे कष्ट । देणें कैसें होईल इष्ट । कोडें हें प्रकृष्ट मुलाला ॥८१॥</p>
<p>
	तरी जाणोनि तयांचें मनोगत । चिरंजीव प्रयाणीं उद्यत । प्रेमपुर:सर वडिलांस विनवीत । काय ती मात परिसावी ॥८२॥</p>
<p>
	साईंस नैवेद्य केल्याविणें । घरीं कोणींही अन्न न सेवणें । हें इतुकें मान्य केलियाविणें । घडेना जाणें निश्चिंत ॥८३॥</p>
<p>
	हें मुलाचें नित्यव्रत । वडिलांस होतें आधींत अवगत । ‘जा मी करीन नैवेद्य नित । राहीं तूं निश्चिंत’ वदती ते ॥८४॥</p>
<p>
	‘आधीं न करितां साईसमर्पण । न करूं कोणीही अन्नग्रहण । हें माझें वचन मानीं प्रमाण । न करीं अनमान जा स्वस्थ’ ॥८५॥</p>
<p>
	प्राप्त होतां हेझं आश्वासन । मुलगा शिरडीस करी प्रयाण । पुढें उगवतां दुसरा दिन । करिती पूजन तर्खड स्वयें ॥८६॥</p>
<p>
	वाबासाहेब तर्खडांनीं । पूजनारंभींच दुसरे दिनीं । आलेख्यप्रतिमेसन्मुख येऊनी । लोटांगणीं प्रार्थियेलें ॥८७॥</p>
<p>
	मुलगा जैसी पूजा करी । तैसीच बाबा माझी चाकरी । असावी कवाईत न घडावी मजकरीं । प्रेम अंतरीं द्या मातें ॥८८॥</p>
<p>
	ब्राम्हामुहूर्तीं स्नान करून । ऐसें प्रार्थनापूर्वक पूजन । तर्खड करूं लागले प्रतिदिन । नैवेद्यसमर्पणसमवेत ॥८९॥</p>
<p>
	नैवेद्यार्थ शर्कराखंड । बाबासाहेब अर्पीत अखंड । ऐसा नियम चालला उदंड । पडला त्या खंड एकदिनीं ॥९०॥</p>
<p>
	व्यवहारव्यापृत अंत:करण । तर्खडांस नाहीं राहिलें स्मरण । होऊनि गेलें सर्वांचें भोजन । नैवेद्यावीण एक दिनीं ॥९१॥</p>
<p>
	एका मोठया गिरणीवरी । तर्खडसाहेब मुख्याधिकारी । तदर्थ प्रात:काळचे प्रहरीं । जाणें बाहेरी नित्य त्यां ॥९२॥</p>
<p>
	पुढें मग दुपार भरतां । बाहेरून परत येतां । पूर्वनिवेदित शर्करा प्रसादता । भोजनीं बैसतां पावत ते ॥९३॥</p>
<p>
	ऐसा नियम चालतां । पडलें एकदां विस्मरण चित्ता । राहिली शर्कराखंडनिवेदनता । प्रसादग्रहणता अंतरली ॥९४॥</p>
<p>
	करावया बैसतां भोजन । शर्कराशेष स्वैंपाकीण । पात्रीं वाढी अनुदिन । तीच कीं जाण अन्नशुद्धि ॥९५॥</p>
<p>
	परी ते दिवशीं पूजासमयीं । होऊनि कांहींतरी घाई । शर्करा नैवेद्य राहूनि जाई । प्रसाद ठायीं पडेना ॥९६॥</p>
<p>
	त्याच वेळीं पात्रावरून । तर्खड अनुतापयुक्त होऊन । साईप्रतिमा अभिवंदून । साश्रुनयन बोलत ॥९७॥</p>
<p>
	बाबा ही काय माया दाविली । कैसी मजला भूल पाडिली । कवाईतचि मजकरीं घडविली । क्षमा वहिली मज करा ॥९८॥</p>
<p>
	नव्हे भूल हें महापाप । पावलों मी महदनुताप । चुकलों चुकलों मी निस्त्रप । व्हावें मज सकृप महाराजा ॥९९॥</p>
<p>
	लोटांगण घातलें छबीचे चरणा । सखेद गहिंवरले अंत:करणा । म्हणती महाराज दयाधना । करीं गा करुणा मजवरी ॥१००॥</p>
<p>
	ऐसें वदत मुलास पत्र । धाडिलें होऊनि अति लाचार । ‘घडला मजकडूनि प्रमाद थोर । क्षमा कर गा’ प्रार्थावें ॥१०१॥</p>
<p>
	‘दया करा या अनन्यशरणा’ । ऐसी साईंसी भाकावी करुणा । अभयकर आणि अभयवचना । मागावें दीना दासातें ॥१०२॥</p>
<p>
	वांद्रें ग्रामीं हा प्रकार । शिरडी शंभर कोस दूर । तात्काळ तेथें पावली खबर । परिसा तैं उद्नार बाबांचे ॥१०३॥</p>
<p>
	भूत - भविष्यवर्तमान । देशकालाद्यनवच्छिन्न । महाराजांसी त्रिकालज्ञान । पहा तें प्रमाण प्रत्यक्ष ॥१०४॥</p>
<p>
	इकडे मुलगा शिरडीस असतां । तेच दिनीं ते समयीं जी वार्ता । घडली साईस वंदूं जातां । श्रोतां सावधानता परिसावी ॥१०५॥</p>
<p>
	मुलगा येऊनि अति उल्हासता । आईसमवेत चरण वंदितां । साई जें आईस वदले तें परिसतां । पावला विस्मितता अत्यंत ॥१०६॥</p>
<p>
	“काय करावें आई आज । गेलों मी वांद्यास जैसा रोज । नाहीं खावया प्यावया पेज । उपाशी मज यावें लागलें ॥१०७॥</p>
<p>
	कैसा पहा ऋणानुबंध । कवाड होतें जरी बंद । तरी मी प्रवेशलों स्वच्छंद । कोण प्रतिबंध मज करी ॥१०८॥</p>
<p>
	मालक नाहीं मिळाला घरीं । आंतडीं माझीं कलळलीं भारी । तैसाचि मी अन्नावीण माघारी । भर दुपारीं परतलों” ॥१०९॥</p>
<p>
	ऐसे हे बोल जेव्हां परिसिले । चिरंजीवांनीं तात्काळ ताडिलें । आपुले वडील वहुधा विसरले । दावाया चुकले नैवेद्य ॥११०॥</p>
<p>
	मुलगा बाबांसी करी विनंती । मजला जाऊं द्या घराप्रती । बाबा तयास जाऊं न देती । तेथेंचि घेती ते पूजा  ॥१११॥</p>
<p>
	त्याच दिवशीं शिरडीहून । धाडिलें सविस्तर पत्र लिहून । वितळलें वडिलांचें अंत:करण । पत्र तें वाचून पाहतां ॥११२॥</p>
<p>
	इकडील पत्र तिकडे पावलें । मुलालाही आश्चर्य वाटलें । तयाच्याही नयनीं दाटले । अश्रु लागले वहावया ॥११३॥</p>
<p>
	पहा कैसा हा साईंचा खेळ  । कैसें न प्रेम उचंबळेल । ऐसा कोण पाषाण असेल । जो न द्रवेल येणेनी ॥११४॥</p>
<p>
	याच मुलाची प्रेमळ आई । शिरडीस असतां एके समयीं । करीत अनुग्रह बाबा साई । ती नवलाई परिसिजे ॥११५॥</p>
<p>
	असतां तेथें भोजनागारीं । पात्रें वाढूनि झाली तयारी । इतुक्यांत एक श्वान द्वारीं । भुकेलें दुपारीं पातलें ॥११६॥</p>
<p>
	भाकर होती जी पात्रावर । श्वानास बाई जों घाली चतकुर । तोंएक चिखलांत माखला सूकर । तेथेंचि क्षुधातुर पातला ॥११७॥</p>
<p>
	वार्ता घड्ली स्वाभाविकपणीं । नाहीं बाईच्या ध्यानीं मनीं । परी दुपारीं आपण होऊनी तीच साईंनीं काढिली ॥११८॥</p>
<p>
	दुपारीं भोजन जाहल्यानंतर । मशिदींत नित्यक्रमानुसार । बाई येऊनि बैसतां दूर । साई सादर पूसती ॥११९॥</p>
<p>
	“आई त्वां आज मज जेवूं घातलें । तेणें हें आकंठ पोट भरलें । होते हे प्राण व्याकुळ झाले । ते तृप्त केले गे तुवां ॥१२०॥</p>
<p>
	ऐसेंच करीत जावें नित्य । हेंच कामीं येईल सत्य । मशिदींत बैसून मी असत्य । बोलेन हें त्रिसत्य घडेना ॥१२१॥</p>
<p>
	ऐशीच माझी दया जाणावी । भुकेल्या भाकर आधीं द्यावी । आपुल्या पोटा नंतर खावी । धरावें जीवीं हें नीट” ॥१२२॥</p>
<p>
	काय वदले हें साईसमर्थ । बाईस कांहींच कळेना अर्थ । काय असावा कीं भावार्थ । वाणी निरर्थक नव्हे कदा ॥१२३॥</p>
<p>
	म्हणे मी तुम्हांस वाढीन ऐसें । घडावें तरी मजकरीं कैसें । मीच परतंत्र देऊनि पैसे । मिळेल तैसें खातसें ॥१२४॥</p>
<p>
	“सेवूनियां ती प्रेमाची भाकर । जाहलों मी तृप्त निर्भर । अजून मजला येती ढेकर” । बाबा प्रत्युत्तर करितात ॥१२५॥</p>
<p>
	“तूं जेवूं बैसतां द्वारीं येतां । पोटीं क्षुधेची जया व्याकुलता । त्वां देखिलें ज्या श्वाना अवचिता । मज एकात्मता तयासवें ॥१२६॥</p>
<p>
	तैसें सर्वांगीं माखिला चिखलासी । देखिलें त्वां जया सूकरासी । भुकेनें व्याकुळ झालेलियासी । माझी तयासीं एकात्मतां” ॥१२७॥</p>
<p>
	ऐकोनि बाबांची वचनोक्ति । बाई पावली विस्मय चित्तीं । श्वानें सूकरें मांजरें वावरती । बाबाचि काय तीं समस्त ॥१२८॥</p>
<p>
	“कधीं मी श्वान कधीं सूकर । कधीं मी गाई कधीं मांजर । कधीं मुंगी माशी जलचर । ऐसिया विचरत रूपें मीं ॥१२९॥</p>
<p>
	पाही भूतमात्रीं जो मज । तोचि माझिया प्रीतीचा समज । तरी तूं भेदबुद्धीतें त्यज । ऐसीच भज मजलागीं” ॥१३०॥</p>
<p>
	वचन नव्हे तें परमामृत । सेवूनि बाई सद्नदित । नेत्र आनंदाश्रुभरित । कंठ दाटत बाष्पांही ॥१३१॥</p>
<p>
	ऐसीच आणीक या बाईची । कथा सुंदर प्रेमरसाची । समर्थ साईंच्या भक्तैक्यतेची । एकात्मतेची निजखूण ॥१३२॥</p>
<p>
	घेऊनि कुटुंब मुलें बाळें । एकदां पुरंदरे शिरडीस निघाले । देई ती वृंताकपळें । प्रेमसमेळें तयांसवें ॥१३३॥</p>
<p>
	विनवी तयांचे कुटुंबास । भरीत एकाचें करीं बाबांस । दुजयाच्या तळून काचर्‍या खरपूस । वाढीं बहुवस तयांतें ॥१३४॥</p>
<p>
	बरें म्हणोनि तीं वांगीं घेतलीं । बाई जेव्हां शिरडीस पातली । आरतीपाठीं भोजनवेळीं । घेऊन गेली भरीत ॥१३५॥</p>
<p>
	नित्याप्रमाणें नैवेद्य दावुनी । बाई गेली ताट ठेवुनी । सर्वांचे नैवेद्य गोळा करूनी । बाबा भोजनीं बैसले ॥१३६॥</p>
<p>
	भरिताची चवी चाखितां । लागलें रुचकर वाटिलें समस्तां । काचर्‍या खाव्यासें वाटलें चित्ता । वदती आतां आणा त्या ॥१३७॥</p>
<p>
	निरोप गेला राधाकृष्णीस । बाबा खोळंबले जेवावयास । काचर्‍यांवरी गेलें मानस । करावें काय समजेना ॥१३८॥</p>
<p>
	हंगम नाहीं हा वांग्यांचा । आतां हा पदार्थ होणार कैंचा । शोध पुरंदर्‍यांचे कुटुंबाचा । आणीक भरिताचा चालला ॥१३९॥</p>
<p>
	तिणें आणिलें जें ताट । भरीत हें तों होतें तयांत । असतील तिचिया सामुग्रींत । वांगीं कदाचित वाटलें ॥१४०॥</p>
<p>
	म्हणूनि तिचेपासीं पुसतां । कळली काचर्‍यांची अन्वर्थता । एवढें बाबांचें प्रेम कां त्यांकरितां । चुकलें समस्तां कळून ॥१४१॥</p>
<p>
	बाई म्हणे भरीत झालें । एकाचें दुपारीं अर्पण झालें । काचर्‍या नेईन मागाहून म्हटलें । दुसरें तें चिरिलें तदर्थ ॥१४२॥</p>
<p>
	पुढें ही वांग्यांची समूळ वार्ता । हळू हळू जैं कळली समस्तां । जो तो आश्चर्य करी चित्ता । पाहूनि व्यापकता साईंची ॥१४३॥</p>
<p>
	आणीक एकदां डिसेंवर मासीं । सन एकूणीसशें पंधराचे वर्षीं । याच बाईनें अति प्रेमेंसीं । पेढा बाबांसी पाठविला ॥१४४॥</p>
<p>
	बाळाराम परलोकवासी । क्रियाकर्मांतर करावयासी । मुलास त्याच्या जाणें शिरडीसी । पुसावयासी पातला ॥१४५॥</p>
<p>
	जातों म्हणूनि सांगावयासी । आला मुलगा तर्खडांपाशीं । तयांसवें कांहीं बाबांसी । द्यावें मनासी कुटुंबाच्या ॥१४६॥</p>
<p>
	पेढयावांचून दुसरें कांहीं । पाहूं जातां घरांत नाहीं । आधींच निवेदित पेढा तोही । मुलास घाई जाण्याची ॥१४७॥</p>
<p>
	शिवाय तो मुलगा सुतकी । पेढाही एक उच्छिष्ट शिलकी । तोचि पाठवी तयासवेंचि कीं । साईमुखीं अर्पावया ॥१४८॥</p>
<p>
	म्हणे दुसरें कांहीं नाहीं । हाचि आतां घेऊनि जाईं । प्रेमपुर:सर हाचि देईं । खातील साई आवडीनें ॥१४९॥</p>
<p>
	पेढा गोविंदजीनें नेला । परी तो जेव्हां दर्शनार्थ गेला । पेढा बिर्‍हाडीं विसरूनि राहिला । धीर तैं धरिला बाबांनीं ॥१५०॥</p>
<p>
	पुढें जेव्हां तिसरे प्रहरीं । मुलगा पुनश्च आला दरबारीं । तेव्हां विसरला पूर्वीच्या परी । आला रिक्तकरीं मशिदीस ॥१५१॥</p>
<p>
	“त्वां मजसाठीं काय आणिलें” । बाबांनीं त्यास पुसून पाहिलें । “कांहीं नाहीं” म्हणतां पुसिलें । स्मरण दिधलें लवमात्र ॥१५२॥</p>
<p>
	“तुला कोणीं कांहीं वस्त । दिधली नाहीं का मजप्रीत्यर्थ” “नाहीं” म्हणतां साई समर्थ । प्रश्न स्पष्टार्थ पूसिती ॥१५३॥</p>
<p>
	“अरे घराहून निघतेवेळीं । नाहीं का दिधला तुझियाजवळी । खाऊ आईनें प्रेमसमेळीं” । तेव्हां मग झाली आठवण ॥१५४॥</p>
<p>
	जाहला अति लज्जायमान । कैसें तरी पडलें विस्मरण । अधोवदन क्षमा मागून । चरण वंदून निघाला ॥१५५॥</p>
<p>
	धांवत धांवत विर्‍हाडीं गेला । पेढा आणूनि बाबांस दिधला । हातीं पडतांच मुखीं समर्पिला । भाव संतर्पिला आईचा ॥१५६॥</p>
<p>
	ऐसा हा साई महानुभाव । जया मनीं जैसा भाव । तया तैसा देऊनि अनुभव । भक्तगौरव वाढवी ॥१५७॥</p>
<p>
	आणिक या कथांचें इंगीत । भूतीं सदैव पहावा भगवंत । हेंचि सकलशास्त्रसंमत । हाचि सिद्धांत येथील ॥१५८॥</p>
<p>
	आतां पुढील अध्याय श्रवणीं । कळोनि येईल बाबांची राहाणी । कोठें ते निजत कवण्या ठिकाणीं । सावचित्तपणीं आकर्णिजे ॥१५९॥</p>
<p>
	हेमाड साईपदीं शरण । श्रोतीं आदरें करिजे मनन । झांलिया कथेचें निदिध्यासन । कृतकल्याण पावाल ॥१६०॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । नवमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 22 Apr 2022 15:03:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 22 Apr 2022 15:11:49 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ८]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-8-122042200044_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
मागील अध्यायीं जाहलें  कथन । कैसे साई हिंदू वा यवन । कय त्या शिरडीचें भाग्य गहन । जें निजस्थान बाबांचें ॥१॥
कैसे ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 8" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/22/full/1650619978-5489.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra adhyaay 8" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	मागील अध्यायीं जाहलें  कथन । कैसे साई हिंदू वा यवन । कय त्या शिरडीचें भाग्य गहन । जें निजस्थान बाबांचें ॥१॥</p>
<p>
	कैसे बाबा आरंभीं पोर । पुढें जाहले वेडे फकीर । कैसी बनविली बाग सुंदर । मूळच्या उखर स्थळाची ॥२॥</p>
<p>
	कैसा कालेंकरून पुढाअ । त्याचि जागेवर जाहला वाडा । धोती पोती खंडयोग गाढा । वर्णिला निधडा बाबांचा ॥३॥</p>
<p>
	झिजवूनियां निजकाय । बाबांनीं साहिले कैसे अपाय । भक्तकैवारी साईराय । वर्णूं मी काय तयांतें ॥४॥</p>
<p>
	आतां ऐका नरजन्माचें महिमान । साईंच्या भैक्ष्यवृत्तीचें वर्णन । बायजाबाईंचें संतसेवन । बाबांचें भोजनकौतुक ॥५॥</p>
<p>
	तात्या बाबा म्हाळसापती । तिघे कैसे मशिदीं निजती । कैसे खुशालचंदाचे गृहा जाती । रहात्याप्रती समर्थ ॥६॥</p>
<p>
	प्रत्यहीं उदय प्रत्यहीं अस्त । वर्षोनुवर्षें जाहलीं फस्त । अर्धा जन्म निद्रितावस्थ । उरलाही स्वस्थ  भोगवेना ॥७॥</p>
<p>
	बाळपणीं क्रीडासक्त । तरुणपणीं तरुणीरक्त । वृद्धापकाळीं जराग्रस्त । सदैव त्रस्त व्याधींनीं ॥८॥</p>
<p>
	जन्मासी येऊनि पुष्ट होणें । श्वासोच्छ्वास करीत राहणें । दीर्घायुष्यवरी वांचणें । हें काय कोणें या जन्मीं ॥९॥</p>
<p>
	परमात्मप्राप्ति हेचि साची । इतिकर्तव्यता नरजन्माची । नातरी श्वानसूकरादिकांची । जीविकाचि काय उणी ॥१०॥</p>
<p>
	श्वानेंही आपुलीं पोटें भरिती । प्रजोत्पादन यथेष्ट करिती । तेथें नरदेहाचीच काय महती । साम्यस्थिती उभयतां जैं ॥११॥</p>
<p>
	पिंडपोषण आणि मैथुन । हेंचि जरी नरदेहाचें साधन । हेंच जरी या जन्माचें पर्यवसान । तरी तो नरजन्म निरर्थक ॥१२॥</p>
<p>
	आहार - निद्रादि चतुष्टय । यांतचि होतां आयुष्यक्षय । मग श्वानां - मानवां भेद काय । करा निर्णय विवेकें ॥१३॥</p>
<p>
	हीच जरी नरदेहसफलता । तरुजन्मीं काय न्य़ूनता । भस्त्राही करी श्वासोच्छवासता । शरीरपुष्टता श्वानांही ॥१४॥</p>
<p>
	मनुष्यप्राणी मुक्त आहे । तो निर्भय तो स्वतंत्र पाहे । तो शाश्चत ही जाणीव राहे । सफलता हे जन्माची ॥१५॥</p>
<p>
	आला कोठूनि आहे कोण । नरजन्माचें काय कारण । एथील बीज जाणे तो प्रवीण । त्यावीण शीण मग सारा ॥१६॥</p>
<p>
	जैसी नंदादीपाची ज्योती । एकचि दिसे आदिअंतीं । परी वेगळी क्षणाक्षणाप्रती । तैशीच स्थिति देहाची ॥१७॥</p>
<p>
	बाल्यतारुण्य - वार्धक्यावस्था । या तों प्रकट जनां समस्तां । परी येती जाती स्वभावता । कोणा न कळतां कदाही ॥१८॥</p>
<p>
	दिसे तीच तत्क्षणीं नासे । अपरिमित तरी एकचि भासे । तैसाचि देह जो या क्षणीं असे । क्षणांतीं नसे पूर्वील ॥१९॥</p>
<p>
	देह मळमूत्रांची न्हाणी । श्लेष्म - पूय - लाळींची घाणी । मरण ठेविलें क्षणोक्षणीं । कुलक्षणी मोठा हा ॥२०॥</p>
<p>
	जें हें कृमिकीटकांचें घर । नाना रोगांचें आगर । अश्वत्थ आणि क्षणभंगुर । तें हें शरीर मानवी ॥२१॥</p>
<p>
	मांसशेणित - स्नायूंचा गाडा । तो हा अस्थि - चर्मांचा सांगाडा । मूत्र - पुरीष दुर्गंधीचा राडा । जीवाचा खोडा प्रत्यक्ष ॥२२॥</p>
<p>
	त्वचा मांस रुधिर स्नायू । मेद मज्जा अस्थि वायू । अमंगल अंगें उपस्थ पायू । ते अल्पायु हे काया ॥२३॥</p>
<p>
	ऐसा अमंगल आणि नश्वर । नरदेह जरी क्षणभंगुर । तरी मंगलधाम श्रीपरमेश्वर । हातीं येणार एणेंचि ॥२४॥</p>
<p>
	सदैव लागलें जन्म - मरण । कल्पनेचेंचि भय दारुण । नाहीं लागतां कानाला कान । प्राण हा निघून जाईल ॥२५॥</p>
<p>
	कोण लक्षी दिवसराती । किती येती आणिक जाती । मार्कंडेयाच्या आयुष्यें जन्मती । तयांही कालगति चुकेना ॥२६॥</p>
<p>
	ऐशिया क्षणभंगुर नरदेहीं । पुण्यश्लोक कथावार्ताही । गेला काळचि पडे संग्रहीं । तद्विरहित तो व्यर्थ ॥२७॥</p>
<p>
	हीच जाणीव झालिया निश्चित । हेंचि जन्मा आल्याचें हित । परी हा विश्वास नाहीं पटत । अनुभवाव्यतिरिक्त कोणाही ॥२८॥</p>
<p>
	परी यावया हा अनुभव । करूं लागे अभ्यास विभव । तरी शाश्वत सुखार्थी हा जीव । तेणें हें वैभव साधावें ॥२९॥</p>
<p>
	दारा सुत वैभव वित्त । पृथ्वी समुद्रवलयांकित । ईश्वरकृपें इतुकेंही प्राप्त । तरी तो अतृप्त मानसीं ॥३०॥</p>
<p>
	शाश्वत सुख आणि शांति । हेंचि ध्येय ठेवूनि चित्तीं । भूतीं भगवंत हे एक उपास्ति । परमप्राप्तिदायक ॥३१॥</p>
<p>
	त्वचा मांस रुधिर हाडां । जोडूनि केला हा देहसांगाडा । परमार्थाचा प्रत्यक्ष खोडा । ममत्व सोडा तयाचें ॥३२॥</p>
<p>
	मानावा तो केवळ चाकर । नका बैसवूं त्या डोक्यावर । लाड न पुरवा निरंतर । नरकद्वार करूं नका ॥३३॥</p>
<p>
	निर्वाहापुरतें अन्न आच्छादन । तैसेंच तात्पुरतें लालन पालन । लावा आध्यात्मिक उन्नतीलागून । जन्ममरण चुकवावया ॥३४॥</p>
<p>
	जन्ममरणादि अनर्थात्मक । प्रतिक्षण विनाशोन्मुख । कैसें क्षणिक याचें सुख । निरंतर असुख जो ॥३५॥</p>
<p>
	जैसी विद्युल्लता पाहीं । आतां आहे आतां नाहीं । क्षणिक सागर - तरंगता ही । विचार कांहीं करावा ॥३६॥</p>
<p>
	देहगेहापत्य स्त्री जन । हीं सर्व नाशिवंत जाणून । मातापित्यांसी खांदां वाहून । स्वयें जो आपण उमजे ना ॥३७॥</p>
<p>
	मेल्यामागें खुशाल मरे । फिरे जन्म - मरणांचे फेरे । परी तें कोण्या गुणें आवरे । विचार न करी क्षणभरी ॥३८॥</p>
<p>
	करितां नित्य कुटुंबाची भर । आयुष्य जातसे भराभर । काळ आयुष्यगणनातत्पर । कर्तव्यविसर त्या नाहीं ॥३९॥</p>
<p>
	भरतां अखेरची घडी । मग तो थांबेना एक चिपडी । धीवर जैसा जाळें ओढी । मरणीं तडफडी जीव तैसा ॥४०॥</p>
<p>
	महद्भाग्याचिया परवडी । वेंचूनियां पुण्यकोडी । लाधली नरदेहाची जोडी । घडीनें घडी साधावी ॥४१॥</p>
<p>
	करूं जातां भगीरथ युक्ति । या नरदेहाची नाहीं प्राप्ति । केवळ अद्दष्टें ये अवचटा हातीं । व्यर्थचि मातींत मिळवा ना ॥४२॥</p>
<p>
	पुढील जन्मीं करूं म्हणतां । एकदां हा हातींचा जातां । पुढें हाचि येईल ही निश्चितता । ऐसें मानिता तो मूर्ख ॥४३॥</p>
<p>
	कितीएक पापी देहवंत । होऊनि शुक्र -बीजसमन्वित । योनिद्वारासी होती प्राप्त । शरीरग्रहणार्थ निजकर्में ॥४४॥</p>
<p>
	कितीएक ते त्याहूनि अधम । असतां जंगमवर्गीं जन्म । मागुती स्थावरभाव परम । यथाकर्म प्राप्त त्यां ॥४५॥</p>
<p>
	जेणें जैसें उपार्जिलें ज्ञान । जयाचें जैसें कर्मानुष्ठान । तदनुसार तया शरीरग्रहण । श्रुतिप्रमाण हा योग ॥४६॥</p>
<p>
	‘यथाप्रज्ञं हि संभवा’ । वदे श्रुति माय अतिकणवा । जैसा जयाचा विज्ञानठेवा । जननही जीवा तैसेंच ॥४७॥</p>
<p>
	अतर्क्य ईश्वरी विंदान । अशक्य तयाचें संपूर्ण ज्ञान । अंशमात्रें लाधे जरी कवण । एक तो धन्य नरदेह ॥४८॥</p>
<p>
	परमभाग्यें हा नरजन्म । महत्पुण्यें ब्राम्हाणवर्ण । ईशकृपें साईचे चरण । लाभ हा संपूर्ण अलभ्य ॥४९॥</p>
<p>
	आहेत जरी नाना योनी । मानवचि श्रेष्ठ सर्वाहुनी । आलों कोठुनी निर्मिलें कोणीं । विवेक - श्रेणी मानवीच ॥५०॥</p>
<p>
	इतर योनी हें न जाणती । उपजती तैसा नाश पावती । भूत भावी वर्तमान गति । ईश्वरस्थिति नेणती ॥५१॥</p>
<p>
	म्हणोनि हा नरदेह निर्मून । ईश्वर झाला आनंदसंपन्न । कीं विवेकवैराग्यातें वरून । नर मद्भजन करील ॥५२॥</p>
<p>
	विनाशी नर करितां साधन । होईल अविनाशी नाराणय । नरदेहासम साधनसंपन्न । दुजा न आन ये सृष्टीं ॥५३॥</p>
<p>
	गारुडी स्वयें मोठा चतुर । खेळ न करी अज्ञानियासमोर । आणे कुशलतेचें वर्मसार । तो प्रेक्षकसंभार अपेक्षी ॥५४॥</p>
<p>
	तैसाचि पुश - पक्षी - वृक्षसंभार । जीवजंतु निर्मूनि अपार । सखेदाश्चर्य परमेश्वर । लीलानि:सार गमली त्या ॥५५॥</p>
<p>
	अफाट हा ब्रह्मांडविस्तार । चंद्र सूर्य तारा भार । निर्मित्याच्या कौतुकाचा विचार । लवभर कोणीही करीना ॥५६॥</p>
<p>
	हा सर्व खेळ करण्याआंतु । माझा जगदीशाचा काय हेतु । ये अर्थींची निश्चयमातु । एकही जंतु जाणेना ॥५७॥</p>
<p>
	माझी अतुल वैभवसमृद्धि । जाणील ऐसा कुशाग्रबुद्धि । प्राणी निर्मिला नाहीं तदवधि । विफल त्रिशुद्धि मम कार्य ॥५८॥</p>
<p>
	ऐसें जाणूनि जगदीशें । निर्मिला प्राणी मानववेषें । कीं जो सारासार बुद्धिवशें । मज सामर्थ्यें जाणील ॥५९॥</p>
<p>
	अगाध माझें वैभव । तैशीच माझी शक्ति अपूर्व । माझ्या मायेचा हा खेळ सर्व । आश्चर्यपूर्वक तो जाणे ॥६०॥</p>
<p>
	तोचि  करील ज्ञानसंपादन । मच्चिंतन आणि मदवलोकन । तोचि होईल आश्चर्यसंपन्न । होईल तैं पूर्ण खेळ माझा ॥६१॥</p>
<p>
	प्रेक्षकांची जी आनंदसंपन्नता । तीचि मज माझे खेळाची साङ्गता । पाहूनि माझी जगन्नियंतृता । नर कृतार्थता मानील ॥६२॥</p>
<p>
	काम्यकर्में द्रव्योपार्जन । एतदर्थ न शरीरपोषण । यावज्जीव तत्त्वज्ञानसंपादन । हेंच जीवनसाफल्य ॥६३॥</p>
<p>
	तत्त्व तेंचि जें अभेदज्ञान । तेंचि उपनिषह्व्रम्हाज्ञान । तेंचि परमात्मोपासन । तेंचि तो भगवान भक्तांचा ॥६४॥</p>
<p>
	गुरु ब्रम्हा नव्हेत दोन । झालें जया हें अभेद ज्ञान । हीच भक्ती घडतां जाण । मायातरण सुगम जें ॥६५॥</p>
<p>
	जे श्रद्धावंत पुरुष योग्य । संपादिती ज्ञान वैराग्य । हें आत्मतत्त्वचि निजभोग्य । भक्त सभाग्य ते जाणा ॥६६॥</p>
<p>
	स्वस्वरूपाचें जें अभावन । तें अज्ञान निरसल्यावीण । स्वयें कृतार्थ मानी जो आपण । प्रतिबंध विलक्षण हा एक ॥६७॥</p>
<p>
	ज्ञान आणि अज्ञान । दोनी हे विकार अविद्याजन्य । कांटियानें कांटा फेडून । तैसीं उडवून द्या दोनी ॥६८॥</p>
<p>
	ज्ञानानें दूर करा अज्ञान । ज्ञानाज्ञानातीत होऊन । निर्मळ स्वस्वरूपावस्थान  । हें एक पर्यवसान नरजन्मा ॥६९॥</p>
<p>
	न करितां स्नेहाची रांगोळी । अज्ञानतमाची काजळी । ‘मी मम’ या वातीची होळी । ज्ञान न पाजळी निजप्रभा ॥७०॥</p>
<p>
	नरदेहगत जें जें कार्य । असो निवार्य वा अनिवार्य । हें तों सर्व बुद्धिकर्तव्य । निश्चयप्राय जाणावें ॥७१॥</p>
<p>
	नाहीं आपणा दुजें काम । स्वस्थ भोगावें ऐश्चर्य आराम । अथवा चिंतावें रामनाम । होऊं निष्काम निश्चिंत ॥७२॥</p>
<p>
	शरीरेंद्रिय - मन - बुद्धी । या तों सर्व आत्म्याच्या उपाधी । इहींचि आत्मा भोक्तृत्व आपादी । स्वयें अनादि अभोक्ता ॥७३॥</p>
<p>
	आत्म्याचें भोक्तृत्व औपाधिक । स्वयें अभोक्ता स्वाभाविक । शास्त्रन्याय अन्वय - व्यतिरेक । प्रमाण देखा ये अर्थीं ॥७४॥</p>
<p>
	हे एक जाणोनि निजवर्म । बुद्धीसि सोंपावेम प्राप्तकर्म । तिचे हातीं मनाचे धर्म । स्वयें निष्कर्म वर्तावें ॥७५॥</p>
<p>
	स्वधर्माचें अनुष्ठान । सदैव आत्मानात्मचिंतन । हेंचि नरजन्माचें पर्यवसान । समाधान स्वरूपीं ॥७६॥</p>
<p>
	नाहीं नरदेहापरी आन । चारी पुरुषार्थ साधाया साधन । जो नर अभ्यासपरायण । तो नारायणप्द पावे ॥७७॥</p>
<p>
	म्हणूनि झालें न जों शरीरपतन । आत्मज्ञानार्थ करा यत्न । नरजन्माचा एकही क्षण । उपेक्षून टाकूं नका ॥७८॥</p>
<p>
	समुद्रींचें क्षारोदक । मेघाहातीं पडतां देख । होतें जैसें गोड पीयूख । तें सुख जडतां गुरुपाय़ीं ॥७९॥</p>
<p>
	ऐशिया नरदेहाची सद्नती । गुरुविना नकळे कवण्याप्रती । गुरूचि जेव्हां धरती हातीं । तैंचि उद्धरती जड जीव ॥८०॥</p>
<p>
	मंत्र तीर्थ देव द्विज । ज्योतिर्वेद आणि भेषज । तैसेचि सातवे गुरुराज । भावना काज यां अवघियां ॥८१॥</p>
<p>
	जयांच्या ठायीं जैशी भावना । सिद्धीही तैशीच त्याप्रमाणा । वेग जैसा अधिक उणा । सिद्धीही जाणा तैशीच ॥८२॥</p>
<p>
	बद्धास करिती मुमुक्षु संत । मुमुक्षूचा करिती मुक्त । अव्यक्ताचे होऊनि व्यक्त । परोपकारार्थ हें करिती ॥८३॥</p>
<p>
	कार्य नव्हे जें व्याख्यानें पुराणें । सुकर होई तें सत्पुरुषाचरणें । तयाचें हालणें चालणें । उपदेशणें नि:शब्द ॥८४॥</p>
<p>
	क्षमा शांति नि:संगता । भूतदया परोपकारता । इंद्रियनिग्रह निरहंकारता । यांचा आचरता दुर्लभ ॥८५॥</p>
<p>
	जें न लाभे पढतां ग्रंथ । सुलन तें पहातां एक क्रियावंत । करी जें न तारागण अनंत । संपादी भास्वत एकला ॥८६॥</p>
<p>
	तैसेचि हे उदार संत । सहज क्रिया त्यांच्या अनंत । करिती जीवांसी बंधमुक्त । सौख्य अत्यंत देतात ॥८७॥</p>
<p>
	यांतीलचि एक साईमहंत । ऐश्वर्यवंत श्रीमंत । परी फकीरासम आचरित । आत्मनिरत सर्वदा ॥८८॥</p>
<p>
	अनवच्छिन्न जयाची समता । मी माझें ही नाहीं वार्ता । जीवमात्रीं सदा सदयता । भूतीं भगवंतता मूर्तिमंत ॥८९॥</p>
<p>
	सौख्यें जयासी नाहीं हरिख । दु:खें जयासी नाहीं शोक । सरिसे जया रावरंक । हें काय कौतुक सामान्य ॥९०॥</p>
<p>
	जयाची भ्रूविक्षेपलहरी । क्षणांत रंकाचा राव करी । तो हा घेऊनि चौपालवी करीं । दारोदारीं हिंडतसे ॥९१॥</p>
<p>
	धन्य ते जन जयांचे द्वारीं । बाबा होऊनि भिक्षेकरी । ‘पोरी आण गे चतकुर भाकरी’ म्हणूनि पसरी निजकर ॥९२॥</p>
<p>
	घेई टमरेल एके करीं । दुजिया हातीं चौपदरी । स्वयें फिरे दारोदारीं । नियमित घरीं प्रतिदिनीं ॥९३॥</p>
<p>
	भाजी सांबारें दूध ताक । पदार्थ तितुके सकळिक । टमरेलांत ओतिती लोक । पहा हें कवतीक खाण्याचें ॥९४॥</p>
<p>
	शिजला भात अथवा भाकरी । घ्यावया पसरली चौपदरी । पातळ पदार्थ मग कैसीही परी । टमरेलाभीतरीं रिचविती ॥९५॥</p>
<p>
	पदार्था - पदार्थाची घ्यावया चवी । लालसा कोठूनि व्हावी । रसासक्ति जिव्हे न ठावी । जीवीं उठावी कैसेनी ॥९६॥</p>
<p>
	झोळींत पडलें जें जद्दच्छेनें । तृप्त असावें तयाच्याच सेवनें । रुचकर कीं बेचव हें नेणे । चवीचि रसने नाहीं कीं ॥९७॥</p>
<p>
	प्रहर दिवसा वस्तीलागुनी । भिक्षा मागत प्रतिदिनीं । तेणें उदरपूर्ति करूनी । समाधानी वर्तत ॥९८॥</p>
<p>
	भिक्षा तरी काय नियमित । इच्छेस येईल तेव्हां मागत । कधीं बारा वेळ एका दिवसांत । भिक्षेस जात गांवांत ॥९९॥</p>
<p>
	एणेंपरी जें अन्न आणीत । मशिदींतील कुंडींत ठेवीत । कावळे कुत्रे त्यांतचि खात । कधीं न हांकीत तयांना ॥१००॥</p>
<p>
	मशीद - आंगण झाडणारी । त्यांतूनि दहाबारा भाकरी । घेऊनि जाई आपुले घरीं । कोणी न वारी तिजलागीं ॥१०१॥</p>
<p>
	कुत्र्यां मांजरां हडहड करणें । स्वप्नांतही जो कदा नेणे । तो काय गरीब दुबळ्यां नको म्हणे । धन्य जिणें तयांचें ॥१०२॥</p>
<p>
	आरंभीं हा वेडा फकीर । येचि नामें जनां महशूर । तुकडे मागूनि भरी जो उदर । कैंचा बडिवार तयाचा ॥१०३॥</p>
<p>
	फकीर परी हाताचा सढळ । निरपेक्ष आणि स्नेहाळ । बाह्य चंचल अंतरीं अचळ । कळा अकळ तयाची ॥१०४॥</p>
<p>
	ऐसियाही त्या कुग्रामांत । जात्या अतीव दयावंत । होते कांहीं भाग्यवंत । ते त्या महंत मानीत ॥१०५॥</p>
<p>
	तात्या कोते यांची आई । नांव जिजेचें बायजाबाई । पाटींत भाकर्‍या घेऊनि डोयीं । रानांत जाई दुपारा ॥१०६॥</p>
<p>
	कोस कोस रान धुंडावें । दाट झाड झुडूप तुडवावें । वेडया फकीरास या हुडकावें । पायां पडावें तयाच्या ॥१०७॥</p>
<p>
	काय तिच्या त्या सत्त्वाची थोरी । ओली कोरडी भाजी भाकरी । रानीं वनीं दुपारीं तिपारीं । भरवी न्याहारी बाबांतें ॥१०८॥</p>
<p>
	ऐसें तिचें तपाचरण । वावाही न विसरले आमरण । केलें तिच्या पुत्राचें कल्याण । पूर्ण स्मरणपूर्वक ॥१०९॥</p>
<p>
	उभयतां त्या स्त्रीपुरुषांचा । फकीरापायीं द्दढभाव साचा । फकीरचि देव त्या उभयतांचा । भावार्थियाचाच देव कीं ॥११०॥</p>
<p>
	फकीरानें ध्यानस्थ असावें । बायजाबाईनें पान मांडावें । पाटींतील अन्न वाढावें । खाववावें प्रयत्नें ॥१११॥</p>
<p>
	‘फकीरी अव्वल बादशाही । फकीरीही चिरंतन राही । अमीरी क्षणभंगुर पाहीं’ । सदा बबांनीं म्हणावें ॥११२॥</p>
<p>
	पुढें बाबांनीं रान त्यागिलें । गांवांत येऊनि राहूं लागले । मशीदींत अन्न खाऊं आदरिलें । कष्ट चुकविले आईचे ॥११३॥</p>
<p>
	ऐसा हा नेम तेव्हांपासुनी । जैसा चालविला त्या उभयतांनीं । तैसाचि तो तयांचे मागुनी । तात्यांनींही चालविला ॥११४॥</p>
<p>
	धन्य धन्य ते संत सदैव । जयांचे ह्रदयीं वासुदेव । धन्य तया भक्तांचें सुदैव । समागमवैभव ज्यां त्यांचें ॥११५॥</p>
<p>
	तात्या महाभाग्यवान । म्हाळसापतीचेंही पुण्य गहन । बाबांचे समागमाचा मान । समसमान भोगीत ॥११६॥</p>
<p>
	तात्या आणि म्हाळसापति । मशिदींतचि शयन करिती । बाबांचीही अनुपम प्रीती । दोघांवरती सारखी ॥११७॥</p>
<p>
	पूर्वपश्चिमे उत्तरेस । डोया तिघांच्या तीन दिशांस । पाय परस्परांचे पायांस । मध्यबिंदूस भिडविती ॥११८॥</p>
<p>
	ताणूनि ऐशिया पथार्‍या । गोष्टी वार्ता चालती सार्‍या । एकास येतां निद्रेच्या लकेर्‍या । तयास दुसर्‍यानें जागवावें ॥११९॥</p>
<p>
	तात्या घोरूं लागतां । उठावें बाबांनीं अवचितां । करोनि तयांसी उलथापालथा । दाबावा माथा तयांचा ॥१२०॥</p>
<p>
	घेऊनि समवेत म्हाळसापती । बिलगती दोघे तात्यांप्रती । आवळूनि धरिती पाय दाबिती । पाठही रगडिती तयांची ॥१२१॥</p>
<p>
	ऐशीं सबंध चवदा सालें । बाबांसवें तात्या मशिदींत निजले । काय भाग्याचे ते दिवस गेले । स्मरणीं राहिले अखंड ॥१२२॥</p>
<p>
	घरीं ठेवूनियां मायबापें । बावांच्या आवडीं मशिदीं झोंपे । प्रेम तें मापावें कवण्या मापें । मोल या कृपेचें कोण करी ॥१२३॥</p>
