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श्री नर्मदा चालीसा

Updated: मंगळवार, 4 फेब्रुवारी 2025 (12:24 IST)
पांव पैंजनी नित ही राजैं ।
 
कल-कल ध्वनि करती हो माता,
पाप ताप हरती हो माता ।
 
पूरब से पश्चिम की ओरा,
बहतीं माता नाचत मोरा ॥12
 
शौनक ऋषि तुम्हरौ गुण गावैं,
सूत आदि तुम्हरौं यश गावैं ।
 
शिव गणेश भी तेरे गुण गवैं,
सकल देव गण तुमको ध्यावैं ।
 
कोटि तीर्थ नर्मदा किनारे,
ये सब कहलाते दु:ख हारे ।
 
मनोकमना पूरण करती,
सर्व दु:ख माँ नित ही हरतीं ॥16
 
कनखल में गंगा की महिमा,
कुरुक्षेत्र में सरस्वती महिमा ।
 
पर नर्मदा ग्राम जंगल में,
नित रहती माता मंगल में ।
 
एक बार कर के स्नाना,
तरत पिढ़ी है नर नारा ।
 
मेकल कन्या तुम ही रेवा,
तुम्हरी भजन करें नित देवा ॥20
 
जटा शंकरी नाम तुम्हारा,
तुमने कोटि जनों को है तारा ।
 
समोद्भवा नर्मदा तुम हो,
पाप मोचनी रेवा तुम हो ।
 
तुम्हरी महिमा कहि नहीं जाई,
करत न बनती मातु बड़ाई ।
 
जल प्रताप तुममें अति माता,
जो रमणीय तथा सुख दाता ॥24
 
चाल सर्पिणी सम है तुम्हारी,
महिमा अति अपार है तुम्हारी ।
 
तुम में पड़ी अस्थि भी भारी,
छुवत पाषाण होत वर वारि ।
 
यमुना मे जो मनुज नहाता,
सात दिनों में वह फल पाता ।
 
सरस्वती तीन दीनों में देती,
गंगा तुरत बाद हीं देती ॥28
 
पर रेवा का दर्शन करके
मानव फल पाता मन भर के ।
 
तुम्हरी महिमा है अति भारी,
जिसको गाते हैं नर-नारी ।
 
जो नर तुम में नित्य नहाता,
रुद्र लोक मे पूजा जाता ।
 
जड़ी बूटियां तट पर राजें,
मोहक दृश्य सदा हीं साजें ॥32
 
वायु सुगंधित चलती तीरा,
जो हरती नर तन की पीरा ।
 
घाट-घाट की महिमा भारी,
कवि भी गा नहिं सकते सारी ।
 
नहिं जानूँ मैं तुम्हरी पूजा,
और सहारा नहीं मम दूजा ।
 
हो प्रसन्न ऊपर मम माता,
तुम ही मातु मोक्ष की दाता ॥35
 
जो मानव यह नित है पढ़ता,
उसका मान सदा ही बढ़ता ।
 
जो शत बार इसे है गाता,
वह विद्या धन दौलत पाता ।
 
अगणित बार पढ़ै जो कोई,
पूरण मनोकामना होई ।
 
सबके उर में बसत नर्मदा,
यहां वहां सर्वत्र नर्मदा ॥40
 
॥ दोहा ॥
भक्ति भाव उर आनि के,
जो करता है जाप ।
 
माता जी की कृपा से,
दूर होत संताप॥
॥ इति श्री नर्मदा चालीसा ॥
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