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Ravanakrutam Shivatandava Stotram रावणकृतं शिवताण्डव स्तोत्रम

Updated: रविवार, 5 ऑक्टोबर 2025 (20:45 IST)
 
अगर्व सर्वमङ्गला कलाकदंबमञ्जरी रसप्रवाह माधुरी विजॄम्भणामधुव्रतम । स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥ 
 
जयत्वदभ्रबिभ्रम भ्रमद्भुजङ्गमस्फुरद धगद्धगाद्विनिर्गमत्कराल भालहव्यवाट । धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्ग तुङ्गमङ्गल ध्वनि क्रम प्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥ 
 
दृषद्विचित्र तल्पयोर्भुजङ्ग मौक्तिकस्रजो- र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्ष पक्षयोः । तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामही महेन्द्रयोः समप्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥ १२॥ 
 
कदा निलिंप निर्झरी निकुञ्जकोटरे वसन- विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन । विमुक्तलोललोचना ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुखरन कदा सुखी भवाम्यहम ॥१३॥ 
 
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम । हरे गुरौ स भक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां तु शङ्करस्य चिन्तनम ॥ १४॥ 
 
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शंभुपूजनमिदं पठति प्रदोषे। तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शंभुः ॥ १५॥ 
 
इति श्रीरावणविरचितं शिवताण्डवस्तोत्रं संपूर्णम ॥
 

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