<p>
	पुढें वडील पंचत्व पावले । तात्या घर - संसारांत पडले । झाले घरधनी स्वयें दादुले । निजूं लागले निजगृहीं ॥१२४॥</p>
<p>
	असो ऐसा निष्ठावंत भाव । तयासीचि साईचा अनुभव । अनाहूत  उभा स्वयमेव । भक्त नवलाव पाहूं ये ॥१२५॥</p>
<p>
	तैसेचि रहात्यांत एक गृहस्थ । खुशालचंद नामें विख्यात । होते बाबांचे भक्त धनवंत । नगरशेट गांवींचे ॥१२६॥</p>
<p>
	प्रसिद्ध पाटील गणपत कोते । जैसे बाबांचे फार आवडते । चुलते खुशालचंदांचे होते । तैसेचि बाबांतें प्रिय बहु ॥१२७॥</p>
<p>
	जरी जातीचे मारवाडी । बाबांलागीं मोठी आवडी । परस्परांच्या घडोघडी । भेटी सुखपरवडी ते घेत ॥१२८॥</p>
<p>
	हरीच्छेनें कांहीं कालें । वडील शेठजी पंचत्व पावले । तरीही न बाबा विरसले । प्रेम पहिलें दुणावलें ॥१२९॥</p>
<p>
	पुढेंही खुशालचंदांवरती । वाढत गेली बाबांची प्रीति । आदेहान्त दिवसराती । कल्याणा जागती तयांचे ॥१३०॥</p>
<p>
	कधीं गोरथीं किंवा हरयथीं । सवें घेऊनि प्रेमाचे सांगाती । तेथूनि दीड मैलावरती । रहात्याप्रती जात बाबा ॥१३१॥</p>
<p>
	ग्रामस्थ लोक सामोरे येत । ताशे वाजंत्री सवें घेत । बाबांस गांवाचे वेशीवर भेटत । लोटांगणीं येत प्रेमानें ॥१३२॥</p>
<p>
	मग तेथूनि गांवाआंत । बाबांस समारंभें नेत । अति प्रेमें वाजत गाजत । आनंदभरित मानसें ॥१३३॥</p>
<p>
	खुशालचंद आपुले सदनीं । बाबांस मग जात घेऊनी । तेथें अल्पाहार करवुनी । सुखसनीं बैसवीत ॥१३४॥</p>
<p>
	मग त्या जुन्या पुराण्या वार्ता । आठवूनि कथिती उभयतां । परस्परांच्या आनंद चित्ता कोणास वर्णितां येईल तो ॥१३५॥</p>
<p>
	एणेंप्रमाणें आनंद - विहार । पूर्ण होतां फळाहार । बाबा मग स्वानंनिर्भर । सहपरिवार परतती ॥१३६॥</p>
<p>
	एकीकडे हें रहातें गांव । दुसरीकडे तें निमगांव । या दोहोंच्या मध्यें ठाव । शिरंडी गांग वस्तीचा ॥१३७॥</p>
<p>
	जरी या मध्यबिंदूपासून । या दोन गांवांबाहेर प्रयाण । स्थूळ देहें केलें न आनिर्वाण । तरी तयां जाण सर्वत्र ॥१३८॥</p>
<p>
	नाहीं इतर कोठें प्रयाण । नाहीं आग्निरथाचें दर्शन । तरी त्या रथाचें गमनागमन । वेळ प्रमाण त्यां ठावें ॥१३९॥</p>
<p>
	साधावया गाडीची वेळ । भक्तांनीं करावी तयारी प्रबळ । आज्ञा मागू जातां जवळ । म्हणावें उतावीळ कां झालां ॥१४०॥</p>
<p>
	बाबा न करितां आतां तांतडी । चुकेल माझी मुंबईची गाडी । नोकरीवरी येईल धाडी । साहेब काढील मजला कीं ॥१४१॥</p>
<p>
	साहेब येथें नाहीं दुसरा । कशास व्हावी इतुकी त्वरा । जा खा भाकर तुकडा जरा । जाईं दुपारा जेवुनी ॥१४२॥</p>
<p>
	ऐशी कोणाची आहे प्राज्ञा । कीं त्या वाणीची करील अवज्ञा । लहाना थोरा शहाण्या सुज्ञा । अनुभवविज्ञान सकळां हें ॥१४३॥</p>
<p>
	ज्यानें ज्यानें आज्ञा मानिली । गाडी तयाची कधीं न चुकली । परी जयानें ती अवमानिली । प्रचीती घेतली रोकडी ॥१४४॥</p>
<p>
	एकामागून एक अभिनव । संख्याविरहित ऐसे अनुभव । अनेकांचे अनेक अपूर्व । संक्षेपपूर्वक सांगेन ॥१४५॥</p>
<p>
	हेमाड साईपदीं शरण । पुढील अध्यायीं हेंचि निरूपण । भक्त परततां गांवालागून । बाबांचें आज्ञापन हों लागे ॥१४६॥</p>
<p>
	आज्ञा होई तो तो जाई । आज्ञा नाहीं तो तो राही । अवमानितां पडे अपायीं । पुढील अध्यायीं दिग्दर्शन ॥१४७॥</p>
<p>
	तैसेंचि मधुकरी वृत्तीचें धारण । साईंस किमर्थ भिक्षान्नसेवन । पंचसूनादि पातकक्षालन । कथानिरूपण पुढारा ॥१४८॥</p>
<p>
	म्हणूनि श्रोतयां चरणीं प्रार्थना । करितों आग्रहें क्षणक्षणा । कराया साईचरित्र - श्रवणा । निजकल्याणाकारणें ॥१४९॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । श्रीसाईसमर्थावतरणं नाम अष्टमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 22 Apr 2022 15:01:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 22 Apr 2022 15:11:10 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ७]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-7-122042200043_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
आतां पूर्वकथेची संगती । स्मरणपूर्वक आणूं चित्तीं । देउळाच्या जीर्णोद्धाराथा । कैसी प्रीति बाबांस ॥१॥
परोपकारार्थ ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 7" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/22/full/1650619853-4934.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra chapter 7" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	आतां पूर्वकथेची संगती । स्मरणपूर्वक आणूं चित्तीं । देउळाच्या जीर्णोद्धाराथा । कैसी प्रीति बाबांस ॥१॥</p>
<p>
	परोपकारार्थ कैसे श्रमत । कैसे निजभक्तां सांभाळीत । कैसा निजांगें देह झिजवीत । दु:खेंही सोशीत भक्तांचीं ॥२॥</p>
<p>
	समाधीसमवेत खंडयोग । धोती पोती इत्यादि प्रयोग । कदा करपदशिरवियोग । कदा संयोग पूर्ववत्‌ ॥३॥</p>
<p>
	हिंदू म्हणतां दिसत यवन । यवन म्हणतां हिंदू सुलक्षण । ऐसा हा अवतार विलक्षण । कोण विचक्षण वर्णील ॥४॥</p>
<p>
	जात हिंदू कीं मुसलमान । थांग न लागला अणुप्रमाण । उभय वर्गां समसमान । जयांचें वर्तन सर्वदा ॥५॥</p>
<p>
	रामनवमी हिंदूंचा सण । करवीतसे स्वयें आपण । सभामंडपीं पाळणा बांधवून । कथा कीर्तन करवीत ॥६॥</p>
<p>
	चौकांत सन्मुख लागे पाळणा । करवूनि घेती रामकीर्तना । तेचि रात्रीं संदल मिरवणा । अनुज्ञा यवनांही देत ॥७॥</p>
<p>
	जमवूनि जमतील तितुके यवन । समारंभें संदल - मिरवण । उभय उत्सव समसमान । घेत करवून आनंदें ॥८॥</p>
<p>
	येतां रामनवमीचा दिवस । कुस्त्या लावण्याची हौस । घोडे तोडे पगडया बक्षीस । अति उल्हास द्यावया ॥९॥</p>
<p>
	सण गोकुळ अष्टमी आला । करवूनि घेती गोपाळकाला । तैसीच ईद येतां यवनांला । निमाजाला अटक ना ॥१०॥</p>
<p>
	एकदां आला मोहरमाचा सण । आले मशिदीस कांहीं यवन । म्हणती एक ताजा बनवून । करूं मिरवण ग्रामांत ॥११॥</p>
<p>
	आज्ञेसरसा ताजा झाला । चार दिवस ठेवूंही दिधली । पांचवे दिवशीं खालीं खालीं काढिला । नाहीं मनाला सुख दु:ख ॥१२॥</p>
<p>
	अविंध म्हणतां विंधित कान । हिंदू म्हणतां सुंता प्रमाण । ऐसा ना हिंदू ना यवन । अवतार पावन साईंचा ॥१३॥</p>
<p>
	हिंदू म्हणावें जरी तयांस । मशिदींत सदा निवास । यवन म्हणावें तरी हुताश । अहर्निश मशिदींत ॥१४॥</p>
<p>
	मशिदींत जात्याचें दळण । मशिदींत घंटाशंखवादन । मशिदींत अग्निसंतर्पण । मुसलमान कैसे हे ॥१५॥</p>
<p>
	मशिदींत सदैव भजन । मशिदींत अन्नसंतर्पण । मशिदींत अर्घ्य - पाद्य - पूजन । मुसलमान कैसे हे ॥१६॥</p>
<p>
	म्हणावी जरी म्लेंच्छ जाती । ब्राम्हाणोत्तम पूजन करिती । अग्निहोत्री लोटांगणीं येती । त्यागूनि स्फीती सोंवळ्याची ॥१७॥</p>
<p>
	ऐसे जन विस्मित चित्तीं । पाहूं येती जे जे प्रचीती । तेही तैसेचि आपण वर्तती । मूग गिळिती दर्शनें ॥१८॥</p>
<p>
	तरी जो सर्वदा हरीसी शरण । त्या काय म्हणावें हिंदू वा यवन । असो शूद्र अतिशूद्र यातिविहीन । जाती न प्रमाण अणुमात्र ॥१९॥</p>
<p>
	नाहीं जयासी देहाभिमान । असो हिंदू वा मुसलमान । सकल वर्णां समसमान । तया न भिन्नपण जातीचें ॥२०॥</p>
<p>
	फकीरपंक्तीसी मांसभोजन । अथवा यद्दच्छा मत्स्यसेवन । तेथेंचि तोंड घालितां श्वान । विटे न मन जयाचें ॥२१॥</p>
<p>
	चालू वर्षाचा धान्याचा सांठा । कृषीवल करितो बांधोनि मोटा । कीं पुढील सालीं आलिया तोटा । वेळीं पुरवठा होईल ॥२२॥</p>
<p>
	तैसें संग्रहीं गव्हांचें पोतें । दळाया मशिदींत असे जातें । पाखडावया सूपही होतें । न्य़ून नव्हतें संसारास ॥२३॥</p>
<p>
	सभामंडपीं शोभायमान । सुंदर खासें तुलसीवृंदावन । तेथेंचि एक लांकडी स्यंदन । अति सुलक्षण कांतीव ॥२४॥</p>
<p>
	होतें कांहीं पुण्य गांठीं । तेणें या सद्वस्तूची झाली भेटी । ऐशी द्दढ सांठवा ह्रदयसंपुटीं । पडेना तुटी आमरणान्त ॥२५॥</p>
<p>
	कांहीं पूर्वाजिंत सभाग्यता । तेणें हे पाय आले हाता । मनासी लाभली शांतता ॥ निश्चिंतताही प्रपंचीं ॥२६॥</p>
<p>
	पुढें कितीही सुखसंपन्न । झालों तरी तें सुख न ये परतोन । जें श्रीसाईसमर्थसमागमजन्य । भोगितां धन्य झालों मी ॥२७॥</p>
<p>
	स्वानंदैकचिद्धन साई । काय वानूं त्याची नवलाई । जो जो रतला तयाच्या पायीं । तो तो ठायींच बैसविला ॥२८॥</p>
<p>
	अजिन - दंडधारी तापसी । हरिद्वारादि तीर्थवासी । तडी तापडी संन्यासी । त्यागी उदासी बहु येती॥२९॥</p>
<p>
	बोले चाले हंसे उदंड । जिव्हेस ‘अल्लामालीक’ अखंड । नावडे वाद किंवा वितंड । निकट दंड सर्वदा ॥३०॥</p>
<p>
	तापस वृत्ति शमी दान्त । वाचा स्रवे पूर्ण वेदान्त । कोणाही न लागला अंत । अखेर पर्यंत बाबांचा ॥३१॥</p>
<p>
	राव असो वा रंक । समसाम्य सकळां निष्टंक । लक्ष्मीपुत्र वा भिकारी खंक । उभयांसी एकचि माप तेथें ॥३२॥</p>
<p>
	कोणाचें बरें वाईट कर्म । जाणतसे जिवाआंतुलें मर्म । सांगूनि देत खूण वर्म । आश्चर्य परम भक्तांना ॥३३॥</p>
<p>
	जाणपणाचें तें सांठवण । नेणतपणाचें पांघरूण । मानसंपादन जयासी शीण । एवं लक्षण श्रीसाई ॥३४॥</p>
<p>
	काया जरी मानवाची । करणी अपूर्व देवाची । शिरडींत प्रत्यक्ष देव तो हाचि । भाविती हेंचि जन सारे ॥३५॥</p>
<p>
	काय बाबांचे चमत्कार । किती म्हणून मी वर्णूं पामर । देवा-देउळांचेही जीर्णोद्धार । बाबांनीं अपार करविले ॥३६॥</p>
<p>
	शिरडीस तात्या पाटिला हातीं । शनी-गणपती-शंकरपार्वती । ग्रामदेवी आणि मारुती । यांचीही सुस्थिति लाविली ॥३७॥</p>
<p>
	लोकांपासूनि  दक्षिणामिषें । घेत असत बाबा जे पैसे । कांहीं धर्मार्थ वांटीत जैसे । कांहीं तैसेचि ते देत ॥३८॥</p>
<p>
	कोणासी रोज रुपये तीस । कोणासी दहा, पंधरा पन्नास, । ऐसें मन मानेल तयांस । वांटीत उल्हासवृत्तीनें ॥३९॥</p>
<p>
	हा तों सर्व धर्माचा पैसा । घेणारासही पूर्ण भरंवसा । विनियोगही व्हावा तैसा । हीच मनीषा बाबांची ॥४०॥</p>
<p>
	असो कित्येक दर्शनें पुष्ट । कित्येक झाले दुष्टांचे सुष्ट । कित्येकांचे गेले कुष्ट । पावले अभीष्ट कितीएक ॥४१॥</p>
<p>
	न घालितां अंजन पाला रस । कितीक अंध झाले डोळस । आले पाय कितीक पंगूंस । केवळ पायांस लागतां ॥४२॥</p>
<p>
	महिमा तयांचा अनिवार । कोणा न लागे तयांचा पार । यात्रा येऊं लागली अपार । अपरंपार चौंबाजूं ॥४३॥</p>
<p>
	धुनीनिकट तेचि स्थानीं । मलमूत्रातें विसर्जूनी । कधीं पारोसें कधीं स्नानीं । नित्य ध्यानीं निरत जे ॥४४॥</p>
<p>
	डोईस सफेत पागोटें खासें । स्वच्छ धोतर लावीत कासे । अंगांत सदरा कीं पैरण असे । पेहराव ऐसा आरंभीं ॥४५॥</p>
<p>
	आरंभीं गांवीं वैद्यकी करीत । पाहूनि पाहूनि दवा देत । हातालाही यश बहुत । हकीम विख्यात जाहले ॥४६॥</p>
<p>
	एकदां एका भक्ताचे डोळे । सुजूनि झाले लाल गोळे । रक्तबंबाळ दोनी बुबुळें । वैद्य न मिळे शिरडींत ॥४७॥</p>
<p>
	भक्त बिचारे भाविक भोळे । बाबांसी दाखविते झाले डोळे । बिबे ठेंचूनि करविले गोळे । सत्वर ते वेळे बाबांनीं ॥४८॥</p>
<p>
	कोणी घालील सुरम्याच्या काडया । कोणी गाईच्या दुधाच्या घडया । कोणी शीतळ कापुराच्या वडया । देईल पुडया अंजनाच्या ॥४९॥</p>
<p>
	बाबांचा तो उपायचि वेतळा । स्वहस्तें उचलिला एकेक गोळा । चिणूनि भरला एकेक डोळा । फडका वाटोळा वेष्टिला ॥५०॥</p>
<p>
	उदय़ीक डोळ्यांची पट्टी सोडिली । वरी पाण्याची धार धरिली । सूज होती ती सर्व निवळली । बुबुळें जाहलीं निर्मळ ॥५१॥</p>
<p>
	डोळ्यासारिखा नाजूक भाग । नाहीं बिब्याची झाली आग । बिब्यानें दवडिला नेत्ररोग । ऐसे अनेक अनुभव ॥५२॥</p>
<p>
	धोती पोती तयां अवगत । नकळत एकान्तस्थळीं जात । स्नान करितां आंतडी ओकीत । धुऊनि टाकीत वाळावया ॥५३॥</p>
<p>
	मशिदीहूनि जितुका आड ॥ तितुकेंचि पुढें वडाचें झाड । तयाहीपलीकडे एक आड । दों दिवसांआड जात ते ॥५४॥</p>
<p>
	भर दुपारीं प्रखर ऊन ।  कोणी न तेथें ऐसें पाहून । स्वयें आडांतूनि पाणी काढून । मुखमार्जन करीत ॥५५॥</p>
<p>
	असो ऐशिया एका प्रसंगीं । बैसले असतां स्नानालागीं । आंतडी काढूनि लागवेगीं । धुऊं ते जागीं लागले ॥५६॥</p>
<p>
	अजा मारितां तिची आंतडी । बाह्याभ्यंतर करूनि उघडी । धुऊनि घालिती घडीवर घडी । निर्मळ चोखडी करितात ॥५७॥</p>
<p>
	तैसीच आपुली आंतडी काढूनी । आंतून बाहेर स्वच्छ धुऊनी । पसरली जांबाचे झाडावरूनी । आश्चर्य जनीं बहु केलें ॥५८॥</p>
<p>
	ज्यांहीं ही स्थिति डोळां देखिली । त्यांतील कांहीं हयात मंडळी । आहेत अजूनि शिरडींत उरली । म्हणती वल्ली तों अपूर्व ॥५९॥</p>
<p>
	कधीं लावीत खंडयोग । करीत ह्स्तपादादि विलग । ऐसे मशिदींत जागोजाग । अवयव अलग ते पडत ॥६०॥</p>
<p>
	देह ऐसा खंड विखंड । देखावा तो भयंकर प्रचंड । पाहूं धांवत लोक उदंड । बाबा अखंड त्यां दिसती ॥६१॥</p>
<p>
	पाहूनि एकदां ऐसा प्रकार । पाहणारा घाबरला फार । कोणा दुष्टें बाबांस ठार । केलें अत्याचार हा ॥६२॥</p>
<p>
	मशिदींत ठिकठिकाणीं । अवयव दिसती चारही कोनीं । रात्र मध्यान्ह जवळी न कोणी । चिंता मनीं उद्भवली ॥६३॥</p>
<p>
	जावें कोणासी सांगावयाला । होईल उलट टांगावयाला । ऐसा विचार पडला तयाला । जाऊनि बैसला बाहेर ॥६४॥</p>
<p>
	असेल साईचा हा योग कांहीं । हें तों तयाच्या स्वप्नींही नाहीं । पाहोनि छिन्नभिन्नता ही । भीति ह्रदयीं धडकली ॥६५॥</p>
<p>
	कोणासी तरी कळवावा प्रकार । मनांत त्याचे येई फार । परी मीच ठरेन गुन्हेगार । प्रथम खबर देणारा ॥६६॥</p>
<p>
	म्हणूनि कोणीसी सांगवेना । येत मनांत असंख्य कल्पना । म्हणूनि पहांटे जाऊनि पुन्हां । पहातां मना विस्मित ॥६७॥</p>
<p>
	अद्दश्य पूर्वील सर्व प्रकार । बाबा कुशलस्थानीं स्थिर । हें स्वप्न नाहींना ऐसा विचार । येऊनि पहाणार साश्चर्य ॥६८॥</p>
<p>
	हे योग हे धोतीपोती । बाळपणापासूनि आचरती । कोणा न कळे ती अगम्यगति । योगस्थिति तयांची ॥६९॥</p>
<p>
	दिडकीस नाहीं कोणाच्या शिवले । गुणानें प्रख्यातीतें पावले । गरीब दुबळ्यांस आरोग्य दिधलें । हकीम गाजले ते प्रांतीं ॥७०॥</p>
<p>
	हकीम हा तों केवळ परार्था । अति उदास तो निजस्वार्था । साधावया परकीयार्था । असह्यानर्था साहतसे ॥७१॥</p>
<p>
	ये अर्थींची अभिनव कथा । निवेदितों मी श्रोतियांकरितां । विदित होईल बाबांची व्यापकता । तैशीच दयार्द्रता तयांची ॥७२॥</p>
<p>
	सन एकोणीसशें दहा सालीं । समय धनतेरस दिवाळी । बाबा सहज धुनीजवळी । बैसले जाळीत लाकडें ॥७३॥</p>
<p>
	प्रखर तेवली होती धुनी । निजहस्त त्यांतचि खुपसुनी । बाबा बैसले निश्चिंत मनीं । हात भाजूनि निघाला ॥७४॥</p>
<p>
	माधव नामें तयांचा सेवक । लक्ष गेलें तयाचें साहजिक । देशपांडेही होते नजीक ॥ तेही तात्कालिक धांवले ॥७५॥</p>
<p>
	जाऊनि मागें मारूनि बैसका । कंबरेसी घट्ट घातला विळखा । बाबांसी मागें ओढोनि देखा । पुसती विलोका मग काय ॥७६॥</p>
<p>
	हाहा देवा हें काय केलें । म्हणतां बाबा ध्यानावर आले । “एक पोर रे खांकेचें म्हणती निसटलें । भट्टींत पडलें एकाकी ॥७७॥</p>
<p>
	ऐकूनि निजपतीच्या हाके । लोहाराची रांड रे धाके । मारूनि आपुल्या पोरासी खांके । भाता फुंके भट्टीचा ॥७८॥</p>
<p>
	फुंकतां फुंकतां लक्ष चुकली । खांकेसी पोर हें ती विसरली । पोर ती अचपळ तेथूनि निसटली । पडतांचि उचलली मीं शामा ॥७९॥</p>
<p>
	काढावयासी त्या पोरीला । गेलों तों हा प्रकार घडला । भाजूं दे रे हा हात मेला । प्राण रे वांचला पोरीचा” ॥८०॥</p>
<p>
	आतां या हाताचें दुखणें । कैसा उपाय करावा कवणें । चांदोरकरांसी पत्र घालणें । माधवरावानें ठरविलें ॥८१॥</p>
<p>
	पत्र लिहिलें सविस्तर । ‘परमानंद’ प्रसिद्ध डॉक्टर । समवेत घेऊनियां सत्वर । आले चांदोरकर शिरडीस ॥८२॥</p>
<p>
	उपयोगा पडती दाहोपशमना । ऐशीं घेतलीं औषधें नाना । परमानंदसमवेत नाना । साईचरणा पातले ॥८३॥</p>
<p>
	करुनि बाबांसी अभिवंदन । पुसती कुशल वर्तमान । निवेदिलें आगमन-प्रयोजन । हस्तावलोकन प्रार्थिलें ॥८४॥</p>
<p>
	आधींच हात पोळल्यापासून । भागोजी शिंदा तूप चोळून । पट्टया बांधीतसे करकरून । पान बांधून प्रत्यहीं ॥८५॥</p>
<p>
	तो हात सोडोनियां पहावा । परमानंदांसी दाखवावा । दवा उपचार सुरू करावा । गुण पडावा बाबांना ॥८६॥</p>
<p>
	ही सदिच्छा धरुनि मनीं । बहुत ननांनीं केली मनधरणी । प्रयत्नही केला परमानंदानीं । पट्टया सोडूनि पहावें ॥८७॥</p>
<p>
	आज उद्या आज उद्यां करूनी । वैद्य आपुला अल्ला म्हणूनी । ह्स्त न दिधला पहावयालागूनी । खेदही न मनीं तयाचा ॥८८॥</p>
<p>
	परमानंदाचा आणिलेला दवा । तया न लागली शिरडीची हवा । परी साईदर्शनसुहाव । तयां घडावा योग हा ॥८९॥</p>
<p>
	भागोजीचीच नित्य सेवा । भागोजीनेंच हात चोळावा । तेणें काळें हातही बरवा । होऊनि सर्वां सुख झालें ॥९०॥</p>
<p>
	ऐसा जरी हात बरा झाला । न कळे बाबांसी येई काय दुकळा । ती प्रात:काळची येतां वेळा । पट्टयांचा सोहळा प्रतिदिनीं ॥९१॥</p>
<p>
	नसतां हातास कांहींही वेदना । नित्य निष्कारण तयाची जोपासना । घृतमर्दन निष्पीडन जोपासना । आमरणान्त चालविली ॥९२॥</p>
<p>
	ही उपासना भागोजीची । साईसिद्धा न आवश्यकता जीची । भागोजीस घडविती नित्यनेमाची । भक्तकाजाची आवडी ॥९३॥</p>
<p>
	पूर्वजन्मींचे महादोष । भागोजी पावला कुष्ट - क्लेश । परी तयाचें ,भाग्य विशेष । साईसहवास लाधला ॥९४॥</p>
<p>
	लेंडीवरी निघतां फेरी । भागोजी बाबांचा छत्रधारी । रक्तपिती भरली शरीरीं । परी सेवेकरी प्रथम तो ॥९५॥</p>
<p>
	धुनीपासले स्तंभापाशी । बाबा जेव्हां प्रात:समयासी । प्रत्यहीं बैसत निजारामासी । हजर सेवेसी तैं भाग्य ॥९६॥</p>
<p>
	हातापायांच्या पट्टया सोडणें । त्या त्या ठायींचे स्नायू मसळणें । मसळल्या ठायीं तूप चोळणें । सेवा करणें भाग्यानें ॥९७॥</p>
<p>
	पूर्वजन्मींचा महापापिष्टा । सर्वांगीं भरलें रक्तकुष्ट । भागोजी शिंदा महाव्याधिष्ट । परी भक्त वरिष्ठ बाबांचा ॥९८॥</p>
<p>
	रक्तपितीनें झडलीं बोटें । दुर्गंधीनें सर्वांग ओखटें । ऐसें जयाचें दुर्भाग्य मोठें । भाग्य चोखटें सेवासुखें ॥९९॥</p>
<p>
	किती म्हणूनि श्रोतयांला । वर्णूं बाबांच्या अगाध लीला । एकदां गांवीं ग्रंथिज्वर आला । चमत्कार झाला तो परिसा ॥१००॥</p>
<p>
	दादासाहेब खापडर्यांचा । मुलगा एक लहान वयाचा । आनंद साईसवासाचा । निजमातेच्या सह भोगी ॥१०१॥</p>
<p>
	आधींचि तो मुलगा लहान । ताप आला फणफणून । मातेचें ह्रदय आलें उलून । अस्वस्थमन जाहली ॥१०२॥</p>
<p>
	उमरावती वसतिस्थान । आलें मनीं करावें प्रस्थान । सायंकाळची वेळ साधून । आली आज्ञापन घ्यावया ॥१०३॥</p>
<p>
	अस्तमानची करितां फेरी । बाबा येतां वाडियाशेजारीं । बाई जाऊनि पाय धरी । निवेदन करी घडलें जें ॥१०४॥</p>
<p>
	आधींच स्त्रियांची जात घाबरी । तशांत मुलाची थांबेना शिरशिरी । ग्रंथिज्वराची भीतीही भारी । निवेदन करी घडलें तें ॥१०५॥</p>
<p>
	बाबा म्हणती मृदु वचन । “आभाळ आलें आहे जाण । पडेल पाऊस पीक पिकोन । आभाळ वितळून जाईल ॥१०६॥</p>
<p>
	भितां किमर्थ” ऐसें वदून । कफनी कंबरेपर्यंत उचलून । दाविते झाले सकळांलागून । ग्रंथी टवटवून उठलेल्या ॥१०७॥</p>
<p>
	कुक्कुटीच्या अंडयांएवढे । चार ग्रंथी चोहींकडे । म्हणतीं “पहा हें भोगणें पडे । तुमचें सांकडें मजलागीं” ॥१०८॥</p>
<p>
	हें दिव्य आणि अलौकिक । कर्म पाहोनि विस्मित लोक । भक्तांलागीं  दु:खेंही कैक । भोगिती अनेक संत कैशीं ॥१०९॥</p>
<p>
	मेणाहूनि मऊ चित्त । सबाह्य जैसें नवनीत । लाभेंवीण भक्तांसी प्रीत । भक्तचि गणगोत जयाचें ॥११०॥</p>
<p>
	एकदां ऐसा वर्तला प्रकार । नानासाहेब चांदोरकर । निघाले सोडूनि नंदुरबार । पंढरपुरासी जावया ॥१११॥</p>
<p>
	नाना परम भाग्यशाली । साईंची अनन्य सेवा फळली । भूवैकुंठप्राप्ति घडली । मामलत मिळाली तेथील ॥११२॥</p>
<p>
	येतांचि हुकूम नंदुरबारीं । जाणें होतें अति सत्वरीं । तांतडीनें केली तयारी । हेतु अंतरीं दर्शनाचा ॥११३॥</p>
<p>
	सहकुटुंब सहपरिवार । शिरडीसी जाण्याचा झाला विचार । शिरडीच प्रथम पंढरपुर । करूं नमस्कार बाबांसी ॥११४॥</p>
<p>
	नाहीं कोणासी पत्र पाठविलें । नाहीं निरोप वृत्त कळविलें । सरसामान सर्व आवरिलें । गाडींत बैसले लगबगां ॥११५॥</p>
<p>
	ऐसे जे हे नाना निघाले । नसेल शिरडींत कोणासी कळलें । परी साईंसी सर्व समजलें । सर्वत्र डोळे तयांचे ॥११६॥</p>
<p>
	नाना निघाले सत्वर । असतील निमगांवाचे शिंवेवर । तों शिरडींत चमत्कार । घडला साचार तो परिसा ॥११७॥</p>
<p>
	बाबा होते मशिदींत । म्हाळसापतीसमवेत । आपा शिंदे काशीराम भक्ता । वार्ता करीत बसलेले ॥११८॥</p>
<p>
	इतुक्यांत बाबा म्हणती अवघे । मिळूनि करूंया भजन चौघे । उघडले पंढरीचे दरवाजे । भजन मौजेनें चालवूं ॥११९॥</p>
<p>
	साई पूर्ण त्रिकालज्ञाता । कळूनि चुकली तयां ही वार्ता । नाना शिंवेच्या ओढयासी असतां । भजनोल्लासता बाबांसी ॥१२०॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	(भजन)</p>
<p>
	“पंढरपुरला जायाचें जायाचें । तिथेंच मजला राह्याचें ।</p>
<p>
	तिथेंच मजला राह्याचें राह्याचें । घर तें माझ्या रायाचें ॥”</p>
<p>
	स्वयें बाबा भजन म्हणती । भक्त बसलेले अनुवाद करिती । पंढरीचे प्रेमांत रंगती । इतक्यांत येती नानाही ॥१२१॥</p>
<p>
	सहकुटुंब पायीं लागत । म्हणती आतां आम्हांसमवेत । महाराजांनीं पंढरपुरांत । निवांत निश्चिंत बैसावें ॥१२२॥</p>
<p>
	तों ही विनंती नकोचि होती । आधींचि बाबांचि उल्हासवृत्ति । पंढरीगमन भजनस्थिति । जन निवेदिती तयांसी ॥१२३॥</p>
<p>
	नाना मनीं अति विस्मित । लीला पाहूनि आश्चर्यचकित । तयां पायीं डोई ठेवीत । सद्नदित जाहले ॥१२४॥</p>
<p>
	घेऊनियां आशीर्वचन । उदी प्रसाद मस्तकीं वंदून । चांदोरकर पंढरपुरालागून । निरोप घेऊन निघाले ॥१२५॥</p>
<p>
	ऐशा गोष्टी सांगूं जातां । होईल ग्रंथविस्तारता । म्हणऊनि आतां परदु:ख-निवृत्तिता । विषय आटोपता घेऊं हा ॥१२६॥</p>
<p>
	संपवूं हा अध्याय आतां । अंत नाहीं बाबांचे चरिता । पुढील अध्यायीं अवांतर कथा । वदेन स्वहितालागीं मी ॥१२७॥</p>
<p>
	ही मीपणाची अहंवृत्ती । जिरवूं जातां जिरेना चित्तीं । हा मी कोण न कळे निश्चितीं । साईचि वदतील निजकथा ॥१२८॥</p>
<p>
	वदतील नरजन्माची महती । कथितील निजभैक्ष्यवृत्ति । बायजाबाईची ती भक्ती । भोजनस्थितीही आपुली ॥१२९॥</p>
<p>
	सवें घेऊनि म्हाळसापती । तैसेचि कोते तात्या गणपती । बाबा निजत मशिदीप्रती । कैसिये रीतीं तें परिसा ॥१३०॥</p>
<p>
	पंत हेमाड साईंसी शरण । म्हणवी भक्त-पायींची वहाण । तयासी साईंची आज्ञा प्रमाण । झालें निरूपण येथवरी ॥१३१॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । विविधकथानिरूपणं नाम सप्तमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 22 Apr 2022 14:59:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 22 Apr 2022 15:10:43 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ६]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-6-122042200042_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
असो परमार्थु वा संसारू । जेथें सद्नुरु कर्णधारू । तेंचि तारूं पैलपारू । नेऊनि उतारू लावील ॥१॥
सुद्नुरु-शब्दें ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 6" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/22/full/1650619736-1424.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra chapter 6" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	असो परमार्थु वा संसारू । जेथें सद्नुरु कर्णधारू । तेंचि तारूं पैलपारू । नेऊनि उतारू लावील ॥१॥</p>
<p>
	सुद्नुरु-शब्दें वृत्ति उठतां । साईच प्रथम आठवती चित्ता । उभेच ठाकती सन्मुखता । ठेविती माथां निजहस्त ॥२॥</p>
<p>
	धुनीमाजील उदीसमन्वित । पडे जंव मस्तकीं वरदहस्त । ह्रदय स्वानंदें उलूनि येत । प्रेम ओसंडत नेत्रांतुनी ॥३॥</p>
<p>
	नवलगुरुहस्तस्पर्शविंदान । प्रलयाग्नींतही न होई जो दहन । त्या सूक्ष्मदेहाचें करी ज्वलन । भस्मीभवन करस्पर्शें ॥४॥</p>
<p>
	चुकूनि देवाची कथा वार्ता । निघाल्या उठे तिडीक माथां । वाचा प्रवाहे बाष्कळता । तयाही स्थिरता लाधावी ॥५॥</p>
<p>
	शिरीं ठेवितां करकमल । अनेका जन्मींचे परिपव्क मल । जाती धुवूनि होती निर्मल । भक्त प्रेमळ साईंचे ॥६॥</p>
<p>
	रूप पाहातां तें गोमटें । परमानंदें कंठ दाटे । नयनीं आनंदा पाझर फुटे । ह्रदयीं प्रकटे अष्टभाव ॥७॥</p>
<p>
	सोहंभावास जागवीत । निजानंदास प्रकटवीत । ठाय़ींच मीतूंपणा विरवीत । सामरस्यें अद्वैत मिरवी ॥८॥</p>
<p>
	वाचूं जातां पोथीपुराण । पावलोपावलीं सद्नुरुस्मरण । साईच नटे रामकृष्ण । करवी श्रवण निजचरित्र ॥९॥</p>
<p>
	परिसूं बैसतां भागवत । कृष्णचि साई नखशिखांत । वाटे गाई तें उद्धवगीत । भक्तनिजहित साधाया ॥१०॥</p>
<p>
	सहज बसावें करूं  वार्ता । तेथेंही साईनाथांची कथा । अकल्पितचि आठवे चित्ता । योग्य द्दष्टांता द्यावया ॥११॥</p>
<p>
	कागद घेऊनि लिहूं म्हणतां । अक्षरीं अक्षर येई न जुळवितां । परी तोचि जेव्हां लिहवी स्वसत्ता । लिहितां लिहितां लिहवेना ॥१२॥</p>
<p>
	जंव जंव अहंभाव डोकावत । निजकरें तया तळीं दडपीत । वरी करोनि निज शक्तिपात । शिष्यास कृतार्थ करीत ते ॥१३॥</p>
<p>
	काया - वाचा - मनें येतां । लोटांगणीं साई समर्था । धर्मार्थ-काम-मोक्ष हाता । चढती न मागतां आपैसे ॥१४॥</p>
<p>
	कर्म ज्ञान योग भक्ती । या चौमार्गीं ईश्वरप्राप्ती । जरी हीं चार चौबाजूं निघती । तरीही पोंचविती निजठाया ॥१५॥</p>
<p>
	भक्ती ही बाभुळवनींची वाट । खांचा खळगे अति बिकट । एकपावली परी ती नीट । हरीनिकट नेई कीं ॥१६॥</p>
<p>
	कांटा टाळूनि टाका पाय । हाचि एक सुलभ उपाय । तरीच निजधाम पावाल निर्भय । निक्षूनि गुरुमाय वदे हें ॥१७॥</p>
<p>
	मनाचे मळे जैं भक्तीं शिंपिलें । वैराग्य खुले ज्ञान फुले । कैवल्य फळे चित्सुख उफळे । अचूक चुकलें जन्ममरण ॥१८॥</p>
<p>
	मूळ परमात्मा स्वयंसिद्ध । तोचि सच्चिदानंद त्रिविध । उपाधियोगें झाला प्रबुद्ध । प्रकट बोध भक्तार्थ ॥१९॥</p>
<p>
	जैसा तो या त्रैगुण्यें व्यक्त । मायाही होऊनि क्रियाप्रयुक्त । सत्त्व-रज-तमा चाळवीत । करी सुव्यक्त निजगुण ॥२०॥</p>
<p>
	मृत्तिकेचा विशिष्ट आकार । तया नाम घट साचार । घट फुटतां नाम रूप विकार । निघूनि पार जातात ॥२१॥</p>
<p>
	हें अखिल जग मायेपासाव । परस्परां कार्यकारणभाव । मायाचि प्रत्यक्ष सावयव । होऊनि उद्भवली जगरूपें ॥२२॥</p>
<p>
	जगाआधीं मायेची स्थिती । पाहूं जातां नाहीं व्यक्ति । परमात्मरूपीं लीन होती । परम अव्यक्तीं संचली ॥२३॥</p>
<p>
	व्यक्त्त होतांही परमात्मरूप । अव्यक्त तरी ही परमात्मरूप । एवंच ही माया परमात्मरूप । अभेदरूप परमात्मीं ॥२४॥</p>
<p>
	मायेनें तमोगुणापासून । केले जडपदार्थ निर्माण । निर्जीव चलनवलनशून्य । क्रिया पूर्ण ही प्रथम ॥२५॥</p>
<p>
	मग मायेच्या रजोगुणीं । परमात्मचिद्नुणाचि मिळणी । होतां उघडली चैतन्यखाणी । स्वभावगुणीं उभंयांचे ॥२६॥</p>
<p>
	पुढें या मायेचा सत्त्वगुण । करी बुद्धितत्त्व निर्माण । तेथ परमात्म्याचा आनंदगुण । मिसळतां खेळां संपूर्णता ॥२७॥</p>
<p>
	एवं माया महाविकारी । क्रियोपाधि जों न स्वीकारी । पूर्वोक्त पदार्थांतें न करी । त्रिगुण तोंवरी अव्यक्त ॥२८॥</p>
<p>
	गुणानुरूप क्रिया कांहीं । न करितां माया व्यक्त नाहीं । राहूं शके अव्यक्त पाहीं । स्वयें जैं सेवी अक्रियत्व ॥२९॥</p>
<p>
	माया कार्य परमात्म्याचें । जग हें कार्य त्या मायेचें । ‘सर्वं खल्विदं ब्रम्हा’ - त्वाचें । ऐक्य तिहींचें तें हेंचि ॥३०॥</p>
<p>
	ऐसी जे हे अभेदप्रतीति । कैसेनि प्राप्त होय निश्चितीं । ऐसी उत्कटेच्छा जया चित्तीं । वेद श्रुति पहावी ॥३१॥</p>
<p>
	सारासार विचारशक्ति । वेदशास्त्र-श्रुति-स्मृती । गुरु-वेदांत-वाक्यप्रतीति । परमानंदप्राप्ति दे ॥३२॥</p>
<p>
	‘माझिया भक्तांचे धामीं । अन्नवस्त्रास नाहीं कमीं’ । ये अर्थीं श्रीसाई दे हमी । भक्तांसी नेहमीं अवगत ॥३३॥</p>
<p>
	‘मज भजती जे अनन्यपणें । सेविती नित्याभियुक्तमनें । तयांचा योगक्षेम चालविणें । ब्रीद हें जाणें मी माझें’ ॥३४॥</p>
<p>
	हेंचि भगवद्नीतावचन । साई म्हणती माना प्रमाण । नाहीं अन्नावस्त्राची वाण । तदर्थ प्राण वेंचूं नका ॥३५॥</p>
<p>
	देवद्वारीं मान व्हावा । देवापुढेंचि पदर पसरावा । तयाचाच प्रसाद जोडावा । मान सोडावा लौकिकीं ॥३६॥</p>
<p>
	काय लोकीं मान डोलविली । तितुक्यानें का भरसी भुली । आराध्यमूर्ति चित्तीं द्रवली । घर्में डवडवली पाहिजे ॥३७॥</p>
<p>
	हेंचि ध्येय लागो गोड । सर्वेंद्रियीं भक्तीचें वेड । इंद्रियविकारां भक्तीचे मोड । फुटोत कोड मग काय ॥३८॥</p>
<p>
	सदैव ऐसें भजन घडो । इतर कांहींहीं नावडो । मन मन्नामस्मरणीं जडो । विसर पडो अवघ्याचा ॥३९॥</p>
<p>
	नाहीं मग देह-गेह-वित्त । परमानंदीं जडेल चित्त । मन समदर्शी आणि प्रशांत । परिपूर्ण निश्चित होईल ॥४०॥</p>
