ganesh chaturthi
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श्री विन्ध्येश्वरी चालीसा

Updated: गुरूवार, 26 मे 2022 (14:37 IST)
 
तुम जाह्नवी और उन्नानी ।
 
हेमावति अम्बे निर्बानी ॥
 
अष्टभुजी वाराहिनि देवी ।
 
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव सेवी ॥
 
चौंसट्ठी देवी कल्यानी ।
 
गौरि मंगला सब गुन खानी ॥
 
पाटन मुम्बा दन्त कुमारी ।
 
भद्रकालि सुन विनय हमारी ॥
 
बज्रधारिणी शोक-नाशिनी ।
 
आयु रक्षिणी विन्ध्यवासिनी ॥
 
जया और विजया बैताली ।
 
मातु संकटी अरु बिकराली ॥
 
नाम अनन्त तुम्हार भवानी ।
 
बरनौं किमि मैं जन अज्ञानी ॥
 
जा पर कृपा मातु तव होई ।
 
तो वह करै चहै मन जोई ॥
 
कृपा करहु मो पर महरानी ।
 
सिद्ध करिअ अम्बे मम बानी ॥
 
जो नर धरे मातु कर ध्याना ।
 
ताकर सदा होय कल्याना ॥
 
विपति ताहि सपनेहु नहिं आवै ।
 
जो देवी को जाप करावै ॥
 
जो नर पर ऋण होय अपारा ।
 
सो नर पाठ करै सतबारा ॥
 
निश्वय ऋणमोचन होइ जाई ।
 
जो नर पाठ करै मन लाई ॥
 
अस्तुति जो नर पढ़े-पढ़ावै ।
 
या जग में सो बहु सुख पावै ॥
 
जाको व्याधि सतावै भाई ।
 
जाप करत सब दूरि पराई ॥
 
जो नर बन्दी-गृह महँ होई ।
 
बार हजार पाठ कर सोई ॥
 
निश्चय बन्धन ते छुटि जाई ।
 
सत्य वचन मम मानहु भाई ॥
 
जा पर जो कछु संकट होई ।
 
सादर देविहिं सुमिरै सोई ॥
 
पुत्र प्राप्ति इच्छा कर जोई ।
 
विधिवत देविहिं सुमिरै सोई ॥
 
पाँच वर्ष नित पाठ करावै ।
 
नौरातर महँ विप्र जिमावै ॥
 
निश्चय होंय प्रसन्न भवानी ।
 
पुत्र देहिं ताकहँ गुन खानी ॥
 
ध्वजा नारियल आनि चढ़ावै ।
 
विधि समेत पूजन करवावै ॥
 
नित प्रति पाठ करै मन लाई ।
 
प्रेम सहित नहिं आन उपाई ॥
 
यह श्री विन्ध्याचल चालीसा ।
 
रंक पढ़त होवे अवनीसा ॥
 
यह जनि अचरज मानहु भाई ।
 
मातु कृपा संभव होई जाई ॥
 
जय जय जय जगमातु भवानी ।
 
कृपा करहु मो पर जन जानी ॥
 
॥ इति श्री विन्ध्येश्वरी चालीसा समाप्त ॥

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