<p>
	सत्संग केलियाची खूण ॥ वृत्तीसी पाहिजे समाधान । नानाठायीं वसे जें मन । तें काय ‘सल्लीन’ म्हणावें ॥४१॥</p>
<p>
	तरी होऊनि दत्तावधान । श्रोतं भावार्थे परिसिजे निरूपण । करितां हें साईचरित्र श्रवण । भक्तिप्रवण मन होवो ॥४२॥</p>
<p>
	कथासंगतीं होईल तृप्ति । लाधेल चंचलमना विश्रांति । होईल तळमळीची निवृत्ति । सुखसंवित्ति पावाल ॥४३॥</p>
<p>
	आतां पूर्वील कथानुसंधान । मशीदीचें जीर्णोद्धरण । रामजन्माचें कथाकीर्तन । चालवूं निरूपण पुढारां ॥४४॥</p>
<p>
	एक भक्त गोपाळ गुंड । जयासी बाबांची भक्ति उदंड । मुखीं बाबांचें नांव अखंड । काळखंडण ये रीती ॥४५॥</p>
<p>
	तयासी नव्हतें संतान । पुढें साईप्रसादेंकरून । पावता झाला पुत्ररत्न । चित्त प्रसन्न जाहलें ॥४६॥</p>
<p>
	झालें गोपाळ गुंडाचें मानस । यात्रा एक अथवा उरूस । भरवावा शिर्डीग्रामीं वर्षास । होईल उल्हास सर्वत्रां ॥४७॥</p>
<p>
	तात्या कोते दादा कोते । माधवरावादि प्रमुख जनांतें । रुचला विचार हा सकळांतें । तयारीतें लागले ॥४८॥</p>
<p>
	परी या वार्षिक उत्सवालागून । आधीं एक नियमनिर्बधन । जिल्हाधिकारी यांचें अनुमोदन । करणें संपादन आवश्यक ॥४९॥</p>
<p>
	तदर्थ उद्योग करूं जातां । गांवीं जो एक कुळकर्णी होता । कुत्सितपणें उलटा जातां । आला मोडता कार्यांत ॥५०॥</p>
<p>
	कुळकर्णी जो आडवा पडला । पहा कैसा परिणाम आला । यात्रा भरूं नये शिर्डीला । हुकूम झाला जिल्ह्याचा ॥५१॥</p>
<p>
	परी ही यात्रा भरावी शिर्डींत । बाबांचेंही हेंचि मनोगत । आज्ञा पूर्ण आशीर्वादयुक्त । होती तदर्थ झालेली ॥५२॥</p>
<p>
	ग्रामस्थांनीं पिच्छा पुरविला । जिवापाड यत्न केला । अधिकारियांनीं हुकूम फिरविला । मान राखिला सकळांचा ॥५३॥</p>
<p>
	तेव्हांपासू नि बाबांच्या मतें । यात्रा ठरविली रामनवमीतें । व्यवस्था पाहती तात्या कोते । यात्रा येते अपरंपार ॥५४॥</p>
<p>
	त्याच रामनवमीचे दिसीं । भजनपूजन समारंभेंसीं । तासे चौघडे वाजंत्रेंसीं । यात्रा चौपासी गडगंज ॥५५॥</p>
<p>
	वर्षास दोन नवीं निशाणें । समारंभें होईअ मिरवणें । मशिदीचे कळसास बंधाणें । तेथेंचि रोवणें अखेर ॥५६॥</p>
<p>
	त्यांतील एक निमोणकरांचें । दुजें निशाण दामू अण्णांचें । मिरवणें होतें थाटामाटाचें । फडकतें कळसाचे अग्रभागीं ॥५७॥</p>
<p>
	पुढें रामनवमीचा उत्सव । उरुसापोटीं कैसा समुद्भव । परिसा तें कथानक अभिनव । स्वानंदगौरव शिर्डीचें ॥५८॥</p>
<p>
	शके अठराशें तेहतीस सालीं । रामनवमी प्रथम झाली । उरुसापोटीं जन्मास आली । तेय़ूनि चालली अव्याहत ॥५९॥</p>
<p>
	प्रसिद्ध कृष्ण जागेश्वर भीष्म । तेथूनि या कल्पनेचा उगम । करावा रामजन्मोपक्रम । लाधेल परम कल्याण ॥६०॥</p>
<p>
	तेथपर्यंत केवळ उरूस । यात्रा भरत असे बहुवस । त्यांतूनि हा जन्मोत्सव सुरस । आला उदयास ते सालीं ॥६१॥</p>
<p>
	एकदां भीष्म स्वस्थचित्त । वाडियामाजीं असतां स्थित । काका पूजासंभारसमवेत । जावया मशिदींत उद्युक्त ॥६२॥</p>
<p>
	अंतरीं साईदर्शन - काज । वरी उरुसाचीही मौज । काका आधींच एक रोज । शिर्डींत हजर उत्सवार्थ ॥६३॥</p>
<p>
	पाहूनियां समय उचित । भीष्म तेव्हां काकांस पुसत । सद्‌वृत्ति एक मनीं स्फुरत । द्यात का मदत मजलागीं ॥६४॥</p>
<p>
	येथें वर्षास भरतो उरूस । रामजन्माचा हा दिवस । तरी जन्मोत्सव संपादायास । आहे अनायास ही संधी ॥६५॥</p>
<p>
	काकांस आवडला तो विचार । घ्या म्हणाले बाबांचा होकार । आहे तयांच्या आज्ञेवर । कार्यासी उशीर नाहीं मग ॥६६॥</p>
<p>
	परी उत्सवा लागे कीर्तन । उभा राहिला तोही प्रश्न । खेडेगांबीं हरिदास कोठून । ही एक अडचण राहिली ॥६७॥</p>
<p>
	भीष्म म्हणती कीर्तनकार । तुम्ही धरा पेटीचा स्वर । राधाकृष्णाबाई तयार । सुंठवडा वेळेवर करितील ॥६८॥</p>
<p>
	चला कीं मग बाबांकडे । विलंब हें शुभकार्या सांकडें । शुभासी जैं शीघ्रत्व जोडे । साधे रोकडें तैं कार्य ॥६९॥</p>
<p>
	चला आपण पुसावयास । आज्ञा कीर्तन करावयास । ऐसें म्हणतांच मशिदीस । दोघे ते समयास पातले ॥७०॥</p>
<p>
	काका आरंभ करितां पूरेतें । बाबाच जाहले प्रश्न पुसते । काय वाडयांत चाललें होतें । सुचेना तें काकांना ॥७१॥</p>
<p>
	तात्काळ बाबा भीष्माप्रती । तोच प्रश्न अन्यरीतीं । कां बुवा काय म्हणती । म्हणवूनि पुसती तयांतें ॥७२॥</p>
<p>
	तेव्हां काकांस आठव झाला । उद्दिष्टार्थ निवेदियेला । विचार बाबांचे मनास रुचला । निश्चित केला उत्सव ॥७३॥</p>
<p>
	दुसरे दिवशीं प्रात:समयाला । पाहूनि बाबा गेले लेंडीला । सभामंडपीं पाळणा बांधिला । थाट केला कीर्तनाचा ॥७४॥</p>
<p>
	पुढें वेळेवरी श्रोते जमले । बाबा परतले मीष्म उठले । काका पेटीवर येऊन बैसले । बोलावूं पाठविलें तयांना ॥७५॥</p>
<p>
	‘बाबा बोलाविती तुम्हांस’ । ऐकतां काकांचे पोटीं धस्स । काय झालें न कळे मनास । कथेचा विसर ना होवो ॥७६॥</p>
<p>
	ऐकूनि बाबांचें निमंत्रण । काकांची तेथेंचि झाली गाळण । बाबा कां बरें क्षुब्ध मन । निर्विन्घ कीर्तन होईल ना ॥७७॥</p>
<p>
	पुढें चालती मागें पहाती । भीत भीत पायर्‍या चढती । मंदमंद पाउलें पडती । चिंतावर्तीं बहु काका ॥७८॥</p>
<p>
	बाबा तयांस करिती विचारणा । कशास येथें बांधिला पाळणा । कथातात्पर्य आणि योजना । ऐकून मना आनंदले ॥७९॥</p>
<p>
	मग तेथें जवळ निंबर । तेथूनि घेऊनि एक हार । घाटला काकांच्या कंठीं सुंदर । मीष्माकरितां दिला दुजा ॥८०॥</p>
<p>
	पाळण्याचा प्रश्न परिसतां । उपजली होती मोठी चिंता । परी गळां तो हार पडतां । सर्वांस निश्चिंतता जाहली ॥८१॥</p>
<p>
	आधींच भीष्म बहुश्रुत । विविधकथापारंगत । कीर्तन जाहलें रसभरित । आनंद अपरिमित श्रोतयां ॥८२॥</p>
<p>
	बाबाही तैं प्रसन्नवदन । जैसें दिधलें अनुमोदन । तैसाचि उत्सव घेतला करवून । कीर्तनभजनसमवेत ॥८३॥</p>
<p>
	रामजन्माचिया अवसरीं । गुलाला बाबांच्या नेत्रांभीतरी । जाऊनि प्रकटले बाबा नरहरी । कौसल्येमंदिरीं श्रीराम ॥८४॥</p>
<p>
	गुलालाचें आला कोप । प्रत्यक्ष नरसिंहाचें रूप । सुरू झाले शिव्याशाप । वर्षाव अमूप जाहला ॥८६॥</p>
<p>
	पाळण्याचे होतील तुकडे । राधाकृष्णा मनीं गडबडे । राडील कैसा धड हें सांकडें । येऊनि पडे तिजलागीं ॥८७॥</p>
<p>
	सोडा सोडा लवकर सोडा । पाठीसी लागतां तिचा लकडा । काका सरकले पुढां । पाळणा सोडावयातें ॥८८॥</p>
<p>
	तंव तों बाबा अति कावले । काकांचिया अंगावर धांवले । पाळणा सोडणें जागींच राहिलें । वृत्तीवर आले बाबाही ॥८९॥</p>
<p>
	पुढें दुपारीं आज्ञा पुसतां । बाबा काय वदले आश्चर्यता । एव्हांच कैंचा पाळणा सोडितां । आहे आवश्यकता अजून ॥९०॥</p>
<p>
	ही आवश्यकता तरी कसली । अन्यथा नव्हे साई-वचनावली । विचार करितां बुद्धि स्फुरली । साङ्गता न झाली उत्सवाची ॥९१॥</p>
<p>
	येथवरी उत्सव झाला । दुसरा दिन जों नाहीं उगवला । नाहीं उगवला । नाहीं झाला जों गोपाळकाला । उत्सव सरला न म्हणावें ॥९२॥</p>
<p>
	एणेंप्रमाणें दुसरे दिनीं । गोपाळकाला कीर्तन होऊनी । पाळणा मग सोडायालागुनी । आज्ञा बाबांनीं दीधली ॥९३॥</p>
<p>
	पुढील वर्षीं भीष्म नव्हते । बाळाबुवा सातारकरांतें । कीर्तनार्थ आणविणें होतें । जाणें कवठयातें तयांना ॥९४॥</p>
<p>
	म्हणूनि बाळाबुवा भजनी । प्रसिद्ध ‘अर्वाचीन तुका’ म्हणूनि । घेऊनि आले काका महाजनी । उत्सव त्यांहातूनि करविला ॥९५॥</p>
<p>
	हेही जरी मिळाले नसते । काकाच कीर्तनार्थ उभे रहाते । दासगणू कृत आख्यान त्यांतें । पाठचि होतें नवमीचें ॥९६॥</p>
<p>
	तिसरे वर्षीं सातारकर । बाळाबुवांचेंच शिर्डीवर । आगमन जाहलें वेळेवर । कैसें सादर परिसा तें ॥९७॥</p>
<p>
	ऐकूनि साईबाबांची कीर्ति । दर्शनकाम उद्भवला चित्तीं । परी मार्गांत पाहिजे संगती । लाभेल केउती ही इच्छा ॥९८॥</p>
<p>
	बाळाबुवा स्वयें हरिदास । सातार्‍याकडे मूळ रहिवास । मुंबापुरीं परेळास । होता निवास ये समयीं ॥९९॥</p>
<p>
	बिर्‍हाड सिद्धाकवठें म्हणून । सातारा जिल्ह्यांत देवस्थान । तेथें रामनवमीचें कीर्तन । वर्षासन बुवांस ॥१००॥</p>
<p>
	आषाढीची एकादशी । रामनवमी चैत्रमासीं । या दोन वार्षिक उत्सवांसी । बाळाबुवांसीं संबंध ॥१०१॥</p>
<p>
	बादशाही सनद पाहतां । बडे बाबांचे खर्चाकरितां । रुपये चतुर्विंशती शतां । मूळ व्यवस्था संस्थानीं ॥१०२॥</p>
<p>
	असो या दोन उत्सवांलागीं । रुपये त्रिंशत बुवांची बिदागी । परी ते वर्षीं कवठयास मरगी । पडले प्रसंगीं ग्रामस्थ ॥१०३॥</p>
<p>
	तेणें रामनवमी राहिली । बुवांस तेथूनि पत्रें आलीं । यावें आतां पुढील सालीं । ग्रामचि खालीं झालासे ॥१०४॥</p>
<p>
	सारांश रामाची सेवा चुकली । बिदागीही जागीं राहिली । शिर्डीस जावया संधी फावली । भेट घेतली दीक्षितांची ॥१०५॥</p>
<p>
	दीक्षित बाबांचे परम भक्त । शिरडी - गमनाचा मनोगत । पुरेल त्यांनीं आणितां मनांत । स्वार्थ परमार्थ साधेल ॥१०६॥</p>
<p>
	पंचवार्षिक कवठयाची प्राप्ति । एकाच उत्सवीं बाबा देती । बाळाबुवा कां न आनंदती । आभारी होती बाबांचे ॥११७॥</p>
<p>
	असो पुढें एके दिवशीं । दासगणू येतां शिर्डीसी । देवविला प्रार्थूनि बाबांसी । उत्सव प्रतिवर्षीं तयांस ॥११८॥</p>
<p>
	तेथूनि पुढें हा कालवरी । होताहे जन्मोत्सव गडगजरीं । अन्नसंतर्पण आकंठवरी । महारापोरीं आनंद ॥११९॥</p>
<p>
	समाधीच्या महाद्वारीं । मंगल वाद्यांचिया गजरीं । साई - नामघोष अंबरीं । आनंदनिर्भरीं कोंदाटे ॥१२०॥</p>
<p>
	जैसी यात्रा वा उरूस । तैसेंच स्फूरलें गोपाळ गुंडास । कीं त्या जीर्ण मशिदीस । रूप गोंडस आणावें ॥१२१॥</p>
<p>
	मशिदीचाही जीर्णोद्धार । व्हावा आपुले हस्तें साचार । भक्त गोपाळ गुंडाचा निर्धार । पाषाण तयार करविले ॥१२२॥</p>
<p>
	परी हा जीर्णोद्धारयोग । नव्हता वाटे गुंडाचा भाग । या विशिष्ट कार्याचा सुयोग । आला मनाजोग पुढारा ॥१२३॥</p>
<p>
	वाटे बाबांच्या होतें मनीं । करावें हें नानांनीं । फरसबंदी मागाहुनी । करावी काकांनीं तदनंतर ॥१२४॥</p>
<p>
	तैसेंचि पुढें घडूनि आलें । आधीं आज्ञा मागतां थकले । म्हाळसापतीस मध्यस्थी घातलें । अनुमोदन दिधलें बाबांहीं ॥१२५॥</p>
<p>
	असो जेव्हां मशिदीसी । निशींत एका झाली फरसी । तेथूनि मग दुसरेच दिवशीं । बाबा गादीसीं बैसले ॥१२६॥</p>
<p>
	अकरा सालीं सभामंडप । तोही प्रचंड खटाटोप । केवढा तरी महाव्याप । जाहला थरकांप सकळिकां ॥१२७॥</p>
<p>
	तेंही कार्य येचि रीतीं । ऐसीच सकल परिस्थिति । असतां पूर्ण केलें भक्तीं । एके रात्रींत सायासें ॥१२८॥</p>
<p>
	रात्रीं प्रयासें खांब दाटावे । सकाळीं बाबांनीं उपटूं लागावें । अवसर साधूनि पुन्हां चिणावे । ऐसें शिणावें सकळिकीं ॥१२९॥</p>
<p>
	सर्वांनी घालावी कास । करावा रात्रीचा दिवस । पुरवावा मनाचा हव्यास । अति सायास सोसूनि ॥१३०॥</p>
<p>
	आधीं येथें उघडें आंगण । होतें इवलेंसें पटांगण । सभामंडपा योग्य स्थान । जाहलें स्फुरण दीक्षितां ॥१३१॥</p>
<p>
	लागेल तितुका पैका लावून । लोहाचे खांब कैच्या आणून । बाबा चावडीसी गेलेसे पाहून । काम हें साधून घेतलें ॥१३२॥</p>
<p>
	भक्तांनीं रात्रीचा करावा दिवस । खांब चिणावे करूनि सायास । चावडींतूनि परतण्याचा अवकाश । लागावें उपटण्यास बाबांनीं ॥१३३॥</p>
<p>
	एकदां अत्यंत कोपायमान । एका हातीं तात्यांची मान । दुजियानें एका खांबास हालवून । उपटून काढूं पहात ॥१३४॥</p>
<p>
	हाल हालवूनि केला ढिला । तात्यांचे माथ्याचा फेटा काढिला । कांडें लावून पेटवूनि दिला । खड्डय़ांत टाकिला त्वेषानें ॥१३५॥</p>
<p>
	तया समयींचे ते डोळे । दिसत जैसे अनल गोळे । सन्मुख पाहील कोण त्या वेळे । धैर्य गेलें सकळांचें ॥१३६॥</p>
<p>
	लगेच खिशांत हस्त घातला । रुपया एक बाहेर काढिला । तोही येथेंचि निक्षेपिला । जाणों तो केला सुमुहूर्त ॥१३७॥</p>
<p>
	शिव्याशापांचा वर्षाव झाला । तात्याही मनीं बहु घाबरला । प्रसंग बहु बिकट आला । प्रकार घडला कैसा हा ॥१३८॥</p>
<p>
	जन लोक विस्मयापन्न । हें काय आज आहे दुश्चिन्ह । तात्या पाटलावरील हें विन्घ । होईल निवारण कैसें कीं ॥१३९॥</p>
<p>
	भागोजी शिंद्यानें धीर केला । हळूहळू पुढें सरकला । तोही आयताच सांपडला । यथेष्ट घुमसिला बाबाहीं ॥१४०॥</p>
<p>
	माधवरावही हातीं लागले । तेही विटांचा प्रसाद पावले । जे जे मध्यस्थी करावया गेले । वेळींच अनुग्रहिले वाबांहीं ॥१४१॥</p>
<p>
	बाबांपुढें जाईल कोण । केबीं तात्याची करावी सोडवण । म्हणतां म्हणतां क्रोधही क्षीण । झाला शमन बाबांचा ॥१४२॥</p>
<p>
	तात्काळ दुकानदार बोलाविला । जरीकांठी फेटा आणविला । स्वयें तात्याचे डोक्यास बांधविला । शिरपाव दिधला जणूं त्यास ॥१४३॥</p>
<p>
	आश्चर्यचकित लोक झाला । काय कारण या रागाला । किमर्थ तात्यावरी हा हल्ला’ । केला गिल्ला बाबांनीं ॥१४४॥</p>
<p>
	कोपास चढले किंनिमित्त । क्षणांत पाहतां प्रसन्नचित्त । यांतील कारण यत्किंचित  । कोणासही विदित होईना ॥१४५॥</p>
<p>
	कधीं असत शांतचित्त । प्रेमें गोष्टी वार्ता वदत । कधीं न लागतां निमिष वा निमित्त । क्षुब्ध चित्त अवचित ॥१४६॥</p>
<p>
	असो ऐशा या बाबांच्या गोष्टी । एक सांगतां एक आठवती । सांगूं कोणती ठेवूं कोणती । प्रपंचवृत्ती बरवी ना ॥१४७॥</p>
<p>
	करवे न मजही आवड निवड । जैसी जिला मिळेल सवड । तैसी ती श्रोतयांची होड । श्रवणकोड पुरवील ॥१४८॥</p>
<p>
	पुढील अध्यायीं करावें श्रवण । वृद्धमुखश्रुत पूर्वकथन । साईबाबा हिंदू कीं यवन । करूं निरूपण यथामति ॥१४९॥</p>
<p>
	दक्षिणामिषें घेऊनि पैसा । जीर्णोद्धारार्थ लाविला कैसा । धोती पोती खंडदुखंडसा । देह कैसा दंडीत ॥१५०॥</p>
<p>
	कैसे परार्थ वेठीत कष्ट । निवारीत भक्तसंकट । पुढील अध्यायीं होईल स्पष्ट । श्रोते संतुष्ट होतील ॥१५१॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । रामजन्मोत्सवादि कथनं नाम षष्ठोध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्रुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 22 Apr 2022 14:57:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 22 Apr 2022 15:10:24 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ५]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-5-122042200041_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥
आतां पूर्वी कथानुसंधान । बाबा शिरडींत गुप्त होऊन । चांदपाटलासवें पुनरागमन । जाहलें तें कथन परिसावें ॥१॥
स्वयें ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 5" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/22/full/1650619610-4354.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra adhyaay 5" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥</p>
<p>
	आतां पूर्वी कथानुसंधान । बाबा शिरडींत गुप्त होऊन । चांदपाटलासवें पुनरागमन । जाहलें तें कथन परिसावें ॥१॥</p>
<p>
	स्वयें बाबांनीं वाहूनि जीवन । केली कैसी बाग निर्माण । गंगागीरादि संतसंमेलन । कथाविंदान पावन तें ॥२॥</p>
<p>
	पुढें कांहीं कालपर्यंत । बाबा होते जे जाहले गुप्त । मुसलमानाचे वर्‍हाडांत । आढळलें शिरडींत हें रत्न ॥३॥</p>
<p>
	तयाआधींच देवीदास । करूनि होते शिरडींत वास । पुढें आले जानकीदास । गोसावी शिरडीस राहावया ॥४॥</p>
<p>
	तो कैसा घडला प्रकार । कथितों आतां सविस्तर । होऊनियां अवधानपर । श्रोतां सादर परिसिजे ॥५॥</p>
<p>
	औरंगाबाद जिल्ह्यांतील । धूप खेडेगांवामधील । मुसलमान भाग्यशील । चांदपाटील नांव जया ॥६॥</p>
<p>
	सफर करितां औरंगाबादेची । घोडी एक हरवली त्याची । दोन महिने दाद न तिची । आतां कशाची आढळते ॥७॥</p>
<p>
	पाटील पूर्ण निराश झाले । घोडीलागीं बहु हळहळले । खोगीर पाठीवरी मारिलें । माघारां फिरले मार्गानें ॥८॥</p>
<p>
	औरंगाबाद मागें टाकिलें । साडेचार कोस आले । मार्गांत आंब्याचें झाड लागलें । तळीं दिसलें । तळीं दिसलें हें रत्न ॥९॥</p>
<p>
	डोईस टोपी अंगांत कफनी । खाकेस सटका तमाखू चुरूनी । तयारी केली चिलीम भरूनी । नवल ते स्थानीं वर्तलें ॥१०॥</p>
<p>
	चांदपाटील रस्त्यानें जातां । फकीर ऐकिला हांका मारितां । ये रे चिलीम पिऊनि जा पुढतां । छायेखालता बैस जरा ॥११॥</p>
<p>
	फकीर पुसे हें खोगीर कसलें । पाटील म्हणे जी घोडें हरवलें । मग तो म्हणे जा शोध ते नाले । घोडें सांपडलें तात्काळ ॥१२॥</p>
<p>
	चांदपाटील विस्मित झाला । मनीं म्हणे अवलिया भेटला । पार नाहीं ह्या कृत्याला । मानव ह्याला म्हणूं नये ॥१३॥</p>
<p>
	पुढें तो घोडी घेऊनि परतला । पाटील पूर्वस्थळीं पातला । फकीर पासीं बैसवी त्याला । चिमटा उचलिला स्वहस्तें ॥१४॥</p>
<p>
	मग तो तेथेंचि मातींत खुपसिला । आंतूनि प्रदीप्त निखारा काढिला । हातांतील चिलमीवर ठेविला । सटका घेतला उचलुनी ॥१५॥</p>
<p>
	पुढे छापी भिजवावयास  । पाणी नाहीं जवळपास । सटका आपटी जमिनीस । पाणी निघावयास लागलें ॥१६॥</p>
<p>
	छापी भिजवूनियां पिळिली । मग ती चिलमीसभोंवती वेष्टिली । स्वयें प्याला तयाही पाजिली । मती गुंगली पाटलाची ॥१७॥</p>
<p>
	पडला फकीराम आग्रह । पवित्र करा हो माझें गृह । पाटिलावरी केला अनुग्रह । लीलाविग्रहधारकें या ॥१८॥</p>
<p>
	दुसरे दिवशीं गावांत गेले । पाटिलाच्या येथें उतरले । कांहीं काळ तेथेंचि राहिले । पुढें ते परतले शिरडीस ॥१९॥</p>
<p>
	हा चांदपाटील कारभारी । धूप खेडयाचा गामाधिकारी । स्वस्त्रीच्या भाच्यालागीं नोवरी । जुळली सोडरीक शिर्डीत ॥२०॥</p>
<p>
	चांदभाईच्या कुटुंबाचा । लग्नायोग्य जाहला भाचा । सुयोग शरीरसंबंधाचा । घडला शिरडीच्या वधूचा ॥२१॥</p>
<p>
	घेऊनि सवें गाडया घोडीं । वर्‍हाड निघालें यावया शिरडीं । मग त्या चांदभाईचे ओढी । बाबाही वर्‍हाडीं प्रविष्ट ॥२२॥</p>
<p>
	लगन झालें वर्‍हाड परतलें । बाबा एकटेचि मागें राहिले । राहिले ते राहूनि गेले । भाग्य उदेलें शिरडीचें ॥२३॥</p>
<p>
	साई अविनाश पुरातन । नाहीं हिंदू ना यवन । जात पात कुळ गोतहीन । स्वरूप जाण निजबोध ॥२४॥</p>
<p>
	‘साई साई’ म्हणती जे जन । तें तरी काय नामाभिधान । ‘या साई’ म्हणवूनि बहुमान - । पुर:सर संबोधन जें तें हें ॥२५॥</p>
<p>
	खंडोबाचे देउळापाशीं । म्हाळसापतीचिया खळियासी । आरंभीं बाबा वर्‍हाडानिशीं । उतरल्या दिवशीं हें पडलें ॥२६॥</p>
<p>
	आरंभीं तें भगताचें खळें । पुढें तें अमीनभाईचें झालें । वर्‍हाड लग्नाचें जें आलें । येथेंचि उतरलें वडातळीं ॥२७॥</p>
<p>
	गाडया सर्व सुटल्या खळ्यांत । खंडोबाचे पटांगणांत । बाबाही तेथें व्र्‍हाडासमेत । सर्वासमवेत उतरले ॥२८॥</p>
<p>
	हे बाल फकीर गाडींतूनि उतरले । प्रथम भगताचे द्दष्टीस जैं पडले । ‘या साई’ म्हणूनि सामोरे गेले । नाम तें पडलें तेथूनि ॥२९॥</p>
<p>
	पुढें मग तेव्हांपसून । ‘साई साई’ ऐसें म्हणून । मारूं लागले हाकही जन । नामाभिधान तें झालें ॥३०॥</p>
<p>
	मग ते तेथें चिलीम प्याले । मशिदींत वास्तव्य केलें । देवीदास - सहवासीं रमले । आनंदले शिरडींत ॥३१॥</p>
<p>
	कधीं बैठक चावडींत । कधीं देवीदासाचे संगतींत । कधीं मारुतीचे देवालयांत । स्वच्छंद रत राहावें ॥३२॥</p>
<p>
	हे देवीदास शिरडी गांवीं । होते आधींच बाबांचे पूर्वीं । पुढें आले जानकीदास गोसावी । महानुभावी शिरडींत ॥३३॥</p>
<p>
	तया जानकीदासासवें । महाराजांनीं बोलत बसावें । किंवा महाराज जेथें असावे । तेथें बसावें जानकीदासें ॥३४॥</p>
<p>
	उभयतांसी मोठें प्रेम । बैठकी होती नित्यनेम । ऐसा तयांचा समागम । सुख परम सकळिकां ॥३५॥</p>
<p>
	तैसेचि एक गंगागीर । महाप्रसिद्ध वैष्णववीर ॥ गृहस्थाश्रमी पुणतांबेकर । शिरडीस वरचेवर आगमन ॥३६॥</p>
<p>
	आरंभीं साई विहिरीवरि । उभय हस्तीं मातीच्या घाघरी । पाणी वाही हें देखोनि अंतरीं । आश्चर्य करीत गंगागीर ॥३७॥</p>
<p>
	ऐसी ही साईची द्दष्टाद्दष्ट । होतांचि बुवा वदले तैं स्पष्ट । धन्य शिरडीचें भाग्य वरिष्ठ । जोडलें श्रेष्ठ हें रत्न ॥३८॥</p>
<p>
	हा आज खांदां पाणी वाही । परी ही मूर्ति सामान्य नाहीं । होतें या भूमीचें पुण्य कांहीं । तरीच ये ठायीं पातली ॥३९॥</p>
<p>
	तैसेचि एक आणिक संत । आनंदनाथ नामें विख्यात । तयांचेंही हेंचि भाकित । कर्तृत्व अद्भुत करितील हे ॥४०॥</p>
<p>
	महाप्रसिद्ध आनंदनथ । येवलें ग्रामीं मठ स्थापीत । कांहीं शिरडीकरांसमवेत । आले ते शिरडींत एकदां ॥४१॥</p>
<p>
	अक्कलकोटकर महापुरुष । आनंदनाथ तयांचे शिष्य । म्हणाले पाहूनि साईस समक्ष । ‘हिरा हो प्रत्यक्ष हा हिरा’ ॥४२॥</p>
<p>
	आज जरी हा उकिरडयावर । तरी हा हिरा नाहीं गार । आनंदनाथांचे हे उद्नार । बाबांचें पोरवय  होतें तों ॥४३॥</p>
<p>
	ध्यानांत ठेवा हे माझे बोल । पुढें तुम्हांसी आठव येईल । भविष्य कथूनि हें पुढील । मग ते येवल्यासी परतले ॥४४॥</p>
<p>
	केश माथ्याचे सबंध राखीत । डोकें न कधीं मुंडवीत । पहिलवानासम पेहेराव करीत । तरुण वयांत हे साई ॥४५॥</p>
<p>
	रहात्यासी बाबा जेव्हां जात । झेंडू जाई जुई आणीत । निजहस्तें उखरीं खुपसीत । पाणीही घालीत नेमानें ॥४६॥</p>
<p>
	वामन तात्या तयांचे भक्त । मृत्तिकेचे घडे तत्प्रीत्यर्थ । कच्चे दोन प्रत्यहीं पुरवीत । बाबा शिंपीत निजहस्तें ॥४७॥</p>
<p>
	आडावरील कुंडीमधून । पाणी आणीत खांदां वाहून । घडे मग होतां अस्तमान । ठेवीत नेऊन निंबातळीं ॥४८॥</p>
<p>
	ठेवण्याचाच अवकाश तेथ । जागचे जागींच भंगूनि जात । उदयीक तात्या आणूनि देत । घडे तयांप्रत नूतन ॥४९॥</p>
<p>
	घडा भाजला टिकाऊ बरा । परी त्यां लागे कच्चा कोरा । आव्याचे श्रमावीण कुंभारा । आधींच विकरा घडयाचा ॥५०॥</p>
<p>
	तीन वर्षें हाचि उद्योग । उघडया जागीं उठविला बाग । तेचि स्थानीं आज हा सुयोग । वाडयाचा उपभोग जन घेती ॥५१॥</p>
<p>
	येथेंचि निंबातळीं साधकां । भाई नामें भक्तें एका । अक्कलकोटच्या स्वामीच्या पादुका । पूजाकामुकां स्थापिल्या ॥५२॥</p>
<p>
	अक्कलकोटचे स्वामीसमर्थ । होते भाईंचें उपास्यदैवत ॥ छबी पूजन नित्यनियमित । भाई करीत निष्ठेनें ॥५३॥</p>
<p>
	वाटलें अक्कलकोटीं जावें । पादुकांचें दर्शन घ्यावें । पूजाउपचार समर्पावे । मनोभावें पादुकांसी ॥५४॥</p>
<p>
	मुंबईहूनि निघावयाची । केली सर्व तयारी साची । उद्यां निघणार तो निश्चय तैसाचि । राहूनि शिरडीची वाट धरिली ॥५५॥</p>
<p>
	उद्यां जाणर तों आज स्वप्न । स्वामीसमर्थ-आज्ञापन । शिरडीस सांप्रत मम स्थान । तेथें तूं प्रस्थान करीं गा ॥५६॥</p>
<p>
	ऐशी ती आज्ञा शिरीं वंदून । भाई निघाले मुंबईहून । शिरडीस एक षण्मास राहून । आनंदसंपन्न जाहले ॥५७॥</p>
<p>
	भाई पूर्ण निष्ठावंत । स्मरणीं रहावा तो द्दष्टांत । म्हणोनि निंबातळीं तेथ । पादुका स्थापीत स्वामींच्या ॥५८॥</p>
<p>
	शके अठराशें चौतीस सालीं । श्रावण शुद्ध पर्वकाळीं । पादुका स्थापिल्या निंबातळीं । भजनमेळीं सप्रेमें ॥५९॥</p>
<p>
	दादा केळकरांच्या हस्तें । पादुका - प्रस्थापन करविलें मुहूर्तें । सशास्त्र विधिविधानांतें । केले निजहस्तें उपासनींनीं ॥६०॥</p>
<p>
	पुढील व्यवस्थेची निरवण । पूजा करी दीक्षित ब्राम्हाण । व्यवस्था पाही भक्त सगुण । ऐसें हें आख्यान पादुकांचें ॥६१॥</p>
<p>
	ऐसेचि हे संत निर्विकार । प्रत्यक्ष ईश्वरी अवतार । करावया जगदुद्धार । उपकारार्थ अवतरती ॥६२॥</p>
<p>
	पुढें कांहीं दिवस जातां । घडली आश्चर्यकारक वार्ता । श्रोतीं सादर श्रवण करितां । नवल चित्ता वाटेल ॥६३॥</p>
<p>
	तांबोळी एक मोहिद्दीन भाई । तयासवें तेढ पडूनि कांहीं । गेली झोंबी जुंपोनि पाहीं । लागली लढाई परस्पर ॥६४॥</p>
<p>
	पहिलवान दोघे कुशल  । होणारापुढें न चले बल । मोहिद्दीन होऊनि प्रबळ । बाबा हतबळ जित झाले ॥६५॥</p>
<p>
	तेथूनि मग निश्चय केला । पोशाख अवघा बाबांनीं बदलला । कफनी ओढीली लंगोट लाविला । फडका गुंडाळिला माथ्यासी ॥६६॥</p>
<p>
	केलें गोणाचें वरासन । गोणाचेंचि अंथरूण । फाटकें तुटकें करोनि परिधान । त्यांतचि समाधान मानावें ॥६७॥</p>
<p>
	“गरीबी अव्वल  बादशाही । अमीरीसे लाख सवाई । गरीबोंका अल्ला भाई । अक्षयीं साई वदत कीं” ॥६८॥</p>
<p>
	गंगागीरही येचि स्थिति । तालिमबाजीची अती प्रीति । एकदां खेळत असतां कुस्ती । जाहली उपरती तयांतें ॥६९॥</p>
<p>
	प्राप्त काळ घटका आली । एका सिद्धाची वाणी वदली । ‘देवसवेंचि करीत केली । तनू ही झिजविली पाहिजे’ ॥७०॥</p>
<p>
	कुस्ती खेळतां खेळतां कानीं । पडली अनुग्रहरूप ही वाणी । संसारावर ओतूनि पाणी । परमार्थभजनीं लागले ॥७१॥</p>
<p>
	पुणतांब्याचिया निकटीं । नदीच्या उभय प्रवाहापोटीं । आहे बुवांचा मठ त्या बेटीं । सेवेसाठीं शिष्यही ॥७२॥</p>
<p>
	असो पुढें साईनाथ । विचारल्याचेंचि उत्तर देत । स्वयें आपण कोणासमवेत । कधींही बोलत नसत ते ॥७३॥</p>
<p>
	दिवसा बैथक निंबाखालीं । कधीं शिवेच्या ओढयाजवळी । बाभळीची आडवी डहाळी । बैसावें साउलिये तियेच्या ॥७४॥</p>
<p>
	कधीं तेथूनि एक मैलावरी । निमगांव गांवाचिया शेजारीं । बाबा दिवसा दुपारीं तिपारीं । स्वेच्छाचारी हिंडत ॥७५॥</p>
<p>
	प्रसिद्ध त्रिंबक डेंगळ्याघरीं । निमगांव गांवाची जहागिरदारी । तेथील बाबासाहेब डेंगळ्यांवरी । प्रीति भारी बाबांची ॥७६॥</p>
<p>
	निमगांवावरी जातां फेरी । बाबानीं जावें तयांचे घरीं । अति प्रेमें तयांबरोबरी । दिवसभरी  बोलावें ॥७७॥</p>
<p>
	बंधु तयांसी होते लहान । नानासाहेब नामाभिधान । तयांसी नव्हतें पुत्रसंतान । तेणें ते खिन्न मानसीं ॥७८॥</p>
<p>
	प्रथम कुटुंबासी योग मंद । म्हणूनि केला द्वितीय संबंध । तरीही चुकेना ऋणानुबंध । दैवनिर्बंध अगाध ॥७९॥</p>
<p>
	पुढें साईंचे दर्शनाला । जनसमुदाय लोटूं लागला । महिमा साईंच वाढत गेला । वार्ता नगराला पोहोंचली ॥८१॥</p>
<p>
	तेथें सरकारदरबारीं चलन । नानांचें होतें मोठें वळण । तैसेचि चिंदबर केशव म्हणून । तेही चिटणीस जाण जिल्ह्याला ॥८२॥</p>
<p>
	साईसमर्थ दर्शनपात्र । घेऊनि आपुले इष्ट मित्र । दर्शनार्थ यावें पुत्र कलत्र । धाडिलें पत्र तयांसी ॥८३॥</p>
<p>
	ऐसे एकामागून एका । शिरडीस येऊं लागले अनेक । वाढळा जैसा बाबांचा लौकिक । परिवारही देख तैसाचि ॥८४॥</p>
<p>
	नलगे जरी कोणाचा सांगात । तरी दिवसा भक्तपरिवराक्रांत । अस्तमानानंतर शिरडींत । पडक्या मशिदींत निजावें ॥८५॥</p>
<p>
	चिलीम तमाखू टमरेल । अंगांत कफनी पायघोळ । माथ्यासी फडका धवल । सटका जवळ सर्वदा ॥८६॥</p>
<p>
	तें धूत वस्त्र एक धवल । वामकर्णामागें सुढाळ । जटाजूटसम देऊनि पीळ । गुंडाळी तो शिरासी ॥८७॥</p>
<p>
	या वसनाचें आच्छादन । आठाठ दिन स्नानविहीन । पायीं जोडा ना वहाण । एक आसन गोणाचें ॥८८॥</p>
<p>
	पोत्याचा तुकडा एका । तयावरी नित्य बैठक । तक्या कसा तो नाहीं ठाऊक । आराणुक कैसेनी ॥८९॥</p>
<p>
	तोंवरी तें जीर्ण तरट । तीच त्यांची आवडती बैठक । सदा सर्वदा तैशीच निष्टांक । अष्टौ प्रहा ते जागीं ॥९०॥</p>
<p>
	तेंचि आसन वा आस्तरण । कांसे एक कौपीन परिधान । नाहीं दुजें वस्त्र प्रावरण । शीतनिवारण एक धुनी ॥९१॥</p>
<p>
	दक्षिणाभिमुख आसनस्थ । कठडयावरी वाम हस्त । समोर धुनीकडे अवलोकीत । बाबा मशिदींत बैसत ॥९२॥</p>
<p>
	अहंकार-वासनासमवेती । नानाविध वृत्तींच्या आहुती । प्रपंचप्रवृत्ति समग्र हविती । युक्तिप्रयुक्तीं धुनींत ॥९३॥</p>
<p>
	ऐसिया त्या प्रखर कुंडा । लाविला ज्ञानाभिमानाचा ओंडा । ‘अल्ला-मालीक’ सदैव तोंडा । तयाचा झेंडा अखंड ॥९४॥</p>
<p>
	मशीद तरी ती केउती । अवघी जागा दोन खण ती । त्यांतचि बसती उठती निजती । भेट देती समस्तां ॥९५॥</p>
<p>
	गादी तक्या हें तों आतां । भक्तसमुदाय मिळाला भवंता । आरंभीं तयांच्या निकट जातां । सकळांस निर्भयता नव्हतीच ॥९६॥</p>
<p>
	सन एकोणीसशें बारा । तेथूनि नवा प्रकार सारा । मशिदीचिया स्थित्यंतरा । आरंभ खरा तेथूनि ॥९७॥</p>
<p>
	ढोपर ढोपर जमिनीसी । खड्डे होते मशिदीसी । एके निशींत झाली फरसी । भावासरसी भक्तांच्या ॥९८॥</p>
<p>
	मशिदीचिया वसती-आधीं । बाबा रहात तकियामधीं । तेथेंचि कित्येक कालावधी । अबाधित रमले ते ॥९९॥</p>
<p>
	तेथेंचि चरणीं बांधोनि घुंगुर । खंजिरीचिया तालावर । नाचावें बाबांनीं अतिसुंदर । गावेंही मधुर प्रेमानें ॥१००॥</p>
<p>
	आरंभीं साई समर्थांस । दीपोत्सवाची मोठी हौस । तदर्थ स्वयें दुकानदारांस । तेल मागावयास ते जात ॥१०१॥</p>
<p>
	घेऊनियां टमरेल हातीं । वाण्यातेल्यांच्या दुकानांप्रती । स्वयें तेलाची भिक्षा मागती । आणूनि भरती पणत्यांत ॥१०२॥</p>
<p>
	पणत्या लावीत झगझगीत । देउळीं आणि मशिदींत । ऐसें कांहीं दिवसपर्यंत । सदोदित चाललें ॥१०३॥</p>
<p>
	दीपाराधनीं बहु प्रीत । दिवाळीचाही दीपोत्सव करीत । चिंध्या काढुनी वाती वळीत । दीप उजळीत मशीदीं ॥१०४॥</p>
<p>
	तेल तों रोज आणीत फुकट । वाणियां मनीं आलें कपट । सर्वांमिळूनि केला कट । पुरे कटकट ही आतां ॥१०५॥</p>
<p>
	पुढें नित्यनियमानुसारतां । बाबा तेल मागूं येतां । सर्वांनींही नाहीं म्हणतां । काय आश्चर्यता वर्तली ॥१०६॥</p>
<p>
	बाबा निमुट गेले परत । कांकडे सुकेचि ठेविले पणत्यांत । तेल नसतां हें काय करीत । वाणी पहात मौज ती ॥१०७॥</p>
<p>
	मशिदीच्या जोत्यावरील । बाबा उचलूनि घेती टमरेल । त्यांत होतें इवलेंसें तेल । कष्टें लागेल सांजवात ॥१०८॥</p>
<p>
	त्या तेलांत घातलें पाणी । स्वयें बाबा गेले पिऊनी । ऐसें तें ब्रम्हार्पण करूनी । निव्वळ पाणी घेतलें ॥१०९॥</p>
<p>
	मग तें पाणी पणत्यांत ओतुनी । सुके कांकडे पूर्ण भिजवुनी । तयांसी कांडें ओढूनि लावुनी । दीप पेटवूनि दाविले ॥११०॥</p>
<p>
	पाहूनि तें पाणी पेटे । वाणी घालिती तोंडांत बोटें । बाबांसी आपण वदलों खोटें । केलें ओखटें मनीं म्हणती ॥१११॥</p>
<p>
	तेल नसतां अणुमात्र । पणत्या जळाल्या सर्व रात्र । वाणी साईंच्या कृपेसी अपात्र । वदूं सर्वत्र लागले ॥११२॥</p>
<p>
	बाबांचा हा काय प्रताप । असत्य भाषणें झालें पाप । दिधला बाबांसी व्यर्थ संताप । हा पश्चात्ताप वाणियां ॥११३॥</p>
<p>
	बाबांच्या तें नाहीं मनीं । रागद्वेषां नातळे जनीं । शुत्र मित्र तयां ना कोणी । सर्वही प्राणी सारिखे ॥११४॥</p>
<p>
	असो आतां पूर्वानुसंधान । कुस्तींत यशस्वी मोहिद्दीन । याहूनि पुढील चरित्रमहिमान । दत्तावधान परिसिजे ॥११५॥</p>
<p>
	कुस्तीनंतर पांचवे वर्षीं । फकीर अहमदनगरनिवासी । ‘जव्हाअल्ली’ नाम जयासी । आला रहात्यासी सशिष्य ॥११६॥</p>
<p>
	पाहूनि एक उघडी बखळ । वीरभद्राचे देउळाजवळ । फकीरानें दिधला तळ । फकीर तो सबळ दैवाचा ॥११७॥</p>
<p>
	जरी नसता तो दैवाचा । तरी तयातें लाधता कैंचा । साईंसारखा शिष्य मौजेचा । डंका जयाचा सर्वत्र ॥११८॥</p>
<p>
	लोक गांवांत होते अनेक । त्यांतही होते मराठे कैक । त्यांतील भगू सदाफळ एक । जाहला सेवक तयाचा ॥११९॥</p>
<p>
	फकीर होता मोठा पढीक । कुराण शरीफ करतलामलक । स्वार्थी परमार्थी आणि भाविक । लागले अनेक तच्चरणीं ॥१२०॥</p>
<p>
	इदगा बांधावया आरंभ केला । ऐसा कांहीं काळ गेला । वीरभद्रदेव बाटविला । आरोप आला त्याजवरी ॥१२१॥</p>
<p>
	पुढें तो इदगा बंद पडला । फकीर गांवाबाहेर घालविला । तेथूनि मग तो शिरडीसी आला । मशिदींत राहिला बाबांपाशीं ॥१२२॥</p>
<p>
	फकीर मोठा मृदुभाषणी । गांव लागला तयाचे भजनीं । बाबांसही कांहीं केली करणी । घातली मोहिनी जन म्हणती ॥१२३॥</p>
<p>
	हो म्हणे तूं माझा चेला । स्वभाव बाबांचा बहु रंगेला । हूं म्हणतां फकीर संतोषला । घेऊनि निघाला बाबांसी ॥१२४॥</p>
<p>
	बाबांसारिखा शिष्य सधरू । जव्हारअल्ली जाहले गुरु । मग दोघांचा जाहला विचारू । रहिवास करूं रहात्यांत ॥१२५॥</p>
<p>
	गुरु नेणे शिष्याची कळा । शिष्य जोण गुरूच्या अवकळा । परीन केव्हांही अनादर केला । स्वधर्म राखिला शिष्याचा ॥१२६॥</p>
<p>
	गुरुमुखांतूनि बाहेर आलें । “योग्यायोग्य” नाहीं पाहिलें । वचन वरिचेवरी झेलिलें । पाणीही वाहिलें गुरुगृहीं ॥१२७॥</p>
<p>
	ऐसी चालली गुरुसेवा । शिरडीसी यावें केव्हां । ऐसें होऊं लागलें जेव्हां । काय मग तेव्हां जाहलें ॥१२८॥</p>
<p>
	ऐसें वरचेवरी होऊं लागलें । रहात्यासचि राहूं लागले । फारचि फकीरा नादीं भरले । वाटलें अंतरले शिरडीला ॥१२९॥</p>
<p>
	जनांसी वाटे जव्हारअल्ली । साईसी निजयोगबळें आकळी । साईची तोंकळा वेगळी । अभिमान जाळी हेहाचा ॥१३०॥</p>
<p>
	साईसी कोठूनि आला अभिमान । श्रोते सहज करितील अनुमान । परी हें लोकसंग्रहार्थ आचरण । अवतरणकार्य हेंच ॥१३१॥</p>
<p>
	शिरडीस्थ बाबांचे प्रेमी भक्त । बाबांचें ठायीं अति आसक्त । तयांतें बाबांपासूनि वियुक्त । राहणें अयुक्त वाटलें ॥१३२॥</p>
<p>
	साई सर्वस्वी तयांआधीन । पाहूनि ग्रामस्थ उद्विग्न मन । कैसें करावें तयां स्वाधीन । विचारीं निमग्न जाहले ॥१३३॥</p>
<p>
	जैसें कनक आणि कांति । जैसा दीप आणि दीप्ति । तैसीचि हे गुरुशिष्यस्थिति । ऐक्यप्रतीति उभयांसी ॥१३४॥</p>
<p>
	मग तें शिरडीचें भक्तमंडळ । गेलें रहात्यास त्या इदग्याजवळ । पाहूं प्रयत्न वेंचूनि प्रबळ । बाबांसह सकळ मग परतूं ॥१३५॥</p>
<p>
	बाबा तैं देती उलट बुद्धि । “फकीर आहे महाक्रोधी । लागूं नका तयाचे नादीं । तो मज कधींच न विसंबे ॥१३६॥</p>
<p>
	तुम्ही येथूनि करा पलायन । आतांच येईल गांवांतून । करील तुमचें निसंतान । परम कठीण क्रोध त्याचा ॥१३७॥</p>
<p>
	राग तयाचा मोठा कडक । येतांचि होईल लालभडक । जा जा निघून जा कीं तडक । धरा कीं सडक शिरडीची” ॥१३८॥</p>
<p>
	आतां पुढें काय कर्तव्यता । बाबा तों कथिती उलटी कथा । इतुक्यांत फकीर आला अवचिता । जाहला पुसता तयांतें ॥१३९॥</p>
<p>
	“आलांत काय पोरासाठीं । काय करीतसां तेथें गोष्टी । शिरडीस माधारा न्यावें हें पोटीं । परी या कष्टीं पडूं नका” ॥१४०॥</p>
<p>
	ऐसें जरी तो प्रथम वदला । ग्रामस्थांपुढें तोही कचरला । म्हणे मलाही घेऊनि चला । सवें मुलाला नेऊं कीं ॥१४१॥</p>
<p>
	असो फकीर आला सवें । तयासही न बाबांस सोडवे । बाबांसही न तया विसंबबे । न कळे संभवे हें कैसें ॥१४२॥</p>
<p>
	साई परब्रम्हा पुतळा । जव्हारअल्ली भ्रमाचा भोपळा । देवीदासें कसास लाविला । भोपळा फुटला शिरडींत ॥१४३॥</p>
<p>
	देवीदासाचा बांधा सुंदर । डोळे सतेज रूप मनोहर । दहा अकार वर्षांचा उमर । प्रथम शिरडीवर आला तैं ॥१४४॥</p>
<p>
	ऐसा तो अल्प वयासी । एक लंगोट मात्र कासेसी । मारुतीचे देउळासी । तीर्थवासी तो उतरला ॥१४५॥</p>
<p>
	आप्पा भिल्ल म्हाळसापती । तयाकडे जाती येती । काशीरामादिक शिधा देती । वाढली महती तयाची ॥१४६॥</p>
<p>
	वर्‍हाडासमवेत जैं बाबा आले । तया आधींच बारा सालें । देवीदास येऊनि पहिले । बसते जाहले शिरडींत ॥१४७॥</p>
<p>
	आप्पा भिल्ल पाटीवर शिकवी । व्यंकटेशस्तोत्र पढवी । सर्वांकरवीं मुखोद्नत म्हणवी । पाठ चालवी नेमानें ॥१४८॥</p>
<p>
	देवीदास महाज्ञानी । गुरुत्व घेतलें तात्याबांनीं । काशीनाथादिक शिष्याग्रणी । तया चरणीं लागले ॥१४९॥</p>
<p>
	तयापुढें तो फकीर आणिला । शास्त्रीय वादविवाद मांडिला । वैराग्यानें फकीर जिंकिला । हांकूनि लाविला तेथून ॥१५०॥</p>
<p>
	मग तो जो तेथूनि निसटला । वैजापुरीं जाऊनि राहिला । पुढें कित्येक वर्षांनीं आला । नमस्कारिला साईनाथ ॥१५१॥</p>
<p>
	आपण गुरु साई चेला । हा सर्व त्याचा भ्रम निरसला । बाबांनींही पूर्ववत सत्कारिला । शुद्ध जाहला पश्चात्तापें ॥१५२॥</p>
<p>
	ऐसी बाबांची अगाध लीला । निवाड होण्याचा तेव्हां झाला । परी तो गुरु आपण चेला । भाव हा आदरिला तेथवर ॥१५३॥</p>
<p>
	तयाचें गुरुपण तयाला । आपुलें चेलेपण आपणाला । हा तरी एक उपदेश एथिला । स्वयें आचरिला साईनाथें ॥१५४॥</p>
<p>
	आपण कोणाचें होऊनि राहावें । किंवा कोणास आपुलें करावें । याहूनि अन्य असणें न बरवें । तेणें न उतरवे परपार ॥१५५॥</p>
<p>
	हाचि एक ये वर्तनीं धडा । परी दुर्लभ ऐसा निधडा । होईल जयाचे मनाचा धडा । निरभिमान - गडा चढेल ॥१५६॥</p>
<p>
	येथें स्वबुद्धि-परिकल्पित । चतुराई न कामा येत । जया मनीं साधावें स्वहित । अभिमानरहित वर्तावें ॥१५७॥</p>
<p>
	जेणें देहाचा अभिमान जाळिला । तेणेंचि हा देह सार्थकीं लाविला । तो मग कोणाचाही होईल चेला । साधावयाला परमार्थ ॥१५८॥</p>
<p>
	पाहोनियां ती निर्विषय स्थिति । लहान थोर विस्मित चित्तीं । वय लहान गोजिरी मूर्ति । चोज करिती जन सारे ॥१५९॥</p>
<p>
	ज्ञानियाचा देहव्यापार । होतसे पूर्वकर्मानुसार । तया न प्रारब्ध - कर्मभार । कर्मकर्तार हो नेणे ॥१६०॥</p>
<p>
	जरी सूर्यास अंधारीं रिघाव । तरीच ज्ञानिया द्वैतभाव । स्वस्वरूपचि जया अवघें विश्व । वसता ठाव अद्वैत ॥१६१॥</p>
<p>
	हें गुरुशिष्याचें आचरित । साईनाथांचे परमभक्त । म्हाळसापतींनीं करविलें श्रुत । तैसेंचि साद्यंत कथियेलें ॥१६२॥</p>
<p>
	असो आतां हें आख्यान । पुढील चरित्र याहूनि गहन । होईल तें यथाक्रम कथन । साबधान श्रवणीं व्हा ॥१६३॥</p>
<p>
	मशीद पूर्वीं होती कैसी । कैसिया कष्टीं जाहली फरसी । साई हिंदु वा यवनवंशी । नेणवे भरंवशीं हें कवणा ॥१६४॥</p>
<p>
	धोती पोती खंडयोग  । करीत भोगीत भक्तांचे भोग । हें सर्व निवेदन यथासांग । होईल चांग पुढारा ॥१६५॥</p>
<p>
	हेमाड साईस शरण । चरणप्रसाद हें कथानिरूपण । श्रवणें होईल दुरितनिवारण । पुण्यपावन ही कथा ॥१६६॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । श्रीसाई - पुन: प्रकटीभवनं नाम पंचमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्रुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 22 Apr 2022 14:55:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 22 Apr 2022 15:10:05 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ४]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-4-122042200040_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥ पूर्वील दो अध्यायीं मंगलाचरण । कथिलें ग्रंथप्रयोजन । अधिकारी अनुबंध निरूपण । साङ्ग विवरण जाहलें ॥१॥]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 4" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/22/full/1650619449-4049.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra chapter 4" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥ पूर्वील दो अध्यायीं मंगलाचरण । कथिलें ग्रंथप्रयोजन । अधिकारी अनुबंध निरूपण । साङ्ग विवरण जाहलें ॥१॥</p>
<p>
	आतां या संतांचा अवतार । किंनिमित्त ये धरित्रीवर । ऐसें हें काय कर्म खडतर । जेणें ते अवतरत भूलोकीं ॥२॥</p>
<p>
	आतां श्रोते महाराज । मी एक तुमचा चरणरज । मज तों अवधान-कृपेचें काज । मागतां लाज मज नाहीं ॥३॥</p>
<p>
	आधींचि गोड संतचरित्र । तैशांत हें तों साईकथामृत । सेवूनि साईचे अनन्य भक्त । आनंदयुक्त होवोत ॥४॥</p>
<p>
	ब्राम्हण हेळसिती आश्रम - वर्ण । शूद्र होऊं पाहती ब्राम्हाण । धर्माचार्यांचें मानखंडण । करूं दंडण पाहाती ॥५॥</p>
<p>
	कोणी न मानी धर्मवचन । घरोघरीं सर्वचि विद्वान । एकावरती एकाची ताण । मानीना कोण कोणाचें ॥६॥</p>
<p>
	सेव्यासेव्य भक्ष्याभक्ष्य । आचारविचारीं पूर्ण दुर्लक्ष । मद्य मांस अवघ्यांसमक्ष । ब्राम्हाण प्रत्यक्ष सेविती ॥७॥</p>
<p>
	घेऊनि धर्माचें पांघरूण । अत्याचार चालविती आंतून । पंथद्वेष जाती माजून । जन जाजावून जाती जैं ॥८॥</p>
<p>
	ब्राम्हाण कंटाळती संध्यास्नाना । कर्मठ कंटाळती अनुष्ठाना । योगी कंटाळती जपतपध्याना । संतावतरणा समय तो ॥९॥</p>
<p>
	जन धन मान पुत्र दारा । हाचि सुखसर्वस्वा थारा । मानूनि विन्मुख परमार्थविचारा । संत अवतारा तैं येती ॥१०॥</p>
<p>
	आत्यंतिक श्रेयप्राप्ति । धर्मग्लानी - पायीं जै मुकती । करावया धर्मजागृती । संत येती आकारा ॥११॥</p>
<p>
	आयुरारोग्य - ऐश्वर्या मुकती । जन शिश्नोदरपरायण बहकती । निजोद्धरणा सर्वस्वी हुकती । अवतारा येती तैं संत ॥१२॥</p>
<p>
	व्हावया वर्णाश्रमधर्मरक्षण । करावया अधर्माचें निर्दळण । दीन गरीब दुबळ्यांचें संरक्षण । क्षितीं अवतरण संतांचें ॥१३॥</p>
<p>
	संत स्वयें ठायींचे मुक्त । दीनोद्भरणीं सदैव उद्युक्त । अवतार तयांचा केवळ परार्थ । निजस्वार्थ त्यां नाहीं ॥१४॥</p>
<p>
	निवृत्तीचा पाया भरती । प्रवृत्तीच्या डोल्हार्‍याभंवती । परमार्थाचें मंदिर उभारिती । भक्तां उद्धरिती सहजगती ॥१५॥</p>
<p>
	धर्मकार्य धर्मजागृति । करूनि अवतारकार्य संपादिती । होतां निजकार्य - परिपूर्ति । अवतारसमाप्ति करितात ॥१६॥</p>
<p>
	सकलजगदानंद करू । प्रत्यगात्माचि परमेश्वरू । जो परमेश्वरू तोचि गुरु । तोचि शंकरू सुखकरू ॥१७॥</p>
<p>
	तोचि तो निरतिशय - प्रेमास्पद । नित्य निरंतर अभेद । नेणे जो देशकालवस्तुभेद । परिच्छेदातीत जो ॥१८॥</p>
<p>
	परा पश्यंती मध्यमा वैखरी । वाणी वर्णितां थकल्या चारी । ‘नेति नेती’ ति घेतली हारी । वेदीं चातुरी चालेना ॥१९॥</p>
<p>
	लाजलीं षट्‌शास्त्रें षड्‌दर्शनें । थकलीं पुराणें आणि कीर्तनें । अखेर कायावाचामनें । ठरलीं नमनेंचि साधनें ॥२०॥</p>
<p>
	ऐसिया संतसाईचें चरित्र । लीला जयाच्या अत्यंत विचित्र । परिसोनि जयाच्या कथा पवित्र । पावन श्रोत्र होऊत कां ॥२१॥</p>
<p>
	तोचि चालक सकलेंद्रियां । बुद्धि देई ग्रंथ रचाया । यथाक्रम चरित्र सुचाया । अनायासें कारण तो ॥२२॥</p>
<p>
	तो सर्वांचा अंतर्यामी । बाह्याभ्य़ंतर सर्वगामी । मग हे काळजी करावी कां मीं । व्यर्थ रिकामी किमर्थ ॥२३॥</p>
<p>
	गुण एकेक तयाचे आठवितां । पडे वृत्तीसी ताटस्थता । येईल वाचेसी कैसा तो वर्णितां । द्दढ मौनता तत्कथन ॥२४॥</p>
<p>
	घ्राणें सुमन हुंगावें । त्वचा शीतोष्ण स्पर्शावें । नयनें सौंदर्यसुख घ्यावें । सुखवावें आपापणां ॥२५॥</p>
<p>
	जिव्हा शर्करेचा स्वाद । जाणे परी नेणे अनुवाद । तैसाचि साईगुणानुवाद । करूं विशद नेणें मी ॥२६॥</p>
<p>
	सद्नुरूचेचि जंव येई मना । तोचि स्वयें देई प्रेरणा । अनिर्वचनीयाचे निर्वचना । स्वजनाकरवीं करवी तो ॥२७॥</p>
<p>
	हा न केवळ शिष्टाचार । बोल हे न केवळ उपचार । मनोभावाचे हे उद्नार । अवधानादर प्रार्थितों ॥२८॥</p>
<p>
	जैसें गाणगापुर नृसिंहवाडी । जैसें औदुंबर वा भिल्लवडी । तैसेंचि पवित्र गोदेचे थडी । क्षेत्र ‘शिरडी’ प्रसिद्ध ॥२९॥</p>
<p>
	गोदावरीचें पवित्र तीर । गोदावरीचें पवित्र नीर । गोदावरीचा शीतसमीर । हीं भवतिमिरनाशक ॥३०॥</p>
<p>
	गोदावरीचें माहात्म्य रुचिर । प्रख्यात जें अखिल जगतीवर । एकाहूनि एक धुरंधर । संतप्रवर तेथें झालें ॥३१॥</p>
<p>
	अनेक तीर्थें या गोमतीतीरीं । अघविनाशक जेथील वारी । भवरोग स्नानें पानें निवारी । पुराणांतरीं वर्णिलें ॥३२॥</p>
<p>
	ते हे गोदा अहमदनगरीं । कोपरगांव तालुक्याभीतरीं । कोपरगांवाचिया शेजारीं । मार्ग देई शिरडीचा ॥३३॥</p>
<p>
	गोदा वळंघूनि पैलतीरीं । सुमारें तीन कोसांवरी । तांगा प्रवेशतां निमगांवाभीतरीं । समोर शिरडी दिसतसे ॥३४॥</p>
<p>
	निवृत्ति ज्ञानदेव मुक्ताबाई । नामा जनी गोरा गोणाई । तुका नरहरी नरसीभाई । सजन कसाई सांवता ॥३५॥</p>
<p>
	पूर्वीं संत होऊनि गेले । सांप्रतही ते बरेचि झाले । वसुधैवकुटुंबी भले । आधार रंजल्यागांजल्यांचे ॥३६॥</p>
<p>
	रामदास संतप्रवर । सोडूनियां गोदातीर । प्रकट झाले कृष्णातटाकावर । जगदुद्धाराकारणें ॥३७॥</p>
<p>
	तैसेचि हे योगेश्वर साई । महान शिरडीची पुण्य़ाई । जगदुद्धाराचिये पायीं । गोदेठायीं अवतरले ॥३८॥</p>
<p>
	परीस लोहा दे कनकस्थिति । तया परिसा संतां उपमिति । संतांची परी अलौकिक कृति । निजरूप देती भक्तांतें ॥३९॥</p>
<p>
	सांडूनियां भेदभाव । स्थिरचर अवघें ब्रम्हास्वभाव । आपणांसी हें विश्वविभव । अखंड वैभव ब्रम्हाचें ॥४०॥</p>
<p>
	ऐसें अखिल विश्व जेव्हां । मीच मी हें प्रबोधेल तेव्हां । मग त्या सुखाचा काय सुहावा । परम सद्भावा पावेल ॥४१॥</p>
<p>
	ऐसें मीपण जेव्हां पावावें । वैर तें करावें कोणासवें । किमर्थ वा कवणासी भ्यावें । अन्यचि ठावें जंव नाहीं ॥४२॥</p>
<p>
	दामाजी जैसे मंगळवेढीं । समर्थ रामदास सज्जनगडीं । नृसिंहसरस्वती जैसे वाडीं । तैसेचि शिरडीं साईनाथ ॥४३॥</p>
<p>
	परम दुर्घट आणि दुस्तर । जिंकिला जयानें हा संसार । शांति जयाचा अलंकार । मूर्त भांडार ज्ञानाचें ॥४४॥</p>
<p>
	वैष्णवांचें हें माहेरघर । उदारांचा ह उदार । परमार्थ-कर्णाचा अवतार । साराचें सार हा साई ॥४५॥</p>
<p>
	प्रीती नाहीं नाशिवंतीं । आत्मस्वरूपीं रंगली वृत्ति । लक्ष एक परमप्राप्तीं । काय ते स्थिति वर्णावी ॥४६॥</p>
<p>
	ऐहिकाचा न उत्कर्षापकर्ष । आमुत्रिकाचा न हर्षामर्ष । अंतरंग निर्मल जैसा आदर्श । वाचा वर्षत अमृत सदा ॥४७॥</p>
<p>
	राजा रंक दरिद्री दीन । जयाचे द्दष्टीं समसमान । स्वयं ठावा न मानापमान । भूर्ती भगवान भरलेला ॥४८॥</p>
<p>
	जनासवें बोले चाले । पाही मुरळ्यांचे नाच चाळे । गज्जल गाणें ऐकतां डोले । रेस न हाले समाधि ॥४९॥</p>
<p>
	‘अल्ला’ नामाची जया मुद्रा । जग जागतां जया ये निद्रा । जागे जगासी लागतां तंद्रा । शांत समुद्रासम उदर ॥५०॥</p>
<p>
	आश्रम-निश्चय कांहीं नकळे । कांहीं निश्चित कर्मा नातळे । बहुधा बैसल्या ठायींचा न ढळे । व्यवहार सगळे जो जाणे ॥५१॥</p>
<p>
	दरबाराचा बाह्य थाट । गोष्टी सांगे तीनशें साठ । ऐसा जरी नित्याचा थाट । मौनाची गांठ सोडीना ॥५२॥</p>
<p>
	भिंतीस टेकूनि उभे असती । सकाळ दुपारा फेरी फिरती । लेंडीवरी वा चावडीस जाती । आत्मस्थिति अखंड ॥५३॥</p>
<p>
	न जाणूं कवण्या जन्मांतरीं । कवण्या प्रसंगीं कवण्या अवसरीं । केलें म्यां तप कैशियापरी । घेतलें पदरीं साईनें ॥५४॥</p>
<p>
	हें काय म्हणावें तपाचें फळ । तरी मी तों जन्माचा खळ । साईच स्वयें दीनवत्सल । कृपा ही निश्चळ तयाची ॥५५॥</p>
<p>
	सिद्धकोटींत जरी जनन । साधकाऐसें तयाचें वर्तन । वृत्ति निरभिमान अतिलीन । राखी मन सकळांचें ॥५६॥</p>
<p>
	नाथांहीं जैसें पैठण । ज्ञानदेवांहीं आळंदी जाण । तैसेंचि साईंनीं शिरडी - स्थान । महिमासंपन्न केलें कीं ॥५७॥</p>
<p>
	धन्य शिरडीचे तृण पाषाण । अनायासें जयां अनुदिन । घडलें बाबांचें चरणचुंबन । पदरजधारण मस्तकीं ॥५८॥</p>
<p>
	शिरडीच आम्हां पंढरपुर । शिरडीच जगन्नाथ द्वारकानगर । शिरडीच गया काशी विश्वेश्व्र । रामेश्वरही शिरडीच ॥५९॥</p>
<p>
	शिरडीच आम्हां बद्रिकेदार । शिरडीच नाशिक - त्र्यंबकेश्वर । शिरडीच उज्जयिनी महाकाळेश्वर । शिरडीच महाबळेश्वर गोकर्ण ॥६०॥</p>
<p>
	शिरडींत साईचा समागम । तोचि आम्हां आगम निगम । तोचि सकळ संसारोपशम । अत्यंत सुगम परमार्थ ॥६१॥</p>
<p>
	समर्थ साईंचें जें दर्शन  । तेणेंचि आम्हां योगसाधन । करितां तयांसीं संभाषण । होय क्षालन पापाचें ॥६२॥</p>
<p>
	तयांचें जें चरणसंवाहन । तेंचि आम्हां त्रिवेणीस्नान । तयांचें चरणतीर्थसेवन । तेंचि निर्मूलन वासनांचें ॥६३॥</p>
<p>
	तयांचें जे आज्ञापण । तेंचि आम्हां वेदवचन । तयांच्या उदी - प्रसादाचें सेवन । पुण्यपावन । सर्वार्थीं ॥६४॥</p>
<p>
	साईचि आम्हां परब्रम्हा । साईचि आमुचा परमार्थ परम । साईचि श्रीकृष्ण श्रीराम ।" निजाराम श्रीसाई ॥६५॥</p>
<p>
	साई स्वयें द्वंद्वातीत । कधीं न उद्विग्न वा उल्लसित । सदैव निजस्वरूपीं स्थित । सदोदित सन्मात्र ॥६६॥</p>
<p>
	शिरडी केवळ केंद्रस्थान । क्षेत्र बाबांचें अति विस्तीर्ण । पंजाब कलकत्ता । हिंदुस्थान । गुजराथ दख्खन कानडा ॥६७॥</p>
<p>
	शिरडीची साईची समाधि । तीचि अखिल संतांची मांदी । येथील मार्ग क्रमितां प्रतिपदीं । तुटते ग्रंथी जीवाची ॥६८॥</p>
<p>
	सार्थक जन्मा आलियाचें । केवळ समाधिदर्शन साचें । मग सेवेसी जयांचें आयुष्य वेंचे । भाग्य तयांचें काय वानूं ॥६९॥</p>
<p>
	मशीद आणि वडियांवरी । सुंदर निशाणांच्य हारी । फडकती उंच गगनोदरीं । पालवती करीं भक्तांसी ॥७०॥</p>
<p>
	बाबा महंत प्रसिद्धकीर्ति । गांवोगांवीं पसरली महती । कोणी तयां सत्‌श्रद्धा नवसिती । दर्शनें निवती जन कोणी ॥७१॥</p>
<p>
	कोणाचें कैसेंहि मनोगत । असो बुद्धि शुद्ध वा कुत्सित । दर्शनमात्रेंचि निवे चित्त । जन विस्मित अंतरीं ॥७२॥</p>
<p>
	पंढरींत विठ्ठल रखुमाई । यांच्या दर्शनीं जी नवलाई । तेंचि विठ्ठलदर्शन देई । बाबा साई शिरडींत ॥७३॥</p>
<p>
	कोणासी वाटल्या ही अतिशयोक्ति । ऐकावी गौळीबुवांची उक्ति । जयासी द्दढ विठ्ठलाची भक्ति । संशयनिवृत्ति होईल ॥७४॥</p>
<p>
	पंढरीचे हे वारकरी । जैसी वर्षासी पंढरीची फेरी । तैसीचि करिती हे शिरडीची वारी । प्रेम भारी बाबांचें ॥७५॥</p>
<p>
	गर्दभ एक बरोबर । शिष्य एक साथीदार । जिव्हा ‘रामकृष्णहरि’ गजर । करी निरंतर बुवांचें ॥७६॥</p>
<p>
	पंचाण्णव तीं वर्षें वयास । चातुर्मासीं गंगातटनिवास । पंढरपुरीं अष्ट मास । भेटी वर्षास बाबांची ॥७७॥</p>
<p>
	बाबांकडे पहात पहात । म्हणावें यांनीं होऊनि विनत । हाचि तो मूर्त पंढरीनाथ । अनाथनाथ दयाळ ॥७८॥</p>
<p>
	धोत्रें नेसूनि रेशीमकानी । होतील काय संत कोणी । करूं लागती हाडांचें मणी । रक्ताचें पाणी निजकष्टें ॥७९॥</p>
<p>
	फुकाचा काय होईल देव । हाचि हो प्रत्यक्ष पंढरीराव । जग वेडें रे वेडें हा द्दढ भाव । ठेवूनि देव लक्षावा ॥८०॥</p>
<p>
	जया पंढरीनाथाची भक्ति । ऐसिया भगवद्भक्ताची हे उक्ति । तेथ मज पामराचा अनुभव किती । श्रोतां प्रतीति पहावी ॥८१॥</p>
<p>
	नामस्मरणीं मोठी प्रीती । ‘अल्ला-मालीक’ अखंड वदती । नामसप्ताह करवूनि घेती । दिवस राती सन्मुख ॥८२॥</p>
<p>
	आज्ञा एकदां दासगणूला । नामसप्ताह मांडावयाला । होतां गणुदास वदती तयांला । विठ्ठल प्रकटला पाहिजे ॥८३॥</p>
<p>
	बाबा तंव छातीस हात लाविती । दासगणूसी निक्षूनि वदती । “हो हो प्रकटेल विठ्ठलमूर्ति । भक्त भावार्थी पाहिजे ॥८४॥</p>
<p>
	डाकुरनाथाची डंकपुरी । अथवा विठ्ठलरायाची पंढरी । ती हीच रणछोड द्वारकनगरी । जाणें न दूरी पहावया ॥८५॥</p>
<p>
	विठ्ठल काय एकांतींचा उठून । येणार आहे दुसरा कुठून । भक्तप्रेमें उत्कटून । एथेंही प्रकटून राहील ॥८६॥</p>
<p>
	पुंडलिकें वडिलांची सेवा । करूनि भुलविलें देवाधिदेवा । पुंडलिकाच्या त्या भक्तिभावा । विटे विसांवा घेतला” ॥८७॥</p>
<p>
	असो होतां सप्ताहाची समाप्ति । झाली म्हणती दासगणूप्रती । शिरडीस विठ्ठलदर्शनप्राप्ती । ही घ्या प्रतीति बाबांची ॥८८॥</p>
<p>
	एकदां काकासाहेब दीक्षित । नियमानुसार प्रात:स्नात । असतां आसनस्थित ध्यानस्थ । दर्शन पावत विठ्ठलाचें ॥८९॥</p>
<p>
	पुढें जातां बाबांचे दर्शना । नवल बाबा पुसती तयांना । “विठ्ठलपाटील आला होताना ? । भेट झालीना ? तयाची ॥९०॥</p>
<p>
	मोठा पळपुटया बरें तो विठ्ठल । मेख मारूनि करीं त्या अढळ । द्दष्टि चुकवूनि काढील पळ । होतां पळ एक दुर्लक्ष” ॥९१॥</p>
<p>
	हा तों प्रात:काळीं प्रकार । पुढें जेव्हां भरली दुपार । पहा आणिक प्रत्यंतर । विठ्ठलदर्शनसोहळा ॥९२॥</p>
<p>
	पंढरपुरच्या विठोबाच्या । छब्या पांचपंचवीस साच्या । घेऊनि कोणी बाहेरगंवींचा । विकावयाच्या इच्छें ये ॥९३॥</p>
<p>
	सकाळीं ध्यानीं आलॊ जी मूर्ती । तियेचीच संपूर्ण होती प्रतिकृती । पाहूनि दीक्षित विस्मित चित्तीं । बोल आठवती बाबांचें ॥९४॥</p>
<p>
	दीक्षित तंव अतिप्रीतीं । विकणारासी  मोल देती । छबी एक विकत घेती । भावें लाविती पूजेसी ॥९५॥</p>
<p>
	विठ्ठलपूजनीं साईचा आदर । आणि एक कथानक सुंदर । परिसा बहु श्ववणमनोहर । आनंदनिर्भर मानसें ॥९६॥</p>
<p>
	भगवंतराव श्रीरसागर । वडील विठ्ठलभक्तप्रवर । पंढरपुरासी वारंवार । फेरी वरचेवर करीत ॥९७॥</p>
<p>
	घरांत होती विठ्ठलमूर्ति । वडील पंचत्व पावल्यावरती । जाहली पूजानैवेद्यसमाप्ति । श्राद्धतिथीही राहिली ॥९८॥</p>
<p>
	नाहीं वारीचा क्थावार्ता । भगवांतराव शिर्डीसी येतां । बाबा आठवूनि तयाचा पिता । म्हणती “तो होता दोस्त माझा ॥९९॥</p>
<p>
	हा त्या माझ्या स्नेहाचा सुत । म्हणूनि यासी मीं आणिला खेंचीत । नाहीं कधीं हा नैवेद्य करीत । उपाशी ठेवीत मजलाही ॥१००॥</p>
<p>
	विठ्ठलासही ठेवी उपाशी । म्हणूनि शिरडीसी आणिलें यासी । आतां देईन आठवणीसी । लावीन पूजेसी याजला” ॥१०१॥</p>
<p>
	एकदां पर्वविशेष जाणून । करावें प्रयागतीर्थीं स्नान । दासगणूचें जाहलें मन । आले आज्ञापन घ्यावया ॥१०२॥</p>
<p>
	बाबा देती प्रत्युत्तर । नलगे तदर्थ जाणें दूर । हेंचि आपुलें प्रयागतीर । विश्वास धर द्दढ मनीं ॥१०३॥</p>
<p>
	खरेंचि सांगावें काय कौतुक । बाबांचे चरणीं ठेवितां मस्तक । उभयांगुष्ठीं निथळलें उदक । गंगायमुनोदक पाझरलें ॥१०४॥</p>
<p>
	पाहूनियां तो चमत्कार । दासगणूसी आला गहिंवर । काय बाबांचा महदुपकार । फुटला पाझर नयनांसी ॥१०५॥</p>
<p>
	वैखरीसी चढलें स्फुरण । प्रेम आलें उचंबळून । अगाध शक्ति अघटित लीला वर्णन । करूनि समाधान पावले ॥१०६॥</p>
<p>
	दासगणूचें पद हें गोड । वेळींच पुरावें श्रोतयांचें कोड । म्हणोनि त्या प्रासादिक पदाची जोड । देवोनि ही होड पुरवितों ॥१०७॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	[ पद ]</p>
<p>
	अगाध शक्ति अघटित लीला तव सद्नुरुराया । जडजीवातें भविं ताराया तूं नौका सदया ॥ध्रु०॥</p>
<p>
	वेणीमाधव आपण होउनि प्रयाग पद केलें । गंगा यमुना द्वय अंगुष्ठीं प्रवाह दाखविले ॥१॥</p>
<p>
	कमलोद्भव कमलावर शिवहर त्रिगुणात्मक मूर्ती । तूंचि होउनी साइसमर्था विचरसि भूवरती ॥२॥</p>
<p>
	प्रहर दिसाला ब्रम्हासम तें ज्ञान मुखें वदसी । तमोगुणाला धरुनि रुद्ररूप कधिं दाखविसी ॥३॥</p>
<p>
	कधीं कधीं श्रीकृष्णासम त्या बाललिला करिसी । भक्तमनासी सरस करूनी मराळ तूं बनसी ॥४॥</p>
<p>
	यवन म्हणावें तरी ठेविसी गंधावर प्रेमा । हिंदु म्हणूं तरि सदैव वससी मशिदिंत सुखधामा ॥५॥</p>
<p>
	धनिक म्हणावें जरी तुला तरि भिक्षाटण करिसी । फकिर म्हणावें तरी कुबेरा दानें लाजविसी ॥६॥</p>
<p>
	तवौकसातें मशिद म्हणूं तरि वन्ही ते ठाया । धुनिंत सदा प्रज्वळीत राहे उदि लोकां द्याया ॥७॥</p>
<p>
	सकाळपासुनि भक्त साबडे पूजन तव करिती । माध्यान्हीला दिनकर येतां होत असे आरती ॥८॥</p>
<p>
	चहुं बाजूंना पार्षदगणसम भक्त उभे राहती । चौरि चामरें करीं धरूनीं तुजवर ढाळीती ॥९॥</p>
<p>
	शिंग कडयाळें सूर सनय्या दणदणते घंटा । चोपदार ललकारति द्वारीं घालुनियां पट्टा ॥१०॥</p>
<p>
	आरतिसमयीं दिव्यासनिं तूं कमलावर दिससी । प्रदोषकाळीं बसुनि धुनिपुढें मदनदहन होसी ॥११॥</p>
<p>
	अशा लीला त्या त्रयदेवांच्या प्रत्यहिं तव ठायीं । प्रचीतीस येताती अमुच्या हे बाबा साई ॥१२॥</p>
<p>
	ऐसें असतां उगीच मन्मन भटकन हें फिरतें । आतां विनंती हीच तुला बा स्थिर करीं त्यातें ॥१३॥</p>
<p>
	अधमाधम मी महापातकी शरण तुझ्या पायां । आलों निवारा दासगणूचे त्रिताप गुरुराया ॥१४॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	असो अघोर  पापें धुवाया । जन जातां गंगेच्या ठाया । गंगा लागे संतांचे पाया । निवारावया निजपापें ॥१०८॥</p>
<p>
	सोडूनियां चरणा पवित्रा । न लगे गंगा - गोदा - यात्रा । भावें परिसा या संतस्तोत्रा । गोड चरित्रा साईंच्या ॥१०९॥</p>
<p>
	जैसा गोणाईस भीमरथींत । तमालास भागीरथींत । नामा कबीर शिंपल्याआंत । सुदैवें प्राप्त जाहले ॥११०॥</p>
<p>
	तैसेचि हे श्रीसाईनाथ । तरुण सोळा वर्षांचे वयांत । निंबातळीं शिरडी गांवांत । प्रथम भक्तार्थ प्रकटले ॥१११॥</p>
<p>
	प्रकटतांचि ब्रम्हाज्ञानी । नाहीं विषयवासना स्वप्नीं । माया त्यागिली लाथें हाणूनी । मुक्ती चरणीं विनटली ॥११२॥</p>
<p>
	जन्म बाबांचा कोण्या देशीं । अथवा कोण्या पवित्र वंशीं । कोण्या मातापितरांच्या कुशीं । हें कोणासी ठावें ना ॥११३॥</p>
<p>
	ठावी न कोणा पूर्वावस्था । कोण  तो तात वा कोण माता । थकले समस्त पुसतां पुसतां । कोणा न पत्ता लागला ॥११४॥</p>
<p>
	सोडूनि माता पितर आप्त । गणगोत आणि जात पात । त्यागूनि सकल संसारजात । प्रकटला जनहितार्थ शिरडींत ॥११५॥</p>
<p>
	शिरडीसी एक वृद्ध बाई । नाना चोपदाराची आई । कथिती झाली परम नवलाई । बाबा साईचरिताची ॥११६॥</p>
<p>
	म्हणे आरंभीं हें पोर । गोरें गोमटें अति सुंदर । निंबातळीं आसनीं स्थिर । प्रथम द्दग्गोचर जाहलें ॥११७॥</p>
<p>
	पाहूनि सुंदर बाळरूफ । लोकां मनीं विस्मय अमूप । कोंवळ्या वयांत खडतरर तप । शीत आतप समसाम्य ॥११८॥</p>
<p>
	वय कोंवळें नवल स्थिती । ग्रामस्थ सकळ विस्मय पावती । गांवोगांवींचे लोक येती । दर्शननिमित्तीं मुलाच्या ॥११९॥</p>
<p>
	दिवसा नव्हे कोणाची संगती । रात्रीसी नाहीं कोणाची भीती । आली कोठूनि ही बालमूर्ति । आश्चर्य चित्तीं सकळिकां ॥१२०॥</p>
<p>
	रूपरेखा अतिगोजिरी । पाहतां प्रेम दाटे अंतरीं । नाहीं कुणाचे घरीं ना दारीं । लिंबाशेजारीं अहर्निश ॥१२१॥</p>
<p>
	जो तो करी आश्चर्य थोर । ऐसें कैसें तरी हें पोर । वय कोंवळें रूप मनोहर । राही उघडय़ावर रात्रंदिन ॥१२२॥</p>
<p>
	बाह्यात्कारीं दिसे पोर । परी कृतीनें थोरांहुनी थोर । वैराग्याचा पूर्णावतार । आश्चर्य फार सकळिकां ॥१२३॥</p>
<p>
	एके दिवशीं नवल झालें । खंडोबाचें वारें आलें । दोघे चौघे घुमूं लागले । पुसूं लागले जन प्रश्न ॥१२४॥</p>
<p>
	कोणा सभाग्याचें हें पोर । कोठूनि कैसें हें आलें इथवर । देवा खंडोबा तूं तरी शोध कर । प्रश्न विचारीत तैं एक ॥१२५॥</p>
<p>
	देव म्हणे जा कुदळी आणा । दावितों ते जागीं खणा । लागेल या पोराचा ठिकाणा । कुदळी हाणा ये जागीं ॥१२६॥</p>
<p>
	मग तेथेंचि त्या गांवकुसाजवळी । त्याच निंबवृक्षाचे तळीं । मारितां कुदळीवरी कुदळी । विटा ते स्थळीं आढळल्या ॥१२७॥</p>
<p>
	पुरा होतांच विटांचा थर । जात्याची तळी सारितां दूर । द्दष्टीस पडलें एक भुयार । समया चार जळती जैं ॥१२८॥</p>
<p>
	चुनेगच्ची तें तळघर । गोमुखी पाट माळ सुंदर । देव म्हणे बारा वर्षें हा पोर । तप आचरला ये स्थळीं ॥१२९॥</p>
<p>
	मग जन सर्व आश्चर्य करिती । खोदखोदूनि पोरास पुसती । पोर तो बारा मुलखाचा गमती । कथा भलतीच सांगितली ॥१३०॥</p>
<p>
	म्हणे हें माझ्या गुरूचें स्थान । अति पवित्र हें माझें वतन । आहे तैसेंचि करा हें जतन । माना मद्वचन एवढें ॥१३१॥</p>
<p>
	बाबा झाले ऐसे बोलते । कथिते झाले श्रवण करिते । बाबा वदले तें वदले भलतें । ऐसी ही वळते जिव्हा कां ॥१३२॥</p>
<p>
	आश्चर्य वाटे माझेंचि मज । बाबांविषयीं हा कां समज । परी तो आतां पडला उमज । असेल सहज विनोद हा ॥१३३॥</p>
<p>
	बाबा मूळचेचि विनोदप्रिय । असेलही भुयार त्यांचेंच आलय । परी गुरूचें म्हणतां काय जाय । महत्त्व काय वेंचे कीं ॥१३४॥</p>
<p>
	असो बाबांच्या आज्ञेवरून । पूर्वींप्रमाणें विटा लावून । भुयार टाकिलें बंद करून । निजगुरुस्थान म्हणून तें ॥१३५॥</p>
<p>
	जैसा अश्वत्थ वा औदुंबर । तैसाचि बाबांस तो ‘निंबतरुवर’ । प्रीति फार त्या निंबावर । अति आदर तयांचा ॥१३६॥</p>
<p>
	म्हाळसापति आदिकरून । जुने शिरडीचे ग्रामस्थ जन । बाबांच्या गुरूचें हें समाधिस्थान । म्हणूनि वंदन त्या करिती ॥१३७॥</p>
<p>
	तया समाधिसन्निधानीं । द्वादशा वर्षें मौन धरूनि तपश्चर्या केली बाबांनीं । प्रसिद्ध जनीं ही वार्ता ॥१३८॥</p>
<p>
	समाधि आणि निंबसमेत । चौफेर जागा घेऊनि विकत । साठे साहेब बाबांचे भक्त । चौसोपी इमारत उठविती ॥१३९॥</p>
<p>
	हीच इमारत हाच वाडा । यात्रेकरूंचा मूळ आखाडा । आलिया गेलियांचा राडा । एकचि गाढा ते स्थानीं ॥१४०॥</p>
<p>
	बांधिला साठयांनीं निंबास पार । माडाया काढिल्या दक्षिणोत्तर । उत्तरेचा जिना तयार । करितां हें भुयार दाखविलें ॥१४१॥</p>
<p>
	जिन्याखालीं दक्षिणाभिमुख । कोनाडा एक आहे सुरेख । तेथेंचि पारावर तयासन्मुख । भक्त उदमुख बैसती ॥१४२॥</p>
<p>
	‘गुरुवार आणि शुक्रवारीं । सूर्यास्तीं सारवूनियां वरी । ऊद जाळील जो क्षणभरी । देईल श्रीहरि सुख तया’ ॥१४३॥</p>
<p>
	ही अतिशयोक्ति किंवा खरें । साशंक होतील श्रोत्यांचीं अंतरें । परी हीं साईमुखींचीं अक्षरें । श्रवणद्वारें परिसिलीं ॥१४४॥</p>
<p>
	नाहीं माझिया पदरचें विधान । शंका न धरा अणुप्रमाण । प्रत्यक्ष ज्यांनीं केलें हें श्रवण । ते आज विद्यमान असती कीं ॥१४५॥</p>
<p>
	पुढें झाला दीक्षितांचा वाडा । सोय झाली प्रशस्त बिर्‍हाडां । अल्पकालांत तेथेंचि पुढां । दगडी वाडाही ऊठला ॥१४६॥</p>
<p>
	दीक्षित आधींच पुण्यकीर्ति । भावार्थाची ओतीव मूर्ति । आंग्लभूमीचे  यात्रेस जाती । तेथ रोविती निजबीज ॥१४७॥</p>
<p>
	येथें श्रोते घेतील शंका । सोडूनि मथुरा काशी द्वारका । धर्मबाह्य जी आंग्लभूमिका । परमार्थदायका कैसी पां ॥१४८॥</p>
<p>
	श्रोत्यांसी शंका ही साहजिक । निरसितां ती वाटेल कौतुक । विषयांतर घडेल अल्पक । क्षमा सकळिक करितील ॥१४९॥</p>
<p>
	काशी प्रयाग बदरिकेदार । मथुरा वृंदावन द्वारकापुर । इत्यादि यात्रा पुण्यनिकर । पदरीं पूर्वींच तयांचे ॥१५०॥</p>
<p>
	शिवाय वडिलांची पुण्याई । धन्य भाग्याची अपूर्वाई । सर्व पूर्वार्जिताची भरपाई । जाहलें साईदर्शन ॥१५१॥</p>
<p>
	या दर्शना आदिकारण । प्राक्तनींचें पांगुळपण । आंग्लभूमींत असतां जाण । पाय निसरून जैं आले ॥१५२॥</p>
<p>
	दिसाया दिसला जरी कुयोग । तरी परिपाकें गुरुपुष्ययोग । तेणें फळला सदुद्योग । अलभ्य संयोग साईचा ॥१५३॥</p>
<p>
	चांदोरकारांची गांठ पडली । साईची कीर्ति कर्णीं आली । म्हणती पहा दर्शन - नव्हाळी । जाईल पांगुळीक तात्काळ ॥१५४॥</p>
<p>
	परी हा पायांचा लंगडेपणा । दीक्षित न मानीत उणेपणा । खरा लंगडेपणा तो मना । घालवा म्हणाले साईंस ॥१५५॥</p>
<p>
	त्वचा रुधिर मांस हाडा । समुदाय नरदेहाचा सांगाडा । हा क्षणभंगुर संसारगाडा । पाय लंगडा राहो कीं ॥१५६॥</p>
<p>
	एकोणीसशें नऊ सन । महिना नोव्हेंवर तारीख दोन । दीक्षितांसी तैं पुण्यपावन । साईदर्शन आरंभीं ॥१५७॥</p>
<p>
	मग ते पुढें त्याच वर्षीं । पुनश्च गेले डिसेंबर मासीं । शिरडीस श्रीच्य्या पुनर्दर्शनासी । व्हावें रहिवासी मन झालें ॥१५९॥</p>
<p>
	पुढें बांधावा एक वाडा । ऐसा जाहला मनाचा धडा । पुढील वर्षींच मुहूर्तमेढा । निक्षेप दगडासी पायाच्या ॥१६०॥</p>
<p>
	नऊ डिसेंबर तो दिन । बाबांचें घेतलें अनुमोदन । तोचि सुमुहूर्त मानून । पायाबंधन सारिलें ॥१६१॥</p>
<p>
	बोलावूनही येणार नव्हे ते । दीक्षितांचे बंधूही तेथें । ते दिवशीं त्याच मुहूर्तें । आलेही होते आधींच ॥१६२॥</p>
<p>
	श्रीयुत दादासाहेब खापर्डे । पूर्वीं आले होते सडे । परवानगी मागतां बाबांकडे । कोण सांकडें तयांला ॥१६३॥</p>
<p>
	परी खापडर्यांतें घरीं जावया । दीक्षितांतें पाया घालावया । जाहल्या या आज्ञा उभयां । दहा डिसेंबर या दिनीं ॥१६४॥</p>
<p>
	आणखी या दिवसाची महती । चावडीची जी शेजारती । तीही याच दिवसापासूनि करती । परम भक्तिप्रीतियुत ॥१६५॥</p>
<p>
	पुढें सन एकूणीसशें अकारा । रामनवमीचा मुहुर्त बरा । साधूनि गृहप्रवेश - संस्कारा । विधिपुर:सर सारिलें ॥१६६॥</p>
<p>
	पुढें श्रीमंत बुट्टींचा इमला । अलोट पैका खर्चीं घातला । देहही बाबांचा तेथ विसवला । पैका लागला सार्थकीं ॥१६७॥</p>
<p>
	वाडे झाले तीन आतां । जेथें पूर्वीं एकही नव्हता । आरंभीं साठयांचे वाडयाची उपयुक्तता । फारचि समस्तां जाहली ॥१६८॥</p>
<p>
	आणिक एक या वाडयाची महती । आरंभीं याच स्थानावरती । फुलझाडांची बाग होती । निर्मिली निजहस्तीं बाबांनीं ॥१६९॥</p>
<p>
	बागेची या अल्प कथा । पुढील अध्यायीं येईल वर्णितां । हेमाड साईचरणीं माथा । ठेवी श्रोतांसमवेत ॥१७०॥</p>
<p>
	वामन तात्या घडे पुरवीत । साई समर्थ पाणी शिंपीत । उखर जागीं बाग उठवीत । पुढें ते गुप्त जाहले ॥१७१॥</p>
<p>
	पुढें औरंगाबादेपाशीं । चांद पाटील भेटले त्यांसी । लग्नाचिया वर्‍याडासी । आले शिरडीसी मागुते ॥१७२॥</p>
<p>
	पुढें देवीदासाची मेट । पडली जानकीदासाची गांठ । गंगागीरांची द्दष्टाद्दष्ट । मिळालें त्रिकूट शिरडींत ॥१७३॥</p>
<p>
	मोहिद्दीनासवें कुस्ती । तेथूनि मग मशिदीं वस्ती । जडली डेंगळ्यालागीं प्रीती । भक्त भोवतीं मिळाले ॥१७४॥</p>
<p>
	या सर्व कथा - वार्तांचें कथन । होईल पुढील अध्यायीं श्रवण । आतां हेमाड साईसी शरण । घालीत लोटांगण अनन्य ॥१७५॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । साईसमर्थसच्चरिते । साईसमर्थावतरणं नाम चतुर्थोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्गुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 22 Apr 2022 14:52:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 22 Apr 2022 15:09:07 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय ३]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-3-122042200038_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: । श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: । श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: । आतां पूर्वकथेची संगती । साई पूर्ण आश्वासन देती । म्हणती “आपुली संपूर्ण अनुमती । चरित्रस्थिती वर्णावया ॥१॥]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai satcharitra chapter 3" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/22/full/1650619226-1251.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai satcharitra chapter 3 marathi" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: । श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: । श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: । आतां पूर्वकथेची संगती । साई पूर्ण आश्वासन देती । म्हणती “आपुली संपूर्ण अनुमती । चरित्रस्थिती वर्णावया ॥१॥</p>
<p>
	तुम्ही आपुलें कार्य करा । मनीं यत्किंचितही न कचरा । विश्वास पूर्ण मद्वचनीं धरा । निर्धार करा मनाचा ॥२॥</p>
<p>
	केलिया मल्लीलेचें लेखन । होईल अविद्यादोषनिरसन । भक्तीभावें करितां श्रवण । प्रपंचभान मावळेल ॥३॥</p>
<p>
	उठतील श्रवणसागरावरी । भक्तिपेमामृताच्या लहरी । बुडिया देतां उपराउपरी । येतील करीं बोधरत्नें” ॥४॥</p>
<p>
	ऐकोनि नि:शंक झालें मन । साईपदीं केलें नमन । मग हें चरित्रलेखन । यथास्मरण आरंभीं ॥५॥</p>
<p>
	हे शब्द येतांच बाबांचे ओठीं । तीच बांधिली शकुनगांठी । घडूनि येणार आतां हे गोष्टी । मी तों वेठीचा बिगारी ॥६॥</p>
<p>
	पहा अगम्य हरीची लीला । त्यावीण न कळे ती अन्याला । श्रुति शास्त्र वेद मुकावला । थांग लागला ना कोणा ॥७॥</p>
<p>
	शास्त्रविशारद वेदवादी । प्रज्ञावंत पंडितादि । घटपटादिवादप्रवादी । यांच्या नादीं भरूं नका ॥८॥</p>
<p>
	हरी निजभक्तांचा केला । भाळ्या - भोळियांचा भुकेला । प्रेमालागीं समूळ विकला । सदा हठेला दांभिकां ॥९॥</p>
<p>
	“यांतचि तुमचें कल्याण आहे । माझेंडी अवतारसार्थक्य हें । माझी तों घोकणी नित्य पाहें । काळजी वाहें हेच मी ॥१०॥</p>
<p>
	वरी एक सांगतों शामा । प्रेमें घेईल जो मन्नामा । तयाच्या मी सकल कामा । पुरवीं प्रेमा वाढवीं ॥११॥</p>
<p>
	मग जो गाई वाडेंकोडें । माझें चरित्र माझे पावडे । तयाचिया मी मागें पुढें । चोहींकडे उभाचि ॥१२॥</p>
<p>
	जे जे भक्त मजकारणें । असतील विनटले जीवें प्राणें । तयांसी या कथाश्रवणें । आनंद होणें सहजीच ॥१३॥</p>
<p>
	कोणींही केल्या माझें कीर्तन । तयासी देईन आनंदघन । नित्य सौख्य समाधान । सत्य वचन मानावें ॥१४॥</p>
<p>
	जो मजलागीं अनन्य शरण । विश्वासयुक्त करी मद्भजन । माझें चिंतन माझें स्मरण । तयाचें उद्धरण ब्रीद माझें ॥१५॥</p>
<p>
	माझें नाम माझी भक्ती । माझें दफ्तर माझी पोथी । माझें ध्यान अक्षय चित्तीं । विषयस्फूर्ती कैंची त्या ॥१६॥</p>
<p>
	कृतांताच्या दाढेंतून । काढीन मी निजभक्ता ओढून । करितां केवळ मत्कथा श्रवण । रोगनिरसन होईल ॥१७॥</p>
<p>
	कथा करा सादर श्रवण । त्यावरी करा पूर्ण मनन । मननावरी निदिध्यासन । समाधान पावाल ॥१८॥</p>
<p>
	‘अहं सोहं’ जाईल विरोन । उन्मन होईल श्रोतियांचें मन । चित्त होईल चैतन्यघन । अनन्य परिपूर्ण श्रद्धेनें ॥१९॥</p>
<p>
	‘साई साईति’ नामस्मरण । करील सकल कलिमल दहन । वाणीश्रवणगतपापभंजन । एक लोटांगण घालितां” ॥२०॥</p>
<p>
	कार्य जरी नव्हे सामान्य । आज्ञा केली शिरसामान्य । बाबांसारिखा असतां वदान्य । कां पां दैन्य आदरावें ॥२१॥</p>
<p>
	कोणा हातीं बांधविलीं राउळें । कोणसी कीर्तनरंगीं लाविलें । कोणासी तीर्थयात्रे धाडिलें । मज बैसविलें लिहावया ॥२२॥</p>
<p>
	अवध्यापरीस मी पामर । कवण्या गुणें हा करुणासागर । दयाघन ओळला मजवर । मी तर कांहीं जाणेंना ॥२३॥</p>
<p>
	हाचि गुरुकृपेचा नवलावा । कीं जेथ कांहीं न लव ओलावा । तेथेंही निबर तरु फुलावा । दाट उफलावा अप्रयासें ॥२४॥</p>
<p>
	कोणी पुढें बांधितील मठ । कोणी देवालयें कोणी घाट । आपण घेऊं धोपट वाट । चरित्रपाठ साईंचा ॥२५॥</p>
<p>
	कोणी सत्कारपूर्वक अर्चन । कोणी करिती पादसंवाहन । उत्कंठित झालें माझें मन । गुणसंकीर्तन करावें ॥२६॥</p>
<p>
	कृतयुगीं जें प्राप्त ‘ध्यानें’ । त्रेतीं ‘यजनें’ द्वापारीं ‘अर्चनें’ । तें प्राप्त सर्व ‘नामसंकीर्तनें’ । गुरुभजनें कलियुगीं ॥२७॥</p>
<p>
	अनधिकारी उघड उघड । चिंध्या भाराभर एक ना धड । तेथें ऐसें हें अवजड । कार्य अवघड घ्यावें कां ॥२८॥</p>
<p>
	यत्न न करितां उगें बसावें । आज्ञाभंगपातकी व्हावें । आज्ञापालन करूं जावें । तरी व्हावें हें कैसें ॥२९॥</p>
<p>
	समर्थ साईंची निजस्थिती । यथार्थ वर्णाया कोणा गती । स्वयेंत भक्तार्थ कृपा करिती । तरी ते वदविती स्वयेंचि ॥३०॥</p>
<p>
	वाणीची जेथ न चले धांव । तेथें मीं कां बांधिली हांव । ऐसें बोलावयासी वाव । ठेविला न ठाव कवणातें ॥३१॥</p>
<p>
	उचलिली जेव्हां हातीं लेखण । बाबांनीं हरिलें माझें मीपण । लिहिती आपुली कथा आपण । ज्याचें भूषण त्याजला ॥३२॥</p>
<p>
	हें तों संतचरित्रलेखन । संतावीण करील कोण । बाबांच्या अतर्क्य गुणांचें आकलन । गगना आलिंगनदानासम ॥३३॥</p>
<p>
	अतिगहन तयांचें महिमान । वर्णावयासी मी मतिहीन । त्यांनींच उचलूनि आपुलें आपण  । निर्मुक्तवचन व्हावें कीं ॥३४॥</p>
<p>
	बाबा जरी मी जन्मत: ब्राम्हाण । तरी श्रुतिस्मृतिनेत्रविहीन । जरी हें या जन्मा दूषण । परी मज भूषण आपुलें ॥३५॥</p>
<p>
	श्रुतिस्मृति हे ब्राम्हाणनयन । काणा तो जो एकें हीन । अंधचि तो जो उभयविहीन । हीन दीन तैसा मी ॥३६॥</p>
<p>
	आपण मज अंधाची काठी । असतां मज काय आटाटी । टेकीत टेकीत पाठी । धोपट वाटे चालेन ॥३७॥</p>
<p>
	आतां पुढारा काय करावें । मज पामरा नाहीं ठावें । आपणचि बुद्धिदायक व्हावें । संपादावें निजकार्य ॥३८॥</p>
<p>
	मुके बृहस्पतीसम बोलती । पंगू मेरूपर्वत लंघिती ही । जयांची अतर्क्य शक्ति । तयांची युक्ती त्यां ठावी ॥३९॥</p>
<p>
	मी तों केवळ पायांचा दास । नका करूं मजला उदास । जोंवरी या देहीं श्वास । निजकर्यास साधूनि घ्या ॥४०॥</p>
<p>
	आतां आपण श्रोते जन । जाणितलें जी ग्रंथप्रयोजन । साईच लिहिता लिहविता आपण । भक्तकल्याणाकारणें ॥४१॥</p>
<p>
	कैसा वाजेल पावा कीं पेटी । चिंता नाहीं उभयां पोटीं । ही तों वाजवित्या आटाटी । आपण कष्टी कां व्हावें ॥४२॥</p>
<p>
	कीं जें चंद्रकांत स्रवत । तें काय तया पोटीचें अमृत । ती तों चंद्राची करामत । चंद्रनिर्मित चंद्रोदयं ॥४३॥</p>
<p>
	किंवा सागरा ये भरती । ती काय त्याची निजकृती । तीही चंद्रोदयाचे हातीं । सागरकृति नव्हे ती ॥४४॥</p>
<p>
	असो टाळोनि भंवरे खडक । सागरीं नावा चालाव्या तडक । म्हणोनि जैसे लालभडक । दीप निदर्शक लाविती ॥४५॥</p>
<p>
	तैशाचि साईनाथांच्या कथा । ज्या गोडीनें हिणवितील अमृता । भवसागरींचे दुस्तर पंथा । अति सुतरता आणितील ॥४६॥</p>
<p>
	धन्य धन्य या संतकथा । श्रवणद्वारें अंतरीं रिघतां । बाहेर निघे देहाभिमानता । द्वंद्ववार्ता नुरेचि ॥४७॥</p>
<p>
	जंव जंव यांचा ह्रदयीं साठा । तंव तंव विकल्प पळे बारा वाटा । ज्ञानसंचय होय लाठा । उतरे ताठा देहाचा ॥४८॥</p>
<p>
	बाबांच्या शुद्ध यशाचें वर्णन । प्रेमें तयाचें श्रवण । होईल भक्तकश्मलदहन । सोपें साधन परमार्था ॥४९॥</p>
<p>
	मायातील ब्रम्हा काय । काय तत्तरणार्थ उपाय । कर्मधर्माचरणें हरि हा प्रिय । कैसेनि होय निजभक्तां ॥५०॥</p>
<p>
	आत्यंतिक क्षेम तें काय । भक्ति मुक्ति विरक्ति काय । वर्णाश्रमधर्म वस्तु अद्वय । इत्यादि विषय अति गूढ ॥५१॥</p>
<p>
	एतदर्थ जयांतें गोडी । तयांनीं पुरवाया निज आवडी । ज्ञानोबा-एकनाथादिकृत ग्रंथपरवडी । सुखनिरवडी सेवावी ॥५२॥</p>
<p>
	कृतयुर्गी ‘शम-दम’ । त्रेतीं ‘जयन’ द्वापारीं ‘पूजन’ । कलियुगीं ‘नामकथाकीर्तन’ । स्वल्प साधन परमार्था ॥५३॥</p>
<p>
	ब्राम्हाणादि चारी वर्ण । सर्वांसी साधन गुरुकथाश्रवण । असो स्त्री शूद्र वा जातिहीन । हें एक साधन सकळांतें ॥५४॥</p>
<p>
	असेल जयाचे पुण्य पदरीं । तोच या कथा श्रवण करी । कोणास येतील निद्रालहरी । तयांही श्रीहरी जागवील ॥५५॥</p>
<p>
	व्हावे विषयभोग अनवरत । ते न लाभतां ते दीनचित्त । तयांसीही हें संतकथामृत । विषयनिर्मुक्त । करील ॥५६॥</p>
<p>
	योग याग ध्यान धारणा । करूं जातां प्रयास नाना । आयास नलगे या कथाश्रवणा । एका अवधानावांचून ॥५७॥</p>
<p>
	ऐसी ही साईची कथा निर्मळ । परिसोत सज्जन श्रोते प्रेमळ । जळतील पंचमहापापें प्रबळ । जातील समूळ विलयाला ॥५८॥</p>
<p>
	आम्हां भवपाशीं जखडिलें । तेणें निजरूप वेढिलें । श्रवणें ते वेढे होतील ढिले । स्वरूप पहिलें लाधेल ॥५९॥</p>
<p>
	व्हावें कथांचें आमरण स्मरण । घडावें तयांचें नित्य परिशीलन । होवो भवदवार्ता शांतवन । समाधान जीवांचें ॥६०॥</p>
<p>
	वाचतां परिसतां भक्तिभावें । सहज साईचें ध्यान व्हावें । सगुणरूप डोळां दिसावें । चित्तीं ठसावें द्दढतर ॥६१॥</p>
<p>
	येणें घडावी सद्नुरुभक्ति । पावावी संसारीं विरक्ति । जडो गुरुस्मरणीं प्रीति । होवो मति निर्मल ॥६२॥</p>
<p>
	ऐसीच बुद्धि धरोनि मनीं । कृपा केली साईनाथांनीं । मज निमित्ता पुढें करोनी । स्वयें करणी हे केली ॥६३॥</p>
<p>
	ओटीं तुडुंब लागली ओढी । वासरावीण पान्हा न सोडी । हे तों धेनूतें उपज खोडी । तैशीच आवडी साईची ॥६४॥</p>
<p>
	मज चातकाचेनि आशे । आनंदघन ही माउली वर्षे । पुरवूनि माझिया अल्प तृषे । भक्त प्रकर्षें निववील ॥६५॥</p>
<p>
	काय भक्तिपेमाचें कौतुक । मातेस लागे बाळाची भूक । तयानें न पसरितांही मुख । नाथकूचुक ते कोंदी ॥६६॥</p>
<p>
	कोण जाणे तिचे शीण । लेंकुरा न त्याची जाण । न पुसतां निज माउलीवीण । अन्य कोण दे थान ॥६७॥</p>
<p>
	बाळकासी घालितां लेणें । बालक त्यांतील स्वारस्य नेणे । तें कौतुक एक माताच जाणे । तैसेंच करणें सद्भुरूचें ॥६८॥</p>
<p>
	हा माझा बाळाचा लळा । पुरवील कोण सुखसोहळा । माउलीवीण कोणास कळवळा । तो जिव्हाळा दुर्मिळ ॥६९॥</p>
<p>
	सन्मातेच्या पोटीं येणें । महद्भाग्यें देवाचें देणें । दु:ख सोसूनि जन्म देणें । बाळक नेणे हें कांहीं ॥७०॥</p>
<p>
	असो ये अर्थीं आणीक वचन । बोलिले बाबा करवितों श्रवण । अहो जी आपण श्रोते सज्जन । आदरें अवधान देइजे ॥७१॥</p>
<p>
	सन कोणीसशें सोळा सालीं । चाकरी सरकारी पुरी झाली । यथायोग्य पेन्शन बसली । बारी आली शिरदीची ॥७२॥</p>
<p>
	गुरुपौर्णिमेचा तो दिवस । भक्त मिळाले गुरुपूजेस । अण्णा स्वयंस्फूर्ति विनविती बाबांस । करिती शिफारस ती परिसा ॥७३॥</p>
<p>
	अण्णांस माझी मोठी काळजी । बाबांच्या समोर करिती अजीजी । यांच्या वाढत्या संसारामाजी । कृपा करा जी यांजवर ॥७४॥</p>
<p>
	लावा कीं यांस दुजी नोकरी । ही पेन्शन काय पडेल पुरी । अण्णासाहेबांची चिंता निवारी । ऐंसी करीं कांहीं गा ॥७५॥</p>
<p>
	बाबा तंव वदती प्रत्युत्तरीं । “मिळेल मेळी तयासी नोकरी । करावी आतां माझी चाकरी । सुख संसारीं लाधेल ॥७६॥</p>
<p>
	ताटें याचीं भरलीं सदा । यावज्जीव न रितीं कदा । भावें मत्पर होतां सर्वदा । हरतील आपदा तयाच्या ॥७७॥</p>
<p>
	कांहीं लेलें काय झालें । म्हणती जन ते समजा चळले । धर्भाचरण जयांनीं वर्जिलें । तयांस पहिलें वर्जावें ॥७८॥</p>
<p>
	समोर येतां बाजूसी जावें । महा भयंकर ते समजावे । त्यांच्या छायेसही न रहावें । पडल्या सहावे कष्टही ॥७९॥</p>
<p>
	आचारहीन शीलभ्रष्ट । विचारहीन कर्मनष्ट । देखेना जो इष्टानिष्ट । केवीं तो अभीष्ट पावेल ॥८०॥</p>
<p>
	लाग्याबांध्यावीण विशेषीं । कोणी न येई आपुलेपाशीं । श्वान सूकर कां माशी । हडहड कुणासी करूं नये ॥८१॥</p>
<p>
	येथूनि पुढें भक्तिभावा । करावी यानें माझी सेवा । करुणा येईल देवाधिदेवा । अक्षय ठेवा लाधेल ॥८२॥</p>
<p>
	मग ही पूजा करावी कैसी । मी कोण कैसा जाणावा भरंवसीं । साईचा तो देह विनाशी । ब्रम्हा अविनाशी सुपूज्य ॥८३॥</p>
<p>
	मी तों अष्टधा - प्रकृतिरूपानें । भरलों आहें चौं बाजूनें । हेंचि अर्जुनासी भगवंतानें । गीताव्याख्यानें निवेदिलें ॥८४॥</p>
<p>
	यावन्नामरू पाकृति । स्थावर जंगमात्मकही जगती । मीचि नटलों अष्टधा प्रकृति ही । एक चमत्कृति माझीच ॥८५॥</p>
<p>
	ॐ प्रणव हा माझा वाचक । वाच्य तयाचा मीचि एका । विश्वाकार वस्तु अनेक । त्यांतही मी एक भरलेला ॥८६॥</p>
<p>
	आत्मभिन्न वस्तु नाहीं । तेथें कामना कशाची पाहीं । मीचि अवघा ठायीं ठायीं । भरलों दाही दिशांतीं ॥८७॥</p>
<p>
	परिपूर्ण सर्वत्र एणें भावें । मी माझें हें जेथ विरावें । तया कामनीय काय असावें । सर्वीं वसावें सर्वस्वीं ॥८८॥</p>
<p>
	कामना या बुद्धींत उगवती । आत्मयासीं संबंध न धरिती । साईमहाराज निजात्ममूर्ति । कामनास्फूर्ति तेथें कैंची ॥८९॥</p>
<p>
	कामनांचे नाना प्रकार । मी कोण हें कळतांचि सार । विरोनि जाती जैसी गार । रविकरनिकरसंतप्त ॥९०॥</p>
<p>
	मनबुद्धयादि इंद्रियांसकट ॥ नव्हे मी स्थूल विराट । नव्हे मी हिरण्यगर्भ अप्रकट । साक्षी मी जुनाट अनादि ॥९१॥</p>
<p>
	एवं गुणइंद्रियांपरता । नाहीं मज विषयतत्परता । नाहीं मजवीण ठाव रिता । कर्ता करविता मी नव्हे ॥९२॥</p>
<p>
	मनबुद्धयादि इंद्रियगण । अवघा जड ही जेथें ओळखण । तेथेंच ‘विरक्ति’ प्रकटेल जाण । सारील आवरण ज्ञानाचें ॥९३॥</p>
<p>
	स्वरूपाचें जें विस्मरण । तेंचि मायेचें अवतरण । शुद्ध पूर्णानंद स्मरणं । तोचि मी चैतन्यघनरूप ॥९४॥</p>
<p>
	त्या मजकडे फिरविणें वृत्ति । तीच सेवा तीच ‘मद्भक्ति’ । चिदानंद मी होतां प्रतीती । शुद्ध स्थिती तें ‘ज्ञान’ ॥९५॥</p>
<p>
	अयमात्मा ब्रम्हा । प्रज्ञानमानंदं ब्रम्हा । जगन्मिथ्यत्वें जगद्भ्रम । सत्यत्वें ब्रम्हा तो हा मी ॥९६॥</p>
<p>
	नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त । वासुदेवोऽहमोमन्वित । सत्य श्रद्धाभक्तिसहित । पूजन स्वहित हें माझें ॥९७॥</p>
<p>
	ऐसें मी कोण तें समजून । करावें माझें यथार्थ पूजन । वरी व्हावें अनन्य शरण । जावें समरसून मजमाजीं ॥९८॥</p>
<p>
	नदी जातां समुद्रा शरण । येईल कां ती पुन्हां परतोन । उरेल कां वेगळें नदीपण । देतां आलिंगन अर्णवा ॥९९॥</p>
<p>
	स्नेहयुक्त कार्पासवाती । भेटूं जातां दीपकज्योती । स्वयें पावे दिव्य दीप्ती । तैसीचि गती संतपदीं ॥१००॥</p>
<p>
	अल्ला - मालीक चैतन्यघन । यावीण चित्ता नाहीं चिंतन । शांतनिरपेक्षसमदर्शन । तयाचें मीपण तैं कैंचें ॥१०१॥</p>
<p>
	निर्ममत्व निरहंकृति । निर्द्वंद्वत्व निष्परिग्रहस्थिति । याही चार गुणांची जैं वस्ती । मीपण स्थिति तैं कैंची ॥१०२॥</p>
<p>
	तात्पर्य हे आठही गुण । साईआंगीं असतां संपूर्ण । मीपणासी तैं कैंचें स्थान । सेवूं मीपण तैं कैसें ॥१०३॥</p>
<p>
	विश्वीं भरलें जयाचें मीपण । तयाचाचि अंश माझेंही मीपण । करावें साईपदीं समर्पण । हीच संपूर्ण मम सेवा ॥१०४॥</p>
<p>
	माझी सेवा माझें भजन । अनन्यपणें मजसी शरण । तो होय मद्रूप जाण । भगवंतवचन भागवतीं ॥१०५॥</p>
<p>
	कीटकीसही भ्रमरध्यान । तेणें ती लाधे भ्रमरपण । शिष्यही करितां निजगुरुभजन । निजगुसमान तो होय ॥१०६॥</p>
<p>
	समान शब्दें जें वेगळेपण । तेंही न साहे गुरु एक क्षण । गुरुत्व नव्हे शिष्यावीण । शिष्यत्वा अभिन्न गुरुपण” ॥१०७॥</p>
<p>
	असो पूजा जयाची आज्ञापिली । तो मी कोण ही व्याख्या केली । पुष्टीकरणार्थ गोष्ट आठवली । ओघासी आली ती कथितों ॥१०८॥</p>
<p>
	शिरडीसी आला एक रोहिला । तोही बाबांचें गुणांसी मोहिला । तेथेंचि बहुत दिन राहिला । प्रेमें वाहिला बाबांसी ॥१०९॥</p>
<p>
	शरीरें पुष्ट जैसा हेला । स्वैरवर्ती न जुमानी कोणाला । फक्त कफनी पायघोळ आंगाला । येऊनि राहिला मशिदींत ॥११०॥</p>
<p>
	दिवस असो वा निशी । मशिदीसी वा चावडीसी । कलमे पढे उंच स्वरेंसीं । अति आवेशीं स्वच्छंद ॥१११॥</p>
<p>
	महाराज शांतीचा पुतळा । ग्रामलोक फार कंटाळला । मध्यरात्रीसही त्याचा टकळा । अडथळा सकळां झोंपेला ॥११२॥</p>
<p>
	दिवसा खपावें उन्हातान्हांत । शेतांत अथवा रानावनांत । रात्रींही झोंप नाहीं निवांत । लोक नितांत कदरले ॥११३॥</p>
<p>
	नसेल होत बाबांना ताप । लोकांचें तों मोठें पाप । नाहीं रात्रीं सुखाची झोंप । आला संताप रोहिल्याचा ॥११४॥</p>
<p>
	इकडे आड तिकडे विहीर । धरावा कोठवरी तो धीर । रात्रंदिन ही किरकीर । मोठी फिकीर त्यां पडली ॥११५॥</p>
<p>
	रोहिला आधींचि माथेफिरू । वरी बाबांचा बळकट धीरू । होता त्याहूनिही अनावरू । मग तो थोरू जाहला ॥११६॥</p>
<p>
	चढेल आणि ताठर झाला । लोकांवरी तोंड टाकूं लगला । निस्सीम बेफाम उरफाटला । गांवही फिरला तयावर ॥११७॥</p>
<p>
	अत्यंत मायाळू साईमाउली । शरणागतासी पाठीसी घाली । म्हणूनि गांवीची सर्व मंडळी । काकुळती आली बाबांसी ॥११८॥</p>
<p>
	परी बाबा न लक्ष देती । ग्रामस्थांसीच उलट वदती । नका सतावूं रोहिल्याप्रती । तो मज अति प्रिय वाटे ॥११९॥</p>
<p>
	या रोहिल्याची बाईल घरघुशी । नांदूं न घटे तयापाशीं । यावया टोंके ती मजपाशीं । चुकवूनि त्यासी ते विवशी ॥१२०॥</p>
<p>
	नाहीं रांडेला पडदपोशी । लाजलज्जा लाविली वेशीं । हांकूनि बाहेर घालितां तिजसी । बलात्कारेंसीं घर घुसे ॥१२१॥</p>
<p>
	ओरडूं थांबे तेचि संधी । शिरूं पाहे रांड दुर्बुद्धी । तो ओरडतां ती पळे त्रिशुद्धी । सुखसमृद्धी मज तेणें ॥१२२॥</p>
<p>
	जावें न कोणीं त्याच्या वाटे । ओरडूं द्या मुक्तकंठें । तयावीण मज रात्र न कंठे । सौख्य मोठें त्याचेनी ॥१२३॥</p>
<p>
	याची ही ओरड एणेंपरी । आहे मज बहु हितकारी । ऐसा हा रोहिला परोपकारी । बहु सुखकारी मजलागीं ॥१२४॥</p>
<p>
	ओरडूं द्या त्यासी यथेष्ट । त्यांतचि आहे माझें इष्ट । नातरी ती रोहिली दुष्ट । देईल कष्ट मजलागीं ॥१२५॥</p>
<p>
	स्वयेंचि मग जैं थकेल । आपोआप स्वस्थ राहील । कार्यभाग तुमचा साधेल । भजही न बाजेल ती रांड ॥१२६॥</p>
<p>
	ऐसें म्हणतां महाराज । खुंटला मग तेथें इलाज । बाबांच्या मनीं नाहीं गजबज । काय मग काज आम्हांतें ॥१२७॥</p>
<p>
	आधींचि रोहिल्यासी उल्हास । वरी हा आला फाल्गुनमास । कलमे पढतां कंठशोष । असमसाहस मांडिला ॥१२८॥</p>
<p>
	जन समस्त आश्चर्यापन्न । केवढे बाबा क्षमासंपन्न । जेणें व्हावें मस्तक भिन्न । तेणेंचि तल्लीन ते होती ॥१२९॥</p>
<p>
	काय भयंकर ती ओरड । घशासी कैसी नव्हे कोरड । बाबांची परि एकचि होरड । नका दरडावूं तयाला ॥१३०॥</p>
<p>
	दिसाया रोहिला वेडा पीर । परी बाबांवरी अत्यंत आदर । कलमे निजधर्मानुसार । हर्षनिर्भर पढे तो ॥१३१॥</p>
<p>
	वाणी हळुवार किंवा मोठी । कोणास याचा विचार पोटीं । स्फुरणासवें उठाउठी । गर्जत उठी हरिनाम ॥१३२॥</p>
<p>
	निसर्गदत्त घर्घर स्वर । ‘अल्लाहो अकबर’ नामगजर । कलमे पढे आनंदनिर्भर । नित्य निरंतर रोहिला ॥१३३॥</p>
<p>
	जयासी हरिनामाचा कंटाळा । बाबा भीती तयाच्या विटाळा । म्हणती उगा कां रोहिल्यास पिटाळा । भजनीं चाळा जयातें ॥१३४॥</p>
<p>
	‘मद्भक्ता यत्र गायंति’ । तिष्ठें तेथें मी उन्निद्र स्थितीं । सत्य करावया हे भगवदुक्ति । ऐसी प्रतीति दाविली ॥१३५॥</p>
<p>
	ओलें कोरडें मागूनि खाईल । नातरी उपाशीही राहील । तया रोहिल्यासी कैंची बाईल । कोठूनि जाईल बाबांशीं ॥१३६॥</p>
<p>
	रोहिला कफल्लक दिडकीस भारी । कैंचें लग्न कैंची नारी । बाबा बाळब्रम्हाचारी । कथा ही सारी मायिक ॥१३७॥</p>
<p>
	करीना कां कंठशोष । बाबांसी कलम्यांचा संतोष । ऐकत राहतील अहर्निश । निद्रा तें विष तयांपुढें ॥१३८॥</p>
<p>
	कोठें कलम्यांची प्रबोध वाणी । कोठें ग्रामस्थांचीं पोकळ गार्‍हाणीं । तयांसी आणावया ठिकाणीं । बतावणी ही बाबांची ॥१३९॥</p>
<p>
	हाचि अभप्राय एणें रीती । बाबांनीं सकळां दाविली प्रतीती । रोहिल्याची आवडे मज संगती । नामीं प्रीति तयातें ॥१४०॥</p>
<p>
	द्दश्य द्रष्टा आणि दर्शन । अवघेंचि जया चैतन्यघन । तो असो ब्राम्हाण वा पठाण । समसमान दोघेही ॥१४१॥</p>
<p>
	एकदां माध्यान्हीं आरती झाली । मंडळी स्वस्थानीं जावया परतली । बाबांच्या मुखावाटे जी निघाली । मधुर वचनावली ती ऐका ॥१४२॥</p>
<p>
	“कुठेंही असा कांहींही करा । एवढें पूर्ण सदैव स्मरा । कीं तुमच्या इत्थंभूत कृतीच्या खबरा । मज निरंतरा लागती ॥१४३॥</p>
<p>
	येणें निदर्शित ऐसा जो मी । तोचि मी सर्वांच्या अंतर्यामीं । तोचि मी ह्रदयस्थ सर्वगामी । असें मी स्वामी सकळांचा ॥१४४॥</p>
<p>
	भूतीं सबाह्याभ्यंतरीं । भरूनि उरलीं मी चराचरीं । हें सकळ सूत्र ईश्वरी । सूत्रधारी मी त्याचा ॥१४५॥</p>
<p>
	मी सकळ भूतांची माता । मी त्रिगुणांची साम्यावस्था । मीचि सकलेंद्रियप्रवर्ता । कर्ता धर्ता संहर्ता ॥१४६॥</p>
<p>
	लक्ष लावी जो मजकडे । नाहीं तयासी कैंचेंही सांकडें । तोचि माझा जैं विसर पडे । माया कोरडे उडवी तैं ॥१४७॥</p>
<p>
	द्दश्यजात हें मत्स्वरूप । कीड मुंगी रंक भूप । हें स्थिर जंगम विश्व अमूप । हेंचि निजरूप बाबांचें ” ॥१४८॥</p>
<p>
	काय मौजेचा हा इशारा । भेद नाहीं संतां ईश्वरा । अभेदरूपें चराचरा । विश्वोद्धारा अवतार ॥१४९॥</p>
<p>
	होणें जरी गुरुपदी लीन । तेणें करावें गुरुगुणगायन । अथवा करावें गुरुकथाकीर्तन । अथवा श्रवण भक्तीनें ॥१५०॥</p>
<p>
	साधकें ऐसें करावें श्रवण । श्रोता श्रव्य जाई विरोन । प्रकट होईल चैतन्यघन । मन उन्मन पावेल ॥१५१॥</p>
<p>
	असतां जरी गर्क संसारीं । पडली संतकथा कानावरी । यत्न न करितां तिळभरी । कल्याणकारी ती स्वभावें ॥१५२॥</p>
<p>
	मग ती भक्तिभावें परिसतां । केवढें श्रेय चढेल हाता । श्रोतां विचार करावा चित्ता । आपुल्या निजहिताकारणें ॥१५३॥</p>
<p>
	जडेल तेणें गुरुपदीं प्रेम । वाढेल क्रमें आत्यंतिक क्षेम । नलगे दुजी निष्ठा नेम । होईल परम कल्याण ॥१५४॥</p>
<p>
	मना लावितां ऐसा निर्बंध । वाढेल कथाश्रवणछंद । सहज तुटतील विषयबंध । परमानंद प्रकटेल ॥१५५॥</p>
<p>
	ऐकूनि बाबांची मधुर वाणी । निर्धार केला मीं निजमनीं । एथूनि पुढें नरसेवा त्यागुनी । गुरुसेवनींचि असावें ॥१५६॥</p>
<p>
	परी मनासी लागली हुरहुरी । ‘मिळेल मेली तया नोकरी’ । हें जें बाबा वदले जत्तरीं । प्रत्यंतरीं येणार कीं ॥१५७॥</p>
<p>
	शब्द बाबांचा खालीं पडेल । हें तों सहसा कधींही न घडेला । नरसेवेचा संबंध जडेल । परी न जोडेल हित मोठें ॥१५८॥</p>
<p>
	स्वयंस्फूर्ति अण्णांची पृच्छा । खरी तथापि माझी ही इच्छा । नव्हती ऐसें नाहीं अनिच्छा - । प्रारब्धभोगेच्छा ही नव्हे ॥१५९॥</p>
<p>
	माझ्याही पोटीं नोकरी व्हावी । संसारनिर्वाहसोय लागावी । सांईही बोटानें गूळ दाखवी । परी पाजवी औषध ॥१६०॥</p>
<p>
	तें औषध या गुळाचे आशें । पिऊनि धालों भाग्यवशें । नोकरीही अकल्पित लागली कासे । द्रव्याभिलाषें स्वीकारिली ॥१६१॥</p>
<p>
	गूळ झाला तरी शेवट । खातां खातां येणार वीट । बाबांच्या उपदेशमधाचें बोट । चाखितां चोखट वाटलें ॥१६२॥</p>
<p>
	नोकरी नव्हती चिरस्थायी । चालूनि गेली आलिया पायीं । बाबांनीं बसविलें ठायींचे ठायीं । सौख्य अनपायी भोगावया ॥१६३॥</p>
<p>
	हें विश्व संपूर्ण चराचर भगवत्स्वरूपचि साचार । परी भगवंत विश्वाहूनही पर । परात्पर परमात्मा ॥१६४॥</p>
<p>
	ईश्वर प्रपंचेंसी अभिन्न । प्रपंच ईश्वरेंसीं भिन्न । प्रपंच तेथूनि चेतनाचेतन । तया अधिष्ठान ईश्वर ॥१६५॥</p>
<p>
	भगवंताचीं पूजास्थानें । अष्टप्रकार असती जाणें । प्रतिमा स्थंडिलादि आनानें । सर्वां तुळणें गुरू श्रेष्ठ ॥१६६॥</p>
<p>
	कृष्ण स्वयें ब्रम्हा पूर्ण । तोही धरी सांदीपनीचरण । म्हणे करितां सद्नुरुस्मण । मी नारायण संतुष्टें ॥१६७॥</p>
<p>
	मजहूनि मज सद्रुरुस्तवन । आवडे कीं सहस्रगुण । ऐसें सद्नुरूचें वरिष्ठपण । महिमान गहन तयाचें ॥१६८॥</p>
<p>
	गुरुभजना जो पाठिमोरा । तो एक अभागी पापी खरा । भोगी जन्मम्रणयेरझारा । करी मातेरा स्वार्थाचा ॥१६९॥</p>
<p>
	मागुती जन्म मागुती मरण । हें तों लागलें नित्य भ्रमण । म्हणूनि करूंया कथाश्रवण । निजोद्धरण संपादूं ॥१७०॥</p>
<p>
	संतमुखींच्या सहज गोष्टी  । अविद्येच्या तोडिती गांठी । तारक होती अतिसंकटीं । म्हणूनि पोटीं सांठवूं ॥१७१॥</p>
<p>
	नकळे कैसा येईल वेळ । घालूनि देतील कैसा मेळ । हा अल्लामियाचा सर्व खेळ । प्रेमळ प्रेक्षक ॥१७२॥</p>
<p>
	गांठीसी नसतां प्रज्ञाबळ । काय म्हणावें हें दैव सबळ । जे मी लाधलों साई गुरु प्रबळ । हाही एक खेळ तयाचा ॥१७३॥</p>
<p>
	निवेदिलें ग्रंथ-प्रयोजन । कथिलें मज दिधलें जें आश्वासन । जेणें मत्परत्व आणि मत्पूजन । काय तें दिग्दर्शन जाहलें ॥१७४॥</p>
<p>
	आतां आपण श्रोतेजन । कराल पुढील अध्यायीं श्रवण । समर्थ साईनाथांचें अवतरण । शिरडींत कैसेन जाहलें ॥१७५॥</p>
<p>
	लहान थोर तुम्ही सगळे । हें साईंचें चरित्र आगळें । होऊनि क्षणैक संसारावेगळे । परिसा भोळे भाविक हो ॥१७६॥</p>
<p>
	स्वयें जरी निर्विकारी । साई नटनाटकी अवतारी । वर्ते मायाकार्यानुसारी । जैसा व्यवहारीं प्रापंचिक ॥१७७॥</p>
<p>
	‘समर्थ साई’ या अल्प मंत्रें । ध्याती जयाचीं पदें पवित्रें । हालवी जो भक्तभवमोक्षसूत्रें । पावन चरित्रें तयाचीं ॥१७८॥</p>
<p>
	एवंच पावन साईचरित्र । वाची तयाचें पावन वक्त्र । श्रोतयांचे पावन श्रोत्र । होईल पवित्र अंतरंग ॥१७९॥</p>
<p>
	प्रेमें करितां कथाश्रवण । होईल भवदु:खांचें हरण । ओळेल साई कृपाघन। प्रकटेल संपूर्ण शुद्धबोध ॥१८०॥</p>
<p>
	लय विक्षेय कषाय । रसास्वाद हे श्रवणा अपाय । दूर सारा हे अंतराय । श्रवण सुखदायक होईल ॥१८१॥</p>
<p>
	नलगे व्रत उद्यापन । नलगे उपवास शरीरशोषण । नलगे तीर्थयात्रापर्यटन । चरित्रश्रवण एक पुरे ॥१८२॥</p>
<p>
	प्रेम असावें अकृत्रिम । जाणिलें पाहिजे भक्तिवर्म । सहज लाधेल परमार्थ परम । नासेल विषम अविद्या ॥१८३॥</p>
<p>
	नलगे इतर साधनीं शीण । करूं हें साईचरित्र श्रवण । संचित आणि क्रियमाण । अल्पप्रमाणही नुरवूं ॥१८४॥</p>
<p>
	कृपण वावरो कवण्याही गांवा । चित्तासमोर पुरलेला ठेवा । जैसा तयासी अहर्निशीं दिसावा । तैसाचि वसावा साई मनीं ॥१८५॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । ग्रंथप्रयोजनानुज्ञापनं नाम तृतीयोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 22 Apr 2022 14:49:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 22 Apr 2022 15:08:46 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय २]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-marathi-adhyay-2-122042200037_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाई नाथाय नम: ॥ पूर्वाध्यायीं मंगलाचरण । जाहलें देवताकुलगरुवंदन । साईचरित्रबीज पेरून । आतां प्रयोजन आरंभूं ॥१॥
अधिकारी अनुबंध ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 2" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/22/full/1650619021-9362.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra chapter 2" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगुरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाई नाथाय नम: ॥ पूर्वाध्यायीं मंगलाचरण । जाहलें देवताकुलगरुवंदन । साईचरित्रबीज पेरून । आतां प्रयोजन आरंभूं ॥१॥</p>
<p>
	अधिकारी अनुबंध दिग्दर्शन । अति संकलित करूं विवेचन । जेणें श्रोतयां ग्रंथप्रवेशन । आयासेंवीण घडेल ॥२॥</p>
<p>
	प्रथमाध्यायीं यथानुक्रम । करूनि गोधूम - पेषणोपक्रम । केला महामारीचा उपशम । आश्चर्य परम । ग्रामस्थां ॥३॥</p>
<p>
	ऐशा साईच्या अगाध लीला । श्रवण करितां आनंद झाला । तोचि या काव्यरूपें प्रकटला । बाहेर उतटला प्रेमपूर ॥४॥</p>
<p>
	म्हणूनि साईचे धन्यवाद । वाटलें यथामती करावे विशद । होतील ते भक्तांसी बोधप्रद । पापापनोद होईल ॥५॥</p>
<p>
	तदर्थ हें साईचें चरित्र । लिहूं आदरिलें अति पवित्र । आरंभिलें हें कथासत्र । इह परत्र सौख्यद ॥६॥</p>
<p>
	सन्मार्गदर्शक संतचरित्र । नव्हे तें न्याय वा तर्कशास्त्र । तरी होईल जो संतकृपापात्र । तयां न विचित्र कांहींच ॥७॥</p>
<p>
	तरी ही प्रार्थना श्रोतयालागीं । व्हावें जी या आनंदा विभागी । धन्य भाग्याचा तो सत्संगी । कथाव्यासंगीं निरत जो ॥८॥</p>
<p>
	चिरपरिचित जीवाचा मित्र । सहवास ज्याचा दिवस रात । त्याचें न मज रेखाटवे चित्र । संतचरित्र काय लिहूं ॥९॥</p>
<p>
	जेथ माझें मज अंतरंग । ओळखूं येईना यथासांग । त्या म्यां संतमनींचे तरंग । वर्णावे निर्व्यंग कैसेनी ॥१०॥</p>
<p>
	करूं जातां स्वरूपनिर्धार । मूकावले जेथ वेदही चार । त्या तुझ्या रूपाचा विचार । कळेल साचार मज कैसा ॥११॥</p>
<p>
	स्वयें आधीं संत व्हावें । मग संतां यथार्थ जाणावें । तेथ मी संतांसी काय वानावें । हें मज ठावें आधींच ॥१२॥</p>
<p>
	सप्त सागरींचें पाणी । तयाचीही करवेल मापणी । आकाशासी घालवेल गवसणी । परी न आयणी संत येती ॥१३॥</p>
<p>
	जाणें मनीं मी एक पामर । परी बाबांचा प्रताप अनिवार । पाहूनि उठे गावयाची लहर । तीही अनावर हों पाहे ॥१४॥</p>
<p>
	जय जयाजी साईराया । दीनदुबळ्यांचिया विसांविया । अगाध न वर्णवे तुझी माया । करीं कृपा या दासावरी ॥१५॥</p>
<p>
	लहान तोंडीं मोठा घांस । तैसें हें होईल माझें साहस । होऊं न देईं माझा उपहास । वाटे हा इतिहास लिहावा ॥१६॥</p>
<p>
	संतचरित्रें जे जे लिहिती । तयांवरी भगवंताची प्रीती । ऐसें महाराजा ज्ञानेश्वर वदती । धरावी भीति मग मीं कां ॥१७॥</p>
<p>
	माझियाही मनीं ही स्फूर्ती । चेतविती तीच भगवंतमूर्ती । स्वयें जरी मी जड मूढमती । निजकार्यपूर्ती ती जाणे ॥१८॥</p>
<p>
	भक्त जी जी सेवा कल्पिती । संत स्वयेंचि करवूनि घेती । भक्त केवळ कारण निमित्तीं । सकळ स्फूर्ति संतांची ॥१९॥</p>
<p>
	सारांश हा साई स्वयें करवी । निजचरित्र मज मूर्खाकरवीं । तेणेंचि या कथेची थोरवी । गौरवी जे आदरें ॥२०॥</p>
<p>
	साधुसंत अथवा श्रीहरी । कोणातेंही धरूनि निजकरीं । आपुली कथा आपण करी । निजकर शिरीं ठेवुनी ॥२१॥</p>
<p>
	जैसी शके सतराशें सालीं । महीपतीसी बुद्धी स्फुरली । साधुसंतांहीं सेवा घेतली । चरित्रें लिहविलीं त्याकरवीं ॥२२॥</p>
<p>
	तीच सेवा अठराशें सालीं । दासगणूच्या हस्तें घेतली । पुढील संतचरित्रें लिहविलीं । पावन झालीं सकळिकां ॥२३॥</p>
<p>
	भक्त आणि संतविजय ग्रंथ । भक्त आणि संतलीलामृत । हे चार जैसे महिपतीरचित । दासगणूकृत दोन तैसे ॥२४॥</p>
<p>
	एकाचें नांव भक्तलीलामृत । दुजयाचें तें संतकथामृत । उपलब्ध अर्वाचीन भक्त संत । उभय ग्रंथांत वर्णिले ॥२५॥</p>
<p>
	त्यांतील भक्तलीलामृतांत । श्रीसाईंचें मधुर चरित । आहे वर्णिलें अध्यायत्रयींत । श्रोतीं तें तेथ वाचावें ॥२६॥</p>
<p>
	तैशीचि गोड ज्ञानकथा । कथिती साई एका भक्ता । ती वाचावी संतकथामृता । अध्याय सत्तावन पहा ॥२७॥</p>
<p>
	शिवाय साईंची अलौकिक लीला । रघुनाथ - सावित्री भजनमाला । अनुभवपूर्वक निववी जनाला । अभंग - पदाला गाऊन ॥२८॥</p>
<p>
	यांतचि एक बाबांचें लेखरूं । जें तृषित चकोरां अमृतकरू । वर्षलें कथामृतप्रेमपडिभरू । श्रोतां तें सादरू सेवावें ॥२९॥</p>
<p>
	दासगणूची स्फुट कविता । तीही अत्यंत रसभरिता । आनंद देईल श्रोतयाचित्ता । लीला परिसतां बाबांची ॥३०॥</p>
<p>
	तैसेंचि गुर्जर जनांकरितां । भक्त अमीदास भवानी मेथा । यांनींही कांहीं चमत्कारकथा । अति प्रेमळता लिहिल्याती ॥३१॥</p>
<p>
	शिवाय कांहीं सद्भक्तशिरोमणी । साईप्रभा हें नांव ठेवुनी । प्रसिद्ध करीत पुण्यपट्टणीं । कथाश्रेणी बाबांच्या ॥३२॥</p>
<p>
	ऐसऐशिया कथा असतां । या ग्रंथाची काय आवश्यकता । शंका येईल श्रोतयांचित्ता । निराकरणता आकर्णिजे ॥३३॥</p>
<p>
	साईचरित्र महासागर । अनंत अपार रत्नाकर । मी ट्टिवी तो रिता करणार । घडणार हें कैसेनी ॥३४॥</p>
<p>
	तैसें साईंचें चरित्र गहन । अशक्य कधींहि साङ्ग वर्णन । म्हणूनि करवेल तें कथन । तेणेंचि समाधान मानावें ॥३५॥</p>
<p>
	अपार साईंच्या अपूर्व कथा । शांतिदायक भवदवार्ता । श्रोतयां देतील श्रवणोल्हासता । चित्तस्थिरता निजभक्तां ॥३६॥</p>
<p>
	कथा वदले परोपरीच्या । व्यावहारिक उपदेशाच्या । तैशाचि सर्वांच्या अनुभवाच्या । वर्माच्या निजकर्माच्या ॥३७॥</p>
<p>
	अपौरुषेय श्रुति विख्यात । जैशा असंख्य आख्यायिका विश्रुत । तैशाचि बाबा मधुर अर्थभरित । अपरिमित सांगत ॥३८॥</p>
<p>
	ऐकतां त्या सावधान । इतर सुखें तृणासमान । विरोनि जाय भूकतहान । समाधान अंतरीं ॥३९॥</p>
<p>
	कोणासी व्हावी ब्रम्हासायुज्यता । अष्टांगयोगप्रावीण्यता । समाधिसुखनिर्भरता । होईल कथा परिसतां या ॥४०॥</p>
<p>
	श्रवणार्थियांचे कर्मपाश । तोडूनि टाकिती या कथा अशेष । बुद्धीसी देती सुप्रकाश । निर्विशेष सुख सकलां ॥४१॥</p>
<p>
	तेणें मज स्फुरली वासना । ऐशा सुसंग्राह्य कथा नाना । ओवूनि करावें मालाग्रथना । हीचि उपासना चांगली ॥४२॥</p>
<p>
	कानीं पडतां चार अक्षरें । तात्काळ जीवाचा दुर्दिन ओसरे । संपूर्ण कथा ऐकतां सादरें । भावार्थी उतरेल भवपार ॥४३॥</p>
<p>
	माझी करोनियां लेखणी । बाबाचि गिरवितील माझा पाणी । मी तों केवळ निमित्ताला धणी । अक्षरें वळणीं वळवितों ॥४४॥</p>
<p>
	वर्षानुवर्ष बाबांची लीला । पाहोनि लागला मनासी चाळा । बाबांच्या गोष्टी कराव्या गोळा । भोळ्या प्रेमळांकारणें ॥४५॥</p>
<p>
	होऊनियां प्रत्यक्ष दर्शन । निवाले नाहींत ज्यांचे नयन । तयांसी बाबांचें माहात्म्यश्रवण । पुण्य पावन घडावें ॥४६॥</p>
<p>
	कोणा सभाग्याचिया मना । वाचावयाची होईल कामना । परमानंद होईल मना । समाधान लाहेल तो ॥४७॥</p>
<p>
	ऐशी मनांत उदेली वृत्ती । माधवरावांचे कानावरती । घातली परी सांशक चित्तीं । कैसें मजप्रति साधे हें ॥४८॥</p>
<p>
	वयासी उलटलीं वर्षें साठ । बुद्धीही नाठ वाहे सुनाट । अशक्तपणें राहील खटपट । उरली वटवट तोंडाची ॥४९॥</p>
<p>
	ती तरी व्हावी साईप्रीत्यर्थ । साधेल कांहींतरी परमार्थ । इतरत्र होईल ती निरर्थ । एतदर्थ हा यत्न ॥५०॥</p>
<p>
	अनुभव घेतां दिवस रातीं । वृत्तांत लिहावा आलें चित्तीं । जयाच्या परिशीलनें शांती । मनासी विश्रांति लाभेल ॥५१॥</p>
<p>
	आत्मतृप्तीचे निसर्गोद्नार । स्वानुभूतीचे अधिष्ठानावर । बाबा उद्नारले वारंवार । श्रोतयां सादर करावें ॥५२॥</p>
<p>
	बहुत वदले ज्ञानकथा । अनेकां लाविलें भजनपंथा । तयांचा संग्रह करावा पुरता । होईल गाथा साईंचा ॥५३॥</p>
<p>
	त्या त्या कथा जो सांगती । सादर मनें जे जे ऐकिती । उभायांच्या मनांसी विश्रांती । पूर्ण शांति लाभेल ॥५४॥</p>
<p>
	ऐकतां श्रीमुखींच्या कथा । भक्त विसरतील देहव्यथा । तयांचें ध्यान मनन करितां । भवनिर्मुक्तता आपैसी ॥५५॥</p>
<p>
	श्रीसाईमुखींच्या वार्ता । अमृतापरिस रसभरिता । परमानंद दाटेल परिसतां । काय मधुरता वानूं मी ॥५६॥</p>
<p>
	ऐशिया कथा जो अदांभिकता । आढळेल मज गातां वर्णितां । वाटे तया पदरजधुळीं लोळतां । मोक्ष हाता येईल ॥५७॥</p>
<p>
	तयांच्या गोष्टींची अलौकिक मांडण । तैशीचि शब्दाशब्दांची ठेवण । परिसतां तल्लीन श्रोतृगण। सुख संपूर्ण सकळिकां ॥५८॥</p>
<p>
	जैसे गोष्टी ऐकावया कान । किंवा दर्शन घ्यावया नौयन । तैसेंचि मन होऊनियां उन्मन । सहज ध्यान लागावें ॥५९॥</p>
<p>
	गुरुमाउली माझी जननी । कथिती तियेच्या कथा ज्या जनीं । ऐकिजेति वदनोवदनीं । सादर श्रवणीं सांठवूं ॥६०॥</p>
<p>
	त्या त्याचि वारंवार आठवूं । सांठवतील तितुक्या सांठवूं । प्रेमबंधनीं त्या गांठवूं । मग लुटवृं परस्पर ॥६१॥</p>
<p>
	यांत माझें कांहींचि नाहीं । साईनाथांची प्रेरणा ही । ते जैसें वदवितील कांहीं । तैसें तें पाहीं मी वदें ॥६२॥</p>
<p>
	मी वदें हाही अहंकार । साईचि स्वयें सूत्रधार । तोचि वाचेवा प्रवर्तविचार । तरी ते वादणार मी कोण ॥६३॥</p>
<p>
	मीपणा समर्पितां  पायांवर । सौख्य लाधेल अपरंपार । सकळ सुखाचा संसार । अहंकार गेलिया ॥६४॥</p>
<p>
	ही वृत्ति उठाया अवसर । बाबांसी विचारूं नाहीं धीर । आले माधवराव पायरीवर । तयांचे कानावर घातली ॥६५॥</p>
<p>
	तेचि वेळीं माधवरावांनीं । नाहीं तेथें दुसरें कोणी । ऐसाचि प्रसंग साधुनी । बाबांलागूनि पुसियलें ॥६६॥</p>
<p>
	बाबा हे अण्णासाहेब म्हणती । आपुलें चरित्र यथामती । लिहावें ऐसें येतें चित्तीं । आपुली अनुमति असलिया ॥६७॥</p>
<p>
	“मी तों केवळ भिकारी । फिरतों भिक्षेसी दारोदारीं । ओलीकोरडी भाजी भाकरी । खाऊनि गुजरीं काळ मी ॥६८॥</p>
<p>
	त्या माझी कथा कशाला । कारण होईल उपहासाला” । ऐसें न म्हणा या हिरियाला । कोंदणीं जडविला पाहिजे ॥६९॥</p>
<p>
	असो आपुली अनुज्ञा काय । लिहितील आपण असल्या सहाय । किंवा लिहवितील आपुलेचि पाय । दूर अपाय दवडुनी ॥७०॥</p>
<p>
	असतां संतांचीं  आशीर्वचनें । तैंचि उपक्रम ग्रंथरचने । विना आपुल्या कृपावलोकनें । निर्विन्घ लेखन चालेना ॥७१॥</p>
<p>
	जानोनि माझिया मनोगता । कृपा उपजली साईसमर्था । म्हणती लहासील मनोरथा । पायां म्यां माथा ठेविला ॥७२॥</p>
<p>
	दिधल अमज उदीचा प्रसाद । मस्तकीं ठेविला हस्त वरद । साई सकलधर्मविशारद । भवापनोद भक्तांचा ॥७३॥</p>
<p>
	ऐकोनि माधवरावांची प्रार्थना । साईंसी आली माझी करुणा । अधीर मनाच्या शांतवना । धैर्यप्रदाना आदरिलें ॥७४॥</p>
<p>
	भावार्थ जाणोनि माझे मनींचा । अनुज्ञापनीं प्रवर्तली वाचा । “कथांवार्तादि अनुभवांचा । संग्रह साचा करावा ॥७५॥</p>
<p>
	दफ्तर ठेवा बरें आहे । त्याला माझें पूर्ण सहाये । तो तर केवळ निमित्त पाहें । लिहावें माझें मींचि कीं ॥७६॥</p>
<p>
	माझी कथा मींच करावी । भक्तेच्छा मींच पुरवावी । तयानें अहंवृत्ति जिरवावी । निरवावी ती ममपदीं ॥७७॥</p>
<p>
	ऐसें वर्ते जो व्यवहारीं । तया मी पूर्ण साह्य करीं । हे कथाच काय सर्वतोपरी । तया घरीं राबें मी ॥७८॥</p>
<p>
	अहंवृत्ति जेव्हां मुरे । तेव्हां तयाचा ठावही नुरे । मीच मग मीपणें संचरें । माझ्याचि करें लिहीन मी ॥७९॥</p>
<p>
	ये बुद्धीं जें कर्म आरंभिलें । श्रवण मनन वा लेखन वहिलें । ज्याचें त्यानेंचि तें संपादिलें । त्यास तों केलें निमित्त ॥८०॥</p>
<p>
	अवश्यमेव दफ्तर ठेवा । घरीं दारीं असा कुठें वा । वारंवार आठव ठेवा । होईल विसावा जीवासी ॥८१॥</p>
<p>
	करितां माझिया कथांचें श्रवण । तयांचें कीर्तन आणि चिंतन । होईल मद्भक्तीचें जनन । अविद्यानिरसन रोकडें ॥८२॥</p>
<p>
	जेथें भक्ति श्रद्धान्वित । तयाचा मी नित्यांकित । ये अर्थीं न व्हावें शंकित । इतरत्र अप्राप्त मी सदा ॥८३॥</p>
<p>
	सद्भावें या कथा परिसतां । निष्ठा उपजेल श्रोतयां चित्ता । सहज स्वानुभव स्वानंदता । सुखावस्था लाधेल ॥८४॥</p>
<p>
	भक्तासी निजरूपज्ञान । जीव-शिवा समाधान । लक्षेल अलक्ष्य निर्गुण । चैतन्यघन प्रकटेल ॥८५॥</p>
<p>
	ऐसें या मत्कथांचें विंदान । याहूनि काय पाहिजे आन । हेंच श्रुतीचें ध्येय संपूर्ण । भक्त संपन्न ये अर्थीं ॥८६॥</p>
<p>
	जेथें वादावादीची बुद्धी । तेथें अविद्या मायासमृद्धी । नाहीं तेथें स्वहितशुद्धी । सदा दुर्बुद्धी कुतर्की ॥८७॥</p>
<p>
	तो ना आत्मज्ञानासी पात्र । तयासी ग्रासी अज्ञान मात्र । नाहीं तयासी इहपरत्र । असुख सर्वत्र सर्वदा ॥८८॥</p>
<p>
	नको स्वपक्षस्थापन । नको परपक्षनिराकरण । नको पक्षद्वयात्मक विवरण । काय ते निष्कारण सायास” ॥८९॥</p>
<p>
	‘नको पक्षद्वयात्मक विवरण’ । होतां या शब्दाचें स्मरण । पूर्वीं श्रोतयां दिधलें अभिवचन । जाहली आठवण तयाची ॥९०॥</p>
<p>
	मागां प्रथमाध्याय संपतां । वचन दिधलेंसे कीं श्रोतां । ‘हेमाड’ नामकरणकथा । आधीं समस्तां सांगेन ॥९१॥</p>
<p>
	कथेमध्यें ही आडकथा । परिसतां ठरेल युक्तायुक्तता । होईल जिज्ञासेची पूर्तता । हीही प्रेरकता साईची ॥९२॥</p>
<p>
	पुढें मग पूर्वानुसंधान । होईल साईचरित्र निवेदन । म्हणूनि श्रोतां करावें श्रवण । दत्तावधान ते कथा ॥९३॥</p>
<p>
	आतां हा ‘साईलीला’ ग्रंथ । ‘भक्तहेमाडपंतविरचित’ । ऐसें जें प्रतिअध्यायान्तीं श्रुत । ते हे पंत कोण कीं ॥९४॥</p>
<p>
	सहज आशखा श्रोतयां मना । करावया तज्जिज्ञासा-शमना । कैसा आरंभ या नामकरणा । व्हावें त्या श्रवणा सादर ॥९५॥</p>
<p>
	जन्मादारभ्य मरणावधी । षोडश संस्कार देहासंबंधीं । त्यांतील एक ‘नामकरण’ विधी । संस्कारसिद्धी प्रसिद्ध ॥९६॥</p>
<p>
	तत्संबंधीं अल्प कथा । श्रोतां परिसिजे सादर चित्ता । हेमाडपंत - नामकरणता । प्रसंगोपात्तता प्रकटेल ॥९७॥</p>
<p>
	आधीं हा लेखक खटयाळ । जैसा खटयाळ तैसा वाचाळ । तैसाचि टावाळ आणि कुटाळ । नाहीं विटाळ ज्ञानाचा ॥९८॥</p>
<p>
	नाहीं ठावा सद्नुरुमहिमा । कुबुद्धि आणिकुतर्कप्रतिमा । सदा निज शहाणीवेचा गरिमा । वादकर्मां प्रवृत्त ॥९९॥</p>
<p>
	परी प्राक्तनरेषा सबळ । तेणेंचि साईंचें चरणकमळ । द्दष्टीसी पडलें अद्दष्टें केवळ । हा तों निश्चळ वादनिष्ठा ॥१००॥</p>
<p>
	काकासाहेब भक्तप्रवर । नानासाहेब चांदोरकर । यांसीं ऋणानुबंध नसता जर । कोठूनि जाणार शिरडीस हा ॥१०१॥</p>
<p>
	काकासाहेब आग्रहा पडले । शिरडीचें जाणें निश्चित ठरलें । जावयाचे दिवशींच बदललें । मन तें फिरलें अवचित ॥१०२॥</p>
<p>
	याचा एक परम मित्र । तो लब्धानुग्रह गुरुपुत्र । असतां लोणावळ्यासी सहकलत्र । प्रसंग विचित्र पातला ॥१०३॥</p>
<p>
	तयाचा एकुलता एक सुत । शरीरें सुद्दढ गुणवंत । असतां त्या शुद्ध हवेच्या स्थानांत । ज्वराक्रांत जाहला ॥१०४॥</p>
<p>
	केले सकळ उपाय मानवी । जाहले दोरे उतारे दैवी । गुरूची आणूनि संनिध बैसवी । अखेर फसवी सुत त्यातें ॥१०५॥</p>
<p>
	प्रसंग पाहूनि ऐसा बिकट । निवारावया दुर्धर संकट । गुरूसी बसविलें पुत्रानिकट । तें सर्व फुकट जाहलें ॥१०६॥</p>
<p>
	ऐसा हा संसार महाविचित्र । कोणाचा पुत्र कोणाचें कलत्र । प्राणिमात्राचें कर्मतंत्र । अद्दष्ट सर्वत्र अनिवार ॥१०७॥</p>
<p>
	कानीं पडतां ही दुर्वार्ता । अति उद्विग्नता आली चित्ता । हीच काय गुरूची उपयुक्तता । पुत्र एकुलता राखवेना ॥१०८॥</p>
<p>
	प्रारब्धकर्मप्राबल्यता । तीच साईदर्शनीं शिथिलता । प्राप्त झाली या माझिया चित्ता । पडला मोडता गमनांत॥१०९॥</p>
<p>
	किमर्थ जावें शिरडीप्रती । काय त्या माझ्या स्नेह्याची स्थिती । हाच ना लाभ गुरूचे संगतीं । गुरु काय करिती कर्मासी ॥११०॥</p>
<p>
	असेल जें जें ललाटीं लिहिलें । तें तेंच जरी होणार वहिलें । मग तें गुरुविण काय कीं अडलें । जाणं ठेलें शिरडीचें ॥१११॥</p>
<p>
	किमर्थ आपुलें स्थान सोडा । कशासी गुरूचे मागें दौडा सुखाचा जीव दु:खांत पाडा । कवण्या चाडा कळेना ॥११२॥</p>
<p>
	जैसें जैसें यद्दच्छे घडे । तें तें मोगूं सुख वा सांकडें । काय जाऊनियां गुरूच्याकडे । जरी होणारापुढें चालेना ॥११३॥</p>
<p>
	जैसें जयाचें अर्जित । नको म्हणतां चालूनि येत । होणारापुढें कांहींही न चालत । नेलें मज खेंचीत शिरडीसी ॥११४॥</p>
<p>
	नानासाहेब प्रांताधिकारी । करूं निघाले वसईची फेरी । ठाण्याहूनि दादरावरी । य़ेऊनि विळभरी बैसले ॥११५॥</p>
<p>
	मध्यंतरीं एक तास । गाडी वसईची यावयास । वाटलें हा अवकाश । लावूं कीं कामास एकादिया ॥११६॥</p>
<p>
	जाहली मात्र ऐसी स्फूर्ती । तोंचि आली दादरावरती । गाडी एक केवळ वांदर्‍यापुरती । ते मग बैसती तियेंत ॥११७॥</p>
<p>
	येतां गाडी निजस्थानीं । निरोप आला मजलागूनी । मग मी भेट घेतां तत्क्षणीं । चालली कहाणी शिरडीची ॥११८॥</p>
<p>
	केव्हां निघणार साईदर्शना । किमर्थ आळस शिरडीगमना । दीर्घसुत्रता कां प्रस्थाना । निश्चिती मना कां नाहीं ॥११९॥</p>
<p>
	पाहूनिज नानांची आतुरता । मीही शरमलें आपुले चित्ता । परी मनाची झालेली चंचलता । पूर्ण प्रांजळता निवेदिली ॥१२०॥</p>
<p>
	त्यावरी म्ग नानांचा बोध । कळकळीचा प्रेमळ शुद्ध । परिसतां शिरडीगमनेच्छोद्बोध । अति मोदप्रद जाहला ॥१२१॥</p>
<p>
	‘तात्काळ निघतों’ घेतलें वचन । तेव्हांच नानांनीं केलें प्रयाण । मग मींही मागें परतोन । ठेविलें प्रस्थान मुहूर्तीं ॥१२२॥</p>
<p>
	मग सर्व सामान आवरूनी । सर्व निरवानिरव करूनी । तेचि दिवशीं अस्तमानीं । शिरडीलागूनि निघालों ॥१२३॥</p>
<p>
	सायंकाळापाठील मेल । दादरावर उभी राहील । जाणूनि दादरचेंच भरलें हंशील । तिकीट तेथील घेतलें ॥१२४॥</p>
<p>
	परी मी गाडींत जाऊनि बसतां । वांद्रें स्टेशनीं गाडी असतां । यवन एक गाडी सुटतां । अति चपळतां आंत ये ॥१२५॥</p>
<p>
	तिकीट घेतलें दादरपर्यंत । तोंच आरंभीं कार्यविघात । ‘प्रथमग्रासीं मक्षिकापात’ । तैसा डोकावत होता कीं ॥१२६॥</p>
<p>
	सवें पाहूनि सर्व सामान । यवन पुसे मज ‘कोठें गमन ? ।’ तंव म्हणें मी दादरासी जाऊन । मेल साधीन मनमाडची ॥१२७॥</p>
<p>
	तंव तो सुचवी वेळेवर । उतरूं नका हो दादरावर । मेल न तेथें थांबणार । बोरीबंदर गांठावें ॥१२८॥</p>
<p>
	होती न वेळीं ही सूचना । मेल दादरवर मिळती ना । नकळे मग या चंचल मना । काय कल्पना उठत्या तें ॥१२९॥</p>
<p>
	परी ते दिवशीं प्रयाणयोग । साधावा ऐसाचि होता सुयोग । म्हणोनि मध्यंतरीं हा कथाभाग । घडला मनाजोग अवचिता ॥१३०॥</p>
<p>
	तिकडे भाऊसाहेब दीक्षित । होतेचि मार्गप्रतीक्षा करीत । उदईक नऊ दहाचे आंत । जाहलों शिरडींत सादर ॥१३१॥</p>
<p>
	इसवी सन एकूणीसशें दहा । वर्तमान हें घडलें पहा । एक साठयांचाच वाडा तेव्हा । होता रहावयासी उतारूंस ॥१३२॥</p>
<p>
	तांग्यांतूनि उतरल्यावरी । दर्शनौत्सुक्य दाटलें अंतरीं । कधीं चरण वंदीन शिरीं । आनंदलहरी उसळल्या ॥१३३॥</p>
<p>
	इतुक्यांत साईंचे परमभक्त । तात्यासाहेब नूलकर विख्यात । मशिदींतूनि आले परत । म्हणती “त्वरित दर्शन घ्या” ॥१३४॥</p>
<p>
	आलेचि बाबा मंडळीनिशीं । वाडियाचे कोपर्‍यापाशीं । चला आधीं धूळभेटीसी । मग ते लेंडीसी निघतील ॥१३५॥</p>
<p>
	पुढें मग करा स्नान  । वाबा जों येताति मागें परतोन । तेव्हां मग मशीदीस जाऊन । स्वस्थ दर्शन घ्या पुन्हा” ॥१३६॥</p>
<p>
	ऐसें ऐकून घाईघाई । धांवलों बाबा होते त्या  ठाईं । धुळींत घातलें लोटांगण पाईं । आनंद न माई मनांत ॥१३७॥</p>
<p>
	नानासाहेब सांगूनि गेले । त्याहूनि अधिक प्रत्यक्ष पाहिलें । दर्शनें म्यां धन्य मानिलें । साफल्या झालें नयनांचें ॥१३८॥</p>
<p>
	कधीं ऐकिली नाहीं देखिली । मूर्ति पाहूनि द्दष्टि निवाली । तहान भूक सारी हरपली । तटस्थ ठेलीं इंद्रियें ॥१३९॥</p>
<p>
	लाधलों साईचा चरणस्पर्श । पावलों जो परामर्ष । तोचि या जीवाचा परमोत्कर्ष । नूतन आयुष्य तेथूनि ॥१४०॥</p>
<p>
	ज्यांचेनि लाधलों हा सत्संग । सुखावलों मी अंग - प्रत्यंग । तयांचे ते उपकार अव्यंग । राहोत अभंग मजवरी ॥१४१॥</p>
<p>
	ज्यांचेनि पावलों परमार्थातें । तेचि कीं खरे आप्त भ्राते । सोयरे नाहींत तयांपरते । ऐसें निजचित्तें मानीं मी ॥१४२॥</p>
<p>
	केवढा तयांचा उपकार । करूं नेणें मी प्रत्युपकार । म्हणोनि केवळ जोडूनि कर । चरणीं हें शिर ठेवितों ॥१४३॥</p>
<p>
	साईदर्शनलाभ घडला । माझिया मनींचा विकल्प झडला । वरी साईसमागम घडला । परम प्रकटला आनंद ॥१४४॥</p>
<p>
	साईदर्शनीं हीच नवाई । दर्शनें वृत्तीसी पालट होई । पूर्वकर्माची मावळे सई । वीट विषयीं हळूहळू ॥१४५॥</p>
<p>
	पूर्वजन्मींचा पापसंचय । कृपावलोकनें झाला क्षय । आशा उपजली आनंद अक्षय । करितील पाय साईंचे ॥१४६॥</p>
<p>
	भाग्यें लाधलों चरण-मानस । वायसाच होईल हंस । साई महंत संतावतंस । परमहंस सद्योगी ॥१४७॥</p>
<p>
	पापताप-दैन्यविनाशी । ऐसिया साईच्या दर्शनेंसीं । पुनीत आज जहालों मी बहुवसी । पुण्यराशी समागमें ॥१४८॥</p>
<p>
	पूर्वील कित्येक जन्मांच्या पुण्यगांठी । ती ही साईमहाराज - भेटी । हा साई एक मीनलिया द्दष्टीं । सकल सृष्टी साईरूप ॥१४९॥</p>
<p>
	 येतांचि शिरडीसी प्रथम दिवशीं । बाळासाहेब भाटयांपाशीं । आरंभ झाला वादावादीसी । गुरू कशीसी व्या कीं ॥१५०॥</p>
<p>
	बुडवूनि आपुली स्वतंत्रता । ओढूनि घ्यावी कां परतंत्रता । जेथें निजकर्तव्यदक्षता । काय आवश्यकता गुरूची ॥१५१॥</p>
<p>
	ज्याचें त्यानेंचि केलें पाहिजे । न करी त्यासी गुरूनें काय कीजे । न हालवितां हात पाय जो निजे । तयासी दीजे काय कवणें ॥१५२॥</p>
<p>
	हाचि माझा पक्ष उजू । प्रतिपक्षाची विरुद्भ बाजू । दुराग्रहाचाच तो तराजू । वाद माजून राहिला ॥१५३॥</p>
<p>
	अंगीं दुर्धर देहाभिमान । तेणेंच वादावादीचें जनन । अहंभावाची ही खूण । नाहीं त्यावीण वाद जगीं ॥१५४॥</p>
<p>
	प्रतिपक्षाचें निश्चित मत । हो कां पंडित वेदपारंगत । गुर्वनुग्रहाव्यतिरिक्त । पुस्तकी मुक्त केवळ तो ॥१५५॥</p>
<p>
	दैव थोर कीं कर्तृत्व थोर । वाद चालला हा घनघोर । केवळ दैवावर टाकूनि भार ।  काय होणार मी म्हणें ॥१५६॥</p>
<p>
	तंव बोले विरुद्ध पक्षकार । होणारासी नाहीं प्रतिकार । होष्यमाण नाहीं टळणार । मी मी म्हणणार भागले ॥१५७॥</p>
<p>
	दैवापुढें कोण जाई । एक करितां एक होई । ठेवा तुमची ही चतुराई । अभिमान ठायीं पडेना ॥१५८॥</p>
<p>
	मी म्हणें हो म्हणतां कसें हें । करील त्याचेंच सर्व आहे । आळशापरी बैसूनि राहे । देव साहे कैसें तें ॥१५९॥</p>
<p>
	“उद्धरेदात्मनात्मानं” गर्जे स्वयें स्मृतिवचन । त्याचा अनादर करून । तरून जाणें अशक्य ॥१६०॥</p>
<p>
	हें ज्याचें त्यानेंच करावें लागे । लागावें किमर्थ गुरूचे मागें । आपण असल्यावीण जागे । गुरूनें भागे कैसेनी ॥१६१॥</p>
<p>
	आपुली सदसद्विचारबुद्धि । आपुलें साधन चित्तशुद्धि । तें झुगारूनि जो कुबुद्धि । गुरु काय सिद्धि देई त्या ॥१६२॥</p>
<p>
	या वादाचा अंत नाहीं । निष्पन्न कांहीं जाहलें नाहीं । चित्तस्वास्थ्यास अंतरलों पाहीं । हेचि कमाई म्यां केली ॥१६३॥</p>
<p>
	ऐसा वाद घालितां घालितां । कोणीही ना तिळभर थकतां । ऐशा दोन घटका लोटतां । वाद आटपता घेतला ॥१६४॥</p>
<p>
	पुढें मंडळीसमवेत । आम्ही जातों जों मशिदींत । बाबा काकासाहेबांप्रत । परिसा पुसत काय तें ॥१६५॥</p>
<p>
	‘काय चाललें होतें वाडयांत । वाद कशाचा होतां भांडत । काय म्हणाले हे हेमाडपत’ । मजकडे पाहत बोलले ॥१६६॥</p>
<p>
	वाडयापसूनि मशीदीपर्यंत । मध्यंतरीं अंतर बहुत । बाबांसी कळलें कैसें हें वृत्त । आश्चर्यचकित मी मनीं ॥१६७॥</p>
<p>
	असो ऐसा मी वाग्बाणहत । जाहलों नि:शब्द लज्जावनत । पहिल्याच भेटीसी कीं हें अनुचित । घडलें अविहित मजकरवीं ॥१६८॥</p>
<p>
	हें ‘हेमाडपंत’ नामकरण । प्रात:कालींचा वाद या कारण । तेणेंचि बाबांसी हेमाडस्मरण । मनीं मीं खूण बांधिली ॥१६९॥</p>
<p>
	देवगिरीचे राजे यादव । हेचि ते दौलताबादींचे जाधव । तेरावे शतकीं राज्य वैभव । वाढविलें गौरव महाराष्ट्राचें ॥१७०॥</p>
<p>
	‘प्रौढप्रतापचक्रवर्ती’ । ‘महादेव’ नामा भूपती । पुतण्या तयाचा पुण्यकीर्ती । विक्रमें प्रख्याती पावला ॥१७१॥</p>
<p>
	तोही यदुवंशचूडामणी । ‘रामराजा’ राजाग्रणी । मंत्री या उभयतांचा बहुगुणी । सर्वलक्षणी ‘हेमाद्री’ ॥१७२॥</p>
<p>
	तो धर्मशास्त्रग्रंथकार । ब्रम्हावृन्दार्थ परम उदार । आचारव्यवस्था संगतवार । आरंभीं रचणार हेमाद्री ॥१७३॥</p>
<p>
	व्रतदानतीर्थमोक्षखाणी । नामें ‘चतुर्वर्गचिंतामणी । ग्रंथ रचिला हेमाद्रींनीं । विख्यात करणी तयांची ॥१७४॥</p>
<p>
	गीर्वाण भोषेंत हेमाद्रिपंत । तोचि प्राकृतीं हेमाडपंत । मुत्सद्दी राजकारणनिष्णात । होता विख्यात ते काळीं ॥१७५॥</p>
<p>
	परी तो वत्स मी भारद्वाज गोत्री । तो पंच मी तीन प्रवरी । तो यजुर मी ऋग्वेदाधिकारी । तो धर्मशास्त्री मी मूढ ॥१७६॥</p>
<p>
	तो माध्यंदिन्मी शाकल । तो धर्मज्ञ मी बाष्कल । तो पंडित मी मूर्ख अकुशल । कां मज पोकळ ही पदवी ॥१७७॥</p>
<p>
	तो राजकारणधुरंधर मुत्सद्दी । मी अल्पमती मंदबुद्धी । त्याची ‘राज्यप्रशस्ती’ प्रसिद्धि । ओवी साधी मज न करवे ॥१७८॥</p>
<p>
	तो ग्रंथकारकलाभिज्ञ । मी तों ऐसा ठोंबा अज्ञ । तो धर्मशास्त्रविशारद सुज्ञ । मी अल्पप्रज्ञ हा ऐसा ॥१७९॥</p>
<p>
	तयाचा ‘लेखनकल्पतरू’ । नाना चित्रकाव्यांचा आकरु । मी हें ऐसें बाबांचें लेंकरूं । येईना करूं ओवीही ॥१८०॥</p>
<p>
	गोरा चोखा सांवतामाळी । निवृत्ति ज्ञानोबा नामादि सगळी । भागवतधर्मप्रवर्तक मंडळी । उदयासि आली ये काळीं ॥१८१॥</p>
<p>
	पंडित बोपदेव विद्वन्मणी । चमके जयाचे सभांगणीं । तेथेंचि हेमाडपंत राजकारणी । ख्याती गुणिगणीं जयाची ॥१८२॥</p>
<p>
	तेथूनि पुढें उत्तरेहूनी । उतरल्या या देशीं फौजा यावनी । जिकडे तिकडे मुसलमानी । अम्मल दक्षिणी मावळला ॥१८३॥</p>
<p>
	उगाच ना या पदवीचें दान । चतुराईचा हा सन्मान । वादावादीवरी हा वाग्बाण । अभिमानखंडण व्हावया ॥१८४॥</p>
<p>
	होऊनि अर्ध्या हळकुंडें पिवळें । उगीच योग्यतेवीण जो बरळे । तया माझिये उघडिले डोळे । घालूनि वेळेवर अंजन ॥१८५॥</p>
<p>
	असो ऐसें हें पूर्वोक्त लक्षण । साईमुखोदित विलक्षण । प्रसंगोचित सार्थ नामकरण । तें म्यां भूषण मानिलें ॥१८६॥</p>
<p>
	कीं यांतूनि मज लाधो शिक्षण । वादावादी हें कुलक्षण । स्पर्शो न मज एकही क्षण । परम अकल्याणकारी तें ॥१८७॥</p>
<p>
	गळूनि जावा वादाभिमान । एतदर्थ हें अभिधान । जेणें आमरण रहावें भान । नित्य निरभिमान असावें ॥१८८॥</p>
<p>
	राम दाशरथी देव अवतारी । पूर्ण ज्ञानी विश्वासी तारी । अखिल ऋषिगणमानसविहारी । चरण धरी वसिष्ठाचे ॥१८९॥</p>
<p>
	कृष्ण परब्रम्हाचें रूपडें । तयासही गुरु करणें पडे । सांदीपनीच्या गृहीं लांकडें । सोसूनि सांकडें वाहिलीं ॥१९०॥</p>
<p>
	तेथें माझी काय मात । वादावादी करावी किमर्थ । गुरुविण ज्ञान वा परमार्थ । नाहीं हा शास्त्रार्थ द्दढ केला ॥१९१॥</p>
<p>
	वादावादी नाहीं बरी । नको कुणाची बरोबरी । नसतां श्रद्धा आणि सबूरी । परमार्थ तिळभरी साधेना ॥१९२॥</p>
<p>
	हेंही पुढें आलें अनुभवा । ये रीतीं या नामगौरवा । प्रेमपुर:सर निजसद्भावा । शुद्ध स्वभावा आदरिलें ॥१९३॥</p>
<p>
	आतां असो हें कथानक । स्वपक्ष - परपक्षविच्छेदक । वादप्रवादनिवर्तक । सर्वांसही बोधक समसाम्य ॥१९४॥</p>
<p>
	असो ऐसें हें ग्रंथप्रयोजन । अधिकार - अनुबंधनदर्शन । ग्रंथकाराचें नामकरण । कथन श्रवण करविलें ॥१९५॥</p>
<p>
	पुरे आतां हा अध्यायविस्तार । हेमाड साईचरणीं सादर । पुढें यथानुक्रम कथा सविस्तर । श्रवणतत्पर व्हावें जी ॥१९६॥</p>
<p>
	साईचि आपुली सुखसंपत्ती । साईच आपुली सुखसंवित्ती । साईच आपुली परम निवृत्ती । अंतिम गति श्रीसाई ॥१९७॥</p>
<p>
	साईकृपेचिया कारणें । साईचरित्र श्रवण करणें । तेणेंचि दुस्तर भवभय तरणें । कलिमल हरणें निर्मूल ॥१९८॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । कथाप्रयोजननामकरणं नाम द्वितीयोऽध्याय: संपूर्ण: ॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<p>
	 </p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 22 Apr 2022 14:45:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 22 Apr 2022 15:08:14 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईसच्चरित - अध्याय १]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-satcharitra-chapter-1-122042200036_1.html</link>
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      <description><![CDATA[॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥ प्रथम कार्यारंभस्थिती । व्हावी निर्विन्घ परिसमाप्ती । इष्टदेवतानुग्रहप्राप्ती । शिष्ट करिती मंगलें ॥१॥
मंगलाचरणाचें ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Sai Satcharitra Marathi adhyay 1" class="imgCont" height="638" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2022-04/22/full/1650618857-7211.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Sai Satcharitra chapter 1" width="740" /></p>
	</p>
	॥ श्रीगणेशाय नम: ॥ श्रीसरस्वत्यै नम: ॥ श्रीगरुभ्यो नम: ॥ श्रीकुलदेवतायै नम: ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नम: ॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथाय नम: ॥ प्रथम कार्यारंभस्थिती । व्हावी निर्विन्घ परिसमाप्ती । इष्टदेवतानुग्रहप्राप्ती । शिष्ट करिती मंगलें ॥१॥</p>
<p>
	मंगलाचरणाचें कारण । सर्व विन्घांचें निवारण । इष्टार्थसिद्धि प्रयोजन । अभिवंदन सकलांचें ॥२॥</p>
<p>
	प्रथम वंदूं गणपती । वक्रतुंड हेरंब मूर्तीं । चतुर्दश विद्यांचा अधिपती । मंगलाक"उति गजमुख ॥३॥</p>
<p>
	पोटीं चतुर्दशा भुवनें मावती । म्हणोनि गा तुज लंबोदर म्हणती । परशु सतेज धरिसी हस्तीं । विन्घोच्छित्त्यर्थ भक्तांच्या ॥४॥</p>
<p>
	हे विन्घविघातोपशमना । गणनाथा गजानना । प्रसाद पूर्ण करीं मद्वचना । साष्टांग वंदना करितों मी ॥५॥</p>
<p>
	तूं भक्तांचा साह्यकारी । विन्घें रुळती तुझ्या तोडरीं । तूं सन्मुख पाहसी जरी । दरिद्र दूरी पळेल ॥६॥</p>
<p>
	तू भवार्णवाची पोत । अज्ञानतमा ज्ञानज्योत । तूं तुझ्या ऋद्धिसिद्धींसहित । पाहें उल्लसित मजकडे ॥७॥</p>
<p>
	जयजयाजी मूषकवहना । विन्घकानन-निकृंतना । गिरिजानंदना मंगलवदना । अभिवंदना करितों मी ॥८॥</p>
<p>
	लाधो अविन्घ परिसमाप्ती । म्हणोनि हेचि शिष्टाचारयुक्ती । इष्टदेवता-नमस्कृती । मंगलप्राप्त्यर्थ आदरिली ॥९॥</p>
<p>
	हा साईच गजानन गणपती । हा साईच घेऊनि परशू हातीं । करोनि विन्घविच्छित्ती । निज व्युत्पत्ति करू कां ॥१०॥</p>
<p>
	हाचि भालचंद्र गजानन । हाचि एकदंत गजकर्ण । हाचि विकट भग्नरदन । हा विन्घकानन - विच्छेदक ॥११॥</p>
<p>
	हे सर्वमंगल-मांगल्या । लंबोदरा गणराया । अभेदरूपा साई सदया । निजसुखनिलया नेईं गा ॥१२॥</p>
<p>
	आतां नमूं ब्रम्हाकुमारी । सरस्वती जे चातुर्यलहरी । या मम जिव्हेसी हंस करीं । होईं तिजवरी आरूढ ॥१३॥</p>
<p>
	ब्रम्हावीणा जिचे करीं । निढळीं आरक्त कुंकुमचिरी । हंसवाहिनी शुभ्रवस्त्री । कृपा करीं मजवरी ॥१४॥</p>
<p>
	ही वाग्देवता जगन्माता । नसतां इयेची प्रसन्नता । चढेल काय सारस्वत हाता । लिहवेल गाथा काय मज ॥१५॥</p>
<p>
	जगज्जननी ही वेदमाता । विद्याविभव गुणसरिता । साईसमर्थचरितामृता । पाजो समस्तां मजकरवीं ॥१६॥</p>
<p>
	साईच भगवती सरस्वती । ॐ कारवीणा घेऊनि हातीं । निजचरित्र स्वयेंचि गाती । उद्धारस्थिती भक्तांच्या ॥१७॥</p>
<p>
	उत्पत्तिस्थितिसंहारकर । रजसत्त्वतमगुणाकार । ब्रम्हा विष्णु आणि शंकर । नमस्कार तयांसी ॥१८॥</p>
<p>
	हे साईनाथ स्वप्रकाश । आम्हां तुम्हीच गणाधीश । सावित्रीश किंवा रमेश । अथवा उमेश तुम्हीच ॥१९॥</p>
<p>
	तुम्हीच आम्हांतें सद्नुरु । तुम्हीच भवनदीचें तारूं । आम्ही भक्त त्यांतील उतारू । पैल पारू दाविजे ॥२०॥</p>
<p>
	कांहींतरी असल्याशिवाय । पूर्वजन्मींचे सुकृतोपाय । केवीं जोडतील हे पाय । ऐसा ठाय आम्हांतें ॥२१॥</p>
<p>
	नमन माझें कुलदैवता । नारायणा आदिनाथा । जो क्षीरसागरीं निवासकर्ता । दु:खहर्ता सकळांचा ॥२२॥</p>
<p>
	परशुरामें समुद्र हटविला । तेणें जो नूतन भूभाग निर्मिला । प्रांत ‘कोंकण’ अभिधान जयाला । तेथ प्रगटला नारायण ॥२३॥</p>
<p>
	जेणें जीवांसी नियामकपणें । अंतर्यामित्वें नारायणें । कृपाकटाक्षें संरक्षणें । तयाच्या प्रेरणेआधीन मी ॥२४॥</p>
<p>
	तैसेंचि भार्गवें यज्ञसाङ्गतेसी । गौडदेशीय ज्या महामुनीसी । आणिलें त्या मूळपुरुषासी । अत्यादरेंसीं नमन हें ॥२५॥</p>
<p>
	आतां नमूं ऋषिराज । गोत्रस्वामी भारद्वाज । ऋग्वेदशाखा ‘शाकल’ पूर्वज । आद्यगौड द्विजजाती ॥२६॥</p>
<p>
	पुढती वंदूं धरामर ॥ ब्राम्हाण परब्रम्हावतार । मग याज्ञवल्क्यादि योगीश्वर । भृगु पराशर नारद ॥२७॥</p>
<p>
	वेदव्यास पाराशर । सनक सनंदन सनत्कुमार । शुक शौनक सूत्रकार । विश्वामित्र वसिष्ठा ॥२८॥</p>
<p>
	वाल्मीक वामदेव जैमिनी । वैशंपायन आदिकरूनी । नवयोगींद्रादिक मुनी । तयां चरणीं लोटांगण ॥२९॥</p>
<p>
	आतां वंदूं संतसज्जनां । निवृत्ति - ज्ञानेश्वर - मुक्ता - सोपाना । एकनाथा स्वामी जनार्दना । तुकया कान्हा नरहरि ॥३०॥</p>
<p>
	सकळांचा नामनिर्देश । करूं न पुरे ग्रंथावकाश । म्हणोनि प्रमाण करितों सर्वांस । आशीर्वचनास प्रार्थितों मी ॥३१॥</p>
<p>
	आतां वंदूं सदाशिव । पितामह जो पुण्यप्रभाव  । बदरीकेदारीं दिला ठाव । संसार वाव मानुनी ॥३२॥</p>
<p>
	पुढें वंदूं निजपिता । सदा सदाशिव आराधिता । कंठीं रुद्राक्ष धारण करिता । आराध्यदेवता शिव जया ॥३३॥</p>
<p>
	पुढती वंदूं  जन्मदाती । पोसिलें जिनें मजप्रती । स्वयें कष्टोनि अहोरातीं । उपकार किती आठवूं ॥३४॥</p>
<p>
	बाळपणीं गेली त्यागुनी । कष्टें सांभाळी पितृव्यपत्नी । ठेवितों भाळ तिचे चरणीं । हरिस्मरणीं निरत जी ॥३५॥</p>
<p>
	अवघ्यांहूनि ज्येष्ठ भ्राता । अनुपम जयाची सहोदरता । मदर्थ जीवप्राण वेंचिता । चरणीं माथा तयाचे ॥३६॥</p>
<p>
	आतां नमूं श्रोतेजन । प्रार्थितों आपुलें एकाग्र मन । आपण असतां अनवधान । समाधान मज कैंचें ॥३७॥</p>
<p>
	श्रोता जंव जंव गुणज्ञ चतुर । कथाश्रवणार्थीं अति आतुर । तंव तंव वक्ता उत्तरोत्तर । प्रसन्नांतर उल्हासे ॥३८॥</p>
<p>
	आपण जरी अनवधान । काय मग कथेचें प्रयोजन । म्हणोनि करितों साष्टांग वंदन । प्रसन्नमन परिसावें ॥३९॥</p>
<p>
	नाहीं मज व्युत्पत्तिज्ञान । नाहीं केलें ग्रंथपारायण । नाहीं घडलें सत्कथाश्रवण । हें पूर्ण आपण जाणतां ॥४०॥</p>
<p>
	मीही जाणें माझें अवगुण । जाणें माझें मी हीनपण । परी करावया गुरुवचन । ग्रंथप्रयत्न हा माझा ॥४१॥</p>
<p>
	माझेंचि मन मज सांगत । कीं मीं तुम्हांपुढें तृणवत । परी मज घ्यावें पदरांत । कृपावंत होऊनि ॥४२॥</p>
<p>
	आतां करूं सद्नुरुस्मरण । प्रेमें वंदूं तयाचे चरण । जाऊं कायावाचामनें शरण । बुद्धिस्फुरणदाता जो ॥४३॥</p>
<p>
	जेवणार बैसतां जेवावयास । अंतीं ठेवितो गोड घांस । तैसाचि गुरुवंदन - सुग्रास । घेऊनि नमनास संपवूं ॥४४॥</p>
<p>
	ॐ नमो सद्नुरुराया । चराचराच्या विसाविया । अधिष्ठान विश्वा अवघिया । अससी सदया तूं एक ॥४५॥</p>
<p>
	पृथ्वी सप्तद्वीप नवखंड । सप्तस्वर्ग पाताळ अखंड । यांतें प्रसवी जें हिरण्यगर्भांड । तेंचि ब्रम्हांड प्रसिद्ध ॥४६॥</p>
<p>
	प्रसवे जी ब्रम्हांडा यया । जी नामें ‘अव्यक्त’ वा ‘माया’ । तया मायेचियाही पैल ठाया । सद्नुरुराया निजवसती ॥४७॥</p>
<p>
	तयाचें वानावया महिमान । वेदशास्त्रीं धरिलें मौन । युक्तिजुक्तीचें प्रमाण । तेथें जाण चालेना ॥४८॥</p>
<p>
	ज्या ज्या दुज्या तुज उपमावें । तो तो आहेस तूंचि स्वभावें । जें जें कांहीं द्दष्टि पडावें । तें तें नटावें त्वां स्वयें ॥४९॥</p>
<p>
	ऐसिया श्रीसाईनाथा । करुणार्णवा सद्नुरु समर्था । स्वसंवेद्या सर्वातीता । अनाद्यनंता तुज नमो ॥५०॥</p>
<p>
	प्रणाम तूतें सर्वोत्तमा । नित्यानंदा पूर्णकामा । स्वप्रकाशा मंगलधामा । आत्मारामा गुरुवर्या ॥५१॥</p>
<p>
	करूं जातां तुझें स्तवन । वेदश्रुतीही धरिती मौन । तेथें माझें कोण ज्ञान । तुज आकलन कराया ॥५२॥</p>
<p>
	जय जय सद्नुरु करुणागारा । जय जय गोदातीरविहारा । जय जय ब्रम्होश रमावरा । दत्तावतारा तुज नमो ॥५३॥</p>
<p>
	ब्रम्हासी जें ब्रम्हापण । तें नाहीं सद्नुरुवीण । कुरवंडावे पंचप्राण । अनन्यशरण रिघावें ॥५४॥</p>
<p>
	करावें मस्तकें अभिवंदन । तैसेंचि हस्तांहीं चरणसंवाहन । नयनीं पाहत असावें वदन । घ्राणें अवघ्राणन तीर्थाचें ॥५५॥</p>
<p>
	श्रवणें साईगुणश्रवण । मनें साईमूर्तीचें ध्यान । चित्तें अखंड साईचिंतन । संसारबंधन तुटेल ॥५६॥</p>
<p>
	तन-मन-धन सर्व भावें । सद्नुरुपायीं समर्पावें । अखंड आयुष्य वेंचावें । गुरुसेवेलागुनी ॥५७॥</p>
<p>
	गुरुनाम आणि गुरुसहवास । गुरुकृपा आणि गुरुचरण पायस ॥ गुरुमंत्र आणि गुरुगृहवास । महत्प्रयास प्राप्ती ही ॥५८॥</p>
<p>
	प्रचंड शक्ति यया पोटीं । अनन्य भक्तीं घेतली कसवटी । भक्तांसी मोक्षद्वारवंटीं । नेतील लोटीत नकळतां ॥५९॥</p>
<p>
	गुरुसंसगति गंगाजळ । क्षाळिते मळ करिते निर्मळ । मनासम दुजें काय चंचळ । करिते निश्चळ हरिचरणीं ॥६०॥</p>
<p>
	आमुचें वेदशास्त्रपुराण । श्रीसद्नुरुचरणसेवन । आम्हां योगयागतपसाधन । लोटांगण गुरुपायीं ॥६१॥</p>
<p>
	श्रीसद्नुरुनाम पवित्र । हेंचि आमुचें वेदशास्त्र । ‘साईसमर्थ’ आमुचा मंत्र । यंत्रतंत्रही तें एक ॥६२॥</p>
<p>
	‘ब्रम्हा सत्य’ हे निजप्रतीती । ‘जगन्मिथ्या’ हे नित्य जागृती । ऐसी ही परमप्राप्तीची स्थिती । साई अर्पिती निजभक्तां ॥६३॥</p>
<p>
	परमात्मसुख परमात्मप्राप्ती । ब्रम्हानंद स्वरू पस्थिती । इत्यादि ही शब्दजाळाची गुंती । आनंदवृत्ति पाहिजे ॥६४॥</p>
<p>
	जयासी बाणली ही एक वृत्ती । सदा सर्वदा ही एक स्थिती । सुखशांति समाधान चित्तीं । परमप्राप्ति ती हीच ॥६५॥</p>
<p>
	साई आनंदवृत्तीची खाण । असलिया भक्त भाग्याचा जाण । परमानंदाची नाहीं वाण । सदैव परिपूर्ण सागरसा ॥६६॥</p>
<p>
	शिवशक्ति पुरुषप्रकृती । प्राणगती दीपदीप्ती । ही शुद्धब्रम्हाचैतन्यविकृती । एकीं कल्पिती द्वैतता ॥६७॥</p>
<p>
	‘एकाकी न रमते’ ही श्रुती । ‘बहु स्याम्‌’ ऐशिया प्रीती । आवडूं लागे दुजियाची संगती । पुनरपि मिळती एकत्वीं ॥६८॥</p>
<p>
	शुद्धब्रम्हारूप जे स्थिती । तेथें ना पुरुष ना प्रकृती । दिनमणीची जेथें वस्ती । दिवस वा राती कैंची ते ॥६९॥</p>
<p>
	गुणातीत मूळ निर्गुण । भक्तकल्याणालागीं सगुण । तो हा साई विमलगुण । अनन्य शरण तयासी ॥७०॥</p>
<p>
	शरण रिघाले साईसमर्था । त्यांहीं चुकविलें बहुतां अनर्थां । म्हणवूनि या मी निजस्वार्था । पायीं माथा ठेवितों ॥७१॥</p>
<p>
	तत्त्वद्दष्टया जो तुळे निराळा । भक्तिसुखार्थ राही जो वेगळा । करी देवभक्तांच्या लीला । तया प्रेमळा प्रणिपात ॥७२॥</p>
<p>
	जो सर्व जीवांची चित्कला । संवित्स्फुरणे जो अधिष्ठिला । जो जडचैतन्यें आकारला । तया प्रेमळा प्रणिपात ॥७३॥</p>
<p>
	तूं तंव माझी परमगती । तूंचि माझी विश्रांती । पुरविता मज आर्ताची आर्ती । सुखमूर्ति गुरुराया ॥७४॥</p>
<p>
	आतां या नमनाची अखेरी । भूतीं भगवंत प्रत्यंतरीं । जीवमात्रासी मी वंदन करीं । घ्या मज पदरीं आपुल्या ॥७५॥</p>
<p>
	नमन सकल भूतजाता । येणें सुखावो विश्वभर्ता । तो विश्वंभर अंतर्बाह्यता । एकात्मता अभेदें ॥७६॥</p>
<p>
	एवं परिपूर्ण झालें नमन । जें आरब्ध परिसमाप्तीचें साधन । हेंचि या ग्रंथाचें मंगलाचरण । आतां प्रयोजन निवेदीं ॥७७॥</p>
<p>
	साईंनीं मज कृपा करून । अनुग्रहिलें जैंपासून । तयांचेंचि मज अहर्निश चिंतन ॥ भवभयकृंतन तेणेनी ॥७८॥</p>
<p>
	नाहीं मज दुसरा जप । नाहीं मज दुसरें तप । अवलोकीं एक सगुणरूप । शुद्धस्वरूप साईंचें ॥७९॥</p>
<p>
	पाहतां श्रीसाईंचें मुख । हरून जातसे तहानभूक्त । काय तयापुढें इतर सुख । पडे भवदु:खविस्मृति ॥८०॥</p>
<p>
	पाहतां बाबांचे नयनांकडे । आपआपणां विसर पडे । आंतुनी येती जैं प्रेमाचे उभडे । वृत्ति बुडे रसरंगीं ॥८१॥</p>
<p>
	कर्मधर्म शास्त्रपुराण । योगयाग अनुष्ठान । तीर्थयात्रा तपाचरण । मज एक चरण साईंचे ॥८२॥</p>
<p>
	अखंड गुरुवाक्यानुवृत्ती । द्दढ धरितां चित्तवृत्ती । श्रद्धेचिया अढळ स्थिती । स्थैर्यप्राप्ति निश्चळ ॥८३॥</p>
<p>
	हेचि कर्मानुबंधस्थिती । वाढली साईपदासक्ती । प्रत्यया आली अतर्क्य शक्ती । काय म्यां किती वर्णावी ॥८४॥</p>
<p>
	जे शक्ति उपजवी भक्ती । समर्थ साईचरणासक्ती । संसारीं राहूनि संसारनिवृत्ती । आनंदवृत्ति जे देई ॥८५॥</p>
<p>
	नाना प्रकारीं नाना मतीं । भक्तीचे प्रकार बहुत कथिती । संक्षेपें तयांची लक्षणस्थिती । यथानिगुतीं कथीन ॥८६॥</p>
<p>
	‘स्वस्वरूपानुसंधान’ । हें एक भक्तीचें मुख्य लक्षण । म्हणती वेदशास्त्रव्युत्पन्न । ज्ञानसंपन्न आचार्य ॥८७॥</p>
<p>
	पूजादिकीं प्रेमव्यक्ती । अर्चन-भक्तीची हे रीती । ऐशी पाराशर व्यासोक्ती । भक्ति म्हणती ती एक ॥८८॥</p>
<p>
	गुरुप्रीत्यर्थ उपवन । पारिजातादि पुष्पावचय जाण । गोमय - सडा - संमार्जन । गुर्वंगण झाडावें ॥८९॥</p>
<p>
	प्रथम स्नान संध्या करणें । गुरुदेवार्थ गंध उगाळणें । पंचामृतस्नान घालणें । धूपदीपार्चनेंसी ॥९०॥</p>
<p>
	तदुपरी नैवेद्य समर्पणें । आरती धूपारती करणें । ऐसें जें सप्रेम घडणें । ‘अर्चन’ नांव या सकळां ॥९१॥</p>
<p>
	आपुले ह्रदयींची चित्कला । शुद्ध - बुद्ध - स्वभाव निर्मला । मूर्तींत आमंत्रूनि तिजला । अर्चनाला लागावें ॥९२॥</p>
<p>
	मग ते चित्कला मागुती । पूजनार्चन विसर्जनांतीं । निजह्रदयीं पूर्वस्थिती । अवस्थित करावी ॥९३॥</p>
<p>
	आतां अवांतर भक्तीचें लक्षण । गर्गाचार्यमतीं जाण । मन होय गुणकीर्तनीं तल्लीन । होय विलीन हरिरंगीं ॥९४॥</p>
<p>
	अखण्ड आत्मानुसंधान । कथाकीर्तन विहिताचरण । हे तों पुढील भक्ती जाण । शांडिल्यवचन हें ऐसें ॥९५॥</p>
<p>
	जयां मनीं साधावें स्वहित । ते तों आचरती वेदविहित । कर्म निषिद्ध आणि अविहित । टाळिती निजहितबाधक जें ॥९६॥</p>
<p>
	कोण्याही क्रियेचा वा फलाचा । कर्ता भोक्ता नाहीं मीं साचा । हा भाव उपजे जैं निरहंकृतीचा । ब्रम्हार्पणाचा तो योग ॥९७॥</p>
<p>
	ऐसिया रीतीं कर्म करितां । सहजीं नैष्कर्म्यता । कर्म कदापि न ये त्यांगितां । कर्मकर्तृता त्यागूं ये ॥९८॥</p>
<p>
	कांटयानें कांटा काढिल्याविण । कर्म थांबेना कर्मावांचून । हातीं लागतां निजात्मखूण । कर्ण संपूर्ण राहील ॥९९॥</p>
<p>
	फलाशेचा पूर्णविराम । काम्यत्यागाचें हेंचि वर्म । करणें नित्यनैमित्तिक कर्म । ‘शुद्ध स्वधर्म’ या नांव ॥१००॥</p>
<p>
	सर्व कर्म भगवंतीं अर्पण । क्षणैक विस्मरणें निर्विण्ण मन । ऐसें नारदीय भक्तीचें वर्णन । भिन्नलक्षण भक्ति हे ॥१०१॥</p>
<p>
	ऐशीं भक्तीचीं अनेक लक्षणें । एकाहूनि एक विलक्षणें । आपण केवळ गुरुकथानुस्मरणें । कोरडया चरणें भव तरूं ॥१०२॥</p>
<p>
	हा गुरुकथाश्रवणछंद । लागला मज झालों दंग । स्वयेंही करावे कथाप्रबंध । अनुभवसिद्ध वाटलें ॥१०३॥</p>
<p>
	पुढें एकदां शिरडीस असतां । दर्शनार्थ मशिदीं जातां । बाबांसी देखिलें गहूं दळतां । अतिविस्मयाता उदेली ॥१०४॥</p>
<p>
	आधीं कथितों ती कथा । श्रवण करावी स्वस्थचित्ता । त्यांतूनि उद्भव या साईचरिता । झाला केउता मग परिसा ॥१०५॥</p>
<p>
	‘उत्तमश्लोकगुणानुवाद’ । तयाचा प्रेमकथासंवाद । करितां होईल चित्त शुद्ध । बुद्धीही विशद होईल ॥१०६॥</p>
<p>
	पुण्यश्लोकगुणानुवर्णन । तत्कथा तल्लीला श्रवण । येणें भगवत्‌-परितोषण । क्लेशनिवारण त्रितापा ॥१०७॥</p>
<p>
	अधिभूतादितापनिर्विण्ण । आत्महितेच्छु आत्मप्रवण । आवडी तयांचे धरिती चरण । अनुभवसंपन्न मग होती ॥१०८॥</p>
<p>
	असो आतां दत्तचित्त । व्हा जी परिसा गोड वृत्तांत । वाटेल बाबांचें आश्चर्य बहुत । कृपावंतत्व पाहूनि ॥१०९॥</p>
<p>
	एके दिवशीं सकाळीं जाण । बाबा करोनि दंतधावन । सारोनि मुखप्रक्षाळण । मांडूं दळण आरंभिलें ॥११०॥</p>
<p>
	हातीं घेतलें एक सूप । गेले गव्हांचे पोत्यासमीप । भरभरूनि मापावर माप । गहूं सुपांत काढिले ॥१११॥</p>
<p>
	दुसरा रिकामा गोण पसरिला । वरी जात्याचा ठाव घातला । खुंटा ठोकूनि घट्ट केला । व्हावा न ढिला दळतांना ॥११२॥</p>
<p>
	म्ग अस्तन्या सारूनि वरी । कफनीचा घोळ आवरी । बैसका देऊनि जात्याचे शेजारीं । पसरूनि पाय बैसले ॥११३॥</p>
<p>
	महदाश्चर्य माझिये मना । दळणाची ही काय कल्पना । अपरिग्रहा अकिंचना । ही कां विवंचना असावी ॥११४॥</p>
<p>
	असो खुंटा धरोनि हातीं । मान घालोनियां खालीती । बाबा निजह्स्तें जातें ओढिती । वैरा रिचविती नि:शंक ॥११५॥</p>
<p>
	संत देखिले अनेक । परी दळणारा हाचि एक । गहूं पिसण्याचें तें काय सुख । त्याचें कौतुक तो जाणे ॥११६॥</p>
<p>
	लोक पाहती साश्चर्य चित्ता । धीर न पुसाया हें काय करितां । गांवांत पसरतां हे वार्ता । पात्तल्या तत्त्वतां नरनारी ॥११७॥</p>
<p>
	धांवतां धांवतां बाया थकल्या । चौघी लगबगां मशिदीं चढल्या । जाऊनि बाबांचे हातां झोंबल्या । खुंटा घेटला हिसकोनि ॥११८॥</p>
<p>
	बाबा त्यांसवें भांड्ती । त्या एकसरा दळूं लागती । दळतां बाबांच्या लीला वानिती । गीतें गाती बाबांचीं ॥११९॥</p>
<p>
	पाहूनि बायांचे प्रेमाला । उसना राग ठायांच निवाला । रागाचा तो अनुराग झाला । हूंसूं गालांत लागले ॥१२०॥</p>
<p>
	दळण झालें पायलीचें । सूप रिकामें झालें साचें । बायांचे मग तरंग मनाचे । लागले नाचूं अनिवार ॥१२१॥</p>
<p>
	बाबा न स्वयें भाकर करिती । त्यांची तों प्रत्यक्ष भैक्ष्यवृत्ती । ते या पिठाचें काय करिती । बाया तर्किती मनांत ॥१२२॥</p>
<p>
	नाहीं बाईल नाहीं लेंक । बाबा तों एकुलते एक । घरदार न संसार देख । कशास कणिक एवढी ॥१२३॥</p>
<p>
	एक म्हणे बाबा परमकृपाळ । आम्हांप्रीत्यर्थ तयांचा खेळ । आतां ही कणिक निखळ । देतील सकळ आम्हांतें ॥१२४॥</p>
<p>
	करितील आतां चार भाग । एकेकीचा विभाग । ऐसे मनांत मांडे देख । त्या सकळीक भाजिती ॥१२५॥</p>
<p>
	बाबांचे खेळ बाबांसी ठावे । कोणी न तयांचा अंत पावे । परी बायांचे मनाचे उठावे । लोभें लुटावें बाबांना ॥१२६॥</p>
<p>
	पीठ पसरलें गोधूम सरले । जातें भिंतीसी टेकूनी ठेविलें । सुपांत बायांनीं पीठ भरिलें । नेऊं आदरिलेम घरोघर ॥१२७॥</p>
<p>
	तेथपर्थंत बाबा कांहीं । चकार शब्द वदले नाहीं । भाग करितां चार चौघींही । वदती पाहीं मग कैसें ॥१२८॥</p>
<p>
	“चळल्या काय कुठें नेतां । बापाचा माल घेऊनि जातां । जा शिवेवरी नेऊनि आतां । पीठ तत्त्वतां टाका तें ॥१२९॥</p>
<p>
	आल्या रांडा फुकटखाऊ । लुटाया मज धांवधांवूं । गहूं माझे काय कर्जाऊ । पीठ नेऊं पाहतां” ॥१३०॥</p>
<p>
	बाया मनीं बहु चुरमुरल्या । लोभापायीं फजित पावल्या । आपआपसांत कुजबुजूं लागल्या । तात्काळ गेल्या शिवेवरी ॥१३१॥</p>
<p>
	आरंभ बाबांचा कोणाही नकळे । कारण प्रथमत: कांहींही नाकळे । धीर धरितां परिणामीं फळे । कौतुक आगळें बाबांचें ॥१३२॥</p>
<p>
	पुढें मग म्यां लोकां पुसिलें । हें कां बाबांनीं ऐसें केलें । रोगराईस संपूर्ण घालविलें । जन वदले ऐसेनी ॥१३३॥</p>
<p>
	गोधूम नाहीं ती माहामारी । भरडावया जात्यांत वैरी । तो मग भरडा शिवेवरी । उपराउपरी टाकवी ॥१३४॥</p>
<p>
	पीठ टाकिलें ओढियाकांठीं । तेथूनि रोगासी लागली ओहटी । दुर्दिन गेले उठाउठी । हे हातोटी बाबांची ॥१३५॥</p>
<p>
	गांवांत होती मरीची सांथ । करिती हा तोडगा साईनाथ ॥ झाली रोगाची वाताहत । गांवास शांतत्व लाधलें ॥१३६॥</p>
<p>
	पाहोनि दळणाचा देखावा । कौतुक वाटलें माझिया जीवा । कैसा कार्यकारणभाव जुळवावा । ताळा मिळवावा हा कैसा ॥१३७॥</p>
<p>
	काय असावा हा अनुबंध । गव्हां-रोगाचा काय संबंध । पाहूनि अतर्क्य कारण निर्बंध । वाटलें प्रबंध लिहावा ॥१३८॥</p>
<p>
	क्षीरसागरा याव्या लहरी । प्रेम उचंबळलें तैसें अंतरीं । वाटलें गावी ती पोटभरी । कथा माधुरी बाबांची ॥१३९॥</p>
<p>
	हेमाड साईनाथासी शरण । संपलें तें मंगलाचरण । संपलें आप्तेष्टसंतनमन । सद्नुरुवंदन अखंड ॥१४०॥</p>
<p>
	पुढील अध्यायीं ग्रंथ ‘प्रयोजन’ । ‘अधिकारी’ ‘अनुबंध’ दर्शन । यथामति करीन कथन । श्रोतां स्वस्थमन परिसिजे ॥१४१॥</p>
<p>
	तैसेंचि श्रोत्यावक्त्यांचें निजहित । ऐसें हें श्रीसाई - सच्चरित । रचिता हा कोण हेमाडपंत । होईलही विदित पुढारां ॥१४२॥</p>
<p>
	स्वस्ति श्रीसंतसज्जनप्रेरिते । भक्तहेमाडपंतविरचिते । श्रीसाईसमर्थसच्चरिते । ‘मंगलाचरणं’ नाम प्रथमोऽध्याय: संपूर्ण: ॥१॥</p>
<p>
	 </p>
<p>
	॥ श्रीसद्नुरुसाईनाथार्पणमस्तु ॥ शुभं भवतु ॥<br />
	<p>
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</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 22 Apr 2022 14:42:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 22 Apr 2022 14:48:03 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईबाबांनी दसर्‍याला का घेतली समाधी ?]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/facts-about-sai-baba-samadhi-118101600019_1.html</link>
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      <description><![CDATA[साईबाबांच्या दसर्‍याला समाधी घेण्यामागे काय रहस्य आहे? यापूर्वी त्यांनी रामविजय प्रकरण का ऐकले? या प्रकरणात कथा आहे की रामाने रावणाशी 10 दिवसापर्यंत युद्ध केले आणि दशमीला रावणाचा मृत्यू झाला. रावण दहनामुळे दशमीला दसरा म्हणतात. या दिवशी दुर्गा देवीने ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="sai baba samadhi" class="imgCont" height="331" src="//media.webdunia.com/_media/mr/img/article/2018-10/16/full/1539690178-8828.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="sai baba samadhi" width="600" /></p>
	</p>
	साईबाबांच्या दसर्‍याला समाधी घेण्यामागे काय रहस्य आहे? यापूर्वी त्यांनी रामविजय प्रकरण का ऐकले? या प्रकरणात कथा आहे की रामाने रावणाशी 10 दिवसापर्यंत युद्ध केले आणि दशमीला रावणाचा मृत्यू झाला. रावण दहनामुळे दशमीला दसरा म्हणतात. या दिवशी दुर्गा देवीने महिषासुराचा वध केला होता म्हणून याला विजयादशमी असे म्हणतात. चला जाणून घ्या की साईबाबांनी दसर्‍याला समाधी का घेतली.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शिरडी, महाराष्ट्राच्या अहमदनगर जिल्ह्यातील राहटा तहसिलाचा एक कस्बा आहे. येथे विश्‍व प्रसिद्ध संत साईबाबांनी समाधी घेतली. जगभरातून येथे भक्त साई बाबांचे दर्शन घेण्यासाठी येतात. साईबाबांनी 15 ऑक्टोबर दसर्‍याच्या दिवशी 1918 साली समाधी घेतली होती.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	समाधी सव्वा दोन मीटर लांब आणि एक मीटर रुंद आहे. समाधी मंदिराव्यतिरिक्त येथे द्वारकामाई मंदिर चावडी आणि ताजिमखान बाबा चौकावर सांईं भक्त अब्दुल्लाची झोपडी आहे. वयाच्या 16 व्या वर्षी साई शिरडीत आले आणि येथे स्थायी झाले.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दसर्‍याच्या काही दिवसांपूर्वीच बाबांनी आपल्या एका भक्त रामचंद्र पाटलांना विजयादशमीला &#39;तात्या&#39; चा मृत्यू होण्यासंबंधी सूचना दिली होती. तात्या बैजाबाईंचे पुत्र होते आणि बैजाबाई साईंची भक्त होती. तात्या, सांईबाबांना  &#39;मामा&#39; म्हणून हाक मारायचे, या प्रकारे साईबाबांनी तात्याला जीवनदान देण्याचा निर्णय घेतला.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	27 सप्टेंबर 1918 ला सांईबाबांच्या शरीराचा तापमान वाढू लागला. त्यांनी अन्न-जल सर्व त्यागले. बाबांच्या समाधिस्त होण्याच्या काही दिवसांपूर्वी तात्यांची तब्बेयत एवढी खालावली की जिवंत राहील असे लक्षण दिसत नव्हते. परंतू त्याच्याजागी साईबाबांनी 15 ऑक्टोबर, 1918 रोजी आपले नश्वर शरीराचे त्याग केले आणि ब्रह्मलीन झाले.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शेवटल्या दिवशी काय केले बाबांनी?</p>
<p>
	दोन-तीन दिवसापूर्वीच सकाळपासूनच बाबांनी भिक्षाटन करणे स्थगित केले आणि मशिदीत बसून राहत असे. ते आपल्या शेवटल्या क्षणांसाठी पूर्णपणे सचेत होते म्हणूनच आपल्या भक्तांना धैर्य देत राहिले.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जेव्हा बाबांना वाटले की आता जाण्याची वेळ आली आहे तेव्हा त्यांनी श्री वझे यांना &#39;रामविजय प्रकरण&#39; (श्री रामविजय कथासार) वाचण्याची आज्ञा केली. श्री वझे यांनी एक आठवडा दररोज पाठ ऐकवला. </p>
<p>
	 </p>
<p>
	नंतर बाबांनी त्यांना आठी प्रहर पाठ करण्याची आज्ञा दिली. श्री वझे यांनी त्या अध्यायाची द्घितीय आवृत्ती 3 दिवसात पूर्ण केली. या प्रकारे 11 दिवस निघून गेले. पुन्हा 3 दिवस पाठ केला गेला. आता श्री वझे पूर्णपणे थकल्यामुळे त्यांना विश्राम करण्याची आज्ञा झाली. आता बाबा अगदी शांत बसले आणि आत्मस्थित होऊन अंतिम क्षणाची प्रतीक्षा करू लागले.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	या दिवसांत काकासाहेब दीक्षित आणि श्रीमान बुटी बाबांसोबत मशीदीत वेळ घालवत असे. महानिर्वाणाच्या दिवशी आरती संपल्यावर त्यांनी सर्वांना परत जायला सांगितले. तरी लक्ष्मीबाई शिंदे, भागोजी शिंदे, बयाजी, लक्ष्मण बाला शिंपी आणि नानासाहेब निमोणकर तेथेच थांबले. शामा खाली मशीदीच्या पायर्‍यांवर बसली होती.</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लक्ष्मीबाई शिंदे यांना 9 शिक्के दिल्यावर बाबांनी म्हटले की आता मशीदीत माझे मन लागत नाही, मला बुटीच्या पत्थरवाड्यात घेऊन चला, तेथे मी सुखपूर्वक राहीन. हेच अंतिम शब्द त्यांच्या श्रीमुखातून निघाले. या दरम्यानच बाबा बयाजींच्या शरीराकडे लटकून गेले आणि अंतिम श्वास सोडली. भागोजी यांनी बघितले की बाबांचा श्वास थांबला आहे तेव्हा त्यांनी नानासाहेब निमोणकर यांना हाक मारत ही गोष्ट सांगितली. नानासाहेब यांनी पाणी आणून बाबांच्या श्रीमुखात टाकले पण पाणी बाहेर पडले. तेव्हा त्यांनी जोरात म्हटले... अरे। देवा! बाबा समाधिस्थ झाले.</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 16 Oct 2018 17:07:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 16 Oct 2018 17:13:14 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आरती साईबाबाची]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-baba-aarti-in-marathi-118012400018_1.html</link>
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      <description><![CDATA[आरती साईबाबा । सौख्यदातार जीवा।
चरणरजातली । द्यावा दासा विसावा, भक्ता विसावा ।। आ०।।ध्रु ०।।
जाळुनियां अनंग। स्वस्वरूपी राहेदंग ।
मुमुक्षूजनां दावी । निज डोळा श्रीरंग ।। आ०।। १ ।।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="" class="imgCont" height="354" src="http://media.webdunia.com/_media/hi/img/article/2016-07/13/full/1468409208-737.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="630" /></p>
	आरती साईबाबा । सौख्यदातार जीवा।</p>
<p>
	चरणरजातली । द्यावा दासा विसावा, भक्ता विसावा ।। आ०।।ध्रु ०।।</p>
<p>
	जाळुनियां अनंग। स्वस्वरूपी राहेदंग ।</p>
<p>
	मुमुक्षूजनां दावी । निज डोळा श्रीरंग ।। आ०।। १ ।।</p>
<p>
	जयामनी जैसा भाव । तया तैसा अनुभव ।</p>
<p>
	दाविसी दयाघना । ऐसी तुझीही माव ।। आ०।। २ ।।</p>
<p>
	तुमचे नाम ध्याता । हरे संस्कृती व्यथा ।</p>
<p>
	अगाध तव करणी । मार्ग दाविसी अनाथा ।। आ०।। ३ ।।</p>
<p>
	कलियुगी अवतार । सगुण परब्रह्मः साचार ।</p>
<p>
	अवतीर्ण झालासे । स्वामी दत्त दिगंबर ।। द०।। आ०।। ४ ।।</p>
<p>
	आठा दिवसा गुरुवारी । भक्त करिती वारी ।</p>
<p>
	प्रभुपद पहावया । भवभय निवारी ।। आ०।। ५ ।।</p>
<p>
	माझा निजद्रव्यठेवा । तव चरणरज सेवा ।</p>
<p>
	मागणे हेचि आता । तुम्हा देवाधिदेवा ।। आ०।। ६ ।।</p>
<p>
	इच्छित दिन चातक। निर्मल तोय निजसुख ।</p>
<p>
	पाजावे माधवा या । सांभाळ आपुली भाक ।। आ०।। ७ ।।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 25 Jan 2018 00:59:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 24 Jan 2018 17:02:01 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[मी गोसावी समस्त त्रैलोक्याचा]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-baba-113052500013_1.html</link>
      <guid>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-baba-113052500013_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2014-11/19/thumb/1_1/1416399147-2034.jpg"/>
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      <description><![CDATA[ज्यांची कीर्ती कस्तुरी अखिल भारत वर्षात दरवळत आहे, असे महान लोकोत्तर महापुरुष आणि परम आदरस्थान असलेले महान अवतार सद्गुरुश्री]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<!--Image-->
<p class="wdp_articleLImg">
	<p>
		<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
			<img align="center" alt="sai baba" class="imgCont" height="300" src="http://media.webdunia.com/_media/mr/img/article/2014-11/19/full/1416399147-2034.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="400" /></p>
		<span style="color: rgb(0, 0, 0); font-size: 11pt;">ज्यांची कीर्ती कस्तुरी अखिल भारत वर्षात दरवळत आहे, असे महान लोकोत्तर महापुरुष आणि परम आदरस्थान असलेले महान अवतार सद्गुरुश्री साईबाबांच्या पदस्पर्शाने पुनीत झालेली शिर्डी आज जागतिक पातळीवर साधनाभूमी आणि समाधीभूमी म्हणून परिचित आहे. अहमदनगर जिल्ह्यात अर्वाचीन काळात एक महान यग्याच्या आगमनाने आणि अकृत्रिम प्रेममुग्ध सहवासामुळे त्या स्थानास महत्त्व आलं. ते धाम म्हणजे शिर्डी. शिर्डीचे अतिप्राचीन नाव ‘शिलधी’ शके 1212 च्या दरम्यान यदुवंशी राजा रामदेवराय यादव याच्या कारकीर्दीत या भागात जुन्या वाड्याचे फक्त अवशेषच काय ते उरलेले होते. भग्नावस्थेत असलेल्या त्या गावाचा उपोगय केवळ मृतांना जाळण्या-पुरण्यासाठी करण्यात येऊ लागला. या शिलधीचेच पुढे शिर्डीत रुपांतर झाले. ‘शिलधी’ हा शब्द श्री बाबांनी आपल्या कठोर तपोबलाने पुढे प्रभावी बनविला आणि पवित्रतेचे धाम म्हणजेच ‘शिलधी’ अशा अर्थाने त्या नावाचे अक्षरश: शिर्डी क्षेत्रात रुपांतर करून टाकले. श्री साईबाबांचे वास्तव्य शिर्डीत कित्येक वर्षे होते. 1910 सालार्पत त्यांची नगर किंवा शिर्डीबाहेर फारशी प्रसिध्दी नव्हती. पण त्या आधी ते सुरुवातीला निंबवृक्षाखाली मौनधारण करून बसत. दिवसरात्र भोजन न करता त्यांनी बारा वर्षे कठोर तपश्र्चर्या करून सार्‍या भारतात श्रेष्ठ संत म्हणून कीर्ती संपादित केली. त्या काळात जे जे योगी, सिध्द, तपस्वी शिर्डी श्री बाबांच्या दर्शनार्थ आले त्या सर्वाची खात्री पटली होती की, श्री साईबाबा हे महान दत्तावतारी सत्पुरुष आहेत. ते योगीयांचे योगी, गुरुंचे गुरु आहेत. सर्वसाक्षी, सर्वज्ञ, आनंदमय, निरजंन आहेत. </span></p>
</p>
<br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">बीदर जिल्ह्यातील हुमनाबाद येथील महान साक्षात्कारी संत माणिकप्रभू यच्याशी साईबाबांचे संबंध आल्याचही समजते. एकदा अवतारी महापुरुष माणिकप्रभू यच्या भक्तदरबारात एक फकीर गेले होते. तेथे जाऊन त्यांनी लोटा पुढे करून भिक्षा मागितली आणि माणिकप्रभूंनी त्या लोट्यात दोन खारका आणि गुलाबफुले टाकली आणि ‘साई ये लेव’ असे म्हटले आणि हां हां म्हणता तो फकीर अदृश्य झाला. हा फकीर म्हणजे साक्षात साईबाबा होते. ‘साई’ या शब्दाचा हिंदीतील अर्थ साधू, संत, संत्पुरुष असा होतो. त्यामुळेच या महापुरुषाला ‘साई’ हे नाव पडले. महात्मे आपल्या केवळ अस्तित्वाने आध्यात्मिक शक्तीची लाट उसळून देतात. त्यांची ठायी अपार पुण्यराशी साठलेल्या असतात. त्यामुळे देहत्यागानंतरही जगदोध्दाराचे त्यांचे कार्य अखंडपणे चाललेले असते. त्यांच्या केवळ नामसंकीर्तनाने संसारबंधन तुटून जाते. जीवन कृतार्थतेचा तत्काळ अनुभव देण्याचे अलौकिक सामर्थ्य अशा पुण्पुरुषांच नामस्मरणामध्ये असते. जे साईभक्त झाले त्यांची नामस्मरणाने जन्म -मरणाची येरझारा चुकेल. सर्व पापे जळून भस्म होतील. </font><br />
<br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">श्री साईबाबांना सर्व रिध्दी, अष्टौ सिध्दी प्राप्त झाल्या होत्या. त्यामुळे त्यांचे योगसामर्थ्य अद्वितीय होते. ते अंर्तज्ञानी योगी होते. ते प्रसंगी पर कायाप्रवेश करीत असत. त्यांना पूर्वजन्मीचेही ज्ञान होते. ते अजानुबाहू होते. श्री साईबाबा शेगावच्या गजानन महाराजांना आपले गुरुबंधू मानीत असत. गजानन महाराज शेगावी जेव्हा समाधीस्थ झाले, तेव्हा तेथे शिर्डीत श्री बाबा ‘माझा गज निघून गेला’ म्हणून शोक करू लागले. भक्तांना बाबा असे का करतात, हे समजेना. अखेर बाबांच्या अनावर शोकाचे कारण समजले. </font><br />
<br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">बाबांना अंतज्ञानान ही गोष्ट समजली होती. श्रध्दा, सेवा आणि सबुरी हा साईबाबांचा सुवर्ण संदेश आहे. तो त्यांनी जगाला दिला. त्याशिवाय श्री बाबांनी अखेर भक्तांना शिकवण दिली. ‘एकटे कधी खाऊ नका आणि अन्नदान करा. द्रव्यापाशी देव नाही व द्रव्य लोभला मोक्ष नाही’ असे ते भक्तांना आवर्जून सांगत. त्यानुसार साईभक्त श्री साईबाबा उत्सवानिमित्त ठिकठिकाणी मोठमोठे भंडारे आयोजित करून अन्नदान करत आहेत. बाबांच्या जयंतीनिमित्त कोटी कोटी प्रणाम.</font>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 19 Apr 2017 21:21:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 19 Apr 2017 21:23:02 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[समानतेची शिकवण देणार साईबाबा!]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/sai-baba-109113000030_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/mr/img/article/2016-03/03/thumb/1_1/1456973581-3423.jpg"/>
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      <description><![CDATA['सबका मालिक एक' अशी जगाला समानतेची शिकवण देणारे सगळ्यांचे परिचीत साईबाबांनी महाराष्ट्रातील अहमदनगर जिल्ह्यातील शिर्डी या छोट्याशा गावाला जागतिक किर्ती मिळवून दिली आहे. ईश्वर हा सर्वव्यापी असून तो चराचरात सामावला आहे, असे साईबाबा सांगून गेले आहेत.]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<!--Image-->
<p class="wdp_articleLImg">
	<p style="float: left;">
		<img align="left" alt="saibaba" class="imgCont" height="185" src="http://media.webdunia.com/_media/mr/img/article/2016-03/03/full/1456973581-3423.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 10px; padding: 1px; float: left; z-index: 0;" title="" width="200" /></p>
	&#39;<font style="font-size: 11pt; color: rgb(255, 0, 255);"><b>सबका मालिक एक&#39; अशी जगाला समानतेची शिकवण देणारे सगळ्यांचे परिचीत साईबाबांनी महाराष्ट्रातील अहमदनगर जिल्ह्यातील शिर्डी या छोट्याशा गावाला जागतिक किर्ती मिळवून दिली आहे. ईश्वर हा सर्वव्यापी असून तो चराचरात सामावला आहे, असे साईबाबा सांगून गेले आहेत.</b></font></p>
<br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">साईबाबांचे हे मंदिर गावाच्या मध्यभागी वसले आहे. याशिवाय साईबाबाच्या वास्तव्याने पावन झालेल्या खंडोबा मंदिर, द्वारकामाई, चावडी अशा ठिकाणांना रोज हजारो भक्त भेट देतात. समाधीमंदिर हे मुख्य ठिकाण. याठिकाणी पुर्वी वाडा होता. साईबाबांचे वास्तव्य अखेरच्या काही दिवसात इथे होते. इथे साईबाबांची समाधी आहे. या मंदिरात शांत निवांतपणे बसलेल्या स्थितीतली पांढर्‍या शुभ्र संगमरवराची साईबाबांची मूर्ती आहे. समाधी मंदिराचे नित्य उपक्रम सकाळी पाच वाजता सुरू होतात. पहाटेच्या प्रसन्न वातावरणात घुमणारे भुपाळी स्वरांनी भक्त मंदिराकडे साईबाबांच्या ओढीने खेचला जातो. शिर्डी आणि साईबाबा हे आता समानार्थी शब्द झाले आहेत. </font><br />
<br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">याशिवाय भक्त दर्शन घेतात ते खंडोबा मंदिराचे. हे तेच मंदिर आहे ज्याठिकाणी साईबाबांनी शिर्डीत सर्वप्रथम दर्शन दिले होते. असे सांगतात की या मंदिराचे विश्वस्य आसलेल्या म्हाळसापती सोनारांनी कफनी घातलेल्या दाढी वाढलेल्या साईबाबांना पाहताक्षणी &#39;या! साई&#39; अशी हाक मारली आणि तेव्हापासून ते साईबाबा याच नावाने भक्तांना परिचित झाले. इथे एक मोठे वडाचे झाड आहे. आता इथे एक छोटे मंदिर उभारण्यात आले आहे. त्यात साईबाबांच्या पादुका ठेवल्या आहेत.</font><br />
<br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">त्यानंतर गुरुस्थानाचे दर्शन भक्त मोठ्या श्रध्देने घेतात. साईबाबांच्या सांगण्याप्रमाणे याठिकाणी कडुलिंबाच्या झाडाखाली त्यांच्या गुरुची समाधी आहे. इथे अजूनही ते कडुनिंबाचे झाड बहरले आहे. इथे एक शिवलिंग आहे आणि साईबाबांची मूर्ती आहे. या मूर्तीसमोर दर मंगळवारी, गुरुवारी आणि शुक्रवारी धुनी पेटवण्यात येते. गुरुस्थान हे आत्मीक शांती देणारे ठिकाण आहे.</font><br />
<br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">द्वारकामाई! हे आणखी एक महत्त्वाचे ठिकाण. साईबाबा जिथे राहायचे त्या ठिकाणाला ते द्वारकामाई म्हणून संबोधायचे. असं सांगतात की, साईबाबा लग्नाच्या वर्‍हाडासोबत शिर्डीला आले आणि उतरले ते याच ठिकाणी आणि अखेरपर्यंत ते इथेच राहिले. इथल्या धुनीची उदी भक्तांना द्यायचे. द्वारकामाईला लागून एक संग्रहालय साई संस्थानाने विकसित केले आहे. याठिकाणी साईबाबांच्या रोजच्या वापरातले पाण्याचे भांडे, कांबळे, जाते इ.वस्तू ठेवल्या आहेत. शिवाय ज्या दगडावर बसून साईबाबा भक्तांचे दु:ख निवारत ती मोठी शिला ही इथे ठेवली आहे. साईबाबांचे एक मोठे पोट्रेट याठिकाणी आहे.</font><br />
<br />
<font style="font-size:11pt; color:#000000">ज्या ठिकाणी साईबाबा झोपायचे त्याठिकाणाला ते चावडी म्हणायचे. ही चावडी द्वारकामाईला लागूनच आहे. इथेही साईबाबांचे एक मोठे पोट्रेट लावले आहे. समाधी मंदिर आणि इतर संबंधित ठिकाणांचे दर्शन एक आत्मशांतीचा अनुभवन देणारे आहे. </font>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 23 Mar 2017 09:11:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 22 Mar 2017 23:30:26 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>वेबदुनिया</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[साईबाबांच्या 7 अद्भुत मुरत्या]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/साईबाबांच्या-7-अद्भुत-मुरत्या-116030300011_1.html</link>
      <guid>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/साईबाबांच्या-7-अद्भुत-मुरत्या-116030300011_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/ta/img/article/2016-02/01/thumb/1_1/1454301598-82.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/ta/img/article/2016-02/01/thumb/1_1/1454301598-82.jpg</image>
      <description><![CDATA[साई बाबा यांचे पहिले मंदिर त्यांचे भक्त केशव रामचंद्र प्रधान यांनी निर्मित केले होते. त्यांचे दुसरे मंदिर शिरडीत आहे जिथे त्यांनी समाधी घेतली होती. बाबांचे तिसरे मंदिर महाराष्ट्रच्या परभणी जिल्ह्यात पाथरी गावात आहे जिथे बाबांचा जन्म झाला होता. आज ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<span style="font-size: 16px;">साई बाबा यांचे पहिले मंदिर त्यांचे भक्त केशव रामचंद्र प्रधान यांनी निर्मित केले होते. त्यांचे दुसरे मंदिर शिरडीत आहे जिथे त्यांनी समाधी घेतली होती. बाबांचे तिसरे मंदिर महाराष्ट्रच्या परभणी जिल्ह्यात पाथरी गावात आहे जिथे बाबांचा जन्म झाला होता. आज देशभरात बाबांचे अनेक मंदिर आहेत ज्यातून काही मंदिरात बाबांच्या मुरत्या पाहून मन भरून येतं.</span><br />
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="saibaba" class="imgCont" height="200" src="http://media.webdunia.com/_media/mr/img/article/2014-08/26/full/1409029917-745.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="600" /></p>
</p>
<p style="text-align: right;">
	<br />
	<br />
	<span style="font-size:16px;">पुढील पानावर साईबाबांची मूर्ती नंबर 1</span></p><p>
	<strong><span style="font-size:16px;">साईबाबा मूर्ती नंबर 1</span></strong></p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">साई मंदिर, शिरडी जिल्हा अहमदनगर (महाराष्ट्र)</span></strong></p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">उंची 5.5 फुट</span></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	<span style="font-size:16px;">‍साईबाबांने जिथे समाधी घेतली तिथे त्यांची मोठी मूर्ती निर्माण करण्यात आली. साई भक्तांसाठी शिरडी हे तीर्थ स्थळ आहे जिथे विश्वभरातून लोकं समाधीवर डोकं टेकून दर्शन घेतात. साईंच्या समाधी स्थळावर या मूर्तीचे अनावरण बाबांच्या 36 व्या पुण्यतिथी अर्थात 7 ऑक्टोबर 1954 मध्ये केले होते.</span></p>
<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="" class="imgCont" height="376" src="http://media.webdunia.com/_media/ta/img/article/2016-02/01/full/1454301598-82.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="600" /></p>
</p>
<p>
	<span style="font-size:16px;">शिरडीत नेहमीच भक्तांची गर्दी असते. दररोज तिथे सुमारे 30 हजार भक्त बाबांचे दर्शन घेतात, तसेच गुरुवारी आणि रविवारी ही संख्या दुप्पट होते.</span></p>
<p style="text-align: right;">
	<br />
	<br />
	<span style="font-size:16px;">पुढील पानावर साईबाबांची मूर्ती नंबर 2 </span></p><p>
	<strong><span style="font-size:16px;">साई बाबा मूर्ती नंबर 2</span></strong></p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">श्रीसाई महाराज देवालयम, मछलीपट्टणम, जिल्हा कृष्णानगरम (आंध्रप्रदेश)</span></strong></p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">उंची 54 फुट आणि रुंदी 36 फुट</span></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	<span style="font-size:16px;">श्रीसाईबाबांची ही विशाल मूर्ती आंध्रप्रदेशातील मछलीपट्टणमच्या मधोमध स्थित जिल्हा कोर्टाच्या समोर आहे. याचे अनावरण 2011 मध्ये झाले होते.</span><br />
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="sai baba" class="imgCont" height="467" src="http://media.webdunia.com/_media/mr/img/article/2016-03/03/full/1456987286-0638.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="375" /></p>
</p>
<p>
	<span style="font-size:16px;">विजयवाडाहून 60 किलोमीटर दूर मछलीपट्टणमचा मागिनापुडी समुद्र किनारा खूप शांत आणि स्वच्छ आहे. येथील पोहचण्याचा रस्ता रम्य असून गावातील सुंदर झोपड्या, डाळ आणि तांदुळाचे शेत, उंच नारळाचे झाडे,  रस्त्याच्या बाजूने वाहणारे कालवे यात मन रमून जातं.</span></p>
<p style="text-align: right;">
	<br />
	<br />
	<span style="font-size:16px;">पुढील पानावर साईबाबांची मूर्ती नंबर 3</span></p><p>
	<strong><span style="font-size:16px;">साईबाबा मूर्ती नंबर 3</span></strong></p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">रेपुर गांव, काकीनाडा जवळ, ईस्ट गोदावरी जिल्हा (आंध्रप्रदेश)</span></strong></p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">उंची 116 फुट</span></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	<span style="font-size:16px;">आंध्रप्रदेशातील पूर्वी गोदावरी जिल्ह्यात काकीनाडाजवळ रेपुर येथे साईबाबांची सर्वात मोठी मूर्ती आहे. याचे अनावरण 2012 मध्ये झाले होते.</span><br />
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="sai baba" class="imgCont" height="680" src="http://media.webdunia.com/_media/mr/img/article/2016-03/03/full/1456987440-6204.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="540" /></p>
</p>
<p>
	<span style="font-size:16px;">बसलेल्या  मुद्रेत असलेल्या या मूर्तीच्या दर्शनासाठी भक्त लांबलांबून येथे येतात. येथे बाबांच्या पादुकाही ठेवण्यात आल्या आहे.</span><br />
	 </p>
<p style="text-align: right;">
	<br />
	<span style="font-size:16px;">पुढील पानावर साईबाबांची मूर्ती नंबर 4</span></p><p>
	<strong><span style="font-size:16px;">साईबाबा मूर्ती नंबर 4</span></strong></p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">साईबाबा मूर्ती, सूरत (गुजरात)</span></strong></p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">उंची 14 फुट </span></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	<span style="font-size:16px;">गुजराताच्या सूरत शहरात मक्काई पूल चौरस्त्यावर स्थित साईबाबांची ही मूर्ती अद्भुत मुद्रेत आहे.</span><br />
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="sai baba" class="imgCont" height="294" src="http://media.webdunia.com/_media/mr/img/article/2016-03/03/full/1456987539-7214.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="394" /></p>
</p>
<p style="text-align: right;">
	<br />
	<br />
	<span style="font-size:16px;">पुढील पानावर साईबाबांची मूर्ती नंबर 5</span></p><p>
	<strong><span style="font-size:16px;">साईबाबा मूर्ती नंबर 5</span></strong></p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">सच्चिदानंद सद्गुरु साईनाथ महाराज मंदिर, भिवपुरी, तहसील करजत जिल्हा रायगड (महाराष्ट्र)</span></strong></p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">उंची सामान्य</span></strong><br />
	 </p>
<p>
	<span style="font-size:16px;">साईबाबांचे एक भक्त केशव रामचंद्र प्रधान यांनी भिवपुरीत 1916 साली हे मंदिर निर्माण केले होते. हे मंदिर मुंबई ते पुणे मार्गावरील आहे. </span><br />
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="sai baba" class="imgCont" height="380" src="http://media.webdunia.com/_media/mr/img/article/2016-03/03/full/1456987643-4932.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="287" /></p>
</p>
<p style="text-align: right;">
	<br />
	<br />
	<span style="font-size:16px;">पुढील पानावर साईबाबांची मूर्ती नंबर 6</span></p><p>
	<strong><span style="font-size:16px;">साईबाबा मूर्ती नंबर 6</span></strong></p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">साईनाथ जन्मस्थान मंदिर, पाथरी जिल्हा परभणी (महाराष्ट्र)</span></strong></p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">उंची सामान्य</span></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	<span style="font-size:16px;">महाराष्ट्रच्या पाथरी गावात साईबाबांचा जन्म 27 सप्टेंबर 1830 रोजी झाला होता. मंदिरात साईंची आकर्षक मूर्ती असून हे बाबांचे निवास स्थळ आहे जिथे जुन्या वस्तू जसे भांडी, घट्टी ठेवलेली आहेत.</span><br />
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="sai baba" class="imgCont" height="318" src="http://media.webdunia.com/_media/mr/img/article/2016-03/03/full/1456987750-0473.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="544" /></p>
	<br />
	 </p>
<p style="text-align: right;">
	<br />
	<span style="font-size:16px;">पुढील पानावर साईबाबांची मूर्ती नंबर 7</span></p><p>
	<strong><span style="font-size:16px;">साईबाबा मूर्ती नंबर 7</span></strong></p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">जिल्हा हरदा (मध्यप्रदेश)</span></strong></p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">उंची सामान्य </span></strong></p>
<p>
	<br />
	<span style="font-size:16px;">मध्यप्रदेशातील हरदा येथे एका साई भक्त कुटुंबाकडे शंभर वर्षांपूर्वी शिरडीच्या साई बाबांने स्वत:च्या हाताने दिलेल्या त्यांच्या चरण पादुका आहे. बाबांचे भक्त रामकृष्ण परुलकर ऊर्फ छुट्ट भैया यांना स्वत: साईंने या पादुका 1915 साली दिल्या होत्या. आता रामकृष्ण नसले तरी त्यांचे कुटुंब प्रमुख किशोर रंगनाथ परुलकर आणि राधा किशोर पुरुलकर या पादुकांची पूजा करतात. </span><br />
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="sai baba" class="imgCont" height="180" src="http://media.webdunia.com/_media/mr/img/article/2016-03/03/full/1456987875-821.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="219" /></p>
	<br />
	<span style="font-size:16px;">या कुटुंबाच्या पूर्वजांचे फोटो आजही शिरडीत येथे लागले आहे. येथे साई बाबांची लहानसी मूर्ती आहे जिथे शिरडी मंदिराप्रमाणेच दररोज साई पूजा आणि आरती होते. </span></p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong><span style="font-size:16px;">सौजन्य: सर्व चित्र यूट्यूब व फेसबुक हून साभार</span></strong></p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 19 May 2016 00:04:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 18 May 2016 17:43:33 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>Webdunia Desk</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आरती साईनाथांची]]></title>
      <link>https://marathi.webdunia.com/article/saibaba-marathi/आरती-साईनाथांची-109081900057_1.htm</link>
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      <description><![CDATA[जय दे जय देव जय साईनाथा।। श्री सद्गुरुनाथा।।
विश्वंभरा विश्वेशा । तारक तू जगता ।।धृ।।
ब्रह्मांडाचा नायक देवा तू कळले।
प्रत्यय निजभक्तांचे अद्भुत दावियेले।।
ब्रह्मा विष्णू शंकर गणपती तू त्राता।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<font  style='font-size:12pt; color:#000000'></font><br/><!--Image--><p class="wdp_articleLImg"><p><img src='/mr/articles/0908/19/images/img1090819057_1_1.jpg' alt='saibaba'  HSPACE=4 VSPACE=4 border="0" class="wdp_img" /></p><p class="wdp_imgSrc"><p class="wdp_left"></p>WD</p></p><!--endImage--> <font  style='font-size:11pt; color:#000000'>जय दे जय देव जय साईनाथा।। श्री सद्गुरुनाथा।।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>विश्वंभरा विश्वेशा । तारक तू जगता ।।धृ।।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>ब्रह्मांडाचा नायक देवा तू कळले।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>प्रत्यय निजभक्तांचे अद्भुत दावियेले।।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>ब्रह्मा विष्णू शंकर गणपती तू त्राता।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>भजतां तव पदकमला ‍हरिसी भवचिंता।।1।।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>हरूनि दारिद्र्याते रंका रक्षियले।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>रोगग्रस्तां तुझिया उदिनें तारियले।।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>वांझेसी तोषविलें देऊनिया पुत्रा।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>जो जो वांछिल त्यांचा तू अससी दाता ।।2।। </font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>ज्ञानरवी तू दिधले ज्ञान अज्ञाना। </font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>सन्मार्गा लावुनिया उद्धरिले त्यांना।।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>ऐशी तू सकलांची ममताळू माता।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>रोमांचित तनु होई गुण महिमा गातां।।3।।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>यमपाशा तोडुनी तू भक्त सोडविले।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>आयुर्बल देऊनि त्या सकला तोषविले।।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>ऐसे सामर्थ्याचे प्रताप तव गातां।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>शिणली मति मग आलों शरण तुला नाथा।।4।। </font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>मद्वचनी विश्वासुनि जे सेवा करिती।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>त्यांची चिंता लागे रात्रं‍दिन मजसी।।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>ऐसे दृढ आश्वासन दिधलेसी जगता।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>करुणेचा सागर तू अससी गुरुनाथा।।5।।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>समतेची योगाची मूर्ती श्री साई।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>रिद्धिसिद्धी घेती लोळण तव पायीं।।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>अंतर साक्षी तुजला सर्वांची वार्ता।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>अगम्य तुजला कांहीं ऐसा तू ज्ञाता ।।6।।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>लाभे फळ करितां तव नवस समाधीला।</font><br/><font  style='font-size:11pt; color:#000000'>दाखविसी अद्यापी निज साद लीला।। </font>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 19 Aug 2009 16:10:21 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 14 Feb 2014 23:16:58 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Saibaba]]></category>
      <authorname>वेबदुनिया</authorname>
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